कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता सिद्धारमैया अपने बयानों को लेकर अक्सर सुर्खियों में रहते हैं। जेडीएस कार्यकर्ताओं को वेश्या बताने वाले अपने बयान पर मचे बवाल के बाद उन्होंने सफाई देते हुए कहा है कि उनका संदर्भ बीजेपी से था।
असल में, सिद्धारमैया से पूछा गया था कि राज्य में गठबंधन सरकार के गिरने के लिए जेडीएस उन्हें जिम्मेदार ठहरा रहा है। जवाब में पूर्व मुख्यमंत्री ने एक कन्नड़ के एक कहावत का इस्तेमाल किया, जिसका मतलब होता है कि जो वेश्याएँ नाच नहीं सकती वे डॉंस फ्लोर का रोना रोती हैं। एएनआई के अनुसार बाद में सफाई देते हुए उन्होंने इस बयान को बीजेपी से जोड़ दिया।
Siddaramaiah, former Karnataka CM & Congress leader on being asked about his statement, “prostitutes can’t complain about the dance floor”: I meant dancers who can’t dance, complain about the dance floor. By this, I meant the BJP, who else? pic.twitter.com/F3E3OHv1Je
गौरतलब है कि 14 महीने पुरानी कॉन्ग्रेस-जेडीएस गठबंधन सरकार इसी साल 22 जुलाई को अपने ही विधायकों की बगावत के कारण गिर गई थी। जेडीएस कार्यकर्ताओं ने सरकार गिरने का सीधा आरोप सिद्धारमैया पर लगाया था। उनका कहना था कि एसटी सोमशेखर, ब्यारथी बासवाराज, एमटीबी नागराज, के सुधाकर जैसे कॉन्ग्रेस के बागी विधायक सिद्धारमैया के इशारे पर ही काम कर रहे थे।
उन्नाव रेप मामले में एक नया मोड़ आ गया है। जानकारी के अनुसार, उन्नाव पीड़िता के चाचा के ड्राइवर पर गुरुवार (29 अगस्त) की रात को जानलेवा हमला हुआ। इसके बाद से पूरा परिवार सदमे में है।
ख़बर के अनुसार, ड्राइवर पीड़िता के चाचा के वकील से मिलकर उन्नाव कोर्ट से वापस लौट रहा था। वापसी के दौरान अचानक 5 हमलावरों ने उसकी गाड़ी रोकी और उसे डराया-धमकाया। जैसे ही वो घर पहुँचा, उसके थोड़ी ही देर बाद उस पर अचानक जानलेवा हमला किया गया।
पीड़ित ड्राइवर ने इस संदर्भ में एसपी को प्रार्थना पत्र देकर सुरक्षा की माँग की है। एसपी के निर्देश पर 3 नामज़द और 2 अज्ञात के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया गया है। फ़िलहाल, पुलिस इस हमले की गहनता से जाँच कर रही है।
ग़ौरतलब है कि उन्नाव रेप पीड़िता के चाचा पर अलग-अलग कोर्ट में 6 केस चल रहे हैं। इसी सिलसिले में शुक्रवार (30 अगस्त) को अलग-अलग न्यायालयों में पाँच मामलो की सुनवाई हुई थी। इस दौरान कड़ी सुरक्षा के बीच दिल्ली पुलिस की गाड़ी में पीड़िता के चाचा को तिहाड़ जेल से उन्नाव लाया गया था। साथ ही ख़ुफ़िया पुलिस को भी लगाया गया था। बता दें कि पीड़िता के चाचा दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद है।
Cadbury का मूल काम-धंधा क्या है? चॉकलेट बनाना-बेचना। Zomato का? खाना रेस्तराँ से उठा कर घर पहुँचाना। Gillette का काम है दाढ़ी बनाने वाले ब्लेड और रेज़र बनाना-बेचना। लेकिन पिछले कुछ महीनों में ये ब्रांड किसी बिज़नेस कारण से नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय (social justice) के पहरुए बनने या सोशल मीडिया पर दूसरों को ज्ञान बाँचने को लेकर खबरों में रहे हैं। और यह काम भी वे ढंग से करने की बजाय मूर्खता करते ही अधिक नज़र आ रहे हैं।
ताज़ातरीन मामला Cadbury का है, जिसने अपने ‘नस्लभेद-विरोधी’ unity bar को भारतीय बाजार में 15 अगस्त के मौके पर उतारा था। इसके लिए उसने ज्ञान बाँचा कि आइए उस देश का सम्मान करें जहाँ विभिन्नता में एकता है। और इसका प्रतीक बताया अपना यूनिटी बार- जिसमें ‘गोरी वाली’ (मिल्क चॉकलेट) और ‘काली वाली’ (डार्क चॉकलेट) चॉकलेट से लेकर दो और रंगों की चॉकलेट यानी “हर रंग (‘नस्ल’ पढ़ें) की चॉकलेट में एकता” है।
This Independence Day, let's celebrate a country that stands united in its diversity. Presenting the Cadbury Unity Bar, India's first chocolate with dark, blended, milk and white chocolate all under one wrap. #CadburyUnityBar#IndependenceDaypic.twitter.com/kHfHqJQlzH
इस विज्ञापन में Cadbury दो बातें करता दिख रहा है: न केवल यह कि भारत में नस्लभेदी/रंगभेदी माहौल है (वरना इस तरह के संदेश की कोई ज़रूरत क्यों थी?), बल्कि वह इतना गंभीर भी है कि इससे निबटने के लिए विदेशी कंपनियों को यहाँ के लोगों को “नस्लभेदी मत बनो” सिखाने उतरना पड़ रहा है।
पहली बात तो यह ज्ञान-बाजी ही बोगस है, क्योंकि भारत में कभी भी नस्लभेद का इतिहास रहा ही नहीं है। लाख साम्प्रदायिकता, जातिवाद, क्षेत्रवाद, भाषाई टकराव भले हों भारत में, लेकिन रंग और नस्ल के आधार पर सामाजिक भेदभाव एक ऐसी बुराई है जो बड़े-छोटे किसी भी स्तर पर भारत में पैर नहीं जमा पाई है।
जब भी इसकी कोशिश हुई, सरकारों ने इसे कुचल दिया है। याद करें कुछ साल पहले जैसे ही खबर आई कि उत्तर-पूर्व के लोगों को दिल्ली और अन्य बड़े शहरों में कुछ चिरकुट उनकी नस्ल को लेकर निशाना बना रहे हैं, तो तत्कालीन केंद्र सरकार ने कानून बनाकर उनके लिए नस्लभेदी और अपमानजनक शब्द “चिंकी” को ही पाँच साल सजा वाला अपराध बना दिया था। इसके पहले पेरियार ने उत्तर-दक्षिण भारत को विभाजित करने के लिए अंग्रेज़ों के झूठे ‘आर्य आक्रमण सिद्धांत’ को नस्ल का रूप देकर हिंदी-संस्कृत-भाषियों को तमिल-मलयालम-भाषियों से अलग नस्ल साबित कर देश के एक और विभाजन की नींव रखने की कोशिश की थी, लेकिन लोगों ने ही उनको ज्यादा भाव नहीं दिया। (गोरे रंग को लेकर भारतीयों में थोड़ा-बहुत आकर्षण ज़रूर है, लेकिन यह औपनिवेशिक हैंगओवर है जो बिना Cadbury की ज्ञान-बाजी के तेज़ी से जा रहा है। इसके अलावा हमारे पुराणों में न केवल गहरे रंग की द्रौपदी को मानव इतिहास की सबसे खूबसूरत महिला बताया गया था, बल्कि श्री कृष्ण भी काले होने के बावजूद आकर्षण का पर्याय माने गए हैं। देवी का सबसे अधिक पूजित रूप भी माँ काली का है।)
और अगर Cadbury के इसी विज्ञापन को देखें तो यह तथाकथित नस्लभेद को खत्म कर रहा है या फिर नस्लवादी स्टीरियोटाइप को बढ़ावा ही दे रहा है? इसका रैपर देखिए:
सबसे गोरी मुस्लिम महिला, और सबसे काले दक्षिण भारतीय ब्राह्मण। रेशियल स्टीरियोटाइपिंग हुई कि नहीं? क्या Cadbury के अधिकारियों ने कभी गहरे रंग की या साँवली मुस्लिम महिला नहीं देखी? और अगर ‘गोरे’ दक्षिण भारतीय ब्राह्मण कैडबरी वालों को देखने हों तो सुब्रमण्यम स्वामी या आनंद रंगनाथन को देख लें। और या फिर यह सब करने से बेहतर होगा कि कैडबरी वाले चॉकलेट बनाने पर ध्यान दें, समाज-सुधार कॉर्पोरेट जगत के Social Justice Warriors का खिलौना नहीं है।
Gillette ने गँवाए 800 करोड़ डॉलर
कॉर्पोरेट वालों को सोशल मीडिया पर Social Justice Warrior बनना या ज्ञान-बाजी करना कितना महंगा पड़ता है, किसी को यह Gillette वालों से पूछना चाहिए। “Toxic Masculinity” के वैचारिक कैंसर को बढ़ावा देने और पुरुषों को ज़लील करने के नारीवादी अंधेपन में वह भूल गया कि उसका 99% से अधिक बिज़नेस मर्दों से ही आता है। नतीजा यह हुआ कि “Toxic Masculinity” वाला वाहियात विज्ञापन YouTube पर प्रकाशित करने के बाद उसकी अभिवावक/होल्डिंग कंपनी प्रॉक्टर एंड गैम्बल को Gillette के मूल्य के आकलन में 8 अरब डॉलर की कमी करनी पड़ी। बनाने को बहाना “मर्दों ने शेव करना ही बंद कर दिया होगा” का बनाया जा सकता है, लेकिन सच्चाई हर बहाने से और साफ़ ही हो जाती है।
Zomato को हलाल-“खाने का मज़हब नहीं होता” विवाद में ठीक-ठीक कितना आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है, यह तो समय बता ही देगा, लेकिन एक ब्रांड के तौर पर उसकी छवि निश्चित रूप से खराब हुई है। यही नहीं, इसी विवाद के चलते रेस्तराँ मालिकों द्वारा किसी और मुद्दे पर की गई आलोचना को भी मीडिया और सोशल मीडिया पर और तूल मिला।
कॉर्पोरेट को यह समझना होगा कि उसके HR और एडवरटाइजिंग विभाग में सामाजिक न्याय का झंडा गाड़ कर बैठे लोग किसी मुद्दे का समाधान करने की कोशिश कर रहे लोग नहीं, प्रोफेशनल एजेन्डाबाज और राजनीतिक रूप से वामपंथी झुकाव वाले हैं। उनकी बकवास में आकर यदि कॉर्पोरेट जगत अपने मूल व्यवसाय से ज्यादा ऐसी फ़िज़ूल की गतिविधियों में ऊर्जा खपाएगा तो न ही वह किसी मुद्दे पर कुछ कर पाएगा, न ही अपना खुद का व्यवसाय बचा पाएगा। बेहतर होगा कि बिना किसी मुद्दे की गहरी समझ के और एजेंडेबाज लोगों के झाँसे में आकर, अपना समय व्यर्थ करने की बजाय बिज़नेस एग्जीक्यूटिव उसे अपने काम में ही लगाएँ।
दुनिया भर के कई अन्य देशों की तरह, ऑस्ट्रेलिया ने भी जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को निष्क्रिय करने के भारत के कदम का समर्थन किया है। ऑस्ट्रेलियाई उच्चायुक्त हरिंदर सिद्धू ने शुक्रवार (अगस्त 30, 2019) को कश्मीर पर भारत के फैसले के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए कहा कि जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त करने का भारत का निर्णय, देश का आंतरिक मामला है। उन्होंने जोर देकर कहा कि कश्मीर मुद्दे को दोनों देशों को द्विपक्षीय रूप से हल करना चाहिए।
एएनआई से बात करते हुए सिद्धू ने कहा, “भारत सरकार ने कहा कि यह उसका आंतरिक मामला है। हम इस पर भारतीय स्थिति का सम्मान करते हैं। ऑस्ट्रेलिया का कश्मीर पर लंबे समय से विचार है कि इसे भारत और पाकिस्तान द्वारा द्विपक्षीय रूप से हल किया जाना चाहिए।”
Australian High Commissioner to India Harinder Sidhu on abrogation of Article 370:Indian Govt says it’s an internal matter of India. We respect Indian position on that. Australia’s longheld view on Kashmir has been that the issue should be resolved bilaterally by India & Pakistan pic.twitter.com/ISgDNCKkma
उन्होंने उम्मीद जताई है कि इससे क्षेत्र में शाँति होगी और फिर बाद में घाटी में धीरे-धीरे आर्थिक विकास होगा। उन्होंने कहा, “हम उम्मीद करते हैं कि दोनों देश संयम से काम लेंगे और इस प्रक्रिया में लोगों की सुरक्षा का पूरा ध्यान रखेंगे।” इसके साथ ही उन्होंने उम्मीद जताई है कि दोनों देशों में स्थिति सामान्य और शांतिपूर्ण होने से आर्थिक विकास में वृद्धि होगी।
गौरतलब है कि, 5 अगस्त 2019 को केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को खत्म कर दिया थे। साथ ही जम्मू-कश्मीर को दो भागों में विभाजित कर जम्मू-कश्मीर और लद्दाख, दो केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया। इसके बाद से पाकिस्तान बौखलाया हुआ है और परमाणु युद्ध की धमकी भी दे रहा है। पाकिस्तान ने कश्मीर मुद्दे पर विश्व से मदद की गुहार लगाई और संयुक्त राष्ट्र से भी संपर्क किया। लेकिन पाकिस्तान को मुँह की खाना पड़ी। सभी ने इस मुद्दे को द्विपक्षीय करार देते हुए टिप्पणी से इनकार कर दिया।
भूमाफिया आज़म खान की मुश्किलें बढ़ती ही जा रही है। हर दिन प्राय: उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज हो रहा है। उत्तर प्रदेश पुलिस ने शनिवार (अगस्त 31, 2019) को फिर से समाजवादी पार्टी (सपा) के सांसद आज़म खान और कुछ अन्य के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है। पुलिस ने उनके खिलाफ रामपुर जिले में घर खाली करने के लिए एक परिवार को मजबूर करने को लेकर मामला दर्ज किया है।
पीड़ित ने पुलिस से की शिकायत में दावा किया है कि 15 अक्टूबर 2016 को 15 से 20 लोगों का एक समूह उसके घर में घुस गया और उसे खाली करने के लिए कहा। घर खाली न करने पर जाने से मारने की धमकी दी।
शिकायतकर्ता के मुताबिक उससे कहा गया कि यह जमीन अब आजम खान की है। यहाँ वह एक स्कूल बनाएँगे और फिर बाद में उन्होंने उनके घर पर बुलडोजर चला दिया। साथ ही पीड़ित ने उन पर 20 हजार रुपए का सामान चुराने का भी आरोप लगाया।
पीड़ित का कहना है कि उस वक़्त पुलिस ने उसकी शिकायत दर्ज करने से मना करते हुए धमकी भी दी थी। बता दें कि आज़म खान और उनके साथियों के खिलाफ आईपीसी की धारा 452, 427, 323, 504 ,506, 395 और 120 बी के तहत मामला दर्ज किया गया है।
गौरतलब है कि, हाल ही में सपा सांसद के खिलाफ ऐसा ही एक और मामला दर्ज किया गया था। उस मामले में पीड़ित ने जबरन मकान खाली कराने के साथ ही लूटपाट और मारपीट का आरोप लगाया था। रामपुर के एसपी अजयपाल शर्मा ने FIR की पुष्टि करते हुए बताया था, “कुछ लोगों के द्वारा शिक़ायत की गई थी कि पहले उनको लालच दिया गया, कहा गया कि उनको दूसरी जगह विस्थापित किया जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उनके घरों को तोड़ा गया, मारपीट की गई और सामान आदि को लूट लिया गया। प्रथम दृष्टया जाँच में ये मामले सही पाए गए हैं।”
धर्म के नाम पर बने और धर्म के नाम पर आतंकी पैदा करने वाले पाकिस्तान का अब इस्लाम से भी भरोसा डोल रहा है। जम्मू-कश्मीर पर अपना प्रोपगेंडा नहीं सुने जाने से तिलमिलाए पाकिस्तानी नेता अब अपनी सरकार पर इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) से बाहर निकलने का दबाव बनाने लगे हैं।
पाकिस्तानी सीनेट के पूर्व चेयरमैन मियॉं राजा रब्बानी ने कहा है कि ‘इस्लामिक उम्माह का बुलबुला फट गया है’ और पाकिस्तान को उम्माह के साथ रिश्तों पर फिर से विचार करना चाहिए। उन्होंने ओआईसी को संयुक्त राष्ट्र से भी वाहियात संगठन बताया।
वे सीनेट में शुक्रवार को कश्मीर मसले पर हुई चर्चा के दौरान बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि यह सही समय है जब पाकिस्तान ओआईसी से बाहर निकल जाए।
बकौल रब्बानी, जब भी पाकिस्तान या कोई अन्य मुस्लिम मुल्क मुश्किल में फॅंसा है, ओआईसी उनकी मदद करने में नाकाम रहा है। बोस्निया और फलस्तीन का हवाला देते हुए उन्होंने यह बात कही। उन्होंने कहा कि इस्लामिक दुनिया को मुनाफे से मतलब है। वे अपने आर्थिक हितों को देख फैसले लेते हैं।
इस दौरान उन्होंने सऊदी कंपनी अरमाको और रिलायंस के बीच हुए करार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मिले यूएई के सर्वोच्च सम्मान और उनके हालिया बहरीन दौरे का हवाला देते हुए कहा कि कश्मीर जैसे मसलों की बजाए मुस्लिम मुल्क अपने धंधे में व्यस्त हैं।
उल्लेखनीय है कि आर्टिकल 370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने के बाद पाकिस्तान अपना प्रोपगेंडा लेकर हर दरवाजे तक गया था। लेकिन, कहीं से उसे मदद नहीं मिल रही। दिवालिया होने के कगार पर पहुॅंचे पाकिस्तान का खर्च भी ओआईसी जैसे संगठनों से मिलने वाले खैरात पर टिका है।
साउथ इंडियन एक्टर प्रभास की फिल्म साहो की रिलीज के बाद इस पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं। इन्हीं प्रतिक्रिया देने वालों में से एक हैं Huffpost India वेबसाइट के एंटरटेनमेंट एडिटर अंकुर पाठक।
साहो फिल्म में नील नितिन मुकेश ने भी काम किया है। उन्हीं को लेकर साहो फिल्म पर अपनी राय देते हुए अंकुर पाठक ने लिखा- “ये 2019 है, और फिल्म प्रोड्यूसर्स अभी भी नील नितिन मुकेश को फिल्मों में एक्टिंग करने के लिए पेमेंट दे रहे हैं? मुझे जवाब चाहिए।”
It’s 2019 and producers are still paying Neil Nitin Mukesh to act in movies? I need answers #Saaho
अंकुर पाठक के इस ट्वीट पर कई लोगों ने अपनी प्रतिक्रियाएँ दी हैं, जिनमें से एक हैं वजीर फिल्म के डायरेक्टर बिजॉय नाम्बियार। उन्होंने अंकुर को जवाब देते हुए लिखा- “तुम उस पर (नील नितिन मुकेश) उसके फिल्मों के चयन के लिए सवाल कर सकते हो, उसकी परफॉर्मेंस पर सवाल कर सकते हो, लेकिन जब तुम इस तरह से सिर्फ खुद को चतुर साबित करने के लिए ट्वीट करते हो तब सिर्फ यही साबित होता है कि तुम कितने ‘हल्के’ आदमी हो।”
इसके बाद अंकुर पाठक ने अपनी बेइज्जती होती देखकर डैमेज कण्ट्रोल के लिए स्वीकार किया कि उससे गलती हुई है और यह वाकई में बहुत उथला ट्वीट था। और उन्होंने नील नितिन मुकेश से इसके लिए माफ़ी माँगी।
इस पर कुछ लोगों ने अंकुर पाठक को इस ट्वीट के लिए फटकार लगाते हुए उससे कहा कि सस्ती लोकप्रियता के लिए आजकल के जर्नलिस्म की ये दशा देखना दुर्भाग्यपूर्ण है। इसके जवाब में नील नितिन मुकेश ने भी कटाक्ष करते हुए जवाब दिया है- “मुझे आश्चर्य है, तुम्हारे जैसे लालन-पालन वाले लोग ये सब भी जानते हैं।”
Wondering how could some one with your upbringing even know this ? haha.
अंकुर पाठक के ट्वीट के जवाब में कई ट्विटर यूजर ने अपनी प्रतिक्रियाएँ दी और अपने अपने अंदाज में उन्हें खरी-खोटी सुनाई। हालाँकि, कुछ लोगों ने MEME के जरिए अंकुर के लिए अपशब्दों का भी प्रयोग किया। लेकिन सोशल मीडिया पर ‘MEME कल्चर’ में क्रिया-प्रतिक्रिया का यह चलन आम होता जा रहा है।
उत्तर प्रदेश के मेरठ में पशु-तस्करों द्वारा पुलिसकर्मियों को दौड़ा-दौड़ा कर मारने का मामला सामने आया है। इस दौरान हमलावरों ने पुलिस की जीप भी तोड़ डाली। घटनास्थल पर भारी संख्या में पहुँच पुलिस बल ने एसपी (देहात) अविनाश कुमार पांडे के नेतृत्व में हालात पर क़ाबू पाया। कई लोगों को हिरासत में लिया गया है।
घटना मेरठ के थाना इंचोली क्षेत्र की है। सीखड़े गाँव में पशु-तस्करी की सूचना पर इंचोली थाने की पुलिस दबिश के मक़सद से गई थी। पशु तस्कर के घर में शादी समारोह चल रहा था और उसके घर में दर्जनों लोग इकट्ठा थे। पुलिस को इस बारे में कोई जानकारी नहीं थी। पुलिस ने पशु तस्कर असलम और उसके बेटे अकरम को हिरासत में ले लिया। अचानक पहुंँची पुलिस को देखकर लोगों का गुस्सा फूट पड़ा।
एसपी के मुताबिक़, बुधवार (28 अगस्त) को सिखोड़ा थाना से दो भैंसों की चोरी की सूचना मिली थी। इसमें नामज़द मुकदमा दर्ज कराया गया था, जिसमें अकरम भाटी को आरोपित बनाया गया। इससे पहले भी आरोपित पर पैसा न लौटाने संबंधी आरोप लगते रहे हैं। इसी मामले में पुलिस उसे गिरफ़्तार करने पहुँची थी। ख़बर के अनुसार, पुलिस ने देर रात 26 लोगों को हिरासत में लिया।
पाकिस्तान में ननकाना साहिब गुरुद्वारा तंबी साहिब के एक ग्रन्थि (सिख पुजारी) की 19 साल की बेटी अपने घर नहीं लौटी है। न ही इस मामले में किसी को अब तक गिरफ्तार किया गया है। यह जानकारी लड़की के भाई ने दी है। इससे पहले दावा किया जा रहा था कि लड़की को सुरक्षित घर पहुॅंचा दिया गया है।
पीड़िता के भाई ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान, सेना प्रमुख बाजवा और पंजाब के गवर्नर से न्याय की गुहार लगाई है।
Brother of Sikh girl who was allegedly abducted and converted to Islam in Pakistan: Our sister has not been returned to us till now, these reports are wrong,neither arrests made yet. I appeal to PM Imran Khan,Army Chief and Punjab Governor to ensure justice to us. pic.twitter.com/zjIvpFv3k9
लड़की को गुंडे उसके घर से घसीट कर ले गए थे। जबरन इस्लाम क़बूल करवाकर उसका निकाह हाफ़िज सईद के आतंकी संगठन के जमात-उद-दावा के मोहम्मद हसन से करवा दिया गया था।
मामला सामने आने के बाद पाकिस्तान की पूरी दुनिया में थू-थू होने लगी थी। भरपाई के लिए पहले एक वीडियो जारी किया जिसमें पीड़िता अपनी मर्जी से इस्लाम क़बूल कर निक़ाह की बात कह रही थी। फिर लड़की को डराने-धमकाने की बात सामने आई। इस्लाम क़बूल नहीं करने पर उसके पिता और भाई को गोली से मार देने की धमकी दी गई थी। इसके बाद दावा किया गया था कि लड़की अपने घर लौट आई है। लेकिन लड़की के भाई ने बहन के घर लौटने और और आरोपितों की गिरफ्तारी से इनकार किया है।
Sikh girl who was allegedly abducted and converted to Islam in Pakistan, has been sent to her parents. Punjab’s Nankana Sahib police have arrested eight persons in the case. pic.twitter.com/YTCi3G9rdl
गौरतलब है कि, लड़की के चार दिन लापता रहने के बाद गुरुवार को उसके धर्मांतरण और निक़ाह की बात सामने आई। इसके बाद केंद्र सरकार ने शुक्रवार (30 अगस्त) को इस मामले में पाकिस्तान सरकार से बात कर तत्काल प्रभाव से ठोस क़दम उठाने की माँग की थी।
वैश्विक दबाव के चलते भारत को परमाणु युद्ध की धमकी देने वाले पाकिस्तानी हुक्मरानों के सुर बदलने लगे हैं। भारत को जंग की धमकी और परमाणु हमले की धौंस देने वाला पाकिस्तान आखिरकार मुँह लटकाकर बातचीत की टेबल पर आ गया है। कश्मीर मुद्दे पर दुनिया भर में अपना प्रोपगेंडा बेचने में नाकाम रहने के बाद पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने कहा है कि भारत से द्विपक्षीय बातचीत में कोई ऐतराज नहीं है। उन्होंने कहा कि उनका मुल्क भारत के साथ ‘सशर्त द्विपक्षीय’ बातचीत करने के लिए तैयार है।
पाकिस्तानी विदेश मंत्री ने शनिवार (अगस्त 31, 2019) को कहा, “हमने कभी भी भारत के साथ बातचीत से इनकार नहीं किया। पाकिस्तान अभी भी भारत के साथ द्विपक्षीय बातचीत के लिए तैयार है। लेकिन भारत बातचीत का माहौल नहीं बना रहा है।”
Pakistani media: “Pakistan ready for ‘conditional’ bilateral talks with India”, says Foreign Minister Shah Mahmood Qureshi (file pic) pic.twitter.com/gyzPLGNhFa
कुरैशी ने कहा कि इस मसले पर यदि कोई तीसरा मुल्क मध्यस्थता करे तो उन्हें खुशी होगी। बातचीत की शर्त रखते हुए कहा कि इसके लिए भारत को कश्मीर में नजरबंद अलगाववादी नेताओं को रिहा करना होगा। कुरैशी ने बातचीत के लिए एकपक्षीय शर्त रखते हुए कहा कि उन्हें कश्मीरी नेतृत्व से मिलने की इजाजत दी जाए, ताकि वे उनसे बात कर सकें और फिर कश्मीरी नेतृत्व पर बातचीत के लिए दबाव डाल सकें।
बता दें कि, अभी हाल ही में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने गीदड़ भभकी देते हुए कहा था कि भारत के प्रधानमंत्री को याद रखना चाहिए, दोनों देशों के पास परमाणु हथियार हैं। परमाणु युद्ध में कोई विजेता नहीं होगा। ये न सिर्फ इस क्षेत्र में कहर बरपाएगा बल्कि पूरी दुनिया को इसके परिणाम भुगतने होंगे।
गौरतलब है कि, कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान ने जितना हो सके दुनिया को बरगलाने की कोशिश की। पाकिस्तान दुनिया के ताकतवर मुल्कों के पास गया, इस्लामिक देशों के संगठन ओआईसी से गुहार लगाई। मानवाधिकार संगठनों के पास जम्मू-कश्मीर की झूठी कहानी सुनाई, लेकिन पाकिस्तान के रुख और पुराने रिकॉर्ड से वाकिफ दुनिया ने पड़ोसी मुल्क का न सिर्फ तर्क मानने से इंकार कर दिया, बल्कि रूस, फ्रांस, अमेरिका और यूएई जैसे देशों ने तो दो टूक कहा कि कश्मीर मुद्दा द्विपक्षीय है, और इसमें किसी के दखल की जरूरत नहीं है।