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हिन्दुओं की आस्था से खिलवाड़ कब तक: त्रिपुरा हाईकोर्ट ने बलि-प्रथा बैन करने के पीछे दिए अजीब तर्क

त्रिपुरा राज्य के पश्चिमी छोर पर उदयपुर शहर में हिन्दू धार्मिक मान्यता के अनुसार 51 शक्ति पीठों में से एक त्रिपुरेश्वरी मंदिर विराजमान है जिसे लोग त्रिपुर सुंदरी मंदिर के नाम से भी जानते हैं। यहाँ देवी की पूजा-अर्चना में देवी की स्तुति में बलि देने की प्रथा प्रचलित है। ठीक ऐसा ही एक मंदिर कमलेश्वरी देवी भी है, जो कि भारत-बांग्लादेश सीमा के किनारे बसे कस्बा गाँव में पड़ता है। बीते सितम्बर माह के आखिरी हफ्ते में राज्य के हाईकोर्ट ने बलि प्रथा पर पूरी तरह से प्रतिबन्ध लगाने का फैसला सुनाया।

इस फैसले के खिलाफ त्रिपुरा की राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल लीव पेटीशन (एसएलपी) के तहत अपील करने का फैसला किया है। प्रदेश कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष प्रद्योत किशोर देब बर्मन ने भी उच्च न्यायालय के फैसले को धार्मिक गतिविधियों में दखल बताते हुए सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने की बात कही है।

यह फैसला देने वालों की सोच में हिन्दू रीति-रिवाजों को न समझ पाने की असमर्थता साफ़ झलकती है। किसी भी सूरत में यह कहना गलत नहीं होगा कि उच्च न्यायालय का यह निर्णय पूरी तरह से निरर्थक और हास्यास्पद है। इसमें सिर्फ हिन्दू सभ्यता और उसकी मान्यताओं के प्रति भीषण असंवेदनशीलता दिखती है। इसी के साथ यह भी स्पष्ट हो जाता है कि यह फैसला देने वाले उन लोगों से कतई अलग नहीं हैं जिन्हें हिन्दुओं की भावनाओं, रीति-रिवाजों और मान्यताओं को अपने पूर्वाग्रह के चश्मे से देखने में ख़ुशी मिलती है।

पूर्वाग्रह से ग्रसित अपने इस जजमेंट में कोर्ट ने पूछा- कौन सा धर्म या संप्रदाय जानवर पर बेवजह दर्द और पीड़ा डालने की बात करता है? किस धर्म में कहा गया है कि वध से पहले जानवर को मानसिक या शारीरिक कष्ट मुक्त नहीं करना चाहिए? कौन सा ऐसा धर्म है जो अपने अनुयायियों को जानवरों पर इंसानियत के नाते दया दृष्टि न रखने के लिए कहता होगा?

दरअसल, इन सभी प्रश्नों पर चिंतन किया जाना बेहद ज़रूरी है। सबसे पहले प्रश्न में तो ‘बेवजह’ शब्द का उपयोग ही पूरी तरह से अनुचित है। ऐसा कई बार देखा गया है कि सामाजिक सुधार को लेकर कई मामलों में अदालतों का रुख सिर्फ एक ही धर्म को निशाना बनाता है, जबकि अदालत को यह भी समझना होगा कि धर्म और आस्था के क्षेत्र में तार्किकता का कोई स्थान नहीं है। यह लोगों की भावनाओं से जुदा मामला है जिसमे कोर्ट को उनकी आस्था और उनकी भावनाओं पर चोट नहीं बल्कि कद्र करनी चाहिए। हालाँकि, देखा यह भी गया है कि कैसे इस प्रकार के मामलों में सिर्फ हिन्दुओं को ही निशाना बनाया जाता है, जबकि अन्य मजहबों की उद्दंडता पर कोई नकेल नहीं कसी जाती इसलिए यह अपने आप में ही एक विवादित प्रश्न है।

किसी भी अदालत का काम धार्मिक मान्यताओं, रीति-रिवाजों और उसमे लोगों की आस्था से छेड़छाड़ करना नहीं है। पशुओं पर अत्याचार की बात करने वाले पहले देखें कि मांस उद्योग के लिए जानवरों पर होने वाला क्रूरतापूर्ण व्यवहार कितना जायज़ है? यदि वास्तव में किसी को पशुओं पर होने वाले अत्याचार को रोकना है तो उसे पहले मांस उद्योग रुकवाने पर ध्यान देना चाहिए, जहाँ व्यवस्थित ढंग से जानवरों की नृशंस हत्या की जाती है। व्यवस्थित क़त्लखाने की बजाय जानवरों को अत्याचार से बचाने के नाम पर पशुबलि पर रोक लगाना ठीक वैसे ही है जैसे चारों ओर और आग लगी हो और कोई मूर्ख पर्यावरण बचाने की दुहाई देकर घर मोमबत्ती जलाए।

फैसले के सम्बन्ध में देखें तो दूसरे और तीसरे सवाल पर यह याद रखना चाहिए कि ‘हलाल’ एक ऐसी इस्लामिक प्रथा है जिसमें जानवर को तड़पा-तड़पा कर मौत के घाट उतार दिया जाता है मगर इसपर किसी भी अदालत का मुँह तक नहीं खुलता। सबको पता है कि इसके पीछे के कारण क्या हैं?

कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में यह भी कहा कि ऐसा कौन सा धर्म है जो इतनी शर्मिंदगी के बावजूद हठ करके रूढी परंपराओं को लिए बैठा रहेगा ताकि संवैधानिक मूल्यों का ह्रास हो और समाज में होने वाले सुधारों में देरी हो?
संवैधानिक नैतिकता जजों का बनाया हुआ एक तमाशा है जिसे अक्सर वे अपनी सीमाएँ लाँघने के लिए इस्तेमाल करते हैं। हालाँकि, संविधान देश और उसके नागरिकों के बीच एक कानूनी अनुबंध से ज्यादा और कुछ नहीं है। मगर यदि संवैधानिक नैतिकता का सिद्धांत एक तमाशा नहीं भी होता तो यह कहना गलत नहीं होगा कि त्रिपुरा उच्च न्यायालय ने संवैधानिक ध्येय को इस मामले में घुसेड़ कर पूरे मसले को एक मज़ाक बनाकर रख दिया है।

देश के एक अभिन्न और महत्वपूर्ण अंग न्यायपालिका ने कैसे “संवैधानिक नैतिकता” शब्द का अविष्कार किया और इसके क्या मायने हैं, इसके बारे में एक बार केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने अपने एक बयान में कहा था कि “हम संवैधानिक नैतिकताओं के बारे में सुनते हैं, इसमें हुए बदलावों की सराहना जायज़ हो सकती है, बशर्ते इसकी बारीकियाँ व्यक्ति-दर-व्यक्ति बदलनी नहीं चाहिए साथ ही इसमें सभी को एकमत होना चाहिए।”

कोर्ट के पहले प्रश्न के विषय में यह कहना भी गलत नहीं होगा कि “क्या यह भी अदालत तय करेंगी कि किस व्यक्ति की लाश को जलाया जाएगा और किस व्यक्ति की लाश को दफनाया जाएगा? क्या अदालत बताएगी कि जीसस कहाँ जन्मे थे?” भाजपा सांसद मीनाक्षी लेखी ने सबरीमाला पर बात करते हुए यही बयान दिया था। इसी विषय पर विस्तार से बात करते हुए उन्होंने कहा था कि यह विषय कोर्ट के तय करने का नहीं है।

धर्म और रीति-रिवाज प्रत्येक व्यक्ति की अपनी आस्था का विषय है। अगर इन सबको सिर्फ इस तर्क पर देखें कि क्या सही है और क्या गलत तो सारे ही धर्म गैर-ज़रूरी रह जाएँगे, इसीलिए इन्हें आवश्यकता के तौर पर नहीं देखा जा सकता। अगर ऐसा होता तो सभी धर्मों को भ्रम या अंधविश्वास करार दे दिया जाएगा। समाज को सुधारने का जो बीड़ा न्यायपालिका ने उठाया है उसे हिन्दू धर्म को तोड़ने-मरोड़ने और पटकने के रवैये से उसकी आतुरता को साफ़ समझा जा सकता है। फैसले में कहा गया है कि “एक प्रगतिशील समाज की स्तिथि तब तक हासिल नहीं की जा सकती जब तक कि समाज का व्यक्ति धार्मिक क्रिया-कलापों में उलझा है, भ्रम और भ्रामकता से भरे समाज में प्रत्येक व्यक्ति को वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।” इसके आगे बात और भी विचित्र हो जाती है।

यह सब काफी नहीं था तो अदालत ने यहाँ तक सिद्धन्तवादी बनने का निश्चय कर लिया और दलील में कहा कि बच्चों को बलि देखने नहीं देना चाहिए, जबकि इसके पीछे कोई ठोस आधार पेश करती रिपोर्ट भी नहीं रखी गई। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि इस प्रकार के वीभत्स दृश्य देखने से छोटे बच्चों में दया, प्रेम और संवेदना जैसे नैतिक मूल्य ख़त्म हो जाते हैं अथवा उनकी नींव ही नहीं पड़ पाती। साथ ही यह भी कहा यह भी गया कि मंदिर में चढ़ाई जाने वाली बलि धर्म के नाम पर एक ऐसा अन्धविश्वास है जो न सिर्फ देखने में अप्रिय है, बल्कि बच्चों के मनोवैज्ञानिक संरचना पर बुरा प्रभाव डालता है।

निश्चित रूप से यह उन जजों की अपनी निजी राय हो सकती है जो हो सकता है कि देखने और सुनने में अच्छा लगे मगर यह मुद्दा पर्सनल नहीं है और इसीलिए इस पर कोई भी एक पक्षीय राय थोपना भी किसी प्रकार से उचित नहीं। यह पूर्णतया चकित कर देने वाली बात है कि ऐसा जजमेंट दिया कैसे गया?

पशुबलि एक शताब्दियों पुरानी प्रथा है जिसे पीढ़ी दर पीढ़ी मनाया जाता रहा है। इसमें लोगों की बड़ी दिलचस्पी इसलिए भी है क्योंकि बंगाली समुदाय में यह बड़े स्तर पर मनाई जाती है और साथ ही इसे प्रगतिशील होने का भी सूचक माना जाता है। निश्चित तौर पर पशुबलि की प्रथा ने बंगाली बच्चों को कभी भी बड़े होकर प्रगतिशील बनने से नहीं रोका, इसलिए यह दावा भी कमज़ोर हो जाता है जिसमें कोर्ट ने कहा है कि बच्चों के ऊपर इसका विपरीत असर पड़ता है।

जजमेंट में कोर्ट की ओर से उन अभिभावकों पर भी टिप्पणी की गई है जो कि पशुबलि के क्रिया-कलापों में संलिप्त होते हैं। इसके जरिए इशारा था कि अभिभावकों से ज्यादा कोर्ट जजों को उनके बच्चों की फ़िक्र है। इसके मुताबिक बच्चों के माँ-बाप अपने बच्चों की ठीक से परवरिश करने में असमर्थ हैं और उनके मुकाबले वे (जज) बच्चों के लालन-पालन को लेकर उनसे ज्यादा चिंतित हैं।

जजमेंट में महानुभावों ने अपने लिखे को जायज़ ठहराने के लिए इन्सान और जानवर के बीच अंतर की खाई को भी पाट दिया, जजों ने अपनी टिप्पणी में यहाँ तक कह दिया कि पुरातन काल में इन्सान की भी बलि दी जाती थी जिसे कई शताब्दियों पहले बंद कर दिया लिहाज़ा पशुओं की भी बलि नहीं होनी चाहिए।

यहाँ बता दें कि पहला तथ्य यह है कि इंसान और जानवर दोनों में दूर-दूर तक किसी तरह की कोई सी भी समानता नहीं है, क्योंकि Cannibalism यानी नर-भक्षण (मनुष्य का मांस खाना) और जानवर का मांस खाने में बहुत फर्क है। किसी इन्सान को मारना गुनाह है मगर किसी जानवर जैसे मवेशी को मारने पर ऐसा कुछ भी नहीं। यह किसी तरह का कोई गुनाह नहीं है, बल्कि दुनियाभर में अपना पेट पालने के लिए लोग इस पर आश्रित हैं।

कोर्ट की अतिविस्तृत टिप्पणी में हिन्दुओं की बलि प्रथा से खीझ खाकर माननीयों ने यहाँ तक कह दिया कि अधिकतर शक्ति पीठों में पशुबलि की प्रथा को नहीं मनाया जाता, मगर इसकी पड़ताल में एक ही तथ्य देख कर कोर्ट का यह दावा भी फेल साबित होता है वह यह कि तारापीठ और कामख्या देवी मंदिर दो ऐसी शक्ति पीठ हैं जहाँ आज भी बलि चढ़ाई जाती है। साथ ही देश भर में ऐसी कई शक्ति पीठ मौजूद हैं जिनमें बलि प्रथा को मनाया जाता है। गौरतलब है कि अपने इस पूरे स्टेटमेंट को डिफेंड करने के लिए तथ्यात्मक तौर पर कई भ्रामक बातों को भी बढ़ावा दिया गया है जिसमें कई बातें गलत कही गई हैं।

इसके आगे न्यायालय की ओर से कहा गया है कि “यदि इस बलि प्रथा का अनुष्ठान कर लिया जाता है तो पूजा समारोह को किसी भी तरीके से बाधित नहीं कहा जा सकता और न ही इसका अभ्यास करने अधिकार कहा जा सकता है।” यहाँ पुनः यह स्पष्ट करना बेहद ज़रूरी है कि किसी भी तरीके से धार्मिक रीति-रिवाजों में अथवा आस्था के विषयों में दखल देना न्यायालय का काम नहीं है, न ही उसे इसके लिए सरकारी तंत्र में रखा गया।

कोर्ट की भाषा को देखकर एक बात तो पूरी तरह स्पष्ट हो जाती है कि इन्हें हिन्दुओं की भावनाओं से कोई लेना-देना नहीं है, इनके लिए हिन्दुओं की भावनाओं को कुचलना ही समाज सुधार का पर्याय है। इस बात को स्पष्ट करने के लिए कोर्ट की टिप्पणी को पढ़कर यह और भी ज्यादा साफ़ हो जाता है। बता दें कि हिन्दू धर्म एकमात्र ऐसी संस्कृति का पोषक है जिसमें विविधता और सहिष्णुता का संगम देखने को मिलता है। विभिन्न सम्प्रदाय और जातियों को अपने अन्दर समेटे यह धर्म कतई संकुचित नही हो सकता, यह सिर्फ कुछ पाखंडी लिबरल हिन्दू हैं जो अपनी ही सभ्यता की जडें खोदने में लगे हुए हैं।

हाईकोर्ट यह भी कहता है कि पशुबलि न मानने वालों के अधिकार उनसे ऊपर हैं जो इसे मानते हैं। यानी कुल मिलाकर एक ही निष्कर्ष निकलता है कि भारत को न्यायिक सुधार की बहुत जरूरत है। यही समय है कि देश की न्याय व्यवस्था में नई जान फूँकी जानी चाहिए, साथ ही उसे खुद भी इसपर विचार भी करना चाहिए कि लोकतंत्र के चार खम्भों में से एक न्यायपालिका कितनी मजबूती से खड़ा है? खड़ा भी है या खोखलेपन का शिकार हो गया है। इससे पहले कि देश का ढाँचा तथाकथित बुद्धिजीवियों और वामी लिबराल्स के चंगुल से बर्बाद हो, हमें संभल जाना चाहिए।

कोई एक कारण ऐसा नहीं दिखता जो वास्तव में समाज-सुधार की परिभाषा में फिट बैठता हो, क्योंकि समाज में सभी धर्म बसते हैं। लेकिन अगर इसके लिए सिर्फ एक ही धर्म पर चोट करने से बदलाव लाने का सपना देखा जा रहा है तो भविष्य में आने वाली नस्लों को वह सिर्फ भयावह अन्धकारमय दलदल की ओर धकेलने जैसा है। इससे भारत की अतिप्राचीन विश्वप्रसिद्ध सभ्यता का ह्रास ही होगा। निश्चित रूप से संवैधानिक नैतिकता की आड़ में लोगों के धर्म और आस्था के प्रति कलुषित रवैया देश को शून्य की धकेल रहा है। किसी भी अराजक अव्यवस्थित राष्ट्र का रास्ता संवैधानिक नैतिकता से होकर ही जाता है।

पुलवामा में जैश, लश्कर और हिज़्बुल की गुप्त बैठक, Pak ने आतंकियों को सौंपे अलग-अलग टास्क

पाकिस्तानी फ़ौज और आईएसआई की शह पर लश्कर-ए-तैयबा, हिज़्बुल मुजाहिदीन और जैश-ए-मोहम्मद ने कई आतंकियों को जम्मू-कश्मीर सहित भारत के अन्य हिस्सों में हमला करने के लिए अलग-अलग टास्क दिया है। इनके निशाने पर राजनेता से लेकर पुलिस और सुरक्षा बलों के कर्मी हैं। एएनआई ने एक डॉक्यूमेंट के हवाले से ये खुलासा किया है।

इस डॉक्यूमेंट में कहा गया है कि पुलवामा में एक अज्ञात जगह पर तीनों बड़े आतंकी समूहों की पिछले हफ्ते गुप्त बैठक हुई। बैठक में उन्हें पाकिस्तान से मिले टास्क और भविष्य में क्या-क्या किया जाना है, इस पर चर्चा हुई। ख़ुफ़िया एजेंसियों ने आगाह किया है कि आतंकी संगठन कुछ राजनेताओं और सुरक्षा बलों के जवानों व अधिकारियों की हत्या की साजिश रच रहे हैं। जम्मू-कश्मीर के अलावा देश के अन्य हिस्सों में भी वारदातों को अंजाम देने की योजना बनाई जा रही है।

जैश को नेशनल हाइवे पर हमले करने का टास्क दिया गया है। लश्कर को सुरक्षा बलों और उनके कैम्पों पर हमला करने का टास्क मिला है। हिज़्बुल को जम्मू-कश्मीर में शटडाउन कराने और राजनेताओं व सुरक्षा बलों को निशाना बनाने का टास्क दिया गया है। यह सब कुछ पाकिस्तानी फ़ौज और आईएसआई की सहमति के बाद किया गया। हिज़्बुल मुजाहिदीन को स्थानीय लोगों को निशाना बनाने और घाटी में अशांति पैदा करने का टास्क भी दिया गया है।

इन आतंकी संगठनों को डर है कि अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने के बाद से घाटी में कई विकास कार्य हो सकते हैं और सरकार जिस तरह से राज्य की जनता की भलाई के लिए काम कर रही है, इससे वहाँ शांति बहाल हो सकती है। इन्होंने योजना बनाई है कि जब भी कोई अच्छी ख़बर आएगी, किसी आतंकी वारदात द्वारा उसे दबाने और नकारात्मकता फैलाने की कोशिश की जाएगी। सुरक्षा बलों को आतंकियों के मंसूबे को नाकाम करने के लिए भारतीय सेना, स्थानीय पुलिस और ख़ुफ़िया विभाग से तालमेल बिठा कर रखने को कहा गया है।

लश्कर, जैश और हिज़्बुल लगातार जम्मू-कश्मीर में दुकानें बंद रखने के लिए दुकानदारों को धमका रहे हैं। ये चाहते हैं कि बाजार बाजार ठप्प हो जाए और लोग ज़रूरी समान भी न ख़रीद पाएँ। ऐसा कर के ये वहाँ की जनता के बीच सरकार के ख़िलाफ़ माहौल बनाना चाहते हैं। आतंकी पेट्रोल पम्प मालिकों को भी धमकी दे रहे हैं।

कॉन्ग्रेस का सफाया हो चुका है, सबसे अच्छा कैल्शियम इंजेक्शन भी इसे नहीं बचा सकता: ओवैसी

महाराष्ट्र में चुनाव प्रचार के लिए पहुँचे असदुद्दीन ओवैसी ने कॉन्ग्रेस पर जम कर निशाना साधा। पुणे में एक चुनावी सभा को सम्बोधित करते हुए एआईएमआईएम अध्यक्ष ने कहा कि कॉन्ग्रेस का अब सफाया हो चुका है और पार्टी इतनी ज्यादा कमज़ोर हो गई है कि अब दुनिया का सबसे प्रभावशाली कैल्सियम इंजेक्शन भी उसे नहीं बचा सकता। महाराष्ट्र में 21 अक्टूबर को विधानसभा चुनाव होना है और ओपिनियन पोल्स में भाजपा-शिवसेना की ‘महायुति’ विपक्ष पर भारी पड़ती दिख रही है। राज्य में कॉन्ग्रेस की स्थिति अच्छी नहीं है और उसकी सहयोगी एनसीपी के कई नेता भाजपा से जा मिले हैं।

हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने दावा किया कि कॉन्ग्रेस पार्टी का आलाकमान हरियाणा और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों को नज़रअंदाज़ कर रहा है। उन्होंने कहा कि देश के राजनीतिक नक़्शे से कॉन्ग्रेस साफ़ हो चुकी है और उसे सबसे अच्छा कैल्शियम इंजेक्शन देकर भी नहीं बचाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस अब धीरे-धोरे नीचे जा रही है और कोई उसे बचा नहीं सकता क्योंकि पार्टी ख़ुद ही लड़ाई लड़ने के लिए तैयार नहीं है।

ओवैसी ने कहा कि हिमाचल में भाजपा सरकार ने धर्मान्तरण करने वाले व्यक्ति को एक महीने पहले नोटिस देना अनिवार्य कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि उन्हें आश्चर्य नहीं होगा अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यही नियम पूरे देश में लागू कर दें। इस वर्ष हुए लोकसभा चुनाव में ओवैसी की पार्टी ने महाराष्ट्र में प्रकाश आंबेडकर के बहुजन संघ के साथ मिल कर चुनाव लड़ा था। चुनावी विश्लेषकों का मानना था कि इस गठबंधन के कारण दलितों और मुस्लिमों का थोड़ा-बहुत वोट बँटा और इसका नुकसान कॉन्ग्रेस को उठाना पड़ा। 2014 विधानसभा चुनाव में ओवैसी की एआईएमआईएम को 2 सीटें मिली थीं।

आगामी विधानसभा चुनाव के लिए भी प्रकाश आंबेडकर और ओवैसी की पार्टी में बातचीत चल रही थी लेकिन सीट शेयरिंग के मामले में अब तक बात नहीं बन पाई है। एआईएमआईएम ने आरोप लगाया कि बहुजन संघ उसे काफ़ी कम सीटें ऑफर कर रहा है। हालाँकि, प्रकाश आंबेडकर का कहना है कि उनकी पार्टी ने अभी सभी दरवाजे बंद नहीं किए हैं और बातचीत का स्कोप है।

अल्लाह के अलावा किसी और की इबादत हराम, नाम बदल लें नुसरत जहाँ: देवबंदी उलेमा

बंगाली अभिनेत्री और तृणमूल सांसद नुसरत जहाँ से इस्लामी उलेमा एक बार फिर नाराज़ हो गए हैं। नुसरत कोलकाता के एक दुर्गा पूजा पंडाल में सिन्दूर लगा कर पहुँची थी। इस दौरान उनके पति निखिल जैन भी साथ में थे। दुर्गा पूजा पंडाल में पहुँच कर उन्होंने पूजा-अर्चना भी की। नुसरत जहाँ से नाराज देवबंद के उलेमा ने कहा है कि अगर उन्हें ग़ैर-मज़हबी कार्यों में इतनी ही रुचि है तो वो अपना नाम बदल लें। उलेमा ने पूछा कि अभिनेत्री नुसरत आख़िर ग़ैर-मज़हबी काम कर क्यों रही हैं?

तृणमूल कॉन्ग्रेस की नेता नुसरत जहाँ फ़िलहाल पश्चिम बंगाल के बसीरहाट से सांसद हैं। अब तक 20 से भी अधिक बंगाली फ़िल्मों में नज़र आ चुकीं नुसरत जब संसद में शपथ लेने पहुँची थीं तब भी उनके माथे के सिन्दूर को देख उलेमा नाराज़ हो गए थे। सोशल मीडिया में उन्हें खरी-खोटी सुनाई थी। अब देवबंदी उलेमा ने कहा कि है अल्लाह के अलावा किसी और की इबादत करना हराम है। उलेमा ने कहा कि इस तरह दुर्गा पूजा में सम्मिलित होकर वह इस्लाम की तौहीन कर रही हैं।

नुसरत जहाँ ने दुर्गा पूजा पंडाल में फेसबुक पर अपने पति का फ़िल्टर वाला फोटो शेयर किया

नुसरत ने उलेमा के बयान का जवाब देते हुए कहा कि वह विवादों पर ध्यान नहीं देती हैं। उन्हें जो सही लगता है वह करती हैं। दुर्गा पूजा के दौरान नुसरत और उनके पति निखिल ने माँ दुर्गा को पहली बार साथ में ‘अंजलि’ अर्पित की। इसी वर्ष जून में उनकी शादी हुई है। नुसरत ने कहा कि बंगाल में सभी लोग एक परिवार की तरह दुर्गा पूजा मनाते हैं।

जब नुसरत से पूछा गया कि वो दूसरे मजहब की होकर भी पूजा कर रही हैं तो उन्होंने कहा कि वह जिस बंगाल में रहती हैं, वहाँ की परंपरा और संस्कृति का अनुसरण कर रही हैं। वहीं, उनके पति निखिल ने कहा कि देश के सभी धर्मों के लोगों को सभी धार्मिक त्योहारों में हिस्सा लेना चाहिए। नुसरत और उनके पति निखिल ने इस दौरान नृत्य भी किया और साथ में ‘ढाक’ बजाया।

अगले 3 महीनों में कर्ज चुकाना चाहती है ZEE: निवेशकों को MD पुनीत गोयनका ने दिलाया भरोसा

जी अगले तीन महीने के भीतर अपना पूरा कर्ज चुकाना चाहती है। कंपनी के एमडी पुनीत गोयनका ने ET Now के साथ बातचीत में कहा कि कंपनी का लक्ष्य अगले तीन महीनों में बकाया राशि का भुगतान करना है। निवेशकों को भरोसा दिलाते हुए उन्होंने कहा कि कर्ज देने वालों की ओर दी गई छह महीने की मियाद से पहले ही कंपनी ने अपनी कुछ संपत्तियों को बेच कर कर्ज चुकाने का फैसला किया है।

बता दें कि जनवरी 2019 में शेयर और दूसरे सिक्योरिटीज के बदले ज़ी एंटरटेनमेंट पर 13,500 करोड़ रुपए का कर्ज था। अब यह कर्ज घटकर 7,000 करोड़ रुपए हो गया है। ज़ी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड (ZEEL) के प्रमोटर Essel Group ने अपने निवेशकों को सूचित किया है कि सितंबर 2017 में फर्मों के बीच संरचित ऋण व्यवस्था में ZEEL के शेयर रूस के VTB कैपिटल पीएलसी को नहीं दिया गया था।

ऐसी खबरें सामने आई थी कि Essel Media ने VTB Capital के पास अपनी 10.71 फीसदी हिस्सेदारी गिरवी रखी है। इसके बाद गुरुवार से ही जी एंटरटेनमेंट के शेयरों में गिरावट शुरू हो गई। दोनों कंपनियों के बीच यह लोन एग्रीमेंट 4 सितंबर 2017 को हुआ था।

पुनीत गोयनका ने कंपनी का रुख स्पष्ट करते हुए कहा, “VTB की देनदारी हमेशा कुल ऋण का हिस्सा रही है। जनवरी में कंपनी के कुल कर्ज 13,000 करोड़ रुपए में यह शामिल था। आज यह रकम लगभग 7,000 करोड़ रुपए है। VTB की देनदारी इसका भी हिस्सा है। VTB का कर्ज 2,000 करोड़ रुपए और डोमेस्टिक मार्केट का 5,000 करोड़ रुपए है। VTB को अगली किश्त लौटाने की दिशा में हम काम कर रहे हैं।”

गोयनका ने बताया कि घरेलू ऋण को चुकता करने के लिए कंपनी अपनी संपत्तियों को बेचने की दिशा में आगे बढ़ रही है। 205 मेगावाट के सोलर प्लांट की ब्रिकी से 1,300 करोड़ रुपए मिलने की उम्मीद है। 80 मेगावाट पावर प्लांट सहित अन्य संपत्तियों की ब्रिकी को लेकर भी बातचीत चल रही है। इन संपत्तियों की ब्रिकी से कर्ज चुकाने के अलावा कंपनी के संचालन के लिए पर्याप्त रकम जुटने की उम्मीद है।

‘वन्दे भारत’ के बाद अब तेजस एक्सप्रेस पर पत्थरबाजी, 3 खिड़कियों के शीशे चटके

देश की पहली कॉर्पोरेट ट्रेन तेजस एक्सप्रेस को भी पत्थरबाजों ने निशाना बनाया है। असामाजिक तत्वों ने तेजस एक्सप्रेस पर पत्थरबाजी की। शनिवार (अक्टूबर 5, 2019) को ट्रेन जब कानपुर और इटावा के बीच थी, तब यह घटना हुई। पत्थरबाजी के कारण तेजस एक्सप्रेस की 3 खिड़कियों खिड़की के शीशे चटक गए। हालाँकि, सुपर क्वालिटी डबल लेयर और अनब्रेकेबल तकनीक के प्रयोग के कारण शीशे टूटे नहीं, जिससे यात्रियों को कोई नुकसान नहीं पहुँचा। मंगलवार को ट्रेन के चटके हुए शीशों को बदल दिया जाएगा।

रविवार को तेजस एक्सप्रेस का नियमित रन शुरू हो गया। इस दौरान लखनऊ से नई दिल्ली तक एक अधिकारी भी साथ भेजा गया। इसी रेलखंड पर वन्दे भारत एक्सप्रेस ट्रेन पर भी पत्थरबाजी की गई थी।

फ़रवरी 2019 में जब ‘वन्दे भारत’ के नाम से लोकप्रिय ‘ट्रेन 18’ का ट्रायल किया जा रहा था, तब इस पर भी पत्थर फेंके गए थे। उस घटना में ट्रेन का साइड विंडो क्षतिग्रस्त हो गया था। मार्च में यूपी के बदायूँ में इस ट्रेन पर फिर पत्थरबाजी हुई, जिसमें बाद 10 साइड विंडो टूट गए थे। इस घटना को लेकर कई लोगों को गिरफ़्तार भी किया गया था। इस ट्रेन पर एक ही दिन में 2 बार पत्थरबाजी की घटना हुई थी।

तेजस एक्सप्रेस में अगले कुछ दिनों के लिए सभी सीटों की बुकिंग लगभग फुल चल रही है। पहले दिन 740 लोगों ने इस ट्रेन में सफर किया। बुधवार (अक्टूबर 9, 2019) को भी ट्रेन की बुकिंग फुल है।

78 साल में पहुॅंचेंगे 5 ट्रिलियन डॉलर पर, 200 साल में अंग्रेज लूट कर ले गए $45 ट्रिलियन

भारत 2024 तक 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के लिए पूरा जोर लगा रहा है। यदि कामयाब रहे तो आजाद भारत को यहॉं तक पहुॅंचने में 78 साल लगेंगे। लेकिन, आप जानकर हैरत में रह जाएँगे कि इसका 9 गुना यानी 45 ट्रिलियन डॉलर तो हमारे देश से अंग्रेज 200 सालों में लूट कर ले गए।

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने हाल ही में अमेरिका में एक कार्यक्रम के दौरान हैरान करने वाले इस आँकड़े को सामने रखा। ब्रिटिश राज में भारत को पहुँचाए गए भारी नुकसान की चर्चा करते हुए याद दिलाया कि किस तरह देश को हर क्षेत्र को अंग्रेजों के अत्याचार का सामना करना पड़ा। इनसे उबरते-उबरते कई पीढ़ियाँ बीत गईं। उन्होंने वाशिंगटन में आयोजित ‘अटलांटिक काउन्सिल’ के कार्यक्रम के दौरान ये बातें कही।

जयशंकर ने भारत में 200 सालों तक चले ब्रिटिश राज से देश को हुए अन्य नुकसानों के साथ-साथ वित्तीय घाटे को भी हाइलाइट किया। उन्होंने कहा कि ब्रिटिश ‘लुटेरे’ 18वीं सदी के मध्य में भारत में घुसे थे। एक अर्थशास्त्री द्वारा कैलकुलेट किए गए आँकड़ों के मुताबिक़, ब्रिटिश भारत से 45 ट्रिलियन (45 लाख करोड़ ) डॉलर लूट कर ले गए।

विदेश मंत्री जयशंकर ने जिस अर्थशास्त्री का उल्लेख किया, उनका नाम उत्सा पटनायक है। जेएनयू में पढ़ा कर रिटायर हो चुकीं मार्क्सवादी अर्थशास्त्री उत्सा पटनायक ने कोलम्बिया यूनिवर्सिटी में प्रकाशित एक लेख में इस आँकड़े का उल्लेख किया था। उन्होंने लिखा था कि अंग्रेजों ने भारत में जो लूट मचाई, उसके कारण देश अब तक ग़रीबी से जूझ रहा है। उन्होंने बताया था कि अगर यह धन देश में ही रहता तो भारत आज विकसित होता। उन्होंने कहा था कि ब्रिटिश राज के दौरान भारत में ‘प्रति व्यक्ति आय’ बढ़ ही नहीं पाया।

इससे पहले पूर्व केंद्रीय मंत्री शशि थरूर भी इस तरफ लोगों का ध्यान आकृष्ट करा चुके हैं। थरूर ने अपनी पुस्तक ‘इनग्लोरियस एम्पायर’ में ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल को ‘नरसंहारक तानाशाह’ करार दिया था। एबीसी न्यूज़ को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि ब्रिटिश भले ही चर्चिल को आज़ादी और लोकतंत्र के मसीहा के रूप में देखते हों लेकिन वह 20वीं सदी के किसी अन्य क्रूर तानाशाह से अलग नहीं थे।

थरूर ने ‘ऑक्सफ़ोर्ड यूनियन’ में दिए गए भाषण में बताया था कि ब्रिटिश राज के शुरुआत के समय भारत की अर्थव्यवस्था सम्पूर्ण वैश्विक इकॉनमी का 23% थी और जब अंग्रेजों से आज़ादी मिली तो यह मात्र 4% रह गई थी। उन्होंने कहा कि ब्रिटेन का औद्योगीकरण भारत के डी-इंडस्ट्रियलाइजेशन पर आधारित था। ब्रिटिश भारत से कच्चा माल ले जाते थे और अपने देश में कपड़े बना कर पूरी दुनिया में उसको बेच कर माल कमाते थे।

चुनाव लड़ने का मतलब CM बनना नहीं: बेटे आदित्य की दावेदारी पर उद्धव ठाकरे

शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने कहा है कि उनके बेटे आदित्य के चुनाव मैदान में उतरने का मतलब यह नहीं कि वे मुख्यमंत्री या उपमुख्यमंत्री बनेंगे। उद्धव का यह रुख महाराष्ट्र में शिवसेना और भाजपा के बीच असहज स्थिति होने की खबरों के बीच आया है।

21 अक्टूबर को होने वाले महाराष्ट्र चुनाव के लिए भाजपा और शिवसेना के बीच आधिकारिक रुप से सीटों के बँटवारा हो चुका है। भाजपा 150 और शिवसेना 124 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। बाकी 14 सीटें अन्य सहयोगी पार्टियों के लिए छोड़ी गई हैं। शिवसेना को 2 विधान परिषद की सीटें भी मिलेंगी।

भाजपा से कम सीटों पर चुनाव लड़ने की कसक तो शिवसेना में है, लेकिन उसे उम्मीद है कि गठबंधन की सरकार बनने पर उसे बराबर की भागीदारी मिलेगी। उद्धव ठाकरे ने कहा है कि उन्हें यकीन है कि बीजेपी अपने वादों पर खरा उतरेगी।

शिवसेना के मुखपत्र सामना के संपादक संजय राउत को दिए साक्षात्कार में उद्धव ने मुख्यमंत्री पद पर पार्टी की दावेदारी को लेकर भी जवाब दिया। उन्होंने कहा कि ठाकरे परिवार से किसी के पहली बार चुनाव लड़ने का मतलब यह नहीं है कि वो तुरंत सीएम या डिप्टी सीएम बन जाएँगे।

उन्होंने कहा कि आदित्य विधायी कार्यों का तजुर्बा लेना चाहते हैं। इसमें उनकी काफी रूचि है। वह अभी राजनीति में आए ही हैं और यह उनकी शुरुआत है। राजनीति में पहले कदम का मतलब यह नहीं होता कि आप राज्य के सीएम बन जाएँ। उल्लेखनीय है कि आदित्य चुनाव मैदान में उतरने वाले पहले ठाकरे हैं। उनके चुनाव लड़ने के ऐलान के बाद से ही कई तरह के कयास लग रहे हैं। पिछले दिनों महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस ने कहा था कि आदित्य को डिप्टी सीएम बनाने में उन्हें खुशी होगी।

साक्षात्कार के दौरान उद्धव ने कहा कि एक दिन शिवसैनिक जरूर राज्य का सीएम बनेगा। उन्होंने कहा कि शिवसैनिक को सीएम बनाने का वचन मैंने अपने पिता (बाला साहेब ठाकरे) को दिया था। जब तक यह पूरा नहीं होगा चैन से नहीं बैठूंगा।

इस दौरान उद्धव ठाकरे ने कहा कि बीजेपी से शिवसेना का गठबंधन हिंदुत्व पर आधारित है। साथ ही ठाकरे ने यह भी कबूला कि उन्होंने बीजेपी के साथ गठबंधन में आने के लिए कंप्रोमाइज किया है और ऐसा उन्होंने सिर्फ महाराष्ट्र की भलाई के लिए किया है। ठाकरे ने कहा, “हम कम सीटों पर लड़ रहे हैं, क्योंकि मुख्यमंत्री देवेंद्र
फड़णवीस और राज्य भाजपा प्रमुख चंद्रकांत पाटिल ने मुझसे अपनी समस्या समझने का अनुरोध किया था। भले ही शिवसेना कम सीटों पर लड़ रही है, लेकिन पार्टी ज्यादातर सीटों पर जीत दर्ज करेगी।”

गाँधी परिवार को विदेश में भी SPG सुरक्षा: मोदी सरकार का फैसला, कॉन्ग्रेस ने कहा – ‘ये तो निगरानी करवाना है’

केंद्र सरकार ने एसपीजी सुरक्षा कवर के नियमों का कड़ाई से पालन करने का निर्णय लिया है। बता दें कि ‘स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप’ की सुरक्षा भारत में गिने-चुने नेताओं को ही मिली हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा गाँधी परिवार के तीनों सदस्यों को एसपीजी सिक्योरिटी कवर मिला हुआ है। यूपीए अध्यक्ष सोनिया गाँधी, पूर्व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी फ़िलहाल एसपीजी की सुरक्षा का लाभ उठा रही हैं। अब सरकार ने कहा है कि जिन्हें भी एसपीजी कवर मिला हुआ है, उन्हें विदेश दौरों पर भी इसे लेकर जाना होगा।

सरकार ने सुरक्षा कारणों ने एसपीजी सिक्योरिटी कवर के दिशा-निर्देशों में कड़ाई की है। नियमों के अनुसार, एसपीजी सुरक्षा प्राप्त व्यक्ति अगर विदेश दौरे पर भी जाता है तो एसपीजी उसके साथ ही रहेगी। इस तरह से सोनिया, राहुल और प्रियंका अगर विदेश दौरों पर भी जाते हैं तो एसपीजी दस्ता उनके साथ ही जाएगा। कॉन्ग्रेस ने इस फ़ैसले का विरोध करते हुए कहा कि मोदी सरकार गाँधी परिवार की निगरानी कराने के लिए ऐसा कर रही है। भाजपा ने कॉन्ग्रेस के इन आरोपों को नकार दिया।

हालाँकि, एक अनाम कॉन्ग्रेस नेता ने ‘टाइम्स नाउ’ को बताया कि राहुल गाँधी नियम-क़ानून का पालन करने वाले नागरिक हैं और उन्होंने हमेशा से सभी सरकारी दिशा-निर्देशों का अनुपालन किया है। उक्त नेता ने कहा कि अगर उनके भले के लिए, उनकी सुरक्षा के लिए ऐसा किया गया है तो इस फ़ैसले को सहर्ष स्वीकार करेंगे। उस नेता ने आगे जानकारी दी कि पूरे दस्ते को लेकर विदेश यात्रा पर जाना बड़ा मुश्किल होता है, इसीलिए राहुल गाँधी विदेश दौरों पर 2-3 एसपीजी कमांडो लेकर जाते रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि केंद्र सरकार ने एसपीजी की नियमावली में किसी प्रकार का बदलाव नहीं किया है बल्कि पहले से ही तय किए गए दिशा-निर्देशों का कड़ाई से पालन करने का निर्णय लिया है। विशेषज्ञों ने बताया कि एसपीजी सुरक्षा कवर प्राप्त व्यक्ति को हमेशा एसपीजी दस्ते को अपने साथ ही रखना होता है लेकिन गाँधी परिवार के तीनों सदस्य समय-समय पर विदेश दौरों पर जाते रहते हैं और इस दौरान वे एसपीजी को साथ नहीं ले जाते। एसपीजी की टीम को हवाई अड्डे से ही वापस कर दिया जाता है।

केंद्र सरकार को लगता है कि ऐसा करना सुरक्षा में लापरवाही बरतना है। इसीलिए, अब नियमों का कड़ाई से पालन करवाया जाएगा। बता दें कि राहुल गाँधी अभी भी विदेश दौरे पर हैं और वह एसपीजी दस्ते को साथ लेकर नहीं गए हैं। ‘इंडिया टुडे’ के सूत्रों के अनुसार, अगर एसपीजी सुरक्षा प्राप्त व्यक्ति इन नियमों का पालन करने से इनकार करता है तो सरकार उसके विदेश दौरों पर रोक लगा सकती है। अगस्त 2017 में राजनाथ सिंह ने आरोप लगाया था कि राहुल गाँधी ने जानबूझ कर एसपीजी सुरक्षा के बिना 2 साल में विदेश में 72 दिन गुजारे ताकि वह विदेश दौरे के डिटेल्स छिपा सकें।

JNU में विरोध-प्रदर्शन: शेहला रशीद होंगी शामिल, उपाध्यक्ष ने कहा – हम दिखाएँगे J&K के असली हालात

केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने कुछ दिनों पहले ही जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 को निरस्त किए जाने को लेकर सरकार के रूख को स्पष्ट करने और आगे बढ़ाने के लिए जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) का दौरा किया। अब उनके दौरा करने के कुछ ही दिन बाद जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ (JNUSU) सोमवार (अक्टूबर 7, 2019) को एक विरोध प्रदर्शन का आयोजन कैंपस में ही कर रहा है। इस विरोध प्रदर्शन में कई वामपंथी दलों के नेता और एक्टिविस्ट शामिल होंगे।

बताया जा रहा है कि इस विरोध प्रदर्शन में शेहला रशीद, अन्नी राजा, प्रदीपिका सारस्वत, फिल्मकार संजय काक और एजाज अहमद राथर शामिल होंगे। इस दौरान स्टूडेंट यूनियन जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को निष्क्रिय किए जाने और लॉकडाउन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करेगी। यूनिवर्सिटी में ’64 डेज ऑफ शटडाउन’ नाम से विरोध प्रदर्शन का आयोजन किया गया है। शाम 4:30 बजे होने वाली विरोध सभा में शेहला रशीद शोरा, एनी राजा, प्रदीपिका सारस्वत, संजय काक और एजाज अहमद राथर को वक्ता के रूप में आमंत्रित किया गया है।

JNUSU उपाध्यक्ष साकेत मून ने इंडिया टुडे को बताया कि यह कार्यक्रम दो प्रमुख कारणों से आयोजित किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि कुछ कार्यकर्ता और शोधकर्ताओं ने 15 दिन पहले घाटी का दौरा किया है। वे ग्रामीण और शहरी, दोनों इलाकों में गए। उन्हें वहाँ के असली हालात पता हैं। उन्होंने वहाँ की वास्तविक तस्वीरें भी ली हैं। फैक्ट फाइंडिंग टीम के सदस्य जम्मू कश्मीर से आर्टिकल 370 के निरस्त हो जाने के बाद कश्मीर की वास्तविक तस्वीर दिखाने के लिए वीडियोज और रिपोर्ट्स पेश करेंगे।

साकेत मून ने आगे कहा कि यूनिवर्सिटी ने कुछ दिनों पहले सरकार के प्रोपेगेंडा के अनुसार प्रतिबंधित क्षेत्रों की एक शांतिपूर्ण तस्वीर के लिए मंत्री जितेंद्र सिंह को आमंत्रित किया था। लेकिन हमने जिन वक्ता को बुलाया है, या तो वे कश्मीर से हैं या फिर घाटी से निकटता से जुड़े हैं। जिसकी वजह से इस बार कश्मीर पर अधिक स्पष्ट परिदृश्य सामने आएगा।

गौरतलब है कि केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह जब 3 अक्टूबर को जेएनयू में कश्मीर से 370 के मुद्दे पर बोलने आए थे, तो इस दौरान लेफ्ट विंग और राइट विंग के स्टूडेंट्स के बीच विवाद हो गया था। जेएनयूएसयू ने संगोष्ठी पर एक बयान भी जारी किया था, जिसमें कहा गया था, “संघ परिवार के ज़ेनोफोबिक ट्रम्पलिज्म आज जेएनयू में पूर्ण प्रदर्शन पर है। यह विडंबना है कि जिस प्रशासन ने जेएनयू की शांति और स्थिरता को बर्बाद कर दिया है, वह एक मंत्री को आमंत्रित कर रहा है। एक ऐसी पार्टी जो देश की शांति और स्थिरता को नष्ट कर रही है।”

अब देखना यह है कि जब चंद विदेशी और प्रोपेगेंडाबाज मीडिया के अलावा अलगाववादी और वामपंथी नेताओं के द्वारा पेश की गई जम्मू-कश्मीर की फर्जी तस्वीर की असलियत बार-बार सामने आ रही है, जब धीरे-धीरे वहाँ जीवन सामान्य हो रहा है, तो ऐसे में JNU के वामपंथी किले से आज किस तरह का फर्जीवाड़ा फैलाया जाएगा! क्योंकि वहाँ कम ही सही लेकिन पर्यटक भी जा रहे हैं, डॉक्टर भी जा रहे हैं, जो जा रहे हैं, वो वहाँ के किस्से भी सुना रहे हैं, फोटो व वीडियो भेज कर इनके प्रोपेगेंडा को ध्वस्त भी कर रहे हैं।

अलगाववादी दुकान बंद रखने के लिए पहुँचाते है पैसे: J&K से लौटे डॉक्टर ने किए कई बड़े खुलासे