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रायबरेली की MLA अदिति सिंह के तेवर से मुश्किल में कॉन्ग्रेस, पार्टी नोटिस का उड़ाया मजाक

विधायक अदिति सिंह के तेवरों ने कॉन्ग्रेस की परेशानी बढ़ा दी है। पार्टी के कारण बताओ नोटिस का उन्होंने मजाक उड़ाया है। अदिति यूपी में कॉन्ग्रेस के एकमात्र बचे गढ़ रायबरेली से विधायक हैं। इस संसदीय सीट से कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गॉंधी खुद सांसद हैं।

अदिति ने दो अक्टूबर को यूपी विधानसभा के आयोजित विशेष सत्र में हिस्सा लिया था। कॉन्ग्रेस ने सत्र के बहिष्कार का ऐलान किया था। इसके बाबत ही पार्टी की ओर शुक्रवार को उन्हें कारण बताओ नोटिस भेजकर जवाब मॉंगा गया था। लेकिन, अदिति का कहना है कि उन्हें नोटिस मिला ही नहीं है। उनके अनुसार पार्टी नेता ने मीडिया में नोटिस दिया होगा।

अदिति का कहना है कि विधायक दल के नेता अजय कुमार लल्लू मीडिया में नोटिस देने के बजाय उन्हें देते। उनके तेवर पार्टी के इस बर्ताव के कारण बेहद तल्ख हैं। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस विधानमंडल के नेता अजय लल्लू उनके फोन का जवाब नहीं दे रहे हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि विधानसभा के विशेष सत्र में विधायक राजेश सिंह और विधान परिषद के सदस्य दिनेश सिंह भी शामिल हुए थे। पार्टी विधानमंडल दल ने क्या उन्हें भी नोटिस भेजा है? उन दोनों का कारण बताओ नोटिस कहाँ है?

बता दें कि राष्ट्रपति महात्मा गाँधी की 150वीं जयंती के मौके पर 2 अक्टूबर को उत्तर प्रदेश विधानसभा में विशेष सत्र आयोजित किया गया था। राज्य की विधानसभा के इस विशेष सत्र का कॉन्ग्रेस समेत पूरे विपक्ष ने बहिष्कार किया था। कॉन्ग्रेस के बहिष्कार के बावजूद अदिति सिंह ने सदन में पहुँच कर सभी को चौंका दिया था। सदन में अदिति ने कहा था कि वो एक पढ़ी-लिखी विधायक हैं और यहाँ विकास पर चर्चा हो रही है। इसलिए उन्होंने आना जरूरी समझा। 

अदिति सिंह के इस रुख के बाद कॉन्ग्रेस विधानमंडल दल के नेता अजय कुमार लल्लू ने अनुशासन तोड़ने का नोटिस भेजते हुए दो दिन में जवाब देने के लिए कहा था। उन्होंने कहा था कि दो दिन में जवाब न मिलने पर कार्रवाई की जाएगी। उल्लेखनीय है कि अदिति सिंह ने इससे पहले पार्टी लाइन से बाहर जाकर अनुच्छेद 370 को निरस्त किए जाने के मोदी सरकार के फैसले का समर्थन किया था।

अगवा कर 15 साल की नाबालिग से गैंगरेप: रईश, इशहाक, अकमल और रेहाब फरार

उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ के बिलरियागंज क्षेत्र के एक गाँव में गुरुवार (अक्टूबर 3, 2019) को देर शाम शौच के लिए घर से बाहर गई किशोरी को अगवाकर गाँव के पाँच युवकों ने सामूहिक दुष्कर्म किया। गुरुवार की रात घटना को अंजाम देने के बाद आरोपित सुबह के तकरीबन तीन बजे किशोरी को गाँव के बाहर स्थित ट्यूबवेल के पास छोड़कर भाग गए।

पीड़िता ने किसी तरह से घर पहुँचकर घटना की जानकारी दी। पीड़िता के पिता की तहरीर पर पुलिस ने पाँचों युवकों को खिलाफ केस दर्ज कर पीड़िता को मेडिकल के लिए भेज दिया है। पुलिस ने आरोपियों के घर दबिश दी पर सभी आरोपित फरार थे।

दैनिक जागरण में प्रकाशित खबर का स्क्रीनशॉट

बिलरियागंज थानाध्यक्ष आरके सिंह ने बताया कि पीड़िता के पिता की शिकायत पर गाँव के ही रईश छांगुर, इशहाक, अकमल, रेहाब व एक अन्य अज्ञात के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है।

पिता के मुताबिक उसकी 15 वर्षीय बेटी गुरुवार की देर शाम को घर से शौच के लिए गई थी। इसी दौरान रईस और इशहाक बाइक से पहुँचे और उसे अगवा कर रौनापार थाना क्षेत्र के बातन गाँव निवासी जावेद के पोखरे पर उठा ले गए। जहाँ पर पहले से अकमल और रेहाब मौजूद थे। पाँचों आरोपितों ने किशोरी के साथ दुष्कर्म किया और फिर उसे शुक्रवार की सुबह उसे घर के पास छोड़ फरार हो गए। किसी तरह से किशोरी अपने घर पहुँची और आपबीती घर वालों को बताई। इसके बाद परिवार के लोग उसे लेकर बिलरियागंज थाने पहुँचे व तहरीर दी।आरोपितों को पकड़ने के लिए पुलिस लगातार दबिश दे रही है।

‘अगर हथिया ही सब कुछ है तो इतने बड़े-बड़े हाथी जो हम लोगों ने पाल रखे हैं वो क्यों हैं’

जीत का सेहरा अपने सर बाँधने की होड़ का नतीजा क्या होगा? ये तो सीधी-सी बात है कि कोई अच्छा काम किया जा रहा हो, तभी उसका श्रेय मिलने की संभावना होती है। लेकिन, अलग-अलग संस्थान किसी जीत को अपनी जीत, सिर्फ मेरी जीत, घोषित करने पर तुले हों तो ज्यादातर ये आपसी लड़ाई दुश्मन को जीत दिला देती है।

पुल्तिज़र पुरस्कार से सम्मानित लेखक (पत्रकार) लॉरेन्स राईट की किताब “द लूमिंग टावर: अल कायदा एंड द रोड टू 9/11” कुछ ऐसे ही मसलों पर ध्यान दिलाती है। काफी शोध के बाद लिखी गई इस 500 पन्ने के लगभग की किताब में इस बात पर ध्यान दिलाया गया है कि कैसे सीआईए और एफबीआई की आपसी प्रतिद्वंदिता में एक ऐसी हरकत को अंजाम दिया जा सका जिसकी जानकारी अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों के पास पहले से ही थी!

किसी शादी के समारोह में ओसामा बिन लादेन ने तीन बार दोहराया था कि ‘मौत तुम्हें ढूँढ लेगी चाहे तुम किसी ऊँची अट्टालिका में क्यों न छिप जाओ’। ये वाक्य सूरा अल निसा (कुरआन 4.78) का है और इसी से इस किताब का शीर्षक लिया गया है। इसके अलावा इस किताब में 9/11 के हमलावरों के जीवन और उनके कट्टरपंथी नजरिए जैसी चीजों पर भी रोशनी डाली गई है।

अगर, अमेरिका जैसी जगहों पर ऐसी कोई किताब लिखी हुई हो, शोध पहले ही हो चुका हो तो क्या इस पर फ़िल्में और टीवी सीरीज भी बनेंगे? 2006-07 में दर्जन भर से ज्यादा पुरस्कार जीत चुकी इस बेस्टसेलर पर शायद ही कोई फिल्म बनी। इस पर जो टीवी सीरीज बनी वो आम चैनल और टीवी पर नहीं वेब सीरीज की तरह चलती है।

अपनी गलतियों को दबाना, हर सरकार के चरित्र में होता है। चाहे वो अमेरिका हो, या फिर वो बिहार हो, अगर नुकसान तब हुआ हो जब सरकारी अमले को होने वाली आपदा का पूर्वानुमान था, तो उसकी ख़बरें दबा दी जाती हैं। बिलकुल पास के बिहार में अगर देखें तो जल-जमाव से अस्त-व्यस्त पटना और बिहार के बाढ़ जैसे हालात टीवी पर ही नजर आ जाते हैं। क्या सरकार बहादुर को इसकी खबर पहले से नहीं थी?

मौसम का पूर्वानुमान लगाने वाले विभागों ने पहले से ही भारी बारिश की घोषणा कर दी थी। बाढ़ आए तो उसे आपदा कहा भी जाए, मगर बारिश का पानी अगर शहरों में ही जमा रह जाए निकल ही न पाए तो आपदा राहत की नहीं जवाब देने की बारी आती है। अफ़सोस कि ऐसे सवाल या तो पूछे नहीं जाते और अगर पूछे जाएँ तो पूछने वालों को भारी दंड भी झेलना पड़ता है।

सवाल पूछे जाने पर पत्रकारों को जागरूकता फैलाने के लिए फटकारते शू-शासन बाबू हाल में ही वीडियो में दिखे हैं। जो बिहार के बाहर आसानी से नहीं दिखा होगा वो था इस जल-जमाव पर स्थानीय अखबारों में छपी कहानियाँ। सरकार के रुख को लेकर “प्रभात खबर” का रवैया काफी तल्ख़ रहा। अक्टूबर की 2-3 तारीख को ऐसी ख़बरों को छापने का नतीजा “प्रभात खबर” में आने वाले विज्ञापनों की गिनती में साफ नजर आ जाएगा।

दुर्गा पूजा के दौरान जहाँ दूसरे अख़बारों में सरकारी और गैर-सरकारी विज्ञापन भरे पड़े हैं, प्रभात खबर विज्ञापनों से खाली ही दिखता है। ऐसा भी बिलकुल नहीं है कि “हथिया नक्षत्र” पर ज्यादा पानी बरसने का दोषारोपण सरकार बहादुर कोई पहली बार कर रही हो। बाढ़ और नदियों पर शोध करने वाले जाने-माने विशेषज्ञ डॉ. दिनेशचन्द्र मिश्र बताते हैं कि ये 1957 में भी हो चुका है। तब जाने-माने साहित्यकार रामबृक्ष बेनीपुरी ने विशालकाय सरकारी अमले की बात करते हुए 28 नवंबर 1957 को बिहार विधानसभा में पूछा था, “अगर हथिया ही सब कुछ है तो इतने बड़े-बड़े हाथी जो हम लोगों ने पाल रखे हैं वो क्यों हैं।”

राजधानी होने के कारण पटना की स्थिति आसानी से नजर आ गई। जिस शहर को “स्मार्ट सिटी” बनाने की बातें बनाई जा रही हैं, वहाँ की नगरपालिका पर भाजपा काबिज है, मेयर भी भाजपा से! कुम्हरार, बांकीपुर, दीघा, पटना साहिब के विधायक भाजपा के हैं, पाटलिपुत्र और पटना साहिब के सांसद भाजपा के हैं, बिहार के स्वास्थ्य मंत्री और नगर विकास मंत्री भी भाजपा के, राज्य में गठबंधन सरकार और उप मुख्यमंत्री भी भाजपा और केंद्र से मदद न आने का बहाना किया जाए तो केंद्र सरकार भी भाजपा की ही है।

डूबते पटना को घर की छत से निहारते सीएम नीतीश कुमार

अक्सर जैसे व्यक्तिगत स्तर पर स्थानीय लोगों को जुटाकर लोगों की मदद करने के प्रयास करते राजनीतिज्ञ नजर आते हैं, वो भी यहाँ नहीं दिखा। एक जो नेता दिखे वो पटना से करीब 300 किलोमीटर दूर के मधेपुरा क्षेत्र से हैं, जो पटना वाले थे वो ट्यूब से बने राफ्ट से फिसलकर पानी में गिरे और हँसी का पात्र बने।

इस दौरान उप-मुख्यमंत्री (भाजपा के) सुशील मोदी को बचाकर निकालने की तस्वीर नजर आती रही। सोशल मीडिया पर उनकी एक पुरानी तस्वीर भी दिखने लगी जिसमें वो 1972 के दौर में हुए जल-जमाव के विरोध में अनशन पर थे। पिछले करीब पचास सालों में क्या बदला मालूम नहीं! आपदा नियंत्रण की कितनी तैयारी थी ये नावों के इंतजाम में नजर आया। ट्रैक्टर और जेसीबी-क्रेन जैसी मशीनें ज्यादा काम आईं। नावें न तो उतनी थीं, न ही उतनी कारगर थीं।

आज के डिप्टी सीएम सुशील मोदी जब विपक्ष में होते थे तो पटना में जल जमाव पर फूट पड़ते थे!

डीएम को आपदा राहत में लगे लोगों को पका भोजन बाँटने से भी मना करना पड़ा, क्योंकि लोग पूड़ी-सब्जी जैसी चीज़ें बाँटने में लगे थे। पका हुआ ऐसा खाना अगर बच जाए तो सीलन और गर्मी से खराब होता है जिससे पानी उतरते-उतरते डायरिया जैसी महामारी फैलने की आशंका रहती है। आपदा नियंत्रण की तैयारी में स्कूल-कॉलेज या सिविल सोसाइटी के लोगों को ये पहले क्यों नहीं बताया गया था ये भी पता नहीं।

इस जल-जमाव को लेकर अदालती मामला भी चला है। हाईकोर्ट ने 23 जून 2015 को (चार साल पहले) ही आदेश दिया था कि पटना में 24 घंटे से अधिक जल-जमाव हुआ तो नगर निगम जिम्मेदार होगा और इसे अदालत की अवमानना भी माना जाएगा। हाईकोर्ट के जिस जज, जस्टिस सुधीर सिंह ने निगम और सरकार को चौबीस घंटे में पानी निकालने का आदेश दिया था, वो भी अपने पिता को गोद में उठाकर पानी से निकालते नजर आए। उनके पिता एनपी सिंह 1991 में पटना हाईकोर्ट के एक्टिंग चीफ जस्टिस थे, उन्होंने भी जल-जमाव से निपटने के लिए कई आदेश दिए थे।

पटना के हालात पर दैनिक भास्कर में प्रकाशित रिपोर्ट

उस दौर में कोलकाता से मशीनें मँगवा कर जल-जमाव से निपटा गया था। तत्कालीन चीफ जस्टिस एल नरसिम्हा और जस्टिस सुधीर सिंह की पीठ ने ये 2015 का आदेश 2012 में हुए जल-जमाव के खिलाफ दायर हुए पीआईएल के मामले में दिया था। यानी पिछले दस साल में ही ऐसा कई बार हो चुका है।

सिर्फ आपदा की बात करें तो बिहार में आपदा नियंत्रण के लिए लोगों को लगातार जागरूक किया जाना जरूरी होता है। यहाँ बाढ़ और भूकम्प जैसी दो आपदाएँ कभी भी आ सकती हैं। हाल के दो-चार वर्षों में हमने इनका प्रकोप देखा भी है। ऐसी स्थिति में आपदा प्रबंधन के लिए स्वयंसेवक जुटाने, लोगों के खाना-दवाइयाँ वितरित करने, आपदा से बचाव और सुरक्षा के प्रति लोगों की जानकारी आमतौर पर समसेवी संगठनों के जरिए बढ़ाई जाती है।

जागरूकता फैलाने का काम बिहार में काम करने वाले बड़े एनजीओ जैसे यूनिसेफ, ऑक्सफेम, आद्री, आगा खान फाउंडेशन इत्यादि का होना चाहिए था। स्थानीय युवा और नागरिक समूह जब ऐसे राहत-बचाव के कामों में जुटे दिखे तो ये सभी तथाकथित समाजसेवी संगठन पता नहीं कहाँ विलुप्त रहे। सरकारी विभागों का सीधे स्थानीय युवाओं से और उनके समूहों से कोई संपर्क रहा हो, ऐसा भी नहीं लगता।

बाकी अगर अच्छी बातें करें तो कहा जाता है कि हर बुरी स्थिति भी कई अच्छी चीजें साथ लाती है। कुछ घटनाओं में सीख छुपी होती है तो कुछ में अवसर छुपे होते हैं। उम्मीद की जा सकती है कि भूकंप, बाढ़ और जल-जमाव जैसी आपदाएँ झेलने के बाद बिहारवासी कम से कम ये सीख लेंगे कि आपदा की स्थिति में किसी और के बदले अपने आप पर भरोसा करना होगा क्योंकि जिनके भरोसे बैठे हैं उस सरकार, राजनैतिक दल, एनजीओ वगैरह में से तो कोई आता नहीं! उन्हें जीत का सेहरा अपने सर बाँधने से ही फुर्सत नहीं।

हर कश्मीरी नहीं राष्ट्र विरोधी, 200 नेताओंं की नजरबंदी से ही आ गई शांति: राम माधव

भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव राम माधव ने शुक्रवार (अक्टूबर 4, 2019) को तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में नेशनल यूनिटी कैंपेन को संबोधित करते हुए कहा कि लद्दाख और जम्मू-कश्मीर के लोग अनुच्छेद 370 के ज्यादातर प्रावधानों को निष्प्रभावी करने के फैसले से बाद से काफी खुश हैं। उन्होंने घाटी में हालात सामान्य होने का दावा किया। साथ ही कहा कि कश्मीर में अभी भी कुछ मुद्दे हैं जिनसे पूरी संवेदनशीलता के साथ निपटा जाएगा।

बीजेपी नेता ने राष्ट्रीय एकता अभियान को संबोधित करते हुए कहा, ”हर कश्मीरी देशद्रोही नहीं है और न ही हर अलगाववादी हैं। वे हमारे और आपके जैसे ही हैं। हमने अनुच्छेद 370 को हटा दिया, क्योंकि हम जम्मू-कश्मीर के लोगों को विकास, राजनीतिक ताकत और गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार देना चाहते थे।”

राम माधव ने कहा कि जम्मू-कश्मीर के लोग इस बात से खुश हैं कि अब वे भी देश के बाकी हिस्से में रह रहे लोगों के साथ जुड़ पाएँगे। उन्होंने कहा कि अब जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग बन गया है। अब वह देश के अन्य राज्य की तरह ही है। उन्होंने कहा कि दो केंद्र शासित प्रदेश बनाए गए हैं। लद्दाख के लोग भी बहुत खुश हैं, क्योंकि वो इसकी माँग काफी लंबे समय से कर रहे थे।

इसके साथ ही राम माधव ने अनुच्छेद 370 को पिछले 70 सालों का कैंसर करार देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे महज 70 घंटे में हटा दिया। उन्होंने कहा कि जो क्षेत्र महीनों तक कानून- व्यवस्था की समस्या में उलझा रहता था, वह अब करीब 200 नेताओं को नजरबंद रखे जाने के बाद शांतिपूर्ण हो गया है। पिछले दो महीनों में सुरक्षाबलों की चौकसी के चलते एक भी नागरिक की मौत नहीं हुई है।

राम माधव ने कहा कि यह दुष्प्रचार है कि जम्मू-कश्मीर में हजारों लोगों को गिरफ्तार किया गया है। वो 200 नेता एहतियाती तौर पर हिरासत में हैं। यह मानवाधिकार का उल्लंघन नहीं है। वे सभी पूरी सुविधाओं के साथ फाइव स्टार होटलों में हैं। यह कदम घाटी में कानून व्यवस्था बेहतर बनाए रखने के लिए उठाया गया है। 

भाजपा महासचिव ने कहा, “अब आप कल्पना कर सकते हैं कि यह कितना प्रभावी नजरबंदी है। लेकिन आप यह न समझें कि मैं कह रहा हूँ कि वे हमेशा के लिए जेल में रहेंगे। उन्हें जल्द ही रिहा कर दिया जाएगा। हम चाहते हैं कि राज्य में सामान्य राजनीतिक गतिविधि बहाल हो।”

हनी ट्रैप पर मुसीबत में कमलनाथ सरकार: 9 दिन में 3 बार बदले SIT चीफ, हाई कोर्ट ने मॉंगा जवाब

हनी ट्रैप मामले में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच ने विशेष जाँच दल (एसआईटी) के प्रमुख को बार-बार बदलने पर राज्य की कमलनाथ सरकार से जवाब माँगा है। हाई कोर्ट ने पूछा कि मामले की जाँच के लिए गठित एसआईटी के प्रमुख और सदस्यों को 10 से 11 दिन के भीतर ही क्यों बदल दिया गया।

बता दें कि हनी ट्रैप मामले की जाँच के लिए 23 सितंबर को एसआईटी का गठन किया गया था। सीआईडी के
आईजी डी. श्रीनिवास को इसका प्रमुख बनाया गया था। लेकिन, अगले ही दिन एसआईटी प्रमुख बदल दिया गया। श्रीनिवास की जगह संजीव शमी को कमान दी गई। इसके बाद 1 अक्टूबर को संजीव शमी को हटाकर राजेंद्र कुमार को एसआईटी का मुखिया बनाया गया। इस तरह विशेष जाँच दाल के गठन के 9 दिन के भीतर ही 3 बार उसके मुखिया को राज्य सरकार ने बदल दिया।

कमलनाथ सरकार के इस फैसले पर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। अब हाई कोर्ट ने राज्य सरकार के गृह विभाग के सचिव को इस पूरे मामले की जाँच रिपोर्ट और सदस्यों को बदलने का कारण लिखित में 21 अक्टूबर को पेश करने का आदेश दिया है। इस मामले पर 21 अक्टूबर को ही अगली सुनवाई होगी। साथ में कोर्ट ने यह भी तय किया कि भविष्य में इस मामले में दायर सभी याचिकाओं की सुनवाई एक साथ होगी।

ख़बर के अनुसार, हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने सरकार से यह सवाल हनी ट्रैप मामले में दायर याचिका की सुनवाई करते हुए पूछा। दिग्विजय सिंह भंडारी ने वरिष्ठ वकील डॉ. मनोहरलाल दलाल और वकील लोकेंद्र जोशी के माध्यम से याचिका दायर की है।

इस याचिका के अनुसार, हनी ट्रैप मामला जनहित से जुड़ा मामला है। सरकार जाँच में लापरवाही बरत रही है। एसआईटी का गठन तो कर दिया गया, लेकिन इसके प्रमुख को बार-बार बदला जा रहा है। अब तक तीन बार एसआईटी के प्रमुख को बदला गया है। इससे यह आशंका उत्पन्न हो रही है कि इस मामले में जाँच को प्रभावित करने का प्रयास किया जा रहा है।

याचिका में यह माँग भी की गई है कि एसआईटी को आदेश दिया जाए कि वह इस मामले में ज़ब्त मोबाइल, लैपटॉप, वीडियो, सीडी आदि की सूची कोर्ट में पेश करे, क्योंकि इनके साथ छेड़छाड़ की जा सकती है और इन्हें नष्ट करने का प्रयास भी हो सकता है। साथ ही याचिका में इस पूरे मामले की जाँच कोर्ट की निगरानी में कराने की माँग भी की गई है। यह भी कहा है कि जाँच कमेटी में प्रदेश के बाहर के किसी ऐसे अधिकारी को नियुक्त किया जाए जो डीआईजी या इससे ऊपर की रैंक का हो। इस मामले की सीबीआई जाँच की माँग भी की गई है।

जस्टिस एससी शर्मा और शैलेंद्र शुक्ला ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को नोटिस जारी करते हुए पूछा कि वो बताए आखिर किस आधार पर और किन कारणों से एसआईटी प्रमुख को बदला जा रहा है।

हिन्दी चैनलों के एंकर: लिखना नहीं आता, उदासीन, नाटकीय, यथास्थिति को स्वीकारने वाले

एक स्क्रीन है, उस पर रंग-बिरंगी आयताकार पट्टियाँ आपको विचित्र तरह की बातें ऐसे बता रही हैं, जैसे वो बातें उस क्षण में जानना अत्यावश्यक है। एक चेहरा उभरता है, वो अमूमन इस भाव को लिए हुए होता है जैसे कुछ हो गया है, और कुछ लोग जिम्मेदार हैं जिन पर जिम्मेदारी डालनी सबसे ज़रूरी काम है। वो चेहरा बहुत धीरे-धीरे, लेकिन अतिगंभीर भंगिमा के साथ, एक-एक शब्द चबाता हुआ कहता जाता है। वो कहीं रुकता भी तो है तो एक नाटकीयता के साथ।

चेहरा तीन से चार मिनट तक में डेढ़ से दो मिनट में पढ़ा जा सकने वाला स्क्रिप्ट पढ़ता है। फिर कुछ और चलते चित्र उभरते हैं, पीछे से गंभीर आवाज आपको बताती है कि हर चीज के होने के पीछे कोई साजिश है, या कुछ तो गड़बड़ चल रहा है। उसके बाद दो से ले कर बारह की संख्या तक में ‘गेस्ट’ अपने-अपने चौकोर डब्बों में अपनी उपलब्धियों के दो शब्दों में कैद हो जाते हैं और इंतजार करते हैं कि या तो वो चेहरा उनसे चिल्लाते हुए सवाल करे, या उन्हें किसी दूसरे चिल्लाते चेहरे के साथ लगा दे कि ‘ज-व्वाब दीजिए उनके स-व्वालों का’। फिर खूब शोर होता है। ऐसा चौबीस घंटे चलता है। चेहरे बदलते हैं, लोगो बदलता है, टेम्पलेट बदलता है, आवाज बदलती है, लेकिन जो हो रहा होता है, वो ऐसे ही होता है।

हर दूसरा आदमी, एक-दूसरे से यही कहता पाया जाता है कि ‘मैंने तो अब टीवी पर न्यूज देखना छोड़ दिया है।’ ये स्थिति खराब कही जानी चाहिए। लोगों को जिस सूचना तंत्र पर विश्वास था, उन्हें वहाँ से कुछ भी ऐसा नहीं मिलता कि उनके ज्ञान में वृद्धि हो सके। हम समाचार चैनल क्यों देखते हैं? आज के दौर में जब खबरें ट्विटर, या अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, या ऑनलाइन माध्यम पर ब्रेक होती हैं, तो टीवी पर एक आम आदमी क्यों जाता है?

टीवी पर न्यूज के लिए क्यों जाते हैं हम?

टीवी पर हम तब जाते हैं जब हमें किसी विषय पर ज्यादा चाहिए। हमें विश्लेषण चाहिए, विषय पर अपनी वैचारिक स्थिति को सुदृढ़ करने के लिए, जानकारी के लिए, या इसलिए भी कि कहीं चर्चा हो तो हम क्या बोलें। ये विश्लेषण हम तक कौन लाता है? सोशल मीडिया पर भी लोग लिखते हैं, लेकिन वहाँ आपको एक्टिव हो कर खोजना पड़ेगा, पढ़ना पड़ेगा। टीवी पर आपको पता है कि इस चैनल पर, ये आएँगे और बताएँगे कि क्या हुआ है।

लेकिन वास्तव में ऐसा हो नहीं रहा। हिन्दी न्यूज चैनलों की बात की जाए तो लगभग सारे चैनलों ने मान लिया है कि एक न्यूज डिबेट का फॉर्मेट वही है जो अमेरिका बीस साल पहले त्याग चुका है। उन्होंने कभी पहले के फॉर्मेट से बाहर जाने की बात सोची ही नहीं। पाँच से सात मिनट उस घंटे के न्यूज बताने में निकल जाते हैं, फिर पाँच-सात मिनट विषय की भूमिका बाँधने और अपनी समझ से चर्चा को दिशा देने की जगह ‘क्या हुआ, कब हुआ, कहाँ हुआ’ बताने में बर्बाद किए जाते हैं, फिर जो एंकर ने अभी बताया है, उसी को एक विडियो के ज़रिए बताया जाता है, फिर बाकी का काम शोरगुल में हो जाता है।

ये फॉर्मेट अब बेकार हो चुका है। न्यूज चैनलों को कुछ नया सोचना चाहिए। जब सूचनाओं के आने का, पहुँचने का, ग्रहण करने का तरीका बदल चुका है तो फिर टीवी अभी तक चालीस साल पुराने फॉर्मेट पर क्यों घूम रहा है? आखिर, दर्शकों को यह क्यों कहना पड़ रहा है कि उन्होंने टीवी पर न्यूज देखना बंद कर दिया है? वो भी उस स्वर्णिम दौर में जब व्यक्ति टीवी जेब में ले कर घूमता है।

जब दर्शक बढ़ रहे हैं, उनका जन्म बिलकुल ही अलग समय में हुआ है, तब न्यूज वाले उनके दादा की जवानी के शो क्यों चला रहे हैं? याद कीजिए कि चौबीस घंटे का न्यूज टेलीविजन जब से आया है, आपने न्यूज डिबेट में क्या बदलाव देखे हैं? आपको याद नहीं आएगा। मेरे पास कुछ समाधान और विकल्प हैं, लेकिन श्रीमान जोकर जी ने कहा है कि आप अगर किसी कार्य में अच्छे हैं, तो उसे कभी भी मुफ्त में न करें।

कारण क्या हैं?

एक कारण जो सबसे सीधा है कि हिन्दी के एंकरों का लिखना नहीं आता। वो हमेशा किसी भी विषय पर छिछले ट्रीटमेंट के साथ, अपना एक घंटा निकाल कर भागना चाहते हैं। अपने काम को अगर आप इन्ज्वॉय नहीं करते तो आप उसकी बेहतरी के लिए कदम उठाना छोड़ देते हैं। आप रिसर्च के नाम पर आँकड़े तो ले आते हैं, लेकिन उन आँकड़ों को आज को परिप्रेक्ष्य में रख नहीं पाते। आप बता नहीं पाते कि इन आँकड़ों से किसी के जीवन पर क्या असर पड़ेगा। वो महज संख्या बन कर स्क्रीन पर आते और चले जाते हैं।

जब तक एंकर एक मेकअप से पुते हुए चेहरे से आगे नहीं जाएँगे, अपनी अहमियत नहीं समझेंगे, तब तक वो एक काम को ढोते रहेंगे। लिखने के लिए जानना ज़रूरी है, अध्ययन करना आवश्यक है, परिस्थितियों के हिसाब से उसका संबंध बिठाने की क्षमता चाहिए, तब जा कर आप चार मिनट में उतना बोल देंगे जितना कोई आठ मिनट में नहीं बता सकता। लेकिन, एक फॉर्मेट बना हुआ है, एक मुद्दा पकड़ना है, कैमरे के सामने बैठना है, कॉपी-पेस्ट करके कुछ भी लिखना है, टेलिप्राम्प्टर चल पड़ता है, आप पढ़ देते हैं।

ये एंकर अपने लिखे हुए शब्दों से अनासक्ति के भाव में होते हैं। लगता है कि उन्हें मतलब ही नहीं कि वो जो पढ़ रहे हैं, उसे कितने लोग देख रहे हैं और क्यों देख रहे हैं। यहाँ दर्शक यह सोच रहा है कि वो टीवी पर है, वो ज़्यादा जानता है और हमारे एंकर हैं कि इन सब दुनियावी बातों से दूर, निर्मोही बने, शब्दों को पढ़ कर, उन्हें बोल कर, तमाम भाव अभिव्यक्त करते हुए, लेकिन भीतर से भावहीन बने, चले जाते हैं। आपके पास कुछ नहीं होता उस एक घंटे के बाद।

24 घंटे चलने की मजबूरी और मुद्दों का अभाव

अंग्रेजी में एक शब्द है: कंटेंटलेसनेस। यानी, सामग्री के अभाव की स्थिति। भारत बहुत बड़ा देश है, बहुत सी बातें होती रहती हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आप सुबह के छः बजे से रात के ग्यारह तक, हर घंटे, कुछ न कुछ उठा लेंगे और बताएँगे कि कहीं, कुछ हो रहा है। ये कोई रुचिकर बात नहीं है। किसी दिन कई बड़ी खबरें आती हैं, किसी दिन आपके लिए सबसे बड़ी खबर किसी घोड़े की टाँग टूटना हो जाता है, तो किसी दिन आप इंटरनेट पर वायरल हो रहे किसी मीम पर आधे घंटे निकाल देते हैं।

आखिर जून की गर्मी में ‘आजादपुर में गिरी बर्फ’ का स्पेशल कोई चैनल क्यों चलाता है? क्या सोचा होगा उसके प्रोड्यूसर ने? उस आवाज देने वाले ने क्या सोचा होगा जो सायकिल के करियर पर रखी बर्फ की सिल्ली के सड़क पर गिरने को ‘आजादपुर में बर्फ गिरी’ कह कर चला रहा होगा? ऐसा करना रचनात्मकता का नमूना तो है, लेकिन ऐसी क्रिएटिविटी पूरे उद्योग को हास्य का पात्र बना देती है।

अगर एंकर और उनकी टीम घंटे-दो घंटे भर की मेहनत कर लें, तो हर मुद्दे पर वो दर्शकों को काफी जानकारी दे सकते हैं। अगर मैं ये काम आराम से कर सकता हूँ, तो करोड़ों का टर्नओवर दे रहे मीडिया संस्थान संसाधन समृद्ध भी हैं, और उनके पास टीम भी होती है, वो इसे और भी बेहतर तरीके से कर सकते हैं।

लेकिन, ‘चल रहा है’, ‘ये तो काम कर ही रहा है’ वाला एटीट्यूड इस पूरे उद्योग को उसी मोड़ पर रखे हुए है, जिसे इसे बीस साल पहले मुड़ कर छोड़ देना चाहिए था। टीवी पर होने वाली चर्चाओं में बेहतरी के इतने स्कोप हैं कि अगर लोग बैठ कर थोड़ा सोचें, दर्शकों में आए बदलाव को पढ़ें, उनकी राजनैतिक जागरूकता को समझने की कोशिश करें, तो उन्हें रास्ता खुद ही दिखने लगेगा।

टीवी अपने कम्फर्ट जोन को छोड़ने को तैयार ही नहीं है। जबकि हर चैनल को, दिन के एक घंटे पूरी तरह से प्रयोगधर्मिता के लिए छोड़ देना चाहिए। उन्हें आलस्य को त्याग कर, यह सोचना चाहिए कि इस मुद्दे को कितने नज़रिए से दिखाया जा सकता है, इसके लिए किस-किस को जोड़ना सही होगा, इसे दिखाने के लिए कौन-सा माध्यम बेहतर होगा, क्या इस मुद्दे को आधे घंटे की चिल्ल-पों से अलग भी दिखाया जा सकता है?

लोग उब चुके हैं, मैं अपने धंधे में ठहराव से बोर हो गया हूँ

यूट्यूब के जमाने में अगर कोई एक व्यक्ति, दिन में एक वीडियो बना कर, बहुत कामचलाऊ एडिटिंग का सहारा ले कर, कुछ आँकड़े और तस्वीरें दिखा कर लाखों कमा रहा है, तो टीवी वालों को सोचना चाहिए कि उनके दर्शक कहाँ जा रहे हैं। इन स्वतंत्र लोगों को लाखों लोग देखते हैं, उनसे संवाद करते हैं। ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि उनका विश्वास टीवी से उठ चुका है।

जिस एकमात्र एंकर को लिखना आता है, वो उस क्षमता को एक व्यक्ति, पार्टी या विचारधारा से घृणा करने में लगाए हुए है। बाकियों को लिखना नहीं आता क्योंकि शायद वो अपने आप को महज एक चेहरा मानते हैं, जिन्हें कैमरे में देख कर नाटकीयता से पढ़ना ही बेहतर लगता है। जो स्वयं ही हीन भावना से, या हीन भावना के ही ग्लोरिफाइड रूप, सुपियोरिटी कॉम्प्लेक्स से ग्रस्त हों, उन्हें न तो सामने दिखता है, न आस-पास। वो अपने आप में भरे हुए, अपने अंदाज में चलते रहते हैं।

ऐसे लोगों से चर्चा में कुछ भी ग्राह्य प्रस्तुत करने की उम्मीद बचकानी है। ये आपको वही बताते रहेंगे, जो आप जानते हैं। इनके ‘जानकार’ स्क्रीन पर भी डब्बों में बंद रहते हैं और जब बोलते भी हैं तो शोर में उनकी बातें दब कर गायब हो जाती हैं। कुल मिला कर स्थिति बहुत खराब है एंकरों की। हिन्दी के साथ-साथ अंग्रेजी पर भी यही बातें लागू होती हैं। चिल्लाने को सफलता की एकमात्र सीढ़ी या मंत्र मान लिया गया है। कहीं एक आदमी चिल्लाता है, कहीं पूरा चैनल ही हर बात पर चिल्लाता रहता है।

ऐसे में, दो-तरफा संवाद के दौर में, संवाद की संभावना नगण्य हो जाती है। आप जब इन चैनलों को देखते हैं तो धिक्कारते हुए देखते हैं कि ये लोग टीवी पर आखिर कर क्या रहे हैं! मेरे पास विकल्प हैं, समाधान भी, लेकिन श्रीमान जोकर जी ने कहा है कि आप अगर किसी कार्य में अच्छे हैं, तो उसे कभी भी मुफ्त में न करें।

राहुल गॉंधी के खिलाफ साजिश रच रहे सोनिया के करीबी, तबाह हो जाएगी कॉन्ग्रेस: संजय निरुपम

21 अक्‍टूबर को होने वाले महाराष्‍ट्र विधानसभा चुनाव में टिकटों के बँटवारे से नाराज कॉन्ग्रेस नेता संजय निरुपम ने पार्टी के खिलाफ ‘मोर्चा’ खोल दिया है। शुक्रवार को निरुपम ने कहा कि कॉन्ग्रेस 3-4 सीटों को छोड़कर मुंबई की सभी सीटें हार जाएगी। उन्‍होंने पार्टी के भीतर षड्यंत्र का आरोप लगाते हुए कहा कि कॉन्ग्रेस के अंदर सिस्टमैटिक फॉल्ट हो गया है। अगर इससे नहीं निकले तो पार्टी जल्द ही तबाह और बर्बाद हो जाएगी।

पत्रकारों से बात करते हुए संजय निरुपम ने कहा, “जिस तरह से मुंबई में उम्‍मीदवारों का चयन किया गया, आप 3-4 सीटें छोड़ दें तो बाकी सभी पर कॉन्ग्रेस की जमानत तक जब्‍त हो जाएगी।” उन्होंने कहा कि बगैर किसी सर्वे के, बगैर किसी ग्राउंड वर्क के व्यक्तिगत पसंद और नापसंद के आधार पर उम्मीदवारों के नाम तय किए हैं। वहीं, पार्टी के लिए प्रचार नहीं करने की बात दोहराते हुए पत्रकारों से कहा, “अब मैं आपसे 24 अक्‍टूबर को नतीजों के दिन ही मिलूँगा।”

निरुपम ने आरोप लगाया है कि सोनिया गाँधी के साथ जुड़े कुछ बड़े नेता साजिश रच रहे हैं। राहुल गाँधी के खिलाफ साजिश रची जा रही है। जो लोग राहुल गाँधी के साथ जुड़े हैं, उन्हें साजिश रचकर पार्टी में अलग-थलग किया जा रहा है।

संजय निरुपम ने पार्टी के वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे पर आरोप लगाते हुए कहा, “मैंने उनसे वर्सोवा, गोरेगांव समेत 4 सीटों पर अपने उम्मीदवारों की सिफारिश की थी। मैंने दिल्ली जाकर उम्मीदवारों को उनसे मिलवाया भी लेकिन खड़गे ने किसी से बात भी नहीं की और एक भी सीट उनमें से किसी को नहीं दी गई। टिकट बँटवारा पूरी तरह से पक्षपातपूर्ण और अनुचित तरीके से की गई है।”

निरुपम ने कहा कि जिनको टिकट दिया गया है, वह 77 साल के हैं। ठीक से चल-फिर भी नहीं पाते हैं। पिछले चुनाव में वो तीसरे स्थान पर रहे थे। पार्टी ने उनसे ये भी नहीं पूछा कि चुनाव हारने के बाद उन्होंने क्या किया। उन्होंने अपना आवेदन भी अपने बेटे के माध्यम से भरा था।

गौरतलब है कि निरुपम ने गुरुवार को घोषणा की थी कि वह 21 अक्टूबर को प्रस्तावित विधानसभा चुनाव में पार्टी के लिए प्रचार नहीं करेंगे। उन्होंने कहा था कि उन्हें ‘दरकिनार’ कर दिया गया है, जबकि उन्होंने चार वर्षों तक पार्टी की मुंबई इकाई का अध्यक्ष पद संभाला था। लोकसभा चुनावों से पहले मुंबई कॉन्ग्रेस अध्यक्ष पद से हटाए गए निरुपम ने कहा कि विधानसभा चुनाव के लिए टिकटों के वितरण में उनकी राय पर विचार नहीं किया गया। उन्होंने कहा, “मुझे विधानसभा चुनाव प्रक्रिया में कोई भूमिका नहीं दी गई। मेरे लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र में ही (विधानसभा) टिकट के बँटवारे के दौरान मेरे विचारों पर ध्यान नहीं दिया गया।”

दलित कॉन्स्टेबल की मजबूरी का मौलाना जुबैर ने उठाया फायदा, ब्लैकमेल कर साल भर करता रहा यौन शोषण

उत्तर प्रदेश के बागपत में महिला हेड कॉन्स्टेबल से यौन उत्पीड़न के आरोपित मौलाना जुबैर को पुलिस ने शुक्रवार (अक्टूबर 4, 2019) को गिरफ्तार कर लिया। आरोपित बागपत के मोमिन मस्जिद में मौलाना है। उस पर बेटे को ठीक करने के बहाने करीब एक साल से महिला कॉन्सटेबल का यौन उत्पीड़न कर ब्लैकमेल करने का आरोप है।

बागपत पुलिस ने एक बयान में इस घटना की पुष्टि करते हुए बताया कि आरोपित मौलाना को गिरफ्तार कर लिया गया है और उसके खिलाफ शिकायत दर्ज कर ली गई है।

बागपत पुलिस स्टेशन में तैनात महिला हेड कॉन्स्टेबल को उसके बेटे के इलाज के बहाने मौलाना जुबैर कथित तौर पर एक साल से बलात्कार और ब्लैकमेल कर रहा था। यह भी पता चला है कि मौलवी ने पीड़िता से उसके बेटे के इलाज और घर में शांति बनाए रखने के नाम पर लाखों रुपए भी ऐंठे।

जानकारी के मुताबिक, वर्ष 2006 में अपने पति की मृत्यु के बाद बिजनौर निवासी पीड़ित महिला को आश्रित कोटे में एक कॉन्स्टेबल के रूप में नौकरी मिली, जो बाद में बागपत पुलिस स्टेशन में हेड कॉन्स्टेबल बन गईं। पिछले साल 29 जून को महिला कॉन्स्टेबल का छोटा बेटा सड़क दुर्घटना में घायल हो गया था। बेटे का कई महीनों तक आईसीयू में इलाज भी चला। बेटे की हालत में सुधार न देख महिला अं​धविश्वास के फेर में पड़ गई। वह 30 जुलाई 2018 को अपने बेटे के इलाज के लिए मोमिन मस्जिद के मौलाना जुबैर के पास पहुँची। 

मौलाना ने हेड कॉन्स्टेबल के अंधविश्वास का पूरा फायदा उठाया और पीड़िता को विश्वास दिलाया कि उसका बेटा उसके मृत पति के पास है। बेटे का इलाज करने का आश्वासन देकर मौलाना शारीरिक संबंध बनाने के लिए महिला को मजबूर करने लगा। आरोपित मौलाना, शारीरिक संबंध न बनाने पर महिला हेड कॉन्स्टेबल को उसके बेटे की मौत की चेतावनी देकर डराता-धमकाता था।

लगभग एक साल तक मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना से तंग आकर हेड कॉन्स्टेबल ने बागपत पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद मौलाना को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने मौलाना के खिलाफ आईपीसी की धारा-376 सहित संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है। इसके साथ ही मौलाना पर एससी/ एसटी एक्ट भी लागू किया गया है, क्योंकि महिला दलित समुदाय से है।

जय भीम-जय मीम की विश्वासघात और पश्चाताप की कहानी: पाक का छला, हिंदुस्तान में गुमनाम मौत मरा

बांग्ला में योगेन्द्र को अक्सर जोगेंद्र कहा जाता है। बंगाल के दलित नेता थे जोगेंद्र नाथ मंडल। आपने उनका नाम नहीं सुना होगा। आम तौर पर दल हित चिन्तक उनका नाम लेने से कतराते नजर आएँगे। आजकल जो जय भीम के साथ जय मीम जोड़ने की कवायद चल रही है, ये नाम उसकी नींव ही खोद डालता है। इसलिए इनके बारे में जानने के लिए आपको खुद ही पढ़ना पड़ेगा।

उनका जन्म ब्रिटिश बंगाल में 29 जनवरी 1904 को हुआ था। पाकिस्तान के जन्मदाताओं में से वो एक थे। सन 1940 में कलकत्ता म्युनिसिपल कॉरपोरेशन में चुने जाने के बाद से ही मुस्लिम समुदाय की उन्होंने खूब मदद की। उन्होंने बंगाल की ए.के. फज़लुल हक़ और ख्वाजा नज़ीमुद्दीन (1943-45) की सरकारों की खूब मदद की और 1946-47 के दौरान मुस्लिम लीग में भी उनका योगदान खूब था। इस वजह से जब कायदे आज़म जिन्ना को अंतरिम सरकार के लिए पाँच मंत्रियों का नाम देना था तो एक नाम उनका भी रहा।

जोगेंद्र नाथ मंडल पाकिस्तान के पहले कानून मंत्री थे। जोगेंद्र नाथ मंडल के इस पद को स्वीकारने से कॉन्ग्रेस के उस निर्णय की बराबरी हो जाती थी, जिसमें कॉन्ग्रेस ने अपनी तरफ से मौलाना अबुल कलाम आजाद को मनोनीत किया था।

आप सोचेंगे कि जोगेंद्र नाथ मंडल ने ऐसा क्या किया था कि जिन्ना ने उन्हें चुना? 3 जून 1947 की घोषणा के बाद असम के सयलहेट जिले को मतदान से ये तय करना था कि वो पाकिस्तान का हिस्सा बनेगा या भारत का। उस इलाके में हिन्दुओं और मुस्लिमों की जनसंख्या लगभग बराबर थी। चुनाव में नतीजे बराबरी के आने की संभावना थी। जिन्ना ने मंडल को वहाँ भेजा। दलितों का मत, मंडल ने पाकिस्तान के समर्थन में झुका दिया। मतों की गिनती हुई तो सयलहेट पाकिस्तान में गया। आज वो बांग्लादेश में है।

जोगेंद्र नाथ मंडल पाकिस्तान के पहले श्रम मंत्री भी थे। सन 1949 में जिन्ना ने उन्हें कॉमनवेल्थ और कश्मीर मामलों के मंत्रालय की जिम्मेदारी भी सौंप दी थी। इस 1947 से 1950 के बीच ही पाकिस्तान में हिन्दुओं पर लौमहर्षक अत्याचार होने शुरू हो चुके थे। दरअसल हिन्दुओं को कुचलना कभी रुका ही नहीं था। बलात्कार आम बात थी। हिन्दुओं की स्त्रियों को उठा ले जाना जोगेंद्र नाथ मंडल की नजरों से भी छुपा नहीं था। वो बार-बार इन पर कार्रवाई के लिए चिट्ठियाँ लिखते रहे।


जोगेंद्र नाथ मंडल

इस्लामिक हुकूमत को ना उनकी बात सुननी थी, ना उन्होंने सुनी। हिन्दुओं की हत्याएँ होती रहीं। जमीन, घर, स्त्रियाँ लूटी जाती रहीं। कुछ समय तो जोगेंद्र नाथ मंडल ने प्रयास जारी रखे। आखिर उन्हें समझ आ गया कि उन्होंने किस पर भरोसा करने की मूर्खता कर दी है। जिन्ना की मौत होते ही 1950 में जोगेंद्र नाथ मंडल भारत लौट आए। पश्चिम बंगाल के बनगांव में वो गुमनामी की जिन्दगी जीते रहे। अपने किए पर 18 साल पछताते हुए आखिर 5 अक्टूबर 1968 को उन्होंने गुमनामी में ही आखरी साँसें लीं।

अब आपको शायद ये सोचकर थोड़ा आश्चर्य हो रहा होगा कि कैसे आपने कभी इस नेता का नाम तक नहीं सुना? राजनीति में तो अच्छी खासी दिलचस्पी है ना आपकी? अपने फायदे के लिए कैसे एक समुदाय विशेष ने एक दलित का इस्तेमाल किया था उसका ये इकलौता उदाहरण भी नहीं है। बस समस्या है कि ना आपने खुद पढ़ने की कोशिश की और दल हित चिन्तक तो आपको सिर्फ एक वोट बनाना चाहते हैं! तो वो क्यों पढ़ने देते भला?

यही सिर्फ एक वोट बनकर रह जाने का अफ़सोस था जो आपने रोहित वेमुल्ला की चिट्ठी में लिखा पाया था। उनकी चिट्ठी में जो कुछ हिस्सा आप आज कटा हुआ देखते हैं वो कल कोई और लिखेगा। आप पढ़ने से इनकार करते रहेंगे, उधर मासूम अपने खून से बार-बार ऐसी चिट्ठियाँ लिखते रहेंगे। कभी सोचा है कि वो आपको जोगेंद्र नाथ मंडल का नाम क्यों नहीं बताते? कभी सोचा है कि वो आपको पढ़ने क्यों नहीं कहते? कभी सोचा है कि उन्होंने आपको चार किताबों का नाम बताकर खुद पढ़कर आने को क्यों नहीं कहा? वो खुद को आंबेडकरवादी कहते हैं ना? आंबेडकर और फुले दम्पति तो जिन्दगी भर शिक्षा के लिए संघर्ष करते रहे! फिर ये क्यों आपको किताबों से दूर करते हैं?

ऐसा वो इसलिए करते हैं क्योंकि पढ़ने के बाद आप सिर्फ एक वोट नहीं रह जाएँगे। पढ़ने के बाद आप दर्ज़नों तीखे सवाल हो जाएँगे। पढ़ने पर आप देखेंगे कि आंबेडकर खुद क्या कहते थे।

बाकी किसी विदेशी फण्ड पर पलने वाले की पूँछ पकड़ कर चलना है, या खुद से दलित चिंतन करना है, ये फैसला तो आपको खुद ही करना होगा।

ये फैसला भी आपको खुद ही करना होगा कि संसद में ‘जय भीम जय मीम’ का नारा लगा कर ओवैसी ने कोई इतिहास नहीं रचा है। और यह समझना भी होगा कि जिस जोगेंद्र नाथ मंडल ने इस तर्ज पर इतिहास रचा था, खुद उनका और उनके प्रयास का हश्र क्या हुआ। यह भी समझना होगा कि जोगेंद्र नाथ मंडल तो नेता थे, मंत्री थे, परिस्थितियाँ विपरीत हुईं तो गुमनामी में सही लेकिन वापस भारत आ गए, लेकिन उनका क्या जो मंडल जी के आह्वान पर मात्र एक वोट बनकर पाकिस्तानी हुए और अब बांग्लादेशी होकर भी कैसी जिंदगी जी रहे होंगे, यह सोचने के लिए किसी दिव्य-दृष्टि की जरूरत नहीं।

इमरान के झूठ के साथी बने पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी, पकड़े गए तो त्यौरियाँ चढ़ाने लगे

जब एक पाकिस्तानी पत्रकार ने पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी से उन “58” देशों की सूची माँग ली, जिन्होंने पाकिस्तान के अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में हिंदुस्तान के खिलाफ प्रस्ताव के समर्थन का कथित वादा किया था, तो कुरैशी को गुस्सा आ गया। पाकिस्तानी चैनल एक्सप्रेस न्यूज़ के होस्ट जावेद चौधरी कुरैशी का इंटरव्यू ले रहे थे, जब यह वाकया हुआ। कुरैशी लगातार इमरान खान के उस झूठ का समर्थन करते जा रहे थे, जिसमें इमरान ने मानवाधिकार आयोग में “58 देशों” का समर्थन पा लेने का दावा किया था।

https://youtu.be/vBUZE3C_c64

किसके एजेंडे पर काम कर रहे हो?

“किसके एजेंडे पर काम कर रहे हो?” जब कुरैशी को कोई जवाब नहीं सूझा तो वे जावेद चौधरी पर ही बिफ़रने लगे। “अब आप मुझे बताएँगे या तय करेंगे कि कौन-से देश ने UN में पाकिस्तान का समर्थन किया है या नहीं? जो लिखना है लिख दो।” झल्लाए हुए कुरैशी का यह जवाब था।

जब कुरैशी से चौधरी ने इमरान खान के दावे का समर्थन अपने खुद के ट्विटर हैंडल से करने के बारे में पूछा, तो चौधरी का आपा ही खो गया। “नहीं! नहीं! दिखाइए मुझे जो ट्वीट मैंने लिखा था। वो मत दिखाइए जो प्रधानमंत्री ने लिखा था। आपने कहा मेरे ट्वीट। दिखाइए मुझे। मुझे मेरा ट्वीट चाहिए।” कुरैशी न केवल ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगे, बल्कि उन्होंने जावेद चौधरी पर “एजेंडा चलाने” का आरोप भी मढ़ दिया।

ट्वीट दिखाने पर भी “इसमें गलत क्या है?”

यहाँ तक कि जब चौधरी को उनका वह ट्वीट दिखा दिया गया, जिसमें उन्होंने “50 से अधिक देशों” के UNHRC में पाकिस्तान के समर्थन का दावा किया था, तो भी उन्हें समझ नहीं आया कि उसमें गलत क्या है। “मैंने जो कहा, उस पर मैं कायम हूँ। इसमें इतनी हैरत की क्या बात है? आप किसका एजेंडा चला रहे हो?” गौरतलब है कि UNHRC में सदस्यों की संख्या ही महज़ 47 है, जबकि कुरैशी और उनके बॉस इमरान खान “50 से अधिक”/”58” देशों के समर्थन का दावा कर रहे थे।