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घोघो रानी… चुल्लू भर ही था पानी, इसलिए छेनू उसमें डूब के मर न सका!

जिस दौर में देश में एनजीओ को लेकर शोर उठ रहा था, करीब-करीब उसी वक्त विदेशों में भी इसे लेकर काफी हंगामा मचा था। अफ़सोस कि ये हंगामा बिलकुल भी वैसा नहीं था, जैसा भारत में उठ रहा था। ये हंगामा ऑक्सफेम नाम की एक संस्था को लेकर था। आरोप था कि इस संस्था के सीइओ ने पीड़ितों का इस्तेमाल देह-व्यापार के लिए किया है। इस काम के लिए संभवतः उन्होंने मदद के लिए भेजे गए पैसों का इस्तेमाल किया था। ऐसा भी माना जा रहा था कि जिनका इस्तेमाल देह-व्यापार में हुआ है, उनमें से कई कम उम्र की, करीब-करीब बच्चियाँ हैं।

ऐसे आरोपों का खुलासा होते ही जमकर बवाल हुआ। शुरुआत में ये रिपोर्ट टाइम्स में आई। बाद में गार्डियन और बीबीसी ने भी इस पर जमकर शोध किया। जैसा कि होना ही था, एनजीओ की तरह काम करने वाली संस्था ऑक्सफेम ने पहले तो इन आरोपों को सिरे से नकारने की कोशिशें कीं। वो ऐसा करने में कामयाब नहीं हो पाए और आख़िरकार पोल खुलने पर ऑक्सफेम जीबी से चीफ एग्जीक्यूटिव मार्क गोल्डरिंग और फिर डिप्टी चीफ एग्जीक्यूटिव पैनी लॉरेन्स को इस्तीफा देना पड़ा। इस विवाद के खुलने का नतीजा ये भी हुआ कि यूके से ऑक्सफेम को मिलने वाले काफी फण्ड रोक दिए गए।

The Times में प्रकाशित खबर

भारत में भी उस दौर में फण्ड के रोके जाने का ही विवाद चल रहा था। ये अलग बात है कि जहाँ विदेशों में ये चर्चा थी कि ऐसी हरकतें करने वाले लोगों को आखिर फण्ड दिए ही क्यों जाएँ, वहीं भारत में फण्ड की जाँच को असहिष्णुता का जामा पहना दिया गया था। विदेशों में नीचता करने के लिए जहाँ संस्था माफ़ी माँग रही थी वहीं भारत में फण्ड रोके जाने को सवर्ण हिन्दू पुरुषों द्वारा किया जा रहा अत्याचार घोषित किया जा रहा था। भारत में उनके दलाल स्क्रीन काली करके ये बता रहे थे कि ये अँधेरा ही कल की तस्वीर है, और विदेशों में ओक्सफेम अपनी माफ़ी अख़बारों में छपवा रही थी।

Oxfam का माफीनामा

भारतीय पत्रकारों की एक अभिजात्य, खानदानी, बिरादरी जिस पोस्ट ट्रुथ के दौर की बात करती है, उसी की तर्ज पर देखें तो हम भी असहिष्णुता के बाद के दौर में हैं। उनके पास लाल माइक है, उनके पास रेडियो चैनल हैं, उनके पास काले करने को पन्ने वाले अखबार भी हैं। दर्जनों सोशल मीडिया पेज और वेबसाइट के जरिए वो इन्टरनेट पर भी छाए हैं। सवाल है कि उनका जवाब देने के लिए एक साधारण आदमी के पास क्या है? और ये सवाल बहुत बड़ा सवाल इसलिए है क्योंकि भारत का संविधान लिखित तौर पर तो आम आदमी की आवाज को भी बड़े लोगों की बराबरी का हक़ देता है, लेकिन ये हक़ जमीन पर उतरा भी है या कागजों पर ही रह गया, ये कोई नहीं पूछता।

आलम ये है कि एक आम आदमी तो अपने हकों के लिए आखिरी दरवाजे की तरह अदालतों का दरवाजा खटखटाता है, मगर उसी के फैसले जब आते हैं तो आश्चर्यजनक रूप से एक फैसला “न्याय की जीत” और बिलकुल वैसा ही दूसरा फैसला “इन्साफ का क़त्ल” करार दिया जाता है। लोकतंत्र के चार खम्भे जब गिनवाए जाते हैं तो विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बाद पत्रकारिता का नंबर भी आता है। जब पहले तीन से जनता सवाल कर सकती है तो आखिर ऐसा क्यों है कि पत्रकारिता सीजर्स वाइफ की तरह सवालों से बिलकुल परे करार दी जाती है?

हाल के दौर में बड़े चैनलों के फर्जी खबरें छापने के कम से कम तीन बड़े मामले प्रकाश में आए हैं। पहला मामला तत्कालीन आरएसएस प्रमुख के बयान को तोड़ने-मरोड़ने का था, जिसमें बड़े चैनल सामने आए थे। कुछ दिन बाद बीबीसी ने “वॉर एंड पीस” को लेकर एक खबर चलाई, जिसका न्यायालय से कोई लेना देना नहीं था। अब सामने आ रहा है कि वायर, क्विंट जैसे तथाकथित रूप से समाचार चलाने वाले पोर्टल करीब साल भर पहले जो अमित शाह के पुत्र के बारे में छाप रहे थे, वो भी फर्जी था। मानहानि के दावे के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट से सिब्बल ने याचिका वापस ले ली है।

इस पूरे वाकये में एनडीटीवी और उससे जुड़े लोगों की याद इसलिए आती है क्योंकि एक चैनल एनडीटीवी गुड टाइम्स भी आता था। उसका किंगफ़िशर के साथ कुछ करार था और किंगफ़िशर कैलेंडर छापने वाले लोग आजकल फरार चल रहे हैं। बाकी मेरे ख़याल से अगर बचपन के खेल वाली घोघो रानी ये पूछे कि पानी कितना है? तो बताइयेगा कि चुल्लू भर ही था, इसलिए छेनू उसमें डूब के मर न सका!

‘हमें भरतनाट्यम सीखना है लेकिन नटराजा-सरस्वती को प्रणाम नहीं करेंगे, जीसस वाले स्टेप डालो’

निहारिका गौड़ा नाम की एक ट्विटर यूज़र ने अपनी माँ, जो कि भरतनाट्यम शिक्षिका भी हैं, के साथ हुई एक घटना लिखी है, जिसे पढ़कर कोई भी हैरान रह जाएगा। निहारिका द्वारा शेयर की गई घटना से हमें पता चलता है कि समाज में असहिष्णुता और पंथिक कट्टरता कितनी ज्यादा बढ़ती जा रही है।

दरअसल, एक ईसाई दंपती ने अपने बच्चों को भरतनाट्यम में दाखिला दिलाने के बाद नटराजा की आरती करने से मना कर दिया। उन्होंने अपने पंथ से जुड़ी हुई चीज़ें भरतनाट्यम में जोड़कर सिखाए जाने की मॉंग भी की।

पूजा का सामान खुद लेकर आए

निहारिका के अनुसार, जब कोई भरतनाट्यम क्लास ज्वाइन करता है, तो उसे नटराजा की पूजा करनी होती है, यही प्रचलन है। जब 2 नए बच्चों ने क्लास ज्वाइन की, तो इसके बारे में शिक्षिका (निहारिका की माँ) ने पहले ही उनके पैरेंट्स को बता दिया था। निहारिका के अनुसार, उन अभिवावकों ने इसके लिए एडवाँस धनराशि दी और पूजा का सामान भी बच्चों के लिए खरीद कर लाए।

लेकिन, शिक्षिका ने जब पूजा के बाद उन बच्चों से आरती करने के लिए कहा तो महज़ दूसरी कक्षा में पढ़ने वाले उन बच्चों ने आरती करने से सिर्फ इसलिए मना कर दिया, क्योंकि वे ईसाई हैं। इस पर भरतनाट्यम शिक्षिका ने उनके अभिवावकों को समझाने की कोशिश की कि अगर वे महज़ आरती से इतना बिदक रहे हैं, तो भरतनाट्यम सीखेंगे कैसे? चूँकि भरतनाट्यम में अधिकाँश नृत्य तो गणेश, सरस्वती, कृष्ण आदि के बारे में ही होते हैं।

“आपकी ज़िम्मेदारी है हमारे मज़हब के बारे में भी सिखाओ”

निहारिका अपने ट्वीट में लिखतीं हैं, नृत्य और पूजा के मामले पर तार्किक रूप से सोचने की बजाय दोनों बच्चों के अभिवावक माँग करने लगे कि उनके मज़हब से जुड़ी चीज़ें, जीसस से जुड़े गाने भरतनाट्यम के रूप में सिखाए जाने चाहिए। यही नहीं, इसे उन्होंने निहारिका की माँ (भरतनाट्यम शिक्षिका) की ‘ज़िम्मेदारी’ बताया और बखेड़ा करने लगे।

निहारिका लिखतीं हैं कि हालाँकि, इस ईसाई दंपती को भरतनाट्यम में जो-जो चीज़ें आतीं हैं- श्लोक, आरती, देवी-देवताओं के गाने आदि, उन सभी से समस्या है और इसके बावजूद भी वे अपने बच्चों को भरतनाट्यम सिखाना चाहते हैं।

ईसाई भी विरोध में

जिन्हें लग रहा है कि वह ईसाई दंपती गलत नहीं कर रहे हैं, उन्हें देखना चाहिए कि कैसे बहुत से ईसाई धर्म के लोग भी सोशल मीडिया पर इस दंपती की बुराई और निहारिका की माँ का समर्थन कर रहे हैं। अनीता लोबो के मुताबिक, जब उन्होंने संगीत सीखना शुरू किया तो वे रोज़ भगवती सरस्वती की आरती करतीं थीं और उनके परिवार ने कभी भी इस पर आपत्ति नहीं की। उन्होंने बताया कि उनकी बहन भी भरतनाट्यम और कथक की प्रशिक्षित नृत्यांगना हैं।

‘दूसरी औरत’ पर थरूर और सुनंदा में रोज होता था झगड़ा, कॉन्ग्रेस सांसद पर हत्या का मामला चलाने की मॉंगी इजाजत

क्या मरने से पहले सुनंदा पुष्कर अपने पति शशि थरूर के राज खोलना चाहती थीं? दिल्ली पुलिस ने कॉन्ग्रेस सांसद के खिलाफ हत्या का मामला चलाने की इजाजत मॉंगते हुए शनिवार को अदालत को बताया कि सुनंदा आईपीएल मामले को लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाली थी।

थरूर को आईपीएल की कोच्चि टीम की फ्रेंचाइजी से जुड़े विवाद में घिरने के बाद 2010 में मनमोहन सिंह की कैबिनेट से इस्तीफा देना पड़ा था। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक दिल्ली पुलिस के वकील ने बताया कि एक महिला को लेकर मौत से पहले सुनंदा और थरूर के बीच रोज झगड़ा होता था।

उन्होंने अदालत से इस मामले में थरूर के खिलाफ आईपीसी की धारा 498-A (पति और उसके रिश्तेदारों द्वारा महिला के साथ क्रूरतम व्यवहार) और 306 (आत्महत्या के लिए उकसाने) के तहत आरोप तय करने का आग्रह किया।

दिल्ली की राउज एवेन्यू अदालत में चल रही सुनवाई के दौरान सुनंदा के भाई आशीष दास ने भी अपना बयान दर्ज कराया। उन्होंने कहा, “वह (सुनंदा) शादीशुदा ज़िंदगी से खुश थीं। अपने आख़िरी दिनों में वह बहुत परेशान रहने लगी थी। लेकिन वह कभी भी आत्महत्या करने के बारे में नहीं सोच सकती थी।”

पिछली सुनवाई के दौरान भी थरूर पर घरेलू हिंसा के आरोप लगाए गए थे। बताया गया था कि मौत के समय सुनंदा के शरीर पर मारपीट के छोटे-बड़े मिलाकर 15 निशान थे, जो कम से कम 12 घंटा और अधिक से अधिक 4 दिन पुराने थे।

उल्लेखनीय है कि 17 जनवरी 2014 को दिल्ली के होटल लीला में 51 वर्षीय सुनंदा पुष्कर मृत मिली थीं। उनकी मौत के बाद से पुलिस ने थरूर के खिलाफ़ आईपीसी की धारा 498-A और धारा -306 के तहत मामला दर्ज किया। फिलहाल वह जमानत पर हैं।

केरल: मुस्लिम छात्र मोर्चा ने कॉलेज में फहराया PAK का झंडा, बीजेपी ने कहा-परिसर में घुसे आतंकी

केरल के एक कॉलेज के कैंपस के अंदर पाकिस्तान का झंडा फहराने के आरोप में 30 से अधिक छात्रों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। जानकारी के मुताबिक, यह घटना गुरुवार (अगस्त 29, 2019) को हुई, जब मुस्लिम छात्र मोर्चा (MSF) के छात्र पेरम्बरा सिल्वर कॉलेज परिसर के अंदर संघ चुनाव के तहत जुलूस निकाल रहे थे।

बता दें कि, केरल के कोझीकोड जिले के पेरम्बरा पुलिस ने कॉलेज परिसर के भीतर पाकिस्तानी झंडा लहराने के लिए उनके खिलाफ मामला दर्ज किया है। मुस्लिम छात्र मोर्चा के आरोपित छात्रों पर आईपीसी की धारा 143, 147, 153 और 149 के तहत मामला दर्ज किया गया। इस घटना में शामिल छात्रों की पहचान की पुष्टि करने के बाद आगे की कार्यवाही की जाएगी।

छात्रों का दावा है कि MSF का झंडा भी पाकिस्तान के राष्ट्रीय ध्वज की तरह दिखता है। कॉलेज के शासी निकाय के अध्यक्ष एके थारुवयी ने कहा कि एमएसएफ ध्वज को उल्टा रखा गया था, जिसकी वजह से वह पाकिस्तान के राष्ट्रीय ध्वज की तरह लग रहा था। उन्होंने कहा कि जुलूस छुट्टी के दिन आयोजित किया गया था। साथ ही उन्होंने सोमवार (सितंबर 2, 2019) को मामले में जाँच का आश्वासन दिया है। हालाँकि, बीजेपी ने आरोप लगाया है कि कॉलेज परिसर में आतंकवादी घुस गए हैं।

कहॉं गए पाकिस्तान के सिख: 15 साल में 40 हजार से 8 हजार हो गए

सिख लड़की को घर से उठाकर आतंकी से निकाह कराने की घटना ने पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों पर होने वाले अत्याचार को फिर से बेनकाब कर दिया है। जिस पाकिस्तान में गुरु नानक देव का जन्मस्थान ननकाना साहिब है वहॉं सिखों के वजूद पर ही खतरा मॅंडरा रहा है।

15 साल में उनकी आबादी घटकर 40 हजार से 8 हजार पर सिमट गई है। सिखों का अस्तित्व खत्म करने के लिए कितनी बड़ी साजिश चल रही है इसे गुरुवार (29 अगस्त) को सामने आई घटना से भी समझा जा सकता है।
ननकाना साहिब गुरुद्वारा तंबी साहिब के एक ग्रन्थि (सिख पुजारी) की 19 साल की बेटी को घर से गुंडे घसीट कर ले गए। जबरन इस्लाम क़बूल करवाया और फिर हाफ़िज सईद के आतंकी संगठन के जमात-उद-दावा के मोहम्मद हसन से उसका निक़ाह करवा दिया गया।

मामले के तूल पकड़ने पर पहले पीड़ित लड़की का एक वीडियो सामने आया। इसमें बताया गया कि उसने अपनी मर्जी से इस्लाम क़बूल कर हसन से निक़ाह की है। फिर लड़की को डराने-धमकाने की बात सामने आई। इस्लाम क़बूल नहीं करने पर उसके पिता और भाई को गोली से मार देने की धमकी दी गई। अब भारत के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बने दबाव के कारण पीड़िता को सुरक्षित उसके घर पहुँचाने की बात सामने आई है।

लेकिन हर मामला न तो इतना तूल पकड़ पाता है और न ही उस तरह से पाकिस्तान पर दबाव बन पाता है। लिहाजा, पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों को प्रताड़ित करने का सिलसिला दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा है। ख़बर के अनुसार, पाकिस्तान में 2017 में हुई जनगणना में सिखों की आबादी 8 हजार है। 2002 में पाक में सिखों की आबादी 40 हज़ार होने का अनुमान लगाया गया था।

लाहौर के जीसी कॉलेज यूनिवर्सिटी में प्राध्यापक और अल्पसंख्यक अधिकार कार्यकर्ता प्रोफेसर कल्याण सिंह के अनुसार सिखों की आबादी घटने का एक बड़ा कारण जबरन धर्म परिवर्तन भी है। विश्व के समृद्ध सिख समुदाय की ओर से पाकिस्तान के सिखों की दशा की अनदेखी को भी वे इसके लिए ज़िम्मेदार मानते ।

उन्होंने कहा कि अफ़गानिस्तान और ईरान में भी सिखों की ऐसी ही हालत है। पाकिस्तान में सिखों या अल्पसंख्यकों के लिए अपना कोई फैमिली लॉ जैसा मज़बूत क़ानून नहीं है। पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों के जबरन धर्म परिवर्तन को रोकने के लिए कोई ख़ास क़ानूनी संरक्षण प्राप्त नहीं है। 

पाकिस्तान की प्रशासनिक व्यवस्था का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि जाँचकर्ता से लेकर वकील और जज तक, अधिकतर बहुसंख्यक समुदाय यानी मुस्लिम हैं। इसलिए सिख समुदाय से जुड़े मुद्दों का क़ानूनी तौर पर कोई समधान मौजूद ही नहीं होता। शेष बचे आठ हज़ार सिखों की सबसे बड़ी परेशानियों में शिक्षा, ग़रीबी और भेदभाव जैसे अहम मुद्दे शामिल हैं।

‘बाबरी मस्जिद शिया वक्फ की संपत्ति, हम उसे मंदिर निर्माण के लिए हिंदुओं को देने को तैयार’

शिया वक्फ बोर्ड ने शुक्रवार (अगस्त 30, 2019) को उच्चतम न्यायालय से कहा कि वह अयोध्या में 2.77 एकड़ विवादित जमीन का तिहाई हिस्सा मंदिर निर्माण के लिए हिंदुओं को देने को तैयार है, जो इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मुस्लिम संगठनों को आवंटित किया था। 

शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड की ओर से पेश वकील एमसी ढिंगरा ने शुक्रवार को अदालत में दलील देते हुए कहा कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए 2010 के फैसले में, विवादित भूमि का एक तिहाई हिस्सा समुदाय विशेष को दिया गया था, न कि सुन्नी वक्फ बोर्ड को। इसलिए वो अपना हिस्सा हिन्दुओं को देना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि इसका एक आधार यह भी है कि बाबरी मस्जिद शिया वक्फ की संपत्ति है। उन्होंने बताया कि विवादित संपत्ति शियाओं को बिना नोटिस दिए सुन्नी वक्फ के तौर पर पंजीकृत कर दी गई और बाद में शिया बोर्ड 1946 में अदालत में इस आधार पर मामले को हार गया कि उसने एक सुन्नी इमाम नियुक्त कर लिया था।

ढिंगरा ने कहा कि हिंदुओं ने जो दलीलें दी हैं, उनसे पूर्वाग्रह रखे बिना, शिया उस संपत्ति पर अधिकार का दावा नहीं करते। 1936 तक इस पर शियाओं का कब्जा था और इसके पहले तथा अंतिम मुतवल्ली शिया थे और किसी सुन्नी को कभी मुतवल्ली नियुक्त नहीं किया गया।

इसके साथ ही, अखिल भारतीय श्री राम जन्म भूमि पुनरुद्धार समिति की ओर से वरिष्ठ वकील पी एन मिश्रा ने अपनी संक्षिप्त दलीलें रखीं और विवादित स्थल के जमीन रिकॉर्ड में हस्तक्षेप किए जाने का आरोप लगाया। मिश्रा ने कहा कि जमीन पर दावे को लेकर दूसरे समुदाय के पास कोई ठोस पक्ष नहीं है। उन्होंने कहा, ‘‘वाकिफ (वक्फ करने वाला) को जमीन का मालिक होना चाहिए। यहाँ बाबर जमीन का मालिक नहीं था।’’ उन्होंने कहा कि इस्लामी कानून और परंपराओं के तहत जमीन को वैध तरीके से अल्लाह को सौंपा जाना चाहिए और बाबर यह काम मीर बकी के जरिए नहीं कर सकता था क्योंकि इस्लाम में एक एजेंसी के माध्यम से जमीन सौंपना निषिद्ध है। मिश्रा ने कहा कि मस्जिद होने के लिए दिन में दो बार अजान के बाद नमाज पढ़ी जानी चाहिए, जबकि विवादित स्थल के मामले में ऐसा नहीं था।

पी एन मिश्रा ने कहा कि एक मस्जिद में ‘वजू’ करने के लिए पानी की टंकी होनी चाहिए मगर यहाँ पर ऐसा कोई बंदोबस्त नहीं था। उन्होंने कहा कि मस्जिद में सजीवों की कोई तस्वीर, फूलों की डिजाइन आदि नहीं होनी चाहिए जबकि विवादित स्थल पर ये सारी चीजें थीं। अदालत आगे की सुनवाई 2 सितंबर को करेगी जब मुस्लिम पक्ष आगे की दलीलें रखेगा।

₹485 करोड़ का बिटकॉइन स्कैम: साथियों के हाथों मारा गया मास्टरमाइंड अब्दुल शकूर, 5 गिरफ़्तार

देहरादून पुलिस ने 485 करोड़ रुपए के बिटकॉइन स्कैम के ‘मास्टरमाइंड’ 24 वर्षीय अब्दुल शकूर की हत्या की गुत्थी सुलझाने का दावा किया है। अब्दुल की बुधवार देर रात हत्या कर लाश एक प्राइवेट हॉस्पिटल के इमरजेंसी वॉर्ड में छोड़कर हत्यारे फ़रार हो गए थे। पुलिस ने अब्दुल के 5 सहयोगियों को हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया है।

पुलिस ने शुक्रवार (30 अगस्त) को केरल के रहने वाले फारिस ममनून, अरविंद सी, आसिफ अली, सुफ़ैल मुख़्तार और आफ़ताब मोहम्मद को गिरफ़्तार किया। ये सभी केरल के रहने वाले हैं। इस मामले से जुड़ी जानकारी देते हुए देहरादून के एसएसपी अरुण मोहन जोशी ने बताया, “अब्दुल शकूर की हत्या की मुख्य वजह सैकड़ों करोड़ की क्रिप्टोकरंसी थी। सभी आरोपी शकूर की टीम के सदस्य थे। उन्होंने शकूर को मारने से पहले प्रेम नगर इलाके के एक घर में उसे यातनाएँ दी थीं।”

इसके आगे उन्होंने बताया कि पुलिस इन आरोपितों की तलाश कर रही थी। ये सभी केरल के मंजेरी कस्बे के रहने वाले हैं। शकूर ने कथित तौर पर मंजेरी के स्थानीय लोगों से बिटकॉइन में निवेश करने के लिए 485 करोड़ रुपए का इंतजाम किया था। पुलिस ने बताया कि बिटकॉइन में नुकसान होने के बाद शकूर और उसके साथी केरल से भाग आए। मगर केरल से कुछ लोग इनके पीछे लगे हुए थे जिसके चलते ये लोग बार-बार अपना स्थान बदल रहे थे।

एसएसपी जोशी ने बताया कि 12 अगस्त को अब्दुल शकूर के साथ आशिक देहरादून पहुँचा और किराए का घर तलाशने लगा। 20 अगस्त को उन्हें प्रेम नगर इलाक़े के सुधोवाला में एक घर किराए पर मिला, जहाँ 26 अगस्त को उनके कुछ अन्य साथी भी आए। जोशी के मुताबिक़, “अन्य सभी साथियों ने शकूर पर दबाव डाला कि वह अपने खाते का पासवर्ड शेयर करे, शकूर ऐसा करने को राज़ी नहीं था। इसके बाद में वे सभी उसे (शकूर) प्रताड़ित करने लगे, जिससे उसकी मौत हो गई। उसके शरीर पर चोट के निशान हैं।”

शकूर के बेहोश हो जाने के बाद उसके सहयोगियों उसे दो अस्पतालों में ले गए, पहले उसे बल्लूपुर चौक के पास एक अस्पताल ले गए, जहाँ डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। फिर वे उसे देहरादून-मसूरी मार्ग पर स्थित एक सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल ले गए। वहाँ भी डॉक्टरों ने बताया की वह मर चुका है। पुलिस के एक अधिकारी ने बताया कि इसके बाद सारे आरोपित अपने वाहन अस्पताल में ही छोड़ भाग गए।

बुद्धिजीवी की बुद्धि की भुर्जी: जब अपशब्दों के बुलबुले उठने लगें, तेल निकल कर अलग होने लगे तो…

बुद्धिजीवी की बुद्धि का वैसे तो बहुत कुछ बनाया जा सकता है किन्तु आज हम भुर्जी बनाने की विधि देखेंगे। पहले एक बुद्धिजीवी लीजिए। सबसे पहले उसकी बुद्धिमत्ता नाप लीजिए। स्वयं को जितना ऊँचे स्तर का बुद्धिजीवी समझकर जितना अधिक मत्त हो, उसकी बुद्धि-मत्ता उतनी अधिक समझनी चाहिए। ऐसा बुद्धिजीवी भुर्जी बनाने के लिए उपयुक्त होता है।

यह आवश्यक है कि बुद्धिजीवी कम से कम राष्ट्रीय स्तर का हो। अंतरराष्ट्रीय स्तर का बुद्धिजीवी मिल जाए तो बहुत बढ़िया रहता है, और न ही मिले तो कोई लोटा बुद्धिजीवी भी ले सकते हैं। लोटा अर्थात ‘लोकल टाइप’ बुद्धिजीवी कच्चे होते हैं, दिमाग छोटा और बुद्धि काफी ठोस होती है। लेकिन इसमें कुछ घुसाना कठिन होता है। इसमें ‘टीआरपी के लिए कुछ भी करेगा’ स्तर के पत्रकार, बी-ग्रेड फ़िल्मों के कलाकार और उनके फैन होते हैं। ये कब, कहाँ, किस बात पर कैसे लुढ़क जाएँ किसी को पता नहीं होता। ये लोटे में रहते हैं और लोटे को ही अथाह संसार मानते हैं और लोटे से कभी बाहर निकल ही नहीं पाते।

राष्ट्रीय स्तर के बुद्धिजीवी का दिमाग बड़ा, तर्क पिलपिले और जीभ बड़ी होती है। इनमें बड़बोले नेता, पत्रकार, वकील और लेखक-कवि आदि शामिल होते हैं। चिंता में डूबे रहना इनका प्रमुख लक्षण है। इनको लगभग हर बात की चिंता होती है और मीडिया को इनकी चिंता की बहुत चिंता होती है। ऐसे लोग, सुबह-सुबह शीशे में अपना मुँह देख लेते हैं, फिर चिंता करते है, और अगले दिन अखबार में छापते हैं – देश में बढ़ते प्रदूषण और गंदगी पर बुद्धिजीवियों ने चिंता जताई है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर के बुद्धिजीवी का दिमाग और बुद्धि दोनों छोटे और पके हुए होते हैं, पर भुर्जी बनाने के लिए श्रेष्ठ होते हैं। इनमें अंग्रेजी कूट-कूट कर भरी होती है, लेकिन ‘घेरावइंग’ करने के लिए शब्द ऑक्सफ़ोर्ड शब्दकोष में भी नहीं ढूँढ पाते। ऑक्सफ़ोर्ड ब्रांड के छुट्टे सांड हों या टुच्चे इतिहासकार, जन्मभूमि के विवाद में जीसस को घसीटने वाले न्यायाधीश हों या नए नोट छापकर अर्थव्यवस्था को मजबूत कर देने वाले मैग्सेसे छाप पत्रकार। ये सब अंतरराष्ट्रीय स्तर के बुद्धिजीवी हैं। अपने दिमाग से बड़ी बात सोचकर फँसने की इनकी पुरानी आदत होती है।

आजकल बुद्धिजीवी जैसे दिखने वाले जीभी भी बहुतायत में पाए जाते हैं। इनके पास केवल जीभ होती है, दिमाग नहीं। क्या बोलते हैं, यह इनको भी पता नहीं होता। इनसे सावधान रहिए, इनका न दलिया बनता है न भुर्जी, इनका रायता ही बनता है।

चलिए हम भुर्जी बनाने की विधि पर वापस आते हैं। आप ऊपर बताए किसी एक बुद्धिजीवी को चुन लीजिए, यह ध्यान रहे बुद्धिजीवी की मात्रा बड़ी ई की हो, छोटी इ की मात्रा वाले बुद्धिजीवी की बुद्धि की भुर्जी नहीं बनती, दलिया बनता है।

भुर्जी बनाने के लिए पहले बुद्धिजीवी की किसी बात का एक छोर पकड़ लें। फिर उसको खींचना शुरू करें, उसे तब तक खींचें जब तक बात का बतंगड़ न बन जाए। बतंगड़ बन जाने पर उसे यथासंभव उछाल कर देखें, जब बतंगड़ के बीच बुद्धिजीवी के साथ उसके नाते-रिश्तेदार और खानदान भी उछलता दिखने लगे तब उसे एक तरफ सूखने, चटकने और सिकने के लिए रख दें। बीच बीच में एक दो ट्वीट छोड़ते हुए धीरे-धीरे बुद्धिजीवी को मद्धम आँच पर पकने दें, आप देखेंगे कि वह गर्म हो रहा है। उसकी बातों में आपको भाप उड़ती हुई साफ़ दिखने लगेगी।

हो सकता है कि वह कभी थोड़ा ज्यादा सुलग जाए और पलटकर उत्तर दे दे, तब उसे दंडवत कर आशीर्वाद माँग लें। उसके बाद उसे धीरे-धीरे सेंकते रहें। बुद्धिजीवी का धैर्य धीरे-धीरे सूखने लगेगा, उसके उत्तर अधिक रूखे होने लगेंगे। थोड़ी देर में उसकी बातों में अपशब्दों के बुलबुले उठने लगेंगे। ऐसे में बुलबुले बाहर भी उचट सकते हैं, आप चाहें तो कुछ देर के लिए ढक्कन लगा दें। जब बुलबुले फूटने बंद हो जाएँ, और बुद्धिजीवी की बुद्धि का तेल निकल कर अलग होने लगे तो आँच बढ़ा दें।

सभी मात्राओं का विशेष ध्यान रखें। मात्रा इधर-उधर होने पर आप भी जल सकते हैं। बुद्धिजीवी की बातों में जब धुआँ उठने लगे, तर्क और बात अलग-अलग दिखने लगे, कान लाल और मन काला दिखने लगे तो समझिए भुर्जी लगभग तैयार होने वाली है। जैसे ही आपको लगे कि अब आप ब्लॉक होने की कगार पर हैं, मुट्ठीभर चंद्रबिंदुओं से गार्निश कीजिए। बुद्धिजीवी के भेजे की भुर्जी तैयार है। ब्लॉक होने पर गर्मागर्म स्क्रीनशॉट के साथ पोस्ट करें।

हिंदू लड़की का धर्म परिवर्तन, निकाह, रेप की कोशिश और अंत में तीन तलाक: सास ने घर से निकाला

उत्तर प्रदेश के बलरामपुर में एक हिंदू लड़की का धर्म परिवर्तन कराकर पहले उससे निक़ाह करने और फिर दो साल बाद दूसरी शादी कर फोन पर तलाक़ देने का मामला सामने आया है। दो साल पहले रेहरा बाज़ार थाना क्षेत्र के मसीहाबाद गाँव की 25 वर्षीय हिंदू युवती का प्रेम-प्रसंग गाँव के ही अब्दुल कुद्दूस से चल रहा था। अब्दुल युवती पर निक़ाह का लगातार दबाव बना रहा था, इसके लिए वो उसे आत्महत्या कर लेने की धमकी (इमोशनल ब्लैकमेल) भी दे रहा था।

काफ़ी दबाव के बाद युवती जब निक़ाह के लिए राज़ी हुई तो अब्दुल उसे दूसरी जगह ले गया, जहाँ उसने उसका धर्म परिवर्तन कराया और उसका नाम बदलकर निशा बानो रख दिया। इसके बाद 11 हज़ार रुपए मेहर की रक़म तय कर निक़ाह किया। निक़ाह के कुछ रोज बाद अब्दुल कुद्दूस काम करने सऊदी अरब चला गया। वहाँ वो क़रीब दो साल रहा, इस बीच निशा बानो बनी हिंदू युवती अपने ससुराल में रह रही थी।

पीड़िता ने आरोप लगाते हुए बताया कि जब अब्दुल सऊदी अरब में था तो उस दौरान उसके देवर और उसके पति के बहनोई ने उसके साथ रेप करने की कई बार कोशिश की। इसका विरोध करने पर पीड़िता को मारपीट कर घर से बाहर निकाल दिया गया। इसके बाद पीड़िता अब्दुल की वापसी का इंतज़ार करने लगी और गाँव के आसपास मेहनत-मज़दूरी कर दिन गुज़ारने लगी।

दैनिक जागरण के बलराम संस्करण में छपी ख़बर

पीड़िता ने अपनी शिक़ायत में बताया कि तीन दिन पहले अब्दुल ने अपने दोस्त के मोबाइल पर उसे (पीड़िता) तीन तलाक़ दे दिया। तब पीड़िता को पता चला कि उसका पति सऊदी अरब से मुंबई आ गया है। साथ ही उसे यह भी पता चला कि अब्दुल ने दूसरा निक़ाह कर अपने परिवार को मुंबई बुला लिया है।

इस मामले में एसपी देवरंजन ने कहा कि ज़िले में धर्म परिवर्तन कराकर तीन तलाक़ मामला संज्ञान में आया है। स्थानीय थाने की पुलिस को जाँच के आदेश दे दिए गए हैं और जल्द ही पीड़िता को न्याय दिलाया जाएगा। साथ ही उन्होंने कहा कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन्स के अनुसार कार्रवाई की जाएगी। 

31121004 Vs 1906657: असम में NRC की फाइनल ल‍िस्‍ट का आँकड़ा, संवेदनशील जिलों में धारा 144 लागू

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने शनिवार (अगस्त 31, 2019) को एनआरसी (NRC) की अंतिम सूची प्रकाशित कर दी है। एनआरसी के स्टेट कॉर्डिनेटर प्रतीक हजेला ने बताया कि इस लिस्ट में 3,11,21,004 (3 करोड़ 11 लाख 21 हजार चार) लोगों के नाम शामिल हैं, जबकि 19,06,657 (19 लाख 6 हजार 657) लोगों के नाम शामिल नहीं हैं। इनमें वह लोग भी शामिल हैं, जिन्होंने अपने दावे प्रस्तुत नहीं किए। उन्होंने कहा कि जो लोग इससे संतुष्ट नहीं है, वे फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल में अपील दायर कर सकते हैं।

राज्य सरकार ने सूची में नाम नहीं आने पर लोगों को भयभीत न होने और हरसंभव मदद करने का आश्वासन दिया है। असम में सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी गई है। हिंसा और सांप्रदायिक झड़पों की आशंकाओं को देखते हुए राज्य सरकार और गृह मंत्रालय ने लोगों से शांति की अपील की है। पुलिस द्वारा जारी एडवाइजरी में लोगों से अफवाहों, सुनी-सुनाई बातों, फेक न्यूज पर विश्वास न करने की अपील की गई है। गुवाहाटी समेत 14 संवेदनशील जिलों में धारा 144 लागू है। सुरक्षा-व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए 51 कंपनियाँ तैनात की गई हैं।

असम के सीएम सर्वानंद सोनेवाल ने एनआरसी की अंतिम सूची जारी होने से पहले यहाँ के लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की। उन्होंने कहा, “मैं आप सभी से असम में शाँति और धीरज बनाए रखने की अपील करता हूँ। जब तक अपील करने का समय है, तब तक किसी को विदेशी नहीं माना जाएगा। राज्य सरकार कानूनी समर्थन का विस्तार करेगी। सरकार इन लोगों की परेशानियों पर ध्यान देगी और यह देखेगी कि उनका किसी तरह का उत्पीड़न न हो।” उन्होंने कहा कि जिनका नाम इस लिस्ट में शामिल नहीं है, वो 120 दिनों के अंदर फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल में अप्लाई कर सकते हैं।

बता दें कि उच्चतम न्यायालय ने साल 2013 में एनआरसी अपडेट करने का आदेश दिया था। जिससे कि बोनाफाइड नागरिकों की पहचान की जा सके और अवैध अप्रवासियों को बाहर निकाला जा सके। मगर इस पर असल काम फरवरी 2015 से शुरू हुआ था। सुप्रीम कोर्ट ने 31 अगस्‍त तक एनआरसी की अंतिम सूची जारी करने की अंतिम समय सीमा तय की थी। सरकार ने तय समय के भीतर यह सूची जारी कर दी है।