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हरियाणा में बीजेपी बनाएगी सरकार, JJP के पास होगा उपमुख्‍यमंत्री पद: अमित शाह ने की घोषणा

तमाम कयासों के बाद अब हरियाणा में बीजेपी और जेजेपी गठबंधन की सरकार बननी तय हो गई है। भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष और गृहमंत्री अमित शाह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर तस्वीर साफ कर दी है। उन्होंने कहा कि हरियाणा के लोगों के बहुमत को मानते हुए बीजेपी और जेजेपी ने तय किया है कि दोनों पार्टियाँ मिलकर राज्य में सरकार बनाएँगी। रिपोर्ट्स के अनुसार, राज्य में बीजेपी का मुख्यमंत्री होगा जबकि डिप्टी सीएम जेजेपी का होगा।

बता दें कि शुक्रवार की शाम काफी देर तक केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के घर बैठक चल रही थी। बैठक के बाद अमित शाह ने ऐलान किया हरियाणा में जेजेपी ने बीजेपी को अपने 10 विधायकों सहित समर्थन दिया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, यह भी कहा जा रहा है कि JJP को गठबंधन सरकार में 4 मंत्री पद (2 कैबिनेट और 2 राज्य मंत्री) मिल सकता है। पहले 3 मंत्री (2 कैबिनेट और 1 राज्य मंत्री) पद की संभावना जताई जा रही थी।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस राजनीतिक हलचल पर शाम से ही नजर बानी हुई थी। जब कुछ देर पहले ही दुष्यंत चौटाला बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह से मिलने उनके निवास पर गए थे जिसके बाद दोनों के बीच सरकार बनाने को लेकर आपसी सहमति की बात अब सामने आई है। अब इस घोषणा के बाद मनोहर लाल खट्टर राज्यपाल से मिलकर सरकार बनाने का दावा पेश करेंगे।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, भाजपा विधायक दल की बैठक शनिवार को होगी, जिसमें खट्टर को दोबारा नेता चुना जाएगा। इसके बाद वह राज्यपाल से मिलकर सरकार बनाने का दावा पेश करेंगे। शपथ समारोह दिवाली बाद ही होने की संभावना है।

POK असल में टेररिस्ट ओकुपाइड कश्मीर, गिलगित बाल्टिस्तान समेत पूरा POK हमारा: सेना प्रमुख

भारतीय थल सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत ने आज (25 अक्टूबर, 2019 को) पाकिस्तान के कश्मीर पर दावे की धज्जियाँ उड़ाते हुए दावा किया है कि अपने कब्जे वाले POK तक पर भी उसका खुद नियंत्रण नहीं है; वह तो जिहादी आतंकियों के कब्जे में है। जनरल रावत सेना के कमांडरों की एक कॉन्फ़्रेंस में भाषण दे रहे थे जब उन्होंने यह बात कही। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने कश्मीर के जिन इलाकों पर अवैध कब्ज़ा कर लिया है, वे खुद उसके प्रशासन या कंट्रोल से नहीं चलते। “पीओके असल में पाकिस्तान का आतंकवादियों के नियंत्रण में चलने वाला हिस्सा है।” रावत ने कहा।

उन्होंने जम्मू कश्मीर की अखंडता और पूरे भूभाग पर भारत के अधिकार पर भी अपने भाषण में जोर देते हुए इस बात को रेखांकित किया। “जब हम जम्मू-कश्मीर की बात करते हैं, तो पूरे जम्मू कश्मीर में पीओके और गिलगित बाल्टिस्तान भी आते हैं। यानि पीओके और गिलगित बाल्टिस्तान एक ओकुपाइड क्षेत्र बन जाते हैं- ऐसे क्षेत्र जिन पर हमारे पश्चिमी पड़ोसी ने अवैध तरीके से कब्जा किया हुआ है।” जनरल रावत फील्ड मार्शल के एम् करियप्पा मेमोरियल लेक्चर में बोल रहे थे।

उन्होंने संविधान के विवादित अनुच्छेद 370 की भी बात करते हुए कहा कि इसे एक अस्थायी प्रावधान के रूप में लाया गया था। “जब आर्टिकल 370 को प्रस्तावित करते समय इसमें ‘अस्थायी’ शब्द था तो इस पर किसी को कोई आपत्ति नहीं हुई थी… ऐसे में अचानक से पाकिस्तान ने क्यों अनुच्छेद 370 के मुद्दे को तूल देना शुरू कर दिया है?”

“ऐसा इसलिए है क्योंकि पाकिस्तान जिस ज़मीन पर अवैध कब्ज़ा किए बैठा है, उस पर उसका खुद का ही नियंत्रण नहीं है; वो आतंकियों से कंट्रोल होती है। पीओके असल में एक आतंकियों द्वारा नियंत्रित देश या पाकिस्तान के भीतर का आतंकियों द्वारा नियंत्रित हिस्सा है।” सेना प्रमुख ने कहा। उन्होंने पाकिस्तान पर कश्मीर में हालातों के सामान्य होने में रुकावट डालने का भी आरोप लगाया। इसी में उन्होंने कई सारे सेब व्यापर से जुड़े लोगों की हत्याओं का भी ज़िक्र किया।

उन्होंने कई अन्य मुद्दों पर भी अपने भाषण में बात की। सैनिकों के हथियारों के बारे में उन्होंने कहा कि दुनिया के सर्वश्रेष्ठ राइफलें सिग सॉइर (Sig Sauer) इसी साल के अंत तक भारत को मिलने लगेंगी।

धनतेरस पर ‘लोहा लेने’ की तैयारी कीजिए, सोना तो आता ही रहेगा

अक्सर ‘मोटिवेशनल’ कहे जाने वाले विदेशी वीडियो नजर आते हैं जिसमें लोगों की बाँटने या देने के गुण को दर्शाया जाता है। इनमें आम तौर पर कोई साधारण सा दिखने वाला व्यक्ति खाने की तलाश में होता है और वो लोगों से किसी रेस्तरां इत्यादि के पास खड़ा, खाना माँगता है। ज्यादातर मामलों में जब ठीक-ठाक या अच्छी आर्थिक स्थिति वाले लोगों से वो कुछ खाने को माँगता है तो उसे भिखारियों की तरह झिड़क दिया जाता है। वहीं कहीं कोने में बैठा कोई गरीब घर-संपत्ति हीन भिखारी सी हालत में होता है जिससे वो खाना माँग लेता है।

जहाँ बाकी लोगों ने उसे दुत्कार दिया होता है, वहीं ये गरीब जिसके पास शायद अपने अगले भोजन के लिए भी पैसे नहीं, वो इसे अपने बर्गर में से आधा हिस्सा दे डालता है! आश्चर्य की बात तो है लेकिन इसके बारे में कुछ लोग कहते हैं कि जिसे भूख का अंदाजा हो, वो अपने खाने में से हिस्सा बाँटता है। जिन्हें अंदाजा नहीं कि भूख क्या होती है, वो लोग खाना माँग रहे व्यक्ति की तकलीफ समझ ही नहीं पाते। ऐसा आज होना शुरू हुआ है, ऐसा भी नहीं, भारतीय इतिहास में देखें तो काफी पहले इसके उदाहरण मिल जाते हैं।

भारत में सन्यासियों के लिए भिक्षाटन आम बात थी और आदिशंकराचार्य से जुड़ी कहानियों में भी उनके भिक्षा माँगने के किस्से मौजूद हैं। कहा जाता है ऐसे ही एक बार भिक्षा माँगते हुए वो एक बार एक बहुत गरीब ब्राह्मण के घर जा पहुँचे। गरीब के घर में कुछ नहीं था और ब्राह्मणी इधर-उधर कुछ भिक्षा में देने के लिए ढूँढने लगी। आखिर उसे घर में खाने को देने लायक सिर्फ एक सूखा सा आंवला मिला। ब्राह्मणी ने वही उठाकर आदिशंकराचार्य की झोली में डाल दिया। दरवाजे पर ही खड़े आदिशंकराचार्य काफी समय से ब्राह्मणी के प्रयास देख रहे थे।

अपनी दरिद्रता की स्थिति में भी याचक को निराश न करना पड़े, इसलिए घर में मौजूद एकमात्र खाने योग्य वस्तु का दान करते ब्राह्मणी को देख उनके मुख से देवी लक्ष्मी की स्तुति में एक स्त्रोत फूट पड़ा। उन्होंने माँ लक्ष्मी से उस परिवार की निर्धनता दूर करने के लिए जो प्रार्थना की, उसे ‘कनकधारा स्त्रोत’ के नाम से जाना जाता है। कुछ कथाएँ कहती है कि इस स्त्रोत से प्रसन्न माँ लक्ष्मी ने वहाँ सोने की बारिश कर दी। कुछ दूसरी कथाएँ बताती हैं कि इस स्त्रोत से घर के आँवले के पेड़ में स्वर्ण के आँवले उग आए और सुबह आँगन में सोने के आँवले बिखरे पड़े मिले।

कहानी कई दृष्टिकोणों से आश्चर्यजनक कही जा सकती है। याचक को निराश न लौटाने के ब्राह्मणी के प्रयास तो रोचक हैं ही, देने वाले को अगली बार कभी ऐसी स्थिति का सामना न करना पड़े इसके लिए आदिशंकराचार्य का सीधा माँ लक्ष्मी से माँगना भी आश्चर्यजनक है। कहानी में देवी, दान देने वाली, सभी पात्र स्त्रियाँ ही हैं, आदिशंकराचार्य एक निमित्त मात्र हैं, ये भी देखने लायक है। आयुर्वेद की दृष्टि से देखें तो आँवले की तुलना स्वर्ण से की गयी है। ऐसा इसलिए है क्योंकि विटामिन सी के अलावा आँवले में आयरन, कैल्शियम जैसे तत्व भी प्रचुर मात्रा में होते हैं। ये स्त्रियों के लिए एक औषधि नहीं बल्कि आवश्यकता है।

हाल ही में किसी बड़े स्वयंसेवी समूह ने स्त्रियों में आयरन की कमी पर एक अच्छा सा वीडियो भी बनाया है। विद्या बालन जैसी नामचीन हस्तियों ने भी अपने ट्विटर हैंडल पर इसे शेयर किया था। इसमें मुख्यतः स्त्रियों से ये कहा गया था कि इस ‘धनतेरस’ पर आप क्या लेंगी? सोना खरीद लेना तो परंपरागत है, लेकिन स्त्रियों शरीर में आयरन की कमी देखी जाती है। भारत में करीब-करीब 40% स्त्रियाँ रक्ताल्पता (एनीमिया) से पीड़ित हैं। इसके लिए हाल में सरकार आयरन फॉलिक एसिड के टेबलेट भी बाँटना शुरू कर चुकी है। लोहे की कमी से ये भी याद आया कि हाल ही में कमलेश तिवारी और उससे पहले डॉ. नारंग जैसे कई लोगों का हाल तो हम सभी देख ही चुके हैं।

बाकी सवाल ये है कि इस धनतेरस में खरीदा क्या गया? लोहे के नाम पर कुछ बर्तन भर लिए गए, सिर्फ स्वर्ण की खरीदारी हुई, या आँवला भी नजर आया? लोहा लेने (जो कि कहावत भी है) के बारे में क्या सोचते हैं आप?

गिरीश चंद मुर्मू होंगे J&K के पहले LG, राधा कृष्ण माथुर संभालेंगे लद्दाख: 31 अक्टूबर से बदल जाएगी व्यवस्था

केंद्र सरकार ने 31 अक्टूबर से दो केंद्र शासित प्रदेशों में बँटने जा रहे जम्मू-कश्मीर राज्य के लिए दो अलग-अलग उप राज्यपाल घोषित कर दिए हैं। आईएएस अफसर गिरीश चंद्र मुर्मू को जम्मू कश्मीर का कार्यभार सौंपा गया है, वहीं राधा कृष्ण माथुर बौद्ध बहुल लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश के लेफ्टिनेंट गवर्नर होंगे। लद्दाख ने अपनी मर्ज़ी से जम्मू-कश्मीर राज्य की बजाय केंद्र द्वारा शासित होने की माँग की थी।

साथ ही खबर आ रही है कि वर्तमान राज्यपाल सत्यपाल मलिक को गोवा का गवर्नर बना कर भेजा जा रहा है। मलिक ने राज्य की प्रशासनिक सत्ता अनुच्छेद-370 के निरस्त किए जाने जैसे मुश्किल समय संभाली थी। वे इस कालखंड में राहुल गाँधी के साथ राज्य में निमंत्रण दिए जाने और वापिस लिए जाने को लेकर नोंकझोंक के लिए भी चर्चित रहे।

माथुर और मुर्मू के नामों की घोषणा राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने की है। इनके नामों को अप्रत्याशित माना जा रहा है।

(यह डेवलपिंग स्टोरी है। और जानकारी मिलने पर इसे आगे अपडेट किया जाता रहेगा।)

हरियाणा में गोपाल कांडा से समर्थन नहीं लेगी BJP: कहा- न हमने टिकट दिया था, न समर्थन की बात कही

सिरसा की विधानसभा सीट से चुनाव जीतने वाले हरियाणा लोकहित पार्टी के गोपाल कांडा को अभी राजनीतिक रूप से राहत नहीं मिलेगी क्योंकि मीडिया में नाम उछलने के बाद से ही हरियाणा की सत्ता में आने के लिए कोशिशें करती भाजपा ने अब गोपाल कांडा से स्पष्ट दूरी बना ली है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार भाजपा ने यह फैसला कर लिया है कि वह गोपाल कांडा को हरियाणा की सरकार में शामिल नहीं करेगी।

बता दें कि यह सब चर्चा में तब आया जब गोपाल कांडा ने खुलेआम भाजपा को समर्थन करने का एलान कर दिया था। कहा जा रहा है कि इस सम्बन्ध में चुनाव नतीजे आने के बाद बातचीत के लिए भाजपा सांसद सुनीता दुग्गल गुरुवार को कांडा और कुछ अन्य निर्वाचित निर्दलीय विधायकों को चार्टर्ड प्लेन से दिल्ली लेकर गई थीं।

रिपोर्ट्स के अनुसार, बीजेपी के तरफ से गोपाला कांडा के समर्थन की कोई बात मीडिया में नहीं कही गई थी। मीडिया में खबरें आने के बाद गोपाल कांडा के भाजपा में शामिल होने को लेकर मोदी सरकार पर रणदीप सुरजेवाला ने भी निशाना साधा था। अपनी पार्टी को आदर्श बताते हुए उन्होंने दुहाई दी और कहा कि जब मंत्री पद पर बैठे गोपाल कांडा पर आरोप लगे थे तो उनकी कॉन्ग्रेस पार्टी ने नैतिक ज़िम्मेदारी समझते हुए, गोपाल कांडा को तत्काल प्रभाव से बर्खास्त कर दिया था। सुरजेवाला ने उस समय मोदी और शाह द्वारा गोपाल कांडा पर दिए गए उनके बयानों का भी ज़िक्र किया। इस दौरान कॉन्ग्रेस पार्टी की महिला राष्ट्रीय अध्यक्ष सुष्मिता देव ने ट्वीट करके इस मुद्दे पर अपनी आपत्ति जताई थी।

गौरतलब है कि इस चुनाव में दुष्यंत चौटाला खुदको किंगमेकर समझ रहे थे मगर उनके लिए यह किसी बड़े झटके से कम नहीं है कि निर्दलीय विधायकों ने अपना विश्वास भाजपा के साथ जाने में जताया है। बता दें कि भाजपा नेता उमा भारती ने भी इस मसले पर पहले ही पार्टी के गोपाल कांडा से दूर होने के संकेत दिए थे।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार विजय गोयल सहित कई नेताओं के बयानों में इस बात का दावा है कि बीजेपी ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि गोपाल कांडा से उनकी पार्टी किसी भी तरह का कोई समर्थन नहीं लेगी। रिपोर्ट के अनुसार गोयल ने यह भी कहा कि न हमने उन्हें टिकट दिया था और न ही कही समर्थन की बात। अब जब 90 सीटों वाली हरियाणा विधानसभा के चुनाव में भाजपा को 40 सीटें मिली हैं। और समर्थन में बहुमत के लिए ज़रूरी 6 की जगज 9 विधायक तैयार हैं तो अगर इसमें से गोपाल कांडा को हटा भी दें तो भी भाजपा आसानी से बहुमत का आँकड़ा पार कर लेगी। ऐसा करना स्वच्छ राजनीति और बीजेपी दोनों के लिए अच्छा है।

अगस्ता वेस्टलैंड घोटाला: रतुल पुरी की जुडिशियल कस्टडी 2 नवम्बर तक बढ़ी, अब हिरासत में मनेगी दिवाली

दिल्ली की एक अदालत ने आज (शुक्रवार, 25 सितंबर, 2019 को) मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ के भांजे रतुल पुरी की न्यायिक हिरासत (जुडिशियल कस्टडी) एक हफ्ते यानि अगले शनिवार (2 नवंबर, 2019) तक के लिए बढ़ा दी है। रतुल पुरी पर अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर घोटाले की मनी लॉन्ड्रिंग में शामिल होने का आरोप है। यह घोटाला मोदी सरकार की पूर्ववर्ती यूपीए के कार्यकाल के अंतिम दौर में हुआ था।

आर्थिक अपराधों की जाँच करने वाली स्पेशलाइज़्ड जाँच एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने रतुल पुरी की हिरासत बढ़ाए जाने के लिए अदालत में अर्ज़ी दायर की थी। ईडी की अर्ज़ी को मंजूर करते हुए विशेष जज अरविन्द कुमार ने पुरी को जेल भेज दिया। इसके पहले 21 अक्टूबर, 2019 को भी अदालत ने तिहाड़ जेल में ईडी को पुरी से पूछताछ के लिए उनकी कस्टडी तीन दिन के लिए बढ़ा दी थी।

रतुल पुरी को ईडी ने पिछले महीने (4 सितंबर, 2019 को) मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में हिरासत में लिया था। यह मुकदमा इटली की रक्षा उपकरण बनाने वाली कम्पनी फिनमैकेनिका की ब्रिटिश सब्सिडरी कम्पनी अगस्ता वेस्टलैंड से 12 हेलीकॉप्टरों की खरीद में कई कथित अनियमितताओं की शिकायतों के चलते किया गया था। इन चॉपरों में अति विशिष्ट श्रेणी के गणमान्य लोगों (वीवीआईपी) को यात्रा करनी थी।

यह रतुल पुरी की पहली गिरफ़्तारी भी नहीं है। इसके पहले वे प्रिवेंशन ऑफ़ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (पीएमएलए) के प्रावधानों के अंतर्गत भी हिरासत में लिए जा चुके हैं। वह भी चॉपर स्कैम से ही जुड़ा मसला था। पहले वे दिल्ली में ईडी के सामने पूछताछ के लिए पेश हुए, उसके बाद उन्हें हिरासत में ले लिया गया। ईडी ने इसके लिए सीबीआई द्वारा दायर एफआईआर का संज्ञान लिया।

पीएमएलए का इस्तेमाल कर सबसे ताज़ा केस सभी ने दायर किया है। लगभग दो महीने पहले (17 अगस्त, 2019 को) दायर इस मुकदमे में रतुल पुरी के अलावा उनके पिता दीपक पुरी, माँ नीता पुरी (जो मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री और कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता कमलनाथ की बहन भी हैं) और अन्य के खिलाफ शिकायत की गई है। मामला सेंट्रल बैंक ऑफ़ इंडिया द्वारा अपने साथ ₹354 करोड़ की धोखाधड़ी (फ्रॉड) किए जाने के आरोप का है।

उनकी अग्रिम जमानत याचिका भी अदालत ने ख़ारिज कर दी थी। इसके अलावा ईडी का यह भी आरोप है कि रतुल पुरी चॉपर घोटाले के मामले में एक गवाह की हत्या के लिए भी जिम्मेदार हैं।

370 के बाद अब J&K से राज्य मानवाधिकार आयोग भी ख़त्म: इसी के ज़रिए बचते थे आतंकी

5 अगस्त 2019 को केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में एक बिल पेश किया जिसके पारित होते ही जम्मू कश्मीर को विशेष अधिकार देने वाला में अनुच्छेद 370 ख़त्म हो गया। पूरे राज्य में सुरक्षा के एहतियात बरतने के चलते सेना को इसकी पूरी ज़िम्मेदारी सौंप दी गई। इस सब के बीच कई लोगों ने इस बात की दलील देते हुए कश्मीर में होने वाली सेना और सरकार की कार्रवाई का विरोध किया था कि कश्मीर घाटी में उठाए जा रहे कदम पूरी तरह से मानवाधिकारों के खिलाफ है।

दरअसल सरकार ने फैसला किया है कि जम्मू-कश्मीर में 31 अक्टूबर से नए कानून लागू हो जाएँगे। बता दें कि देश में केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए कई ऐसे कानून हैं जो जम्मू-कश्मीर को छोड़कर देश के सभी अन्य भागों में लागू होते थे। इसकी बड़ी वजह थी ‘अनुच्छेद 370’। संविधान से इस अनुच्छेद के हटते ही राज्य में उन सभी कानूनों को लागू करने का रास्ता साफ़ हो गया जो सरकार द्वारा अपने नागरिकों की भलाई के लिए बनाए जाते हैं। इसी क्रम में जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने एक अहम् निर्णय लिया है जिसके तहत राज्य में सात आयोग को ख़त्म करने का आदेश जारी किया गया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक राज्य से केंद्र शासित प्रदेश बनने वाले जम्मू-कश्मीर को जिन 7 आयोगों को नष्ट करने का निर्णय लिया गया उनमें राज्य का मानवाधिकार आयोग, सूचना-आयोग, उपभोक्ता निवारण आयोग, राज्य विद्युत आयोग, महिला एवं बाल विकास आयोग, दिव्यांगजन के लिए बना आयोग, राज्य पारदर्शिता आयोग शामिल हैं।

बता दें कि जम्मू-कश्मीर 31 अक्टूबर को पूर्णतः एक केंद्र शासित प्रदेश बन जाएगा, लिहाज़ा आने वाले वक़्त में जम्मू-कश्मीर से सम्बंधित सभी कानून सीधे केंद्र द्वारा जारी किए जाएँगे। बता दें कि 5 अगस्त 2019 के अपने ऐतिहासिक फैसले में सरकार ने जम्मू और कश्मीर को दो भागों में बाँट दिया था। जिसके बाद जम्मू और कश्मीर नाम से पहचाने जाने वाले राज्य को जम्मू और लद्दाख- दो केंद्र शासित प्रदेशों में बाँट दिया था। बता दें कि दिल्ली की ही तरह जम्मू एक विधानसभा वाला केंद्र शासित प्रदेश होगा तो वहीं लद्दाख चंडीगढ़ की तरह पूर्णतः केंद्र सरकार के आधीन रहेगा। उल्लेखनीय है कि राज्य के जो आयोग ख़त्म किए गए हैं वह अब सीधे केंद्र सरकार की देख-रेख में होंगे।

बता दें कि जब कश्मीर में सरकार ने सेना को भेजकर स्थिति नियंत्रण में रखने का फैसला लिया तो कई लोगों ने इसपर अपनी आपत्ति ज़ाहिर की थी। अधिकांश लोगों ने इसे मानवाधिकारों का उल्लंघन बताया था। इस तरह की बात करने वाले लोगों में कश्मीर से अपनी सियासत चमकाने वालों से लेकर कई वामपंथी तथाकथित बुद्धिजीवी, मनीषी और चिन्तक शामिल थे जो मानवाधिकार के नाम पर हजारों लोगों की नृशंस हत्या और दंगा फसाद करने वालों को विशेष सुविधाएँ दिए जाने की वकालत करते हैं। उल्लेखनीय है कि अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद भी कुछ ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई थी जब घाटी में स्कूल, मोबाइल, फोन, इन्टरनेट, पर्यटकों की आवाजाही लम्बे समय तक प्रभावित रहे थे।

हरियाणा BJP में ख़ुशी की लहर: बहुमत के लिए चाहिए थे 6 आ गए 9 समर्थन में

हरियाणा में अब भारतीय जनता पार्टी की सरकार में कोई अड़चन नहीं दिख रही है। कल देर रात रानिया सीट से निर्दलीय विधायक और ओमप्रकाश चौटाला के छोटे भाई रणजीत सिंह चौटाला ने समर्थन का ऐलान कर ही दिया था। 4 और विधायक समर्थन में थे ही, सुबह दो और विधायकों ने भाजपा के कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा और हरियाणा बीजेपी के प्रभारी से मुलाकात कर भाजपा को समर्थन देने का आश्वासन दिया, और अब फिर दो और विधायकों ने मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर की सरकार को समर्थन देने का ऐलान किया है।

निर्दलीय विधायक गोपाल कांडा को मिलाकर अब भाजपा के पास 49 विधायक हो गए है। 90 सदस्यों वाली हरियाणा विधानसभा में बहुमत का आँकड़ा 46 का है, जिसे विश्वास प्रस्ताव के दौरान छूने में भाजपा को कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए। हालाँकि, कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि बीजेपी गोपाल कांडा से दूरी बनाकर चल रही है। अगर वो न भी हों तो भी बीजेपी सरकार बनाने की शर्तें आराम से पूरी कर पा रही है।

सुबह सात निर्दलीय विधायकों ने भाजपा के कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा और हरियाणा बीजेपी के प्रभारी से मुलाकात कर भाजपा को समर्थन देने का आश्वासन दिया है। इसके अलावा 5 अन्य विधायक कल रात नड्डा और हरियाणा भाजपा के प्रभारी एवं महासचिव अनिल जैन से मिले थे, जिनमें रणजीत सिंह चौटाला भी शामिल थे।

अब भाजपा को समर्थन करने वाले 9 विधायकों की सूची कुछ ऐसी है:

1) रणधीर गोलन- पुंडरी

2) बलराज  कुंडू- महम

3) रणजीत सिंह- रानियां

4) राकेश दौलताबाद- बादशाहपुर

5) गोपाल कांडा – सिरसा

6) सोमवीर सांगवान- दादरी

7) धर्मपाल गोंदर- नीलोखेड़ी

8) अभय चौटाला – आईएनएलडी

9) नयनपाल रावत – पृथला

रानिया से जीते रणजीत सिंह 31 साल बाद एक बार फिर से विधानसभा की सीढ़ियाँ चढ़ेंगे। रणजीत सिंह का एक वीडियो सामने आया है। इसमें रणजीत सिंह कहते हैं, “मैं बीजेपी को अपना समर्थन दे रहा हूँ। मैं रानिया विधानसभा से एमएलए चुनकर आया हूँ। मैं मोदी जी की नीतियों को ध्यान में रखते हुए बीजेपी को अपना समर्थन दे रहा हूँ।”

हरियाणा भाजपा के अध्यक्ष सुभाष बराला ने भी कहा था कि निर्दलीय विधायक बीजेपी के साथ हैं और राज्य में मनोहर लाल खट्टर के नेतृत्व में बीजेपी फिर से सरकार बनाने जा रही है। उन्होंने कहा, “जनता का जनादेश बीजेपी को मिला है। हालाँकि इस बात की हम समीक्षा भी करेंगे कि हमें इस बार पिछली बार की तुलना में सात सीटें कम क्यों मिलीं। पार्टी और मुझे स्वयं इस चुनाव के परिणामों से सीखने को मिलेगा। हम राज्य में पार्टी को मजबूत करने के लिए कदम उठाएँगे।” वहीं सरकार बनाने की बात पर उन्होंने कहा, “हरियाणा के निर्दलीय विधायक बीजेपी के साथ हैं। मनोहर लाल खट्टर के नेतृत्व में सरकार बनेगी। वो आज चर्चा के लिए दिल्ली आ रहे हैं।”

विपक्ष में बैठे पवार: सत्ता ठुकराई या छीन लिया शिव सेना के CM पद का दिवास्वप्न

राजनीति से तेज़ किसी खेल, किसी फॉर्मेट में गेम पलटता है तो वो केवल क्रिकेट का T-20 है। बाकी राजनीति जिस गति से रंग बदलती हैं उसका कहीं कोई मुकाबला नहीं है। कल शाम तक खट्टर की सत्ता खटाई में थी और दुष्यंत चौटाला किंग और किंगमेकर के बीच अक्कड़ बक्कड़ बम्बे बो करते लग रहे थे। फिर निर्दलीय विधायकों रणजीत सिंह चौटाला और गोपाल कांडा ने क्रमशः कल (24-25 अक्टूबर, 2019) देर रात और आज (25 अक्टूबर, 2019 को) सुबह पलटी मारी, तो खट्टर की सरकार से खतरा हटता दिख रहा है।

कुछ ही घंटे पहले तक ऐसा ही हाल महाराष्ट्र में था। भाजपा खुद बहुमत के लिए ज़रूरी 145 सीटों में से 105 पा कर दम तोड़ चुकी है। कॉन्ग्रेस और राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी (राकांपा) दोनों के ही साथ उसके गठबंधन का सवाल पैदा ही नहीं होता (बावजूद इसके कि एनसीपी प्रमुख शरद पवार को मोदी ने 2017 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया था)। अगर किसी चमत्कार से असदुद्दीन ओवैसी के 2 विधायक, सपा के दो और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का एक विधायक दल बदल कर उसके साथ आ भी जाएँ तो भी वह पूरे ‘अन्य’ के साथ भी 134 पर दम तोड़ देती। यानि उसके दोस्त और दुश्मन, “बड़ा भाई कौन, छोटा भाई कौन” में उलझी बाला साहेब ठाकरे से उद्धव के हाथ में आई शिव सेना अहम थी।

इतनी अहम कि विधानसभा में एक तिहाई से अधिक सीटें अकेले लाने वाली भाजपा को किनारे कर उद्धव ठाकरे अपने बेटे आदित्य ठाकरे के लिए सियासत की ‘ओपनिंग’ ही मुख्यमंत्री पद से करवाने के बारे में सोचने लगे (मीडिया की खबरों के अनुसार)।

समीकरण यह था कि अगर भाजपा को सत्ता से बाहर रखना ही ध्येय है तो शिव सेना के 56, कॉन्ग्रेस के 44 और एनसीपी के 54 विधायकों की सरकार आराम से बहुमत के लिए ज़रूरी 145 के सामने 154 खड़े कर सकती है। इसी उम्मीद को कल्पित करते ही पूरा हुआ समझ कर शिव सेना प्रमुख ने राजग में रहते हुए ही ऐसा सम्पादकीय छाप डाला जैसे किसी विरोधी खेमे के नेता को गरिया रहे हों।

सामना के मुताबिक यह जनादेश कोई “महा जनादेश” नहीं है। यह उनके लिए सबक है जो “सत्ता की मद में चूर” हैं। सामना में शिव सेना ने यह भी कहा है कि इस जनादेश ने वह ग़लतफ़हमी भी दूर कर दी कि चुनाव जीतने का रास्ता दल बदल की इंजीनियरिंग करना और विपक्षी पार्टियों को तोड़ना है। यही नहीं, तस्वीर पूरी तरह साफ़ होने के पहले ही आदित्य ठाकरे को मुख्यमंत्री बनाने के नारे भी शिव सैनिक लगाने लगे।

अगर उद्धव उतनी दूर न भी जाते तो भी वे कम से कम भाजपा से समर्थन का तगड़ा मूल्य वसूलने की स्थिति में तो थे ही। उन्होंने 50-50 फॉर्मूले की बात करनी शुरू कर दी- यानि आधे समय भाजपा का सीएम, बाकी आधे समय शिव सेना का। चूँकि शिव सेना के पास कम लेकिन अहम संख्या थी, इसलिए ज़ाहिर तौर पर वह पहले अपना नंबर लगाती कुर्सी पर।

घबराए फडणवीस ने भी शिव सेना पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए पार्टी छोड़ कर गए नाराज़ बागियों को मनाने की कवायद शुरू कर दी थी। हालाँकि, कल ही मोदी ने उन्हें 5 साल का कार्यकाल पूरा कर चुनाव में जाने और फिर जीत कर आने वाले पहले मराठी सीएम होने की बधाई देते हुए एक तरह से ठाकरे को बता दिया था कि वे झुकेंगे नहीं, लेकिन यह साफ़ है कि फडणवीस अपनी ओर से हाथ पैर मारने में कोई कोताही नहीं रहने देना चाहते थे।

और इसी बीच भाजपा के तारणहार बनकर आए शरद ‘राव’ पवार। और उन्होंने अपनी पार्टी के सरकार बनाने की कोशिश की अटकलों से इंकार कर दिया।

और इसी के साथ शिव सेना के भाजपा के बिना सरकार बनाने की उम्मीदें स्वाहा हो गईं हैं- और उसके पास भाजपा के पास ‘लौट के बुद्धू घर को आए’ के अलावा कोई और चारा ही नहीं बचा है। 54 विधायकों पर पकड़ के साथ वे ठाकरे परिवार की उम्मीदों की धुरी थे। अब जब उन्होंने भी मना कर दिया तो भाजपा के बिना किसी और की सरकार बन ही नहीं सकती।

वैसे तो वे शिव सेना के संस्थापक बाला साहेब ठाकरे के मित्र भी हैं, लेकिन जैसा कि उन्हें दो साल पहले ही एहतियातन पद्म विभूषण देने वाले मोदी ने उनके गढ़ सतारा की रैली में हफ्ते भर ही पहले कहा था, “शरद ‘राव’ शरद ‘राव’ हैं, वे हवा का रुख पहचानते हैं।” उद्धव ठाकरे को भी इतनी बयानबाजी के पहले हवा का रुख पहचानना सीखना चाहिए।

कटी गर्दन हाथ में ले कर बनानी थी वीडियो, बाप खुश, बीवी खुश… लेकिन घृणा कौन फैला रहा? हिन्दू!

कमलेश तिवारी हत्याकांड की जितनी भी जानकारी सामने आ रही है वो बताती है कि मजहबी उन्माद किस स्तर तक उतर सकता है। कमलेश तिवारी ने जो कहा, वो कब और कहाँ कहा, इसकी किसी को पुख्ता जानकारी नहीं। उसने ऐसा क्यों कहा था, ये भी भुलाया जा चुका है। केस चला, जेल में रहे, बाहर आए, लेकिन वो नहीं भूले जिन्होंने पूरी दुनिया को एक झंडे के नीचे लाने का सपना पाल रखा है।

वो नहीं भूले जो बाजारों में फट जाते हैं। वो नहीं भूले जिन्हें कोई मुल्ला, कोई मौलवी, कोई मजहबी घृणा फैलाता, तसबीह फिराता उन्मादी यह कह कर उकसाता रहा कि कमलेश तिवारी की गर्दन ले कर आओ। और हाँ, जब वो कहते हैं कि गर्दन ले कर आओ तो इसका कोई सांकेतिक मतलब नहीं होता। मतलब सिर्फ और सिर्फ, शब्दशः बस एक ही होता है: कमलेश तिवारी की गर्दन उतार कर लाओ। मतलब यह कि गोली मार कर, जहर दे कर, गाड़ी से कुचल कर मारो या जैसे भी, लेकिन गर्दन ले कर आना है।

इसलिए अशफाक और मोइनुद्दीन जब कमलेश तिवारी को मारने चले तो रास्ते में नमाज पढ़ कर चले। उन्होंने कहीं भी अपनी पहचान नहीं छिपाई। मिठाई के डिब्बे में रसीद रखी, होटल में अपना नाम दिया। उन्होंने कबूला कि वो चाहते थे कि लोग जानें कि मारने वाला कौन है, किसी को किसी भी तरह का भ्रम न हो कि किसी गैर-मजहब वाले ने मारा। ये बात और है कि हत्या के बाद जब यही बात लोग ट्विटर पर लिख रहे थे तो आतंकियों के, नक्सिलियों के, हत्यारों के हिमायतियों ने लगातार पूछा कि इसे मजहबी रंग क्यों दिया जा रहा है।

इसकी मानसिकता में आप जाइए। पढ़े-लिखे लोग, इंतज़ार करते हैं, मृतक से बातचीत करते हैं, मित्रवत् रिश्ता बनाते हैं, और सबके अंत में एक ही मकसद: कमलेश तिवारी की गर्दन काटनी है। ये किसी व्यक्ति की सोच नहीं है, ये सामूहिक सोच है जो किसी व्यक्ति के माध्यम से फलित होती है। कमलेश तिवारी की हत्या अशफाक और मोइनुद्दीन ने ही नहीं, एक मजहब ने की है जो ऐसे लोगों को रोकना तो छोड़िए, उनकी निंदा तक नहीं कर पाता।

हर जगह मिली सहायता

इन्हें कैसे लोगों ने सहायता दी? इनके सहयोगियों में मुफ्ती हैं, मौलवी हैं, मुल्ला हैं और इन्हें मदरसों में छुपाया गया, इनके बाप को कहा गया कि उन्हें इधर बुला लो, बाकी हम देख लेंगे। इसके बाप को कोई गम नहीं कि उसके बेटे ने क्या किया है, वो बार-बार ‘अल्लाह अच्छा करेगा’ कह रहा है फोन पर। आप सोचिए कि ये कैसे बाप हैं जो बेटे द्वारा की गई हत्या पर खुश हैं और इस उम्मीद में हैं कि कोई मदद कर देगा। मतलब, बाप भी सहमत है कि जो किया अच्छा किया!

पत्नी का भी वही हाल है। ये कैसा परिवार है, ये कैसा तंत्र है जो इस तरह की हत्या को सहमति देता है? ये कैसा समाज है, ये कैसा समुदाय है जो ऐसी हत्या पर खुश होता है और हर जगह लिखता है कि जो हुआ, वो सही हुआ। फिर ध्यान में आता है अशफाक का कबूलनामा जहाँ वो स्वीकारता है कि उसकी योजना थी कि गर्दन काट कर अलग करे, उसे हाथ में ले, उसका विडियो बनाए और उसे वायरल करे ताकि लोगों को यह चेतावनी मिले कि वो ऐसी बातें न करें।

ये घृणा कोई एक दिन में नहीं उपजती, ये घृणा संकलित होती रहती है, रिस-रिस कर। ये घृणा बचपन से, शिक्षण संस्थानों से, घरों से, मजहबी स्थलों से, दोस्तों के दायरे से, बाप से, समाज से, सामुदायिक जलसों से, सड़कों पर बँधे लाउडस्पीकरों से भरी जाती है। इसलिए हत्यारे को इस बात का मलाल नहीं होता कि वो हत्या करने जा रहा है। इसलिए उसे तनिक भी हिचक नहीं होती जब वो कमलेश तिवारी का मुँह बंद करके, उसका गला रेतता है।

इसकी तैयारी कितनी सटीक रही होगी कि डेढ़ मिनट में ही वो सारे काम निपटा लेता है। चूँकि वो जानता है कि समय की कमी होगी, इसलिए उसने हलाल करने की बाकायदा प्रैक्टिस की होगी, कई जानवर काटे होंगे। मीडिया रिपोर्ट्स में तो ये भी कहा जा रहा है। छाती में सात बार हृदय वाली जगह पर छुरा मारना, ताकि उसे दर्द हो। चेहरे पर गोली मारना, सर में नहीं, ताकि वो महसूस कर सके।

और आपको लगता है कि ये एक व्यक्ति का काम है? जी नहीं, वो चाकू भले ही मोइनुद्दीन के हाथ में थी, लेकिन उसे चलाने की शक्ति, जो कि पसलियों में बार-बार फँस कर निकल रही होगी, वो शक्ति सामुदायिक थी। अशफाक की उँगली ट्रिगर पर थी, लेकिन उसे चलाने का बल टीवी कैमरे पर बोलती उन आवाजों का था जो हर दिन नए अशफाक पैदा कर रही है। आपको लगता है कि ऐसे कृत्यों को अंजाम देना इतना आसान है?

चुप लोगों से बचिए, इन्हें पहचानिए

नेता ने कहा था कि वो हत्या कर के आएँ तो सही, जमानत की जिम्मेदारी वो लेता है। उसका बाप कहता है कि बात हो गई है, वो घर आ जाए। ये किससे बात हो गई है अशफाक के बाप की? कौन हैं ये लोग जो ऐसे लोगों को बचाने के लिए ‘बात’ कर चुके होते हैं? कौन हैं ये लोग जो किसी को इतना दिलासा दे देते हैं कि वो हत्या करे, गर्दन काट ले, विडियो बना ले, वायरल करे, और फिर भी वो बचा लिया जाएगा?

ये एक तंत्र है जो बहुत अच्छे तरीके से काम करता है। दुर्भाग्य बस यही है कि बुद्धिजीवियों की भी सहमति है इन्हें क्योंकि ये लोग हिन्दुओं के खिलाफ हैं, उन्हीं हिन्दुओं के खिलाफ जो बाबरी जैसे धब्बे को मिटाना चाहता है अयोध्या के इतिहास से, उन्हीं हिन्दुओं को खिलाफ जिसने अपने मतलब की सरकार चुनी है। इसलिए आधे घंटे में कमलेश तिवारी की हत्या में निजी दुश्मनी, चंदे के बँटवारे को ले कर हुई अनबन, उनकी माताजी का बयान, और प्रेम प्रसंग तक हवा में तैरने लगता है।

इनसे हर जगह बच कर रहिए। अगर आप किसी को जानते हैं, जो सोशल मीडिया पर चुप है इस मुद्दे को ले कर, तो वो अशफाक और मोइनुद्दीन को मौन सहमति दे रहा है। जो इस पर चुप बैठे हैं, वो वही हैं जो अशफाक के विडियो के वायरल होने के इंतजार में बैठे थे। इसलिए, इनसे आपको हर कदम पर बचना होगा। ये वो बम हैं,जो फटे नहीं हैं लेकिन कोई मुफ्ती, मुल्ला, मौलवी इन्हें दो बार उकसा दे, तो ये मिठाई के डिब्बें में रसीद रख कर आपका सर उतारने निकल पड़ेंगे।

उन्मादियों से बचिए, उन्हें पहचानिए। हर व्यक्ति उन्मादी नहीं है, लेकिन जो भी ट्विटर के ट्रेंड में हिन्दुओं की घृणा तलाश लेता है, लेकिन कमलेश की गर्दन पर बारह इंच लम्बा और तीन इंच गहरा घाव नहीं देख पाता, वो पोटेंशियल जिहादी है। वो किसी दिन किसी बाजार में नारा-ए-लहसुन लगाते हुए फट जाएगा और आप कहेंगे कि ये तो आपका दोस्त था, बड़ा रिजर्व रहता था।

मैं ये नहीं कह रहा कि आप सबकी निशानदेही कीजिए, मैं ये कह रहा हूँ कि चुप लोगों को पहचानिए। सारे लोग ऐसे नहीं हैं, लेकिन जिन्हें ट्विटर के ट्रेंड में घृणा दिखती है, लेकिन अशफाक-मोइनुद्दीन पर वो चुप रहते हैं, तो उनसे दूर रहिए। इनसे डरिए और संभल कर रहिए। इनसे आत्मरक्षा के उपाय कीजिए, क्योंकि जब अशफाक पिस्तौल तानेगा, और मोइनुद्दीन छाती पर चाकू मारेगा, गला रेतेगा और गर्दन उतारने से पहले मोबाइल पर विडियो बनाएगा, तब आपका वही उपाय काम में आएगा।

इनसे मतलब मत रखिए, ऐसे लोग उन्मादी हैं जो किसी के सगे नहीं। लेकिन हाँ, सारे लोग ऐसे नहीं होते। मैं उन्हें तलाश रहा हूँ जो ऐसे नहीं हैं। मुझे मिले नहीं, ये और बात है। लेकिन, मैं दिल की अतल गहराइयों से ये पूरी तरह, जिम्मेदारी से, मानता हूँ कि किसी खास समुदाय के सारे लोग ऐसे नहीं होते। आप कितना भी कह लें, मैं नहीं मानता। मैं इसलिए नहीं मानता क्योंकि मेरा धर्म ऐसा कहता है।