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माओवादियों के मारे जाने पर पुलिस को दी थी धमकी, CPI-M के एलन सुहैब, थाहा फज़ल गिरफ़्तार

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी- मार्क्सवादी (CPI-M) के दो कार्यकर्ताओं को केरल पुलिस ने 2 नवंबर को माओवादियों के साथ कथित संबंधों का ज़िम्मेदार ठहराते हुए गिरफ़्तार कर लिया है। केरल के पलक्कड़ ज़िले में चार माओवादियों के मारे जाने पर दोनों ने पुलिस बल के थंडरबोल्ट कमांडो की आलोचना भी की थी।

जिन दो लोगों को गिरफ़्तार किया गया है उनकी पहचान एलन सुहैब और थाहा फ़ज़ल के रुप में हुई है। उन्होंने माओवादियों के मारे जाने पर राज्य पुलिस को धमकाते हुए नोटिस भी जारी किए थे। प्रारम्भिक जाँच में, पुलिस ने दावा किया है कि इस बात के ठोस सबूत हैं कि दोनों ने माओवादी पदाधिकारियों के साथ संपर्क बना रखा था।

इस बात पर भी ग़ौर किया जाना चाहिए कि दोनों आरोपितों की गिरफ़्तारी ग़ैर-कानूनी गतिविधियों (रोकथाम) अधिनियम के कड़े प्रावधानों के तहत की गई है, जो संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित करने और संबंधित गतिविधियों पर रोक लगाने या आतंकवाद को बढ़ावा से रोक लगाने के संबंध में पारित किया गया था।

ख़बर के अनुसार, एलन सुहैब और थाहा फ़ज़ल को शुक्रवार की रात को पंथीरनकवु से हिरासत में ले लिया गया। उन पर सेक्शन-20 (एक आतंकवादी गिरोह या संगठन का सदस्य होने की सज़ा), 38 (आतंकवादी संगठन की सदस्यता से संबंधित अपराध) और 39 (ग़ैर-क़ानूनी गतिविधियों के लिए आतंकवादी संगठन को समर्थन देने से संबंधित अपराध) के तहत मामला दर्ज किया गया है।

पुलिस ने बताया कि दोनों कार्यकर्ता क्रमशः कानून और पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे हैं, उन पर माओवादी पदाधिकारियों के साथ संपर्क बनाए रखने का संदेह था। मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने राज्य पुलिस प्रमुख लोकनाथ बेहरा से गिरफ़्तारी की रिपोर्ट माँगी है।

पुलिस ने ख़ुलासा किया है कि सुहैब और फ़ज़ल की तलाशी के दौरान उन्होंने माओवादी विचारधारा को बढ़ावा देने वाले पर्चे बरामद किए हैं। पुलिस ने अब तीसरे ऐसे व्यक्ति की तलाश तेज़ कर दी है, जो पुलिस बल को देखकर मौके से भाग गया था।

काले बाल ब्राह्मणों की साजिश, मूल निवासियों को दो हर जगह नीले बाल: दिलीप सी मंडल

नारीवाद का चिंतन जैसे राह भटक कर पीरियड्स के पैड्स और ‘नो ब्रा डे’ तक सीमित होने से ले कर स्वच्छंद संभोग और सिर्फ संभोग तक ही सिमट गया, वैसे ही दलित चिंतन की फुलवारी लगाने वाले आज कल हर बात में जनेऊ और ब्राह्मणवाद ढूँढ लेते हैं। पूरी दुनिया कथित दलितों के साथ साजिश में लगी हुई है और सारा विश्व भारत के ब्राह्मणों द्वारा संचालित है, ऐसा दलित चिंतन के अग्रणी दिलीप सी मंडल का मानना है।

दिलीप सी मंडल के नाम का ‘सी’ कई लोगों द्वारा कई अर्थों में लिया जा चुका है और सर्वाधिक प्रचलित मत वही है जो आप समझ रहे हैं। आर्यन आक्रमण थ्योरी जबसे ध्वस्त हुई है तब से इनका चिंतन थोड़ा कमजोर पड़ गया है। साथ ही, दलितों की स्वघोषित मसीहा मायावती को जब से दलितों के नए स्वघोषित मसीहा चंद्रशेखर ने चुनावों के समय नकारा है, तब से दलित चिंतन चर्चा से गायब हो गया था।

रोहित वेमुला की सच्चाई भी सामने आ गई और वेमुला स्वयं राजनीति में नहीं पड़ना चाहता था, लेकिन दलित चिंतकों को एक हीरो चाहिए था, तो उसकी मूर्ति बना दी गई। उसके बाद से दलितों के सारे मुद्दे भाजपा ने न सिर्फ हथिया लिए बल्कि कई योजनाओं के जरिए, उन्हें शौचालय से ले कर सिलिंडर, पानी, बिजली, बल्ब, बैंक खाता, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि सारी सुविधाएँ सुनिश्चित कीं।

इसका नतीजा यह हुआ कि दलित नेताओं और चिंतकों के पास दलितों के नाम पर राजनीति को ले कर कुछ खास बचा नहीं। या तो इन्होंने अफवाह फैला कर दलितों से आगजनी करवाई और (अलग-अलग खबरों के अनुसार) नौ से चौदह लोगों की जान ली, या फिर जबरदस्ती की दलित सम्मान रैलियाँ निकालीं, जिसका हासिल कुछ नहीं रहा। भाजपा समर्थित राजग पहले से ज्यादा सीट ले कर सत्ता में आई।

सोशल इंजीनियरिंग: गरीब को गरीब, दलित को दलित रखने की साजिश

जब दलितों ने, दूसरे मजहब की महिलाओं ने अपनी समस्याओं का समाधान मोदी सरकार की नीतियों और योजनाओं में पाया तो फिर वोटिंग रूम में कौन सा बटन दबाया, यह जानना मुश्किल नहीं है क्योंकि समुदाय विशेष के इलाकों में भी भाजपा ने आधी सीटें जीती हैं। कुल मिला कर बात यह है कि दलितों के नाम पर राजनीति करने वालों को दलित नकार चुके हैं क्योंकि मायावती दलित नहीं रही, लालू गरीब नहीं रहा, मुलायम समाजवादी नहीं रहे, लेकिन इनका वोट बैंक उसी घटिया अवस्था में रहा जैसा वो तीस साल पहले थे, और उससे तीस साल पहले था।

दिलीप सी मंडल हों, जिग्नेश मवाणी हों, चंद्रशेखर हों, या मायावती, दलित जातियों ने यह समझना शुरू कर दिया है कि उनके जीवन में बदलाव ले कर कौन आएगा। यह समझना निरी मूर्खता है कि किसी के घर में एक अच्छे जीवन की शुरुआत के लिए जरूरी सारी सुविधाएँ, बिना किसी भेदभाव के, भाजपा सरकार दे, और वो वोट मायावती को चला जाएगा!

इसलिए, भीम को मीम के साथ आना पड़ा। इसलिए, गेस्टहाउस कांड वाले लोग बुआ-भतीजा हो गए। बात दलितों की कभी हुई ही नहीं, बात हमेशा गणित की थी। बात हमेशा सीट पाने की थी। बात हमेशा सत्ता में पहुँचने की थी। लालू-मुलायम-माया-सोनिया आदि ने दलितों-गरीबों को दलित और गरीब रखने पर विशेष काम किया।

ऐसा इसलिए किया क्योंकि गरीब शिक्षित हो कर, रोजगार के अवसर पा कर, एक सम्मानित जीवन हेतु आवास से ले कर, सिलिंडर, बल्ब, बिजली, बीमा आदि पा कर गरीबी से बाहर आ सकता है। अगर वो बाहर आ गया तो फिर वोट बैंक तो बर्बाद हो जाएगा, इसलिए दलित को दलित, गरीब को गरीब बनाए रखने की ‘सोशल इंजीनियरिंग’ शुरू हुई। मकसद कुछ और था, लेकिन अंग्रेजी के शब्द गढ़ कर उसे ऐसा बताया गया मानो ये लोग सत्ता में आ कर कुछ गजब का कर देंगे।

दलित चिंतन को चाहिए ब्रा और पैड्स… और ब्लू टिक

जब मूल मुद्दे गायब हो जाएँ क्योंकि आपके नेता और चिंतक (किसी ने बनाया नहीं, उन्होंने स्वयं को ऐसा मान लिया) कभी भी आपके हितों के लिए खड़े नहीं हुए बल्कि आपकी रीढ़ के कशेरुकों को अपने पैर के अंगूठे रख कर ऊपर उठने के लिए इस्तेमाल किया और कहा कि तुम्हारे सर पर लात रख कर तुम्हारा भविष्य देख रहे हैं, तब प्रतीकों को ही मूल मुद्दा जैसे दिखाया जाता है। तब हर बात को साजिश के तौर पर दिखाया जाता है।

इस समय जब वंचितों और पिछड़ों के भविष्य पर लगातार काम हो रहा है, कहीं न कहीं उन्हें दी जा रही सब्सिडी आदि के कारण राष्ट्र की अर्थव्यवस्था भी धक्का सह रही है, तब उनकी हालत भी सुधर रही है। ये बात हर लाभार्थी को दिख रहा है, इसलिए अब नए दुश्मन और नए लांछन की आवश्यकता आन पड़ी है। अब इन्हें ‘दलित अस्मिता’ का झुनझुना थमाया जा रहा है। क्योंकि जमीनी बातों पर ये नेता और चिंतक कभी टिक ही नहीं पाएँगे, इसलिए शाब्दिक बातें छेड़ी जा रही हैं।

जब आप पूछिए कि 5000 सालों से कथित दलितों के साथ जो कथित अत्याचार हुए हैं, उनका वर्णन किस इतिहासकार ने किया है? क्या ऐसी बातें हजार साल पहले के भी यात्रा वृत्तांतों, ऐतिहासिक दस्तावेजों में दर्ज है? किसी धार्मिक ग्रंथ में इसका जिक्र है? क्या किसी कथित निचली जाति के रचनाकार ने कहीं लिखा है कि हजारों सालों से निचली जातियों के साथ दुर्व्यवहार हो रहा है? आप खोजते रहेंगे, आपको प्रमाण नहीं मिलेंगे। मैक्समूलर और विलियम जोन्स जैसे चिरकुट उपन्यासकारों (जिन्हें लोग इतिहासकार समझते हैं) ने ऐसी भ्रांतियाँ पैदा की, ताकि समाज कभी एकजुट न हो।

इसमें दोराय नहीं है कि निचली जातियों के साथ भेदभाव होता रहा है, और हो रहा है। लेकिन यह घटना पौराणिक नहीं है, यह घटना वैदिक काल से नहीं है, यह घटना 5000 साल पुरानी नहीं है। यह घटना अंग्रेजों और मुगलों को समय की है, जब से बाहर से अपने साथ लाई असमानता का सिद्धांत इस्लामी शासकों और अंग्रेजों ने भारतीय समाज पर थोप दिया।

बाहर से आए इस्लामी शासक अशरफ और ऐलाफ-अरजल जातियों के साथ समाज को हाँकते रहे, अंग्रेजों ने पूरे भारतीय समाज को ही अश्वेत होने के नाम पर हीन बनाए रखा। उसके बाद सूक्ष्म तरीके से भारतीय समाज के बीच विभाजन की दरारें पैदा की गईं, दो गुटों को भड़का कर वैमनस्य पैदा किया गया ताकि समाज एकजुट न हो सके। चाहे वो ईसाई कनवर्जन का काम हो या इस्लामी मतपरिवर्तन का, उन्हें बँटा हुआ हिन्दू समाज चाहिए था संख्या बढ़ाने के लिए।

संख्या बढ़ा कर इन्होंने क्या उखाड़ लिया वो पूरे विश्व में दिख रहा है। चोरी और डकैती से चलने वाली यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं का क्या हाल है, दिख रहा है। इस्लाम आईसिस के झंडे पर छप कर हर जगह आतंक की छाप छोड़ ही रहा है। आखिर समृद्ध भारत में गरीबी ले कर कौन आए? फिर ऐसे गरीबों को बहलाना किनके लिए सकारात्मक परिणाम ले कर आने वाला था? इसलिए जरूरत पड़ी जाति और दलित जैसे शब्दों की, जो इनके आने से पहले भारतीय समाज की शब्दावली में था ही नहीं।

वही बँटा हुआ समाज विकृत होता गया और सवर्ण-दलित का कोढ़ बन कर, भेदभाव की घटिया पराकाष्ठाओं को लगातार पार करता गया। यह कहना अनुचित है कि दलितों के साथ अत्याचार और भेदभाव नहीं हुए, या नहीं होते। खूब होते हैं, आज भी होते हैं, हमारे आपके सामने होते हैं। लेकिन उसका समाधान ट्विटर पर ‘ब्लू टिक’ न मिलने को ब्राह्मणों की साजिश बताना नहीं है।

ब्राह्मणवाद का नीला जनेऊ

दिलीप सी मंडल के लिए दलितों के जीवन की सबसे बड़ी समस्या ट्विटर पर ब्लू टिक का नहीं मिलना है। लेकिन, कोई भी व्यक्ति थोड़ी रिसर्च करे, दो बार सर्च करे तो पाएगा कि ट्विटर पर हर जाति, समाज, समुदाय, धर्म, मजहब, विचारधारा के लोगों को ब्लू टिक, यानी सत्यापित प्रोफाइल होने का प्रमाण, हासिल है।

चूँकि एक परमानेंट दुश्मन पहले से स्थापित है तो उसके प्रतीक जनेऊ को, जो अनभिज्ञता में ब्राह्मणों के ही साथ जोड़ा जाता है, उसको तुरंत खींच लिया जाता है। सी मंडल ने कहा कि ब्लू टिक नीला जनेऊ बना दिया गया है। चूँकि सी मंडल सी मंडल हैं, तो उनकी मजबूरी है कि उन्हें हर चीज नीली ही चाहिए, वरना उसमें ब्राह्मणवाद ठूँस देना है। इनसे पूछा जाए कि ब्राह्मणवाद है क्या, तो दो लाइन से आगे नहीं बढ़ पाएँगे।

ऐसी शब्दावली गढ़ कर जातिवाद फैलाने के कुत्सित प्रयास कुछ सौ सालों से चल रहे हैं, और चूँकि ये सत्ता पाने की सीढ़ी भी है, तो पिछले कुछ दशकों की राजनीति में ये ज्यादा प्रबल हो चुका है। ब्राह्मणों की दुर्गति क्या है वो बिहार के गाँवों में यजमानी करने वाले ब्राह्मणों को जा कर कोई देखे। उनके साथ समस्या यह है कि वो मजदूरी कर नहीं सकते क्योंकि यही समाज उन्हें मजदूरी करने से भी रोकता है, यह कह कर उन्हें पाप चढ़ेगा। और यही समाज, ब्राह्मणों को फिल्मों और टीवी पर धूर्त और मक्कार बता कर उसे उचित यजमानी भी नहीं देता।

इसका फल यह होता है कि ब्राह्मण न तो आरक्षण का पात्र बन पाता है, न ही उसके घर पर छत आ पाती है। वो अपनी कथित जाति के बंधन में बँधा हुआ है। स्थिति यह है कि आज बिहार के ब्राह्मणों और निचली जातियों की आर्थिक स्थिति में कोई खास अंतर नहीं है। जिन्होंने पढ़ाई की और नौकरियाँ पाईं, वो जरूर बेहतर स्थिति में हैं, लेकिन ये तर्क सारी जातियों पर लागू होता है।

इसलिए, दिलीप सी मंडल को ट्विटर पर अब ब्राह्मणवाद दिखता है। लोग इस पर ‘दिलीप सर का कथन सत्य है’ लिख रहे हैं, क्योंकि और कुछ लिख भी नहीं सकते। किसी भी शब्द में ‘वाद’ जोड़ देने से वो अचानक कूल हो जाता है। लोग उसे बिना जाने चर्चा में ले आते हैं। एक काल्पनिक बात को आधार मान कर नए तथ्य गढ़ लिए जाते हैं।

इसी तरह के उजड्ड लोगों ने नारीवाद के विमर्श में नारी की आर्थिक स्वतंत्रता से उसकी संपूर्ण स्वतंत्रता की राह को दूर छोड़ कर पश्चिमी विमर्श के पीरियड्स, ब्रा और सेक्स पर केन्द्रित कर दिया। नारी को समान अवसर देने की बात गायब हो गई और शराब पीना, व्यभिचार करना, गाली देना, ड्रग्स लेना नारीवाद का मुख्य पहलू बन गया। पश्चिम के समाज में भारतीय समाज की तरह की आर्थिक विसंगति नहीं है, वहाँ भ्रूण हत्या नहीं है, बच्चियों को जन्म लेते ही नहीं मारा जाता, इसलिए वहाँ समानता की बाकी सीढ़ियाँ पाटने के बाद स्त्रियों के मुद्दे अलग हैं।

वो वहाँ बार में जाना चाहती है, कई सेक्स पार्टनर रखना चाहती हैं, हर उस प्रतीक को त्यागना चाहती हैं जो उनके हिसाब से बंधन है, चाहे वो छाती पर लगा हुआ ब्रा ही क्यों न हो। उन्हें नौकरी की समस्या नहीं है, स्वास्थ्य की समस्या नहीं है, आर्थिक स्वतंत्रता की समस्या नहीं है, समान अवसरों की समस्या बहुत कम है। इसलिए उनका विमर्श अलग है। भारत के छद्म नारीवादी सीधे अंतिम सीढ़ी पर खड़े हो कर जीत जाना चाहते हैं।

वही हाल दलित विमर्श का हो गया है। समस्या है उनके आर्थिक और सामाजिक पिछड़ेपन की, जो कि उसी स्तर के समाधान खोजती है, न कि ट्विटर के ब्लू टिक की दरकार है उन्हें। जनेऊ को सूअर के गले में पहनाने और ब्राह्मणों को गाली देने से वंचितों का उत्थान नहीं हो सकता, इससे वो अपने ही खिलाफ और दुर्भावना फैला रहे हैं। ब्लू टिक सैकड़ों दलितों को मिला हुआ है, दलित नेताओं को मिला हुआ है। उसे पाने का एक तय नियम है, आप उसके लिए अप्लाय कीजिए, उनकी शर्तों को पूरा कीजिए, आपको मिल जाएगा।

इस सबमें जो अच्छी बात जो है, वो यह है कि असली दलित, यानी जिसका दलन किया गया है, शोषण हुआ है, जो वंचित है, पिछड़ा है, गरीब है, वो ट्विटर पर नहीं है। वरना जिस तरह का जहर दिलीप सी मंडल जैसे लोग फैला रहे हैं, वो विभाजनकारी और भड़काऊ है। ऐसे ही भावनाओं को भड़काने वाली, महत्वहीन बातें, नेताओं को चमका देती है, और दलित सड़क पर नीला दुपट्टा ओढ़े दूसरे दलित के सब्जी के ठेले को उलट देता है, मशाल ले कर छोटे व्यापारियों के बाजार में आग लगा देता है और नेता कहते हैं ‘आंदोलन सफल हुआ’।

मोहम्मद इस्माइल की ‘मॉब लिंचिंग’: छेड़खानी ​करने पर पीट-पीटकर मार डाला, कुएँ में फेंकी लाश

झारखंड के पश्चिम सिंहभूम ज़िले में एक लड़की से कथित तौर पर छेड़छाड़ करने वाले मोहम्मद इस्माइल की तीन लोगों ने पीट-पीटकर हत्या कर दी। बताया जा रहा है कि इस्माइल पहले भी इस तरह की हरकत कर चुका था। इससे नाराज लोगों ने इस्माइल को मार दिया। इस घटना की जानकारी शनिवार को एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने दी।

पुलिस अधीक्षक इंद्रजीत महाता ने बताया कि घटना 28 अक्टूबर की शाम की है। मोहम्मद इस्माइल ‘हड़िया (चावल की शराब) पीने के लिए गुलुरुआ गाँव गया था। ख़बर के अनुसार, एसपी ने बताया कि इस्माइल ने एक लड़की के साथ कथित तौर पर छेड़छाड़ की। इससे गुस्साए उसके भाई ने दो अन्य व्यक्तियों के साथ मिलकर लाठी-डंडों से उसकी पिटाई कर दी, जिससे उसकी मौत हो गई। उन्होंने बताया कि आरोपितों ने शव को गाँव से करीब दो किलोमीटर दूर एक कुएँ में फेंक दिया था।

एसपी के मुताबिक़, तीनों आरोपितों को 31 अक्टूबर को गिरफ़्तार कर स्थानीय अदालत में पेश किया गया। अदालत ने उन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। उन्होंने बताया कि इस्माइल पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद ज़िले के रघुनाथगंज पुलिस थाना क्षेत्र का निवासी था। वह राजमिस्त्री का काम करता था।

‘1 साल में Pak ने लिया 70 सालों से ज्यादा कर्ज़’: मौलाना के मार्च से अटकी इमरान की साँस

उलेमा-ए-इस्लाम-फजल के मुखिया मौलाना फजलुर रहमान ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की धड़कनें बढ़ा दी है। मौलाना प्रदर्शनकारियों के साथ प्रधानमंत्री के दफ़्तर की ओर बढ़ रहे हैं। सहमे इमरान ने गृह मंत्रालय को आदेश दिया है कि मौलाना को हर हल में रोका जाए। पाकिस्तान की मीडिया का कहना है कि मौलाना ने भारी भीड़ इकट्ठी कर ली है, जो किसी भी गंभीर स्थिति को जन्म दे सकती है। पाक मीडिया के अनुसार, भीड़ इतनी है कि बलप्रयोग कर के भी उन्हें हटाना मुश्किल है। मौलाना ने इमरान को इस्तीफे के लिए दो दिनों का अल्टीमेटम दिया था जो आज पूरा होने वाला है।

मौलाना को मिल रहे जनसमर्थन ने पाकिस्तान के विशेषज्ञों और सरकार की चिंता बढ़ा दी है। मौलाना को मनाने की भी कोशिशें की गई हैं लेकिन वो अपनी माँगों पर अड़े हुए है। मौलाना ने ख़ुद या अपने आजादी मार्च में शामिल अन्य नेताओं की गिरफ़्तारी होने की स्थिति के लिए भी रणनीति बना रखी है। हालॉंकि वे कुछ भी सार्वजनिक करने से बच रहे हैं। पाकिस्तान के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री फवाद चौधरी ने कहा है कि प्रदर्शनकारी नेताओं के पूर्वज जिन्ना के विरोधी थे और आज वे इमरान ख़ान के विरोध में उतरे हैं।

ख़ैबर पख़्तूनख़्वा प्रशासन से 5,000 अतिरिक्त पुलिस बल की माँग की गई है। इस्लामाबाद में तैनाती के लिए 3,000 अतिरक्त पुलिस बल भेज दिए गए हैं। सरकार की पूरी कोशिश ये है कि प्रदर्शन स्थल से मौलाना और उसके अनुयायियों को आगे न बढ़ने दिया जाए, लेकिन मौलाना ने इमरान ख़ान द्वारा इस्तीफा न देने की सूरत में मार्च को आगे बढ़ाने का फ़ैसला लिया है। पाकिस्तान के इंटीरियर सेक्रेटरी ने सेना और पुलिस के आला अधिकारियों के साथ बैठक की है, जिसमें ‘आज़ादी मार्च’ के प्रदर्शनकारियों से निपटने के बारे में चर्चा की गई। पहले मौलाना ने कहा था कि वो इस्लामाबाद के रेड जोन में नहीं घुसेंगे।

मौलाना ने साफ़ कर दिया है कि वो अगले दो दिनों में कोई कड़ा फ़ैसला लेंगे ताकि सरकार विरोधी आंदोलन को नई ऊर्जा दी जा सके। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान का इतिहास आन्दोलनों से भरा हुआ है और वह जल्द ही कोई बड़ा निर्णय लेंगे। मौलाना ने बताया कि वो नई रणनीति पर काम कर रहे हैं, जो मौजूदा प्रदर्शन से भी ज्यादा प्रभावी होगा। मौलाना ने क़ानून-व्यवस्था की बात करते हुए कहा कि पिछले 15 महीनों से चल रहे प्रदर्शन के दौरान भी संयम बरता गया, यह दिखाता है कि प्रदर्शनकारी क़ानून-व्यवस्था को लेकर कितने सजग हैं।

मौलाना ने इमरान ख़ान की आर्थिक नीतियों पर निशाना साधते हुए कहा कि उनके नेतृत्व में देश असुरक्षित है। मौलाना ने आरोप लगाया कि इमरान ख़ान की सरकार ने 1 साल में जितना क़र्ज़ लिया, उतना पिछले 70 साल की सभी सरकारों ने मिल कर भी नहीं लिया। उन्होंने आरोप लगाया कि पाकिस्तानी रुपए की क़ीमत डॉलर के मुक़ाबले 105 से गिर कर 160 पर आ गई है। लोग अपने बच्चों तक के लिए भोजन ख़रीदने में असमर्थ हैं। उन्होंने कहा कि यह सब इमरान के शासनकाल में हुआ।

गाँधी परिवार में फूट: ‘प्रियंका को आगे नहीं बढ़ने दे रहे राहुल, खुद कर रहे 15 साल से राजनीति में इंटर्नशिप’

कॉन्ग्रेस पार्टी के बड़े नेता और गाँधी परिवार के करीबी पंकज शंकर ने अपनी ही पार्टी और उसके मुखिया परिवार पर खुल कर हमला बोला है। ABP न्यूज चैनल को दिए साक्षात्कार में उन्होंने कॉन्ग्रेस पार्टी और गाँधी परिवार को लेकर कई अहम खुलासे किए हैं। अपने इंटरव्यू में पंकज शंकर ने बताया कि पार्टी अध्यक्ष सोनिया गाँधी अपने पुत्रमोह से उबर नहीं पाई हैं और इसी चलते पूरी कॉन्ग्रेस पार्टी डूब रही है। उन्होंने पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी को लेकर कहा कि उन्हें राजनीति में आए हुए भले ही 15 साल हो गए हैं मगर वे अभी भी जैसे इंटर्नशिप पीरियड में हैं, जो पता नहीं कब ख़त्म होगा।

पंकज शंकर ने आरोप लगाया कि बतौर एक नेता और पार्टी अध्यक्ष के पद पर रहने के बावजूद अपने कार्यकर्ताओं के प्रति राहुल का व्यवहार और उनसे उनका संवाद बेहद खराब रहा। पंकज के मुताबिक यह भी एक वजह है कि कॉन्ग्रेस पार्टी छोड़कर लोग दूसरे दलों की ओर जा रहे हैं।

बातचीत के दौरान उन्होंने संकेतों के ज़रिए यह भी साफ़ कर दिया कि राहुल अपनी ही बहन प्रियंका के पार्टी अध्यक्ष बनने में सबसे बड़ा रोड़ा हैं। इसकी वजह पर बात करते हुए उन्होंने बताया कि दरअसल राहुल चाहते ही नहीं हैं कि प्रियंका गाँधी अध्यक्ष बनकर पार्टी की कमान संभालें। पंकज यहीं नहीं रुके बल्कि उन्होंने पार्टी की वर्किंग कमिटी के कामकाज पर भी सवाल उठाए। पंकज बोले कि इन पदों पर बैठे लोग कई साल से जमे हुए हैं मगर इन्होंने कभी-भी पार्टी और उसके भविष्य की चिंता नहीं की।

गाँधी परिवार के लाडले राहुल की राजनीतिक उपलब्धि पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा, “वह किसी से भी मिलना या बातें करना नहीं चाहते हैं। वे कुछ लोगों से ऐसा घिरे हैं कि उन्हीं की सुनते हैं मगर उन लोगों को और राहुल के मैनेजर्स को दरअसल ज़मीनी हकीक़त का कोई अंदाज़ा नहीं है।” उनके मुताबिक राहुल ने अपनी ही एक टीम बना रखी है, जबकि उसमें होने वाले तथाकथित एक्सपर्ट्स को मुद्दों की कोई समझ नहीं है।

अयोध्या जन्मभूमि को लेकर बोलते हुए पंकज शंकर ने कहा कि इस मामले में देश की सर्वोच्च अदालत फैसला सुनाने को है मगर इस पर पार्टी का अभी तक कोई निश्चित पक्ष या स्टैंड सामने नहीं आया है। वे बोले कि भले कॉन्ग्रेस पार्टी दस साल आगे की सोच रखने का दावा करती हो मगर सच्चाई यह है कि इस पार्टी के लोग अगले दस मिनट में क्या कर डालेंगे, इसका किसी को कोई अंदाज़ा नहीं। अपनी पार्टी के पतन पर खुलकर बोलते हुए पंकज शंकर ने कहा, “आने वाले समय में एक वेब सीरीज बना सकते हैं कि कैसे कॉन्ग्रेस पार्टी जनता से दूर होती चली गई।”

8 दिन में ठीक करो अजंता-एलोरा तक जाने का रास्ता: गडकरी के अल्टीमेटम से मंत्रालय में हड़कंप

केंद्रीय सड़क एवं परिवहन मंत्री नितिन गडकरी अनुशासन के लिए जाने जाते हैं और उनकी प्रशासनिक क्षमता की भी अक्सर चर्चा होते रहती है। गडकरी को मोदी सरकार के सबसे ज्यादा परफॉर्म करने वाले मंत्रियों में से एक गिना जाता है। मीडिया से चर्चा के दौरान भी वह पत्रकारों को अपने किसी दावे को झूठा साबित करने की चुनौती देते हैं। लेकिन, हाल ही में ऐसा वाकया हुआ कि गडकरी भी नाराज हो गए। केंद्रीय मंत्री ने न सिर्फ़ अपने विभाग के अधिकारियों को फटकार लगाई, बल्कि जनता की शिकायतों के बाद यह भी निश्चित किया कि एक समयावधि के भीतर चीजों को ठीक किया जा सके।

दरअसल, महाराष्ट्र के औरंगाबाद-सिल्लोड-जलगाँव को आपस में जोड़ने वाले हाइवे की स्थिति जर्जर हो चुकी है। अजंता की गुफाओं तक पहुँचने के लिए पर्यटक इसी रास्ते का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में लोगों ने सीधे केंद्रीय मंत्री से शिकायत की। ट्विटर पर गडकरी ने जानकारी देते हुए कहा कि उन्हें इस बात की सूचना मिली है कि औरंगाबाद-सिल्लोड-जलगाँव हाइवे की स्थिति ख़राब हो चुकी है। इसके बाद उन्होंने अधिकारियों की क्लास लगानी शुरू की।

नितिन गडकरी ने पीडब्ल्यूडी महाराष्ट्र के नेशनल हाइवे डिवीजन और अपने मंत्रालय के मुंबई स्थित अधिकारियों को तुरंत तलब किया। गडकरी ने अधिकारियों को अल्टीमेटम देते हुए कहा कि 8 दिनों के भीतर राजमार्ग की मरम्मत की जाए, नहीं तो सभी सम्बंधित इंजीनियर व अधिकारी परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहें। केंद्रीय मंत्री के इस सख्त निर्देश के बाद मंत्रालय में हड़कंप मच गया और तुरंत राजमार्ग को ठीक करने के लिए काम शुरू कराया गया। नितिन गडकरी ने कहा कि इस तरह की चीजें अस्वीकार्य है।

गडकरी ने कहा कि ठेकेदार से लेकर इंजीनियर तक, जिसनें भी गड़बड़ी की है- उसे नहीं छोड़ा जाएगा। अक्टूबर 2018 में उक्त राजमार्ग पर नई एजेंसियों द्वारा काम फिर से शुरू कराया गया था, क्योंकि पुरानी एजेंसी छोड़ कर चली गई थी। इसके लिए तेलंगाना की जिस एजेंसी को 837 करोड़ रुपए का ये काम सौंपा गया था, वो कंगाल हो गई थी। इस रास्ते से अंजता-एलोरा के पर्यटकों के साथ-साथ बौद्ध श्रद्धालु भी यात्रा करते हैं।

महाराष्ट्र में पक गई खिचड़ी! शिवसेना ने किया 170 विधायकों के समर्थन का दावा

महाराष्ट्र के सियासी घटनाक्रम तेजी से बदल रहे हैं। शिवसेना सांसद संजय राउत ने पार्टी के पास 170 से ज्यादा विधायकों का समर्थन होने का दावा किया है। उनके मुताबिक ‘महाराष्ट्र के हित में’ शिवसेना के साथ कॉन्ग्रेस और एनसीपी आ सकते हैं। बकौल राउत शिवसेना को समर्थन का आँकड़ा 175 तक पहुँच सकता है। 288 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत का आँकड़ा 145 है।

शिवसेना के मुखपत्र सामना के एग्जीक्यूटिव एडिटर सांसद राउत ने ट्वीट किया, “उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है, जो ज़िन्दा हो तो फिर ज़िन्दा नज़र आना ज़रूरी है….जय महाराष्ट्र…।”

राउत ने सामना के रोक ठोक कॉलम में लिखा,

“बीजेपी सदन में बहुमत साबित करने में नाकाम रहने के बाद शिवसेना सरकार बनाने का दावा पेश कर सकती है। NCP, कॉन्ग्रेस और निर्दलीय उम्मीदवारों की मदद से बहुमत का आँकड़ा 170 तक जाएगा। शिवसेना का अपना मुख्यमंत्री हो सकता है। उसे सरकार चलाने के लिए साहस दिखाना होगा।”

इससे पहले राउत ने शनिवार (2 नवंबर ) को कहा था कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद के लिए उनकी पार्टी की माँग उचित है और भाजपा से साथ सत्ता साझा करने का आधार जीती गई सीटों की संख्या नहीं, बल्कि चुनाव से पहले हुआ समझौता होना चाहिए।

राउत ने एक समाचार चैनल से कहा कि सरकार का गठन (चुनाव से पहले भाजपा और शिवसेना के बीच) पहले बनी सहमति के आधार पर होना चाहिए न कि इस आधार पर कि सबसे बड़ा एकल दल कौन-सा है।

इधर, एनसीपी विधायक दल के नेता अजित पवार ने कहा है कि उनके पास संजय राउत का संदेशा आया था। मीटिंग में होने के कारण वे इसका जवाब नहीं दे पाए। पवार ने बताया कि चुनाव के बाद यह पहला मौका है जब राउत ने उनसे संपर्क किया है। मुझे नहीं पता कि उन्होंने क्यों मैसेज किया था। मैं उनसे बात करूॅंगा।

इससे पहले शपथ ग्रहण समारोह की तैयारी होने और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस तथा उद्धव ठाकरे के बीच मुलाकात होने की खबरें आई थी। इसके मुताबिक फडणवीस ने शिवसेना को मनाने के लिए नया प्रस्ताव रखा है। इसके तहत भाजपा राज्य कैबिनेट में शिवसेना को आधी हिस्सेदारी देने को तैयार है। मीडिया रिपोर्टों में यह भी बताया गया था कि उद्धव ने नरम पड़ते हुए केंद्र की मोदी सरकार में दो अतिरिक्त पद मॉंगे थे।

ग़ौरतलब है कि महाराष्ट्र की 288 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा को 105 और उसकी सहयोगी शिवसेना को 56 सीटें मिली हैं। कॉन्ग्रेस ने 44 और उसकी सहयोगी एनसीपी ने 54 सीटों पर जीत हासिल की है। ऐसे में शिवसेना के साथ यदि कॉन्ग्रेस और एनसीपी आ जाते हैं तो सरकार बन सकती है।

इमरान के तख्तापलट का प्लान: बेनजीर के बेटे बिलावल को PM बनाना चाहती है पाकिस्तानी सेना

पाकिस्तान की आतंकी नीति के कारण उसके संबंध न तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ अच्छे हैं और न ही भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ। इस बीच नई खबर यह है कि उनकी गृह और आर्थिक नीति के कारण अब इमरान खान से पाकिस्तानी सेना भी नाखुश है। इमरान खान को इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। संडे गार्डियन की रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तानी सेना अब इमरान खान की जगह पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के प्रमुख बिलावल भुट्टो जरदारी को देश का प्रधानमंत्री बनाने की योजना पर काम कर रही है।

ऐसा देखा जा रहा है कि हर परिस्थिति में पाकिस्तान का साथ देने वाला चीन का भी इमरान खान पर से भरोसा हटाता जा रहा है। इमरान के इस्तीफे की माँग को लेकर कराची से इस्लामाबाद तक होने वाले ‘आजादी मार्च’ से भी यह साफ हो रहा है कि इमरान खान अब सभी तरफ से (मतलब जनता भी त्रस्त है, वो जिन्होंने उन्हें पीएम की कुर्सी तक पहुँचाया) अपना समर्थन खो रहे हैं।

बता दें कि शुक्रवार (नवंबर 1, 2019) को पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम फजल (JUI-F) के प्रमुख मौलाना फजलुर्रहमान के नेतृत्व में आजादी मार्च कराची से इस्लामाबाद पहुँची। दिलचस्प बात यह है कि रैली को पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) के अध्यक्ष बिलावल भुट्टो जरदारी ने भी संबोधित किया। इस मौके पर उन्होंने इमरान खान को “कठपुतली” कहा।

फजलुर्रहमान का आरोप है कि इमरान निर्वाचित नहीं बल्कि एक चयनित पीएम हैं। उन्होंने इमरान पर 2018 के आम चुनाव जीतने के लिए धांधली का आरोप लगाते हुए इस्तीफे की माँग की। उनका कहना है कि वह इस पद पर बने रहने के लायक नहीं है। बता दें कि भुट्टो के पिता आसिफ अली जरदारी को भी भ्रष्टाचार के आरोपों में इमरान खान द्वारा जेल में डाल दिया गया था। भुट्टो ने हाल ही में खान पर आरोप लगाया था कि वह जेल में स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध नहीं कराकर उनके पिता की हत्या की कोशिश कर रहे हैं।

यह आजादी मार्च 2014 के इंकलाब मार्च जैसा ही है। जो उस समय की नवाज़ शरीफ़ सरकार के खिलाफ इमरान खान द्वारा ताहिर-उल-कादरी द्वारा प्रायोजित किया गया था। जानकारों का मानना है कि इस समय इमरान खान को कट्टरपंथियों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है।

पूर्व राजनयिक कंवल सिब्बल ने इस स्थिति पर प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए कहा, “हाँ, यह एक खतरे की घंटी है। फजलुर्रहमान इमरान खान को सत्ता से बेदखल करने के लिए आजादी मार्च का आयोजन कर अपना ताकत दिखाना चाहते हैं। इमरान खान ने नवाज शरीफ सरकार के खिलाफ इन हथकंडों का इस्तेमाल किया था। खैबर पख्तूनख्वां की राजनीति में निहित मौलाना और इमरान खान के बीच का खून-खराबा भी लोग अच्छी तरह से जानते हैं। मौलाना अपनी व्यक्तिगत प्रतिशोध के अलावा पाकिस्तान में आर्थिक संकट की स्थिति को भी भुनाने में लगा हुआ है।”

संडे गार्जियन के एक अन्य सूत्र ने कहा कि इमरान खान न केवल अर्थव्यवस्था को सही तरीके से स्थापित करने में विफल रहे हैं, बल्कि वे अमेरिका के साथ-साथ अन्य पश्चिमी देशों के सामने भी पाकिस्तान के कश्मीर मुद्दे के नकली बयान को भी नहीं भुना पाए।

इसमें कहा गया है कि देश में इमरान के खिलाफ भारी आक्रोश है। वो पाकिस्तान के सबसे अलोकप्रिय नेताओं में से एक बन गए हैं और इसलिए पाकिस्तानी सेना, जिसने कभी बड़ी उम्मीदों के साथ उनका समर्थन किया था, अब वह निराश हो रहा है। संयुक्त राष्ट्र की बैठक में उनके बयान की खूब किरकिरी हुई। वह वैश्विक समुदाय को कश्मीर पर अपने नैरेटिव के बारे में आश्वस्त नहीं कर सके। इसीलिए, वह उनसे छुटकारा पाना चाहती है और उनके स्थान पर बिलावल भुट्टो जरदारी को प्रधानमंत्री बनाना चाहती है।

बताया जा रहा है कि यह आजादी मार्च इमरान शासन के अंत की शुरुआत हो सकती है। पाकिस्तान सेना ने पहले ही अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण कर लिया है। बता दें कि पाकिस्तान के सेना प्रमुख क़मर जावेद बाजवा ने पिछले महीने इमरान खान के अमेरिका की यात्रा से वापसी के तुरंत बाद सभी शीर्ष उद्योगपतियों और व्यापारिक नेताओं की बैठक बुलाई थी, जिसमें प्रधानमंत्री अनुपस्थित थे। जानकारों के अनुसार, यह एक स्पष्ट संकेत था कि इमरान को पाकिस्तान में स्थापित जटिल शक्ति-समीकरण में से धीरे-धीरे दरकिनार किया जा रहा है।

ठंड में बड़े पैमाने पर आतंकी हमलों की फिराक में जैश और लश्कर: ख़ुफ़िया रिपोर्ट

पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा जाड़े के मौसम में भारत में बड़े पैमाने पर आतंकी हमलों को अंजाम देने की फिराक में हैं। ताजा खुफिया रिपोर्टों ये यह जानकारी सामने आई हैं। आतंकी अपने नापाक मंसूबों से केंद्र शासित प्रदेश जम्मू कश्मीर में स्थिति सामान्य नहीं होने देना चाहते।

हिंदुस्तान टाइम्स की ख़बर के अनुसार, खुफिया एजेंसी की ओर से सरकार को उपलब्ध कराए गए इनपुट के मुताबिक जैश ने अपने आतंकियों से इसी हफ्ते बहावलपुर स्थित मुख्यालय मरकाज उस्मान-ओ-अली में हाजिरी लगाने को कहा है। आशंका है कि फिदायीन हमलों को अंजाम देने के लिए यह आदेश दिया गया है।

जैश प्रमुख मसूद अज़हर और उसका भाई मुफ्ती अब्दुल रऊफ असगर फ़िलहाल बहावलपुर में ही है। इनपुट्स से संकेत मिला है कि लश्कर के कमांडर अबू उज़ैल ने दावा किया है कि भारत जल्द ही एक घातक आत्मघाती हमला होगा।

इसके अलावा, इनपुट्स यह भी कहते हैं कि पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी समूह 26 अक्टूबर के बाद नियंत्रण रेखा (एलओसी) के पार अपने आतंकियों को भेजने को कोशिश करेंगे। सुरक्षा बलों और एजेंसियों की सक्रियता के कारण आतंकी अब तक अपने मंसूबों में नाकाम रहे हैं। लेकिन, राष्ट्रीय सुरक्षा के रणनीतिकारों का मानना है कि पाकिस्तान समर्थित आतंकी गुट ठंड बढ़ने पर हमले की कोशिश करेंगे।

इसी साल 5 अगस्त को, भारतीय संसद ने जम्मू-कश्मीर को मिलने वाले विशेष राज्य के दर्जे को समाप्त करते हुए अनुच्छेद 370 को निरस्त कर दिया था। एक नवंबर से जम्मू-कश्मीर और लद्दाख दो केंद्र शासित प्रदेश अस्तित्व में आ चुके हैं।

जानकारी के अनुसार, पाकिस्तानी सेना का रावलपिंडी स्थित मुख्यालय जैश को भारत में हमलों के लिए हरी झंडी दिखा चुका है। भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार पॉंच अगस्त से आतंकरोधी अभियानों और आतंकियों एवं पाकिस्तानी सेना की बातचीत सीमा पर तैनात सुरक्षा बलों द्वारा पकड़े जाने के खतरे को देखते हुए, बीते तीन महीने में सियालकोट सेक्टर में जैश की गतिविधियॉं सीमित हो गई है।

खुफिया रिपोर्ट में विशेष तौर पर सात अफगान कमांडरों के नेतृत्व 20 जैश आतंकियों की गतिविधियों का जिक्र किया गया है। घाटी में घुसपैठ के लिए इनके नियंत्रण रेखा के पास पाकिस्तानी लॉन्चिंग पैड की ओर बढ़ने की खबर है। इन्हीं आतंकियों को अक्टूबर के दूसरे सप्ताह में पाकिस्तानी सेना ने बालाकोट, मानशेरा, खैबर पख्तूनख्वा के अपने कैंपों में भेजा था।

करतारपुर कॉरिडोर खोलने के पीछे हो सकता है आईएसआई का एजेंडा: अमरिंदर सिंह

पंजाब सरकार के पूर्व मंत्री और कॉन्ग्रेस नेता नवजोत सिंह सिद्धू ने करतारपुर कॉरिडोर के उद्घाटन समारोह में शामिल होने के लिए विदेश मंत्रालय और पंजाब सरकार को खत लिखकर पाकिस्तान जाने की अनुमति माँगी है। वहीं, उन्हीं के पार्टी के नेता और पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने करतारपुर कॉरिडोर खोलने को लेकर पाकिस्तान की मंशा पर शक जताया है।

अमरिंदर सिंह ने कहा कि बाकी सिखों की तरह वह भी करतारपुर साहिब गुरुद्वारा में नतमस्तक होने के बारे में सोचकर बहुत खुश हैं। यह हमेशा ही उनके अरदास का हिस्सा रहा है। हालाँकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनको अभी भी पाकिस्तान की मंशा पर शक है। उनका कहना है कि कॉरिडोर खोलने के पीछे आईएसआई का एजेंडा हो सकता है।

उन्होंने आशंका जाहिर करते हुए कहा कि इसका उद्देश्य जनमत-संग्रह 2020 के लिए सिख भाईचारे को प्रभावित करना हो सकता है, जिसे सिख फॉर जस्टिस (एसएफजे) के अंतर्गत बढ़ावा दिया जा रहा है। कॉन्ग्रेस नेता का कहना है कि पाकिस्तान द्वारा कॉरिडोर और गुरु नानक के नाम पर यूनिवर्सिटी शुरू करने जैसे फैसलों पर भारत को पूरी तरह से सतर्क और सक्रिय रहने की जरूरत है।

उन्होंने कहा कि इनके पीछे छिपे एजेंडे को भी ध्यान से परखने की जरूरत है। भारत को इस मामले में पाकिस्तान के सिर्फ चेहरे पर नहीं जाना चाहिए, सभी चीजों को समग्र तौर पर लेना चाहिए। कैप्टन ने करतारपुर कॉरिडोर का सियासीकरण करने की तीखी आलोचना की। उन्होंने कहा कि यह सिख पंथ के महान संस्थापक गुरु नानक देव की विचारधारा के विरुद्ध है।

मुख्यमंत्री ने गुरु नानक देव के 550वें प्रकाशोत्सव का राजनीतिकरण किए जाने पर अफसोस जताते हुए कहा कि समूचे मुद्दों का संकुचित राजनीतिक हितों के मद्देनजर सियासीकरण किया जा रहा है। अमरिंदर सिंह ने कहा कि इस अवसर पर राजनीति को एक तरफ रख देना चाहिए और यह महान समारोह आयोजित करने का काम सरकार पर छोड़ देना चाहिए।

बता दें कि नवजोत सिंह सिद्धू ने पाकिस्तान जाने की इजाजत माँगते हुए विदेश मंत्री एस जयशंकर को संबोधित पत्र में लिखा था, “9 नवंबर को श्री करतारपुर साहिब कॉरिडोर के उद्घाटन कार्यक्रम में पाकिस्तान सरकार ने मुझे आमंत्रित किया है। एक सिख होने के नाते अपने महान गुरु बाबा नानक के प्रति श्रद्धा अर्पित करने का सम्मान मिलना और अपनी जड़ों से जुड़ने का यह एक ऐतिहासिक मौका है। इस ख़ास अवसर पर पाकिस्तान यात्रा के लिए मुझे इजाज़त दी जाए।”

इसके साथ ही पंजाब सरकार से अनुमति माँगने लिए मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को पत्र लिखा था। इसमें उन्होंने लिखा था, “आपको ध्यान दिलाना चाहता हूँ कि पाकिस्तान सरकार ने मुझे श्री करतारपुर साहिब कॉरिडोर के कार्यक्रम में बुलाया है। इसलिए मुझे इस मौके पर पाकिस्तान जाने की अनुमति प्रदान की जाए।”