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लैंडर विक्रम का नाम होता टीपू सुल्तान तो अपने तलवार से भेजता सिग्नल: वामपंथी मीडिया गिरोह

नई खबरों के अनुसार चंद्रयान द्वितीय ऑर्बिटर ने चंद्रमा की कक्षा से खबर भेजी है कि विक्रम लैंडर चाँद की सतह पर ही है, और थोड़ा झुका हुआ है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (इसरो) ने बताया कि उनके पास जानकारी आई है कि विक्रम लैंडर टूटा-फूटा तो नहीं है, लेकिन कुछ संदेश नहीं भेज पा रहा।

वामपंथी मीडिया ने मजाक उड़ाते हुए कहा है कि विक्रम का नाम टीपू सुल्तान रखते तो एंटेना की जगह वह अपने तलवार से सिग्नल भेज सकता था। साथ ही, ‘लायर’, ‘डू नॉट प्रिंट’ और ‘स्प्रिंट’ नामक मीडिया पोर्टलों के पत्रकारों ने यह पूछा है कि मोदी जी के राज में क्या विक्रम के पास एक अदद स्मार्टफोन भी नहीं? रेनडीटीवी के विज्ञान बीट को कवर करने वाले पत्रकार नल्ला बगुला ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में पूछा कि उसे सीधा अम्बानी से बात करनी है कि जियो का सिग्नल इतना खराब क्यों है कि विक्रम का फोन नहीं लग रहा!

इसी पर किसी ट्विटर यूजर ने पत्रकार बगुला से कहा कि विक्रम आदमी नहीं, मशीन है इसलिए उसके पास जियो का सिम नहीं है। रेनडीटीवी के नल्ला बगुला ने काउंटर क्वेश्चन पूछा कि क्या चंद्रयान में कोई एस्ट्रॉनॉट नहीं था? जब जवाब आया कि ये पूरा मिशन ‘अन-मैन्ड’ था, तो पत्रकार ने, जिसकी कसमें धनय रॉय और धिनि दानराज खाते नहीं थकते, डाँटते हुए बवाल काटा और पूछा, “यहाँ धरती पर एक मोटर सायकिल अपने आप नहीं चल सकती और आप लोगों ने करोड़ों का चंद्रयान बिना किसी आदमी के ही भेज दिया?”

वहाँ मौजूद ऑपइंडिया के तीखी मिर्ची बीट के पत्रकार आशीष नौटियाल ने बताया कि बाकी पत्रकारों ने आँखों ही आँखों में इशारा किया और बगुला को खूब कूटने के बाद, वहीं अपने समुदाय से बर्खास्त कर दिया।

आखिर क्यों नहीं संदेश भेज रहा है लैंडर?

यूँ तो चंद्रयान द्वितीय जो अपने कंधे पर लैंडर ले कर चाँद की कक्षा तक गया था, और कक्षा तक पहुँचने तक लैंडर को हेलमेट भी पहना कर रखा था, वो पूरी बात इसरो के ग्राउंड स्टेशन तक नहीं भेज रहा है, लेकिन इसरो के वैज्ञानिकों ने बताया कि विक्रम और चंद्रयान आपस में बात करते पाए गए हैं।

इसरो की टीम ने चंद्रयान में एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस वाला उपकरण लगा रखा था जो कि चंद्रयान के मुख्य कम्प्यूटर को बिना बताए उसके द्वारा इकट्ठा की गई सारी जानकारी इसरो तक एक कूट भाषा में भेजता है। हालाँकि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस वाले उपकरण ने अपने इंटेलिजेंस का फायदा उठाया और संदेश ऐसी भाषा में भेजा जिसे तोड़ने में हमें तीन दिन लग गए। इसरो ने ऑपइंडिया से खास बातचीत करते हुए हमें पूरा संदेश भेजा।

क्या है पूरा मामला?

विक्रम से जब चंद्रयान ने पूछा कि सारे उपकरण सही होने के बाद भी वो बात क्यों नहीं करना चाहता? क्या वो हीलियम थ्री देख कर लालची हो गया है? इस पर विक्रम ने ‘भारत माता की जय’ बोल कर कसम खाते हुए कहा कि उसका एक-एक पुर्जा राष्ट्रहित में लगा हुआ है, और वो हीलियम थ्री जैसी चीजों का मोह नहीं रखता।

आगे बातचीत में खुलासा हुआ कि जब चंद्रयान ऑर्बिटर से विक्रम लैंडर अलग हो कर चाँद की तरफ तेजी से नीचे आ रहा था, तभी उसका हेलमेट रास्ते में गिर गया। हेलमेट में उसने इयरफोन लगा रखा था, जो कि नीचे गिर गया इससे उसे गिरते वक्त सही स्पीड का अंदाजा नहीं रहा और फिर लगभग दो किलोमीटर रहने पर उसकी गति धीमी नहीं हो पाई और वो धम्म से नीचे गिर गया।

इस पर चंद्रयान ने पूछा कि इसमें क्या समस्या है? विक्रम ने बताया कि हाल ही में उसने कुछ खबरें पढ़ी हैं जिसमें बाइक की कीमत से ज्यादा चालान काटा जा रहा है। इसी कारण उसे डर है कि संदेश भेजते ही ट्रैफिक पुलिस उसे ओवरस्पीडिंग, हेलमेट न पहनने, चलते वक्त पर बात करने और एक छोटे बच्चे (प्रज्ञान) को डिक्की में बिठाने के लिए चालान काट देगी।

चंद्रयान ने उसे समझाया कि नागपुर पुलिस ने कहा है कि वो सिग्नल तोड़ने का चालान नहीं काटेंगे। इसके साथ ही चंद्रयान ने उसे ट्वीट भी दिखाया पुलिस का। इस पर विक्रम का कहना था कि वो नागपुर के एरिया में नहीं आता, नेल्लोर पुलिस ने नागपुर वालों को ऐसा लिखने को कहा होगा। साथ ही उसने चंद्रयान को बताया कि पुलिस वालों की न तो दोस्ती अच्छी, न दुश्मनी!

इसरो टीम की समझ में नहीं आ रहा कि ये हो क्या रहा है!

वहीं, इसरो की टीम परेशान है कि आखिर विक्रम अपने आप को आदमी क्यों मान रहा है और ट्रैफिक पुलिस की बातें क्यों कर रहा है! एक युवा वैज्ञानिक ने कहा कि विक्रम के भीतर भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस वाला उपकरण लगा हुआ है जो इस कारण लगाया गया था कि अगर कुछ खराबी आ जाए तो उसे वो स्वयं ठीक कर ले, लेकिन उसकी तैयारी के लिए उसे सड़कों पर चलने की जानकारी, खास कर गड्ढे वाले सड़कों की जानकारी दी गई थी, ताकि उसके पास ज्यादा से ज्यादा आँकड़े हों। उसने बताया कि शायद ऐसी खबरें ज्यादा पढ़ने के कारण वो खुद को ट्रैफिक तोड़ने वाला समझ बैठा है।

इस पर एक बुजुर्ग वैज्ञानिक ने युवा वैज्ञानिक को मुर्गा बना दिया और पूछा कि ये सब करने की क्या जरूरत थी? जहाँ बुजुर्ग वैज्ञानिक अपनी जगह सही हैं कि मशीन को उतना ही दिमाग देना चाहिए कि वो पूर्वनिर्धारित काम करता रहे, न कि अपना दिमाग लगा कर खुद को मोटरसायकिल चालक समझ बैठे, वहीं युवा वैज्ञानिक ने हमें बताया कि उसने आने वाली चुनौतियों के मद्देनजर ऐसे इंतजाम किए थे।

इस बात का राजनीतिकरण होना शुरु हो गया है

इस बात की खबर जब राहुल गाँधी जी को मिली तो उन्होंने वैज्ञानिकों से कहा कि अगर संभव हो सके तो विक्रम को बताया जाए कि उसकी ‘बात’ ट्रैफिक पुलिस से करवा दी जाएगी। उन्होंने कहा कि आपस में बातचीत से ट्रैफिक पुलिस और मोटरसायकिल वाले हर दिन सैकड़ों चालान निपटा लेते हैं। साथ ही, राष्ट्र की बात करते हुए श्री गाँधी ने कहा कि डिमोनेटाइजेशन के समय जो चार हजार रुपए उन्होंने एटीएम से निकाले थे, उनमें से दो हजार अभी भी उनके पास हैं।

आगे राहुल जी ने कहा कि अगर नेल्लोर पुलिस दो हजार में मान जाती है, तो राष्ट्रहित में वो अपने दो साल का खर्चा, दो हजार का नोट, चालान ‘निपटाने’ के लिए दे सकते हैं। राजनैतिक, सामाजिक और मजहबी मामलों की जानकार ज़ोया मंसूरी ने बताया कि राहुल गाँधी के इस मकसद के पीछे वाड्रा है जो चाँद पर मॉल बनाने के लिए दो हजार रुपए में दो हजार एकड़ जमीन हथियाना चाहता है।

मोदी जी यह सुनते ही गुस्सा हो गए कि कॉन्ग्रेस ये दो हजार दे कर सारा क्रेडिट खुद ले लेगी कि उन्होंने बात आगे बढ़ाई और विक्रम से संपर्क संभव हो पाया। फिलहाल इस विकट स्थिति में कॉन्ग्रेस को देश की बर्बादी के अलावा किसी भी तरह का क्रेडिट न देने की कसम खा चुके अमित शाह ने मोदी जी से कहा कि वो कुछ लोगों से संपर्क में हैं और जल्द ही चाँद से मिस्ड कॉल आएगा और विक्रम भी माननीय मोदी जी को ही वोट देगा। मोदी जी की समझ में नहीं आया कि विक्रम उन्हें वोट कैसे देगा लेकिन फिर उन्हें याद आया कि ‘मोदी है तो मुमकिन है’।

रकाबगंज गुरुद्वारे पर हमले में घिरे कमलनाथ, 1984 सिख दंगे के दो चश्मदीद SIT को बयान देने के लिए तैयार

1984 सिख नरसंहार मामले में मुख्यमंत्री कमलनाथ का नाम फिर से उछला है। दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधन कमिटी के अध्यक्ष मनजिंदर सिंह सिरसा ने दावा किया है कि गुरुद्वारा रकाबगंज साहिब पर हुए हमले के सम्बन्ध में दो गवाह बयान देने को तैयार हैं। सिरसा ने उन दोनों गवाहों से बात की और उन्होंने कहा कि उन्हें जब भी बुलाया जाएगा, वे एसआईटी के समक्ष बयान देने को तैयार हैं।

मनजिंदर सिंह सिरसा दिल्ली के राजौरी गार्डन क्षेत्र से विधायक हैं। शिरोमणि अकाली दल के नेता सिरसा ने कहा कि एसआईटी भी उन गवाहों का बयान लेने के लिए तैयार हो गई है। एसआईटी ने कहा है कि इसके लिए तारीख मुक़र्रर की जाएगी। सिरसा ने कॉन्ग्रेस से कमलनाथ को मुख्यमंत्री पद से तुरंत हटाने की माँग की है ताकि सिखों को जल्द से जल्द न्याय मिल सके।

सिरसा ने दोनों गवाहों की सुरक्षा को लेकर भी चिंता ज़ाहिर की। उन्होंने कहा कि यह एक नरसंहार का मामला है और चूँकि वे एक मुख्यमंत्री के ख़िलाफ़ बयान देने जा रहे हैं, उन्हें उचित सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए। सिरसा ने भविष्यवाणी करते हुए कहा कि कमलनाथ 1984 सिख नरसंहार मामले में गिरफ़्तार होने वाले पहले पदस्थ मुख्यमंत्री होंगे।

वरिष्ठ अधिवक्ता एचएस फुल्का ने अपनी पुस्तक में रकाबगंज गुरुद्वारा पर हमले का जिक्र किया है। फुल्का ने लिखा है कि भीड़ द्वारा गुरुद्वारा को नुक़सान पहुँचाया गया था और 2 सिखों को ज़िंदा जला डाला गया था। फुल्का लिखते हैं कि हत्यारों द्वारा 5 घंटे तक उत्पात मचाया गया और कहा जाता है कि कॉन्ग्रेस नेता कमलनाथ पूरे 2 घंटे तक भीड़ के साथ रहे। ततकालीन कमिश्नर और एडिशनल कमिश्नर ने भी मौके पर कमलनाथ की मौजूदगी की पुष्टि की थी। अगले दिन इंडियन एक्सप्रेस में ख़बर छपी थी कि कमलनाथ ने ही भीड़ का नेतृत्व किया था।

1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद सिखों का नरसंहार चालू हो गया था। इसमें जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार जैसे कई कॉन्ग्रेस नेताओं का हाथ सामने आया था। अभी हाल ही में ख़बर आई थी कि गृह मंत्रालय ने स्पेशल जाँच टीम (SIT) को सिख नरसंहार से जुड़े ऐसे सभी मामलों की फाइल्स फिर से खोलने की अनुमति दे दी है, जिनमें आरोपितों को या तो क्लीनचिट दे दी गई थी या फिर जाँच पूरी हो चुकी थी।

बड़ा नेता बनना है तो पकड़ो एसपी-कलेक्टर का कॉलर: कॉन्ग्रेसी मंत्री कवासी लखमा ने बच्चों को दी नसीहत

कॉन्ग्रेस नेता और छत्तीसगढ़ की भूपेश बघेल सरकार में मंत्री कवासी लखमा ने एक बार फिर से अजीबोगरीब बयान दिया है। इस बार उन्होंने बच्चों को बड़ा नेता बनने के लिए एसपी और कलेक्टर की कॉलर पकड़ने की नसीहत दी है।

कवासी लखमा का ये वीडियो वायरल हो गया है। दरअसल, शिक्षक दिवस के अवसर पर राज्य के आबकारी मंत्री कवासी लखमा सुकमा के पावारास शासकीय स्कूल के कार्यक्रम में बतौर मुख्यमंत्री पहुँचे थे। इस दौरान उन्होंने बच्चों को एक कहानी सुनाते हुए कहते हैं कि एक कार्यक्रम के दौरान उनसे एक बच्चा कहता है कि उसे नेता बनना है और फिर वो उनसे पूछता है कि एक बड़ा नेता कैसे बन सकते हैं? वो इतने बड़े नेता कैसे बने? तो लखमा ने उस बच्चे को बड़ा नेता बनने के लिए सीख देते हुए कहते हैं कि अगर बड़ा नेता बनना है तो एसपी और कलेक्टर का कॉलर पकड़ो, तभी बड़े नेता बनोगे। और फिर वो इशारे से एसपी-कलेक्टर की पिटाई करने की बात कहते हैं।

बच्चे ने तो आबकारी मंत्री से सीधा सवाल पूछा था, लेकिन कवासी लखमा ने इसका उल्टा जवाब दिया। बेहद ही शर्म की बात है कि कवासी लखमा महत्वपूर्ण पद पर होते हुए भी शिक्षक दिवस के अवसर पर बच्चों के बीच बकायदा मजे लेकर ये बता रहे हैं कि किस तरह से गुंडागर्दी करके बड़ा नेता बना जा सकता है। इस दौरान वो बच्चों को भविष्य के लिए अच्छी सीख दे सकते थे। लेकिन उन्होंने एक बार फिर से वही पुराना रूख अपनाते हुए विवादित बयान दिया है। बता दें कि, कवासी लखमा हमेशा ही अपने विवादित बयानों को लेकर सुर्खियों में रहे हैं। मगर, इस बार जो उन्होंने बच्चों को विवादित नसीहत दी है, वो बेहद ही शर्मनाक है।

प्रणब मुखर्जी की बेटी और जगजीवन राम के नाती का कॉन्ग्रेस में प्रमोशन, सोनिया ने बनाया राष्ट्रीय प्रवक्ता

कॉन्ग्रेस पार्टी पर अक्सर वंशवाद के आरोप लगते रहे हैं। आजादी के बाद से अधिकतर अवधि में नेहरू-गाँधी परिवार के लोग ही पार्टी अध्यक्ष का पद संभालते रहे हैं। अब कॉन्ग्रेस ने पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की बेटी और पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार के बेटे को पार्टी में प्रमोशन दिया है। प्रणव मुखर्जी की बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी और मीरा कुमार के बेटे अंशुल मीरा कुमार को पार्टी का राष्ट्रीय प्रवक्ता बनाया गया है।

शर्मिष्ठा मुखर्जी ने राष्ट्रीय प्रवक्ता बनाए जाने पर कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी और पार्टी के कम्युनिकेशन इंचार्ज रणदीप सिंह सुरजेवाला को धन्यवाद किया। इससे पहले शर्मिष्ठा दिल्ली प्रदेश कॉन्ग्रेस में प्रवक्ता बनाई गई थीं। इसी तरह अंशुल मीरा कुमार का भी प्रमोशन हुआ है। वह मीरा कुमार के बेटे हैं। मीरा कुमार पूर्व उप-प्रधानमंत्री जगजीवन राम की बेटी हैं।

कॉन्ग्रेस ने नोटिफिकेशन जारी कर इन दोनों के राष्ट्रीय प्रवक्ता बनाए जाने की जानकारी दी। हालाँकि, इन दोनों के अलावा फिलहाल किसी अन्य पदाधिकारी की नियुक्ति नहीं की गई है। बता दें कि सोनिया गाँधी के अध्यक्ष बनने के बाद पार्टी में कुछ अहम बदलाव हुए हैं। हरियाणा में कॉन्ग्रेस ने पूर्व केंद्रीय मंत्री कुमारी शैलजा को प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया है।

हेडलाइन में सिख को मुस्लिम बताकर NDTV ने फिर किया पाठकों को गुमराह

सौहार्द के नाम पर अपने पाठकों को अक्सर एक पक्ष दिखाकर गुमराह करने वाले NDTV ने इस बार सिख भावना को ठेस पहुँचाया है। दरअसल, गणेश चतुर्थी के अवसर पर एनडीटीवी ने अपने पोर्टल पर आज एक खबर प्रकाशित की। जिसमें हेडलाइन दी गई, “लुधियाना में मुस्लिम कलाकार ने बल्जियन चॉक्लेट से 106 किलो की गणेश प्रतिमा बनाई।” लेकिन इस खबर की फीचर इमेज में उन्होंने दो सिखों की तस्वीरें लगाई जो गणपति की प्रतिमा के साथ खड़े थे।

हालाँकि, इस खबर की बॉडी में इस बात का विशेष रूप से जिक्र किया गया कि ये प्रतिमा एक मुस्लिम ने सिख बेकरी के मालिक की देखरेख में बनाई हैं। लेकिन हेडलाइन में इसका कोई उल्लेख नहीं था और न ही तस्वीर में किसी मुस्लिम का चेहरा था। तो फिर हेडलाइन और तस्वीर में क्या ताल-मेल?

अब इससे पहले एनडीटीवी पर आप, हम या कोई अन्य पाठक सवाल उठाता, खुद उस शख्स ने जिसकी तस्वीर NDTV ने छापी थी, इस मामले पर संज्ञान ले लिया। हरजिंदर सिंह कुकरेजा नाम के व्यक्ति ने अपने ट्वीटर पर इस खबर को शेयर करते हुए बड़े ही सम्मान से लिखा, “प्रिय NDTV, ये शीर्षक गुमराह करने वाला है और तस्वीर से मेल नहीं खाता। हमें मुस्लिमों से प्यार है लेकिन जो नीचे तस्वीर में पगड़ी पहनकर आदमी खड़ा है वो मैं हूँ और मैं एक सिख हूँ। तुमने बहुत बड़े स्तर पर सिखों और उनकी पगड़ी की जहालत की हैं। कृपा करके अब इस तस्वीर को हटाएँ और इस खबर का भी शीर्षक ठीक करें। “

अब किसी की शिकायत के बाद अपनी भूल को सुधारना एक आम प्रक्रिया है, लेकिन एनडीटीवी अपने प्रोपगेंडा को फैलाने में इतना व्यक्त है कि उसने इस ट्वीट पर नजर तो डाली लेकिन जो सुधार किया, वो इनकी गलती से भी ज्यादा शर्मसार करने वाला था।

दरअसल, हरजिंदर की शिकायत के बाद एनडीटीवी ने इस खबर से उन दो सिखों की तस्वीर को ही क्रॉप कर दिया, जो पहले तस्वीर में दिखाई दे रहे थे, लेकिन इन्होंने अपनी हेडलाइन में कोई सुधार नहीं किया, क्योंकि उसमें संदेश जा रहा था कि एक मुस्लिम शख्स ने गणपति की मूर्ति बनाई।

अब सवाल उठता है कि क्या एक पक्ष को दिखाने वाला ये मीडिया संस्थान इतना भी नहीं जानता कि देश में सिखों का पहनावा केवल भारत में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व उनका परिचय हैं या फिर इस संस्थान ने अपनी पॉलिसी बना ली है कि खबर कुछ भी हो, लेकिन एँगल सिर्फ़ समुदाय विशेष से संबंधित ही जाएगा।

ट्विटर पर इस हरकत पर लोग एनडीटीवी की थू-थू कर रहे हैं। कुछ लोगों का मानना है कि पल्लव बागला की ओछी हरकत से भटकाने के लिए ये तरीका संस्थान ने अपनाया है तो किसी का मानना है कि इस संस्थान की मंशा में ही खोट हैं, इसे भारत में बंद कर दिया जाना चाहिए। लोग इस संस्थान के बहिष्कार की बात करने के साथ खुलकर इल्जाम लगा रहे हैं कि इन्होंने इस स्टोरी को घुमा फिराकर पेश किया है। ये जोर देकर बता रहे हैं कि सिख बेकरी का मालिक है जबकि जिसने प्रतिमा बनाई वो एक मुस्लिम है।

आजम खान परिवार मुश्किल में, पत्नी तंजीन, दोनों बेटों को नोटिस जारी, 3 दिन में उपस्थित होने के आदेश

किसानों की जमीन हड़पकर मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी की चारदीवारी के अंदर मिलाने के मामले में सपा सांसद भू-माफिया आजम खान और उनके परिवार की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही है। अब आजम खान की पत्नी और राज्यसभा सांसद तंजीन फातिमा के अलावा उनके दोनों बेटों अब्दुल्ला आजम खान और अदीब आजम खान के खिलाफ नोटिस जारी किया गया है। रामपुर जिला प्रशासन ने तीनों के खिलाफ कुल 4 नोटिस जारी किए हैं। 3 नोटिस धारा 160 के अंतर्गत और एक नोटिस धारा 91 के तहत जारी हुआ है।

सभी नोटिस को रामपुर पुलिस ने आजम खान के घर पर चस्पा कर दिया है। उन्हें 3 दिन में थाने में उपस्थित होने के लिए कहा गया है। साथ ही आजम खान की पत्नी से जौहर यूनिवर्सिटी के रिकॉर्ड भी माँगे गए हैं। आजम खान की पत्नी और दोनों बेटों से जौहर यूनिवर्सिटी में किसानों की जमीन पर कब्जा करने के मामले में पूछताछ होगी। 

इससे पहले आजम खान की पत्नी तंजीन फातिमा के खिलाफ बिजली चोरी का मुकदमा दर्ज किया गया था। रामपुर की थाना कोतवाली पुलिस ने विद्युत अधिनियम (2003) की धारा 135 के अंतर्गत यह मुकदमा दर्ज किया था। दरअसल, हमसफर रिसॉर्ट पर बिजली विभाग ने छापेमारी की थी। छापेमारी के दौरान रिसॉर्ट में बिजली चोरी पकड़ी गई। जिसके बाद रिसॉर्ट का बिजली कनेक्शन काट दिया गया।

बता दें कि, रामपुर से सपा सांसद आजम खान के खिलाफ सरकारी और किसानों की जमीन पर कब्जा करने के साथ ही बिजली चोरी, अतिक्रमण, भैंस चोरी तथा अभ्रद्र भाषा का इस्तेमाल करने के लगभग 80 मामले दर्ज हैं।

PAK दूतावास से ईरान ने उतारे भारत विरोधी पोस्टर, अनुशासनहीन बता फटकार लगाई

पाकिस्तान को कश्मीर मुद्दे पर एक बार फिर फजीहत का सामना करना पड़ा है। इस बार पाकिस्तान को फटकार लगाने वाला देश ईरान है। पाकिस्तान द्वारा अपने दूतावास को भारत विरोधी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल करने पर कड़ा रुख अपनाते हुए ईरानी अधिकारियों ने 15 अगस्त को उत्तर-पूर्व शहर मशहद स्थित पाकिस्तानी दूतावास की दीवारों पर लगे भारत विरोधी पोस्टर हटा दिए।

पाकिस्तान ने कश्मीर पर 15 अगस्त को कथित ‘कश्मीर सोलिडेरिटी डे’ (Kashmir Solidarity day) के नाम ये पोस्टर दूतावास की दीवारों पर लगाए गए थेा। लेकिन आधी रात को स्थानीय पुलिस ने पोस्टर हटा दिए।

तेहरान में अधिकारियों ने पाकिस्तानी राजनयिकों से पूछा, “अगर इस्लामाबाद में ईरानी मिशन की दीवारों पर सऊदी अरब के खिलाफ पोस्टर लगाए जाएँ तो क्या पाकिस्तान इसकी इजाजत देगा?”

ईरान ने इन तरीकों को ‘अनुशासनहीन रणनीति’ बताया। तेहरान ने इस्लामाबाद को स्पष्ट शब्दों में कहा है कि किसी तीसरे देश के खिलाफ इस तरह के पोस्टर लगाना राजनयिक मानदंडों के खिलाफ है। पाकिस्तान ने एक मौखिक नोट के जरिए जब इस मुद्दे को उठाया तो तेहरान ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया।

‘भारत दुश्मन देश नहीं है’

ईरानी से मिली इस फटकार पर के बाद भी पाकिस्तान अपनी दलील पर अड़ा रहा। पकिस्तान ने दावा किया है कि उसके मिशन को किसी भी सन्देश के प्रदर्शन का अधिकार है। इसके जवाब में ईरान ने कहा कि पाकिस्तान से उसके दोस्ताना संबंध रहे हैं, लेकिन भारत भी कोई दुश्मन देश नही है।

इस घटना के बाद भारत ने दिल्ली में ईरान के राजदूत को एक विरोध नोट सौंपा है। इस घटना से पहले भी ईरान में पाकिस्तानी मिशन द्वारा बिना किसी अनुमति के भारत विरोधी दो प्रदर्शन आयोजित किए थे।

गौरतलब है कि जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाए जाने के बाद से पाकिस्तान बौखलाहट में इस तरह की हरकत कर रहा है। वो अन्य देशों में भारत विरोधी प्रदर्शन प्रायोजित करवाता है। ब्रिटेन की राजधानी लंदन में भारतीय उच्चायोग के सामने विरोध-प्रदर्शन के नाम पर दो मौकों पर पाकिस्तानी उत्पात मचा चुके हैं। ब्रिटेन में भारतीय दूतावास के पास भी पाकिस्तानी दो मौकों पर विरोध-प्रदर्शन के नाम पर उत्पात मचा चुके हैं।

पाकिस्तानियों ने प्रदर्शन के दौरान अंडे और टमाटर फेंके थे। इस गंदगी को ब्रिटेन में भारतीय उच्चायुक्त के साथ मिलकर भारतीयों ने साफ़ किया। तीन सितंबर को विरोध-प्रदर्शन के दौरान भारतीय उच्चायोग की इमारत पर अण्डे और टमाटर फेंकने वाले दो पाकिस्तानियों को CCTV कैमरा में पहचान कर लंदन पुलिस ने गिरफ्तार किया भी किया था।

दादा से राहुल-प्रियंका की चिढ़ पुरानी, इंदिरा ने भी डस्टबिन में फेंक दिया था ‘फिरोज गाँधी प्रेस लॉ’

कल रविवार (सितम्बर 8, 2019) को फ़िरोज़ गाँधी की पुण्यतिथि थी। उनके पोते राहुल गाँधी और पोती प्रियंका गाँधी ने उन्हें याद तक न किया। बात-बात पर नेहरू, इंदिरा और राजीव का नाम लेने वाले कॉन्ग्रेस नेता उन्हें याद
तक नहीं करते। बहू सोनिया गाँधी ने सरनेम तो लिया लेकिन ससुर को भूला बैठीं। इसका कारण क्या है? इससे जानने के लिए हम 6 महीने पीछे चलते हैं और फिर नेहरू से लेकर इंदिरा काल में कॉन्ग्रेस की करतूतों को देख कर समझेंगे कि आखिर क्यों फ़िरोज़ को याद नहीं किया जाता?

आपको याद होगा जब प्रियंका गाँधी ने रविवार (मार्च 17, 2019) की रात स्वराज भवन में गुजारी थी। इस दौरान ‘भावुक’ प्रियंका ने अपनी दादी पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को भी याद किया था। उन्होंने बताया था कि उनकी दादी बचपन में उन्हें ‘जॉन ऑफ ओर्क’ की कहानी सुनाया करती थी। लेकिन, प्रियंका गाँधी ने अपने दादाजी को याद करना मुनासिब नहीं समझा। आनंद भवन से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर स्थित फ़िरोज़ गाँधी की कब्र को प्रियंका ने वैसे ही नज़रअंदाज़ किया, जैसे राहुल व सोनिया करते आए हैं।

ऐसे में प्रियंका गाँधी जब अपनी दादी की बात कर रही थी, लोगों द्वारा यह पूछना लाजिमी था कि वह अपने दादा को कब याद करेंगी? पारसी समुदाय से आने वाले फ़िरोज़ जहाँगीर गाँधी का निधन 8 सितंबर 1960 को हो गया था। फ़िरोज़ ने महात्मा गाँधी से प्रेरित होकर अपना सरनेम ‘गैंडी’ से ‘गाँधी’ कर लिया था।

प्रियंका गाँधी से पहले राहुल गाँधी और सोनिया गाँधी भी फ़िरोज़ गाँधी के कब्र को नज़रअंदाज़ करते आए हैं। कॉन्ग्रेस के प्रथम परिवार सहित सभी बड़े नेता राजीव गाँधी, जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गाँधी की समाधि पर तो जाते रहे हैं, लेकिन फ़िरोज़ गाँधी की समाधि को कोई पूछता तक नहीं। फ़िरोज़ के अलावा गाँधी परिवार के अन्य पूर्वजों की जयंती या पुण्यतिथि के मौके पर सभी बड़े कॉन्ग्रेसी नेताओं का जमावड़ा लगता है, लेकिन फ़िरोज़ की जयंती और पुण्यतिथि कब आकर निकल जाती है, इसका पता भी नहीं चलता।

उनका कब्र यूँ ही सूना पड़ा होता है, सभी मौसम में, बारहो मास। चुनावी मौसम में भी कॉन्ग्रेस द्वारा इंदिरा, राजीव और नेहरू तो ख़ूब याद किए जाते हैं लेकिन उनकी ही पार्टी में फ़िरोज़ का नाम लेने वाला भी कोई मौजूद नहीं है।

ऐसा नहीं फ़िरोज़ गाँधी कॉन्ग्रेसी नहीं थे या राजनीति में उनकी हिस्सेदारी नहीं थी। गाँधी परिवार की परंपरागत सीट रायबरेली के पहले सांसद भी फ़िरोज़ गाँधी ही थे। 1952 में हुए स्वतंत्र भारत के पहले आम चुनाव में उन्होंने यहाँ से जीत दर्ज की थी। इसके बाद 1957 में भी उन्होंने यहाँ से जीत दर्ज की थी। राजनीति में सक्रिय रहने वाले फ़िरोज़ गाँधी भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ भी काफ़ी मुखर थे।

आप जान कर चौंक जाएँगे कि उनके विरोध के कारण प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के कैबिनेट में वित्त मंत्री रहे टीटी कृष्णमाचारी को इस्तीफा देना पड़ा था। उस दौरान कॉन्ग्रेस नेताओं के बड़े उद्योगपतियों के साथ अच्छे-ख़ासे सम्बन्ध बनने लगे थे, जिसका फ़िरोज़ ने भरपूर विरोध किया था।

क्या कॉन्ग्रेस इसलिए फ़िरोज़ गाँधी को याद नहीं करना चाहती क्योंकि उनका नाम आते ही उनका नेहरू सरकार की आलोचना करना फिर से प्रासंगिक हो जाएगा? क्या कॉन्ग्रेस इसलिए फ़िरोज़ को याद नहीं करना चाहती, क्योंकि उनका नाम आते ही उनके कारण नेहरू के मंत्री के इस्तीफा देने की बात फिर से छेड़ी जाएगी? क्या कॉन्ग्रेस फ़िरोज़ खान की बात इसलिए नहीं करना चाहती, क्योंकि बड़े कॉन्ग्रेस नेताओं व उद्योगपतियों के बीच संबंधों की बात फिर से चल निकलेगी?

जब उनका नाम आएगा, तो इतिहास में फिर से झाँका जाएगा। अगर उनका नाम आएगा तो उनके सुनसान कब्रगाह की बात आएगी, कॉन्ग्रेस नेताओं व गाँधी परिवार की थू-थू होगी। अब कॉन्ग्रेस चाह कर भी फ़िरोज़ गाँधी की प्रासंगिकता को ज़िंदा नहीं करना चाहेगी, क्योंकि उनसे सवाल पूछे जाएँगे।

आपको बता दें कि पारसी फ़िरोज़ गाँधी का अंतिम संस्कार पूरे हिन्दू रीती-रिवाजों के साथ किया गया था। बीबीसी के अनुसार, उन्होंने कई बार अंतिम संस्कार के पारसी रीति-रिवाजों से नाख़ुशी जताई थी। उनकी अंतिम इच्छा थी कि उनका क्रिया-कर्म हिन्दू तौर-तरीकों से ही किया जाए। अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा ने राहुल गाँधी को उनके दादा की याद दिलाई। जनवरी 2019 में शर्मा ने राहुल गाँधी को कुम्भ में आने का आमंत्रण देते हुए उन्हें फ़िरोज़ गाँधी के कब्रगाह पर मोमबत्ती जलाने की सलाह दी थी। शर्मा ने कहा था कि राहुल के ऐसा करने से दिवंगत आत्मा को शांति मिलेगी, फ़िरोज़ गाँधी की कब्रगाह भी प्रयागराज में ही है।

सूना पड़ा रहता है इलाहबाद में फ़िरोज़ गाँधी का समाधि-स्थल

पारसी कब्रगाह के एक कोने में फ़िरोज़ गाँधी की कब्र अभी भी आगुन्तकों की बाट जोह रही है। राहुल गाँधी शायद एक-दो बार वहाँ जा चुके हैं, लेकिन पिछले 8 वर्षों से शायद ही गाँधी परिवार का कोई व्यक्ति वहाँ गया हो। पिछले एक दशक में प्रियंका गाँधी के वहाँ जाने के कोई रिकॉर्ड नहीं हैं। आलम यह है कि कब्रिस्तान की रखवाली के लिए एक चौकीदार है जिसके रहने के लिए दो कमरे बने हुए हैं। इसके अलावा कब्रिस्तान में एक कुआँ और एक मकान है। कब्र और कब्रिस्तान की स्थिति जर्जर हो चुकी है। अपने ही परिवार की उपेक्षा के कारण यह स्थिति हुई है। कहा जाता है कि 1980 में उनकी बहू मेनका गाँधी ने यहाँ का दौरा किया था। मेनका गाँधी अभी मोदी कैबिनेट में महिला एवं बाल विकास मंत्री हैं।

अगर कॉन्ग्रेस फ़िरोज़ गाँधी की बात करती है तो यह भी याद दिलाया जाएगा कि उन्ही की पत्नी इंदिरा गाँधी ने अपने पति के द्वारा बनवाए गए क़ानून को कचरे के डब्बे में फेंक दिया था। नेहरू काल में नियम था कि संसद के भीतर कुछ भी कहा जा सकता था, लेकिन अगर किसी पत्रकार ने इस बारे में कुछ लिखने या बोलने की कोशिश की तो उसे सज़ा तक मिल सकती थी। इसे हटाने के लिए फ़िरोज़ गाँधी ने संसद में प्राइवेट मेम्बरशिप बिल पेश किया। बाद में इस क़ानून को फ़िरोज़ गाँधी प्रेस लॉ के नाम से जाना गया। आपातकाल के दौरान इंदिरा ने अपने पति के नाम के इस क़ानून की धज्जियाँ उड़ा कर रख दी।

क्या कॉन्ग्रेस को इस बात के चर्चा में आने का डर है? बाद में विरोधी जनता पार्टी की सरकार ने इस क़ानून को फिर से लागू किया। इस तरह से फ़िरोज़ गाँधी को अपनों ने ही दगा दिया, विरोधियों ने अपनाया।

क्या कारण है कि देश के सबसे शक्तिशाली राजनीतिक परिवार के पूर्वज की कब्रगाह पर कचरों का ढेर लगा पड़ा है? दशकों तक केंद्र से लेकर यूपी तक कॉन्ग्रेस की सरकार रही, लेकिन फ़िरोज़ गाँधी उपेक्षित क्यों रहे? सवाल तो पूछे जाएँगे। प्रियंका से भी पूछे जाएँगे। दादी को याद कर राजनीतिक रोटियाँ सेंकने वाली प्रियंका-राहुल को दादा को याद करने से शायद कोई राजनीतिक फ़ायदा न मिले। अफ़सोस कि भारत में एक ऐसा भी परिवार है जो अपने पुरखों को याद करने के मामले में भी सेलेक्टिव है।

पुण्यतिथि के दिन अपने दादा फ़िरोज़ गाँधी को भूले राहुल-प्रियंका, उन्हीं के कारण मिला ‘गाँधी’ सरनेम

जिस व्यक्ति के कारण आज कॉन्ग्रेस का शीर्ष परिवार अपने सरनेम में ‘गाँधी’ लगाता है, उस व्यक्ति को उसके जन्मदिवस और पुण्यतिथि पर उसीका परिवार याद नहीं करता। हम बात कर रहे हैं फ़िरोज़ गाँधी की, जिनके कारण इंदिरा का सरनेम नेहरू की जगह गाँधी हुआ। फ़िरोज़ इंदिरा गाँधी के पति थे। वह सोनिया गाँधी के ससुर थे और राहुल गाँधी के दादा थे। लेकिन, 8 सितम्बर को उनकी पुण्यतिथि पर न बहू ने याद किया और न ही पोते-पोती ने।

यहाँ तक कि जिस कॉन्ग्रेस पार्टी के वह सांसद थे, उस पार्टी ने भी उन्हें याद नहीं किया। अगर आप राहुल और प्रियंका का ट्विटर अकाउंट खँगालेंगे तो पाएँगे कि दोनों में से किसी ने भी अपने दादा को याद करने की जहमत नहीं उठाई। अगर कॉन्ग्रेस का शीर्ष परिवार सत्ता का भागी बना रहा तो उसमें ‘गाँधी’ सरनेम का भी योगदान था। लेकिन, उस व्यक्ति को भुला दिया गया जिसके कारण यह सरनेम मिला।

फ़िरोज़ गाँधी भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ अभियान चलाने वाले अग्रणी नेताओं में से एक थे। नेहरू काल के दौरान भी उन्होंने विभिन्न घोटालों के विरोध में आवाज़ उठाई। एलआईसी कम्पनी में हुए घोटाले के ख़िलाफ़ फ़िरोज़ द्वारा आवाज़ उठाए जाने के कारण तत्कालीन वित्त मंत्री टीटी कृष्णमाचारी को इस्तीफा देना पड़ गया था। कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी अगर विदेश में छुट्टियाँ न मना रहे हों तो ट्विटर पर काफ़ी सक्रिय रहते हैं लेकिन फ़िरोज़ गाँधी को याद करने के लिए उनके पास समय नहीं है।

फ़िरोज़ गाँधी के समाधी-स्थल पर उनके परिवार का कोई सदस्य नहीं जाता

प्रियंका गाँधी ने फ़िरोज़ की पुण्यतिथि के दिन मोदी सरकार के विरोध में एक कविता शेयर की, अर्थव्यवस्था को लेकर चिंता जताई लेकिन अपने ही दादा को उन्होंने याद नहीं किया। ऐसा नहीं है कि कॉन्ग्रेस का शीर्ष परिवार अपने निजी कार्यक्रमों की प्राइवेसी को लेकर कुछ ज्यादा ही सतर्क रहता है। राहुल, प्रियंका और सोनिया अक्सर इंदिरा गाँधी, जवाहरलाल नेहरू और राजीव गाँधी को याद करते रहते हैं, उनके जन्मदिवस और पुण्यतिथि पर उनकी समाधी पर जाते रहे हैं।

और फ़िरोज़ गाँधी की समाधी? वहाँ कोई नहीं जाता। वह न तो इंदिरा का ‘शक्ति स्थल’ जितना हाई प्रोफाइल है और न ही राजीव गाँधी की ‘वीर भूमि’ की तरह भव्य। कॉन्ग्रेस के शीर्ष परिवार के भाषणों में भी फ़िरोज़ गाँधी का नाम कहीं नहीं आता। उनका समाधी-स्थल लखनऊ-इलाहबाद हाइवे पर एक कोने में धूल फाँक रहा है। सोनिया गाँधी 2001 के बाद से वहाँ नहीं गईं। राहुल अंतिम बार 2011 में वहाँ गए थे। प्रियंका 2009 में वहाँ गई थीं।

पूरी तरह सुरक्षित है लैंडर विक्रम, हुई हार्ड-लैंडिंग: ISRO ने चंद्रयान-2 को लेकर सुनाई बड़ी खुशखबरी

भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो ने देशवासियों को बड़ी ख़ुशख़बरी दी है। इसरो के मुताबिक़, चंद्रयान-2 का लैंडर विक्रम पूरी तरह सुरक्षित है। हाल ही में ऑर्बिटर ने उसकी थर्मल इमेज क्लिक की थी। इसका अर्थ यह है कि लैंडर में कोई तोड़-फोड़ नहीं हुई है और वह पूरी तरह सेफ है। लैंडर को कोई नुक़सान नहीं पहुँचा है।

बता दें कि लैंडर का इसरो से संपर्क टूट गया था, जिसके बाद से अभी तक उससे संपर्क साधने की कोशिशें जारी हैं। अब इसरो ने बताया है कि विक्रम सुरक्षित है और उससे संपर्क साधने का प्रयास किया जा रहा है। ऑर्बिटर के कैमरा द्वारा भेजी गई तस्वीरों के मुताबिक़, जहाँ विक्रम को लैंड करना था, उसने वहाँ से कुछ ही दूरी पर हार्ड-लैंडिंग की है।