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सबरीमाला मंदिर से लौटी महिला की सास ने की कुटाई, अस्पताल में भर्ती

800 वर्षों की परंपरा को तोड़ कर सबरीमाला मंदिर में प्रवेश करने वाली महिला की उसकी सास ने बुरी तरह पिटाई की है। सुप्रीम कोर्ट ने सितम्बर 2018 में महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में प्रवेश करने की इजाज़त दे दी थी जिसके बाद श्रद्धालुओं ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया था। उच्चतम न्यायलय के उस निर्णय के बाद कनकदुर्गा सबरीमाला मंदिर में प्रवेश करने वाली पहली महिला थी। 39 वर्षीय कनकदुर्गा ने एक अन्य महिला के साथ सबरीमाला की सैकड़ों साल पुरानी परंपरा को धता बताते हुए मंदिर में प्रवेश किया था।

ताज़ा ख़बर के अनुसार मंदिर में प्रवेश करने के बाद पहली बार घर पहुँची कनकदुर्गा पर उनकी सास ने हमला कर दिया। उसकी सास ने उसे इतनी बुरी तरह पीटा कि कनकदुर्गा को तुरंत अस्पताल पहुँचाना पड़ा। अभी उसकी हालत स्थिर बनी हुई है। सबरीमाला मंदिर में प्रवेश कर वापस लौटने के बाद कनकदुर्गा कई दिनों से घर नहीं पहुँची थी और किसी गुप्त स्थान पर छिपी हुई थी। लोगों को लगा था कि वो शायद प्रदर्शनकारियों से बचना चाह रही हैं।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार कनकदुर्गा जैसे ही अपने घर पहुँची, उस से नाराज़ उसकी सास ने लकड़ी के तख्ते से उसपर हमला कर दिया और उसकी पिटाई शुरू कर दी। उसके बाद उन्हें आनन-फानन में पेरिंथलमन्ना के सरकारी अस्पताल में भर्ती किया गया जहाँ अभी भी उसका इलाज चल रहा है। स्थानीय लोगों के अनुसार उसकी सास ने लकड़ी के तख्ते से उसके सिर पर वार किया। फ़िलहाल पुलिस ने इस मामले में केस दर्ज कर लिया है और आगे की करवाई की जा रही है।

कनकदुर्गा का परिवार उस से तभी से नाराज़ चल रहा था जब से उसके सबरीमाला में प्रवेश करने की ख़बर आई थी। उसके भाई ने इसे CPM और केरल पुलिस की साजिश बताया था। ज्ञात हो कि केरल के मुख्यमंत्री पिन्नाराई विजयन ने सबरीमाला में प्रवेश करने वाली इन महिलाओं को पूरी सुरक्षा प्रदान करने के निर्देश दिए थे। इसके बाद इन्हे पुलिस प्रोटेक्शन के साथ उसे आधी रात को मंदिर की सीढ़ियों पर ले जाया गया। रात के क़रीब तीन बजे कनकदुर्गा एक अन्य महिला के साथ सबरीमाला के अंदर घुसने में सफल हो गई थी। उसके साथ गई महिला का नाम बिंदु है जो केरल में सत्ताधारी पार्टी CPM की कार्यकर्ता है।

कई ख़बरों के मुताबिक़ अब तक 10 महिलाएँ सबरीमाला मंदिर के अंदर प्रेवश करने का दावा कर चुकी है। सबरीमाला की पुरातन प्रथा की रक्षा के लिए श्रद्धालु कई दिनों से सड़कों पर हैं और केरल की वामपंथी सरकार के ख़िलाफ़ लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं। इस मामले में अब तक केरल पुलिस ने 5000 से भी अधिक श्रद्धालुओं को गिरफ़्तार किया है।

गुप्ता जी का नया धमाका: सुप्रीम कोर्ट के जज ‘दि प्रिंट’ के रिपोर्ट को पढ़कर फ़ैसला लेते हैं!

बचपन से अपने गाँव में एक कहावत ‘अधजल गगरी छलकत जाय’ को सुनते हुए बड़ा हुआ हूँ। इस कहावत का आशय यह है कि जब किसी घड़े में आधा पानी भरा होता है, तो घड़ा से छलक कर पानी बाहर आ ही जाता है।

शेखर गुप्ता की वेबसाइट ‘दि प्रिंट’ का मामला भी कुछ इसी तरह का लगता है। दरअसल दि प्रिंट को लॉन्च हुए अभी मुश्किल से दो साल भी नहीं हुआ है, लेकिन वेबसाइट अपने रिपोर्ट के ज़रिए दावा कुछ इस तरह करती है, जैसे उनके रिपोर्ट को पढ़ने के बाद ही सुप्रीम कोर्ट के जज किसी मामले में कोई फ़ैसला लेते हैं।

पिछले दिनों सीबीआई निदेशक पद से आलोक वर्मा को हटाए जाने के लिए केंद्र के पक्ष में वोट करने के बाद तथाकथित प्रगतिशील मीडिया का एक बड़ा गिरोह जस्टिस एके सीकरी के ईमानदारी पर सवाल खड़े कर रहा है। इस मामले में मार्कंडेय काटजू ने नई टिप्पणी करते हुए अपने ट्वीटर पर लिखा – “मीडिया में जरा सी भी शर्म बची है तो उसे जस्टिस सीकरी से माफ़ी माँगनी चाहिए।”

पूर्व जस्टिस काटजू का यह बयान दि प्रिंट जैसे संस्थानों के लिए ही है। सीबीआई निदेशक मामले में जस्टिस सीकरी के फ़ैसले के बाद दि प्रिंट हिंदी ने वेबसाइट पर एक आर्टिकल पब्लिश किया। इस आर्टिकल को मनीष छिब्बर नाम के व्यक्ति ने 14 जनवरी को 10 बजकर 39 मिनट पर अपडेट किया है। इसे राहुल गाँधी ने अपने ट्वीटर अकाउंट से शेयर भी किया है। इस आर्टिकल में अप्रत्यक्ष रूप से एक न्यायाधीश की ईमानदारी पर सवाल उठाया गया है, मानो आलोक वर्मा को हटाने के पुरस्कार के रूप में सरकार उन्हें यह पद दे रही है।

जस्टिस सीकरी मामले में दिप्रिंट की यह पहली रिपोर्ट है

पहले रिपोर्ट के ठीक 38 मिनट बाद 11 बजकर 17 मिनट पर दि प्रिंट हिंदी की तरफ से एक दूसरी स्टोरी ‘दि प्रिंट की रिपोर्ट के बाद न्यायमूर्ति सीकरी का अब सीसैट पद से इंकार’ की हेडिंग के साथ अपडेट की गई। जिस वेबसाइट को पैदा हुए अभी जुम्मा-जुम्मा आठ रोज़ नहीं हुए हैं, उस वेबसाइट के इस खोखले दावे को देखकर किसी को भी आश्चर्य होगा। हालाँकि, दि प्रिंट ने अंग्रेजी वेबसाइट पर मनीष छिब्बर की यह रिपोर्ट 13 जनवरी को अपडेट की है। लेकिन बावजूद इसके सोचने वाली बात यह है कि दि प्रिंट को किन सूत्रों से यह पता चला कि उनके रिपोर्ट को पढ़ने के बाद ही जस्टिस सीकरी ने अपने फ़ैसले को बदला है।

दिप्रिंट के इस रिपोर्ट में जस्टिस सीकरी के फ़ैसले पर सवाल किया गया है

इस रिपोर्ट में किए गए दावे को देखकर शेखर गुप्ता और उनकी टीम के बड़बोलेपन का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। दि प्रिंट को लगता है कि जस्टिस सीकरी मुख्यधारा के चैनल व अख़बारों को देखना-पढ़ना छोड़कर आजकल सिर्फ़ दि प्रिंट को पढ़ रहे हैं। यही वजह है कि उनके रिपोर्ट को अपडेट हुए आधा घंटा भी नहीं हुआ कि जस्टिस सीकरी का दिमाग एकदम से घूम गया और उन्होंने आधे घंटे के अंदर सीसैट पद ठुकराने का फ़ैसला ले लिया। दि प्रिंट को यह भ्रम हो गया है कि उनके रिपोर्ट को पढ़कर ही एक न्यायाधीश ने अपना फ़ैसला बदल लिया है।

जस्टिस एके सीकरी की छवि एक ईमानदार न्यायधीश की रही है। पिछले दिनों बेबाक राय रखने वाले पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू ने कहा, “एके सीकरी को मैं काफ़ी अच्छे से जानता हूँ, वो बेहद ईमानदार न्यायधीश हैं। उन्होंने जो भी फ़ैसला लिया है, कुछ सोचने के बाद ही लिया होगा।”

ऐसे में साफ़ है कि जस्टिस सीकरी को यह बात काफ़ी अच्छी तरह से मालूम था कि सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा पर फ़ैसले के बाद कुछ लोगों और कथित प्रगतिशील मीडिया के एक धरे द्वारा उनके ऊपर सवाल उठाए जाएंगे। इस बात को समझते हुए एके सीकरी ने विवादों के गंदे छींटें से बचने के लिए सेवानिवृत होने के बाद सीसैट के पद से इनकार कर दिया।

लेकिन जस्टिस सीकरी के इस ईमानदार फ़ैसले पर शेखर गुप्ता के शेरों ने इसे अपनी जीत के रूप में देखना शुरू कर दिया। सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा के मामले में जैसे ही जस्टिस सीकरी ने फ़ैसला लिया, राहुल गाँधी ने हर बार की तरह इस बार भी देश के सर्वोच्च संस्थान और वहाँ काम करने वाले ईमानदार न्यायाधीश को बदनाम करना शुरू कर दिया।

दि प्रिंट जैसे प्रोपेगेंडा फ़ैलाने वाले वेबसाइट के लिंक के ज़रिए जस्टिस सीकरी को बदनाम करने वाले राहुल ने एक बार भी नहीं सोचा कि कर्नाटक मामले में कॉन्ग्रेस की याचिका पर सीकरी ने दूसरे जजों के साथ मिलकर रात के एक बजे कोर्ट में सुनवाई की थी। यही नहीं अपने फ़ैसले में सीकरी ने राज्यपाल के फ़ैसले को पलटकर भाजपा को पंद्रह दिनों की बजाय तुरंत बहुमत साबित करने का आदेश सुनाया था। इसी आदेश के बाद भाजपा जल्दबाजी में बहुमत नहीं साबित कर पाई और कॉन्गेस-जेडीएस ने मिलकर सरकार बना लिया था।

कॉन्ग्रेस के लिए देश के सरकारी संस्थाओं पर सवाल उठाना कोई नई बात नहीं है। इससे पहले भी कॉन्ग्रेस पार्टी ने गुजरात में होने वाले राज्यसभा चुनाव के दौरान चुनाव आयोग पर सरकार के दवाब में काम करने का आरोप लगाया था, जबकि चुनाव आयोग ने दो विधायकों के सदस्यता को रद्द करके फ़ैसला कॉन्ग्रेस पार्टी के पक्ष में सुनाया।

इसी तरह जब अचल कुमार ज्योति देश के मुख्य निर्वाचन आयुक्त बने थे, तो कॉन्ग्रेस ने उन्हें भाजपा समर्थक बताकर घड़ियाली आँसू बहाना शुरू कर दिया। कॉन्ग्रेस और राहुल गाँधी के इन बयानों को प्रोपेगेंडा वेबसाइटों ने खूब आगे बढ़ाया था ।

शेखर गुप्ता अपने बेकार और बेबुनियाद ख़बरों को लीड में चलाकर देश की सेना पर पहले ही ‘मिलिट्री कू’ (सेना द्वारा तख़्तापलट) के मनगढंत आरोप लगाकर जलवे काटे हैं। गुप्ता जी जैसे पत्रकारों को कहानी लेखन में अप्रतिम योगदान के लिए साहित्य अकादमी अवार्ड दिया जाना चाहिए।

गुप्ता जी के कारनामे की एक तस्वीर

प्रोपगेंडा है शाह फ़ैसल का इस्तीफा: IPS अधिकारी

भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी अभिनव कुमार ने UPSC के टॉपर रहे शाह फ़ैसल के इस्तीफे को प्रोपेगंडा बताते हुए उनकी धज्जियाँ उड़ा दी है। इंडियन एक्सप्रेस में लिखे गए एक लेख में अभिनव कुमार ने कहा कि फ़ैसल ये समझते हैं कि कश्मीरी अलगाववाद भारतीय संविधान के साथ पूरी तरह सुसंगत है। अपने लेख में उन्होंने कश्मीर समस्या पर बात करते हुए कहा कि बुद्धिजीवियों और यहाँ तक कि अंतराष्ट्रीय समुदाय ने कश्मीर पर एक गलत धारणा बना रखी है। बकौल अभिनव वो धारणा है, ‘निर्दयी भारतीय गणराज्य 1947 से ही कश्मीर के लोगों पर अत्याचार करता रहा है।’

अभी कश्मीर में अपनी सेवा दे रहे IPS अधिकारी कुमार इस लेख में कहते हैं कि यह एक संकीर्ण विचारधारा है, जो खुद धार्मिक कट्टरता, ज़ेनोफोबिया पर टिकी हुई है। उनके अनुसार इसमें कश्मीर की संस्कृति और उसके इतिहास के लिए कोई जगह नहीं है। ये ‘एकतरफा उत्पीड़न’ की गलत धारणा कश्मीरियों द्वारा उठाए गए कई गलत कदमों को भी नजरअंदाज कर देती है। अभिनव ने इसके लिए कश्मीरी नेताओं को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि उन अति महत्वकांक्षी नेताओं ने राज्य को विशेष दर्जा हासिल कराने के लिए अतिशयोक्तिपूर्ण आश्वाशन दिए। साथ ही उन्होंने घाटी से कश्मीरी पंडितों की निर्मम सफाई के लिए भी इस धारणा को आड़े हाथों लिया।

अभिनव कुमार ने अलगावादियों को भी कश्मीर पर भारतीय भावनाओं को समझने की हिदायत देते हुए कहा कि भारतीय भावनाएँ भारत-पाक विभाजन के कड़वे अनुभवों पर आधारित है। साथ ही, भारत-पाक के तल्ख़ रिश्ते भी इसे प्रभावित करते हैं। आतंकवादियों और अलगाववादियों द्वारा प्रयोग किए जाने वाले ‘इन्तिफ़ा’ और ‘जिहाद’ जैसे शब्दों पर करारी चोट करते हुए उन्होंने अपने इस लेख में कहा कि ये शब्द ना तो भारतीय मुख्यधारा को भयभीत कर सकते हैं और न ही हमारे इरादे को तनिक भी हिला सकते हैं।

कश्मीरियों को इस अपरिहार्य त्रासदी लिए जिम्मेदार ठहराते हुए उन्होंने लेख में बताया कि इसका निर्माण कश्मीरियों ने ही किया है और वो आज खुद इसमें उलझ गए हैं। शाह फ़ैसल के बारे में बात करते हुए अभिनव कुमार ने लिखा कि भले ही कश्मीर को एक उभरता सितारा मिल गया हो लेकिन उसकी सोच अस्पष्ट है। उन्होंने फ़ैसल द्वारा ‘टारगेट ऑडियंस’ को भरमाने पर भी सवाल खड़ा किया। कुल मिला कर देखें तो पुलिस अधिकारी अभिनव कुमार ने कश्मीर को लेकर चल रही गलत अवधारणा और उसे आगे ले जाने वाले फ़ैसल के इस्तीफे को विशेष प्रोपगेंडा से प्रेरित बताया।

बता दें कि शाह फै़ैसल 2009 में सिविल सेवा की परीक्षा में पूरे भारत में प्रथम स्थान प्राप्त करने वाले पहले कश्मीरी बने थे। उसके बाद वो विभिन्न पदों पर कार्यरत रहे। विवादित अधिकारी फ़ैसल अक्सर उलूलजलूल बयान देकर चर्चा में आते रहे हैं। भारत को रेपिस्तान कह कर तीखी आलोचना का सामना करने वाले फ़ैसल ने भारत सरकार पर कश्मीरियों को प्रताड़ित करने का आरोप लगा कर कुछ दिनों पहले सिविल सेवा से इस्तीफा दे दिया था जिसके बाद उनके उमर अब्दुल्ला की पार्टी में शामिल होने के कयास लगाए जा रहे हैं।

मोदी को छोड़कर अब पूर्व पीएम वाजपेयी पर पिली कॉन्ग्रेस

लोकसभा चुनावों के आते-आते कॉन्ग्रेस नेताओं के बयानों को सुनकर ऐसा लगता है, मानो जैसे वो अच्छा-बुरा सब भुलाकर अपना आपा खो चुके हैँ। उन्हें न किसी के पद का ख़्याल है और न ही किसी की उपलब्धियों का। साम-दाम-दंड-भेद किसी भी तरीके से उन्हें सत्ता में आना हैं, जिसके लिए वो कुछ भी कर गुज़रने को तैयार हैं।

मणिशंकर अय्यर, दिग्विजय सिंह और संजय निरूपम जैसे कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता पहले ही प्रधानमंत्री और उनके मंत्रिमंडल के ख़िलाफ़ अपशब्दों का प्रयोग करते रहे हैं। लगातार आते इन नेताओं के बयानों को देखकर लगता हैं जैसे ये सिलसिला अभी रुकने वाला नहीं हैं।

रिपोर्टों के अनुसार उल्हास पवार ने, जो कि कॉन्ग्रेस के नेता भी हैं और पूर्व विधायक भी रह चुके हैं, नागपुर में आयोजित हुई ‘जन संघर्ष रैली’ में इल्ज़ाम लगाते हुए कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी 1942 में स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल थे, जिस दौरान उन्हें जेल भी भेजा गया। लेकिन, उन्होंने 9 दिनों के भीतर ही ब्रिटिश सरकार को क्षमा पत्र लिखा और जेल से बाहर आ गए। इस घटना के बाद वो कभी भी जेल नहीं गए।

इसके बाद उन्होंने अपनी बात को जारी रखते हुए बताया कि विनायक दामोदर सावरकर ने भी अंग्रेज़ों को कम से कम 18 दफ़ा माफ़ी पत्र लिखा। अपनी बातों पर ज़ोर देते हुए उन्होंने भाजपा पर कई और आरोप लगाए। उनके कहे अनुसार 1968 में वो भाजपा के ही नेता थे, जिन्होंने अपनी पार्टी के प्रमुख दीन दयाल उपध्याय को मारा था। जिसका स्त्रोत उन्होंने भारतीय जन संघ के पूर्व अध्यक्ष बलराज माढोक की किताब को बताया, जिसमें उन्होंनें दील दयाल उपध्याय की पूरी जीवनी की चर्चा की है।

बीजेपी की छवि धूमिल करने के लिए लगातार कॉन्ग्रेस नेताओं का इस तरह का हमला करना उनकी ओछी राजनीति का सबूत है। अपने आपको सेक्यूलर पार्टी होने का दावा करने वाली कॉन्ग्रेस सरकार लगातार पीएम की जाति को लेकर, उनके पारिवारिक परिस्थितियों को लेकर उनके बैकग्राउंड को लेकर टिप्पणी करना बताता है, कि कॉन्ग्रेस किस दिशा में जाकर पीएम को सत्ता से हटाने के लिए आतुर है। यही नहीं तथाकथित रूप से महिलाओं का सम्मान करने वाली कॉन्ग्रेस पार्टी के नेता संजय निरूपम ने स्मृति ईरानी पर भी शर्मसार करने वाली नारीविरोधी टिप्पणी की थी।

सेना दिवस: परेड में मेक इन इंडिया का जलवा, महिलाओं ने रचा इतिहास

हर साल की तरह इस साल भी 15 जनवरी ‘आर्मी डे’ के रूप में मनाया गया। दिल्ली कैंट स्थित फील्ड मार्शल केएम करियप्पा परेड ग्राउण्ड में भारतीय सेना और सशस्त्र बलों ने अपनी ताकत दुनिया को दिखाई और अपने प्रदर्शन से पूरे देश का दिल जीत लिया। इस आर्मी डे की सबसे ख़ास बात यह रही कि इतिहास में पहली बार किसी महिला अधिकारी ने परेड का नेतृत्व किया। ये अपने-आप में एक बहुत बड़ा क्षण था, जब लेफ्टिनेंट भावना कस्तूरी ने आर्मी सर्विस कोर के 144 जवानों का नेतृत्व किया। लेफ्टिनेंट कस्तूरी 2015 में सेना में शामिल हुई थीं।

सेना में आने से पहले एनसीसी में शामिल रहीं लेफ्टिनेंट भावना कस्तूरी ने इस परेड को सफल बनाने के लिए कई दिनों तक प्रैक्टिस किया था। परेड से पहले एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि अब भारतीय सेना में क्रांति हो रही है और महिला अधिकारियों की स्वीकार्यता बढ़ रही है। इसके अलावे कप्तान शिखा सुरभि आर्मी डेयरडेविल्स टीम में जगह बनाने वाली पहली महिला बन कर इतिहास रचा। 24 वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने वाली इस टीम ने इस बार भी डेयरडेविल्स बाइक स्टंट्स का ऐसा प्रदर्शन किया, जिस से लोगों के रोंगटे खड़े हो गए।

विदेशी तोपों के साथ-साथ इस बार के सेना दिवस परेड में ‘मेक इन इंडिया (Make In India)’ का भी जलवा रहा। दक्षिण कोरिया के सहयोग से भारत में बनी K-9, जिसका भारतीय नाम वज्र दिया गया है, को भी इस परेड में शामिल किया गया। सेल्फ प्रोपेल्ड हॉवित्ज़र कैटिगरी में वज्र बोफोर्स से भी ज्यादा ताकतवर है। वज्र को नवंबर 2018 में सेना में शामिल किया गया था।

सेना प्रमुख जनरल विपिन रावत ने सेना दिवस पर कहा:

“हम अपने शहीदों को याद करते हैं, जिनकी अद्वितीय वीरता हमें आने वाले वर्षों में भी प्रेरित करती रहेंगी। भारतीय सेना राष्ट्र की सुरक्षा के लिए किसी भी चुनौती से निपटने में सक्षम है और पूरी तरह तैयार है।”

राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने भी भारतीय सेना को देश का गौरव बताते हुए उन्हें सेना दिवस की बधाई दी।

सेना दिवस प्रत्येक वर्ष भारत के पहले चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ़ (COAS) कोडंडेरा मडप्पा करिअप्पा (KM Cariappa) की याद में मनाया जाता है। जनरल करिअप्पा को उनके सेना से रिटायरमेंट के 33 सालों बाद फील्ड मार्शल की उपाधि से सम्मानित किया गया था। राजपूत रेजिमेंट से जुड़े करिअप्पा ने 1947 के भारत-पाक युद्ध में देश की पश्चिमी सीमा पर भारतीय सेना का नेतृत्व किया था। 15 जनवरी यानी आज के ही दिन 1949 में सेना प्रमुख नियुक्त किए गए जनरल करिअप्पा ने भारत और पकिस्तान के बँटवारे के बाद भारतीय सेना के गठन में अहम भूमिका निभाई थी।

BSF जवान का वायरल वीडियो: सैनिक दिवस पर ये नहीं देखा मतलब कुछ नहीं देखा!

देश की रक्षा कर रहे जवानों को लेकर अक्सर तरह-तरह की बातें की जाती हैं। कई बार सोशल मीडिया के यूज़र्स उन पर तंज कसते हुए उनकी सफलताओं पर सवालिया निशान लगाते हुए दिखाई देते हैं। कई बार शाहरुख़ और सलमान की 100 करोड़ पार कर गई फ्लॉप फिल्मों को शेयर करने में चक्कर में हम नौज़वानों के बलिदान को एक दूसरे के साथ साझा करना ही भूल जाते हैं।

लेकिन, हमारी सराहनाओं की अपेक्षा किए बिना भी वो देश की रक्षा में हमेशा जुटे रहते हैं ताकि हर नागरिक सुरक्षित रह सके। 1997 में आई बॉर्डर फिल्म उन्हीं सैनिकों की कहानी दिखाती है, जो देश की रक्षा करने में अपने घर से दूर, ज़िम्मेदारियों को दरकिनार करके देश के लिए मर-मिटने की कसम खाए, सरहद पर मौत का सेहरा बाँधे हमेशा तैनात रहते हैं।

इस फिल्म का पर्दे पर आना भले ही कलाकारों और निर्देशक की मेहनत का परिणाम है, लेकिन इसकी सफ़लता सिर्फ उन सैनिकों के जीवन का आधार है, जो हकीकत में भी बिलकुल उसी तरह देश की सुरक्षा करते हैं, कभी गर्म रेत पर तो कभी सियाचीन की बर्फ पर…

इस फिल्म में एक गाना है, “संदेशे आते हैं, हमें तड़पाते हैं….” जिसमें हर सैनिक अपने घर को, अपने लोगों को, अपनी ज़िम्मेदारियों को याद करते हुए बेहद भावुक हो जाता है और बदलते अंतरों में अपनी यादों को और व्यथाओं को गुनगुना कर बताने की कोशिश करता है। वो वाकई आँसूं छलका देने वाला दृश्य होता है। सोचिए अगर कोई जवान सही में ये बोल गुनगुनाए तो शायद हम उनके दर्द की खनक को दोगुना महसूस कर पाएंगे।

सोशल मीडिया पर इस समय एक वीडियो वायरल हुआ है। इस वीडियो में बीएसएफ का एक जवान बॉर्डर फिल्म के उसी गाने को बहुत ही शानदार ढंग से गा रहा है। फेसबुक से लेकर ट्विटर और ढेर सारे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर इस वीडियो को शेयर किया जा रहा है।

इस वीडियो की सबसे खास बात यह है कि फिल्म में जहाँ कई उपकरणों की मदद से और दृश्यों के चुनाव के साथ इस गाने में जान डाली गई थी, वहीं इसमें एक रियल लाइफ सैनिक इस गाने को अपनी भावनाओं में लपेटकर गाते जा रहा है, वो भी पूरे सुर-लय-ताल के साथ।

बता दें बॉर्डर फिल्म में यह गाना सोनू निगम और रूप कुमार राठौड़ की आवाज़ में है।

‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’: कन्हैया चिल्ला रहा था, कर रहा था भीड़ का नेतृत्व – पुलिस ने की पुष्टि

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने जेएनयू के पूर्व छात्र नेता कन्हैया कुमार, सईद उमर ख़ालिद और अनिर्बन भट्टाचार्य पर सोमवार (जनवरी 14, 2019) को देशद्रोह के मामले में आपराधिक षड्यंत्र रचने का आरोप लगाया है। पुलिस का आरोप है कि ये लोग 9 फरवरी 2016 को हुए प्रदर्शन में अन्य अपराधों से भी जुड़े हुए थे।

इस पूरे मामले पर पुलिस ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया के रिपोर्ट की पुष्टि करते हुए बताया कि जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व नेता कन्हैया कुमार ने ही उस दिन पूरी भीड़ का नेतृत्व किया था और बतौर छात्रसंघ नेता उसने सबको रोकने की जगह उन सबके साथ मिलकर देश-विरोधी नारेबाज़ी की थी।

दिल्ली पुलिस ने जो चार्जशीट फाइल की है, वो पूरे 1200 पन्नों का है। इसमें इस बात का ज़िक्र है कि 2016 में हुई यह घटना सोची-समझी साज़िश और पूरी प्लानिंग के साथ हुई थी। अपनी चार्जशीट में पुलिस ने इस मामले से जुड़े 90 गवाहों को साक्ष्य के तौर पर रखा है। इनमें से 30 ऐसे हैं, जो देशद्रोही नारेबाज़ी के प्रत्यक्षदर्शी हैं। इनमें से कुछ वहाँ के स्टॉफ और सुरक्षाकर्मी भी हैं।

रिपोर्ट के अनुसार सैयद उमर ख़ालिद के खिलाफ देशद्रोह के साथ-साथ आईपीसी की दो अन्य धाराएँ भी लगाई गई हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि ख़ालिद पर आरोप है कि उसने कुछ छात्रों और लोगों के नाम पर फर्जी हस्ताक्षर किए थे। खालिद पर 124ए, 323, 465, 471, 143, 147, 149 और 120 बी धारा लगाई गई है। अन्य आरोपितों पर 465 और 471 धारा को छोड़कर बाकी सारी धाराएँ लगाई गई हैं।

लगभग 3 साल पहले सैयद उमर ख़ालिद, कन्हैया कुमार और अनिर्बन भट्टाचार्य को इस पूरे मामले में मुख्य आरोपितों के रूप में गिरफ़्तार किया गया था, लेकिन बाद में सबको ज़मानत मिल गई थी। इन तीन के अलावा इस मामले में 7 कश्मीरी छात्रों – अक़ूब हुसैन, मुज़ीब हुसैन गट्टू, मुनीब हुसैन गट्टू, उमर गुल, रईस रसूल, बशरत अली और ख़ालीद बशीर भट्ट के भी नाम शामिल हैं। इन सातों आरोपितों में से उस समय किसी को भी गिरफ़्तार नहीं किया गया था।

सात कश्मीरी छात्रों में से रईस रसूल एक फ्रीलांस पत्रकार है, जबकि अक़ूब हुसैन डेंटिस्ट्री की पढ़ाई कर रहा है। बाकी के छात्र अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से या जेएनयू से है।

इस पूरी घटना के आरोपितों में से कन्हैया, उमर ख़ालिद और अनिर्बन के अलावा मुज़ीब हुसैन गट्टू जेएनयू का छात्र था। जबकि देश-विरोधी इस घटना को अंज़ाम देने के लिए कुछ लोगों को बाहर से बुलाया गया था, जिन्होंने पूरे समय अपने चेहरों पर मास्क ढक रखा था। हालाँकि पुलिस की स्पेशल सेल ने वहाँ पर मौजूद गवाहों और सोशल मीडिया के ज़रिए इन सबकी पुख़्ता पहचान कर ली है।

नमो ऐप पर PM मोदी ने माँगा जनता से फीडबैक; BJP सांसदों की धड़कनें तेज़

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जनता से सीधा संवाद करने के लिए जाने जाते हैं। चाहे रेडियो द्वारा ‘मन की बात’ हो या नमो ऐप द्वारा ‘मेरा बूथ, सबसे मज़बूत’- ये सभी उपक्रम प्रधानमंत्री मोदी और जनता के बीच सीधा संवाद का माध्यम बने हैं। शायद यही कारण है कि पीएम को ‘लुटियंस मीडिया’ को इंटरव्यू देने की जरूरत नहीं पड़ती। जनता से सीधा जुड़ाव के इस क्रम को आगे बढ़ाते हुए पीएम नरेंद्र मोदी ने अब नमो ऐप पर एक सर्वे शुरू किया है। इस सर्वे में जनता द्वारा वोट डाल कर ये सुनिश्चित किया जाएगा कि उनके हिसाब से उनके क्षेत्र में सबसे लोकप्रिय भाजपा नेता कौन है। प्रधानमंत्री ने इस सर्वे के बारे में बताते हुए फेसबुक पर पोस्ट किए एक वीडियो में कहा:

“नमो ऐप पर एक सर्वे लॉन्च किया गया है। मैं आपकी सीधी प्रतिक्रिया चाहता हूँ। आपकी प्रतिक्रिया हमारे लिए मायने रखती है। विभिन्न मुद्दों पर आपकी प्रतिक्रिया हमें महत्वपूर्ण निर्णय लेने में मदद करेगी। क्या आप सभी इस सर्वे को भरेंगे और दूसरों को भी ऐसा करने को कहेंगे?”

इस सर्वे में जनता से उनके क्षेत्र में हुए विकास कार्यों की समीक्षा करने को भी कहा गया है। इस सर्वे में लोग सुलभ स्वास्थ्य सुविधा, किसानों की समृद्धि, भ्रष्टाचार मुक्त शासन, स्वच्छ भारत, राष्ट्रीय सुरक्षा, अर्थव्यवस्था, बुनियादी ढाँचा, रोजगार और ग्रामीण विद्युतीकरण को लेकर उनके क्षेत्र में हुए विकास कार्यों की समीक्षा करेंगे। इसके अलावा, इस सर्वे में जनता का मूड भाँपने की भी कोशिश की गई है। महागठबंधन को लेकर भी सवाल पूछे गए हैं, जिससे यह पता चले कि जनता महगठबंधन के बारे में क्या सोचती है।

इस सर्वे में यह भी पूछा गया है कि आप मोदी सरकार को किस तरह रेट करना चाहेंगे। इसमें खराब (Poor) से लेकर उत्कृष्ट (Excellent) तक का विकल्प है। यह भी पूछा गया है कि अगर आप वोट करने जाते हैं तो आप किस मुद्दे पर सबसे ज्यादा विचार करते हैं। विकल्प के तौर पर स्वच्छता, रोज़गार, भ्रष्टाचार, कानून व्यवस्था इत्यादि दिए गए हैं।

पॉंचवें सवाल में जनता से उनके लोकसभा क्षेत्र के तीन सबसे लोकप्रिय नेताओं के नाम बताने को कहा गया है। वहीं इसके अगले सवाल में उनसे उनके राज्य के तीन सबसे लोकप्रिय भाजपा नेताओं के नाम पूछे गए हैं। इसके बाद जो प्रश्न पूछे गए हैं, वो भाजपा सांसदों की धड़कनें बढ़ा सकती हैं। इस प्रश्न में जनता से उनके क्षेत्र से चुने गए सांसद को लेकर राय मांगी गई है। इसमें पुछा गया है कि क्या आप अपने सांसद के कार्यों से संतुष्ट हैं? सांसद अपने क्षेत्र में लोकप्रिय हैं या नहीं- इस बारे में भी जनता से ज़वाब देने को कहा गया है।

नौवें प्रश्न में जनता से उनके क्षेत्र में सड़कें, बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार इत्यादि को लेकर सवाल पुछा गया है। इसमें उनसे पूछा गया है कि क्या आपके क्षेत्र में इन सबको लेकर हो रहे कार्य से आप संतुष्ट हैं?

अब देखना यह है कि इस सर्वे से क्या परिणाम निकलता है। लेकिन यह तो तय है कि इससे कई सांसदों की धड़कनें बढ़ जाएँगी। ऐसा इसलिए क्योंकि नरेंद्र मोदी जनता के मूड के हिसाब से निर्णय लेने के लिए जाने जाते हैं और अगर किसी सांसद ने अपने क्षेत्र में अच्छा काम नहीं किया है तो उसका टिकट भी काटा जा सकता है।

जब कॉन्ग्रेस ने की शिवराज को ट्रोल करने की कोशिश और ख़ुद ही हो गए ट्रोल

मध्यप्रदेश में कॉन्ग्रेस की सरकार ने अपना काम करना शरू कर दिया है, और काम करने की एक ऐसी थ्योरी बनाई है, जिससे पाँच दिनों में ‘चमत्कार’ हो रहा है। दरअसल कॉन्ग्रेस का कहना है कि सदियों से गंदी, मैली, पड़ी क्षिप्रा नदी को उन्होंने बस पाँच दिनों में साफ़ कर दिया। सफ़ाई का श्रेय लेने के लिए, और अपने काम का ट्रेलर शिवराज सिंह (मामा) को भी दिखाने के लिए, कॉन्ग्रेस के ऑफ़िसियल ट्विटर एकाउंट पर एक वीडियो पोस्ट किया गया, जिसमें उन्हें टैग करते हुए लिखा गयाः

“कमलनाथ जी ने उज्जैन में क्षिप्रा नदी को स्वच्छ करने और नियमित जलप्रवाह का वादा किया और महज़ 5 दिन में परिणाम आपके सामने है। गंगा सफ़ाई के नाम पर जनता का हज़ारों करोड़ बर्बाद करने वाले उज्जैन आएँ और देखें-सीखें।”

खै़र, शिवराज सिंह ने इनके वीडियो का लोड तो लिया ही नहीं और वीडियो बनाने एवं क्षिप्रा को साफ़ करने का श्रेय देने के बजाय, पूरी मेहनत पर बिना कुछ सोचे-समझे पानी फेरते हुए एक मुस्कुराहट वाली ईमोजी पोस्ट कर दी।

चलिए आपने ये कॉन्ग्रेस के ट्विटर हैडल का वीडियो तो देख ही लिया अब हम आपको दो साल पुरानी क्षिप्रा और उसके तट के घाटों को दिखाते हैं, जिसमें क्षिप्रा पूर तरह से निर्मल दिख रही है।

दो साल पहले इस तरह दिख रही थी क्षिप्रा नदी

अब इस वीडियो को देखकर आपको अंदाज़ा लग ही गया होगा कि आखिर कैसे इस नदी को पाँच दिनों में साफ़ कर दिया गया। वैस आपकी जानकारी के लिए बता दे कि नदी में पानी नहीं था और उसमें पानी छोड़कर क्षिप्रा को साफ़ करने का श्रेय ले लिया गया। इस ट्वीट पर लोगों की ख़ूब प्रतिक्रियाएँ आईं जिसमें से कुछ लोग ये पूछते दिखे कि अगर 5 दिन में साफ़ हो सकती थी नदी, तो इतने समय से कमलनाथ कहाँ थे, सफ़ाई तब ही करवा देते जब लोगों को पानी के न होने पर कीचड़ में नहाना पड़ा था। ज़ाहिर सी बात है कि नदियाँ 5 दिनों में साफ़ नहीं होती, बल्कि उसके लिए तमाम इंतज़ाम किए जाते हैं ताकि उसमें बाहर से गन्दगी ना आए, उसके तटों पर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बनाए जाएँ आदि।

जाते-जाते आपको दिखाते हैं कि पाँच दिन में क्षिप्रा को साफ़ करने की बात पर लोगों ने क्या कहा:

‘अर्बन नक्सल’ आनंद तेलतुम्बडे के ख़िलाफ़ दर्ज़ FIR को SC ने रद्द करने से किया इनकार

उच्चतम न्यायालय ने सोमवार (जनवरी 14, 2019) को भीमा कोरेगाँव हिंसा के मामले में संलिप्तता और प्रधानमंत्री मोदी की हत्या की साज़िश रचने के सिलसिले में पुणे पुलिस द्वारा दर्ज़ FIR को रद्द करने से इनकार कर दिया है।

रिपोर्ट के अनुसार, भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति अशोक भूषण, न्यायमूर्ति एस के कौल की एक खंडपीठ ने मामले में चल रही जाँच में किसी भी तरह के हस्तक्षेप से इनकार कर दिया और आनंद तेलतुंबडे को ट्रायल कोर्ट से नियमित जमानत लेने का आदेश दिया। हालाँकि, शीर्ष अदालत ने तेलतुंबडे को चार हफ्तों के लिए गिरफ़्तारी से सुरक्षा दे दी है।

इससे पहले, बॉम्बे हाईकोर्ट ने 21 दिसंबर को तेलतुंबडे द्वारा दायर पुणे पुलिस के FIR को रद्द करने की याचिका ख़ारिज़ कर दी थी और उन्हें तीन सप्ताह के लिए गिरफ़्तारी से अंतरिम संरक्षण दिया था।

पुणे पुलिस ने भीमा कोरेगाँव हिंसा के सिलसिले में स्वयंभू ‘सामाजिक कार्यकर्ताओं’ – गौतम नवलखा, पी वरवरा राव, वर्नोन गोंजाल्विस, अरुण परेरा, सुधा भारद्वाज, आनंद तेलतुम्बडे और स्टेन स्वामी – को गिरफ़्तार किया था। ये सभी पीएम मोदी की हत्या की साज़िश रचने के आरोपित हैं। गिरफ़्तार किए गए इन ‘सामाजिक कार्यकर्ताओं’ पर माओवादियों के नेटवर्क के साथ सम्बन्ध होने के पुख़्ता सबूत मिले थे।

गिरफ़्तारियाँ भीमा कोरेगाँव हिंसा के संबंध में थीं। इससे पहले, पुणे पुलिस ने इस मामले में रोना विल्सन, सुरेंद्र गडलिंग, शोमा सेन, महेश राउत और सुधीर धवले को गिरफ़्तार किया था। अगस्त (2018) महीने के छापे में गिरफ़्तार किए गए ये आरोपित सर्वोच्च न्यायालय में चले गए थे और न्यायिक हिरासत के बजाय ‘हाउस अरेस्ट’ का अंतरिम आदेश प्राप्त किया था।

सुप्रीम कोर्ट ने भीमा कोरेगाँव हिंसा में कथित भूमिका के लिए पाँच नक्सलियों की गिरफ़्तारी के मामले में इतिहासकार रोमिला थापर द्वारा दायर एक समीक्षा याचिका की तत्काल सुनवाई से इनकार कर दिया था।

28 सितंबर को भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली सर्वोच्च न्यायालय ने इन पाँच ‘अर्बन नक्सलियों’ की गिरफ़्तारी के मामले में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया था। साथ ही इनकी हाउस अरेस्ट की अवधि को बढ़ा दिया था। शीर्ष अदालत ने ये भी कहा था कि इन आरोपित कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारी का विपरीत राजनीतिक विचारधारा या भिन्न विचार होने से कोई लेना-देना नहीं है।