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जब स्वामी श्रद्धानंद के हत्यारे को बचाने के लिए गाँधी बोले- अब्दुल भाई को छोड़ दो

कमलेश तिवारी को पैगम्बर मुहम्मद पर एक टिप्पणी की कीमत जान देकर चुकानी पड़ी। अब तक की जाँच से यह साफ़ है कि इस्लाम को मानने वाले कुछ धर्मांध लोगों ने नृशंस हत्या को अंजाम दिया। जिस तरीके से कमलेश तिवारी की हत्या की गई वैसे ही कभी जबरन धर्म-परिवर्तन के खिलाफ ‘शुद्धि मूवमेंट’ चलाने वाले स्वामी श्रद्धानंद की एक सनकी धर्मांध ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। ‘शुद्धि प्रक्रिया’ या ‘शुद्धि मूवमेंट’ के जरिए स्वामीजी उन तमाम लोगों को दोबारा हिन्दू धर्म में वापस ला रहे थे जिनका जबरन इस्लाम में धर्मांतरण किया गया था।

यह 19वीं शताब्दी के शुरुआत की बात है। इस्लामिक संगठन तेज़ी से धर्म परिवर्तन में लगे हुए थे। पराधीन भारत के इस काल में हिन्दुओं का धर्मान्तरण चरम पर पहुँच रहा था। मजहब वालों के संपर्क में आने वाले हिन्दुओं को मौलाना किसी न किसी बहाने इस्लाम कबूल करवा देते थे। मकसद था जिस तरीके से भी हो अपने दीन का प्रसार करना।

लखनऊ शहर से तक़रीर देने वाले वहाबी समुदाय के मौलाना अब्दुल बारी ने उसी समय एक फतवा जारी किया था। इसमें कहा गया था, “कोई भी मुस्लिम अगर हिन्दू हो जाए तो वह ‘मुर्तद’ (धर्मत्याग) है, वह इंसान वाजिब-उल-क़त्ल (मार देने योग्य) है”, जबकि उसी समय के एक और मौलाना ने इस्लाम फ़ैलाने के अलग-अलग तरीके बताते हुए एक किताब ‘दाई-ए-इस्लाम’ ही लिख डाली। इसमें उसने बताया कि किसको कैसे इस्लाम का प्रचार करना चाहिए। फकीरों-भिखमंगों से लेकर, गाने वालों, हकीमों और मुस्लिम वेश्याओं को भी इस्लाम का प्रचार करने का आदेश देते हुए किताब में लिखा कि, “मुस्लिम वेश्याओं के पास जो हिन्दू ग्राहक आए उसे अपनी जुल्फों का, पलकों का कैदी बनाएँ और इस्लाम की दावत दें।”

इन्ही पाखंडों के खिलाफ स्वामी श्रद्धानंद ने शुद्धि मूवमेंट चलाया और जबरन इस्लामीकरण के खिलाफ आवाज़ उठाई। उन्हें अक्सर इसके लिए धमकी मिला करती थी। लेकिन वे पीछे नहीं हटे।

महात्मा गांधी 1915 में जब अफ्रीका से लौटे तो हरिद्वार के कांगड़ी गाँव में स्वामी श्रद्धानंद के साथ उन्ही के गुरुकुल में रुके। कुछ समय बाद जब स्वामी श्रद्धानंद ने उनका ध्यान जबरन धर्मांतरण की तरफ खींचा तो गाँधी उनका साथ देने की बजाय पलट गए। इसके बाद जब स्वामी श्रद्धानंद ने हिन्दुओं को इस्लामीकरण से बचाने के लिए ‘शुद्धि मूवमेंट’ चलाया तो महात्मा गांधी ने खुद को पूरी तरह स्वामीजी से अलग कर लिया।

हिन्दुओं को उनका हक दिलाने के लिए सामाजिक संग्राम में उतरे स्वामी श्रद्धानंद को भी एक रोज़ ठीक वैसे ही मार दिया गया जैसे कि कमलेश तिवारी को मारा गया। 22 दिसंबर 1926 को जब निमोनिया से अस्वस्थ स्वामीजी पुरानी दिल्ली के अपने मकान में आराम कर रहे थे, अब्दुल रशीद नाम का एक व्यक्ति उनके कमरे में दाखिल हुआ। ठीक कमलेश के हत्यारों की ही तरह उसने स्वामीजी के सेवक को पानी लाने के बहाने बाहर भेजा और फिर मौका पाते ही स्वामी श्रद्धानंद को सामने से तीन गोलियाँ मार दीं। इसके बाद महात्मा गांधी ने स्वामी जी की शहादत पर श्रद्धासुमन तो दिए, लेकिन कभी इस घटना के लिए किसी ने दूसरे मजहब वालों को उनके दोष की याद नहीं दिलाई। महात्मा गाँधी ने तो स्वामीजी के पुत्र इंद्र विद्यावाचस्पति को पत्र लिखकर यहाँ तक कहा कि ‘अब्दुल भाई’ को माफ़ कर दो।

मोदी के ‘चुनाव लड़ने की हिम्मत ही नहीं’ पर पवार ने माना – हाँ, गलती हो गई

राकांपा प्रमुख और पूर्व केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने माना कि उनसे सतारा के लोकसभा चुनाव के लिए उम्मीदवार चुनने में ‘गलती’ हो गई। अपने पुराने गढ़ सतारा में दिया गया उनका यह बयान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस बयान के बाद आया है, जिसमें उन्होंने पवार के लिए कहा था कि उनमें लोकसभा चुनाव के मैदान में उतरने की हिम्मत ही नहीं थी।

कुछ महीने पहले हुए लोकसभा चुनाव में राकांपा ने सतारा से उदयराज भोंसले को उतारा था, जो शिवाजी महाराज के वंशज हैं। सीट जीतने वाले भोंसले ने महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों के पहले झटक कर भाजपा से हाथ मिला लिया था। भाजपा ने उन्हें फिर से उपचुनाव में उतारा है। इसके अलावा विधानसभा में भी सतारा का प्रतिनिधित्व करने वाले शिवाजी के ही एक दूसरे वंशज शिवेंद्रराजे भोंसले भी भाजपा में शामिल हो गए हैं।

पवार की राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी ने उदयराज के विरुद्ध इस बार श्रीनिवास पाटिल को टिकट दिया है। 78 साल के पाटिल भारतीय प्रशासकीय सेवा (IAS) में सेवारत रहने के अलावा 2013 से 2018 तक उत्तर-पूर्वी राज्य सिक्किम में भी गवर्नर के तौर पर सेवाएँ दे चुके हैं

पार्टी के गढ़ सतारा में उदयराज भोंसले को लोकसभा उम्मीदवार बनाने के निर्णय की भूल को स्वीकार करते हुए पवार ने शुक्रवार को कहा, “जब कोई गलती करता है, तो उसे मान लेना चाहिए। मैंने लोकसभा चुनाव का उम्मीदवार चुनने में गलती कर दी। लेकिन मुझे खुशी है कि उस गलती का सुधार करने के लिए सतारा का हर बूढ़ा-जवान 21 अक्टूबर का इंतज़ार कर रहा है।”

भारी बारिश में भीगते हुए भी अपना भाषण जारी रखते हुए पवार ने इकट्ठा श्रोताओं से कहा, “वरुण राजा ने 21 अक्टूबर के चुनाव के लिए राकांपा को आशीर्वाद दिया है। और वरुण राजा के आशीर्वाद से सतारा जिला महाराष्ट्र में चमत्कार करेगा। उस चमत्कार की शुरुआत 21 अक्टूबर से होगी।”

80-वर्षीय पवार पर हमला बोलते हुए मोदी ने सतारा की एक रैली में कहा था, “उनमें तो सतारा से लोकसभा चुनाव लड़ने की भी हिम्मत नहीं थी।” मोदी ने विपक्ष पर जम्मू-कश्मीर और वहाँ से हटाए गए अनुच्छेद 370 से मिले विशेष दर्जे को लेकर बँटवारे की राजनीति करने का इल्ज़ाम लगाया था

न्यूज़ एजेंसी पीटीआई के अनुसार मोदी ने यह भी कहा था, “शरद राव (पवार) शरद राव (पवार) हैं। उन्हें हवा का रुख पता है। इसीलिए उन्होंने साफ़ मना कर दिया।” सोमवार (21 अक्टूबर, 2019) को महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव होने हैं, जिनके नतीजे 24 अक्टूबर को आ जाएँगे।

गलत कोड से ही डर गया पाकिस्तान, F-16 ने घेरा यात्री विमान, 120 लोग थे सवार

नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) के एक गलत कोड के कारण पाकिस्तान में एफ-16 फाइटर जेट्स ने स्पाइसजेट के एक विमान को घेर लिया था। पिछले दिनों हुई इस घटना की चर्चा पूरी दुनिया में हुई थी। अब इस मामले में डीजीसीए के ही एक अधिकारी की लापरवाही सामने आई है।

खबर के मुताबिक डीजीसीए के एक अधिकारी ने इस यात्री विमान को कमर्शियल की जगह मिलिट्री का ‘ट्रांसपोंडर कोड’ दे दिया था। एक अधिकारी ने बताया कि लापरवाही बरतने वाले अधिकारी को सस्पेंड कर दिया गया है।

गौरतलब है कि स्पाइसजेट का यह विमान पिछले महीने 23 सितंबर को दिल्ली से काबुल जा रहा था। इसी दौरान आसमान में उसे पाकिस्तान के एफ-16 लड़ाकू विमानों ने घेर लिया था। विमान में 120 लोग सवार थे। गलत कोड देने की वजह से पाकिस्तानी रडार पर यह भारतीय वायुसेना का विमान दिखाई दे रहा था। गनीमत ये रही कि पाकिस्तान के लड़ाकू विमान ने कोई एक्शन नहीं लिया।

बता दें कि कि मिलिट्री ट्रांसपोंडर कोड और कॉमर्शियल कोड में अंतर होता है। अगर कॉमर्शियल कोड वाले रास्ते में कोई मिलिट्री कोड वाला विमान उड़ान भरता है तो इसकी जानकारी रडार से उस देश की सुरक्षा एजेंसी को मिल जाती है। बताया जा रहा है कि स्पाइसजेट एयरक्राफ्ट को गलती से एन 32 कोड दिया गया था, जिसका इस्तेमाल भारतीय वायु सेना करती है। इसकी वजह से पाकिस्तानी लड़ाकू विमान को स्पाइसजेट विमान भारतीय सेना का विमान मालूम पड़ा।

मैं भारत का हिन्दू हूँ और अब मुझे यहाँ डर लगता है…

“सुबह-सुबह घर की घंटी बजी, मैं आवाज़ सुन कर दरवाजे तक गया। बाहर तीन लड़के खड़े थे। हुलिया मजहब वाले जैसा था, टोपी लगाए हुए, दाढ़ी रखी हुई। कहा, “दरवाजा खोलो, बात करनी है तुमसे।” मैंने सीधा कहा कि मैं न तो उन्हें जानता हूँ, न ही दरवाजा खोलूँगा। दो दरवाजे हैं मेरे कमरे पर, पहला लोहे का है, दूसरा काठ का। मैंने दूसरा दरवाजा बंद करने को हाथ लगाया तो उनमें से एक ने लम्बा छुरा दिखाते हुए कहा, “बहुत उँगलियाँ चलती हैं तुम्हारी आज कल, कमलेश तिवारी की तरह तुझे भी हलाल कर देंगे आज।” यह कहते हुए एक ने दरवाजे पर किसी लोहे से प्रहार किया और मुझे लगा कि थोड़ी देर में ये दरवाजा तोड़ देंगे। यह स्थिति ऐसी थी जहाँ मैं न भाग सकता था, न बच सकता था। इतनी बेचैनी मैंने कभी महसूस नहीं की। मैं उन क्षणों को याद करने लगा जब एक लड़का मेरा पैर बाँध देगा, दूसरा मेरा हाथ पकड़ेगा और तीसरा अरबी में कुछ बुदबुदाते हुए अपने लिए जन्नत में कमरा बुक करने के लिए धीरे-धीरे मेरे गले पर चाकू फेरेगा…”

और धक से मेरी नींद खुल गई। मैं अपने गले को पकड़ते हुए जग गया। मैं यह सोचते हुए अगले दो घंटे तक जगा रहा कि एक दिन हो सकता है सच में ऐसा हो। मेरे विडियो या लेख के कमेंट में आप इरफानों, अहमदों, मोहम्मदों, आलमों, अरशदों, मलिकों और तमाम मजहबी नाम वाले का लिखा पढ़ेंगे तो आप पाएँगे कि इनके पास सिर्फ मेरा पता नहीं है, वरना ये चाकू ले कर किसी भी दिन मुझे रेतने पहुँच जाएँगे।

जो मेरे हितैषी हैं, मेरे दोस्त हैं, इंटरनेट पर मुझसे जुड़े लोग हैं, वो बार-बार कहते हैं कि मैं जो लिख रहा हूँ, वो सत्य है, समय की माँग भी है लेकिन मैं ही क्यों लिखता हूँ? वो चिंतित होते हैं कि किसी दिन मुझे कुछ हो जाएगा। वो मुझे बताते हैं कि और भी पत्रकार हैं जो कहाँ नाला है, किधर सड़क है, किसे कितना फाइन लगा, कहाँ गले की चेन लूटी जा रही है, इन विषयों पर घंटे-घंटे भर बोल रहे हैं, मैं भी क्यों वैसा नहीं करता?

वो कहते हैं कि और भी लेखक हैं, साहित्यकार हैं जो सिर्फ अपनी किताबों के रिलीज के समय एमेजॉन पर कितना डिस्काउंट मिल रहा है, वो बताने आते हैं, मैं उनकी तरह क्यों नहीं बन जाता? एक तरीके से देखा जाए तो यह सही रास्ता है, गाली नहीं सुनना पड़ती मैसेज बॉक्स में; आपको अकेले में ऑफिस के नीचे इधर-उधर नहीं देखना पड़ता कि कोई संदिग्ध आपकी तरफ तो नहीं आ रहा; आप ऑफिस जाने और आने का समय कभी भी एक जैसा नहीं रखते ताकि कोई घात लगाए बैठा हो तो उसके मजहबी उन्माद का शिकार न बनें…

ये वास्तविकता है जिससे मेरे जैसे मुट्ठी भर लोग हर रोज जूझते हैं। मुझे ये सपना क्यों आता है कि मेरे दरवाजे के सामने की फर्श पर ‘अगला नंबर तुम्हारा है’ लिखा हुआ दिखता है? सपने तभी आते हैं जब उससे जुड़ी कुछ बातें आपको परेशान करती हैं। अपना मानने वाले हमेशा लिखता है कि ‘अजीत तुम ख्याल रखो अपना, यू टेक केयर!’

मेरे माता-पिता इंटरनेट पर नहीं हैं। वो बस ये जानते हैं कि मैं पत्रकार हूँ। वो ये भी नहीं समझते कि पत्रकार होता क्या है। अगर वो जान जाएँगे तो मेरे सहकर्मियों की तरह, जिनकी पत्नी और जिनके पति ये सलाह देते हैं कि ‘कुछ और क्यों नहीं कर लेते’, मेरे माँ-बाप भी कहेंगे कि गाँव आ जाओ, खेत है, गायें हैं पंद्रह, खेती करो और जीवन जियो। कोई माँ या पिता अपनी संतान को इस तरह से किसी के छुरे की धार से हलाल होता नहीं देख सकता, तस्वीर नहीं देख सकता, लाश तो छोड़ ही दीजिए।

तो क्या करूँ मैं? हर दिन चोर की हत्या पर उठते बवाल को सच मान लूँ कि हिन्दू ही इस देश का असली आतंकी है और ‘शांतिप्रिय समुदाय’ वाले सताए जा रहे हैं? क्या मैं ये मान लूँ कि ‘जय श्री राम’ का नारा आतंकवादियों का नारा है जैसे कि मीडिया का पतित पत्रकार गिरोह और दोगले लोगों का समूह बार-बार पूरी दुनिया को बताना चाहता है? क्या मैं ये मान लूँ कि इस्लाम शांतिप्रिय मजहब है और सारे कट्टरपंथी डर कर जीने को मजबूर हैं? क्या मैं ये मान लूँ कि कट्टरपंथियों द्वारा फैलाए जा रहे आतंक, उनके द्वारा की जा रही हिन्दुओं की लिंचिंग, उनके द्वारा गला रेत कर की जा रही हत्याएँ, उनके द्वारा आतंकियों के समर्थन में निकलने वाली रैलियाँ, उनके द्वारा सोशल मीडिया पर खुलेआम गला काटने की धमकियाँ सब किसी समानांतर ब्रह्मांड की घटनाएँ हैं?

मैं यह नहीं मानता कि उस एक मजहब के सारे ऐसा करते हैं, वो सारे गुनहगार हैं, लेकिन मैं आतंकियों, अपराधियों, बलात्कारियों, उन्मादियों और इस तरह की इच्छा रखने वाले लोगों का नाम क्यों न लूँ? मैं यह भी नहीं मानता कि अपराधियों को अपराधी कहना, उनका नाम लेना, उनके मजहबी कारणों से किए गए गुनाहों में उनका मजहब लिखना किसी भी तरह से अनुचित है।

क्या इसे सच मान कर अपनी पत्रकारिता करता रहूँ? ये करना होता तो मैं इस क्षेत्र में आता ही नहीं। मैं सच में खेती ही कर लेता। मुझे याद है कि इकनॉमिक टाइम्स में काम करते हुए जब मैंने अपने एडिटर को त्यागपत्र दिया था तो उन्होंने पूछा था कि यहाँ से छोड़ कर जाओगे तो क्या करोगे, तुम्हारे पास तो नौकरी भी नहीं है। तब मैंने कहा था कि मैं गाँव जा कर कुदाल उठाऊँगा और पिताजी के साथ खेती कर लूँगा लेकिन रीढ़ मोड़ कर जीना न मेरे माँ-बाप ने सिखाया न ही मेरे उस स्कूल, सैनिक स्कूल तिलैया ने, जहाँ से सैकड़ों बच्चे सशस्त्र सेनाओं में भर्ती हो कर दुष्कर जीवन व्यतीत करते हैं।

कुछ दूसरे मजहब वाले मुझसे इसलिए नाराज होते हैं कि मैं सिर्फ उन्हीं की गलती और अपराध क्यों दिखाता हूँ? एक तरह से प्रश्न सही है लेकिन उत्तर यह है कि बाकी हर मीडिया पोर्टल इन अपराधियों को, इन आतंकियों को, इन अराजक तत्वों को, ‘समुदाय विशेष’ की आड़ में बिना नाम छापे बचाता रहा है। इनके अपराधों को इसलिए छुपाया जाता रहा ताकि इनकी ‘शांतिप्रिय’ होने की नकली छवि बनी रहे। ऐसा इसलिए होता रहा, क्योंकि राज्याश्रयी मीडिया ने अपनी आत्मा मैडमों के चरणों में गिरवी रख दी थी।

कट्टरपंथी अपराध करेगा तो उसका नाम और मजहब बोल्ड अक्षरों में लिखा जाएगा। ये बताना ज़रूरी है कि बलात्कार मदरसों में भी हो रहे हैं, मस्जिदों के मुल्ले भी बलात्कारी हैं और हलाला से लेकर तमाम तरह के पेट में मरोड़ और मुँह में उल्टी ला देने वाले कृत्यों में ख़ास कट्टरपंथी मजहब वाले ही शामिल होते हैं। जब अपराध कर रहे हैं, तो उनका नाम क्यों नहीं लिखा जाए? हिन्दुओं का नाम लिखा जाए, आठ हिन्दू बलात्कार करें तो यही ‘शांतिप्रिय’ नाम वाले पूरी दुनिया में हिन्दुओं को और इस देश को ही बलात्कारी बता देते हैं, लेकिन जब ये बलात्कार करें, गला रेतें, तो उनके नाम न लिखे जाएँ?

और जब आप लिखते हैं तो आपको धमकियाँ मिलती हैं। आपको बताया जाता है कि आप इस देश के ‘मजहब’ वालों के लिए कुछ नहीं हैं। क्योंकि इन्हें इस राष्ट्र के कानून का कोई भय नहीं है। ये भारत का कानून तब ही मानते हैं जब इनका अपना दोषी हो। तब ये शरियत और पर्सनल लॉ की बातें नहीं करते क्योंकि चोरी, बलात्कार, हत्या आदि की सजा तो शरियत में डीटेल में लिखी हुई है। वहाँ इनको भारतीय दंड विधान की याद आती है, लेकिन जब अभियुक्त हिन्दू हो, पीड़ित इनके मजहब का, तब ये शरियत से चलते हैं। तब फतवा निकलता है, तब इसी राष्ट्र के संविधान की होली जला कर कट्टरपंथी वही करता है जो उसके ऊपर बैठा कट्टरपंथी कहीं से बैठ कर आदेश देता है। करोड़ों समर्थक तैयार रहते हैं ऐसे फतवों का पालन करने के लिए, लाखों इस पर सोचते हैं, हजारों इस पर योजना बनाते हैं, सैकड़ों शिकार पर घात लगाते हैं, दर्जनों उसका पीछा करते हैं, और उनमें से एक टोली मौका पाते ही गला रेत देती हैं।

संविधान और प्रशासन तो कमलेश तिवारी के लिए मौजूद था ना? क्या हुआ? जब दोषी पकड़े जा रहे हैं, तो कहा जा रहा है कि वो तो बस इसलिए मारने को आ गए क्योंकि उसने तो फलाने के लिए फलानी बात लिख दी थी! एक मजहब के नाम वाला पत्रकार है जो ये लिख रहा है कि उसकी माँ तो कह रही है कि किसी भाजपा वाले ने ही मरवा दिया, तो पुलिस कट्टरपंथी मजहब वालों को क्यों पकड़ रही है! बाकी मरे हिन्दुओं की माँ ने क्या कहा था वो किसी को याद नहीं?

आप ध्यान दीजिए कि ऐसे मौकों पर ऐसे नाम वाले लोग, जो अपने बारे में बायो में स्वयं को पत्रकार, परोपकारी, घुमक्कड़, स्वतंत्र आत्मा, सामाजिक कार्यकर्ता आदि लिखे रहते हैं, वो अपनी केंचुली उतार कर फौरन मजहब विशेष के बन जाते हैं, सारी पहचानें मिट जाती हैं क्योंकि ‘मजहब वाला’ चाहे आतंकवादी हो, बलात्कारी हो, चोर हो, हत्यारा हो, किसी भी तरह का अपराधी हो, उसकी भी सारी पहचान और उससे जुड़े सारे विशेषण गौण हो जाते हैं, बचता है तो बस उसका ‘मजहबी’ होना।

फिर एक कट्टरपंथी, दूसरे कट्टरपंथी को, सहोदर मान कर उसकी प्रतिरक्षा में जुट जाता है। वो सवाल उठाने लगता है कि आपको कैसे पता कि मजहब विशेष वाले ने ही मारा है, जाँच हुई है क्या? वो पूछने लगता है कि कमलेश तिवारी की जाती दुश्मनी भी तो हो सकती है। वो लिखने लगता है कि प्राथमिक जाँच में यह निकल कर आया है कि कमलेश तिवारी की पार्टी के लोगों ने चंदे के लिए उसकी हत्या कर दी।

यही पूरा समूह, ये पूरा इकोसिस्टम, ये हलाल इकोसिस्टम ऐसे ही एक घड़ी की तरह काम करते हैं। सबको पता है कि उनका काम क्या है, उन्हें कितना बोलना है, क्या बोलना है, कब बोलना है, किस बात को पकड़ कर तूल देना है। इसीलिए हजारों आतंकी वारदातों को अंजाम देने वाला मजहब शांतिप्रिय होने का तमगा चमकाता फिरता है और हजारों साल से अतिसहिष्णु रहा हिन्दू असहिष्णुता का पर्याय बना दिया जाता है। और जो इनमें अच्छे लोग हैं, जिन कलाम साहब की हम भारतीय पूजा करते हैं, वो इनके लिए ‘बुरे’ हैं, वो ‘बस नाम के’ ही कहे जाते हैं। आरिफ़ मोहम्मद खान, केके मोहम्मद ‘बुरे’ हैं क्योंकि वो तार्किक बातें करते हैं।

ये इकोसिस्टम फेसबुक पर आपके ‘जय श्री राम’ लिखने से ले कर संस्कृत में कुछ भी लिखने पर समूह में रिपोर्ट करता है और आपका अकाउंट वही फेसबुक बंद करता है जो अपने आप को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का चैंपियन मानता है। आज कमलेश तिवारी पर कुछ लोग लिख रहे हैं तो ट्विटर पर अकाउंट सस्पैंड हो रहा है। ऐसा इसलिए होता है कि इकोसिस्टम अपने सारे पहचान मिटा कर सिर्फ एक पहचान धारण कर लेता है ऐसे मौकों पर। वो पहचान, वो आइडेंटिटी, वो एक शब्द क्या है, ये बताने की ज़रूरत नहीं।

मेरा एक मित्र अमेरिका में है, वो मुझे लिखता है कि मैं एक विडियो बनाऊँ जिसमें मैं भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी से, गृहमंत्री अमित शाह जी से अपील करूँ कि भारत के हर उस इलाके की सुरक्षा चौकस कर दी जाए जहाँ भी एक खास मजहब के लोग बीस प्रतिशत से ज्यादा हैं। इसका कारण उसने बताया कि अगर बाबरी मस्जिद पर निर्णय मस्जिद वाले पक्ष में नहीं गया तो वो दंगा करेंगे, और इसका सबसे बुरा प्रभाव उन हिन्दू बच्चियों पर पड़ेगा जिसका बलात्कार करने से पहले इस समुदाय विशेष के लोग एक बार सोचेंगे भी नहीं।

उसका डर गलत नहीं है। भारत में इस्लामी आक्रांताओं के आगमन के समय से आज तक, किसी न किसी रूप में बलात्कार करना और दंगों के नाम पर हर तरह के आतंक की छाप छोड़ना इस समुदाय विशेष का सिग्नेचर तरीका है। इन्हें कोई झिझक ही नहीं होती क्योंकि ये मजहबी तौर पर जायज है। न तो पाप का भागी बनने का डर, और कानून का खौफ तो खैर है ही नहीं, तो क्यों न डरें हम अपनी बच्चियों के लिए?

ये उस देश में हो रहा है जो हिन्दुओं की एकमात्र बड़ी जगह है। ये उस राष्ट्र में हो रहा है जहाँ कथित तौर पर हिन्दूवादी सरकार है। मेरे जैसों को उस देश में डर लग रहा है जहाँ अस्सी प्रतिशत जनसंख्या हिन्दुओं की है। ये डर इसलिए लगता है क्योंकि हम कभी भी संगठित हो कर किसी से लड़ते नहीं। हमारे घरों में हथियार नहीं होते जबकि आत्मरक्षा आप किचन के बर्तनों से नहीं कर सकते। हमने कभी भी इस आने वाले युद्ध की तैयारी की ही नहीं जो अलहिंद नामक कई संगठन ऐलान कर चुके हैं।

मैं हिन्दू हूँ और मुझे बहुत डर लगता है अपने ही इस देश में क्योंकि न तो कमलेश तिवारी पहला शिकार था इन हलालप्रेमियों का, न ही मैं आखिरी होऊँगा। मैं या मेरे जैसे और लोग इनकी राह का रोड़ा हैं। अभिव्यक्ति की आजादी आप उस समुदाय विशेष को समझने बोल रहे हैं, जहाँ हलाला जैसी विचित्रता स्वीकार्य है सबको? उस लड़की से कोई पूछता भी है कि उससे जो करवाया जा रहा है उसकी सहमति है उसमें?

फिर मेरी अभिव्यक्ति तो गई संविधान के उन पन्नों में जिसकी विवेचना कुछ ऐसे भी होती है कि आपकी अभिव्यक्ति से दूसरे की भावना आहत हो गई, लेकिन उसकी अभिव्यक्ति तो फ्री स्पीच है, तो आपकी भावना का कुछ नहीं किया जा सकता। इसलिए मुझे अस्सी प्रतिशत हिन्दुओं के देश में, जहाँ एक अरब आबादी है मेरे धर्म की, जहाँ कथित तौर पर मेरी विचारधारा के लोगों की सरकार है, लेकिन मैं सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रहा क्योंकि यहाँ का कानून मुझे सुरक्षित होने की फीलिंग नहीं दे पा रहा।

मुझे डर इसलिए लगता है कि किसी दिन छुरा ले कर आए तीन लोग मुझे काट देंगे और मेरी लाश की फोटो पर गर्दन को पिक्सिलेट करके फीचर्ड इमेज बना कर अंग्रेज़ी मीडिया लिखेगा ‘कॉन्ट्रोवर्सियल स्क्राइब मर्डर्ड; ही वाज नोन फॉर राइटिंग अगेन्स्ट इस्लाम’। लेखों के शीर्षकों में इस हत्या को सूक्ष्म तरीके से जायज ठहराया जाएगा कि ‘मजहब विशेष पर लगातार लेख लिख कर उकसाने वाले पत्रकार की हत्या’। कुछ लोग यह भी कहेंगे कि ये हत्या तो इसके अपने लोगों ने ही राजनैतिक लाभ के लिए कराई है।

इसीलिए मुझे एक अरब हिन्दुओं के बीच हो कर भी अपने हिन्दू होने और सच बोलने को लेकर डर लगता है। मुझे मेरे शुभचिंतकों का डर जायज लगता है जब वो कहते हैं कि सँभल कर रहा करो। मेरे पिता और मुझे धमकाने वालों के पिताओं में फर्क बस यही है कि मेरे पिता के लिए मेरी मौत उनकी अपनी मौत से भी बुरी होगी, जबकि उनके पिता छाती ठोक कर कहेंगे कि फलाने की राह में कुर्बानी है ये, किसी काफिर को मार कर जेल गया है, फख्र है।

मैं भारत का हिन्दू हूँ और मुझे इसलिए डर लगता है क्योंकि यहाँ किसी का गला रेत कर हलाल करने वालों को किसी का डर नहीं लगता।

कमलेश तिवारी के परिवार को मिलेगी सुरक्षा, बेटे को मिलेगा लाइसेंसी हथियार और सरकारी नौकरी

लखनऊ डिवीजन के कमिश्नर मुकेश मेश्राम ने शनिवार (अक्टूबर 19, 2019) को उत्तर प्रदेश के सीतापुर में कमलेश तिवारी के परिवार से मुलाकात की। उन्होंने मुलाकात के बाद मीडिया से बात करते हुए कहा कि कमलेश तिवारी के बड़े बेटे के लिए यूपी प्रशासन सरकारी नौकरी की अनुशंसा करेगी। साथ ही आत्मरक्षा के लिए उसे लाइसेंसी हथियार भी प्रदान किया जाएगा। उन्होंने बताया कि उन्हें उचित वित्तीय सहायता प्रदान किया जाएगा। इन सभी बातों पर एक समिति द्वारा विचार किया जा रहा है।

मुकेश मेश्राम ने बताया कि कमलेश तिवारी के रिश्तेदारों द्वारा की जा रही माँगों को स्वीकार कर लिया गया है। कमलेश के परिवार की सीएम योगी आदित्यनाथ के साथ मुलाकात तय कर दी गई है। बताया जा रहा है कि कमलेश का रविवार (अक्टूबर 20, 2019) की शाम को लखनऊ में सीएम योगी आदित्यनाथ से मुलाकात करेगा। अगले 48 घंटे के अंदर पूरे परिवार के लिए सुरक्षा बहाल की जाएगी। इसके साथ ही सरकार लखनऊ में इनके लिए घर की व्यवस्था करेगी। इन्हें सरकारी योजना के तहत आवास मुहैया कराया जाएगा।

गौरतलब है कि शुक्रवार (18 अक्टूबर) को लखनऊ में नाका क्षेत्र स्थित हिन्दू महासभा कार्यालय में कमलेश तिवारी को बदमाशों ने गला रेतकर व गोली मारकर हत्या कर दी थी थी। नृशंस हत्या की वारदात को अंजाम देकर हमलावर वहाँ से फ़रार हो गए थे। गंभीर हालत में तिवारी को ट्रामा सेंटर में भर्ती कराया गया, जहाँ इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। 

डॉक्टरों ने बताया था कि कमलेश तिवारी का किसी धारदार हथियार से गला रेता गया। पुलिस का कहना था कि हत्या की वारदात को किसी परिचित ने अंजाम दिया है। घटना-स्थल से पुलिस ने रिवॉल्वर भी बरामद की थी। पुलिस ने इस मामले में कार्रवाई करते हुए सूरत के मौलाना मोहसिन शेख, फैजान पठान और राशिद अहमद को हिरासत में ले लिया है। इनसे पूछताछ की जा रही है।

दहशतगर्दों को कुचल कर रख देंगे: कमलेश तिवारी के परिजनों से मिलेंगे योगी आदित्यनाथ

हिन्दू महासभा के पूर्व अध्यक्ष और हिन्दू समाज पार्टी के नेता कमलेश तिवारी की हत्या पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि यह दहशत पैदा करने की एक शरारत है। उन्होंने कहा कि इस मामले में अभी तक तीन गिरफ्तारियाँ हुई हैं और कार्रवाई लगातार चल रही है। मामला एक स्पेशल इन्वेस्टीगेशन को देकर प्रभावी कार्रवाई करने के आदेश दे दिए गए हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि इस जघन्य वारदात में शामिल तत्वों को पाताल से भी ढूंढ़ निकाला जाएगा और कड़ी से कड़ी सजा दिलाई जाएगी।

लखनऊ में हुई इस घटना का ज़िक्र करते हुए योगी आदित्यनाथ ने बताया कि हत्यारे जब कमलेश के घर में आए तो उन्होंने साथ बैठकर चाय पी और जलपान किया। लेकिन इसके ठीक बाद उनके निजी सहायक को हत्यारों ने समान लाने के बहाने बाहर भेजकर कमलेश की हत्या कर दी।

हिन्दू समाज पार्टी के नेता कमलेश तिवारी ने 2015 में पैगम्बर मुहम्मद को लेकर एक विवादित टिप्पणी की थी, जिसके बाद देशभर के कट्टरपंथियों ने उनके खिलाफ प्रदर्शन किया था। कई उलेमा और मौलवियों ने तो यहाँ तक कह दिया था कि ‘कमलेश तिवारी का सर काटने वाले को लाखों का इनाम दिया जाएगा।’

इसी तक़रीर के बाद ही देश में माहौल बिगड़ना शुरू हो गया था। देवबंद से लेकर सहारनपुर और पश्चिम बंगाल में मजहबी भीड़ ने जमकर हंगामा किया था। पश्चिम बंगाल के मालदा में 2.5 लाख मजहबियों ने इकट्ठा होकर कालियाचक बाज़ार में दुकानों में लूट मचाई थी, सड़क पर खड़ी बसें जला दी थीं और पुलिस के एक थाने को भी आग के हवाले कर दिया था। कुछ लोगों की जानें भी गई थीं।

बता दें कि जब कमलेश की हत्या की तस्वीरें इन्टरनेट के ज़रिये लोगों तक पहुँचीं तो गला रेती हुई और गोली लगी लाश को देखकर हर कोई विचलित हो गया। सोशल मीडिया पर भी कुछ अराजक तत्वों ने बेशर्मी दिखाते हुए कमलेश के हत्यारों के समर्थन में निहायत ही घटिया कमेन्ट लिखे, जिनमें अधिकतर कट्टरपंथी थे।

हत्या के 24 घंटों के भीतर ही यूपी पुलिस ने इस मामले में तीन लोगों को गिरफ्तार कर लिया जिनके नाम मोहसिन शेख, फैजान और राशिद अहमद पठान हैं। इस पर जानकारी देते हुए उत्तर प्रदेश पुलिस के डीजीपी ओपी सिंह ने जानकारी देते हुए बताया, “हम गुजरात एंटी-टेररिज्म स्क्वाड (एटीएस) के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। हालाँकि, अभी तक इस मामले में किसी भी आतंकवादी संगठन के संलिप्त होने का कोई सबूत नहीं मिला है।

मुख्यमंत्री योगी ने यह भी कहा कि भय और दहशत का माहौल फ़ैलाने वाले जो भी तत्व हैं, हम उन्हें और उनके मंसूबों को कुचल कर रख देंगे। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की किसी भी वारदात को स्वीकार नहीं किया जाएगा। उन्होंने आश्वासन दिया कि ऐसा करने वालों को बक्शा नहीं जाएगा। रविवार (अक्टूबर 20, 2019) को सीएम योगी आदित्यनाथ मृतक कमलेश तिवारी के परिजनों से मुलाक़ात करेंगे। सूत्रों के मुताबिक कमलेश तिवारी का परिवार रविवार शाम को लखनऊ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात करेगा। सरकार तिवारी के परिवार को आर्थिक मदद देने के साथ ही परिवार के लिए सुरक्षा मुहैया कराएगी।

इक़बाल मिर्ची की सम्पत्ति होगी नीलाम, उसकी बीवी से पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रफुल्ल पटेल ने की थी डील

आतंकवादी दाऊद इब्राहिम के करीबी इक़बाल मिर्ची के 2 फ्लैट नीलाम किए जाएँगे। दोनों फ्लैट मुंबई के सांता क्रूज़ पश्चिम में हैं। इसे मुंबई का पॉश इलाका माना जाता है। नीलामी का संचालन वित्त मंत्रालय द्वारा किया जाएगा। दोनों ही फ्लैट का रिजर्व प्राइस 3.45 करोड़ रुपए है। नीलामी 19 नवंबर 2019 को होगी।

नीलामी सार्वजनिक रूप से होगी। इन फ्लैटों को ख़रीदने में रुचि रखने वाले लोग अपना टेंडर 86.5 लाख रुपए के डिपॉजिट के साथ जमा कर सकते हैं। दोनों फ्लैट मिर्ची की पत्नी हीना कौसर से जब्त किए जाने की बात फ्री प्रेस जर्नल में कही गई है। इंडिया टुडे के अनुसार फ्लैट नंबर 501 और 502 का कुल क्षेत्रफ़ल 1245 स्क्वायर फ़ीट है। 7 और 8 नवंबर, 2019 को इच्छुक खरीददार आकर इन संपत्तियों का निरीक्षण कर सकते हैं।

जाँच एजेंसियों ने पता लगाया है कि भारत में 6 सम्पत्तियों के अलावा 25 ऐसी सम्पत्तियाँ लंदन और UAE में हैं, जिनका कनेक्शन इक़बाल मिर्ची के साथ है। हाल ही में इकबाल मिर्ची की पत्नी हाजरा मेनन के साथ पूर्व केंद्रीय मंत्री और एनसीपी नेता प्रफुल्ल पटेल की एक संपत्ति को लेकर डील होने की बात सामने आई थी। पटेल ने इसे स्वीकार करते हुए कहा था कि इक़बाल मिर्ची की पत्नी को अतिरिक्त आवास देने के लिए एक डील किया गया था, जिसके लिए बॉम्बे हाईकोर्ट की अनुमति भी ली गई थी। हालॉंकि उन्होंने मिर्ची से सम्बंधित मिलेनियम डेवेलपर्स से कोई वित्तीय सम्बन्ध होने से इनकार किया था।

मुंबई स्थित सीजे (Ceejay) हाउस को लेकर पटेल से ईडी ने पूछताछ की है। 11 घंटे से अधिक समय तक चली पूछताछ में मिर्ची के दाहिने हाथ माने जाने वाले हुमायूँ मर्चेंट और रिश्तेदार मुश्ताक़ मेमन के बयान रखे गए। दोनों के बयान Prevention of Money Laundering Act की धारा 50 के अंतर्गत लिए गए हैं। दोनों ने बताया है कि कैसे मिर्ची ने दक्षिण मुंबई में सम्पत्तियों पर कब्ज़ा किया था।

सूत्रों के मुताबिक पटेल ने इकबाल मिर्ची से किसी तरह के कनेक्शन से इनकार किया है। यह भी कहा है कि वे कभी मर्चेंट या मुश्ताक से भी नहीं मिले। पटेल ने ईडी के सामने यह दावा भी किया है कि उन्होंने सेल्स डीड पर हस्ताक्षर इसलिए किए क्योंकि उनके पास मिलेनियम प्रॉपर्टीज़ की पावर ऑफ़ अटॉर्नी थी।

कमलेश तिवारी का वो आखिरी FB पोस्ट… आईबी ने पहले ही जताई थी जिहादियों से हमले की आशंका

पैगम्बर मुहम्मद पर टिप्पणी करने के बाद कमलेश तिवारी की नृशंस हत्या में उत्तर-प्रदेश पुलिस के डीजीपी ने इस बात को पुख्ता कर दिया कि घटना प्रथम-दृष्टया कट्टरता की है। इस मामले में पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए व्यक्ति ने भी इस बात को कबूला है कि मुहम्मद पर टिप्पणी करने के चलते कमलेश की हत्या की गई। शुक्रवार 18 अक्टूबर को हुई इस घटना की जाँच में पुलिस ने तीन लोगों को गिरफ्तार कर लिया, इनमें राशिद, फैज़ान और मौलाना मोहसिन शामिल हैं।

जब इस घटना की तस्वीरें लोगों तक पहुँचीं तो गहरे घाव वाली कमलेश तिवारी की गला रेती लाश देखकर हर कोई विचलित हो गया। कमलेश तिवारी ने फेसबुक पर एक पोस्ट अपनी मौत से करीब दो दिन पहले साझा किया था। उन्होंने उस पोस्ट में लिखा था कि कैसे उन्हें यूपी आईबी से फोन कर इस सन्दर्भ में बताया गया था। इसी से यह भी पता चलता है कि कमलेश पहले से ही जिहादियों के निशाने पर थे।

कमलेश तिवारी का आखिरी फेसबुक पोस्ट

बता दें कि हाल ही में पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद के में एक पूरे हिन्दू परिवार की हत्या के विरोध में तिवारी की हिन्दू समाज पार्टी बंगाल में इसका विरोध प्रदर्शन करने में व्यस्त थी। कमलेश ने यह भी लिखा है कि उन्हें यूपी आईबी से कॉल आया था, जिसमें उन्होंने कमलेश से उनके कोलकाता जाने के बारे में सारी जानकारी माँगी थी क्योंकि उन्हें जिहादियों से खतरा था।

बीते दिनों कमलेश तिवारी के ट्विटर से अख़बार की एक तस्वीर ट्वीट की गई थी, जिसमें खबर यह थी कि एटीएस ने गुजराती मूल के दो संदिग्ध (ISIS से ताल्लुक रखने वाले) को गिरफ्तार किया गया था, जो उनकी हत्या करना चाहते थे। 2015 में पैगंबर मुहम्मद को लेकर बयान देने के बाद से ही वे कट्टरपंथियों के निशाने पर आ गए थे। बयान के बाद सहारनपुर से लेकर देवबंद और पश्चिम बंगाल के कट्टरपंथियों ने तिवारी का सर काट देने जैसी माँगें उठाकर दंगे जैसे हालात कर दिए थे। कमलेश तिवारी को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) के तहत साल भर से ज्यादा समय के लिए जेल में बंद कर दिया गया था। 2016 में इन सभी आरोपों को अवैध करार देते हुए इलाहबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने इस मामले में हिन्दू समाज पार्टी के नेता पर लगे रासुका के आरोपों को गलत बताया था।

पैगम्बर मुहम्मद पर कमलेश तिवारी के बयान के बाद विवाद इतना बढ़ गया था कि पश्चिम बंगाल के मालदा में कट्टरपंथियों ने विरोध प्रदर्शन के नाम पर भयंकर उपद्रव किया था। उनके बयान पर कट्टरपंथियों का विरोध इतना भयंकर था कि ढाई लाख लोगों ने इकट्ठा होकर मालदा के कालियाचक बाज़ार में दुकानों को लूट लिया, सड़क पर खड़ी बसें जला डालीं और पुलिस के एक थाने को आग के हवाले कर दिया।

अब सैनिक स्कूलों में भी पढ़ सकेंगी लड़कियाँ, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने दी मंजूरी

देश के सैनिक स्कूल में अब लड़कियाँ भी पढ़ सकेंगी। केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 2021-22 के शैक्षणिक सत्र से सैनिक स्कूलों में छात्राओं के प्रवेश के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। दो साल पहले मिजोरम में सैनिक स्कूल छिंगछीपी में छात्राओं के प्रवेश के लिए रक्षा मंत्रालय द्वारा शुरू की गई पायलट परियोजना की सफलता के बाद यह निर्णय लिया गया है। अब इसे सभी सैनिक स्कूलों में लागू करने का फ़ैसला लिया गया है।

रक्षा मंत्री ने संबंधित अधिकारियों को इस आदेश के सुचारू कार्यान्वयन के लिए सैनिक स्कूलों में आवश्यक व्यवस्था और पर्याप्त महिला स्टाफ़ की उपलब्धता सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है। रक्षा मंत्री के इस निर्णय से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुहिम ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ को मज़बूती मिलेगी। साथ ही सशस्त्र बलों में महिलाओं की अधिक भागीदारी हो सकेगी, जिससे लैंगिक समानता के उद्देश्य की भी पूर्ति होगी। सैनिक स्कूलों में कक्षा 6 से 12वीं तक की पढ़ाई होती है और सैन्य अकादमियों में प्रवेश की तैयारी भी कराई जाती है।

बता दें कि देश भर में 33 सैनिक स्कूल हैं। सैनिक स्कूल ने 2017 में केंद्र सरकार के पायलट प्रोजेक्ट के तहत सैनिक स्कूल में 6 लड़कियों प्रवेश देकर इसकी शुरुआत की गई थी। सैनिक स्कूलों को पारंपरिक रूप से एक पुरुष गढ़ के रूप में देखा जाता है। सैनिक स्कूलों में लड़कियों को प्रवेश देना राष्ट्रीय रक्षा अकादमी में महिला कैडेटों को शामिल करने की दिशा में यह पहला क़दम है।

ख़बर के अनुसार, पिछले साल दो नए स्कूल झुंझनू (राजस्थान) और सियांग (अरुणाचल प्रदेश) में खुले थे, जो अब चालू हो चुके हैं। इसके अलावा एक दर्जन से अधिक स्कूलों को मंज़ूरी मिल चुकी है, जिनके अगले साल चालू होने की संभावना है। वर्तमान समय में रक्षा अकादमी में प्रवेश पाने वाले एक चौथाई से भी अधिक बच्चे सैनिक स्कूलों के होते हैंं। पिछले साल चुने गए कुल 348 उम्मीदवारों में से 99 बच्चे सैनिक स्कूल के थे, जो 28.45 फ़ीसदी है। 

पिछले साल अप्रैल में देश में पहली बार लखनऊ के एक सैनिक स्कूल ने लड़कियों के दाखिले के लिए दरवाज़े खोले थे। विभिन्न पारिवारिक पृष्ठभूमि की 15 लड़कियों को कैप्टन मनोज कुमार पांडेय उत्तर प्रदेश सैनिक स्कूल  (यह देश का एकमात्र सैनिक स्कूल है जो रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत नहीं आता) में शैक्षणिक वर्ष 2018-19 के लिए कक्षा-9 में प्रवेश मिला था।

फारूक अब्दुल्ला की बहन और बेटी पर बोले DGP, पोस्टर भी होते हैं भड़काऊ

जम्मू-कश्मीर पुलिस के मुखिया दिलबाग सिंह ने कहा है कि राज्य में हालात जब तक पूरी तरह नियंत्रित नहीं होते, तब तक किसी को विरोध-प्रदर्शन की इजाजत नहीं दी जा सकती। उन्होंने कहा कि केवल शब्द ही नहीं, पोस्टर भी भड़काऊ होते हैं। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला की बहन सुरैया और बेटी साफिया को हिरासत में लेने के मामले में प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने यह बात कही है।

सुरैया और साफिया सहित एक दर्जन से अधिक महिलाओं को मंगलवार को (अक्टूबर 15, 2019) श्रीनगर के लाल चौक पर प्रदर्शन करने के दौरान हिरासत में लिया गया ​था। प्रदर्शन में शामिल महिलाएँ जम्मू-कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा खत्म करने और उसे दो केंद्र शासित प्रदेश में बाँटने का विरोध कर रही थीं।

NDTV से बातचीत जम्मू कश्मीर पुलिस के डीजीपी दिलबाग सिंह ने कहा, जब तक स्थिति बेहतर नहीं होती ब तक किसी तरह के प्रदर्शन की अनुमति नहीं मिलेगी फिर चाहें वो धरना ही क्यों ना हो। उन्होंने बताया कि वैसे घाटी में भी अब प्रतिबंध पूरी तरह हटा दिए गए हैं। आर्टिकल 370 के प्रावधानों को निरस्त करने से पहले केंद्र सरकार ने एहतियातन पाबंदियॉं लगाई थी। कई नेताओं को भी हिरासत में लिया गया था।

सिंह ने बताया कि विरोध-प्रदर्शन की अनुमति देने से पहले प्रशासन का ध्यान पूरी तरह शांति कायम करने पर है। उन्होंने कहा कि कुछ महिलाओं के हाथ में जो पोस्टर थे, वह बहुत अच्छे नहीं थे। निश्चित रूप से वे कानून और व्यवस्था के हित में नहीं थे। यही कारण है कि उन्हें हिरासत में लिया गया। उन्होंने कहा कि शांति के लिए प्रतिबंधों का सबको सम्मान करना चाहिए। महिला प्रदर्शनकारियों को भी इसकी अनुमति के लिए डिप्टी कमिश्नर के पास जाने की सलाह दी गई थी।

गौरतलब है कि पाकिस्तान की शह पर आतंकी राज्य में खून-खराबे की लगातार कोशिश कर रहे हैं। हालॉंकि छिटपुट घटनाओं को छोड़ दे तो सुरक्षा बलों की मुस्तैदी के कारण वे अपने मंसूबे में अब तक नाकामयाब रहे हैं।दो दिन पहले ही आतंकियों ने शोपियां में पंजाब के अबोहर ज़िले के दो सेब व्यापारियों को गोली मार दी थी। कश्मीर से जो सेब जम्मू की मंडियों में पहुँच रहे थे, राज्य का माहौल खराब करने के प्रयासों में उन पर इस्लामी आतंकी ज़ाकिर मूसा, बुरहान वानी जैसे जिहादियों से लेकर पाकिस्तान और उसके तालिबान-समर्थक प्रधानमंत्री इमरान खान के समर्थन के नारे लिखे मिले थे। सेबों पर ‘Go back India-Go back India’ जैसे हिंदुस्तान-विरोधी नारे भी लिखे हुए थे।