Home Blog Page 5355

कॉन्ग्रेसी मुखपत्र को खटका ‘अयोध्या में रामलला विराजमान’, फैसले को पाकिस्तानी कोर्ट के आदेश जैसा बताया

दशकों पुराने अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले का ज्यादातर तबकों ने स्वागत किया है। लेकिन, एक वर्ग ऐसा भी है जिन्हें विवादित जमीन रामलला को मिलना खटक रहा है। ऐसा ही हाल कॉन्ग्रेस का भी है। एक तरफ उसके नेता फैसले का स्वागत कर रहे हैं तो दूसरी ओर उसका मुखपत्र नेशनल हेराल्ड सुप्रीम कोर्ट के फैसले की तुलना पाकिस्तानी कोर्ट के एक बेतुके फरमान से कर रहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने विवादित जमीन को रामजन्मभूमि बताते हुए पूरी राम मंदिर के निर्माण के लिए देने का आदेश दिया है। अदालत ने कहा कि इस जमीन पर सुन्नी वक्फ बोर्ड अपना हक साबित करने में विफल रहा। बावजूद इसके अदालत ने मुस्लिम पक्ष को मस्जिद बनाने के लिए पॉंच एकड़ जमीन मुहैया कराने का आदेश भी केंद्र सरकार को दिया है।

इस फैसले का स्वागत कॉन्ग्रेस ने भी किया। पार्टी प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने फैसला आने के बाद ट्वीट कर कहा, “सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आ चुका है। भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस भगवान श्री राम के मंदिर के निर्माण की पक्षधर है।”

कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने लिखा, “सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या मुद्दे पर अपना फैसला सुना दिया है। कोर्ट के इस फैसले का सम्मान करते हुए हम सब को आपसी सद्भाव बनाए रखना है। ये वक्त हम सभी भारतीयों के बीच बन्धुत्व,विश्वास और प्रेम का है।”

प्रियंका गाँधी ने इस फैसले पर ट्वीट करते हुए लिखा, “अयोध्या मुद्दे पर भारत की सर्वोच्च अदालत ने फैसला दिया है। सभी पक्षों, समुदायों और नागरिकों को इस फ़ैसले का सम्मान करते हुए हमारी सदियों से चली आ रही मेलजोल की संस्कृति को बनाए रखना चाहिए। हम सबको एक होकर आपसी सौहार्द और भाईचारे को मजबूत करना होगा।”

लेकिन, मुखपत्र नेशनल हेराल्ड के एक लेख के जरिए इस फैसले की तुलना पाकिस्तानी कोर्ट के आदेश से की गई है। कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने वैसा ही फैसला सुनाया जैसा शुरुआत से भाजपा और विश्व हिन्दू परिषद चाहती रही है। फैसले से स्पष्ट है कि सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी तौर पर वही किया है जिसकी मॉंग बीजेपी और विहिप लंबे समय से कर रही थी।

नेशनल हेराल्ड के इस लेख को लिखा है आकार पटेल ने। लेख में अपना एक अनुभव साझा करते हुए पटेल ने लिखा है कि 30 साल पहले जब वो छात्र थे, तो बोकारो में उनके यूनिवर्सिटी में इसी मुद्दे पर बोलने के लिए अरुण शौरी आए थे, जो उस समय भाजपा समर्थक थे। उन्होंने कहा था कि मुस्लिम कहीं और मस्जिद बनाए, क्योंकि यह स्थान हिन्दू के लिए पवित्र स्थान है। आकार पटेल ने लिखा कि अभी जो हुआ, वह वही बात है, सिवाय इसके कि अब इसे कानूनी कवर मिल गया है।

नेशनल हेराल्ड के इस लेख में कहा गया है कि अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट के 65 साल पुराने एक आदेश जैसा है। लेख में कहा गया है कि 1948 में जिन्ना की मौत और 1951 में उनके उत्तराधिकारी लियाकत अली खान की हत्या के बाद पाकिस्तान मुस्लिम लीग नेतृत्व विहीन हो गया। ऐसे हालात में गुलाम मोहम्मद गवर्नर जनरल बना। उसने 1954 में पाकिस्तान की संविधान सभा को गैरकानूनी तरीके से भंग कर दिया। इसके खिलाफ अदालत में अपील की गई। गुलाम ने जो किया वह कानून के खिलाफ होने के बावजूद अदालत ने उसके फैसले का बचाव किया। इस फैसले ने गुलाम मोहम्मद को मनमर्जी करने की छूट दे दी।

लेख में कहा गया है कि अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दूरगामी असर होगा। समय के साथ यह देखने को मिलेगा। लेकिन, यह तय है कि इसके नतीजे दिखाई पड़ेंगे ही। हालाँकि लेखक ने ‘उम्मीद’ जताई है कि भारत के लिए यह उतना घातक नहीं हो, जिस तरह वह फैसला पाकिस्तान के लिए साबित हुआ।

राम मंदिर पर फ़ैसले के बाद वामपंथी गैंग में सिर-फुटव्वल, चल रहा फॉलो-अनफॉलो का खेल

राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आते ही हिन्दुओं की आस्था पर मुहर लग गई और साथ ही वामपंथी ब्रिगेड भी पागल हो उठा। कइयों ने राम मंदिर की जगह हॉस्पिटल-स्कूल की माँग दोहराई तो कइयों ने बाबरी मस्जिद ध्वस्त किए जाने वाली घटना को याद कर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर ही सवाल उठाए। उधर कविता कृष्णन भी इस फ़ैसले से ख़ासी नाराज़ नज़र आईं। उन्होंने बाबरी मस्जिद को ट्विटर पर अपनी कवर फोटो बना कर इस फ़ैसले का विरोध किया। साथ ही उन्होंने दावा किया कि विरोध करने का उनका अधिकार कोई नहीं छीन सकता।

इस बीच वामपंथी ब्रिगेड में फुट भी पड़ गई। यूट्यूब के माध्यम से झूठ फैलाने वाले ध्रुव राठी ने एक ऐसा ट्वीट किया, जिसने कविता कृष्णन को नाराज़ कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से बौखलाईं कविता को अपनी ही गुट के किसी व्यक्ति द्वारा ऐसा ट्वीट करना जले पर नमक के समान लगा। दरअसल, ध्रुव राठी ने अपनी ट्वीट में लिखा:

“आज भारत की एकता और सेक्युलरिज़्म के लिए एक अभूतपूर्व दिन है। राम मंदिर बनेगा। मस्जिद भी बनेगा। करतारपुर साहिब कॉरिडोर खुल गया। भारत और पाकिस्तान फिर से एक-दूसरे के साथ सहयोग कर रहे हैं। अर्थात, सभी तीनों धर्मों को सम्मान मिला है। और सबसे बड़ी बात, यह दिन लोगों के लिए टीवी पर धार्मिक बहसों के ख़त्म होने का दिन हो सकता है।”

बस, फिर क्या था? कविता कृष्णन नाराज़ हो गईं कि ध्रुव ने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का समर्थन कैसे कर दिया? यूट्यब पर प्रोपेगंडा फैलाने वाला ध्रुव मंदिर बनाने की बातें क्यों कर रहा है, कविता कृष्णन की नाराज़गी की श्याद यही वजह रही होगी। वामपंथियों के हिसाब से तो राम कोई थे ही नहीं, उनका अस्तित्व ही नहीं था, तो राम जन्मभूमि का सवाल कहाँ से आता है? फिर कविता ने ध्रुव को फटकार दिया। उन्हें ट्विटर पर अनफॉलो कर दिया। राठी को डाँटते हुए पूछा कि वो इतना अनभिज्ञ कैसे हो सकता है?

इसके बाद कविता कृष्णन ने आरोपों की झड़ी लगा दी। उन्होंने लिखा कि ध्रुव राठी कभी अपनी आलोचना को स्वीकार नहीं करता है। बकौल कविता कृष्णन, स्वस्थ आलोचना को नज़रअंदाज़ करने वाला ध्रुव कभी इस बात को नहीं समझता कि उसे काफ़ी कुछ सीखने की ज़रूरत है। वामपंथी गैंग के इस डिजिटल सिर-फुटव्वल का लोगों ने सोशल मीडिया पर लुत्फ़ उठाया। हालाँकि, अगले ही दिन कविता कृष्णन ने ध्रुव राठी को फिर से फॉलो कर दिया और लिखा कि ध्रुव ने उनके ट्वीट पर ध्यान दे दिया है, इसलिए वो उन्हें फिर से फॉलो कर रही हैं।

कविता कृष्णन ने लिखा कि ध्रुव राठी को उचित शिक्षा और मार्गदर्शन की ज़रूरत है, जो वो देती रहेंगी। साथ ही कविता ने ‘अधजल गगरी छलकत जाए’ कहावत का जिक्र करते हुए बताया कि वो ध्रुव से बातचीत करती रहेंगी। कविता कृष्णन ने हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की तुलना बाबरी ध्वस्त करने वालों से की है। उन्होंने एक कार्टून पोस्ट कर ऐसा किया।

5 जजों की पीठ में से 1045 पन्नों का फैसला किसने लिखा? कानून के जानकार भी आश्चर्य में

दशकों पुराने विवाद और 134 साल चली कानूनी लड़ाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार (नवंबर 9, 2019) को राम मंदिर मामले पर फैसला सुना दिया। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पाँच सदस्यीय संविधान पीठ ने एकमत से अयोध्या को भगवान राम का जन्मस्थान मानते हुए पूरी जमीन रामलला विराजमान को सौंपकर मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त कर दिया। वहीं मुस्लिम पक्षकारों को मस्जिद बनाने के लिए अलग से 5 एकड़ जमीन देने का भी निर्णय सुनाया।

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने 1045 पन्नों में अपना फैसला सुनाया। लेकिन इस बात का खुलासा नहीं किया गया कि इस फैसले को किसने लिखा। सामान्यत: जब एक पीठ द्वारा किसी विषय पर फैसला दिया जाता है, तो निर्णय को लिखने वाले न्यायाधीश का नाम इसमें दिया जाता है। लेकिन अयोध्या के फैसले को किसने लिखा है, इसका जिक्र नहीं किया गया है।

बता दें कि मामले की सुनवाई कर रहे इस संवैधानिक पीठ में सीजेआई रंजन गोगोई के अलावा जस्टिस बोबडे, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस अब्दुल नजीर शामिल थे। 1045 पेज के फैसले में 929 पेज के आगे 116 पेज परिशिष्ट के रूप में जोड़े गए हैं। 116 पृष्ठों के परिशिष्ट में यह कहा गया है कि विवादित स्थल हिंदू भक्तों की आस्था और विश्वास के अनुसार भगवान राम का जन्म स्थान है। हालाँकि इन्हें जिस जज ने लिखा है, उनका नाम नहीं बताया गया है।

इस बात को लेकर कानून के जानकार भी आश्चर्य जाहिर कर रहे हैं कि फैसला लिखने वाले जज का नाम नहीं लिखा गया है, उसे गुप्त रखा गया है। बता दें कि इससे पहले मौजूदा समय के फैसलों में ऐसा कोई वाकया नहीं रहा, जब सुप्रीम कोर्ट के किसी भी फैसला लिखने वाले जज का नाम न दिया गया हो।

राम मंदिर पर फैसले के बाद आतंकियों के निशाने पर 3 राज्य, ‘डार्क वेब’ पर चल रही प्लानिंग को किया गया डिकोड

सदियों से चले आ रहे राम जन्मभूमि मामले पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के साथ ही एक विवाद का अंत हो गया। विवाद ख़त्म होते ही आतंकी संगठन सक्रिय हो गए हैं। यही वजह है कि सरकार संदिग्ध गतिविधियों की आशंका के मद्देनज़र काफी सख्त रवैया अपना रही है।

मीडिया में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान के आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद की संदिग्ध गतिविधियों को देखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार को दस दिन पहले ही इस सम्बन्ध में सतर्क कर दिया गया था।

एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न सार्वजनिक करने की शर्त पर ने बताया कि यह खतरे की गंभीरता को दिखाता है। उन्होंने बताया कि रॉ, इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) से लेकर सेना तक प्रत्येक एजेंसी इस निष्कर्ष पर पहुँची है कि यह फैसला आने के बाद से ही पाकिस्तान की ओर से आतंकवादी हमला होने की सम्भावना काफी अधिक है।

मीडिया में आ रही रिपोर्ट्स की मानें तो आतंकवादियों के निशाने पर प्रमुख रूप से उत्तर प्रदेश, दिल्ली और हिमाचल प्रदेश तक हो सकते हैं। बता दें कि आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने हमले से संबंधित जानकारी और सूचनाओं के लिए ‘डार्क वेब’ की तकनीक का सहारा लिया, जिसमें सारी बातें इनक्रिपटेड थीं। कोडवर्ड के सहारे चल रही इस बातचीत को डिकोड करने में सुरक्षा एजेंसियों को ख़ासी मेहनत करनी पड़ी।

यूपी के अयोध्या में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विवादित ज़मीन को राम जन्मभूमि करार दिए जाने के बाद से ही यह पूरी कवायद चल रही है। सुप्रीम कोर्ट ने एतिहासिक फैसला सुनाते हुए 2010 में आए इलाहबाद हाईकोर्ट के फैसले को पलटकर रख दिया।

रामलला का जन्मभूमि पर हक मानते हुए कोर्ट ने मंदिर बनाए जाने की दलील के पक्ष में फैसला सुनाया तो वहीं मुस्लिम पक्ष को मस्जिद बनाने के लिए अलग से पाँच एकड़ ज़मीन देने का भी आदेश दिया गया।

2 मुस्लिम नाम, जिनको लेकर मो. कैफ ने किया राम मंदिर पर ट्वीट और हो गया Viral

सदियों से चल रहे राम मंदिर मामले पर विराम लगाते हुए देश की शीर्ष अदालत ने शनिवार (9 नवंबर) को ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाया। इस फ़ैसले के तहत पाँच जजों की पीठ द्वारा पूरी ज़मीन को सर्वसम्मति से राम लला विराजमान को देने का फ़ैसला किया गया। बता दें कि इस फ़ैसले पर हर ओर से तमाम प्रतिक्रियाएँ आईं, जिसमें कोर्ट के इस फ़ैसले का स्वागत किया गया।

इसी बीच, पूर्व क्रिकेटर मोहम्मद कैफ़ ने अयोध्या फ़ैसले पर ऐसा बयान दिया है जिस पर हर भारतीय को नाज़ होना चाहिए। दरअसल, उन्होंने एक ट्वीट किया है जिसमें उन्होंने लिखा, “ऐसा केवल भारत में ही हो सकता है। जहाँ एक जस्टिस अब्‍दुल नज़ीर सर्वसम्‍मति से लिए फ़ैसले में शामिल थे और एक केके मोहम्‍मद ने ऐतिहासिक दस्‍तावेज़ दिए। भारत की संकल्‍पना सबको शामिल करने वाली विचारधारा से बड़ी है। सभी ख़ुश रहें, मैं शांति, प्रेम और सद्भाव की दुआ करता हूँ।”

अयोध्या फ़ैसले के सन्दर्भ में किया गया कैफ़ का यह ट्वीट सोशल मीडिया पर तेज़ी के साथ वायरल हो रहा है। सोशल मीडिया के यूज़र्स इस ट्वीट की जमकर तारीफ़ कर रहे हैं। साकेत कुमार ने ट्विटर पर लिखा, “कैफू भैया इंडिया में सिर्फ कुछ तबक़ों ने माहौल बिगाड़ दिया है वर्ना इंडिया जैसे हिंदू बहुसंख्यक देश में कैफ और जहीर खान जैसे क्रिकेटर हीरो के श्रेणी में आते हैं और शाहरुख, सलमान और आमिर खान सुपरस्टार हैं। ये एक पूरे हिंदुस्तानी का प्यार है। बाकी आपका मैसेज बहुत ही अच्छा है।”

ख़बर लिखे जाने तक कैफ़ के ट्वीट को 13.4 हज़ार लोग रीट्वीट कर चुके हैं और 65.3 हजार लोग लाइक कर चुके हैं। बता दें कि कैफ़ से पहले भी खेल जगत की कई हस्तियों ने भी सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का स्वागत करते हुए ट्वीट किए थे।

‘HINDU STHAN’ के नाम से किसने छापी फ्रंट पेज खबर, किसने सिर्फ ‘श्रीराम’ को दी जगह: अखबारों में आज

अयोध्या भूमि विवाद भारत के सबसे पुराने विवाद के रूप में जाना जाता था। इस मामले पर शनिवार (9 नवंबर) को सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुनाए गए ऐतिहासिक फ़ैसले से भारत के इतिहास में एक और पन्ना जुड़ गया। इस तरह सदियों से चल रहे इस विवाद पर अंतत: विराम लग गया। अब भगवान राम की जन्मभूमि पर भव्य राम मंदिर के निर्माण का रास्ता खुल गया।

भारत के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पाँच-सदस्यीय सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने एक सर्वसम्मत फ़ैसले में घोषणा की कि सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड, जो सात दशक पुराने टाइटल सूट के पक्षकार थे, उन्हें तीन महीने में अयोध्या में अन्य जगह पर मस्जिद के निर्माण के लिए पाँच एकड़ ज़मीन दी जानी चाहिए।

देश भर के समाचार पत्रों ने रविवार की सुबह इस ऐतिहासिक फ़ैसले को कैसे कवर किया, आइए इस पर एक नज़र डालते हैं…

नवभारत टाइम्स ने “मंदिर वहीं, मस्जिद नई” शीर्षक से फ्रंट पेज पर ख़बर प्रकाशित की। इस ख़बर में अयोध्या फ़ैसले के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा राष्ट्र को संबोधित किए जाने का उल्लेख उनकी तस्वीर के साथ किया गया।

पंजाब केसरी ने अपने फ्रंट पेज पर भगवान श्री राम के धनुषधारी तस्वीर को प्रकाशित किया और “श्रीराम मंदिर वहीं बनेगा” शीर्षक से ख़बर प्रकाशित की।

हिन्दी दैनिक अख़बार जनसत्ता ने फ्रंट पेज पर सुप्रीम कोर्ट और शंख बजाते भक्तों के साथ “मंदिर वहीं” शीर्षक से ख़बर प्रकाशित की।

प्रमुख हिन्दी दैनिक अमर उजाला ने अपनी ख़बर “रामलला विराजमान” शीर्षक से प्रकाशित किया और फ़ैसले को राम राज की भोर के रूप में संदर्भित किया।

दैनिक जागरण ने सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फ़ैसले के बाद भगवान राम के एक बड़े चित्र और प्रस्तावित राम मंदिर के एक चित्र को अपने पहले पन्ने पर प्रकाशित किया।

दैनिक भास्कर ने “रामलला ही विराजमान” शीर्षक से सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर एक संक्षिप्त रिपोर्ट प्रकाशित की। दिलचस्प बात यह है कि फ्रंट पेज पर पुरातत्वविद केके मुहम्मद की रिपोर्ट थी, जो पुरातत्वविदों की टीम का एक हिस्सा थे। उन्होंने 1976-77 में राम मंदिर साइट पर पहली खुदाई की थी, जिसमें पुष्टि की गई थी कि बाबरी मस्जिद के नीचे एक भव्य मंदिर के पर्याप्त पुरातात्विक प्रमाण हैं।

दैनिक हिन्दी अख़बार हिन्दुस्तान, जो हिंदुस्तान टाइम्स समूह का एक हिस्सा है, उसने फ्रंट पेज पर “राम मंदिर का रास्ता साफ” शीर्षक से ख़बर प्रकाशित की और साथ ही अयोध्या में भगवान राम का एक भव्य मंदिर भी प्रकाशित किया।

दैनिक हिन्दी अख़बार, प्रभात खबर ने अपने फ्रंट पेज पर सुप्रीम कोर्ट की एक तस्वीर लगाई और “अयोध्या राम की” शीर्षक के साथ ख़बर प्रकाशित की। इसका अर्थ है अयोध्या नगरी भगवान राम की है।

प्रभात खबर ने यह भी उल्लेख किया है कि कैसे मुस्लिम पक्षकारों को अयोध्या में 5 एकड़ ज़मीन केवल एक मस्जिद बनाने के लिए मिलेगी।

अंग्रेजी अखबारों की बात करें तो हिन्दुस्तान टाइम्स के फ्रंट पेज पर ‘श्री राम’ के नाम की ईंटों के साथ खड़े एक संत की तस्वीर है, जो अयोध्या की साइट पर मौजूद थे। दरअसल, इस तस्वीर में वो संत एक भव्य मंदिर के निर्माण का लंबे समय से इंतज़ार करते नज़र आ रहे हैं।

इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा कि जिस जगह पर वर्षों से विवाद चला आ रहा है, उसकी जगह अब एक मंदिर होगा, जबकि मस्जिद को 5 एकड़ का भूखंड मिलेगा।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने फ्रंट पेज पर “RAM MANDIR WITHIN SITE” हेडिंग से ख़बर प्रकाशित की।

मुंबई मिरर, जो टाइम्स ग्रुप का ही हिस्सा है, उसने भगवान को मिली जमीन और मुस्लिमों को नाजुक शांति नाम से ख़बर प्रकाशित की।

लेकिन एक अखबार है – द टेलिग्राफ। यह अपने फ्रंट पेज के अपने कुख्यात हेडलाइन के लिए जाना जाता है। जहाँ सभी मीडिया हाउस ने सर्वोच्च न्यायालय की सर्वोच्चता को बरकरार रखते हुए हेडलाइन बनाई, वहीं इसने बड़ी चालाकी से हिंदूस्थान को तोड़ कर हिंदू स्थान लिखा। सामान्य हिंदी भाषी शायद इसकी धूर्तता को समझने में थोड़ा समय लगाए, लेकिन HINDU STHAN को अगर आप ध्यान से देखें तो समझ जाएँगे कि इसका संपादक कितनी गिरी हुई मानसिकता का इंसान है। दरअसल Stan (अगर H को साइलेंट कर दें तो, जो कि टेलिग्राफ के संपादक की मंशा भी थी, तभी उसने इसे ब्रेक करके हेडलाइन बनाई) का अर्थ शैतान होता है। खैर… शायद इन्हें नहीं पता लेकिन ये हेडलाइन बनाते-बनाते खुद हेडलाइन बन जाएँगे, JNU से गायब होते वामपंथियों की तरह।

‘कॉन्ग्रेस महाराष्ट्र की दुश्मन नहीं, हम सरकार बनाने को तैयार’ – संजय राउत के बयान के बाद अब कॉन्ग्रेसी MLA भी…

महाराष्ट्र में सरकार गठन को लेकर चल रही उठा-पटक के बीच शिवसेना के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद संजय राउत ने कहा है कि अगर कोई सरकार बनाने को तैयार नहीं है तो शिवसेना यह जिम्मा ले सकती है। इसके साथ ही उन्होंने कॉन्ग्रेस को लेकर भी बड़ा बयान दिया है। संजय राउत ने कहा है कि कॉन्ग्रेस राज्य की दुश्मन नहीं है। सभी पार्टियों के बीच कुछ मुद्दों को लेकर मतभेद होता है।

बता दें कि महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने शनिवार (नवंबर 9, 2019) को बीजेपी को सरकार बनाने के लिए न्योता दिया था। विधानसभा चुनाव में सबसे बड़े दल के रूप में उभरी बीजेपी को मिले राज्यपाल के न्योते के बाद संजय राउत का यह बयान आया है। वहीं इस बीच कॉन्ग्रेस विधायकों के शिवसेना को समर्थन देने की बात भी सामने आ रही है।

जानकारी के मुताबिक कॉन्ग्रेस विधायकों ने सर्वसम्मति से शिवसेना को सरकार बनाने के लिए समर्थन देने का फैसला किया है। इसको लेकर कॉन्ग्रेस पार्टी राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी (NCP) को एक पत्र प्रस्तुत करने की योजना बना रही है। इसको लेकर राजस्थान के कॉन्ग्रेस में मीटिंग हो रही है। 

बता दें कि कॉन्ग्रेस के 44 विधायकों में से 35 विधायक जयपुर में ही हैं। महाराष्ट्र से भारतीय जनता पार्टी की सरकार को हटाने के लिए कॉन्ग्रेस के अधिकतर विधायकों के शिवसेना के साथ जुड़ने की संभावना जताई जा रही है। इसके साथ ही एनसीपी प्रमुख शरद पवार की भी विधायकों के साथ मीटिंग की बात सामने आ रही है। ऐसा बताया जा रहा है कि शरद पवार भी अपने विधायकों से शिवसेना को समर्थन देने के लिए कहेंगे।

उल्लेखनीय है कि परसों देवेंद्र फड़णवीस को सोमवार (11 नवंबर, 2019) तक विधानसभा के पटल पर फ्लोर टेस्ट पास करने (सदन में बहुमत साबित करने) का मौका होगा। फडणवीस ने शुक्रवार (8 नवंबर, 2019 को) राज्य के कार्यवाहक मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफ़ा दे दिया है।

राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का JNU में विरोध, ‘रामलला हम आएँगे, मंदिर…’ के नारे से मिला करारा जवाब

जेएनयू के कुछ छात्रों काे सुप्रीम कोर्ट का शनिवार (नवंबर 9, 2019) को अयोध्या पर आया फैसला रास नहीं आया। सुप्रीम कोर्ट ने रामलला विराजमान के पक्ष में फैसला सुनाया, जिससे अयोध्या में भगवान राम के पैदा होने के स्थान पर राम मंदिर के निर्माण का रास्ता साफ हो गया है। इसके विरोध में जेएनयू के छात्रों ने शनिवार शाम को विरोध प्रदर्शन किया।

नवभारत टाइम्स द्वारा शेयर किए गए एक वीडियो में जेएनयू के छात्रों को यह कहते हुए देखा जा सकता है कि अयोध्या भूमि टाइटल मामले पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला ’अनुचित’ था। विरोध करने वाले छात्र कहते हैं, “जय श्री राम लीगल हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे लीगल कर दिया है। ये पब्लिक नारा बन गया है। इसे याद रखना। इससे निराश नहीं होना है।” हास्यास्पद यह है कि जितनी भीड़ वामपंथियों ने विरोध के लिए जुटाई थी और जितनी ऊँची आवाज में वो विरोध कर रहे थे, उससे कहीं अधिक जय श्री राम के नारे की गूँज सुनाई दे रही थी। नीचे के वीडियो में वामपंथी विरोध की दम तोड़ती आवाज को सुनिए और मजे लीजिए।

लेकिन बेचारे वामपंथी! विरोध के नाम पर विरोध करना था, सो किया। वीडियो में राम मंदिर पर विरोध कर रही भीड़ को संबोधित करता एक छात्र नेता कहता है कि दूसरे पक्ष को 5 एकड़ जमीन मिली है, जो उस भूमि का दोगुना है, जो कभी विवादित थी। उसने कहा, “इस तरह से तो मुस्लिम पक्ष जीत गया है। लेकिन यह जमीन का सवाल नहीं था। यह गरिमा का सवाल था। यह अधिकार और न्याय का प्रश्न है। यह कभी जमीन के बारे में था ही नहीं। 1992 के विध्वंस के बाद जो भी दंगे हुए, उसमें केवल मुस्लिमों ने ही अपनी जान गँवाई। यूपी में, मुंबई में और फिर गुजरात में दंगे हुए। तुम्हारा नरेंद्र मोदी भी उसी का प्रोडक्ट है। वह बाबरी मस्जिद विध्वंस का प्रोडक्ट है। भारतीय राजनीति का मौजूदा स्थिति भी उसी बाबरी मस्जिद विध्वंस की उपज है। ये तुम्हें नहीं भूलना है और वही मोदी जी आज आपको अयोध्या के फैसले पर देश को संबोधित करते हैं। ये चीजें नहीं भूलनी है। हमें निराश नहीं होना है।”

मतलब इन्हें राम मंदिर पर विरोध करना हो या सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर… घूम-फिर कर इनका सारा तर्क एक ही नाम पर आकर अटकता है, वो है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। वामपंथी छात्रों ने जेएनयू के साबरमती ढाबा के पास भी विरोध रैली की योजना बनाई थी। उन्होंने विरोध प्रदर्शन किया भी। हालाँकि उनकी ये योजना असफल हो गई, क्योंकि वहाँ पर एक और ग्रुप भी मौजूद था, जिसने “रामलला हम आएँगे, मंदिर वहीं बनाएँगे” के नारे लगाए। और इस नारे की गूँज इतनी थी कि वामपंथियों की योजना धरी की धरी रह गई।

उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने दशकों से चले आ रहे विवाद को खत्म करते हुए सर्वसम्मति से रामलला विराजमान के पक्ष में ऐतिहासिक फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार से तीन महीने के अंदर एक ट्रस्ट स्थापित करने के लिए कहा है, जो राम मंदिर निर्माण का प्रभारी होगा। वहीं, मस्जिद बनाने के लिए अयोध्या में ही दूसरी जगह 5 एकड़ जमीन दिया जाएगा।

राम मंदिर के बाद अब सबरीमाला का इंतजार… रिटायरमेंट से पहले CJI गोगोई सुनाएँगे फैसला

राम मंदिर मामले पर ऐतिहासिक फ़ैसले के बाद, अब चीफ़ जस्टिस ऑफ़ इंडिया (CJI) को चार अन्य प्रमुख मामलों में फ़ैसला सुनाना है। वैसे अब तक अयोध्या भूमि विवाद मामले को ही सबसे बड़ा माना जा रहा था, लेकिन इस पर फ़ैसला सुना दिए जाने के बाद अब बाक़ी चार मामलों में फ़ैसले का इंतज़ार किया जा रहा है। दरअसल, इनकी सुनवाई CJI रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने की थी और फ़ैसला सुरक्षित रख लिया था। अगले सप्ताह इन मामलों में फ़ैसला आना है।

बता दें कि अयोध्या विवाद की सुनवाई करने वाली सुप्रीम कोर्ट की स्पेशल बेंच की अगुवाई चीफ जस्टिस रंजन गोगई ने की थी। CJI के अलावा इस बेंच में जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर शामिल थे।

ये मामले कौन से हैं, इन्हें विस्तार से समझते हैं…

1. सबरीमाला में महिलाओं का प्रवेश-

कोर्ट ने पिछले साल 28 सितंबर को केरल के सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लगी पाबंदी को लिंग आधारित भेदभाव ठहराते हुए रद्द किया था। हालाँकि, ये फैसला 4-1 के बहुमत से था। जिसमें जस्टिस इंदू मल्होत्रा ने बहुमत से असहमति जताई थी। लेकिन फैसला आने के बाद अयप्पा अनुयायी इस फैसले का भारी विरोध करने लगे। नतीजतन इसके ख़िलाफ़ 55 पुनर्विचार याचिकाओं सहित कुल 65 याचिकाएँ कोर्ट में दर्ज हुईं। जिस पर सुनवाई करते हुए बीती 6 फरवरी को CJI गोगोई, जस्टिस आरएफ नरीमन, जस्टिस एएम खानविल्कर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदु मल्होत्रा ​​ने 45 से अधिक समीक्षा याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रख लिया था। 

2. राहुल गाँधी द्वारा अवमानना किए जाने पर माफी माँगने का मामला

कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी के ‘चौकीदार चोर है’ बयान पर उनके खिलाफ लंबित अवमानना मामले में उन्हें माफी दिए जाने पर भी फैसला आना बाकी है। जिसमें भाजपा सांसद मीनाक्षी लेखी ने उन्हें माफी न देने की अपील कोर्ट से की है और कहा है कि इसके लिए केवल माफी काफी नहीं है बल्कि उन्हें सजा दी जानी चाहिए।

3. राफेल सौदे पर पुनर्विचार

दिसंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने राफेल फाइटर जेट सौदे में आपराधिक जाँच से इनकार कर दिया था। इसके खिलाफ याचिकाएँ दायर हुई थीं। CJI गोगोई की अगुवाई वाली पीठ ने इस साल मई में इन पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। अब सीजेआई को रिटायरमेंट से पहले इस पर फैसला सुनाना है।

4. आरटीआई के दायरे में सुप्रीम कोर्ट और सीजेआई का ऑफिस ‘लोक प्राधिकार’ है या नहीं

एक दशक से सुप्रीम कोर्ट के समक्ष लंबित पड़े इस मामले पर भी फैसला आने की पूरी संभावना है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री ने 2010 में दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील की थी और CJI गोगोई की अध्यक्षता वाली पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने अप्रैल 2019 के मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। बता दें इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति रवींद्र भट ने फैसला सुनाया था कि CJI का कार्यालय RTI जाँच के लिए खुला है।

ग़ौरतलब है कि CJI रंजन गोगोई की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की बेंच ने अयोध्या की जिस जमीन को लेकर विवाद था वहॉं मंदिर निर्माण का आदेश दिया है। साथ ही मस्जिद निर्माण के लिए सरकार को सुन्नी वक्फ बोर्ड को 5 एकड़ ज़मीन देने के निर्देश दिए हैं। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार से 3 महीने के भीतर इसके लिए एक योजना तैयार करने को कहा है।

राम मंदिर पर फैसले के बाद मेरठ के मुस्लिम बहुल इलाकों में माहौल खराब करने की कोशिश, 10 गिरफ्तार

सालों से चले आ रहे अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने 9 नवंबर को ऐतिहासिक फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद प्राय: हर जगह शांति व्यवस्था कायम रही, लेकिन कुछ जगहों पर पुलिस को सख्ती भी दिखानी पड़ी। उत्तर प्रदेश के मेरठ जोन में मुस्ल‍िम बहुल इलाकों में शांत‍ि भंग करने की कोश‍िश की गई। जिसे पुल‍िस ने नाकाम कर द‍िया।

मामले में पुलिस ने कुल 10 लोगों को गिरफ्तार कर लिया है। इन सभी को शांति भंग करने की कोशिश के आरोप में आईपीसी की धारा 151 के तहत गिरफ्तार किया गया। फैसला आने के तकरीबन एक महीने पहले से ही पुलिस पूरी तरह से मुस्तैद है और सुरक्षा-व्यवस्था को भी चाक-चौबंद रखा गया है। तमाम राजनेताओं और धर्मगुरूओं ने फैसला आने से पहले और फैसला आने के बाद भी शांति-व्यवस्था बनाए रखने की अपील की। 

अपील के बावजूद मेरठ के मुस्लिम बहुल इलाके में अराजतक तत्वों की शरारतें देखने को मिली। हालाँकि सुरक्षाा-व्यवस्था पर नजर रख रही पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया है। बता दें कि मेरठ जोन में कई ऐसे इलाके हैं, जो मुस्लिम बाहुल्य हैं। नोएडा से भी पुलिस ने 2 लोगों को गिरफ्तार किया है।

एडीजी प्रशांत कुमार ने इस संबंध में कहा, “उत्तर प्रदेश पुलिस सुरक्षा के ल‍िए सदैव तत्पर है। हमने सोशल मीडिया की भी पूरे दिन मॉनिटरिंग की और अभी भी कर रहे हैं। किसी को भी कानून तोड़ने और शांति भंग करने पर बख्शा नहीं जाएगा।”

अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के पहले ऐहतियात के तौर पर कई शहरों में इंटरनेट सेवाएँ बंद कर दी गई हैं। फैसले को देखते हुए न सिर्फ उत्तर प्रदेश बल्कि देश के कई हिस्सों में सुरक्षा के भारी इंतजाम किए गए हैं। अलीगढ़ जिला प्रशासन ने जिले भर में 8 नवंबर की रात 12 से 9 नवंबर की रात 12 बजे तक मोबाइल इंटरनेट सेवाएँ बंद रखने का आदेश दिया था। इसके अलावा अलीगढ़ स्थित अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में भी सभी कक्षाएँ रद्द कर दी गई हैं। यूनिवर्सिटी से जुड़े स्कूल 11 नवंबर तक बंद कर दिए गए हैं।

राम मंदिर पर शनिवार को सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने से पहले शुक्रवार (नवंबर 8, 2019) रात से ही यूपी प्रशासन हाई अलर्ट मोड पर आ गया था। सुरक्षा के मद्देनजर पूरी अयोध्या नगरी को छावनी में तब्दील कर दिया गया। साथ ही अयोध्या में अर्धसैनिक बलों के 4000 जवानों को तैनात किया गया।