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‘ओवैसी मुस्लिमों के ठेकेदार नहीं, 20 करोड़ मुस्लिमों की तरफ से 5 एकड़ जमीन कैसे मना कर दिए?’

कॉन्ग्रेस नेता और कश्मीरी मुस्लिम सलमान निज़ामी ने अयोध्या फैसले में मुस्लिमों को बाबरी के एवज में मिली 5 एकड़ ज़मीन ख़ारिज कर कर देने के लिए अकबरुद्दीन ‘अच्छा वाला’ ओवैसी को आड़े हाथों लिया है। निज़ामी ने कहा कि 20 करोड़ मुलिमों के ओवैसी ठेकेदार नहीं हैं। उन्होंने मुस्लिमों से 5 एकड़ ज़मीन स्वीकार कर उस पर एक मस्जिद और एक दोनों मज़हबों के छात्रों के लिए शिक्षा केन्द्र बनाने की बात की है।

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लमिन (एआईएमआईएम) के अध्यक्ष और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने अदालत के फैसले को लेकर अपनी नाखुशी जाहिर की है। उन्होंने कहा कि वो इस फैसले से संतुष्ट नहीं हैं। उनका कहना है कि उन्हें खैरात में पाँच एकड़ जमीन नहीं चाहिए।

ओवैसी ने कहा, “मैं फैसले से खुश नहीं हूँ। सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम (सर्वोच्च) जरूर है, लेकिन वह अचूक नहीं है। हमें संविधान पर पूरा भरोसा है। हम अपने अधिकार के लिए लड़ रहे थे। हमें दान के रूप में पाँच एकड़ की जमीन नहीं चाहिए। हमें इस 5 एकड़ भूमि के प्रस्ताव को अस्वीकार करना चाहिए, हमें संरक्षण नहीं चाहिए।”

असदुद्दीन ओवैसी ने कॉन्ग्रेस को निशाने पर लेते हुए कहा कि कॉन्ग्रेस पार्टी ने भी आज अपना असली रंग दिखा दिया। कॉन्ग्रेस पार्टी पाखंडी और धोखेबाजों की पार्टी है। उनका कहना है कि अगर 1949 में मूर्तियों को नहीं रखा गया होता और तत्‍कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने ताले नहीं खुलवाए होते तो मस्‍जिद अभी भी होती। वहीं नरसिम्‍हा राव ने अपने कर्तव्यों का निर्वहन किया होता तो मस्‍जिद अभी भी होती।

बाबर के वंशज ने किया फैसले का स्वागत, कहा- मंदिर बनवाने के लिए सोने की ईंट भेंट करूँगा

सुप्रीम कोर्ट द्वारा अयोध्या विवाद पर सुनाए गए फैसले का बाबर के वंशज और मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फर के परपोते याकूब हबीबुद्दीन उर्फ़ प्रिंस तुसी ने भी स्वागत किया है। इसके साथ ही उन्होंने कहा है कि मंदिर निर्माण के लिए वे सोने की ईंट भी ट्रस्ट को देंगे।

प्रिंस तुसी ने फैसले को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि जिस तरह से देश में 26 जनवरी और 15 अगस्त को खुशियाँ मनाई जाती है, उसी तरह से आज के दिन को भी राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस फैसले को सभी पक्षों को कबूल करना चाहिए।

उन्होंने ने सभी से शांति कायम रखने की अपील करते हुए कहा, “जिस तरह से हिन्दू भाई हमारे फंक्शन रमजान में, बकरीद में हमारा साथ देते हैं, उसी तरह से इस फैसले के बाद हम सभी मिलकर राम मंदिर बनाएँ और जहाँ तक हमारे सोने की ईंट की बात थी, वो हम देंगे।”

साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि जितने नेताओं की भड़काने की दुकानें हैं, वो आपको भड़काने की कोशिश करेंगे। मगर आप उनके बहकावे में न आएँ। रामलला की जहाँ जगह थी, उसे कायम रखा जाएगा और फिर दोनों मजहब के लोग मिलकर वहाँ मंदिर बनाएँगे। सारी दुनिया देखेगी कि हिन्दुस्तान एक सेक्युलर देश है।

उल्लेखनीय है कि अयोध्या विवाद पर हो रही सुनवाई के दौरान याकूब हबीबुद्दीन तुसी ने अयोध्या में राम मंदिर की पहली ईंट रखने की ख्वाहिश जताई थी। तुसी ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की इच्छा जताते हुए कहा था, “हमारा परिवार उसकी पहली ईंट रखेगा और हम मंदिर की नींव के लिए सोने की शिला दान करेंगे।”

गजब की अनुभूति हो रही है, कारसेवा जैसी ख़ुशी हो रही है, आप सब को बधाई: PM मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने करतारपुर कॉरिडोर के उद्घाटन के समय कई ऐसी बातें कहीं, जिनकी सोशल मीडिया में ख़ूब चर्चा हुई। इस दौरान उन्होंने कारसेवा की बातें भी की, जिसका सिख धर्म में काफ़ी महत्व है। सिख धर्म की परिभाषा के अनुसार, कारसेवा वो सेवा है, जो आप बिना किसी फल की प्राप्ति की इच्छा लिए दूसरों के लिए करते हैं। इसका अर्थ है कि प्रत्येक जीव के अंदर भगवान हैं और उनकी सेवा करना ही कारसेवा है। किसी धार्मिक निर्माण कार्य में सहयोग करने को भी कारसेवा कहा जाता है। पीएम मोदी ने कहा:

“ये मेरा सौभाग्य है कि मैं आज देश को करतारपुर साहिब कॉरिडोर समर्पित कर रहा हूँ। जैसी अनुभूति आप सभी को ‘कार सेवा’ के समय होती है, वही मुझे इस वक्त हो रही है। मैं आप सभी को, पूरे देश को, दुनिया भर में बसे सिख भाई-बहनों को बहुत-बहुत बधाई देता हूँ।”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस बयान के कारण लोगों को विश्व हिन्दू परिषद की कारसेवा भी याद आ गई। राम मंदिर आंदोलन के दौरान विहिप ने कारसेवा का प्रयोग किया था और इसने जनांदोलन का रूप ले लिया था। देश भर से लाखों श्रद्धालु कारसेवा करने के लिए अयोध्या पहुँचे थे। विहिप और बजरंग दल ने हजारों-लाखों कारसेवकों की भीड़ अयोध्या में जुटाई थी। ऐसे में पीएम मोदी द्वारा करतारपुर कॉरिडोर के उद्घाटन के दौरान कारसेवा का जिक्र करने से लोगों को अनायास ही 90 के दशक में राम जन्मभूमि के लिए हुई कारसेवा की याद आ गई।

गुरदासपुर स्थित डेरा बाबा नानक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने करतारपुर कॉरिडोर के लिए इंटीग्रेटेड चेकपोस्ट का उद्घाटन किया। इस दौरान पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह भी वहाँ उपस्थित रहे। उन्होंने पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह के साथ लंगर में भोजन किया। इस दौरान पीएम मोदी ने याद दिलाया कि कैसे गुरु गोबिंद सिंह सहित सभी सिख गुरुओं ने देश की रक्षा और एकता के लिए बलिदान दिए हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि गुरु नानक देव न सिर्फ़ सिख समुदाय बल्कि पूरी मानवता के धरोहर हैं।

करतारपुर साहिब के उद्घाटन से सिखों में ख़ुशी का माहौल है क्योंकि इससे उन्हें गुरु नानक देव के पवित्र स्थल का दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त होगा। देशभर के कई सिखों ने पीएम मोदी को इसके लिए धन्यवाद दिया।

PM मोदी ने राष्ट्र को सम्बोधित किया, कहा-सुप्रीम कोर्ट का फैसला नया सवेरा लेकर आया है

आज सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसे महत्वपूर्ण मामले पर फैसला सुनाया है, जिसके पीछे सैकड़ों वर्षों का एक इतिहास है। पूरे देश की ये इच्छा थी कि इस मामले की अदालत में हर रोज सुनवाई हो, जो हुई, और आज निर्णय आ चुका है। दुनिया मानती है कि भारत का लोकतंत्र कितना जीवंत है। फैसला आने के बाद हर समुदाय और पंत के लोगों ने जिस प्रकार से इस स्‍वीकार किया है ये अदभुत है। भारत की पहचान विविधता में एकता की रही है।

फैसला आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राम मंदिर मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र को संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने जो बातें कही वो इस प्रकार है:

  • आइए, इस अहम और पवित्र पड़ाव पर हम संकल्प लें कि गुरु नानक जी के वचनों को अपने जीवन का हिस्सा बनाएंगे। हम समाज के भीतर सद्भाव पैदा करने के लिए हर कोशिश करेंगे।
  • आज सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसे महत्वपूर्ण मामले पर फैसला सुनाया है, जिसके पीछे सैकड़ों वर्षों का एक इतिहास है।पूरे देश की ये इच्छा थी कि इस मामले की अदालत में हर रोज़ सुनवाई हो, जो हुई, और आज निर्णय आ चुका है।
  • फैसला आने के बाद जिस प्रकार हर वर्ग ने, हर समुदाय ने, हर पंथ के लोगों ने, पूरे देश ने खुले दिल से इसे स्वीकार किया है, वो भारत की पुरातन संस्कृति, परंपराओं और सद्भाव की भावना को प्रतिबिंबित करता है।
  • भारत की न्यायपालिका के इतिहास में भी आज का ये दिन एक स्वर्णिम अध्याय की तरह है। इस विषय पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सबको सुना, बहुत धैर्य से सुना और सर्वसम्मति से फैसला दिया।
  • सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले के पीछे दृढ़ इच्छाशक्ति दिखाई है। और इसलिए, देश के न्यायधीश, न्यायालय और हमारी न्यायिक प्रणाली अभिनंदन के अधिकारी हैं।
  • आज अयोध्या पर फैसले के साथ ही, 9 नवंबर की ये तारीख हमें साथ रहकर आगे बढ़ने की सीख भी दे ही है। आज के दिन का संदेश जोड़ने का है-जुड़ने का है और मिलकर जीने का है। नए भारत में भय, कटुता, नकारात्मकता का कोई स्थान नहीं है।
  • सर्वोच्च अदालत का ये फैसला हमारे लिए एक नया सवेरा लेकर आया है। इस विवाद का भले ही कई पीढ़ियों पर असर पड़ा हो, लेकिन इस फैसले के बाद हमें ये संकल्प करना होगा कि अब नई पीढ़ी, नए सिरे से न्यू इंडिया के निर्माण में जुटेगी।
  • अब समाज के नाते, हर भारतीय को अपने कर्तव्य, अपने दायित्व को प्राथमिकता देते हुए काम करना है। हमारे बीच का सौहार्द, हमारी एकता, हमारी शांति, देश के विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

ग़ौरतलब है कि एक ऐतिहासिक फ़ैसले के तहत, CJI रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की 5-जजों की बेंच ने अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए 2.77 एकड़ की पूरी राम जन्मभूमि साइट को सौंप दी। साथ ही, अदालत ने सरकार से कहा कि वह अयोध्या में सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के प्रतिनिधित्व वाले मुस्लिम पक्षकारों को मस्जिद निर्माण के लिए 5 एकड़ ज़मीन प्रदान करे। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार से 3 महीने के भीतर इसके लिए एक योजना तैयार करने को कहा है। सरकार को मंदिर निर्माण के लिए न्यास बोर्ड का गठन करना होगा।

कटाक्ष: लिबरलों को रुदन कक्ष, रवीश-राठी-कामरा के लिए चिराँध योजना। Ajeet Bharti on Liberals meltdown

जहाँ रवीश कुमार को अनपढ़ रवीश भक्तों से जोड़ने के लिए सरकार द्वारा पेपर रोल देने का निर्देश है, वहीं कामरा-राठी जैसे लौंडों के लिए जज ने चिरकुट रोजगार एवं नल्लारोधी धमाका (ChiRAnDh) योजना बनाने के आदेश दिए हैं।

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‘पापा मोदी’, हिम्मत है तो राम मंदिर बनाओ और अनुच्छेद 370 हटाओ: कबूल हुई शेहला रशीद की दोनों दुआएँ

मोदी सरकार ने शेहला रशीद की दोनों इच्छाएँ पूरी कर दी हैं। अगर आपको लगता है कि हम मजाक कर रहे हैं तो आप ग़लत हैं। दरअसल, ट्विटर पर शेहला रशीद ने राम मंदिर को लेकर कई बार टिप्पणी की थी। जेएनयू की छात्र नेता रहीं शेहला ने जम्मू कश्मीर की राजनीति में भी क़दम रखा था लेकिन अनुच्छेद 370 के प्रावधानों के निरस्त होने के कारण उन्हें राजनीति से सन्यास लेना पड़ा। इसके लिए उन्होंने लम्बा-चौड़ा फेसबुक पोस्ट लिख कर मोदी सरकार पर निशाना साधा। अगर अनुच्छेद 370 की बात करें तो इसके हटने के पहले भी वह कई बार इसके लिए सरकार पर निशाना साध चुकी थीं।

शेहला रशीद ने एक बार ट्वीट कर के कहा था:

“अयोध्या में कॉर्पोरेटर, विधायक और सांसद- सभी भाजपा के हैं। राज्य में भी भाजपा की सरकार है। केंद्र में तो भाजपा की सरकार है ही। तो फिर राम मंदिर क्यों नहीं बना? अगर ये चुनावी मुद्दा है तो जनता को भाजपा को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा देना चाहिए।”

शेहला रशीद का ट्वीट, जिसमें उन्होंने राम मंदिर को लेकर तंज कसा था

अब शेहला रशीद की इच्छा पूरी हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या मामले में ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाते हुए पूरी की पूरी विवादित ज़मीन रामलला विराजमान को देने का आदेश दिया है। मुस्लिम पक्ष का वहाँ किसी प्रकार का स्वामित्व नहीं है, ऐसा सुप्रीम कोर्ट ने कहा है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मुस्लिमों को अयोध्या में ही कहीं और 5 एकड़ ज़मीन दी जाए। इस सम्बन्ध में केंद्र सरकार से एक ट्रस्ट बना कर मंदिर निर्माण के सम्बन्ध में योजना बनाने को कहा गया है। यानी, मंदिर निर्माण को लेकर मोदी सरकार द्वारा गठित ट्रस्ट योजना बनाएगा।

शेहला रशीद ने राम मंदिर को लेकर मोदी समर्थकों पर किया था कटाक्ष

इस तरह से राम मंदिर के निर्माण का कार्य भी मोदी सरकार करेगी और शेहला रशीद की ये इच्छा भी पूरी हो जाएगी। शेहला ने एक बार और किसी व्यक्ति को जवाब देते हुए कहा था कि ‘राम मंदिर ले लो।’ शेहला रशीद अक्सर राम मंदिर को लेकर मोदी सरकार और मोदी समर्थकों पर कटाक्ष करती रहती हैं। सोशल मीडिया पर लोगों ने शेहला रशीद की उन ट्वीट्स को जम कर शेयर किया और उन्हें याद दिलाया कि उनकी इच्छा पूरी हो गई है।

इतना ही नहीं, अनुच्छेद 370 को लेकर भी शेहला रशीद मोदी सरकार पर तंज कसती रहती थीं। शायद उन्हें ऐसा लगता था कि बाकि सरकारों की तरह इस बार भी सिर्फ़ बातें ही की जाएँगी और एक्शन नहीं लिया जाएगा। अनुच्छेद 370 के बारे में शेहला ने कहा था:

“अरे ट्रोल्स की ही तो हुकूमत चल रही है। बोलो ट्रोल्स के पापा से कि हिम्मत है तो हटा के दिखाए अनुच्छेद 370।”

शेहला के कटाक्ष के बाद अनुच्छेद 370 के प्रावधान भी निरस्त हो गए

भले ही शेहला रशीद जैसे लोग राम मंदिर और अनुच्छेद 370 हटाने के कट्टर विरोधी रहे हों लेकिन वो समझते थे कि भाजपा के कार्यकाल में यह सब नहीं हो पाएगा। उन्होंने इसे राजनीतिक जुमला समझने की भूल की। अब इस भूल का परिणाम सामने है। शेहला के पास शायद ही अब बोलने के लिए शब्द हों।

मुस्लिमों के लिए अयोध्या की महत्ता नहीं, कोई औलिया या पीर यहाँ से नहीं जुड़ा: पद्मश्री मोहम्मद

अयोध्या मामले का फैसला आने के बाद विवाद के पटाक्षेप का एएसआई (आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया) के पूर्व निदेशक के के मोहम्मद ने स्वागत किया है। उन्होंने इसे ‘सबसे अच्छा’ फैसला बताया है।

टाइम्स नाउ से बात करते हुए एएसआई (उत्तरी) के पूर्व निदेशक मोहम्मद ने कहा कि अयोध्या और जन्मभूमि हिन्दुओं के लिए वैसे ही पवित्र और महत्वपूर्ण है, जैसे मुस्लिमों के लिए मक्का और मदीना हैं। उन्होंने यह भी कहा कि मुस्लिमों के लिए इसकी उतनी ज़्यादा कोई महत्ता नहीं है, क्योंकि कोई बड़ा औलिया या पीर इस स्थान से जुड़ा नहीं रहा है।

इसके अलावा एएनआई से बात करते हुए उन्होंने कहा कि एक ‘गैंग’ ने उन्हें उस समय परेशान करना शुरू कर दिया था, जब उन्होंने कहा था कि पुरातात्विक साक्ष्य उस जगह पर मंदिर होने की ओर इंगित करते हैं।

आज अयोध्या पर फैसले की ऐतिहासिक घड़ी में मोहम्मद को याद भी खूब किया जा रहा है। हिन्दू उनके प्रति कृतज्ञता जता रहे हैं कि उन्होंने हिन्दुओं की आस्था के पक्ष में क़ानूनी सबूत ढूँढ़ निकाले।

लेखक और वैज्ञानिक आनंद रंगनाथन वह वाकया याद दिला रहे हैं जिसमें के के मोहम्मद को धमकी दी गई थी कि बाबरी का सच जनता को बताने पर उन्हें सस्पेंड कर देने की धमकी दी गई थी। इसके बाद मोहम्मद ने संस्कृत में जवाब में कहा था, “लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन् कर्तुमर्हसि। स्वधर्मे निधनं श्रेयः…”

संक्रांत सानु और संजय दीक्षित जैसे हिंदूवादी विचारकों ने भी आज मोहम्मद के उस आरोप को याद किया कि मुस्लिम पक्ष को भी ‘सेक्युलर’ गैंग ने ही राम मंदिर के खिलाफ भड़काया था।

रामलला के तुलसी: 92 की उम्र में लड़ा अयोध्या का धर्मयुद्ध, दलीलों से मुस्लिम पक्ष को किया चित

भारतीय न्यायिक व्यवस्था में वकालत की दुनिया के पितामह कहे जाने वाले के पराशरण की अंतिम इच्छा पूरी हो गई। वे अपनी मृत्यु से पहले यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि रामलला अपनी जमीन पर​ कानूनी तौर से विराजमान हो जाएँ। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से उनकी यह मुराद पूरी हो गई है।

सुप्रीम कोर्ट में रामलला विराजमान की तरफ से उन्होंने ही दलीलें पेश की थी। सुनवाई के दौरान ऐसी-ऐसी दलीलें रखी कि मुस्लिम पक्ष उसकी काट नहीं तलाश पाए। शीर्ष अदालत पूरी सुनवाई उनकी दलीलों के इर्द-गिर्द ही घूमती रही। उन्होंने पूरे राम जन्मभूमि को न्यायिक व्यक्ति अथवा ज्यूरिस्टिक पर्सन साबित करने की कोशिश की। हालाँकि, अंत में उनकी यह दलील कोर्ट ने स्वीकार नहीं की, लेकिन पूरी सुनवाई इसी के आसपास घूमती रही।

जब सुनवाई चालू होनी थी, उससे पहले सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के वकील राजीव धवन ने कहा था कि के. पराशरण के लिए ये प्रक्रिया काफ़ी थकाऊ होगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पराशरण ने घंटों खड़े होकर बहस की। अदालत में जजों ने उनकी उम्र को देखते हुए उन्हें बैठ कर बहस करने की सहूलियत दी, लेकिन पराशरण ने कहा कि इंडियन बार की जो परंपरा है, वह उसी हिसाब से चलेंगे। उनका जन्म अक्टूबर 9, 1927 को हुआ था। वह 1983 से 1989 तक भारत के अटॉर्नी जनरल रह चुके हैं।

के पराशरण तमिलनाडु से लेकर केंद्र तक, प्रत्येक सरकारों के फेवरिट रहे हैं। उनके पिता केशव अय्यंगर भी एक वकील थे। उनके दोनों बेटे मोहन पराशरण और सतीश पराशरण भी वकील हैं। भारत के अटॉर्नी जनरल रहने से पहले वह 1976-77 में तमिलनाडु के सॉलिसिटर जनरल भी रह चुके हैं। इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी के शासनकाल में भी वह इस पद पर रहे। कॉन्ग्रेस सरकारों के दौरान वो महत्वपूर्ण पदों पर रहे, लेकिन उनकी विद्वता का लोहा भी राजनीतिक दलों, नेताओं और सरकारों ने माना। तभी तो तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने जब संविधान की वर्किंग के लिए ड्राफ्टिंग एंड एडिटोरियल कमिटी बनाई तो पराशरण को भी उसमें शामिल किया गया।

पराशरण छात्र जीवन से ही विलक्षण प्रतिभा के धनी रहे हैं। उन्हें बीए के कोर्स के दौरान सीवी कुमारस्वामी शास्त्री संस्कृत मेडल और हिन्दू लॉ में जस्टिस वी भाष्यम अयंगर गोल्ड मेडल मिला। तब वो बीएल कर रहे थे, जिसे अब बीए एलएलबी के नाम से जाना जाता है। फिर बार कॉउन्सिल की परीक्षा में उन्हें जस्टिस श्री केएएस कृष्णास्वामी अयंगर गोल्ड मेडल मिला। आप इसी से समझ सकते हैं कि उन्होंने छात्र जीवन के दौरान ही क़दम-क़दम पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। भगवान राम के लिए, रामकाज के लिए- भला उनसे बेहतर वकील कहाँ मिलता?

राम मंदिर का मामला उन्होंने यूँ ही नहीं लड़ा। उन्हें भारतीय इतिहास, वेद-पुराण और धर्म का वृहद ज्ञान है। यही कारण है कि सुनवाई के दौरान भी वह अदालत में स्कन्द पुराण के श्लोकों का जिक्र कर राम मंदिर का अस्तित्व साबित करते रहे। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में जिरह की शुरुआत ही ‘जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ श्लोक के साथ की थी। वाल्मीकि रामायण में ये बात श्रीराम ने अपने भाई लक्ष्मण से कही थी। जहाँ भी आस्था का मामला हो, जहाँ भी धार्मिक विश्वास का मामला हो, वहाँ धर्म की ओर से, श्रद्धा की ओर से, पराशरण ही वकील होते हैं। उन्होंने सरकार के ख़िलाफ़ जाकर रामसेतु बचाने के लिए केस लड़ा।

सबरीमाला मामले में भी श्रद्धालुओं की तरफ़ से पराशरण ही वकील थे। पराशरण मजाक-मजाक में वकालत को अपनी दूसरी पत्नी बताते हैं। 24 घंटे में 18 घंटे वकालत सम्बन्धी कामकाज और अध्ययन में बिताने वाले पराशरण ने बताया था कि वो अपनी पत्नी से भी ज्यादा समय वकालत को देते हैं। सुप्रीम कोर्ट के जज संजय किशन कॉल ने अपनी पुस्तक में उनके लिए ‘पितामह ऑफ इंडियन बार’ शब्द प्रयोग किया। वकालत के कुछ छात्रों ने मिल कर के पराशरण पर ‘Law and Dharma: A tribute to the Pitamaha of the Indian Bar’ नामक पुस्तक भी लिखी है, जिसमें उनके बारे में लिखा गया है।

इस मौके पर जस्टिस संजय किशन कौल कहा कि पराशरण न सिर्फ़ बार बल्कि बेंच के युवा सदस्यों का मार्गदर्शन करने के लिए सबसे उपयुक्त व्यक्ति हैं। ‘सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ छत्तीसगढ़’ के कुलपति एनआर माधव मेनन ने पराशरण को तीन गुणों का मिश्रण बताया। उनका मानना है कि पराशरण अध्यात्म के साथ-साथ मानवता और सादगी के प्रोफेशनल प्रतीक हैं। पराशरण कहते हैं कि जीवन में कोई भी फ़ैसला लेने से पहले धर्म के प्रति हमें सचेत रहना चाहिए।

बहुत कम लोगों को पता है कि पराशरण को 2012 में राज्यसभा के लिए नामित किया गया था। वह राज्यसभा सांसद भी रह चुके हैं। उन्हें 2003 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। उन्हें 2011 में पद्म विभूषण मिला। शनिवार (नवंबर 9, 2019) को जब सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या मामले में फ़ैसला सुना कर वहाँ मंदिर बनाने का मार्ग प्रशस्त कर दिया, पराशरण को ख़ुशी तो हुई लेकिन उन्हें बोरियत भी महसूस हुई। वह पिछले 8 महीनों से इस काम में इतने लीन हो गए थे कि अब उन्हें समझ ही नहीं आ रहा कि उनका समय कैसे व्यतीत होगा? पराशरण की टीम में जितने भी वकील थे, उनकी ऊर्जा देख कर वो सभी अचम्भे में थे और पिछले कुछ महीने उनके लिए यादगार बन गए। उन्हें काफ़ी कुछ सीखने को मिला।

आपको 16 अक्टूबर की एक बात याद दिलानी ज़रूरी है। जब सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई ख़त्म हुई, तब पराशरण कोर्ट के बाहर 15 मिनट तक किसी का इन्तजार करते रहे। वो राजीव धवन का इन्तजार कर रहे थे। वही धवन, जिन्होंने 40 दिन की सुनवाई के दौरान कई बार आपा खोया जबकि पराशरण एकदम शांत और गंभीर बने रहे। पराशरण ने धवन के साथ फोटो खिंचवा कर देश-दुनिया को यह सन्देश दिया कि प्रोफेशनल रूप से भले ही आप एक-दूसरे से लड़ें, लेकिन अंत में शांति और समरसता की ही जीत होनी चाहिए।

इतिहास में जब भी ऐतिहासिक राम मंदिर फ़ैसले की बात होगी, पराशरण के जिक्र ज़रूर आएगा क्योंकि पूरा मामले उनके इर्द-गिर्द घूमा और हिन्दुओं की इस विजय में श्रीराम के इस सेनानी का महान योगदान रहा। हिन्दुओं की भी यही इच्छा है कि पराशरण अपने जीवनकाल में भव्य राम मंदिर निर्माण का गवाह बनें। हम भी उनकी लम्बी उम्र और उत्तम स्वास्थ्य की कामना करते हैं।

देश हिंदू राष्‍ट्र की ओर आगे बढ़ रहा, अब वे काशी और मथुरा पर भी अपना दावा ठोकेंगे: असंतुष्ट ओवैसी

सालों से चले आ रहे अयोध्या विवाद पर देश की सर्वोच्च अदालत ने शनिवार (नवंबर 9, 2019) को अपना फैसला सुना दिया। सभी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान किया और शांति बनाए रखने की अपील की। पीएम मोदी ने भी इसे हार और जीत के रूप में न लेने की बात कही। वहीं ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लमिन (एआईएमआईएम) के अध्यक्ष और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने अदालत के फैसले को लेकर अपनी नाखुशी जाहिर की है। उन्होंने कहा कि वो इस फैसले से संतुष्ट नहीं हैं। उनका कहना है कि उन्हें खैरात में पाँच एकड़ जमीन नहीं चाहिए।

ओवैसी ने कहा, “मैं फैसले से खुश नहीं हूँ। सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम (सर्वोच्च) जरूर है, लेकिन वह अचूक नहीं है। हमें संविधान पर पूरा भरोसा है। हम अपने अधिकार के लिए लड़ रहे थे। हमें दान के रूप में पाँच एकड़ की जमीन नहीं चाहिए। हमें इस 5 एकड़ भूमि के प्रस्ताव को अस्वीकार करना चाहिए, हमें संरक्षण नहीं चाहिए।”

असदुद्दीन ओवैसी ने कॉन्ग्रेस को निशाने पर लेते हुए कहा कि कॉन्ग्रेस पार्टी ने भी आज अपना असली रंग दिखा दिया। कॉन्ग्रेस पार्टी पाखंडी और धोखेबाजों की पार्टी है। उनका कहना है कि अगर 1949 में मूर्तियों को नहीं रखा गया होता और तत्‍कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने ताले नहीं खुलवाए होते तो मस्‍जिद अभी भी होती। वहीं नरसिम्‍हा राव ने अपने कर्तव्यों का निर्वहन किया होता तो मस्‍जिद अभी भी होती।

उन्होंने कहा कि मस्जिद की जमीन का कोई सौदा नहीं किया जा सकता। ओवैसी ने मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को इस पर विचार करने के लिए कहा है। उन्होंने कहा कि अगर बाबरी मस्जिद नहीं टूटती तो उच्चतम न्यायालय क्या फैसला लेता? साथ ही उनका यह भी कहना है कि भाजपा चुनावों में इन चीजों का इस्तेमाल करेगी।

ओवैसी ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा कि जिन लोगों ने बाबरी मस्‍जिद गिराई, उन्‍हीं को कोर्ट ने ट्रस्‍ट बनाने और मंदिर निर्माण का जिम्‍मा सौंप दिया है। इससे साफ लगा रहा है कि यह देश अब हिंदू राष्‍ट्र की ओर आगे बढ़ रहा है। अब वे काशी और मथुरा पर भी अपना दावा ठोकेंगे। ओवैसी ने कहा कि वो अपने निजी घर का सौदा कर सकते हैं, मगर मस्जिद की जमीन का सौदा नहीं कर सकते। हिन्दुस्तान का मुस्लिम इतना गिरा नहीं है कि वो 5 एकड़ की जमीन भीख लेंगे।

बता दें कि कोर्ट ने अपने फैसले में विवादित जमीन रामलला विराजमान को देने का फैसला किया है, जबकि मुस्लिम पक्ष को अयोध्या में ही दूसरी जगह 5 एकड़ जमीन देने का आदेश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने विवादित जमीन रामलला को इसलिए दी, क्योंकि मुस्लिम पक्ष जमीन पर दावा साबित करने में नाकाम रहा। जिसके बाद कोर्ट ने राम मंदिर निर्माण की रूपरेखा तय करने की जिम्मेदारी केंद्र सरकार को दी है। कोर्ट ने केंद्र से तीन महीने के अंदर ट्रस्ट बनाने के लिए कहा है।

जिन सबूतों से बाबरी मस्जिद का दावा कमजोर साबित हुआ उन्हें जुटाने वालों में 53 मुस्लिम थे

अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला दिया है उसका आधार भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की रिपोर्ट भी है। 2003 में इलाहाबाद हाई कोर्ट के निर्देश पर यहॉं खुदाई थी। हाई कोर्ट के फैसले का भी य​ह रिपोर्ट आधार बनी थी। सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने फैसले में कहा है कि एएसआई की रिपोर्ट से पता चलता है कि बाबरी मस्जिद के नीचे कोई ढाँचा था। यह ढॉंचा इस्लामिक नहीं था यह भी शीर्ष अदालत ने माना है। हालॉंकि चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अगुवाई वाली पीठ ने यह भी कहा है कि एएसआई की रिपोर्ट से यह साबित नहीं होता कि मंदिर ध्वस्त कर मस्जिद बनाई गई थी।

यह रिपोर्ट बताती है कि अयोध्या सिर्फ हिंदुओं की मान्यता नहीं है। मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाने की बात कोरी आस्था नहीं है। हाई कोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट में भी जिन पुरातात्विक सबूतों से बाबरी मस्जिद का दावा कमजोर साबित हुआ, उन्हें जुटाने वालों में 53 मुस्लिम थे। इनमें सबसे प्रमुख नाम केके मुहम्मद का है।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के क्षेत्रीय निदेशक रहे केके मुहम्मद मलयालम में लिखी अपनी आत्मकथा ‘जानएन्ना भारतीयन’ में बताते हैं कि 1976-77 में ही इस बात के सबूत मिल चुके थे कि बाबरी मस्जिद असल में मंदिर है। उनकी आत्मकथा हिंदी में ‘मैं भारतीय हूॅं’ नाम से है। वैसे, ब्रिटिश राज में पीटर कारनेगी ने भी लिखा था, “यह बात स्थानीय तौर पर पुष्ट होती है कि मुस्लिमों की विजय के वक्त अयोध्या में तीन महत्वपूर्ण हिंदू मंदिर थे। जन्मस्थान मंदिर, स्वर्गद्वार मंदिर और ठाकुर मंदिर। पहले पर बाबर ने मस्जिद बनवा दी, जिस पर अभी भी उसका नाम खुदा है। दूसरे मंदिर के साथ औरंगजेब ने वैसा ही किया। तीसरे पर भी बाद में मस्जिद बना दी गई। ये सब इस्लाम के उस मशहूर सिद्धांत के आधार पर किया गया, जिसके तहत उन सभी पर धर्म थोप दिया जाता है, जिन्हें जीत लिया गया हो।”

कारनेगी फैजाबाद का पहला ब्रिटिश कमिश्नर था। उसने ही अवध का पहला गजेटियर तैयार किया था। कारनेगी के लिखे से जाहिर है कि बाबरी मस्जिद उसी जगह पर बनाई गई थी, जो जन्मस्थान है। फैजाबाद अदालत के मुलाजिम हफीजुल्ला ने भी 1822 में सरकार को एक रिपोर्ट भेजी थी जिसमें कहा गया था कि राम के जन्मस्थान पर बाबर ने मस्जिद बनवाई थी।

यदि कारनेगी और हफीजुल्ला के दावों को नकार दें तो भी खुदाई से मिले साक्ष्य बार-बार इस सत्य को दुहराते हैं कि बाबरी मस्जिद असल में मंदिर के मलबे पर खड़ा किया गया था। मुहम्मद अपनी आत्मकथा में लिखते हैं, “हमें विवादित स्थल से 14 स्तंभ मिले थे। सभी स्तंभों में गुंबद खुदे हुए थे। ये 11वीं और 12वीं शताब्दी के मंदिरों में मिलने वाले गुंबद जैसे थे। गुंबद में ऐसे 9 प्रतीक मिले हैं, जो मंदिर में मिलते हैं।”

1976-77 में पुरातात्विक अध्ययन के लिए अयोध्या में प्रो. बीबी लाल की अगुवाई में खुदाई हुई थी। इस टीम में मुहम्मद भी थे। बकौल मोहम्मद, “खुदाई के लिए जब हम वहॉं पहुॅंचे तो मस्जिद की दीवारों में मंदिर के खंभे साफ-साफ दिखाई देते थे। मंदिर के उन स्तंभों का निर्माण ‘ब्लैक बसाल्ट’ पत्थरों से किया गया था। स्तंभ के नीचे भाग में 11वीं और 12वीं सदी के मंदिरों में दिखने वाले पूर्ण कलश बनाए गए थे। मंदिर कला में पूर्ण कलश 8 ऐश्वर्य चिन्हों में एक माने जाते हैं।”

एक इंटरव्यू में मोहम्मद ने बताया था कि उस समय इन साक्ष्यों पर उतनी बात नहीं हुई। जब अयोध्या का विवाद गहराया तो उस उत्खनन की रिपोर्ट को लेकर संदेह जताए गए। इसके बाद हाई कोर्ट के आदेश पर एएसआई ने 12 मार्च 2003 से 7 अगस्त 2003 के बीच राम जन्मभूमि परिसर की खुदाई की। खुदाई में कुल 137 मजदूर लगाए गए थे, जिनमें से 52 मुस्लिम थे।

खुदाई के बाद एएसआई ने 22 सितंबर 2003 को अपनी 574 पन्नों की रिपोर्ट हाई कोर्ट को सौंपी। इन्हीं साक्ष्यों के आधार पर हाई कोर्ट के तीन जजों ने माना कि विवादित स्थल का केंद्रीय स्थल रामजन्मभूमि ही है। खास बात यह रही कि तीनों जज गर्भगृह के सवाल पर एकमत थे। अब सुप्रीम कोर्ट की पॉंच सदस्यीय पीठ के भी फैसले से इस पर मुहर लग गई है।

हेमंत शर्मा ने अपनी किताब ‘युद्ध में अयोध्या’ और ‘अयोध्या का चश्मदीद’ में 2003 में हुई खुदाई का विस्तार से ब्यौरा दिया है। वे लिखते हैं, “एएसआई ने कुल 90 खाइयाँ खोदीं। पूरे क्षेत्र को पॉंच हिस्सों में बॉंटा। इनमें पूर्वी, दक्षिणी, पश्चिमी, उत्तरी क्षेत्र और उभरा हुआ प्लेटफॉर्म शामिल था। सभी क्षेत्रों में क्रमवार खुदाई हुई, जिससे ढॉंचों की प्रकृति और उसकी सांस्कृतिकता का अंदाजा लगे। जो अवशेष मिले, उससे साबित होता था कि वहाँ 11वीं शताब्दी का हिंदू मंदिर था।”

खुदाई के दौरान निष्पक्षता और पारदर्शिता को लेकर सवाल नहीं उठे, इसके भी बकायदा इंतजाम किए गए थे। हेमंत शर्मा ने इसका ब्यौरा देते हुए लिखा है, “समूची खुदाई और ढॉंचों के अभिलेखीकरण की पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी की गई। खुदाई न्यायिक पर्यवेक्षकों, वकीलों और संबंधित पक्षों या उनके नामित व्यक्तियों की मौजूदगी में संपन्न हुई। खुदाई में पारदर्शिता हो, इस खातिर सारी उत्खनित सामग्री दोनों पक्षों की मौजूदगी में ही सील की जाती थी। इसे उसी दिन फैजाबाद के कमिश्नर की ओर से उपलब्ध कराए गए स्ट्रांग रूम में रखा जाता था। हर रोज इस स्ट्रांग रूम को बंद करने के बाद सील किया जाता था।”

एएसआई की रिपोर्ट में खुदाई के दौरान पाए गए अभिलेखों के तीन हिस्सों पर एक संक्षिप्त टिप्पणी भी है। इनमें एक नागरी में और दो अरबी में पाए गए थे। अरबी अभिलेख में एक 16वीं शताब्दी की नस्ख शैली में था। इसमें कुरान की एक आयत खुदी थी। दूसरा अरबी अभिलेख भी 16वीं शताब्दी के शुरुआत की शैली में था। इसमें अल्लाह शब्द खुदा था। एएसआई के मुताबिक नागरी का पॉंच वर्णों वाला अभिलेख 11वीं शताब्दी का था। मुहम्मद बताते हैं कि विवादित ढॉंचा विध्वंस के बाद मलबे से ‘विष्णु हरिशिला पटल’ मिला था। इसमें 11वीं और 12वीं सदी की नागरी लिपि में संस्कृत भाषा में लिखा गया है, “यह मंदिर बाली और दस हाथों वाले (रावण) को मारने वाले विष्णु (श्रीराम विष्णु के अवतार माने जाते हैं) को समर्पित किया जाता है।”

दैनिक जागरण की एक रिपोर्ट के अनुसार, एएसआई की रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि विवादित ढॉंचे के ठीक नीचे एक बड़ी संरचना मिली है। जो अवशेष मिले हैं वह ढॉंचे के नीचे उत्तर भारत के मंदिर होने का संकेत देते हैं। यही नहीं 10वीं शताब्दी के पहले उत्तर वैदिक काल तक की मूर्तियाँ और अन्य वस्तुओं के खंडित अवशेष मिले हैं। इनमें शुंग काल की चूना पत्थर की दीवार और कुषाण काल की बढ़ी संरचना शामिल है।

एएसआई रिपोर्ट में कहा गया है कि विवादित ढांचे के नीचे मिली विशाल संरचना में नक्काशीदार ईंटें, देवताओं की युगल खंडित मूर्तियाँ, नक्काशीदार वास्तुशिल्प, पत्तों के गुच्छे, अमालका, कपोतपाली, दरवाजों के हिस्से, कमल की आकृति जैसी चीजें मिली हैं। विवादित मस्जिद के ठीक नीचे मिले इमारत का आकार 50 गुना 30 मीटर उत्तर-दक्षिण और पूरब-पश्चिम था। इसके 50 खम्भों के आधार मिले हैं। इसके केंद्र बिंदु के ठीक ऊपर विवादित मस्जिद के बीच का गुंबद है, जहाँ अस्थायी मंदिर में भगवान राम की मूर्तियॉं रखी होने की वजह से खुदाई नहीं हो सकी।

तीन अभिलेख। दो अरबी में और एक नागरी में। अरबी के दोनों अभिलेख 16वीं शताब्दी के। पॉंच वर्णों का नागरी अभिलेख 11वीं शताब्दी का। 16वीं शताब्दी के बाद का इतिहास तो आपको वामपंथी इतिहासकारों ने खूब पढ़ाया है। और ये भी कि मंदिर तोड़कर बाबरी मस्जिद नहीं बनाई गई थी!

पुरातत्व की इसी ताकत को देख अमेरिकी पुरातत्वविद सारा पर्कक ने कहा है;

पुरातत्व उन सारी बातों को समझने की कुॅंजी है कि हम कौन हैं और कहॉं से आते हैं।