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DD से निकाले जाने के बाद बीफ प्रोमोशन पर घिरी इरा त्रिवेदी, बोली- माफ़ करो, दिल से हूँ हिन्दू

बीफ (गोमांस) का प्रचार करने के कारण सोशल मीडिया पर लगातार हो रहे विरोध के बाद इरा त्रिवेदी को दूरदर्शन ने योग वाले शो से हटा दिया है। इरा रोजाना सुबह दूरदर्शन पर ‘योगा विद इरा त्रिवेदी’ कार्यक्रम पेश करती थीं। अब उनकी जगह यामिनी मुथाना को इस शो की जिम्मेदारी दी गई है। इस घटना के बाद इरा त्रिवेदी ट्विटर पर स्पष्टीकरण देते हुए देखी जा रही हैं।

दूरदर्शन पर ‘योगा विद इरा त्रिवेदी’ के नाम से शो चलाने वाली इरा त्रिवेदी ने गुरुवार (जुलाई 25, 2019) को ट्विटर पर लिखा कि वो शुद्ध शाकाहारी हैं और हिंदू धर्म का सम्मान करती हैं। उन्होंने कहा कि वो सभी धर्मों और ग्रंथों का सम्मान करती हैं, लेकिन हिंदू धर्म उनके दिल में है।

इरा ने आगे लिखा कि वो योग का अभ्यास करने वाले सभी लोगों के लिए शाकाहारी भोजन करने को कहती हैं और इसे बढ़ावा देती हैं। इरा का कहना है कि जो लोग उन्हें इंस्टाग्राम पर फॉलो करते हैं वो देख सकते हैं कि वो (इरा) शाकाहारी भोजन की कितनी वकालत करती हैं।

दरअसल, 19 जुलाई को दूरदर्शन ने एक ट्वीट किया था जिसमें लिखा था- “स्वस्थ और फिट रहने के लिए सुबह 6.30 बजे देखना नहीं भूलें, हमारी प्रस्तुति कार्यक्रम “योगा विद इरा त्रिवेदी” सिर्फ @DDNational पर।”

इस ट्वीट के बाद इरा का एक पुराना ट्वीट वायरल होने लगा, जिसमें उन्होंने हिन्दू धर्म की तुलना इस्लाम से करते हुए हिन्दू धर्म को पिछड़ा और इस्लाम के धर्मग्रंथ कुरान को प्रोग्रेसिव बताया था। दरअसल, यह सब तब शुरू हुआ जब सीएनएन न्यूज 18 के साथ उनका 2017 का इंटरव्यू सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। वायरल वीडियो में, वह गोमांस (बीफ) को प्रोटीन का सबसे सस्ता स्रोत बताती हैं। इंटरव्यू में इरा त्रिवेदी बीफ पर प्रतिबंध की बात कर रही थीं। इस दौरान उन्होंने कहा कि उनके अनुसार गोमांस कुपोषित लोगों के लिए प्रोटीन का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। इसलिए गोमांस पर प्रतिबंध लगाना अनुचित होगा, विशेष तौर पर मुस्लिम समुदाय के लिए।

बता दें कि, इरा कॉन्ग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री वीसी शुक्ला की पोती हैं।

वीसी शुक्ला इंदिरा गाँधी सरकार में सूचना और प्रसारण मंत्री थे। वे पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी और उनके बेटे संजय गाँधी के करीबी सहयोगी थे। अपने कार्यकाल के दौरान, वह प्रेस को मोहरा बनाने के लिए कुख्यात थे। वह ऐसे कॉन्ग्रेस नेता थे, जिन्होंने आकाशवाणी और दूरदर्शन पर किशोर कुमार के गानों पर प्रतिबंध लगा दिया था।

इरा त्रिवेदी के इंटरव्यू पर प्रतिक्रिया देते हुए कई लोगों ने कहा कि वो तथ्यात्मक रूप से गलत बयान दे रही थी और साथ ही उन लोगों ने ये भी साबित करके दिखाया कि बीफ प्रोटीन का सबसे सस्ता स्रोत क्यों नहीं है।

वीडियो वायरल होने के बाद, इरा के पिछले ट्वीट्स के कई स्क्रीनशॉट भी काफी तेजी से शेयर होने लगा। जिसमें इरा हिन्दू धर्म की तुलना इस्लाम से करते हुए आधुनिक हिन्दू धर्म को पिछड़ा और इस्लाम के मजहबी ग्रंथ कुरान को प्रोग्रेसिव बताती हैं। वायरल हो रहे स्क्रीनशॉट का जवाब देते हुए इरा ने कहा कि उनकी बातों को अलग तरीके से देखा जा रहा है। हालाँकि, ट्विटर यूजर इरा के जवाब और माफी से संतुष्ट नहीं हैं।

इरा के हिन्दू-विरोधी बयानों को लेकर कई लोग काफी हैरत में पड़ गए। कुछ ने इरा को ‘हिंदूफोबिक’ कहा, तो कुछ ने दूरदर्शन से उनके एक कार्यक्रम के लिए होस्ट के रूप में चुनने को लेकर भी सवाल किया है।

प्रसार भारती के सीईओ शशि शेखर ने इस मुद्दे पर ध्यान दिया और इसे दूरदर्शन के महानिदेशक को भेज दिया।

डीडी के ही पत्रकार अशोक श्रीवास्तव ने भी इरा के होस्ट के रुप में चुनने को लेकर दूरदर्शन पर सवाल उठाया। इरा त्रिवेदी ने ट्वीट कर अशोक श्रीवास्तव से माफी माँगी है।

गौरतलब है कि, पिछले साल अक्टूबर में, मीटू अभियान के तहत इरा त्रिवेदी ने जाने-माने लेखक चेतन भगत पर जबरदस्ती चूमने की कोशिश करने का आरोप लगाया था। जिसके बाद उन्होंने सारे ईमेल सार्वजनिक कर दिए। इसमें इरा ने ‘मिस यू किस यू’ के मैसेज के साथ साइन ऑफ किया था।

1984 से चल रही थी कारगिल की तैयारी, हवा में मुशर्रफ़ को बर्खास्त कर कुर्सी गँवा बैठे नवाज़ शरीफ़

किसी राजनीति के मशहूर पंडित (शायद मैक्यावेली/Machiavelli) ने कहा था कि राजनीति में दुश्मन का हाल चाल दोस्तों से ज्यादा पता रखना चाहिए। कारगिल को आज 20 साल हो गए हैं। पाकिस्तान इन बीस सालों में लोकतंत्र, राजनीति, अर्थव्यवस्था यानि एक राष्ट्र की सफ़लता के हर लिहाज से जहाँ इन दो दशकों में बद से बदतर हुआ है, वहीं तमाम उतार-चढ़ावों के बावजूद हिंदुस्तान की सफलता पाकिस्तान की तुलना में अचम्भित कर देने वाली रही है। और इसका एक बड़ा श्रेय हिंदुस्तान के स्थिर लोकतंत्र और पाकिस्तान के उलट हिंदुस्तानी सेना में एक संस्था के तौर पर सत्ता-लोलुपता के अभाव की बड़ी भूमिका है। आज यह ज़रूरी है कि हम सीमा के उस पार पाकिस्तान की राजनीति पर नज़र डालें, और देखें कि कारगिल के हालात राजनीतिक रूप से कैसे पैदा किए गए, और उसके बाद क्या हुआ, ताकि भविष्य में भी कभी हम वही गलतियाँ दोहराने की गलती न करें।

1984 से नज़र

1984 में दुर्गम और रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण सियाचिन दर्रे पर हिंदुस्तानी सेना के कब्ज़े के बाद से पाकिस्तानी सेना की नज़र इसका ‘बदला’ लेने पर थी। इसके लिए पाकिस्तान के चार जनरलों ने एक ‘प्लान’ तैयार किया। जानकारों की मानें तो यह प्लान कारगिल क्षेत्र में पाकिस्तानी घुसपैठ का ही था। किन्हीं कारणवश न केवल नागरिक प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो, बल्कि उनके पहले सैन्य तानाशाह जनरल ज़िया उल हक ने भी इस प्लान पर अमल करने की बजाय इसे ठंडे बस्ते में ही रखा।

इसके बाद प्रधानमंत्री बने नवाज़ शरीफ़, और सेना के सिरमौर हुए जनरल परवेज़ मुशर्रफ़। ‘शांतिप्रिय’ नवाज़ शरीफ़ की हिंदुस्तानी ‘वज़ीरे-आज़म’ वाजपेयी से बढ़ती पींगों से पाकिस्तानी सेना परेशान थी दो कारणों से- पहले तो इसलिए कि पाकिस्तान में हिंदुस्तान के उलट सेना का देश के हर स्तर पर दखल है (उस समय भी था)। मलाईदार ठेकों, जो सेवारत होते हुए भी सेना और आईएसआई के जनरल खुल्लमखुल्ला लूटते हैं, के चलते सेना में भर्ती होना पाकिस्तान में तरक्की की सबसे शर्तिया और आसान सीढ़ी थी। (कॉन्ग्रेस में होने के बावजूद अक्सर पाकिस्तान को आईना दिखाने में सफल रहने वाले पूर्व संयुक्त राष्ट्र राजनयिक शशि थरूर की मशहूर कहावत है कि हिंदुस्तान में देश के पास सेना है, पाकिस्तान में सेना के लिए एक देश है।) ऐसे में अगर हिंदुस्तान के साथ शांति कायम हो जाती तो देश के संसाधनों की खुली लूट के ज़रिए सेना को दुलारने-पुचकारने की इतनी ज़रूरत न रहती। इसके अलावा दूसरा कारण यह था कि जिहादी और हिंदुस्तान-विरोधी मानसिकता को पाकिस्तान ने न केवल आतंकी संगठनों के ज़रिए पाला है, बल्कि अपने अंदर भी, अपने सैनिकों में जिहादियों की भर्ती के रूप में भी पनाह दी है।

ऐसे में एक ओर वाजपेयी के साथ नवाज़ शरीफ़ 1998 में वार्ता शुरू कर रहे थे, हिन्दुस्तान-पाकिस्तान शिखर सम्मेलन ज़ोर-शोर से करने की तैयारी कर रहे थे, और दूसरी ओर उनके सैनिक उनकी ही बेखबरी में कारगिल के शिखर पर चढ़े जा रहे थे, ‘ऑपरेशन कोह-ए-पाइमा’ (“पर्वतारोही”) के तहत। जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ द्वारा सक्रिय किए गए इस प्लान की रूपरेखा 1984 वाले प्लान पर ही आधारित थी, और मकसद था हिन्दुस्तान से सियाचिन का बदला लेने के अलावा कश्मीर में सुस्त पड़ती दहशतगर्दी को सक्रिय करना और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान के कश्मीर प्रोपेगंडा के लिए जमीन तैयार करना।

अपने ही जनरलों द्वारा ब्रीफिंग के नाम पर ‘चक्रम’ बने शरीफ़ प्रशासन को इस योजना और जंग की भनक, नसीम ज़ेहरा की किताब ‘फ्रॉम कारगिल टू कू (तख्तापलट)’ के मुताबिक, 17 मई, 1999 के आसपास लगी, जब जंग ने ज़ोर पकड़ लिया था, और ऐसे में पीछे हटना नाक कटवाना होता। तब तक 3 मई को हिंदुस्तानी गड़ेरियों ने बर्फ़ पिघलना शुरू होने के बाद पाकिस्तानी कब्ज़ा देख कर हिंदुस्तानी सेना को इत्तला कर दिया था, 5 मई को पाकिस्तानियों ने हमारी सेना के गश्ती दल के सैनिकों को टॉर्चर कर के मार डाला था, और जब तक हिंदुस्तान की गोलियों को सुनने के लिए नवाज़ शरीफ़ जनरलों के हाथ अपने कान से हटाते, जंग पूरे शबाब में थी।

बिखरा पाकिस्तान का ‘घर’

मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि किसी भी परिवार या सामाजिक इकाई का वर्गीकरण इस आधार पर किया जा सकता है कि किसी मुसीबत के आने पर उसके सदस्य और करीब आ जाते हैं, एक-दूसरे से सामान्य समय से बेहतर तालमेल बिठा लेते हैं, या आपस में ही लड़कर मुसीबत को और नासूर बना देते हैं। हिंदुस्तान और काफिरों से नफ़रत की बुनियाद पर बना पाकिस्तान अगर कभी भी एक परिवार के तौर पर रहा होगा, तो वह परिवार कारगिल के समय एक-दूसरे से ही जूझता अधिक नज़र आया।

पहले तो, जैसे कि ऊपर बताया गया है, न केवल सेना ने अपने प्रधानमंत्री को ही अँधेरे में रख कर ऑपरेशन शुरू किया और एक शत्रु देश (हिंदुस्तान) पर उस समय धावा बोला जिस समय उनके प्रधानमंत्री उसी देश से मित्रता करने की कोशिश कर रहे थे,बल्कि उन्हें इसके बारे में झूठी ब्रीफिंग भी दी।

अपनी तमाम चालबाज़ियों के बाद भी पाकिस्तान का सैन्य प्रशासन अंततः सैन्य था, और इसलिए राजनीतिक गणित में वह गलतियों पर ऐसी गलतियाँ करता गया, जो शायद दिन-रात राजनीति को ओढ़ने-बिछाने वाले नागरिक राजनेता और राजनयिक उसे करने से रोक लेते। उनकी सेना को लगा कि मुश्किल से एक साल पहले प्रकाश में आए मोनिका लेविंस्की सेक्स स्कैंडल में फँसे और हिंदुस्तान के पोखरण न्यूक्लियर टेस्ट से भड़के अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन प्रशासन की पाकिस्तान के साथ बहुत ज़्यादा सहानुभूति होगी; उसे यह भी लगा कि कश्मीर में उसके फैलाए दहशत और जिहाद से लड़ते-लड़ते हिंदुस्तानी सैनिक थक गए होंगे। उसने यहाँ तक कि गर्मियों में घुसपैठ का पता चलने के बाद हिंदुस्तान को पलटवार में कितना समय लगेगा, इसका गणित करने में भी चूक कर दी।

नतीजन न केवल हिंदुस्तान के ‘अप्रत्याशित’ रूप से द्रुत प्रत्युत्तर के चलते पाकिस्तानी सेना ने मुँह की खाई, बल्कि अमेरिका ने भी इस मामले में हिंदुस्तान के स्टैंड का स्पष्ट समर्थन किया। दुनिया के अधिकाँश देशों का दबाव भी पाकिस्तान के गले पर ही पड़ा। अंत में खीझ कर सरकार को सेना को वापिस बुलाना पड़ा।

अंदर की शतरंज में अपनी ही शह पर मात

हार के बाद प्रधानमंत्री नवाज शरीफ़ ने जो फैसले लिए, अंत में वह उनके प्रधानमंत्रित्व के ताबूत की कील साबित हुए। उन्होंने एक ओर जनरल मुशर्रफ़ को कारगिल के लिए पूरी तरह ज़िम्मेदार ठहराया और खुद के अनजान-मासूम होने का दावा किया, और दूसरी ओर मुशर्रफ़ को पद पर भी बने रहने दिया। परवेज़ मुशर्रफ़, अपनी ही किताब ‘इन द लाइन ऑफ़ फायर’ में इकबालनामे के मुताबिक, कारगिल के समय ही नवाज़ शरीफ़ की कथित कमज़ोरी और नाकाबिलियत को भाँप गए थे, और बाद में उनसे और सेना से सीधा टकराव मोल लेकर शरीफ़ ने उन्हें तख्तापलट के लिए बहाना भी थमा दिया।

जंग के बाद पाकिस्तानी सैनिक मायूस थे और अफ़सर, जो असैन्य/नागरिक सरकार को अपने से ‘नीचे’ देखने की संस्कृति में पगे हुए थे, प्रधानमंत्री की ‘जुर्रत’ से भड़के हुए थे। मुशर्रफ़ ने मौके का फायदा उठाया और तख्तापलट के आखिरी अध्याय के लिए ज़मीन तैयार करनी शुरू कर दी, जिसे पता नहीं नवाज़ शरीफ देख के अनजान बने रहे, या देख ही नहीं पाए। मुशर्रफ़ ने उस तरह से विभिन्न सैन्य अड्डों का दौरा शुरू किया, जैसे लोकतंत्र में चुनावी रैलियाँ होतीं हैं। बहाना लिया सैनिकों का ‘मनोबल बढ़ाने’ का। वह सैनिकों को साफ़ सिग्नल भेज रहे थे कि वह (मुशर्रफ़) न केवल उनके ‘अपने आदमी’ हैं, बल्कि हार के बाद उनके साथ भी खड़े हैं; वहीं ‘बाहरी’/’ब्लडी सिविलयन’ नवाज़ शरीफ़ उनके (सैनिकों के) जान की बाज़ी लगाकर बर्फ़ीली चोटी पर जंग लड़ने के बाद उन्हें अपनी नाक बचाने के लिए बलि का बकरा बना रहे हैं।

इसके बाद अंत में चेते नवाज़ शरीफ ने न केवल मूर्खतापूर्ण, बल्कि कायरतापूर्ण, कदम उठाते हुए परवेज़ मुशर्रफ़ को उस समय बर्खास्त कर दिया जब मुशर्रफ़ श्री लंका के दौरे से लौटते हुए एक हवाई जहाज में थे। शरीफ शायद मुशर्रफ़ का सामना करने से इतना हिचकिचा रहे थे कि उन्होंने जनरल मुशर्रफ़ के जहाज को पाकिस्तान की बजाय किसी भी और देश में उतारे जाने का भी आदेश दे दिया! मुशर्रफ़ ने पाकिस्तान इंटरनेशनल एयरलाइन्स के नागरिक विमान, जिसमें वह तकरीबन सौ अन्य सहयात्रियों के साथ थे, के कॉकपिट से दो फ़ोन किए यह खबर सुनने के बाद। एक अपने जनरल स्टाफ़ के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल मुहम्मद अज़ीज़ खान को, और दूसरा रावलपिंडी सैन्य टुकड़ी के लेफ्टिनेंट जनरल महमूद अहमद को। जब तक मुशर्रफ़ का जहाज कराची में उतरा, सेना ने शरीफ़ को बंदी बना लिया था, और पाकिस्तान के जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ सरताज बन चुके थे

न होगी सड़क पर हनुमान जी की आरती और न पढ़ी जाएगी नमाज: अलीगढ़ जिला प्रशासन

उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में जिला प्रशासन ने सड़कों पर सभी प्रकार की धार्मिक गतिविधियों जैसे नमाज पढ़ना, हनुमान चालीसा पढ़ना, आरती करने पर प्रतिबंध लगा दिया है। जिला प्रशासन का यह फैसला उस समय आया है जब कुछ दक्षिण पंथी समूह द्वारा सड़कों पर मुस्लिमों के नमाज पढ़े जाने के विरोध में आरती और हनुमान चालीसा पाठ का कार्यक्रम आयोजित किया जाने लगा।

जिला मजिस्ट्रेट सीबी सिंह के मुताबिक पूर्व सूचना दिए बिना सड़को पर किसी प्रकार की धार्मिक गतिविधि करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। उनका कहना है कि उन्होंने इन गतिविधियों से जुड़े लोगों से बात की है और उन्हें मामले की गंभीरता के बारे में बताया। उनके मुताबिक इस तरह की गतिविधियों से इलाके में कानून व्यव्स्था प्रभावित हो सकती है। जिला मजिस्ट्रेट का कहना है कि ये प्रतिबंध ईद के मौके पर पढ़े जाने वाले नमाज को लेकर भी है।

बता दें इस मामले में एक ओर जहाँ भाजपा नेता मानव महाजन ने जिला प्रशासन के इस फैसले का स्वागत किया है तो वहीं मौलाना खलीद रशीद फरंगी महाली ने गुहार लगाई है कि मामले का राजनीतिकरण न किया जाए। इस मामले पर भाजपा नेता ने कहा कि अगर एक समुदाय के लोग सड़कों को जाम करके नमाज पढ़ सकते हैं तो फिर हिंदू सड़कों पर महाआरती क्यों नहीं कर सकते हैं? मानव महाजन का कहना है कि वो शुक्रगुजार है उन लोगों का जिन्होंने सड़कों पर पढ़ी जा रही नमाज के बदले इस परंपरा की शुरुआत की।

वहीं, मीडिया खबरों के मुताबिक मौलाना खालीद रशीद का कहना है कि ऐसी खबर आ रही है कि सड़को पर नमाज पढ़े जाने के विरोध में लोग सड़को पर हनुमान चालीसा पढ़ेंगे, लेकिन लोगों को ये समझना चाहिए कि जब मस्जिदों में जगह खत्म हो जाती है, सिर्फ़ तभी लोगों को (मुस्लिम) जबरदस्ती सड़क पर नमाज पढनी पड़ती है। अगर किसी दूसरे धर्म में भी इबादत के दौरान जगह भर जाती है तो लोग बाहर खड़े होकर ही प्रार्थना करते हैं।

गौरतलब है इस महीने के हर मंगलवार और शनिवार बजरंग दल जैसे हिंदू संगठनों ने मंदिर के बाहर हनुमान आरती का आयोजन करवाया, जिसमें कई लोग शामिल हुए। पिछले शनिवार तो इस आयोजन में अलीगढ़ की पूर्व मेयर शकुंतला भारती भी शामिल हुईं थी और उन्होंने हनुमान चालीसा का पाठ भी किया था।

ट्रिपल तलाक़ पर PM मोदी ने निभाया अपना वादा, मौलवियों ने कहा शरीयत में दखलअंदाज़ी

लोकसभा में कड़े विरोध के बावजूद ट्रिपल तलाक़ विधेयक पास हो गया। इस विधेयक के पास होने पर जहाँ एक तरफ़ मुस्लिम महिलाओं में ख़ुशी की लहर है, तो वहीं दूसरी तरफ़ उलेमा और मौलवियों ने इस पर अपनी आपत्ति दर्ज कराते हुए इसे शरीयत के ख़िलाफ़ बताया। दारुल उलूम समेत कई उलेमाओं ने कड़ा विरोध जताते हुए इस विधेयक को शरीयत में दखलअंदाज़ी करार दिया।

ख़बर के अनुसार, तीन तलाक़ के ख़िलाफ़ बरेली की निदा ख़ान ने आवाज़ उठाई थी। उन्होंने सभी पीड़ित मुस्लिम महिलाओं को एकजुट करके तीन तलाक़ के विरोध में मोर्चा खोला था। उनका कहना है कि मोदी सरकार ने मुस्लिम महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान के लिए तीन तलाक़ बिल लाकर अपना वादा निभाया है। 

निदा ख़ान ने कहा कि मुस्लिम महिलाओं ने इसी उम्मीद से उन्हें (बीजेपी) वोट भी दिया था। इस बिल के माध्यम से उलेमा को चेताते हुए उन्होंने कहा कि अब मुस्लिम महिलाओं पर अत्याचार नहीं हो सकेगा। देश में क़ानून सबसे ऊपर है जिसे हर शख़्स को मानना होगा। इसके लिए मुस्लिम समाज की पीड़ित महिलाओं ने प्रधानमंत्री मोदी को धन्यवाद भी दिया है। बता दें कि आला हज़रत खानदान की बहू निदा ख़ान आला हज़रत हेल्पिंग सोसायटी की अध्यक्ष हैं।

इसके अलावा मेरा हक़ फाउंडेशन की अध्यक्ष फरहत नकवी का कहना कि वर्तमान सरकार ने ट्रिपल तलाक़ बिल को लाकर अपनी नीयत साफ़ कर दी है जिससे यह पता चलता है कि वो तीन तलाक़ पर रोक लगाने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है। लंबे समय से जो मुस्लिम महिलाएँ तीन तलाक़ के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ रही थीं उन्हें अब जाकर न्याय मिला है। उन्होंने यह उम्मीद भी जताई कि जल्द ही यह बिल राज्यसभा से पास होकर क़ानून बन जाएगा और महिलाएँ अपनी ज़िंदगी बिना किसी ख़ौफ़ के जी सकेंगी।

मॉब लिंचिंग: जैकम, अख्तर, साजिद, मकसूदन, सरजीना, सैकुल व रुजदार ने नवीन को बेरहमी से पीटा, मौत

हरियाणा के उदाका गाँव में एक सप्ताह पहले एक पक्ष द्वारा बेरहमी से पीटकर घायल किए गए वकील नवीन यादव की बुधवार (जुलाई 24, 2019) देर रात गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में मौत हो गई। नवीन यादव की मौत से लोगों का गुस्सा फूट पड़ा। नवीन की मौत से बौखलाए गुरुग्राम कोर्ट के वकीलों ने गुरुवार (जुलाई 25, 2019) को राजीव चौक पर प्रदर्शन किया। वकीलों ने हत्यारों को जल्द पकड़ने की माँग की।

बार एसोसिएशन के सदस्यों ने अदालत परिसर में भी धरना प्रदर्शन किया और नवीन यादव के परिवार के लिए 1 करोड़ रुपए सहयोग के रूप में देने, उनके बच्चों को बालिग होने तक फ्री शिक्षा मुहैया करवाने और उनकी पत्नी को सरकारी नौकरी की माँग की। मृतक नवीन के परिजनों की माँग है कि मुकदमे को नूंह जिला अदालत की बजाय गुरुग्राम के फास्ट ट्रैक कोर्ट में चलाकर 3 महीने में केस का निपटारा कराया जाए। साथ ही जिन गाँव के पंचों की मौजूदगी में नवीन पर जानलेवा हमला हुआ, उन सभी पंचों के खिलाफ मुकदमा चलाने की माँग की है।

दैनिक जागरण में प्रकाशित खबर

प्रदर्शन में सोहना बार एसोसिएशन के साथ नूंह व गुरुग्राम बार एसोसिएशन के सदस्यों के साथ हजारों की संख्या में हिंदू संगठनों से जुड़े लोग शामिल हुए। लोगों ने कड़ी शब्दों में घटना की निंदा करते हुए प्रदर्शन किया। करीब एक घंटे तक रोड जाम रहने से प्रशासन व पुलिस हरकत में आ गई। जाम खुलवाने के लिए मौके पर गुरुग्राम जिला अदालत के न्यायाधीश आरके सोंधी, एसडीएम नूंह प्रदीप अहलावत, डीएसपी नूंह धर्मबीर ने लोगों को उनकी माँगों को पूरा कराने का आश्वासन दिया। तब जाकर लोगों ने जाम हटाया।

इस मामले में नवीन के चाचा कुंदन की शिकायत पर तीन महिलाओं समेत 7 नामजद पर केस दर्ज किया था। जिसमें अख्तर, जैकम, साजिद को गिरफ्तार किया जा चुका है। वहीं आरोपित सरजीना, मकसूदन, रुकसार, शेकुल अभी फरार है। वहीं, जाँच अधिकारी राजकुमार को लापरवाही बरतने के मामले में निलंबित कर दिया गया।

खबर के मुताबिक, 15 जुलाई, 2019 को ऊदाका गाँव में ममरेज के पुत्र जमशेद और रुस्तम के पुत्र अख्तर के बीच झगड़ा हुआ था। इसकी शिकायत लेकर रोजकामेव थाने जा रहे जमशेद ने रास्ते में एडवोकेट नवीन से लिफ्ट माँगी और फिर नवीन अपने काम से चले गए, वहीं जमशेद थाने में शिकायत देने के लिए रोजकामेव चला गया। इस मामले में अख्तर के परिवार ने नवीन पर आरोप लगाया कि उसने जमशेद के साथ मिलकर उसके खिलाफ शिकायत दर्ज की है, जिसका परिणाम वो भुगतेगा। इसी विवाद को लेकर गाँव में 19 जुलाई को पंचायत हुई, जिसमें जमशेद और अख्तर के बीच समझौता हो गया। इस दौरान नवीन भी पंचायत में मौजूद था। 

पंचायत खत्म होने के बाद जब नवीन अपने घर जा रहा था, तो इसी दौरान अख्तर की पत्नी मकसूदन व बेटी सरजीना ने अपनी छत से नवीन के सिर पर ईंट फेंक कर मारी, जिससे वह घायल हो गया। पहले से ही घात लगाए बैठे नसरूद्दीन के पुत्र जैकम ने नवीन को अपने घर में खींच लिया और वहाँ पर जैकम, अख्तर, साजिद, मकसूदन, सरजीना, सैकुल व रुजदार ने नवीन को बेरहमी से पीटा। जब नवीन को बचाने के लिए उसके चाचा कुंदन व परिवार की महिलाएँ वहाँ पहुँचीं, तो आरोपितों ने उनके साथ भी बेरहमी से मारपीट की। झगड़े की सूचना की सूचना मिलते ही गाँव के अन्य लोग वहाँ पहुँचे तो आरोपित, नवीन व उसके परिजनों को घायल अवस्था में छोड़कर फरार हो गए। ग्रामीणों ने घायलों को गुरुग्राम के एक मेदांता अस्पताल पहुँचाया।

ख़ारिज हुई नीरव मोदी की ज़मानत याचिका, जेल में ही रहना होगा 22 अगस्त तक

भगोड़े कारोबारी नीरव मोदी को लंदन की कोर्ट से एक बार फिर से झटका लगा है। कोर्ट ने नीरव मोदी की ज़मानत याचिका एक बार फिर ख़ारिज कर दी है और साथ ही 22 अगस्त तक उसकी हिरासत भी बढ़ा दी। इस मामले में अगली सुनवाई के लिए कोर्ट ने 22 अगस्त की तारीख़ मुकर्रर की है।

ख़बर के अनुसार, ब्रिटेन की हाईकोर्ट ने नीरव के मोदी को फ़टकार भी लगाई और कहा कि याचिकाकर्ता के ख़िलाफ़ कई देशों में मुकदमे दर्ज हैं। ऐसे में इस बात पर भरोसा नहीं किया जा सकता कि वो बाहर आने के बाद सबूतों को नष्ट नहीं करेगा।

ग़ौरतलब है कि नीरव मोदी पर आरोप है कि उसने पंजाब नेशनल बैंक को क़रीब 13 हज़ार करोड़ रुपए का चूना लगाया था। जब तक इस घोटाले की ख़बर सामने आती, उससे पहले ही वो देश छोड़कर भाग गया। दरअसल, फरवरी 2018 में PNB बैंक का घोटाला सामने आया था। काफ़ी समय बाद यह पता चला था कि वो इतना बड़ा फ्राड करके ब्रिटेन भाग गया है। उसके बाद से नीरव मोदी की करोड़ों की सम्पत्तियाँ ज़ब्त की जा चुकी हैं।

हाल ही में, सिंगापुर हाईकोर्ट ने PNB बैंक घोटाले के आरोपी नीरव मोदी के चार बैंक खातों को ज़ब्त करने का आदेश दिया था। सिंगापुर हाईकोर्ट ने जिन खातों को ज़ब्त करने का आदेश दिया था, उनमें ब्रिटिश वर्जन आइसलैंड के नाम से रजिस्टर कंपनी के हैं, इनमें पूर्वी मोदी और मयंक मेहता के भी नाम शामिल हैं।

इसके अलावा ख़बर यह भी है कि PNB बैंंक को करोड़ों रुपए का चूना लगाकर भागने वाले नीरव मोदी को प्रत्यर्पित कर भारत लाने की कोशिश में केंद्रीय एजेंसियाँ जुटी हुई हैं। ब्रिटेन की पुलिस ने नीरव मोदी को 19 मार्च 2019 को होलबोर्न से गिरफ़्तार किया था। उसके बाद से ही वो पुलिस हिरासत में है।

कारगिल के 20 साल: गाथा चार वीरों की, जो हमें बार-बार सुननी चाहिए

कारगिल की बर्फ़ीली चोटियाँ न जाने कितने सैनिकों की जाँबाज़ी की कितनी ही गाथाएँ अपनी ख़ामोशी में समेटे हैं। उन सभी को जान पाना शायद मुमकिन नहीं होगा। लेकिन आज कारगिल विजय दिवस पर उन कुछ वीरताओं को याद तो किया ही जा सकता है जिनके चलते कारगिल पर चाँद-सितारे की जगह आज भी तिरंगा कायम है।

टाँग खोकर भी चैम्पियन बनने वाले सतेंद्र सांगवान

Captain Satendra Sangwan

2009 में ओएनजीसी के सर्वश्रेष्ठ विकलांग कर्मचारी और समाज के लिए प्रेरणा-स्रोत का राष्ट्रीय अवार्ड तत्कालीन उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी से पाने वाले कैप्टेन सतेंद्र सांगवान प्रोस्ठटिक टाँग के सहारे राष्ट्रीय विकलांग बैडमिंटन चैंपियनशिप लगातार तीन साल जीत चुके हैं, एवरेस्ट (हिन्दुस्तानी नाम: सागरमाथा) पर चढ़ने का प्रयास कर चुके हैं, और विश्व चैम्पियनशिप में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया है। बारहवीं के बाद रेडियो टेक्नीशियन के तौर पर वायु सेना में भर्ती होने वाले कैप्टेन सांगवान ने उस्मानिया विश्वविद्यालय से डिस्टेंस लर्निंग द्वारा ग्रेजुएशन किया, और उसके बाद CDS/OTA इम्तिहान पास करने के बाद 16 ग्रेनेडियर रेजिमेंट में वह कमीशन-प्राप्त अफसर बने।

29 जून, 1999 को ब्लैक रॉक नामक क्षेत्र में दुश्मन के बंकरों को तबाह करने के बाद गश्ती (पैट्रोलिंग) ऑपेरशन से लौटते समय कैप्टेन सांगवान का पैर एक बारूदी सुरंग पर पड़ गया, जिसका धमाका उनके दाहिने पैर को उनसे छीन ले गया। उस समय तक उनकी टुकड़ी द्रास और बटालिक जैसे दुर्गम स्थलों पर दो महीने से अधिक समय बिता चुकी थी।

टीले पर कब्ज़े के लिए गोलियों की बौछार में सीधी छलाँग

लगभग सीधी चढ़ाई वाले टीले पर स्थित पॉइंट 4812 पर कब्ज़ा करने का निर्देश लेफ्टिनेंट कीशिंग क्लिफ़र्ड नोंग्रुम की टुकड़ी को मिला था। तिस पर से यह चढ़ाई भी पाकिस्तानियों की नज़र में न आने के लिए छिप कर ही करनी थी। 30 जून-1 जुलाई 1999 की रात को दक्षिण-पूर्वी छोर से किसी तरह चढ़ते हुए चोटी के पास तो भारतीय सेना पहुँच गई, लेकिन बहुत कोशिश करने के बाद भी ऊपर की चट्टानों में खाई बनाकर छिपी पाकिस्तानी सेना की गोलीबारी ने दो घंटे तक उन्हें आगे बढ़ने से रोके रखा

लेफ्टिनेंट नोंग्रुम की तस्वीर के साथ उनके माता-पिता (साभार: defencelover.in)

तब इस गतिरोध से पार पाने के लिए लेफ्टिनेंट नोंग्रुम ने अपनी जान हथेली पर लेकर गोलियों की बौछार में छलाँग लगा दी। दुश्मन की पहली पोज़ीशन पर पहुँच कर उन्होंने वहाँ ग्रेनेड फेंका, जिसके धमाके से 6 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए। दूसरी पोज़िशन पर तैनात यूनिवर्सल मशीन गन को भी पाकिस्तानियों से छीनने की कोशिश में वह तो घातक रूप से घायल हो गए, लेकिन इस बीच पाकिस्तानियों का ध्यान बँटने का फायदा उठाकर भारतीय सैनिकों ने हमला बोलकर वह पोज़िशन हथिया ली। इसके बाद अपने घावों के साफ़ तौर पर जानलेवा होने के बावजूद लेफ्टिनेंट नोंग्रुम ने मैदान से दूर ले जाए जाने से साफ़ इंकार कर दिया, और आखिरी साँस तक लड़ते ही रहे। उनको सेना का दूसरा सबसे बड़ा पुरस्कार ‘महा वीर चक्र’ मरणोपरांत दिया गया

नायक ब्रिज मोहन सिंह- पाकिस्तानियों को समझ नहीं आया खाली हाथ झपटते को कैसे रोकें

BRIJ MOHAN SINGH

नायक ब्रिज मोहन सिंह ने मश्कोह सब-सेक्टर में “सैंड्स टॉप” टीले पर कब्ज़े के लिए जो रणनीति इस्तेमाल की, उसकी शायद ही कभी पाकिस्तानियों ने कल्पना भी की होगी, सामना तो दूर की बात है। जब उनकी 9 पैराशूट स्पेशल फोर्सेज़ की 30-सदस्यीय कमांडो टीम की बढ़त 30-जून-1 जुलाई, 1999 की रात टीले की छोटी के पास पहुँच कर भी लगातार हमले के चलते रुक गई, तो उन्होंने आत्मोत्सर्गी निर्णय लिया। अपनी टुकड़ी के भाले की नोंक बन उन्होंने पहले दुश्मन की पोज़िशनों पर ग्रेनेड से हमला किया, उसके बाद यकायक धमाके से बौखलाए सैनिकों पर खुद झपट्टा मार कर उन्हें ढेर करना शुरू कर दिया। ऐसी रणनीति से बौखलाए पाकिस्तानी जब तक कुछ समझ या पलट कर ब्रिज मोहन सिंह पर हमला कर पाते, भारतीय कमांडोज़ को हमले का वह मौका मिल चुका था जिसकी उन्हें तलाश थी। ऐसे ही ब्रिज मोहन सिंह ने गंभीर रूप से घायल होकर वीरगति को प्राप्त होने के पहले पाँच पाकिस्तानियों को मौत की नींद सुला दिया, जिसमें से दो को तो उन्होंने केवल अपने खंजर (कमाण्डो नाइफ़) से मारा। अपनी जान और सुरक्षा की परवाह किए बिना दिलेरी और शौर्य की मिसाल खड़ी करने वाले ब्रिज मोहन सिंह को वीर चक्र से नवाज़ा गया

हाथ पर लगी गोली ले गई टाइगर हिल के नायक की जान

कैप्टेन जेरी प्रेमराज को वीर चक्र से नवाज़ा गया

जब 6/7 जुलाई, 1999 की रात पाकिस्तानी गोली कैप्टेन जेरी प्रेमराज के सर, सीने और पेट को ‘बख्श’ बाँह पर लगी होगी तो उन्होंने भी नहीं सोचा होगा कि एक विषैले सँपोले की तरह वह ‘मामूली’ चोट उनकी जान की दुश्मन साबित होगी। लेकिन हुआ यही, क्योंकि गोली देश के दुर्भाग्य से नस को चीर गई, और वह चोट ऊँचाई पर ज़्यादा तेज़ी से होने वाले रक्त-स्राव के चलते अंततः प्राणघातक निकली। उस चोट के बाद भी कैप्टेन लड़ते रहे, क्योंकि उनका मिशन था 15,000 फ़ीट की ऊँचाई पर स्थित चोटी 4875 पर हमला, जिससे पाकिस्तानियों पर गोलीबारी की जा सके। हमले के दौरान पाकिस्तानियों की ओर से हुई जवाबी गोलीबारी में उन्हें और गोलियाँ भी लगीं, लेकिन उन्होंने हमला पूरा होने के पहले मेडिकल सहायता के लिए मैदान छोड़ कर जाने से मना कर दिया। अंततः उसी दिन मात्र छह महीने की उम्र में अपने गाँव के सबसे तंदरुस्त बच्चे का ख़िताब जीतने वाले कैप्टेन आर. जेरी प्रेमराज की मौत हो गई।

खुद घायल होते हुए भी छह को मारा हवलदार गिल ने

Sis ram gill

हवलदार शीश राम गिल के नेतृत्व वाली कमांडो टीम को 17,000 फीट की ऊँचाई पर स्थित “मंजू” नामक पाकिस्तानी चौकी पर कब्ज़े का निर्देश दिया गया। लगभग असम्भव चढ़ाई वाली यह चोटी बहुत ही दुर्गम थी, और दुश्मन ने गोलियों और मोर्टार के हमले लगातार चालू रखे। लेकिन हवलदार गिल ने भी अपनी टीम के जज़्बे को गोलियों की बारिश से बुझने नहीं दिया, और अपने पैर पर लगी गोली की चोट को भी खुद स्नाइपर और मशीन गन से एक पाकिस्तानी अफसर, दो जेसीओ, और तीन सैनिकों को ऊपर पहुँचाने के आड़े नहीं आने दिया। इसके अलावा उनकी गोलियों से चार अन्य पाकिस्तानी भी घायल हुए। हवलदार गिल को पता था कि उनके हटने से कमांडो टीम की लड़ने की ताकत घटेगी और मिशन फेल हो जाएगा, इसलिए वह लड़ते रहे। 9 जुलाई, 1999 को लेकिन वह अपनी ज़िंदगी की जंग हार गए, और उनका वीर चक्र मरणोपरांत उनके परिवार को मिला।

भारत-बांग्लादेश सीमा पर गाय के गले में बम बाँधकर हो रही है तस्करी, 365 गायों को किया गया जब्त

पश्चिम बंगाल में भारत-बांग्लादेश सीमा पर तस्करी के ख़िलाफ़ BSF जवानों द्वारा दिखाई जा रही सक्रियता से हताश होकर पशु तस्कर अब अपने मनसूबों को अंजाम देने के लिए नए-नए हथकंडे आजमाने लगे हैं।

जानकारी के मुताबिक अब ये तस्कर पशुओं को सीमा पार ले जाने के लिए गायों की गर्दन के पीछे केले के पत्तों के साथ सॉकेट बम लगा रहे हैं। ताकि जवान इसकी चपेट में आ जाएँ और वे आसानी से तस्करी कर पाएँ। लेकिन सीमा पर तैनात जवान उनके इन इरादों को कामयाब नहीं होने दे रहे हैं। नई दुनिया की खबर के अनुसार 24/25 की रात बीएसएफ जवानों ने 365 गायों को अपनी जान पर खेलकर सीमा पार जाने से बचाया।

पशु तस्करों द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे इस नए तरीके को जानने के बाद बीएसएफ अधिकारी भी हैरान हैं। उनकी मानें तो बंगाल के साउथ बंगाल फ्रंटियर के जवानों ने 25 की रात को ऑपरेशन के दौरान सीमावर्ती मालदा, उत्तर 24 परगना, मुर्शिदाबाद और नदिया जिलों से होकर बांग्लादेश की सीमा पार होने वाले 365 मवेशियों को जब्त किया।

जिसके बाद तस्करों ने बीएसएफ के जवानों पर घातक हमला किया, लेकिन फिर भी जवानों ने हार नहीं मानी और सीमा पार होने वाली अवैध तस्करी को नाकाम कर दिया।

गौरतलब है कुछ दिन पहले सीमा पार होने वाली इस अवैध पशु तस्करी को रोकने के प्रयास में एक जवान को अपना पंजा गँवाना पड़ा था क्योंकि उस समय इन तस्करों ने लगातार दो बार जवान पर देसी विस्फोटक से हमला किया था। इस घटना के बाद बीएसएफ ने भारत-बांग्लादेश सीमा पर दक्षिण बंगाल इलाके में अलर्ट जारी किया था, और दक्षिण बंगाल फ्रंटियर के इंस्पेक्टर जनरल ने इस मामले पर सख्त रुख अख्तियार करते हुए सभी फील्ड फॉर्मेशन को निर्देश दिए थे कि ट्रांस बॉर्डर क्रिमिनल के खिलाफ बेहद सख्‍त रुख अपनाते हुए कार्रवाई की जाए ।

आज़म खान पुरुष सांसदों पर धब्‍बा, उनका शर्मनाक बयान उनके चरित्र का प्रतिबिम्ब: स्‍मृति ईरानी

लोकसभा में ट्रिपल तलाक बिल पर चर्चा के दौरान सदन की अध्यक्षता कर रही भाजपा सांसद रमा देवी पर सपा सांसद आज़म खान द्वारा की गई आपत्तिजनक टिप्पणी की हर तरफ आलोचना हो रही है। केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने भी आज़म  खान के बयान की आलोचना करते हुए इसे शर्मनाक बताया है। उन्होंने ट्वीट करते हुए लिखा, “आज़म खान द्वारा दिया गया शर्मनाक बयान उनके चरित्र का प्रतिबिंब है; उनका बचाव करके अखिलेश यादव ने भी प्रमाणित कर दिया की उनकी सोच में भी कोई फ़र्क़ नहीं। जो सदन में महिला के साथ निंदनीय व्यवहार कर सकता है वह साधारण महिला से किस प्रकार का व्यवहार करता होगा, यह सोचने वाली बात है।” इसके साथ ही एक और ट्वीट में स्मृति ने आज़म खान को सभी पुरुष सांसदों पर धब्बा बताया।

गौरतलब है कि, आज़म खान ने गुरुवार (जुलाई 25, 2019) को सदन में भाजपा सांसद रमा देवी से कहा, “आप मुझे इतनी अच्छी लगती हैं कि मेरा मन करता है कि आपकी आँखों में आँखें डाले रहूॅं।” पार्टी मुखिया अखिलेश यादव ने भी आज़म खान के इस बयान को सही बताते हुए कहा कि उन्हें नहीं लगता कि आजम खान स्पीकर का असम्मान करना चाहते थे और उन्होंने जो कुछ भी बोला, उसमें कुछ भी गलत नहीं है।

वहीं दूसरी तरफ एनसीपी नेता माजिद मेमन ने भी आजम खान का बचाव किया। माजिद मेमन ने कहा कि आज़म खान ने जो कहा वह कहीं से भी गलत नहीं लगता है। उन्होंने असम्मान की भावना से चेयरपर्सन को कुछ नहीं कहा है। यही नहीं माजिद मेमन ने तो यहाँ तक कह दिया कि आज़म खान के बयान की सराहना होनी चाहिए, उनके बयान को तारीफ के तौर पर देखना चाहिए।

बीजेपी सदस्यों ने आज़म खान के व्यवहार के लिए कड़ी आपत्ति जताई और माफी माँगने के लिए कहा। लेकिन आज़म खान ने माफी माँगने की बजाय सपा सदस्यों के साथ सदन से वॉकआउट कर लिया। उनका कहना था कि उन्होंने किसी असंसदीय शब्द का इस्तेमाल नहीं किया है और अगर ऐसा हुआ है, तो वो इस्तीफा देने के लिए तैयार हैं।

कारगिल: कहानी उन हीरोज की जिनके आगे पस्त हो गया पाकिस्तान का ‘डर्टी-4’

आज 26 जुलाई को देश कारगिल विजय दिवस मना रहा है। 20 साल पहले आज के ही दिन हमारे वीर जवानों ने पाक के ‘डर्टी-4’ जिसमें उस समय पाकिस्तानी सेना के प्रमुख रहे जनरल परवेज मुशर्रफ, जनरल अजीज, जनरल महमूद और ब्रिगेडियर जावेद हसन शामिल थे, के नापाक मंसूबों को नाकाम कर दिया था।

डर्टी-4 ने कारगिल का प्लान बनाया यह सोचकर बनाया था कि अगर भारत उन्हें कारगिल से खदेड़ने की कोशिश करेगा तो उसे कश्मीर से अपनी सेना को मूव कराना पड़ेगा। डर्टी फोर की प्लानिंग थी कि अगर भारत ने ऐसा कुछ किया तो कश्मीर में उसकी स्थिति कमजोर हो जाएगी। ऐसे में वे और ज्यादा मुजाहिदीन (आतंकवादी) कश्मीर भेजेंगे। जम्मू-कश्मीर में घुसपैठ के बाद आतंकी भयंकर मारकाट मचाएँगे, इस तरह भारत को दो मोर्चों पर लड़ाई लड़नी पड़ेगी, भारत को गुरिल्ला वार में फँसाने की पूरी साजिश इन चारों के दिमाग की ही उपज थी। पहले तो कारगिल में पाकिस्तान अपने सैनिकों की संलिप्तता से इनकार करता रहा पाक लेकिन बाद में उसका झूठ बेनकाब हो गया।

बलिदान की गाथा

वैसे, युद्ध में पकड़े जाने वाले सैनिकों के साथ बर्बरता करने के मामले में पाकिस्तान का रिकॉर्ड हमेशा से खराब रहा है। अंतरराष्ट्रीय कानूनों को धता बताते हुए पाकिस्तान के ऐसे कई कारनामे दर्ज़ हैं जहाँ उसने दरिंदगी की सारी हदें लाँघ दी। कारगिल के सन्दर्भ में भी पाकिस्तान की बर्बरता के तीन बड़े उदाहरणों की बात की जाए तो वह हैं स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा, कैप्टन सौरभ कालिया और फ्लाइट लेफ्टिनेंट नचिकेता, हालाँकि फ्लाइट लेफ्टिनेंट नचिकेता वापस लौट आए थे। लेकिन क्या किया था पाकिस्तानी सैनिकों ने इनके साथ, इन अफसरों के साथ क्या हुआ था, पढ़िए पूरी दास्तान…….

पहले हीरो सौरभ कालिया

कैप्टन सौरभ कालिया (1976-1999) कारगिल में मई 1999 में नियंत्रण रेखा पर भारतीय सीमा के भीतर पाकिस्तानी सेना की घुसपैठ के संबंध में रिपोर्ट करने वाले पहले सैन्य अधिकारी थे। उनको कारगिल का पहला हीरो भी कहा जाता है। कारगिल सेक्टर में 4-जाट रेजीमेंट में उनकी पहली पोस्टिंग थी। 15 मई, 1999 को वह अपने दल के पाँच जवानों अर्जुन राम, भँवर लाल बघेरिया, बीकाराम, मूलाराम और नरेश सिंह के साथ काकसर क्षेत्र में गश्त पर थे। इसी दौरान पाकिस्तानी सेना के साथ गोलीबारी में उनका गोला-बारूद खत्म हो गया। इससे पहले कि भारतीय सैनिक उन तक पहुँच पाते पाक रेंजरों ने उनको घेरकर युद्ध बंदी बना लिया।

बलिदानी सौरभ कालिया के लिए आज भी न्याय की आस लगाए उनके माता-पिता

22 दिनों तक उनको भयानक यातनाएँ देने के बाद गोली मार दी गई। 9 जून 1999 को पाकिस्तानी सेना ने सभी जवानों के क्षत-विक्षत शव भारत को सौंपे। इन्हें वीभत्स तरीके से टॉर्चर किया गया था। तीन हफ्ते बाद उनका क्षत-विक्षत शव सेना को मिला था। इतना टॉर्चर किया गया था कि उनकी पहचान तक मुश्किल थी। पाकिस्तानियों ने उनकी आँखें तक फोड़ दी थी और गला काट दिया था। पाक ने जब कैप्टन कालिया का शव सौंपा तो उनके शरीर के कई अंग कटे हुए और गायब थे। उनके दोनों कानों में गर्म छड़ें घुसेड़ दी गई थी। फिर भी, झूठे और मक्कार पाकिस्तान ने दावा किया था कि सौरभ का शव एक गड्ढे में मिला था और उनकी मौत ख़राब मौसम की वजह से हुई।

स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा

स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा जो विंग कमांडर अभिनंदन की तरह ही मिग-21 फाइटर जेट उड़ाते हुए पाकिस्तान सीमा में पहुँच गए थे। बात 27 मई 1999 की है। कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय वायुसेना ने ऑपरेशन ‘सफेद सागर’ लॉन्च किया था, जिसका मकसद एलओसी पर पाकिस्तानी सेना की स्थिति का पता लगाना था। वायुसेना की भटिंडा स्थित गोल्डन-एरोज स्क्वाड्रन में अजय आहूजा फ्लाइट कमांडर थे, सेना ने उन्हें जिम्मेदारी दी कि वह पाकिस्तानी सेना की सही स्थिति का पता लगाएं। वह मिग-21 लेकर निकले लेकिन बीच में ही उन्हें सूचना मिली कि फ्लाइट-लेफ्टिनेंट नचिकेता को अपना मिग-27 विमान आग लगने के कारण छोड़ना पड़ा है।


स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा

आहूजा को पता चल गया था कि नचिकेता पाकिस्तानी सीमा में हैं और वहाँ उन्हें ढूँढने जाना जोखिम भरा हो सकता है फिर भी वह अपने साथी का पता लगाने सीमा में घुस गए। जब वह नचिकेता की तलाश कर ही रहे थे कि बारूद गोला उनके जेट से टकराया जिससे उसमें आग लग गई। उन्हें पाकिस्तानी सीमा में उतरना पड़ा। 27 मई शाम साढ़े आठ बजे तक यह कंफर्म हो गया था कि अजय आहूजा शहीद हो चुके हैं। लेकिन, जब पाकिस्तानी सेना ने उनका शव सौंपा तो पता चला कि उनकी मौत प्लेन से कूदने की वजह से नहीं, बल्कि बहुत नज़दीक से गोली मारने से हुई थी। मरने से पहले उन्हें भी पाकिस्तानी सैनिकों ने टॉर्चर किया था। कारगिल युद्ध की समाप्ति के बाद स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा को उनकी बहादुरी के लिए मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया गया था।

8 दिन बाद लौटे फ्लाइट लेफ्टिनेंट नचिकेता

1999 में कारगिल युद्ध के दौरान फ्लाइट लेफ्टिनेंट नचिकेता को पाकिस्तानी सेना ने बंदी बना लिया था। हालाँकि, भारत सरकार के कूटनीतिक प्रयासों और अंतरराष्ट्रीय दबावों के बाद उन्हें आठ दिन बाद छोड़ दिया गया था।


फ्लाइट लेफ्टिनेंट नचिकेता

1999 में नचिकेता वायुसेना के नौवें स्क्वाड्रन जो कारगिल के बटालिक सेक्टर में है, पर तैनात थे। नचिकेता को 17 हजार फीट की ऊंचाई से 80 एमएम रॉकेट दागने की जिम्मेदारी दी गई थी। 27 मई के दिन भारतीय वायुसेना दुश्मन की चौकियों पर मिग-27 से लगातार हमले कर रही थी। लेकिन, एक रॉकेट के हमले में नचिकेता के विमान का इंजन बंद हो गया जिसकी वजह से उन्हें पाकिस्तानी सीमा में पैराशूट लेकर उतरना पड़ा। पाकिस्तानी सेना ने उन्हें बंदी बना लिया और रावलपिंडी जेल में असंख्य यातनाएँ दी। 8 दिन की यातनाओं के बाद 3 जून, 1999 को नचिकेता को पाकिस्तान में रेड क्रास को सौंप दिया गया और वह वाघा बार्डर के रास्ते भारत लौट आए। ग्रुप कैप्टन नचिकेता को वर्ष 2000 में वायुसेना पदक से सम्मानित किया गया था।

जेनेवा संधि का उलंघन

भारतीय सैनिकों के साथ अमानवीय तरीके से पेश आने के कारण 15 जून, 1999 को भारत ने पाकिस्तान को कारगिल युद्ध के दौरान युद्ध बंदियों के साथ जेनेवा संधि का हनन संबंधी नोटिस दिया। 1949 के इस अंतरराष्ट्रीय संधि के तहत युद्धबंदियों के साथ मानवतापूर्ण व्यवहार की शर्त रखी गई है। लेकिन पाकिस्तान न तब अपनी हरकतों से बाज आया था और न अब उससे सभ्य व्यवहार की उम्मीद की जा सकती है।

इंसाफ की आस

आज जहाँ देश कारगिल युद्ध के 20 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में देश एक बार फिर विजय दिवस मना रहा है वहीं 20 साल बाद भी इंसाफ न मिलने के कारण कारगिल युद्ध में शहीद कैप्टन सौरभ कालिया के परिजनों का दर्द रह-रह कर छलक उठता है। पाकिस्तान की अमानवीय यातनाओं से शहीद हुए कैप्टन सौरभ कालिया के परिजनों को आज तक इंसाफ नहीं मिला है। फिलहाल मामला सुप्रीम कोर्ट में मामला चल रहा है।

न्याय की आस लगाए पिता डॉ. एनके कालिया और माता विजय कालिया का कहना है कि जब तक विदेश मंत्रालय पाकिस्तान या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह मामला सख्ती से नहीं उठाता, तब तक कुछ नहीं होने वाला। जिस तरह से भारत सरकार ने पाकिस्तान के साथ नौसेना अधिकारी कुलभूषण जाधव और विंग कमांडर अभिनंदन का मामला उठाया और उसके नतीजे भी सामने आए। लिहाजा, विदेश मंत्रालय को सौरभ कालिया का मामला भी पाकिस्तान और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सीधा उठाना चाहिए।

डॉ. कालिया का कहना है कि उस समय अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में यह मुद्दा सीधे पाकिस्तान या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठना चाहिए था। बाद में कॉन्ग्रेस के शासन काल में भी उन्हें न्याय नहीं मिला, लेकिन अब उन्हें मोदी सरकार से उम्मीदें हैं। पिता चाहते हैं कि उनके बेटे के मामले में इंसाफ मिलना चाहिए। भारत सरकार इस मामले में पाकिस्तान से माफी माँगने को भी कहे, क्योंकि इसमें युद्धबंदियों से संबंधित जेनेवा समझौते का उल्लंघन हुआ है।

धूर्त पाकिस्तान

“पाकिस्तान शायद यह भूल गया है कि 1971 में करीब 92 हजार सैनिकों के साथ आत्मसमर्पण को विवश हुआ था, लेकिन भारत ने बतौर युद्धबंदी उनकी सुख-सुविधा का पूरा ख्याल रखा था।” यह मैं इसलिए कह सकता हूँ क्योंकि मुझे उनके साथ बतौर गार्ड तैनात किया गया था। उनके लिए जबलपुर में ऑफिसर मेस का एक बड़ा हिस्सा खाली कराया गया था। उस ऐतिहासिक विजय के बाद भी भारतीय सेना की विनम्रता और संस्कारपूर्ण व्यवहार को याद करते हुए भारतीय सेना के सेवानिवृत्त कर्नल करतार सिंह ये बातें बड़े गर्व से कहते हैं। करतार सिंह सेना में उसी साल सैनिक के रूप में भर्ती होकर शकरगढ़ सेक्टर में युद्ध के मोर्चे पर तैनात थे।

इसका जिक्र यहाँ इसलिए क्योंकि 31 जुलाई 2013 को यू-ट्यूब पर एक वीडियो जारी हुआ, जिसमें एक पाकिस्तानी सैनिक गुल-ए-खांदन ने कैप्टन कालिया को मारने की बात कबूल की है। कांगड़ा के कोहाला गाँव में रहने वाले 59 वर्षीय करतार सिंह कहते हैं, “खुद पाकिस्तानी युद्धबंदी कह कर गए थे कि जितना सम्मान उन्हें भारत में बंदी होते हुए मिला, उतना तो सैनिक होते हुए पाकिस्तान में भी नहीं मिला। हम भले ही मांस खाते हों या नहीं, पाकिस्तानियों को ताजा मांस खिलाया गया था, उनकी सुविधाओं का ख्याल रखा गया, लेकिन सच यह भी है कि वे नहीं सुधरेंगे।”

कर्नल करतार के मुताबिक सीमा पर हमेशा जंग नहीं होती, दुश्मन से बातचीत भी होती है। लेकिन पाकिस्तानी इतने दगाबाज और धूर्त हैं कि कई बार बातचीत के लिए भारतीय सैनिक को बुलाया और गोली चला दी। पाकिस्तानी फौजी ने सौरभ कालिया के बारे में जो कहा है वह पाकिस्तान के झूठ को बेनकाब करता है। पाकिस्तान तो अक्सर अपने सैनिकों के शव भी लेने से यह कहकर इंकार कर देता है कि ये तो मुजाहिद्दीन हैं।

कर्नल करतार भारतीय सैनिकों के मानवतावादी दृष्टिकोण के बारे में बात करते हुए बताते हैं कि 1971 के युद्ध में पाकिस्तानी चौकियों पर कब्जा करने के बाद एक भारतीय सैनिक को दुश्मन के अस्त्र-शस्त्रों के बीच कुछ हिलता दिखाई दिया। कुछ ही देर में अंदर से एक पाकिस्तानी कैप्टन हाथ जोड़े हुए दिखाई पड़ा। उसका कहना था कि उसकी शादी को चार दिन ही हुए हैं। भारतीय सैनिक ने उसका हथियार रख लिया और उसे जाने दिया। इसके विपरीत कैप्टन सौरभ कालिया की टुकड़ी के साथ वे लोग इतनी बर्बरता और वीभत्सता से पेश आए। यही चरित्र है पाकिस्तान का।

पाकिस्तान की हरकतें कितनी घिनौने हो सकती हैं इसका देर-सवेर खुलासा हो ही जाता है। चाहे वह कारगिल हो या फिर कश्मीर में भारतीय सैनिकों के सिर काटने की घटना। सौरभ कालिया और अन्य भारतीय सैनिकों पर किए गए बर्बर अत्याचार को पाकिस्तान के सैनिकों ने कई बार स्वीकार किया है। हालाँकि, धूर्त पाकिस्तान ने आधिकारिक रूप से कभी यह स्वीकार नहीं किया कि कारगिल युद्ध में उसके सैनिक शामिल थे। लेकिन सच तो जगजाहिर है।