Monday, May 25, 2020
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1984 से चल रही थी कारगिल की तैयारी, हवा में मुशर्रफ़ को बर्खास्त कर कुर्सी गँवा बैठे नवाज़ शरीफ़

अपनी तमाम चालबाज़ियों के बाद भी पाकिस्तान का सैन्य प्रशासन अंततः सैन्य था, और इसलिए राजनीतिक गणित में वह गलतियों पर ऐसी गलतियाँ करता गया, जो शायद दिन-रात राजनीति को ओढ़ने-बिछाने वाले राजनेता और राजनयिक उसे करने से रोक लेते।

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किसी राजनीति के मशहूर पंडित (शायद मैक्यावेली/Machiavelli) ने कहा था कि राजनीति में दुश्मन का हाल चाल दोस्तों से ज्यादा पता रखना चाहिए। कारगिल को आज 20 साल हो गए हैं। पाकिस्तान इन बीस सालों में लोकतंत्र, राजनीति, अर्थव्यवस्था यानि एक राष्ट्र की सफ़लता के हर लिहाज से जहाँ इन दो दशकों में बद से बदतर हुआ है, वहीं तमाम उतार-चढ़ावों के बावजूद हिंदुस्तान की सफलता पाकिस्तान की तुलना में अचम्भित कर देने वाली रही है। और इसका एक बड़ा श्रेय हिंदुस्तान के स्थिर लोकतंत्र और पाकिस्तान के उलट हिंदुस्तानी सेना में एक संस्था के तौर पर सत्ता-लोलुपता के अभाव की बड़ी भूमिका है। आज यह ज़रूरी है कि हम सीमा के उस पार पाकिस्तान की राजनीति पर नज़र डालें, और देखें कि कारगिल के हालात राजनीतिक रूप से कैसे पैदा किए गए, और उसके बाद क्या हुआ, ताकि भविष्य में भी कभी हम वही गलतियाँ दोहराने की गलती न करें।

1984 से नज़र

1984 में दुर्गम और रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण सियाचिन दर्रे पर हिंदुस्तानी सेना के कब्ज़े के बाद से पाकिस्तानी सेना की नज़र इसका ‘बदला’ लेने पर थी। इसके लिए पाकिस्तान के चार जनरलों ने एक ‘प्लान’ तैयार किया। जानकारों की मानें तो यह प्लान कारगिल क्षेत्र में पाकिस्तानी घुसपैठ का ही था। किन्हीं कारणवश न केवल नागरिक प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो, बल्कि उनके पहले सैन्य तानाशाह जनरल ज़िया उल हक ने भी इस प्लान पर अमल करने की बजाय इसे ठंडे बस्ते में ही रखा।

इसके बाद प्रधानमंत्री बने नवाज़ शरीफ़, और सेना के सिरमौर हुए जनरल परवेज़ मुशर्रफ़। ‘शांतिप्रिय’ नवाज़ शरीफ़ की हिंदुस्तानी ‘वज़ीरे-आज़म’ वाजपेयी से बढ़ती पींगों से पाकिस्तानी सेना परेशान थी दो कारणों से- पहले तो इसलिए कि पाकिस्तान में हिंदुस्तान के उलट सेना का देश के हर स्तर पर दखल है (उस समय भी था)। मलाईदार ठेकों, जो सेवारत होते हुए भी सेना और आईएसआई के जनरल खुल्लमखुल्ला लूटते हैं, के चलते सेना में भर्ती होना पाकिस्तान में तरक्की की सबसे शर्तिया और आसान सीढ़ी थी। (कॉन्ग्रेस में होने के बावजूद अक्सर पाकिस्तान को आईना दिखाने में सफल रहने वाले पूर्व संयुक्त राष्ट्र राजनयिक शशि थरूर की मशहूर कहावत है कि हिंदुस्तान में देश के पास सेना है, पाकिस्तान में सेना के लिए एक देश है।) ऐसे में अगर हिंदुस्तान के साथ शांति कायम हो जाती तो देश के संसाधनों की खुली लूट के ज़रिए सेना को दुलारने-पुचकारने की इतनी ज़रूरत न रहती। इसके अलावा दूसरा कारण यह था कि जिहादी और हिंदुस्तान-विरोधी मानसिकता को पाकिस्तान ने न केवल आतंकी संगठनों के ज़रिए पाला है, बल्कि अपने अंदर भी, अपने सैनिकों में जिहादियों की भर्ती के रूप में भी पनाह दी है।

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ऐसे में एक ओर वाजपेयी के साथ नवाज़ शरीफ़ 1998 में वार्ता शुरू कर रहे थे, हिन्दुस्तान-पाकिस्तान शिखर सम्मेलन ज़ोर-शोर से करने की तैयारी कर रहे थे, और दूसरी ओर उनके सैनिक उनकी ही बेखबरी में कारगिल के शिखर पर चढ़े जा रहे थे, ‘ऑपरेशन कोह-ए-पाइमा’ (“पर्वतारोही”) के तहत। जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ द्वारा सक्रिय किए गए इस प्लान की रूपरेखा 1984 वाले प्लान पर ही आधारित थी, और मकसद था हिन्दुस्तान से सियाचिन का बदला लेने के अलावा कश्मीर में सुस्त पड़ती दहशतगर्दी को सक्रिय करना और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान के कश्मीर प्रोपेगंडा के लिए जमीन तैयार करना।

अपने ही जनरलों द्वारा ब्रीफिंग के नाम पर ‘चक्रम’ बने शरीफ़ प्रशासन को इस योजना और जंग की भनक, नसीम ज़ेहरा की किताब ‘फ्रॉम कारगिल टू कू (तख्तापलट)’ के मुताबिक, 17 मई, 1999 के आसपास लगी, जब जंग ने ज़ोर पकड़ लिया था, और ऐसे में पीछे हटना नाक कटवाना होता। तब तक 3 मई को हिंदुस्तानी गड़ेरियों ने बर्फ़ पिघलना शुरू होने के बाद पाकिस्तानी कब्ज़ा देख कर हिंदुस्तानी सेना को इत्तला कर दिया था, 5 मई को पाकिस्तानियों ने हमारी सेना के गश्ती दल के सैनिकों को टॉर्चर कर के मार डाला था, और जब तक हिंदुस्तान की गोलियों को सुनने के लिए नवाज़ शरीफ़ जनरलों के हाथ अपने कान से हटाते, जंग पूरे शबाब में थी।

बिखरा पाकिस्तान का ‘घर’

मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि किसी भी परिवार या सामाजिक इकाई का वर्गीकरण इस आधार पर किया जा सकता है कि किसी मुसीबत के आने पर उसके सदस्य और करीब आ जाते हैं, एक-दूसरे से सामान्य समय से बेहतर तालमेल बिठा लेते हैं, या आपस में ही लड़कर मुसीबत को और नासूर बना देते हैं। हिंदुस्तान और काफिरों से नफ़रत की बुनियाद पर बना पाकिस्तान अगर कभी भी एक परिवार के तौर पर रहा होगा, तो वह परिवार कारगिल के समय एक-दूसरे से ही जूझता अधिक नज़र आया।

पहले तो, जैसे कि ऊपर बताया गया है, न केवल सेना ने अपने प्रधानमंत्री को ही अँधेरे में रख कर ऑपरेशन शुरू किया और एक शत्रु देश (हिंदुस्तान) पर उस समय धावा बोला जिस समय उनके प्रधानमंत्री उसी देश से मित्रता करने की कोशिश कर रहे थे,बल्कि उन्हें इसके बारे में झूठी ब्रीफिंग भी दी।

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अपनी तमाम चालबाज़ियों के बाद भी पाकिस्तान का सैन्य प्रशासन अंततः सैन्य था, और इसलिए राजनीतिक गणित में वह गलतियों पर ऐसी गलतियाँ करता गया, जो शायद दिन-रात राजनीति को ओढ़ने-बिछाने वाले नागरिक राजनेता और राजनयिक उसे करने से रोक लेते। उनकी सेना को लगा कि मुश्किल से एक साल पहले प्रकाश में आए मोनिका लेविंस्की सेक्स स्कैंडल में फँसे और हिंदुस्तान के पोखरण न्यूक्लियर टेस्ट से भड़के अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन प्रशासन की पाकिस्तान के साथ बहुत ज़्यादा सहानुभूति होगी; उसे यह भी लगा कि कश्मीर में उसके फैलाए दहशत और जिहाद से लड़ते-लड़ते हिंदुस्तानी सैनिक थक गए होंगे। उसने यहाँ तक कि गर्मियों में घुसपैठ का पता चलने के बाद हिंदुस्तान को पलटवार में कितना समय लगेगा, इसका गणित करने में भी चूक कर दी।

नतीजन न केवल हिंदुस्तान के ‘अप्रत्याशित’ रूप से द्रुत प्रत्युत्तर के चलते पाकिस्तानी सेना ने मुँह की खाई, बल्कि अमेरिका ने भी इस मामले में हिंदुस्तान के स्टैंड का स्पष्ट समर्थन किया। दुनिया के अधिकाँश देशों का दबाव भी पाकिस्तान के गले पर ही पड़ा। अंत में खीझ कर सरकार को सेना को वापिस बुलाना पड़ा।

अंदर की शतरंज में अपनी ही शह पर मात

हार के बाद प्रधानमंत्री नवाज शरीफ़ ने जो फैसले लिए, अंत में वह उनके प्रधानमंत्रित्व के ताबूत की कील साबित हुए। उन्होंने एक ओर जनरल मुशर्रफ़ को कारगिल के लिए पूरी तरह ज़िम्मेदार ठहराया और खुद के अनजान-मासूम होने का दावा किया, और दूसरी ओर मुशर्रफ़ को पद पर भी बने रहने दिया। परवेज़ मुशर्रफ़, अपनी ही किताब ‘इन द लाइन ऑफ़ फायर’ में इकबालनामे के मुताबिक, कारगिल के समय ही नवाज़ शरीफ़ की कथित कमज़ोरी और नाकाबिलियत को भाँप गए थे, और बाद में उनसे और सेना से सीधा टकराव मोल लेकर शरीफ़ ने उन्हें तख्तापलट के लिए बहाना भी थमा दिया।

जंग के बाद पाकिस्तानी सैनिक मायूस थे और अफ़सर, जो असैन्य/नागरिक सरकार को अपने से ‘नीचे’ देखने की संस्कृति में पगे हुए थे, प्रधानमंत्री की ‘जुर्रत’ से भड़के हुए थे। मुशर्रफ़ ने मौके का फायदा उठाया और तख्तापलट के आखिरी अध्याय के लिए ज़मीन तैयार करनी शुरू कर दी, जिसे पता नहीं नवाज़ शरीफ देख के अनजान बने रहे, या देख ही नहीं पाए। मुशर्रफ़ ने उस तरह से विभिन्न सैन्य अड्डों का दौरा शुरू किया, जैसे लोकतंत्र में चुनावी रैलियाँ होतीं हैं। बहाना लिया सैनिकों का ‘मनोबल बढ़ाने’ का। वह सैनिकों को साफ़ सिग्नल भेज रहे थे कि वह (मुशर्रफ़) न केवल उनके ‘अपने आदमी’ हैं, बल्कि हार के बाद उनके साथ भी खड़े हैं; वहीं ‘बाहरी’/’ब्लडी सिविलयन’ नवाज़ शरीफ़ उनके (सैनिकों के) जान की बाज़ी लगाकर बर्फ़ीली चोटी पर जंग लड़ने के बाद उन्हें अपनी नाक बचाने के लिए बलि का बकरा बना रहे हैं।

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इसके बाद अंत में चेते नवाज़ शरीफ ने न केवल मूर्खतापूर्ण, बल्कि कायरतापूर्ण, कदम उठाते हुए परवेज़ मुशर्रफ़ को उस समय बर्खास्त कर दिया जब मुशर्रफ़ श्री लंका के दौरे से लौटते हुए एक हवाई जहाज में थे। शरीफ शायद मुशर्रफ़ का सामना करने से इतना हिचकिचा रहे थे कि उन्होंने जनरल मुशर्रफ़ के जहाज को पाकिस्तान की बजाय किसी भी और देश में उतारे जाने का भी आदेश दे दिया! मुशर्रफ़ ने पाकिस्तान इंटरनेशनल एयरलाइन्स के नागरिक विमान, जिसमें वह तकरीबन सौ अन्य सहयात्रियों के साथ थे, के कॉकपिट से दो फ़ोन किए यह खबर सुनने के बाद। एक अपने जनरल स्टाफ़ के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल मुहम्मद अज़ीज़ खान को, और दूसरा रावलपिंडी सैन्य टुकड़ी के लेफ्टिनेंट जनरल महमूद अहमद को। जब तक मुशर्रफ़ का जहाज कराची में उतरा, सेना ने शरीफ़ को बंदी बना लिया था, और पाकिस्तान के जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ सरताज बन चुके थे

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