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…अल्लाह का सम्मान नहीं किया तो भारत के टुकड़े-टुकड़े हो जाएँगे: सुप्रीम कोर्ट से मुस्लिम पक्षकार

राम मंदिर मामले में सुप्रीम कोर्ट में आज मुस्लिम पक्षकार राजीव धवन ने अपनी दलीलें पेश की। जन्मस्थान को ‘न्यायिक व्यक्ति’ माने जाने पर धवन ने आपत्ति जताई। उन्होंने कहा विवाद ही इस बात को लेकर है कि राम का जन्मस्थान कहाँ है?

सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से पेश धवन ने दलील दी “हम राम का सम्मान करते हैं, जन्मस्थान का भी सम्मान करते हैं। इस देश में अगर राम और अल्लाह का सम्मान नहीं होगा तो देश खत्म हो जाएगा।” उन्होंने कहा कि अगर मान भी लिया जाए राम का जन्म वहाँ हुआ था, तो भी जन्मस्थान के रूप में उतने बड़े क्षेत्र पर दावा ठोकना एक निहायत ही कमज़ोर दलील है। धवन ने हिन्दू पक्ष की उस दलील पर आपत्ति जताई, जिसमें कहा गया था कि विवादित स्थल के सारे ढाँचों को ध्वस्त कर एक भव्य मंदिर का निर्माण होना चाहिए।

धवन ने कहा कि हिन्दू पक्ष सिर्फ़ यहाँ राम का जन्म होने की बात करते हैं, लेकिन उनकी अर्जी में कहीं भी उस क्षेत्र की बाउंड्री का जिक्र नहीं है। पूरी विवादित जमीन जन्मस्थान नहीं हो सकती। कुछ तो निश्चित स्थान होगा। पूरा क्षेत्र जन्मस्थान नहीं हो सकता।

धवन ने राम के साथ अल्लाह का भी नाम लिया। उन्होंने कहा:

“इसमें कोई शक नहीं है कि राम का सम्मान किया जाना चाहिए। अगर राम और अल्लाह का सम्मान नहीं किया गया तो भारत जैसा विविधताओं से भरा देश अलग-थलग हो जाएगा। हिन्दू पक्ष ने यह दिखाया है कि जन्मस्थान को लेकर आस्था है, लेकिन उन्होंने यह नहीं साबित किया है कि यहाँ पूजा होती थी। हाँ, ये कहा जा सकता है कि चबूतरे पर प्रार्थना होती थी लेकिन पूरे क्षेत्र के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता। 1949 तक तो भीतरी क्षेत्र में एक प्रतिमा तक नहीं थी।”

धवन ने बाबरी मस्जिद को लेकर कहा कि वहाँ हमेशा से नमाज़ पढ़ी जाती रही है। उन्होंने दावा किया कि मस्जिद कभी भी वीरान नहीं पड़ा। अर्थात, इतिहास में किसी भी समय मस्जिद सुनसान नहीं रहा। राजीव धवन ने दावा किया कि ज्यादा से ज्यादा यह हुआ होगा कि कुछ दिनों तक मस्जिद का प्रयोग किसी ने नहीं किया गया होगा। धवन ने कहा कि जो भी शासक रहा हो और उसने धर्म या क़ुरान में से किसी का भी उल्लंघन किया हो, फ़ैसला संविधान के अनुरूप ही होना है।

राम मंदिर मामले में सुप्रीम कोर्ट पहले ही कह चुका है कि 18 अक्टूबर तक सुनवाई पूरी हो जाने की उम्मीद है, ताकि कोर्ट को फ़ैसला लिखने के लिए पर्याप्त समय मिल सके। सुब्रह्मण्यम स्वामी सहित तमाम विशेषज्ञों ने अनुमान लगाया है कि 17 नवम्बर से पहले इस मामले में निर्णय आ जाएगा।

हॉस्टल में मृत मिली हिंदू मेडिकल छात्रा की ‘हत्या’ की न्यायिक जॉंच नहीं कराएगा पाकिस्तान

अपने हॉस्टल के कमरे में मृत मिली मेडिकल छात्रा नमृता चंदानी को इंसाफ दिलाने के लिए पाकिस्तान गंभीर नहीं है। एक पाकिस्तानी अदालत ने इस मामले की न्यायिक जॉंच की इजाजत देने से इनकार कर दिया है। प्रशासन पहले से ही इस मामले को आत्महत्या बता रफा-दफा करने की कोशिश में लगा है।

पाकिस्तान के लरकाना जिले के सत्र न्यायाधीश ने मृतका की मौत पर न्यायिक जाँच कराने से इनकार कर दिया है। नमृता सिंध के घोटकी शहर से थी, जहाँ हाल ही में एक हिंदू मंदिर में तोड़फोड़ की गई थी। उसका शव 17 सितंबर को हॉस्टल के कमरे में चारपाई पर संदिग्ध हालत में मिली थी। कमरा अंदर से बंद था और गले में रस्सी बंधी थी।

सिंध पुलिस ने 20 सितंबर को इस मामले में 2 लोगों को गिरफ्तार किया था। इनकी पहचान उसके सहपाठी अली शान मेमन और मेहरान अब्रो के तौर पर की गई थी। इनमें से एक नमृता का क्रेडिट कार्ड भी इस्तेमाल करता था।

ऐसा माना जा रहा है कि धर्मपरिवर्तन से इनकार करने पर नमृता की हत्या की गई थी। नमृता के भाई विशाल जो खुद मेडिकल कंसलटेंट हैं शुरुआत से इसे हत्या बता रहे हैं। उन्होंने नमृता की गर्दन पर तार के निशान देखने की बात कही थी। ऐसे ही निशान उसके हाथ पर थे। लेकिन नमृता की दोस्त का दावा है कि उसके गले में दुपट्टा बॅंधा था।

लेकिन, फिर भी स्थानीय पुलिस और प्रशासन इसे आत्महत्या साबित करने की कोशिश करता रहा। जबकि, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कहा गया था कि ‘गला घोंटने के साफ निशान दिखाई देते हैं।’ ऐसे में मामले की न्यायिक जॉंच की मॉंग अदालत द्वारा ठुकराए जाने से समझा जा सकता है कि पाकिस्तान की पूरी मशीनरी अल्पसंख्यकों को लेकर कितनी गंभीर है।

3 बीवी-15 बच्चे: जिले का सबसे बड़ा परिवार फिर भी मोहम्मद शरीफ को चाहिए और औलादें

देश में बढ़ती जनसंख्या जहाँ एक ओर चिंता का गंभीर विषय बना हुआ है, वहीं एक शख़्स ऐसा भी है जो 15 बच्चों का अब्बू होने के बावजूद संतुष्ट नहीं है। उत्तर प्रदेश में लखीमपुर के बौधियान कलां गाँव का रहने वाला मोहम्मद शरीफ़ का कहना है कि तीन बीवियों और 15 बच्चों का उसका परिवार इस ज़िले का सबसे बड़ा परिवार है। इस गाँव की कुल आबादी 6,000 है।

शरीफ ने बताया कि 1987 में जब जट्ट बेगम से उसका पहला निक़ाह हुआ तो उस वक़्त उसकी उम्र 14 साल की थी। पहली बीवी से उसके तीन बेटे और पाँच बेटियाँ हैं। शरीफ़ ने बताया कि नूर से मुलाक़ात होने के बाद नब्बे के दशक में उसने दूसरा निक़ाह किया। उससे चार बेटियाँ और एक बेटा है। इसके बाद 2000 में, शरीफ़ ने तरन्नुम बेगम (नेपाली) से तीसरा निक़ाह किया। उससे उसे एक बेटा और एक बेटी है।

दिलचस्प बात यह है कि खुद शरीफ़ को अपने सभी बच्चों के नाम याद नहीं रहते। उसने बताया कि हर शाम घर पहुँच कर वह बच्चों के सिर गिनता है, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि सभी बच्चे घर पर मौजूद हैं। शरीफ़ का सबसे बड़ा बेटा 24 साल का है और सबसे छोटी बेटी 2 साल की है।

मोहम्मद शरीफ़ का कहना है कि उसे बहुत प्यार करने वाला परिवार मिला है, जहाँ सभी एक साथ रहते हैं। यहाँ तक ​​कि उसकी तीनों बीवियाँ भी साथ रहती हैं। शरीफ़ ने बताया कि वो कभी ऐसी स्थिति नहीं आने देता जिससे परिवार में बीवियों और बच्चों के बीच किसी तरह की बहस या विवाद उत्पन्न हो जाए।

पेशे से किसान मोहम्मद शरीफ को इस बात पर पूरा भरोसा जताया कि अगर अल्लाह ने हमें धरती पर भेजा है, तो वह सुनिश्चित करता है कि कोई भी खाली पेट न सोए। शरीफ़ ने बताया कि उसे अक्सर मज़दूरी के बदले अनाज मिलता है और इससे परिवार का गुज़ारा चलता है।

हाल ही में शरीफ़ ने अपनी तीन बीवियों के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत तीन आवासों के लिए आवेदन किया है। शरीफ परिवार नियोजन कार्यक्रमों से अनजान हैं और ज़ोर देकर कहता है कि बच्चे अल्लाह का उपहार हैं। उसने बताया कि अगर अल्लाह उसके परिवार को और औलाद दे तो उसे और ख़ुशी होगी।

आतंक का एक मजहब है: एक ने स्वीकारा, आप भी स्वीकारिए

‘हाउडी मोदी’ कार्यक्रम के दौरान बहुत सी चीजें कही गईं, दिखीं और दिखाई गईं। मोदी के लिए एक भीड़ आई थी, जिसे कुछ कुख्यात पत्रकार रोहिंग्या और बांग्लादेशी भीड़ सदृश बताते हुए लेख लिखते पाए गए। फर्क बस यही है कि ऐसे पत्रकार अब इतना नीचे गिर चुके हैं कि इनके लिए राह चलते थूकना और सड़क पर छुरा मारना, एक ही अपराध है जो कि इन्होंने पहले भी बताया है कि ‘जय श्री राम’ कहलवाने पर किसी को मजबूर करना ‘हिन्दू आतंकवाद’ है, जबकि इस्लामी आतंक तो आज तक आ ही नहीं सका भारत में।

खैर, ट्रम्प न तो एनडीटीवी के स्टूडियो में काम करता है, न ही उसे इस बात से फर्क पड़ता है कि आतंकवाद के साथ समुदाय विशेष को जोड़ने पर उसे लिबरल या वामपंथी लॉबी क्या कहेगी। अमेरिकी टॉक शो को मसाला भले ही मिल जाएगा, वो उसे रेसिस्ट और कम्यूनल भले ही कह देंगे, लेकिन उससे यह सच्चाई जो है, वो नहीं बदल सकती कि आईसिस के झंडे पर ‘अल्लाहु अकबर’ लिखा हुआ है और पूरा विश्व कट्टरपंथियों द्वारा फैलाए जा रहे आतंक से जल रहा है।

इसलिए, लिबरलों के स्थानविशेष से धुँआ और आग भले ही निकल रहा हो, लेकिन वो सिवाय चार स्वनिर्मित वाक्यांशों के, जो बहुत मीठे शब्दों में भी शुतुर्मुर्ग की गर्दन रेत में होने जैसा से लेकर ‘हेड इन आस’ के लक्षण ही हैं, कि ‘आतंक का कोई मजहब नहीं होता’, ‘हम ऐसा करके इस्लामोफोबिया फैला रहे हैं’, ‘ऐसा करने से हम एक समुदाय को अलग-थलग ढकेल रहे हैं’, और कुछ कह भी नहीं सकते।

आप इन वाक्यांशों पर गौर कीजिए कि ये आखिर कहना क्या चाहते हैं? आतंक का कोई मजहब नहीं होता? सच्ची? फिर इन हमलों को देखिए और बताइए कि इनकी जड़ में क्या है? क्या यहाँ इस्लामी कट्टरपंथ नहीं है जिसे पूरी दुनिया खिलाफत के नीचे चाहिए या वो आज तक पता नहीं किस हमले का बदला पूरे विश्व के बड़े शहरों में निर्दोषों को मार कर लेते हैं?

इन्हीं आतंकियों ने बेल्जियम से लेकर फ़्रांस तक, मैड्रिड, बार्सीलोना, मैन्चेस्टर, लंदन, ग्लासगो, मिलान, स्टॉकहोम, फ़्रैंकफ़र्ट एयरपोर्ट, दिजों, कोपेनहेगन, बर्लिन, मरसाई, हनोवर, सेंट पीटर्सबर्ग, हैमबर्ग, तुर्कु, कारकासोन, लीज, एम्सटर्डम, अतातुर्क एयरपोर्ट, ब्रुसेल्स, नीस, पेरिस में या तो बम धमाके किए या लोन वूल्फ अटैक्स के ज़रिए ट्रकों और कारों से लोगों को रौंद दिया। हर बार आईसिस या कोई इस्लामी संगठन इसकी ज़िम्मेदारी लेता रहा और यूरोप का हर राष्ट्र अपनी निंदा में ‘इस्लामोफोबिक’ कहलाने से बचने के लिए इसे सिर्फ आतंकी वारदात कहता रहा।

पिछले पाँच सालों में यूरोप में 20 से ज़्यादा बड़े आतंकी हमले

पिछले पाँच सालों में यूरोप में 20 से ज़्यादा बड़े आतंकी हमले हुए हैं, जिसमें महज़ 18 महीने में 8 हमले सिर्फ फ़्रान्स में हुए। इस्ताम्बुल में तीन बार बम विस्फोट और शूटिंग्स हुईं। बेल्जियम, जर्मनी, रूस और स्पेन इनके निशाने पर रहे। यूरोपोल द्वारा 2017 में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार आईसिस ने यूरोप में आतंकी हमलों के लिए वहाँ शरण पाने वाले कट्टरपंथियों की मदद ली। स्वीडन की न्यूज एजेंसी टिडनिन्गारनास टेलिग्रामबायरा के अनुसार पश्चिमी यूरोप में हुए 37 हमलों में दो तिहाई हमलावर (68 में से 44) घृणा फैलाने वाले लोगों के प्रभाव में आकर हमला करने को तैयार हुए। उनका रेडिकलाइजेशन ऑनलाइन नहीं था, बल्कि उन्हें निजी तौर पर मिलने के बाद ऐसा करने को कहा गया, और वो तैयार हुए।

फिर भी इसे हम इस्लामी कट्टरपंथी आतंकवाद न कह कर सिर्फ आतंकवाद कहते रहेंगे। आखिर आतंकवाद के पहले के दो शब्द क्यों जरूरी हैं? इसके लिए हमें यह समझना होगा कि किसी भी चीज का सामान्यीकरण कैसे होता है। पहले कच्ची सड़कें होती थीं, तो पक्की सड़क को हम पक्की सड़क कहते थे। फिर वो इतनी आम हो गई कि सड़क का मतलब ही पक्की सड़क हो गया, जो कि सपाट हो, बिना तोड़-फोड़ के। कई चीजों को हम ‘सरकारी’ जब कहते हैं तो हम उसे यह जताने के लिए कहते हैं कि वो बेकार हालत में होगी।

जैसे कि बिहार सरकार मर्सीडीज की बसें भी चलाती है, लेकिन जब कोई आपको कहे कि सरकारी बस से चलेंगे तो आपकी रूह काँप जाएगी। ऐसा इसलिए हुआ कि शुरु में अच्छी रही सेवाएँ, कालांतर में बुरी होती गईं और उसके पहले एक विशेषण लगा क्योंकि अधिकांशतः उसकी हालत, या उसका अर्थ उसी संदर्भ में रहा जिसके लिए हम उसे सामान्य रूप में बोलते हैं। सरकारी बस बेकार ही होगी, सरकारी अस्पताल बेकार होंगे… जबकि अपवाद स्वरूप आपको दोनों ही सेवाओं में बेहतर उदाहरण मिलेंगे। जैसे कि एम्स या बिहार की मर्सीडीज बसें।

इसी तरह, जब आतंकवाद के पीछे, लगभग हर बार, एक ही मजहबी परचम हो, एक ही नारा हो, और एक ही तरह के लोग हों, जो एक ही मजहब के नाम पर ऐसा करते हों तो फिर आपका उसे सिर्फ आतंकवाद कहना समस्या को बदतर ही बनाता है। किसी भी रोग को दूर करने के लिए पहले उसके कारणों को पहचानना जरूरी है। जैसे कि मधुमेह है, और आप मीठा ज्यादा खाते हैं, लेकिन आपका डॉक्टर यह कहे कि इन्हें एक रोग है, हम इलाज करेंगे। रोग का कारण मीठा है, और आप उसे पूरी तरह से छोड़ते हुए, निकल लेंगे, तो उसका इलाज नहीं हो पाएगा। रोगी को भी नहीं पता कि मीठा खाने से हो रहा है, घरवालों को भी नहीं पता, तो फिर उसके भोजन में रसगुल्ले देते रहिए और सोचते रहिए कि डॉक्टर की दवाई काम करती रहेगी।

मजहबी आतंकवाद के साथ यही हो रहा है। जब तक कट्टरपंथी शिक्षा, बच्चों और किशोरों के जेहन में एक मज़हबी सर्वश्रेष्ठता का झूठा दम्भ, हर गैर-मजहबी व्यक्ति को दुश्मन मानने की जिद, मजहब के नाम पर कत्लेआम को जन्नत जाने का मार्ग बताना और इस तरह की बेहूदगी बंद नहीं की जाएगी तो दुनिया जलती रहेगी। क्योंकि यहाँ एक कश्मीरी आतंकी मरता है तो उसका बाप शोक नहीं मनाता, वो हार्डवायर्ड है अपने मजहबी शिक्षा के कारण, उसका दिमाग रिपेयर होने के परे है, वो कहता है कि और बच्चे होते तो उन्हें भी कुर्बान कर देता।

ऐसी सोच पर आप कैसे लगाम लगाएँगे? यहाँ बच्चों के मरने की, आतंकी होने की ग्लानि कैसे होगी इस बाप को जिसने ताउम्र यही तालीम ली है कि धरती समुदाय विशेष की है और इसके हर समर्थक को पाँच काफिर ढूँढ कर उसे मजहबी बनाना ही उसका परम कर्तव्य है। वो आखिर क्यों नहीं कैमरे पर बोलेगा का कि मजहब की राह में और भी बच्चे कुर्बान कर दूँगा!

क्या मैं बिगट हूँ, कम्यूनल हूँ या तुमने अपनी मुंडी स्थानविशेष में घुसा ली है?

ये मैंने बहुत सुना है और मुझे इससे फर्क नहीं पड़ता क्योंकि सामने वाले मुझे बस इन्हीं शब्दों से ही घेर सकते हैं, इन शब्दों के बाद इनके पास, अपनी ही बात को संदर्भ सहित समझाने के लिए एक अक्षर तक नहीं मिलेगा। इन्होंने आतंक को हिन्दुओं से जोड़ने की पुरजोर कोशिश की। कोर्ट में मामले लंबित हैं, लेकिन इनके गिरोह ने अपनी ही सरकार में, अपनी ही पुलिस के साथ, कुछ हिन्दुओं पर आरोप लगाया और आरोप लगाने के साथ ही ऐलान कर दिया कि ये ‘हिन्दू आतंक’ है।

कोर्ट तो अपना काम खैर करती रहेगी, लेकिन क्या हमारे पास इतनी घटनाएँ हैं आतंक की, इसी देश में, जो मजहबी आतंक की भयावहता के समकक्ष हो, गिनती में उसके लाखवें हिस्से जितना भी हो कि हिन्दुओं का नाम आतंक से जोड़ दिया जाए? फिर, गैंग नए नैरेटिव पर उतर आता है। आतंक की परिभाषा में अब किसी समुदाय विशेष को थप्पड़ मारना, उससे ‘जय श्री राम’ कहलवाना भी आ जाता है और यह गिरोह गँड़थैय्यो नाच करने लगता है।

गिरोह चिल्लाने लगता है कि अगर ये आतंक नहीं तो और क्या है! जबकि आप इन चांडालों को, इन पतित पत्रकारों को, इन बरसाती सेलिब्रिटीज़ को, इन दोगले वामपंथियों को, इन पापी लिबरलों को, आप बेखौफ बता सकते हैं कि आतंक क्या है: आतंक है कट्टरपंथियों द्वारा कश्मीर में ली गई 42,000 जानें और निर्वासित हुए लाखों कश्मीरी पंडित; आतंक है संकटमोचन मंदिर में फटा बम; आतंक है सरोजिनी नगर मार्केट का ब्लास्ट; आतंक है मुंबई लोकल ट्रेनों में हुए कई धमाके; आतंक मुंबई शहर में 2008 में विकराल रूप लेकर आया था; आतंक था संसद भवन में आरडीएक्स से भरी कार लेकर घुसना और बहादुर जवानों को मार देना; आतंक था उरी, पठानकोट, पुलवामा; आतंक है कोयम्बटूर की बॉम्बिंग; आतंक है रघुनाथ मंदिर पर हमला; मुंबई के बसों पर किए गए धमाके; आतंक है अक्षरधाम मंदिर को निशाना बनाना; आतंक है दिल्ली के सीरियल ब्लास्ट्स; आतंक है 2008 में हुए 11 कट्टरपंथी आतंकियों द्वारा किए गए हमले; आतंक है जयपुर के धमाके…

गिनते-गिनते थक जाओगे और सबकी जड़ में बड़ी ईमानदारी से अपने संगठन का नाम लेता हुआ समुदाय विशेष का शांतिप्रिय मिल जाएगा कि काफिरों का यही हश्र होगा। भारत में 1970 से अब तक लगभग 20,000 मौत और 30,000 घायलों में से सबसे बड़ा प्रतिशत मजहबी आतंक के नाम दर्ज है। इसलिए, जब आतंक के नाम कोई मजहब ट्रम्प जोड़ता है तो वो भारतीय और वैश्विक, दोनों ही, परिदृश्यों में सोलह आने सच हैं।

इस्लामोफोबिया क्या है? आतंकवाद के मूल कारणों को गिनाना घृणा कैसे फैलाता है?

किसी को ‘इस्लामोफोबिया’ से ग्रस्त बताना या उसे ‘इस्लामोफोब’ कहना कहाँ तक सही है अगर वो सत्य बोल रहा हो? अगर भारत में 2018 से अभी तक बीफ माफिया ने बीस लोगों को मार दिया और मारने वाले हमेशा समुदाय विशेष के थे, मरने वाले हमेशा हिन्दू, और आप ये आँकड़ा रख देंगे तो क्या ये मजहब से घृणा हो गई? क्या यह एक सच्चाई नहीं है कि अपराधी हर धर्म और मजहब में होते हैं? अगर कठुआ की बच्ची का बलात्कार करने वाले आठ लोग हिन्दू थे, तब तो सारे हिन्दू, पूरा हिन्दू धर्म और ‘हिन्दुस्तान’ ही कटघरे में खड़ा कर दिया गया था, जबकि दसियों मौलवियों द्वारा, मस्जिदों और घरों के अंदर बच्चियों का यौन शोषण और बलात्कार होता रहा, तब मजहब और उनका लीडर तो बलात्कारी नहीं बताया गया?

ये कौन सा फोबिया है? और क्या हम एक दूसरे को ‘इस्लामोफोब’ और ‘हिन्दूफोब’ बता कर बाता-बाती करते रहेंगे या हम ये स्वीकारेंगे कि कई कट्टरपंथी शरीर पर बम लपेट कर, मजहबी नारा लगाते हुए बाजारों में फट रहे हैं? क्या हमने वो तमाम वीडियो नहीं देखे हैं जहाँ आदमी एक मजहबी नारा लगाता है, और लोग जान ले कर भागने लगते हैं? आखिर एक मजहबी नारे से मजहब कब अलग हुआ और उसे इन्हीं आतंकियों के कारण, इसी मजहब के मानने वालों ने भी दहशत और डर का नारा कब मान लिया, क्यों मान लिया, ये आपको नहीं पता? या आप पता करना ही नहीं चाहते?

आप हजार धमाकों का गुनाह, उस एक अपराध के बराबर कर देंगे जहाँ किसी निरीह कथित अल्पसंख्यक को ‘जय श्री राम’ बोलने पर चार लुच्चे हिन्दुओं ने मजबूर किया और उसके बाद आप दस खबरें ऐसी ले आएँगे जहाँ हर बार ‘जय श्री राम नहीं बोलने पर हिन्दुओं ने पीटा’ की हर खबर झूठी साबित होगी? क्या मैं आपको यह कहूँ कि तुम मुझे चार थप्पड़ मार लो और मैं ‘अल्लाहु अकबर’ बोल देता हूँ, और मैं तुम्हारे घर में बम फोड़ कर दस लोगों को मार दूँगा, तो आप इसे बराबर की बात मान लेंगे?

ये जो फर्जी की बातें कुछ मजहब के लोग करते हैं कि ये आतंकी ‘असली शांतिप्रिय’ नहीं है, सच्चे इस्लाम को नहीं जानते, वो हर आतंकी हमले पर स्वतः ऐसा क्यों नहीं कहते कि इस्लाम के नाम पर जो ये नवयुवक बाज़ारों में फट रहे हैं, वो मजहब का नाम खराब कर रहे हैं? क्या इन्होंने इस बात को कभी स्वीकारा है कि ये लोग एक तय तरीके से तैयार किए जाते हैं? क्या इन तथाकथित अच्छे और सच्चे ‘शंतिप्रियों’ ने सोशल मीडिया, पब्लिक जगहों पर, उसी तरह एक लाख की भीड़ जुटाई है जैसी वो कथित चोर तबरेज की मौत पर जुटाते हैं?

ऐसा नहीं होता, ऐसा नहीं दिखता कि लाखों की इस्लामी भीड़ मथुरा के भारत यादव की भीड़ हत्या पर, चौक चौराहों पर निकल आती है और कहती है कि वो इस भीड़ हत्या के खिलाफ हैं। सोशल मीडिया पर एक नजर घुमा लीजिए कि अगर हिन्दुओं ने भीड़ हत्या की तब भी हिन्दू ही उसकी भर्त्सना करता दिखता है, और समुदाय विशेष ने की तब भी हिन्दू ही। कट्टरपंथी तब ही जमा होता है जब जयपुर के पुलिस कॉन्स्टेबल की छड़ी गलती से किसी समुदाय विशेष के दम्पत्ति को छू जाती है, और एक भीड़ पुलिस स्टेशन से लेकर शहर की गाड़ियों में आग लगा देती है।

इसलिए, जब आप इस्लामोफोबिया की परिभाषा में आतंकवादी द्वारा स्वयं को घोषित तौर पर ‘शांतिप्रिय’ कहने, मजहब के नाम पर खुद को शहीद बनाने, मजहब का सबसे पाक नारा चिल्लाने वाले का नाम और मजहब बताने को ही रख देते हैं, तब तो पूरी दुनिया इस्लामोफोब है। यहाँ घाव हड्डी तक पहुँच गया है और आप कह रहे हैं कि इसे फूल कहो, सोचो कि तुम बगीचे में टहल रहे हो! नहीं, ये कैंसर है और ये शरीर को भीतर से नष्ट करता जा रहा है।

समुदाय को स्वयं समझना होगा इस समस्या को

राजनैतिक तरीकों से परे, पूरी तब्दीली तब ही आएगी जब समुदाय के भीतर से ऐसी आवाजें उठेंगी। इससे इनकार नहीं कि मजहब का हर आदमी इसे मौन सहमति नहीं देता। उसी मजहब के कई लोग हैं जो लगातार लिखते और बोलते हैं। लेकिन वो बहुत ही कम हैं। दूसरी बात यह भी है कि जिस दिन समुदाय विशेष से एक व्यक्ति मुखर होना चाहता है, उसे अपने ही समुदाय से प्रतिबंध से लेकर ब्लासफेमी जैसी चीजों से रूबरू होना पड़ता है। मजहब विशेष के ऐसे उदारवादियों को न तो वामपंथी जगह देते हैं, न उनका अपना समुदाय।

सेंसिबल लोगों को जब सामाजिक स्वीकार्यता नहीं मिलेगी, तो फिर हमारी नाली कोई दूसरा कब तक साफ करता रहेगा, और क्यों साफ करेगा? आप आतंकवाद तो छोड़िए, तीन तलाक से लेकर हलाला जैसी बातों पर अगर सुधार लाने की बात करते हैं तो समुदाय के स्वघोषित ठेकेदार आपको सामूहिक रूप से घेर लेते हैं और बताते हैं कि ये बहुत वैज्ञानिक बात है, ये मजहब का मसला है, तुम्हें इससे क्या!

अम्बेदकर ने हिन्दू समाज की कई बातों पर लगातार बोला और हिन्दुओं ने उन्हें नकारने की जगह सर पर बिठाया, स्वीकारा। आज भी उनकी बातों पर चर्चा होती है, हिन्दू ही इस चर्चा में शामिल होता है, अपने ही गाँव-समाज की कुप्रथाओं से लड़ता है। अगर आज की तारीख में अंबेदकर जैसा कोई मजहब विशेष का व्यक्ति इन बातों पर बोलना चाहेगा तो उसे कोई भी रिफॉर्मर या क्रांतिकारी नहीं कहेगा, उसके सर पर इनाम रखे जाएँगे, उसे सरे-बाजार मारा ही नहीं जाएगा बल्कि जश्न मनाया जाएगा कि मजहब के दुश्मन को रास्ते से हटा दिया गया।

ट्रम्प के शब्द हर बड़े राष्ट्राध्यक्ष को दोहराना चाहिए

चाहे वो मोदी हों, मर्कल हों, मैक्राँ हों, जॉनसन हो या कोई वैसा राष्ट्र जो यह नहीं चाहता कि उसके किसी एयरपोर्ट पर, चर्च में, सड़क पर, पार्क में, मंदिर पर या बस-ट्रेन में बम फूटे, छुरा चले, ट्रकों से लोगों को रौंदा जाए, तो सबसे पहला काम तो वो यह करें कि एक स्वर में इस मुसीबत को उसके पूरे नाम से स्वीकारें कि हाँ, कट्टरपंथी आतंकवाद ने इन सारे देशों में दहशत फैलाई है, जानें ली है, परिवारों को तोड़ा है।

जब तक स्वीकारोक्ति नहीं होगी, तब तक इससे लड़ने की हर योजना विफल होती रहेगी। जब तक आप इन आतंक की फैक्टरियों को निशाना नहीं बनाएँगे, मजहब की आड़ में आतंकी समूह चलाते नामों की फंडिंग नहीं रोकेंगे, आतंकियों को अपने देश के लिए, दूसरे देशों को अस्थिर करने हेतु एसेट की तरह पालना नहीं छोड़ेंगे, इन्हें बचपन से ही ऐसी शिक्षा से दूर नहीं करेंगे जो इन्हें भविष्य में सुसाइड जैकेट पहनने पर भी परेशान नहीं करता, तब तक आप लाशें गिनते रहेंगे और ये जान लीजिए कि लोन वूल्फ अटैक हो या पूरी तरह से योजनाबद्ध तरीके से किए गए हमले, वो नहीं रुकेंगे।

दाऊद इब्राहिम से शरद पवार के संबंध जगजाहिर, उनके CM रहते ही भागे थे मुंबई धमाकों के आरोपित: पूर्व रॉ अधिकारी

दाऊद इब्राहिम और उसकी डी कंपनी से कई नामचीनों के तार जुड़े होने का अंदेशा समय-समय पर लगता रहता है। अब रॉ के एक पूर्व अधिकारी ने इस संबंध में बड़ा खुलासा किया है। एनके सूद के अनुसार एनसीपी के मुखिया शरद पवार और कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गॉंधी के बेहद करीबी माने जाने वाले पार्टी सांसद अहमद पटेल के दाऊद से करीबी संबंध थे।

कॉन्ग्रेस और एनसीपी नेताओं से अपनी इसी करीबी का फायदा उठाकर अंडरवर्ल्ड डॉन देश से भाग निकलने में कामयाब रहा। उसे पकड़ कर लाने के खुफिया ऑपरेशन भी इसकी भेंट चढ़े। 1993 मुंबई ब्लास्ट के इस गुनहार को केंद्र सरकार ने हाल ही में यूएपीए कानून के तहत आतंकी घोषित किया है।

सूद ने एक साक्षात्कार में कहा कि जब दाऊद और मुंबई धमाकों के अन्य आरोपी देश से भागे, तब पवार मुख्यमंत्री थे। उनके मुताबिक धमाकों के बाद दाऊद और उसके गुर्गों के खिलाफ कानून-प्रवर्तन एजेंसियों ने सख्ती नहीं की। इस सबसे संकेत मिलते हैं कि शरद पवार और दाऊद के बीच संबंध थे। उन्होंने कहा, “यह जगजाहिर है कि शरद पवार के दाऊद इब्राहिम से संबंध थे।”

सूद ने पाकिस्तान को लेकर पवार के हालिया बयान का भी इस दौरान जिक्र किया। पवार ने हाल में पाकिस्तान को शांति प्रिय मुल्क बताते हुए कहा था कि भारत सरकार उसके खिलाफ दुष्प्रचार कर रही है। सूद ने जोर देकर कहा कि आतंकवाद के सरपरस्त मुल्क पाकिस्तान की तारीफ करने के पीछे पवार और दाऊद इब्राहिम के ही संबंध ही हैं। दाऊद के साथ उनका व्यापारिक संबंध भी रहा है।

पूर्व रॉ अधिकारी ने कहा कि बालाकोट एयरस्ट्राइक के वक्त पवार ने कहा कि हमला पाकिस्तान पर नहीं, जम्मू-कश्मीर पर हुआ है। जो शख्स कभी कॉन्ग्रेस का कद्दावर नेता रहा हो, कई महत्वपूर्ण मह​कमे सॅंभाल चुका हो और महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री रह चुका हो, उसका इस तरह बयान देना दिलचस्प है। उन्होंने कहा जब इस स्तर का नेता इस तरह के बयान देता है तो यह धारणा और मजबूत होती है कि इसके पीछे के कारण कुछ और हैं।

मुंबई में जब मार्च 1993 में 12 सिलसिलेवार धमाके हुए थे और सैकड़ों निर्दोष मारे गए थे, तब पवार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री थे। सूद ने दावा किया कि उस वक्त पवार ने 12 की बजाए एक मस्जिद सहित 13 जगह धमाके होने की बात कह लोगों की आँखों में धूल झोंका था। उनके अनुसार, शायद वे पाकिस्तान और दाऊद इब्राहिम से देश का ध्यान भटकाना चाहते थे। इसके अलावा, सूद ने कहा कि जब जाँच एजेंसियों ने सरकार से दाऊद इब्राहिम की सम्पत्तियों को ज़ब्त करने के लिए कहा, तो पवार ने यह कहकर कि यहाँ दाऊद की कोई संपत्ति नहीं है इसमें अड़ंगा डाला।

सूद ने कहा कि दाऊद को पकड़ने में मनमोहन सरकार ने भी कोई रुचि नहीं दिखाई थी। रिटायर होने के बाद अजित डोभाल को उसे दुबई में गिरफ़्तार कर देश लाने के लिए बुलाया गया था। ऑपरेशन को अंजाम देने के लिए दो अधिकारियों का चयन किया गया। जब डोभाल उन्हें हवाई अड्डे की ओर जाने वाली कार में ऑपरेशन के बारे में बता रहे थे, तो दिल्ली के डीएसपी ने उन्हें दुबई जाने और अपने ऑपरेशन को अंजाम देने से रोक दिया। इस तरह के एक महत्वपूर्ण ऑपरेशन में, एक सरकारी कर्मचारी के अंतिम मिनट के हस्तक्षेप से पता चलता है कि कॉन्ग्रेस, एनसीपी और अन्य वरिष्ठ नेता नहीं चाहते थे कि दाऊद पकड़ा जाए।

दाऊद इब्राहिम के स्वैच्छिक आत्मसमर्पण की पेशकश के बारे में सूद ने दावा किया कि शरद पवार जैसे नेता और डी-कंपनी के साथ व्यापारिक संबंध रखने वाले नेता नहीं चाहते थे कि वे भारत लौटे। इससे शरद पवार समेत उससे जुड़े नेताओं को डर था कि दाऊद ने मुँह खोला तो उनका राजनीतिक करियर चौपट हो सकता है। सूद के अनुसार शरद पवार ने सरेंडर के बदले दाऊद इब्राहिम की मामूली माँगों को भी नहीं स्वीकार किया। उसने आर्थर जेल में रखने और थर्ड डिग्री ट्रीटमेंट नहीं देने की माँग की थी।

पूर्व रॉ अधिकारी ने बताया कि कई कॉन्ग्रेस नेताओं, विशेष रूप से सोनिया गाँधी के करीबी अहमद पटेल का भी दाऊद इब्राहिम के साथ संबंध था। सूद के अनुसार कुछ प्रभावशाली लोगों जिनमें ज्यादातर राजनेता थे के दखल के कारण ही दाऊद देश से भागने में कामयाब हो पाया। उन्होंने कहा कि उस समय खाड़ी देशों में रॉ की यूनिट को जानबूझकर बर्बाद किया गया। इसमें रतन सहगल और हामिद अंसारी की भूमिका होने की बात उन्होंने कही। सहगल बाद में सीआईए का एजेंट साबित हुआ। बकौल सूद ये तथ्य संदेह पैदा करते हैं।

जम्मू-कश्मीर में वर्षों से बंद 50 हजार मंदिर खोलने की तैयारी में सरकार, जल्द होगा सर्वे: गृह राज्यमंत्री

जम्मू-कश्मीर में केंद्र सरकार सालों से बंद पड़े 50 हजार मंदिरों को खोलने की तैयारी में है। जानकारी के मुताबिक सरकार जल्द इन मंदिरों की पहचान करने के लिए सर्वेक्षण करवाने वाली है। इस खबर की पुष्टि खुद केंद्रीय गृह राज्य मंत्री जी किशन रेड्डी ने की है। उन्होंने बताया है कि जिन मंदिरों का सर्वेक्षण सरकार करवाने जा रही है, वो ऐसे मंदिर हैं, जिन्हें तोड़ा गया है या फिर उनकी मूर्तियाँ खंडित की गई हैं। इसके अलावा गृह राज्य मंत्री ने जानकारी देते हुए बताया कि मंदिरों के साथ घाटी में लंबे वक्त से बंद पड़े स्कूलों को भी दोबारा खोलने के लिए भी सर्वेक्षण कराया जा रहा है।

उन्होंने कहा, “हमने कश्मीर घाटी में बंद पड़े स्कूलों के सर्वे के लिए एक कमिटी का गठन किया है, जिन्हें दोबारा खोला जाएगा। इसके अलावा पिछले कुछ सालों में करीब 50 हजार मंदिर बंद हुए हैं, जिनमें से कुछ नष्ट हो गए थे और मूर्तियाँ टूटी हुई हैं। हमने ऐसे मंदिरों के सर्वे का भी आदेश दिया है

इस दौरान गृह राज्य मंत्री रेड्डी ने घाटी में सिनेमा खोलने के बारे में भी बात कही। उन्होंने कहा, “घाटी में पिछले 20 सालों से कोई सिनेमा नहीं खुला हुआ है, इसलिए हम एक सिनेमा खोलने की भी सोच रहे हैं। हम उन स्कूलों, सिनेमाघरों और मंदिरों का सर्वेक्षण करवाएँगे जिन्हें बंद कर दिया गया है।”

इसके अलावा उन्होंने मोदी सरकार के बारे में बताया कि मोदी सरकार कश्मीर में आतंकवाद मिटाने के लिए प्रतिबद्ध है। इसके लिए ऑपरेशन भी चलाया जा रहा है। हमारी सरकार घाटी से नफरत को जड़ से खत्म करके रहेगी।

गौरतलब है कि दशकों तक घाटी में आतंकवाद के कारण पलायन के लिए मजबूर हुए कश्मीरियों के विस्थापन के बाद कई मंदिरों को वहाँ बंद कर दिया गया था और आतंकियों ने बड़ी तादाद में कश्मीरी पंडितों का नरसंहार करने के साथ मूर्तियों को भी खंडित किया था। यहाँ मंदिरों में तोड़फोड़ हुई थी और उनके द्वार भी बंद कर दिए गए थे। इन मंदिरों में शोपियाँ के भगवान विष्णु और पहलगाम में भगवान शिव के प्राचीन मंदिर भी हैं। जिन्हें अब सरकार खोलने की तैयारी में है।

परमादरणीय रवीश कुमार, भारत का दिल छोटा नहीं, आपकी नीयत में खोट है

एनडीटीवी के पत्रकार रवीश कुमार ने ह्यूस्टन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विशाल रैली का मज़ाक बनाया है। एक फेसबुक पोस्ट में सोशल मीडिया को गाली देने वाले रवीश कुमार ने ह्यूस्टन में आयोजित ‘हाउडी मोदी’ की बात करते हुए यह दिखाना चाहा कि अमेरिका में भारत से ज्यादा लोकतंत्र है। अब रवीश से यह पूछने भला कौन जाएगा कि उनके लिए लोकतंत्र को मापने का पैमाना क्या है? लोकतंत्र में कितनी मात्रा में नमक-मिर्ची होनी चाहिए, यह तो रवीश ही बता पाएँगे क्योंकि उसी अमेरिका के राष्ट्रपति ने भारत की, मोदी की जम कर प्रशंसा की है।

रवीश कुमार अमेरिका के बारे में कहते हैं कि वहाँ इतना लोकतंत्र हैं कि आप वहाँ जाकर बस सकते हैं, वहाँ की नागरिकता ले सकते हैं और चुनाव लड़ कर सांसद भी बन सकते हैं। लेकिन, क्या रवीश प्रवासी और ‘अवैध प्रवासी’ के बीच का अंतर समझते भी हैं? आज जब अमेरिका ख़ुद अवैध प्रवासियों को निकाल बाहर करने के लिए कृतसंकल्पित दिख रहा है, रवीश अवैध प्रवासियों के बसने को लोकतंत्र मापने का पैमाना बना रहे हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ‘हाउडी मोदी’ में अवैध प्रवासियों के बारे में क्या कहा, इसे जानने से पहले एक आँकड़े पर नज़र डालिए।

रवीश कुमार ने अपने लेख में भारतीयों को कमतर बताया

संयुक्त राष्ट्र अमेरिका अवैध प्रवासियों को देश से निकाल बाहर करने में अव्वल रहा है। 2016-18 में अमेरिका ने क़रीब सवा 7 लाख अवैध आप्रवासियों को निकाल बाहर किया। 2016 में 2,40,255 आप्रवासी निकाल बाहर किए गए। वहीं 2017 और 2018 में यह आँकड़ा क्रमशः 2,26,119 और 2,56,085 रहा। अब हो सकता है कि रवीश जिस थर्मामीटर का इस्तेमाल कर के लोकतंत्र को माप रहे हों, उसमें यह आए कि डोनाल्ड ट्रम्प कम लोकतान्त्रिक हैं और ओबामा ज्यादा। अगर ऐसा है तो रवीश को बताया जाना चाहिए कि 2012 में बराक ओबामा के राष्ट्रपति रहते 4,09,849 अवैध आप्रवासियों को डिपोर्ट किया गया। इस संख्या को छूने में तो ट्रम्प प्रशासन भी नाकाम रहा है।

रवीश लिखते हैं कि अमेरिका की किसी भी संस्था में भारतीय अपनी प्रतिभा के दम पर जगह बना सकते हैं। क्या भारतीय कम्पनियाँ टॉस कर के कर्मचारियों को हायर करती हैं? दुनिया के हर लोकतान्त्रिक देश में या कहीं भी, कोई भी अपनी प्रतिभा के दम पर ही किसी कम्पनी में जाता है और आगे बढ़ता है। लेकिन नहीं, रवीश की मानें तो अमेरिका में प्रतिभा के दम पर, जबकि भारत में सिक्का उछाल कर हायरिंग होती है। रवीश के अनुसार, मातृभूमि और पुण्यभूमि का सिद्धांत ‘बोगस’ है। जिस अमेरिका का हवाला देकर रवीश भारत के लोकतंत्र को कोस रहे हैं, उसी अमेरिका के राष्ट्रपति के शब्दों पर गौर करें।

राष्ट्रपति ट्रम्प ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी भारत और भारतीयों के लिए सचमुच असाधारण कार्य कर रहे हैं। विश्व के सबसे पुराने लोकतंत्र के मुखिया ने कहा कि अमेरिका में रहने वाले भारतीय मूल के लोग कड़ी मेहनत करते हैं और वे लगातार समृद्ध, संपन्न और विकसित हो रहे हैं। उन्होंने भारत के हालिया आम चुनाव की प्रशंसा करते हुए इसे सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक चुनाव बताया। ट्रम्प के अनुसार, अमेरिका में रहने वाले 40 लाख भारतीय अद्भुत हैं और वे वहाँ की संस्कृति को समृद्ध बना रहे हैं, मान बढ़ा रहे हैं और समाज की उन्नति में योगदान दे रहे हैं।

जिस देश में भारतीय रहे रहे हैं, उस देश का मुखिया उन्हें उनकी प्रतिभा, व्यवहार और कार्यों के कारण उन्हें रखना चाहता है। जबकि, रवीश पूछते हैं कि अगर अमेरिका ने भारतीयों को निकाल दिया तो? जैसा कि ट्रम्प ने कहा, अमेरिकी-भारतीय समाज अमेरिका पर गर्व करता है। कितने रोहिंग्या हैं जो भारतीय संस्कृति को अपनाते हैं, यहाँ के विकास में योगदान देते हैं या फिर यहाँ के लोगों को नौकरी देते हैं? ट्रम्प ने कहा कि भारतीय मूल के लोगों ने अमेरिका में काफ़ी रोजगार पैदा किया है। रवीश एक रोहिंग्या मुस्लमान का नाम बता दें, जिसनें भारतीयों को रोजगार दिया हो?

अमेरिका में भारतीय किसी की कृपा से नहीं रहते हैं, रवीश आख़िर यह कब समझेंगे? जबकि, भारत में आए दिन लूटपाट से लेकर अन्य आपराधिक वारदातों में शामिल रहने वाले रोहिंग्या यहाँ अवैध तरीके से बसे हुए हैं। भारत के लोगों की तुलना बांग्लादेश और म्यांमार से आने वाले रोहिंग्याओं से करने वाले रवीश को यह मालूम होना चाहिए कि भारतीय को अमेरिका अपने संसाधन पर बोझ इसलिए नहीं बताते क्योंकि सारे भारतीय वहाँ के नियम-क़ानून का पालन करते हुए उस देश की समृद्धि के लिए कार्य करते हैं।

अमेरिका के राष्ट्रपति यह स्वीकार कर रहे हैं कि भारतीयों से उनके मुल्क को फायदा है, जबकि रवीश अमेरिका के छद्म वकील का वेश धारण कर दावा करने में लगे हुए हैं कि भारत के लोग वहाँ के संसाधनों पर बोझ हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति ने कहा कि सीमा को सुरक्षित करना दोनों ही देशों का लक्ष्य है, लेकिन रवीश उसी अमेरिका का उदाहरण देकर अप्रत्यक्ष रूप से भारत को सीख देते हैं कि भारत में विदेशी नागरिकों को अवैध तरीके बसना चाहिए, भले ही वे यहाँ आकर अपराध करें और समाज के विकास में कोई योगदान न दें।

भारत में जो सचमुच अल्पसंख्यक हैं, वे भी यहाँ उसी तरीके से रहते हैं, जैसे बाकी लोग। रवीश कहते हैं कि भारत में अगर कोई अमेरिकी आकर बस जाए तो उसे लोग शक की निगाहों से देखने लगेंगे, वो अपना व्यापार नहीं कर पाएगा। रवीश को इतिहास में जाकर पता करना चाहिए कि 7 लाख से भी अधिक लोगों को रोजगार देने वाले टाटा समूह की स्थापना किसने की थी और टाटा परिवार किस संप्रदाय से ताल्लुक रखता है? आपको बता दें कि टाटा परिवार पारसी हैं। अब रवीश बताएँ की रतन टाटा को भारत में कितने लोग शक की निगाह से देखते हैं और कौन उनके कारोबार में व्यवधान डाल रहा है? उनका लॉजिक यहीं फुस्स हो जाता है।

रवीश लिखते हैं कि भारत का आत्मविश्वास कमज़ोर है और हमारा दिल छोटा है। रवीश कुमार ने भारतीयों पर आरोप लगाया कि वह दुनिया भर में जाकर केवल खा रहे हैं लेकिन दुनिया को खिला नहीं रहे हैं। यह एक बहुत बड़ा आरोप है। क्या अमेरिका में रहने वाले भारतीय मूल के लोग अमेरिका का खा रहे हैं? यह एक अपमानजनक भाषा है। अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प के शब्दों से रवीश को करारा तमाचा लग सकता है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा कि भारतीय लोग अमेरिकी नागरिकों के जीवन की रक्षा कर रहे हैं। वे मेडिकल फील्ड में अनुसन्धान से जुड़े अभूतपूर्व कार्य कर रहे हैं और अनगिनत ज़िंदगियाँ बचा रहे हैं।

ट्रम्प कहते हैं कि भारतीय मूल के लोग अमेरिकी लोगों के जीवन रक्षक हैं, जबकि रवीश कहते हैं कि भारत के लोग अमेरिका का खा रहे हैं लेकिन बदले में खिला नहीं रहे हैं। ट्रम्प कहते हैं कि भारतीय मूल के लोगों ने हज़ारों अमेरिकी नागरिकों को रोज़गार दिया है, लेकिन रवीश पूछते हैं कि भारत के लोगों को अगर अमेरिका ने भगा दिया तो? अगर कोई व्यक्ति किसी देश में जाकर वहाँ के विकास, समृद्धि, सम्पन्नता में योगदान देते हुए वहाँ के नियम-क़ानूनों का पालन कर रहा है और वहाँ के नागरिकों की ज़िंदगी बचाने का काम कर रहा है, तो भला उसे क्यों भगाया जाएगा?

परिकल्पनाओं पर धारणा बनाने वाले वास्तविकता से दूर जा चुके रवीश कुमार को एक बार फिर से ‘हाउडी मोदी’ में डोनाल्ड ट्रम्प का भाषण सुनना चाहिए। उन्हें जवाब मिल जाएगा कि आखिर क्यों भारतीय लोग रोहिंग्या नहीं हैं, जो अवैध रूप से भारत में आकर बस जाएँ और यहाँ कोई योगदान ही न दें, उल्टा आपराधिक गतिविधियों में उनका नाम आए। रवीश आँकड़े देखें। या फिर रवीश अगर अमेरिका के बारे में उसके राष्ट्रपति और सरकार से भी ज्यादा जानते हैं तो फिर कोई बात नहीं।

370 के बाद अमित शाह ने रखा ‘एक पहचान’ का प्रस्ताव, आधार, पासपोर्ट, DL सब एक कार्ड में हो

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद अब देश में एक पहचान पत्र का प्रस्ताव दिया है। उन्होंने कहा है कि इस पहचान पत्र में पासपोर्ट, आधार, और वोटर आईडी कार्ड सब कुछ समाहित होंगे। गृह मंत्री ने अपने प्रस्ताव में बैंक अकॉउंट को भी इसी कार्ड से जोड़ देने की सलाह दी है।

गृहमंत्री अमित शाह ने साल 2021 में होने वाली जनगणना को लेकर भी एक बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि आगामी वर्ष 2021 में होने वाली जनगणना में मोबाइल ऐप का इस्तेमाल होगा। शाह ने कहा है कि इससे हमें कागज से डिजीटल जनगणना की तरफ जाने में मदद मिलेगी।

उन्होंने इस दौरान ये भी कहा कि एक ऐसा सिस्‍टम भी होना चाहिए कि यदि किसी शख्‍स की मौत हो जाए तो ऑटोमेटिक उसकी जानकारी पॉपुलेशन डाटा में अपडेट हो जाए।

उन्होंने दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम के दौरान माँग की कि हम ऐसा कार्ड चाहते हैं जो सभी की जरूरतें जैसे आधार, पासपोर्ट, बैंक अकॉउंट, ड्राइविंग लाइसेंस और वोटर आईडी की जरूरत को पूरा कर सके। जिसकी संभावनाएँ हैं।

अमित शाह ने बताया कि देश के पहले डिजिटल सेंसस पर कुल 12 हजार करोड़ रुपए का खर्च आएगा। उन्होंने कहा, “जनगणना कोई बोरिंग काम नहीं होता है। इससे सरकार को अपनी स्‍कीम लोगों के लिए लागू करने में मदद मिलती है। राष्‍ट्रीय जनसंख्‍या रजिस्‍टर (NPR) कई मुद्दों को सुलझाने में सरकार की मदद करता है। ये देश के इतिहास में पहली बार होगा, जब जनगणना का काम ऐप के जरिए होगा”

उल्लेखनीय है कि एक ओर जहाँ देश में अभी आधार की अनिवार्यता पर जनमानस में लगातार बहस चल रही है। उस बीच गृहमंत्री ने पहचान पत्र का ये प्रस्‍ताव रखा है।

किश्तवाड़ में आतंकी अहमद शेख़, निसार और आज़ाद हुसैन गिरफ़्तार, BJP नेताओं की हत्या की गुत्थी सुलझी

जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ में पुलिस ने बड़ी कार्रवाई करते हुए तीन आतंकवादियों को गिरफ़्तार किया है। इन आतंकवादियों की गिरफ़्तारी के साथ ही बीजेपी नेता चंद्रकांत शर्मा और उनके PSO की हत्या और एक अन्य बीजेपी नेता अनिल परिहार की हत्या की गुत्थी भी सुलझ गई है। गिरफ़्तार किए गए आतंकियों के पास से पुलिस ने हथियार व गोला बारूद भी बरामद किया है।

तीनों आतंकियों के बारे में पता चला है कि ये किश्तवाड़ में आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने में लगे हुए थे। आतंकियों की पहचान, निषाद अहमद शेख़, निसार और आज़ाद हुसैन के रूप में हुई है।

जम्मू क्षेत्र के आई जी मुकेश सिंह ने बताया, “पिछले एक साल में किश्तवाड़ में 4 आतंकी घटनाएँ हुईं। किश्तवाड़ पुलिस की लगातार कोशिश, सीआरपीएफ, सेना और NIA टीम की मदद से हमने ये चारो केस सुलझा लिए हैं।” इसके आगे उन्होंने बताया,

“हमने इन घटनाओं से जुड़े 3 लोगों को गिरफ़्तार किया है। ये आतंकी नेता चंद्रकांत शर्मा (बीजेपी) और उनके पीएसओ की हत्या में शामिल थे। गिरफ़्तार लोगों में से एक निसार अहमद शेख है जो बीजेपी नेता अनिल परिहार की हत्या की साज़िश में शामिल था।”

ख़बर के अनुसार, इस साल के अप्रैल महीने में बीजेपी के चंद्रकांत शर्मा और उनके पीएसओ की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। वहीं, पिछले साल 1 नवंबर को किश्तवाड़ ज़िले में बीजेपी के प्रदेश सचिव अनिल परिहार और उनके भाई की आतंकवादियों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी।

इससे पहले सांबा और कठुआ ज़िले में आतंकी हमले की आशंका के चलते हाई अलर्ट जारी किया गया था। जानकारी के अनुसार आतंकियों की ओर से सांबा और कठुआ समेत कुछ ज़िलों में दहशतगर्द बड़े आतंकी हमले को अंजाम देने के कोशिश में हैं। सुरक्षा एजेंसियों से मिली जानकारी में ख़ासतौर पर सैन्य क्षेत्रों को निशाना बनाए जाने की बात कही गई है।

सऊदी में रह रहा आतंकी अब्दुल वहाब शेख दबोचा गया, BJP नेता हरेन पांड्या की हत्या में था शामिल

साल 2003 में जिहादी गतिविधियों में शामिल मोस्ट वांटेड आतंकी अब्दुल वहाब शेख को पकड़कर गुजरात पुलिस ने एक बड़ी कामयाबी हासिल की है। जानकारी के मुताबिक जेद्दाह (सऊदी अरब) से अहमदाबाद लौटने के दौरान पुलिस ने गुप्त सूचना के आधार पर अब्दुल को हवाई अड्डे से गिरफ्तार किया। वह साल 1999 से सऊदी अरब में रह रहा था। उस पर बीजेपी और विश्व हिन्दू परिषद के नेताओं की हत्या की साजिश रचने और आतंकी गतिविधियों के लिए पैसे भेजने का आरोप है।

क्राइम ब्रांच के एसीपी बीवी गोहिल ने बताया , “गुजरात एटीएस, अहमदाबाद क्राइम ब्रांच ने आतंकी अब्दुल वहाब शेख को गिरफ्तार कर लिया है। सऊदी अरब के जेद्दाह से अहमदाबाद वापस आने पर उसे गिरफ्तार किया गया। उस पर 2003 के एक आतंकी साजिश के लिए धन मुहैया करने के आरोप हैं।”

उल्लेखनीय है कि साल 2003 में 3 नेताओं की हत्या की साजिश रची गई थी। साजिश के तहत जिन नेताओं पर हमला हुआ उनमें भाजपा नेता हरेन पांड्या एवं वीएचपी के नेता जयदीप पटेल और जगदीश पटेल का नाम शामिल थे। हरेन पांड्या की हत्या कर दी गई जबकि वीएचपी के दोनों नेता बच गए थे।

2003 के इस मामले में पुलिस ने 82 लोगों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया था। जिसमें 12 से ज्यादा आरोपित फरार थे। इनमें से कुछ भागने में विदेश कामयाब रहे थे। ऐसे में गुजरात के गृहमंत्री प्रदीप जाडेजा ने 16 साल बाद हुई गिरफ्तारी के लिए गुजरात एटीएस को बधाई दी है। उन्होंने कहा, “मैं गुजरात की आतंक निरोधी इकाई (एटीएस) को बधाई देता हूँ। आतंकी अब्दुल वहाब शेख से उसकी भूमिका पर पूरी तरह से पूछताछ की जाएगी।”