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पकड़ा गया असम राइफल्स पर हमले का ये खूँखार उग्रवादी यांगहांग

असम राइफल्स ने आज नागालैंड के अबोई-मोन रोड पर नागा आतंकवादी संगठन NSCN (K) के मेजर जनरल यांगहंग उर्फ़ मोपा को पकड़ा है। 40 असम राइफल्स पर हमले के पीछे इसी का हाथ था। इस हमले में 2 जवान शहीद हो गए थे।

गिरफ्तार किया गया उग्रवादी खुद को मेजर जनरल यांगहांग बताता है। इस साल मई के महीने में नागालैंड के मोन जिले के अंतर्गत असम राइफल्स 40 रेजिमेंट के जवानों पर उग्रवादियों ने घात लगाकर हमला कर दिया था। इसके बाद दोनों तरफ से ताबड़तोड़ गोलियाँ चली थी। इस हमले में असम राइफल्स के 2 जवान शहीद हो गए थे।

रिपोर्ट्स के अनुसार, घटना के वक्त 40 असम राइफल्स के सेक्टर सात के जवानों का काफिला नागालैंड के जंगलों से घिरे मोन जिले से गुजर रहा था। उसी वक्त पहले से घात लगाकर बैठे एनएससीएन और उल्फा के उग्रवादियों ने एक साथ हमला बोल दिया था।

मौलवी ने मदरसे में किया नाबालिग़ से रेप, निकाह की आड़ में छुपाने की कोशिश

कानपुर में एक मदरसे का मौलवी जावेद, जो कि मदरसे के अंदर ही एक नाबालिग़ लड़की से रेप का आरोपित है। अब वह निकाह की आड़ में बचने का उपाय तलाश रहा है। मौलवी का कहना है कि उसने पीड़िता के साथ निकाह कर लिया था। जबकि पीड़िता को आरोपित मौलवी फॉर्म भरवाने के नाम पर मदरसा ले गया था, जहाँ उस समय जावेद की मामी आब्दा इस्लाम और उनकी बेटी शीबा (जो उसी मदरसे में पढ़ाती हैं) के अलावा कोई अन्य छात्र मौजूद नहीं था। आरोपित ने मदरसे में ही रेप किया जबकि वहाँ उपस्थित दो महिला टीचर उसकी मदद को आगे नहीं आई।

आरोपित मौलवी मुहम्मद जावेद

आरोपित जो अब तक भागा-भागा फिर रहा था, जिसे पुलिस ने मोबाइल फोन को ट्रैक कर गिरफ्तार कर लिया है। स्वराज्य की पत्रकार स्वाति गोयल शर्मा की रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस ने बताया कि आरोपित ने मदरसे में पीड़िता के साथ सेक्सुअल सम्बन्ध की बात स्वीकार कर ली है लेकिन आरोपित मौलवी का कहना है कि उसने रेप करने से पहले उसके साथ निकाह किया था।

हालाँकि, मौलवी ने कोई निकाहनामा पुलिस के सामने पेश नहीं किया है। मौलवी ने यह भी दावा किया है कि पीड़िता नाबालिग नहीं है बल्कि 19 साल की है। जबकि परिवार द्वारा पीड़िता का जो जन्म प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया गया है, उसमे उसकी जन्म तिथि 19 मार्च 2004 है, अर्थात वह अभी 15 साल की है।

पीड़िता का परिवार इस बात से चिंतित है क्योंकि मोहल्ले में आरोपित मौलवी का पीड़िता से निकाह वाली बात फैल चुकी है। पीड़िता के पिता ने कहा, “हमारे ऊपर जावेद को पैसे के लिए फँसाने के झूठे आरोप लगा, बदनाम किया जा रहा है। कोई भी हमारा साथ नहीं दे रहा है।” पीड़िता की कजिन का कहना है कि मुहल्ले वाले भी मौलवी के ही साथ हैं, कोई हमारी मदद नहीं कर रहा है, यहाँ तक पुलिस स्टेशन भी कोई हमारे साथ नहीं गया।

पीड़िता की माँ का कहना है कि मौलवी की मामी आब्दा ने हमें पुलिस में शिकायत न करने के लिए पैसे देने की बात की। निकाह की बात से भी इनकार करते हुए पीड़िता की माँ ने कहा कि उनका खुद का पति अभी 34 साल का है तो वह भला अपनी बेटी का निकाह उसके बाप के भी उम्र से ज़्यादा उम्र के व्यक्ति से कैसे कर सकती हैं। कैसे मैं अपना दामाद अपने पति से भी बूढ़ा लाऊँ?

पीड़िता के अब्बू ने कहा कि वैलिड निकाह में एक काजी और चार गवाहों की आवश्यकता होती है। दोनों तरफ से दो-दो गवाह और निकाह के बाद, निकाहनामा की एक-एक कॉपी दोनों पक्षों को दी जाती है। लेकिन इस मामले में ऐसा कुछ नहीं है।

निकाह और निकाहनामें की मुस्लिमों में क्या हालात हैं यह भी चिंता का विषय है। नूरजहाँ साफिआ निआज़, जो कि एक मुस्लिम महिला अधिकार कार्यकर्ता हैं और भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की संस्थापिका भी हैं, ने बताया कि मुस्लिम समुदाय द्वारा कोई भी निकाह का तय नियम का पालन नहीं किया जाता है। उन्होंने कहा कि किसी भी मदरसा या मस्जिद द्वारा दिए गए निकाहनामें में संस्था का नाम प्रिंट होता है और महज कुछ कॉलम भरे होते हैं जिसे समुदाय और कोर्ट द्वारा स्वीकार कर लिया जाता है।

योग दिवस का मजाक उड़ाते हुए राहुल पिद्दी गाँधी ने देश, सेना और आर्मी के कुत्तों का किया अपमान

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी की हरकतों में लोकसभा चुनाव में उत्तर भारत से ठेठ दक्षिण भगाए जाने के बाद भी कोई ख़ास बदलाव नहीं आया है। दुनियाभर में आज योग दिवस मनाया जा रहा है। इस मौके पर राहुल गाँधी ने एक ट्वीट किया है जिस पर विवाद शुरू हो चुका है। इस ट्वीट में उन्होंने सेना के जवानों और कुत्तों के जरिए योग करते हुए तस्वीरें ट्वीट की हैं। राहुल ने बीजेपी और सरकार पर तंज कसने के चक्कर में सेना और योग दिवस का मजाक बनाया जो लोगों को पसंद नहीं आया।

राहुल के इस ट्वीट पर लोगों ने रिएक्शन देना भी शुरू कर दिया है। दरअसल, राहुल गाँधी ने शुक्रवार (जून 21, 2019) को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर सेना की ‘डॉग यूनिट’ के योग कार्यक्रम से जुड़ी तस्वीरें शेयर कर करते हुए सरकार पर तंज कसा और कहा कि यह ‘न्यू इंडिया’ है। हालाँकि, उनके इस तस्वीर के शेयर करते ही लोगों ने उन्हें ही ट्रोल करना शुरू कर दिया।

राहुल गाँधी के इस विवादित ट्वीट पर भारतीय जनता पार्टी के सांसद तेजस्वी सूर्या ने पलटवार करते हुए लिखा है-“राहुल गाँधी ने अब तक अपने कर्मों से कोई सबक नहीं लिया है। उन्होंने हमारी सेना, हमारे बहादुर जवानों, अतुल्य डॉग यूनिट, योग की परंपरा और हमारे देश का अपमान अपने इस ट्वीट के जरिए किया है। मुझे कॉन्ग्रेस के युवा कार्यकर्ताओं के लिए काफी बुरा महसूस होता है जिन्हें ऐसे आदमी को अपने नेता के रूप में झेलना पड़ता है।”

अभिनेता और नेता परेश रावल ने भी इसको लेकर ट्वीट किया है। परेश रावल ने ट्वीट में लिखा है, “हाँ, ये नया इंडिया है राहुल जी, जहाँ कुत्ते भी आपसे ज्यादा होशियार हैं।”

वहीं, जब बीजेपी सांसद परवेश वर्मा से राहुल गाँधी के इस ट्वीट के बारे में पूछा गया तो वर्मा ने राहुल गाँधी के ट्वीट पर जवाब देते हुए कहा- “राहुल गाँधी के शरीर में एक हिस्सा ऐसा है जो पूरी तरह से खाली है उसे कोई भी भर नहीं सकता है ना कोई किताब और ना ही कॉन्ग्रेस पार्टी। देश के साथ साथ विदेशों में भी योग ने भारत का नाम रोशन किया है।”

देखा जाए तो न्यू इंडिया के नाम पर जिन कुत्तों के जरिए राहुल गाँधी सेना का मजाक बना रहे हैं, देश के लिए राहुल गाँधी से ज्यादा योगदान इन कुत्तों ने ही दिया है।

फ्री मेट्रो राइड पर ‘मेट्रो मैन’ श्रीधरन का सिसोदिया-केजरीवाल को तार्किक तमाचा

‘मेट्रो मैन’ के नाम से मशहूर ई श्रीधरन ने कल (जून 20, 2019) को एक पत्र के माध्यम से कुछ दिनों पहले ही मीडिया में रिलीज़ दिल्ली फ्री मेट्रो सेवा को जायज ठहराने वाले मनीष सिसोदिया के पत्र के जवाब दिया है। जिसमें उन्होंने बहुत ही तार्किक तरीके से सिसोदिया के हर प्रश्न और अपनी आपत्तियों को रखा है।

चलिए एक निगाह में जान लेते हैं क्या है पूरा मामला- कुछ दिन पहले ही, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए दिल्ली की महिलाओं को लोकलुभावन योजना के दायरे में लाने के लिए दिल्ली की बसों व मेट्रो में महिलाओं की यात्रा मुफ्त करने का निर्णय लिया। इसके पीछे केजरीवाल का तर्क है कि सभी डीटीसी बस, क्लस्टर बस और मेट्रो ट्रेन में महिलाओं को मुफ्त में यात्रा करने की अनुमति दी जाएगी ताकि वे ख़ुद को सुरक्षित महसूस कर सकें।

दिल्ली मेट्रो के पहले प्रबंध निदेशक और ‘मेट्रो मैन’ के नाम से मशहूर ई श्रीधरन ने मेट्रो में महिलाओं को मुफ़्त यात्रा की सुविधा देने की आम आदमी पार्टी सरकार की पहल को मेट्रो के लिए नुकसानदायक बताया था। उन्होंने सुझाव दिया कि छूट की राशि सीधे महिलाओं के खाते में ट्रांसफर की जाए। इस संबंध में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी भी लिखी थी।

दिल्ली मेट्रो के सलाहकार श्रीधरन द्वारा लिखी चिट्ठी पर दिल्ली के उप मुख्यमंत्री ने कड़ी आपत्ति जताते हुए जवाब में लिखा, “मुझे आश्चर्य के साथ-साथ आपकी चिट्ठी पर दुख भी है, जिसमें आपने मेट्रो में महिलाओं को फ्री यात्रा का खर्च दिल्ली सरकार द्वारा उठाने के प्रस्ताव का विरोध किया है।” सिसोदिया के पत्र का इसी लेख में नीचे विवरण दिया गया है। बेशक, उस समय सिसोदिया और AAP सहित, उनके तमाम समर्थक मीडिया को वह सिसोदिया का मास्टर स्ट्रोक नज़र आया हो। लेकिन यह कदम व्यावहारिक तो नहीं ही है, ऐसा कई विशेषज्ञों ने दावा किया है।

सिसोदिया के पत्र का बिंदुवार जवाब श्रीधरन ने दिया है। हालाँकि, उन्होंने कहा कि उन्हें आम आदमी पार्टी या सिसोदिया का भेजा कोई पत्र नहीं मिला है, पर मीडिया के माध्यम से उन्हें सिसोदिया का पत्र हाथ लगा। जिसका जवाब श्रीधरन ने भी 20 जून को अपने एक पत्र के माध्यम से दिया है। हालाँकि, उनके इस पत्र का मीडिया ने शायद उतना संज्ञान नहीं लिया है।

मनीष सिसोदिया के पत्र का इ श्रीधरन द्वारा दिया गया जवाब

आदरणीय महोदय,
विषय- दिल्ली मेट्रो में महिलाओं की मुफ़्त यात्रा

आपका 14 जून 2019 को जारी पत्र मुझे अभी तक नहीं मिला, लेकिन मुझे मीडिया के माध्यम से उसकी एक कॉपी मिली है।

सर, मेरा विरोध इस विचार से ही है कि समाज के किसी भी सेक्शन को ऐसे समय में मुफ्त मेट्रो सेवा नहीं दी जानी चाहिए। अभी भी DMRC पर बचे हुए लोन का बोझ लगभग 35 हज़ार करोड़ रुपए का है। हो सकता है, आपकी सरकार DMRC को हुए नुकसान की भरपाई कर दे, लेकिन आने वाली सरकार शायद ऐसा न करे तो ऐसे समय में DMRC योजना को वापस लेने और फिर से महिलाओं पर टिकट चार्ज लगाने में सक्षम नहीं होगी। आगे यह योजना दूसरे शहरों के मेट्रो सेवाओं के लिए भी मुसीबत बनेगी जो अभी भारी कर्ज के बोझ तले दबे है। अभी के जो हालात हैं, उसमें मेट्रो निर्माण की गति अपने तय लक्ष्य (चीन के 300 किलोमीटर प्रति वर्ष की जगह भारत में मात्र 25 किलोमीटर प्रति वर्ष) से बेहद धीमी गति से चल रही है। इसका मुख्य कारण फंड की कमी है। मेट्रो अभी उधार के जाल में फँसता हुआ नज़र आ रहा है, ऐसे में आने वाले समय में नए मेट्रो के निर्माण के लिए लोन की कोई व्यवस्था नज़र नहीं आ रही।

मैं, दिल्ली सरकार के महिलाओं के मुफ्त यात्रा के ट्रेवल चार्ज वहन करने के प्रस्ताव का विरोध नहीं कर रहा हूँ, बल्कि मेरा विरोध मेट्रो में मुफ्त यात्रा के विचार का विरोध है। यदि हम महिलाओं को मुफ्त यात्रा की सुविधा देने जा रहे हैं तो उन अन्य महत्वपूर्ण वर्गों जैसे छात्रों, दिव्यांग व्यक्तियों और सीनियर सिटीजन आदि का क्या करेंगे? वैसे, पूरे विश्व में कहीं भी कोई मेट्रो सेवा नहीं है जो सिर्फ महिलाओं के लिए मुफ्त हो।

गयदि GNCTD महिलाओं की मुफ्त यात्रा के प्रति इतनी ही चिंतित है तो उन्हें मुफ्त मेट्रो सेवा देने से बेहतर है कि सीधे उनके खाते में उनकी यात्रा का खर्च डाल दे। कृपया याद रखें, किसी भी तरह से यदि दिल्ली सरकार DMRC को पेमेंट करती है तो वह पैसा टैक्स पेयर का है और वे दूसरों को मुफ्त यात्रा सुविधा देने के लिए सवाल कर सकते हैं। लगभग सभी को पता है कि यह आगामी दिल्ली विधानसभा चुनाव में महिलाओं का वोट हासिल करने लिए महज एक चुनावी हथकंडा है।

सर, आपका यह कहना कि दिल्ली मेट्रो अभी अपनी सम्पूर्ण क्षमता का केवल 65% उपयोग कर पा रही है, यह सत्य नहीं है।(शायद आप DPR की भविष्यवाणी पर आँख मूँदकर भरोसा कर रहे हैं।) भीड़ वाले समय में पूरा मेट्रो सिस्टम अत्यधिक ओवरलोडेड होता है, जबकि हर 2 मिनट में मेट्रो संचालित हो रहा होता है। तब भी यात्रियों को बमुश्किल खड़े होने की जगह मिलती है। महिलाओं की मुफ्त यात्रा को मंजूरी देने के बाद भीड़ और बुरी तरह से बढ़ेगी जो कि किसी बड़ी दुर्घटना का कारण हो सकती है।

यदि दिल्ली सरकार के पास बहुत ज़्यादा पैसा हो गया है तो नए मेट्रो ट्रेन्स और तेजी से लाइन्स के निर्माण में क्यों न DMRC का सहयोग करे, ताकि अभी की बेतहाशा भीड़ से यात्रियों को आराम मिले। दूसरी तरफ, जहाँ तक मुझे जानकारी है कि दिल्ली सरकार ने चौथे फेज को स्वीकृति देने में भी 2 वर्ष की देरी की। यहाँ तक कि बसों के लिंक कनेक्टिविटी में भी देरी हुई। यह ज़्यादा महत्वपूर्ण काम है जो सरकार कर सकती है जिससे सड़क पर भीड़ कम हो और दिल्ली को काफी हद तक प्रदूषण से मुक्ति भी मिले।

महिलाओं को मुफ्त यात्रा की सुविधा देने से महिलाओं की सुरक्षा में शायद ही कोई सुधार आए, उनकी सुरक्षा का तब क्या होगा जब वह मेट्रो से बाहर आएँगी, जहाँ उनके लिए लिंक बस सुविधाओं की ज़्यादा आवश्यकता है। यह कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ आपकी सरकार ध्यान दे सकती है, न कि मुफ्त मेट्रो सेवा में पैसा लगाकर उन्हें बर्बाद करे।

इसलिए, मेरी आपकी सरकार से निवेदन है कि सिर्फ चुनावी लाभ के लिए दिल्ली की सबसे प्रभावशाली यात्रा सुविधा को बर्बाद मत कीजिए।
आपका
डॉ. ई श्रीधरन

बता दें कि इससे पहले डीएमआरसी ने बताया था कि इस पूरी योजना पर सालाना ₹1566 करोड़ का खर्च आएगा। साथ ही मेट्रो ने योजना के लागू होने के बाद मुसाफिरों की संख्या में 15 से 20% बढ़ोतरी की उम्मीद जताई गई है। डीएमआरसी ने इस योजना को लागू करने के लिए किराया निर्धारण समिति (एफएफसी) से मंजूरी लेना अनिवार्य बताया है। हालाँकि, केजरीवाल का मानना है कि वैसे तो इसकी कोई जरूरत नहीं है, लेकिन अगर जरूरत पड़ी तो वो इसकी मंज़ूरी लेकर आएँगे। 

DMRC ने दिल्ली सरकार को सौंपे अपने प्रस्ताव में कहा कि महिलाओं के लिए मुफ्त यात्रा को लागू करने से लगभग ₹1566 करोड़ का वार्षिक ख़र्च होगा, इसमें से ₹11 करोड़ का ख़र्च फीडर बसों पर आएगा। 

जिसके बाद, बुधवार (12 जून) को, मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि दिल्ली सरकार द्वारा DMRC को इस रकम का भुगतान किया जाएगा। DMRC ने अपनी 8 पेज की रिपोर्ट में, इस बात का भी ज़िक्र किया था कि महिलाओं को मुफ़्त सफर कराने वाली इस योजना का भविष्य में दुरुपयोग भी हो सकता है। DMRC ने क़ानूनी सलाहकार से भी चर्चा की और यह जानने का प्रयास किया था कि क्या इस तरह की वित्तीय सब्सिडी या अनुदान राज्य सरकार द्वारा दिल्ली मेट्रो रेलवे (संचालन और रखरखाव) अधिनियम, 2002 के तहत यात्रियों के एक विशेष वर्ग को दी जा सकती है?

जानकारी के लिए बता दें कि केजरीवाल की इस मुफ्त मेट्रो योजना का जहाँ मीडिया गिरोह और कुछ नेताओं द्वारा क्रांतिकारी बताया गया, वहीं विशेषज्ञों ने इस योजना की कई खामियाँ गिनाते हुए ऐसे अधोगामी प्रस्ताव का विरोध भी किया था। यहाँ तक कि जनता ने भी इस योजना को लेकर विरोध और समर्थन दोनों व्यक्त किया। सोशल मीडिया पर विरोध बढ़ता देख, मनीष सिसोदिया सहित आप की पूरी मशीनरी इस योजना के समर्थन में उतर गई। इसी कड़ी में 14 जून को मनीष सिसोदिया ने एक सार्वजनिक पत्र के माध्यम से विशेषज्ञों और खासतौर से डॉ. ई श्रीधरन के विरोध का जवाब सोशल मीडिया पर जारी एक पत्र के माध्यम से दिया था।

अपनी चिट्ठी में सिसोदिया ने यह तर्क दिया कि मेट्रो की कुल क्षमता प्रतिदिन 40 लाख यात्रियों की है, लेकिन DMRC के अनुसार, फ़िलहाल औसतन राइडरशिप 25 लाख है। सिसोदिया ने इस बात पर भी ज़ोर दिया था कि दिल्ली मेट्रो अपनी कुल क्षमता का 65% पर ही काम कर रही है, जो कि एक कंपनी की गुणवत्ता और परफॉर्मेंस के लिए बहुत ख़राब है।

खैर, महिलाओं को मुफ्त मेट्रो सुविधा देने पर लगातार बहस जारी है। जहाँ एक तरफ आप और केजरीवाल इस चुनावी स्टंट को सही ठहराने में जुटे हैं तो वहीं विशेषज्ञों द्वारा इसे एक अधोगामी कदम मानते हुए, इसे पूरे मेट्रो तंत्र को बर्बाद करने के रूप में देखा जा रहा है।

चलते-चलते सिर्फ इतना ही कहना है कि केजरीवाल इससे पहले भी कई हवाई योजनाओं की चर्चा कर चुके हैं। जिन पर अभी तक ग्राउंड वर्क की प्रोग्रेस शून्य है। बाद में किसी न किसी वजह से वह योजना फाइलों में फँस जाती है। ऐसे समय में कई विशेषज्ञों का कहना है कि केजरीवाल सरकार जानबूझकर ऐसे काम करती है कि फाइल नियम विरुद्ध हो या इसके लिए आवश्यक तैयारी के अभाव के कारण फाइल उप राज्यपाल के यहाँ फँस जाए, जिससे AAP की पूरी मशीनरी को एक बार फिर से ‘कि हम तो दिल्ली की महिलाओं को मुफ्त योजना देना चाहते थे लेकिन मोदी फाइल ही आगे नहीं बढ़ने दे रहें‘ पर आकर रुक जाती है।

ऐसे में केजरीवाल सरकार दो-तरफा फायदे में होती है। खैर, यह योजना भी है तो चुनावी लॉलीपॉप ही, अब देखना यह है कि क्या इस बार कामयाब होती है या फाइल फिर से अटक जाती है और केजरीवाल अगली बार सरकार आने के बाद कानून में बड़ा बदलाव कर इसे पूरा करने का वादा करते हैं। अंजाम जो भी हो, खेल तो शुरू हो ही चुका है।

गौ तस्करों ने गौशाला पर किया हमला, महंत की पिटाई के बाद 3 गाय लेकर हुए फ़रार

राजस्थान के भरतपुर में मंगलवार (18 जून) को मवेशी तस्करों ने कथित रूप से एक गौशाला (गाय-आश्रय) पर हमला किया, महंत की पिटाई की और तीन गायों को लेकर भाग गए। पुलिस ने आरोपितों को पकड़ने के लिए प्रयास शुरू कर दिया है। हालाँकि, स्थानीय निवासियों को लगता है कि पुलिस की लापरवाही के कारण पशु तस्करों के हौसले दिन-प्रतिदिन बुलंद होते जा रहे हैं।

एसएचओ विनोद सावरिया के अनुसार, “गौशाला के कार्यवाहक कन्हैया लाल, जिन्हें बाबाजी के नाम से भी जाना जाता है, उन्होंने शिक़ायत दर्ज की थी कि कुछ पशु तस्करों ने उन पर हमला किया और गायों को लेकर भाग गए।”

एसपी (एएसपी) देग महेश मीणा ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया से कहा, “संदिग्धों की पहचान नहीं हो पाई है। कार्यवाहक ने कहा कि आरोपित एक वाहन में आया था, लेकिन वह उस वाहन का नंबर नहीं याद रख सके। कार्यवाहक ने आरोप लगाया कि जब वो उनसे भिड़ गया तो अभियुक्तों ने उनकी पिटाई कर दी। हमारी टीमें इस मामले को देख रही हैं और हमने राजस्थान गोजातीय पशु अधिनियम के तहत FIR दर्ज कर ली है।”

मेवात क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले क्षेत्र में कैटल स्मगलिंग हमेशा से ही एक बड़ी समस्या रही है। यह संगठित अपराध, मवेशी तस्करी, अवैध रोहिंग्या बस्ती और हिंसात्मक गतिविधियों का अड्डा है।

पिछले साल भी यूपी के औरैया में कुछ घटनाएँ हुई थीं, जहाँ साधुओं ने इलाक़े में गोहत्या को रोकने के लिए काम किया था, उनके आवासों में घुसकर क्रूरतापूर्वक उनकी हत्या कर दी गई थी।

इससे पहले की एक घटना में, अलवर ज़िले के तिजारा क्षेत्र में, जो मेवात के अंतर्गत आता है, पुलिस ने अरंडका गाँव में निषाद नाम के एक व्यक्ति के घर पर छापा मारा था और गायों का माँस और खाल बरामद की थी। पुलिस ने पास के खेत में 4-5 संदिग्धों को हिरासत में लिया था। जब पुलिस वहाँ गई तो उन्हें पास के खेत में मौजूद कुएँ से लगभग 20-22 किलोग्राम गोमाँस पड़ा मिला था और 5-6 गायों की खाल मिली। गुरुवार (20 जून) को भी, पुलिस ने 18 भैंसों को बचाने में क़ामयाबी हासिल की थी और दो दोषियों को गिरफ़्तार भी किया था।

बिहार: BJP सांसद अपने संसदीय क्षेत्र में बच्चों के बेहतर इलाज के लिए देंगे ₹25-25 लाख की मदद

बिहार में चमकी बुखार का कहर लगातार बढ़ता जा रहा है और मौत का आँकड़ा भी थमने का नाम नहीं ले रहा। शुक्रवार (जून 21, 2019) सुबह तक पूरे राज्य में इस बीमारी की वजह से मरने वालों की संख्या 142 हो गई है, जबकि सिर्फ मुजफ्फरपुर में मरने वालों का आँकड़ा 122 है। चमकी बुखार के कारण बिहार में हाहाकार मचा हुआ है और अस्पतालों में बच्चों के भर्ती होने की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है जिसके कारण राज्य की नीतीश सरकार हर किसी के निशाने पर है।

इस बीच बिहार बीजेपी के 17 सांसदों ने राज्य के बच्चों के बेहतर इलाज के लिए ₹25-25 लाख रुपए देने का ऐलान किया है। इसकी घोषणा केंद्रीय गृह राज्य मंत्री और बिहार भाजपा प्रदेश अध्यक्ष नित्यानंद राय ने शुक्रवार को की। इन पैसों से बच्चों के बेहतर स्वास्थ्य सुविधा के लिए बिहार के प्रत्येक सांसद के लोकसभा क्षेत्र में पीडियाट्रिक इंटेंसिव केयर यूनिट (पीआईसीयू) बनाए जाने की योजना है। जानकारी के मुताबिक, उत्तर बिहार के सभी सांसद इस पहल के लिए पूरी तरह से तैयार हैं। केंद्रीय गृहराज्य मंत्री और बिहार बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष नित्यानन्द राय ने इसकी शुरुआत भी कर दी है।

खबर के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से सभी सांसदों को दिए गए रात्रिभोज के दौरान इस मुद्दे पर चर्चा की गई और सभी सांसदों ने बच्चों के बेहतर इलाज के लिए ₹25-25 लाख रुपए देने का फैसला किया। एक तरफ जहाँ पर ये बुखार मासूम बच्चों पर कहर बरपा रहा है, तो वहीं इस पर राजनीति भी तेज हो गई है।

नेहरूघाटी सभ्यता में पला BBC मोदी विरोध में बीमा और इलाज का अंतर भूला

बिहार में पिछले 20 दिनों में दिमागी बुखार के कारण 350 से अधिक मामले सामने आ चुके हैं, जिसमें अब तक करीब 120 बच्चों की मौत हो चुकी है। मेडिकल की शब्दावली में इसी दिमागी बुखार का नाम है- एक्यूट इंसेफलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) जिसे सामान्य भाषा में ‘चमकी बुखार‘ कहा जा रहा है।

यह इंसेफलाइटिस एक भीषण महामारी बनाकर सामने आया है और यह एकदम वाजिब बात है कि देशभर में शायद हर व्यक्ति इस महामारी के आतंक से भयातीत है। लेकिन, हर किसी का भय मानवीय संवेदना से उपजा हो यह आवश्यक नहीं है। कम से कम नेहरुघाटी सभ्यता के मीडिया गिरोह तो इस बुखार से बिलकुल भी चिंतित नजर नहीं आते हैं।

इसका उदाहरण हम BBC जैसे मीडिया गिरोहों की आजकल की गतिविधियों से देख सकते हैं। एक ओर जब सभी लोग इंसेफलाइटिस सिंड्रोम, यानी चमकी बुखार से प्रभावित बच्चों के लिए प्रार्थना कर रहे हैं, ऐसे समय में BBC अपने अन्नदाताओं की स्वामिभक्ति में मशगूल है और उनके दिशानिर्देशों पर ही आगे बढ़ रहा है।

यह कोई हवा में कही गई बात नहीं बल्कि BBC की ही पत्रकारिता का एक नमूना खुद इस तथ्य को साबित कर रहा है। ब्रिटिश उपनिवेशवाद द्वारा त्यागी गई विष्ठा BBC को अब नेहरूवियन उपनिवेशवाद का कर्ज चुकाना है इसलिए राष्ट्रवादी सरकार के समय में वह पीड़ित, उपेक्षित और शोषित महसूस करने लगा है।

BBC की आज की सनसनाती हुई हेडलाइन का कहना है – “मुज़फ्फ़रपुर बुखार: मोदी के आयुष्मान भारत से क्यों नहीं बच रही बच्चों की जान”

इस पूरे लेख में BBC ने यह साबित करने का प्रयास किया है कि किस प्रकार से मुज़फ्फरपुर में बुखार से हो रही बच्चों की मृत्यु लिए मोदी सरकार द्वारा शुरू की गई आयुष्मान भारत योजना है। देश के वंचित वर्ग के लोगों को लाभ पहुँचाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘प्रधानमंत्री जन आरोग्य’ योजना (आयुष्मान भारत योजना यानी ABY) की घोषणा की थी, जिसे गत वर्ष पंडित दीन दयाल उपाध्याय की जयंती पर 25 सितंबर से देशभर में लागू कर दिया गया था।

यह एक प्रकार की बीमा योजना है जो खासतौर से गरीब और वंचित वर्ग के लोगों को ध्यान में रखकर जारी की गई थी। सरकार का मकसद ABY के माध्यम से गरीब, उपेक्षित परिवार और शहरी गरीब लोगों के परिवारों को स्वास्थ्य बीमा उपलब्ध कराना है। और यह बड़े स्तर पर लोगों को लाभ देने में सक्षम रही है।

ध्यान देने वाली बात यह है कि यही बात BBC के लेख के आखिरी के पैराग्राफ में भी कही गई है। लेकिन जब BBC नामक संस्थान का पहला मकसद प्रोपगैंडा से लेकर झूठी ख़बरों द्वारा जनता के दिमाग को ब्रेनवॉश करना हो तब किसी भी प्रकार के तथ्य को बेहद सुविधाजनक तरीके से पेश करने में BBC जैसे मीडिया गिरोहों को महारत हासिल है। अपने झूठे नैरेटिव को जमीन देने के लिए BBC जैसे सूचना के स्थापित स्तम्भों के पास ऐसे मक्कार और धूर्त लोगों की भी कोई कमी नहीं है जो महज देश विरोधी और सरकार विरोधी प्रपंच स्थापित करने के लिए हर वक्त तैयार रहते हैं।

यदि देश में किसी भी प्रकार का कोई षड्यंत्र, प्रपंच, अराजकता और उन्माद फैलाना हो तो इस काम के लिए BBC जैसे मीडिया गिरोह किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार रहते हैं। हालाँकि यह कहना निंदनीय है, लेकिन इसी देश का अन्न खाकर यहीं के खिलाफ प्रपंच रचने के लिए अगर बाहरी लोग किसी गन्दी चीज में भी रुपए फेंक दें, तो यही षड्यंत्रकारी, दुराग्रही, कपटी और लगभग प्रगतिशील लोग उसे मुँह से उठाने के लिए तैयार बैठे रहते हैं।

BBC को इस तथ्य के साथ बेहद सावधानी से खिलवाड़ करते हुए देखा गया है कि आयुष्मान भारत योजना का लक्ष्य वही लोग हैं, जो कि मुज़फ्फरपुर में दिमागी बुखार के लिए इलाज पा रहे हैं। चमकी बुखार जैसी किसी महामारी को कोई सरकार खुद बुलावा नहीं देती है और ना ही ऐसे हादसों से खुश होती है। लेकिन जो भी प्रयास ऐसे समय में किए जा सकते हैं, राज्य और केंद्र सरकारें कर रही हैं।

लेकिन इस सबसे हटकर, BBC को पहले यह तथ्य समझ लेना आवश्यक है कि बीमा योजना का उद्देश्य डॉक्टरों की भर्ती या फिर समाज में स्वच्छता कार्यक्रम चलना नहीं होता है। ना ही लोगों के घर घर जाकर किसी बीमा योजना के अंतर्गत आप सफाई और संक्रमण से बचने वाले रसायन छिड़क सकते हैं। यह संभव भी नहीं हैं, ना PM मोदी के लिए यह संभव है और ना ही नेहरू के लिए यह सम्भव हो पाता कि स्वच्छता मिशन चलाने के बाद हर आदमी के घर में सुबह शौचालयों की निगरानी करें और वहाँ पानी डालें। सफाई और स्वच्छता के प्रति जागरूकता के लिए अलग से कई कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।

हम इस सच्चाई को भी नहीं नकार सकते हैं कि भारत एक सीमित संसाधनों वाला देश है और इसे अपनी सीमाओं के भीतर ही हर प्रकार की त्रासदी से निपटना होता है। हम स्वीडन जैसे आर्थिक रूप से सशक्त देश नहीं हैं जहाँ पर नागरिकों को स्वास्थ्य सुरक्षा और रेगुलर हेल्थ चेकअप के मौलिक अधिकार प्राप्त हैं। हमारे संसाधन इतने सीमित हैं कि कुल बजट का 2.5% हिस्सा स्वास्थ्य के लिए झोंकना अभी हमारा लक्ष्य ही है और वर्तमान सरकार इस लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ रही है। लेकिन हमारा देश का अभी भी एक बड़ा वर्ग कुपोषित है और यही कुपोषण चमकी बुखार जैसी बिमारियों का पहला कारण है, ना की आयुष्मान भारत योजना।

सरकार जो कर सकती है वो कर रही है। पीड़ितों को स्वास्थ्य से लेकर आर्थिक मदद दे रही है। आज ही बिहार बीजेपी ने घोषणा की है कि उनका हर सांसद चमकी पीड़ितों को 25 लाख रुपए की मदद देगा। हम देख चुके हैं कि इस बीच BBC ही नहीं बल्कि अजीत अंजुम से लेकर अंजना ओम कश्यप जैसे पत्रकारों ने इस बाजी मारने के खेल में एक-दूसरे को कड़ी टक्कर दी है। इन सभी मीडिया गिरोहों ने सिर्फ हल्ला करने और छपास के उद्देश्य से अपनी मौजूदगी दर्ज करने का पूरा प्रयास किया है। जाहिर सी बात है, हल्ला करने से भी दिमागी बुखार द्वारा गई जानें वापस नहीं आ सकती हैं। यह भी जरूरी है कि जनता प्रश्न करे। प्रश्न करने और सुरक्षा के लिए ही शासन और प्रशासन होते हैं। लेकिन कम से कम BBC जैसे मीडिया का लक्ष्य तो इस सबके बीच न्याय माँगना नहीं लगता है।

100 से ज्यादा बच्चों की जान चली जाना हर किसी के लिए एक भयावह घटना है, लेकिन ऐसे समय में तमाम घटनाक्रम को नजरअंदाज कर के एक ऐसी योजना पर जिम्मेदारी थोपना, जो कि उस सरकार द्वारा जारी की गई हो जिससे आप निरंतर दुखी रहने का प्रयत्न करते हैं, BBC की पत्रकारिता नहीं बल्कि पत्थरकारिता का ही सबूत है।

मूल विषय से भटककर आयुष्मान भारत योजना, जो कि मूल रूप से एक बीमा योजना है का पीछा करना तो यही सन्देश देता है कि BBC इस योजना में जवाहरलाल नेहरू या फिर राजीव गाँधी का नाम तलाशना चाहती है, शायद तभी वो अपने लेख में कोई तार्किक चर्चा चमकी बुखार को लेकर कर पाते, या फिर इस बारे में सोचते। लेकिन BBC का मर्म यही है कि यह जवाहरलाल नेहरू नहीं बल्कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर शुरू की गई एक बीमा योजना है। अगर यह ‘जवाहर आयुष्मान भारत’ योजना होती तो या फिर ‘राजीव गाँधी आयुष्मान योजना’ होती तो BBC अपने लेख और हेडलाइन में सम्बन्ध बैठा पाने में सक्षम होता।

अफवाह फ़ैलाने से ज्यादा हमें इस बुखार पर प्रकाशित शोध पढ़ने की आवश्यकता है

यह जानना आवश्यक है कि अभी तक अधिकतर बच्चों की मौतें हाइपोग्लाइसीमिया या लो ब्लड शुगर के कारण हुई हैं। डॉक्टर मौतों का कारण बताते हुए कहते हैं कि बिहार में दिमागी बुखार के 98% मरीज हाइपोग्लाइसीमिया से पीड़ित हैं। वर्ष 2014 में एक रिसर्च पेपर ‘एपिडेमियोलॉजी ऑफ एक्यूट इंसेफलाइटिस सिंड्रोम इन इंडिया: चेंजिंग पैराडाइम एंड इम्प्लिकेशन फॉर कंट्रोल’ में बिहार के मुजफ्फरपुर और वियतनाम के बाक गियाँग प्रांत के मामलों में समानता पाई गई थी।

दोनों ही जगहों पर पड़ोस में ही लीची के बाग थे। हमें TRP की रेस में भागते एंकर्स से प्रभावित होना छोड़कर इन शोध को पढ़ना चाहिए। यह शोध हमें विज्ञान से परिचित करवाकर जागरूक बनाते हैं और बीमारी का कारण जानने में मदद करते हैं ताकि हम किसी बीमा योजना को बीमारी का कारण न समझ बैठें।

इस अध्ययन में कहा गया था कि इस बीमारी का लीची या पर्यावरण में मौजूद किसी जहर के साथ संभावित संबंध को दर्ज किया जाना चाहिए। पशुओं पर किए गए परीक्षण में हाइपोग्लाइसीमिया होने का कारण लीची में मौजूद मेथिलीन साइक्लोप्रोपिल ग्लिसिन को पाया गया था। इस रिसर्च के अनुसार – “यह बहुत ही सामान्य है कि बच्चे जमीन पर गिरी हुई लीचियों को खाते होंगे और फिर बिना खाना खाए सो जाते होंगे। इसके बाद रात के समय लीची में मौजूद विषाक्त पदार्थ उनका ब्लड शुगर लेवल कम कर देता है और ये बच्चे सुबह के समय बेहोश हो जाते हैं।“

इसमें बताया गया है कि जहाँ दिमागी बुखार के कारण पर अभी भी शोध किया जा रहा है तो वहीं हाइपोग्लाइसीमिक दिमागी बुखार कारण कुपोषण, गर्मी, बारिश की कमी और अंतड़ियों से संबंधित संक्रमण हो सकते हैं।

मुजफ्फरपुर में दिमागी बुखार का पहला मामला 1995 में सामने आया था। वहीं, पूर्वी यूपी में भी ऐसे मामले अक्सर सामने आते रहते हैं। इस बीमारी के फैलने का कोई खास पैमाना तो नहीं है लेकिन अत्यधिक गर्मी और बारिश की कमी के कारण अक्सर ऐसे मामले में बढ़ोतरी देखी गई है।

प्रभावित एरिया में कुपोषण बहुत ही अधिक है और कुपोषित बच्चे जल्दी संक्रमित होते हैं। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, देश भर में होने वाली बच्चों की कुल मौतों में से 35% उत्तर प्रदेश और बिहार में होती हैं। ये सभी आँकड़े हैं। आँकड़े मृतकों के साथ न्याय नहीं करते हैं लेकिन हमें भविष्य के लिए सावधान होने की राय जरूर देते हैं।

संयम और जागरूकता समाज के हर तबके के लिए आवश्यक है। खासतौर से तब, जब हम सूचना का एक साधन हों। संवाद की गुंजाईश के बीच BBC जैसे झूठे नैरेटिव और प्रोपेगैंडा विकसित करने वाले लोग तर्क को खोखला करते आए हैं और अब बेनकाब होने पर बौखला भी रहे हैं। फिलहाल पीड़ितों के प्रति सहानुभूति रखिए और उम्मीद करिए कि जल्दी ही समाज इस दुःस्वप्न से उबरने में कामयाब होगा। BBC से यदि ना हो पाए तो कम से कम दिखावा तो करे कि उसकी मुख्य चिंता बीमा योजना नहीं बल्कि नीतियों का ठीक से अनुसरण ना किया जाना है वरना मौन भी तो अभिव्यक्ति है।

भाटपारा में 2 लोगों की मौत के बाद उत्तर 24 परगना ज़िले में इंटरनेट सेवाएँ बंद

पश्चिम बंगाल सरकार ने भाटपारा में दो समूहों के बीच झड़प के बाद उत्तर 24 परगना ज़िले में एहतियात के तौर पर इंटरनेट सेवाओं को शुक्रवार (21 जून) मध्यरात्रि तक बंद कर दिया है।

गुरुवार (20 जून) को तृणमूल और भाजपा समर्थकों के बीच हुई झड़प में दो लोगों की मौत और तीन के घायल होने की ख़बर सामने आई थी। पुलिस अधिकारियों ने कहा, “मृतक की पहचान रामबाबू शॉ और धर्मेंद्र शॉ के रूप में की गई, जबकि घटना में घायल लोगों का विवरण अभी तक पता नहीं चल सका है।”

पश्चिम बंगाल में आए दिन होने वाली इन हिंसक झड़पों से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की जिस कार्यशैली का प्रदर्शन होता है उसमें राज्य की बिगड़ती क़ानून-व्यवस्था की तस्वीर साफ़ दिखाई पड़ती है। 10 जनवरी को, मोहम्मद सईद की मौत के बाद कोलकाता के NRS मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में डॉक्टर्स और इन्टर्नस पर हमला करने के लिए ट्रकों में 200 लोगों की भीड़ पहुँची थी। इसके बाद पूरे राज्य में चिकित्सा संस्थानों पर व्यापक विरोध प्रदर्शन और हमलों का दौर शुरू हो गया था।

अभी हाल ही में, एक पूर्व मिस इंडिया यूनिवर्स पर उनके घर पर एक इस्लामी भीड़ ने हमला किया था। इन सभी मामलों में, पुलिस मूकदर्शक बनी रही। इस मामले में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से अपराधियों के ख़िलाफ़ कठोर कार्रवाई करने की माँग की गई थी, क्योंकि यह एक आम धारणा है कि यदि अपराध करने वाले समुदाय विशेष से होते हैं तो उन्हें बच निकलने का मौक़ा दिया जाता है।

इस सब के बीच, राज्य में राजनीतिक हिंसा बेरोकटोक जारी है और भाजपा कार्यकर्ताओं और समर्थकों की हत्याएँ लगातार चिंता का विषय बनी हुई हैं। यहाँ तक ​​कि महिलाओं को भी नहीं बख़्शा जा रहा है। हर दिन हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं।

मासूमों की मौत के बीच गायब हैं तेजस्वी, ढूँढकर लाने वाले को ₹5100 का ईनाम

बिहार की प्रमुख राजनीतिक पार्टी राष्ट्रीय जनता दल के नेता और पूर्व डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव लोकसभा चुनाव के परिणाम के बाद अचानक से गायब हो गए हैं। इस बारे में सबसे आश्चर्य की बात ये सामने आ रही है कि राजद नेताओं को भी पता नहीं है कि वो कहाँ हैं? राजद के वरिष्ठ नेता रघुवंश प्रसाद सिंह ने बुधवार (जून 19, 2019) को मीडिया से बात करते हुए कहा, “मुझे स्पष्ट रूप से नहीं पता कि तेजस्वी यादव कहाँ हैं। शायद वह वर्ल्ड कप देखने के लिए गए हैं, लेकिन मुझे इसकी स्पष्ट जानकारी नहीं है।” तो वहीं राजद के राज्यसभा सांसद मनोज झा का कहना है कि तेजस्वी दिल्ली में ही हैं।

अब बिहार में तेजस्वी यादव को ढूँढ़ने की मुहिम शुरू की गई है। इसके लिए बिहार के मुजफ्फरपुर में तेजस्वी यादव का एक पोस्टर लगाया गया है जिस पर तेजस्‍वी यादव को ढूंढकर लाने वाले को ₹5100 का इनाम दिए जाने की घोषणा की गई है। ये पोस्टर तमन्ना हाशमी नाम के सामाजिक कार्यकर्ता की तरफ से लगाए गए हैं।

दरअसल, मुजफ्फरपुर में चमकी बुखार से लगातार बच्चों की मौत हो रही है और ऐसे में नेता प्रतिपक्ष का मृतक बच्चों के परिजनों से मिलकर सांत्वना देने और पीड़ितों का हाल ना पूछना और इस तरह से गायब हो जाना उनकी राजनीतिक अपरिपक्वता को दर्शाता है। तेजस्वी ने पीड़ितों को सांत्वना देने के लिए एक ट्वीट तक नहीं किया है। ऐसे में विपक्ष को आम जनता की आवाज़ बनने की ज़रूरत थी, मगर उनकी आवाज़ को बुलंद कर सरकार तक पहुँचाने की बजाए ऐसे संवेदनशील मामले पर चुप्पी साध लेना, नेता प्रतिपक्ष का इस तरह अज्ञातवास पर चले जाना, विपक्ष की संवेदनहीनता को दर्शाता है।

बिहार में चमकी बुखार से मरने वाले बच्चों का आँकड़ा बढ़ने के बीच तेजस्वी की गैर-मौजूदगी से कई राजनीतिक चर्चाओं की शुरुआत हो गई है। एक ओर जहाँ प्रदेश में जदयू-भाजपा की सरकार लगातार आलोचना का शिकार हो रही है, वहीं तेजस्वी की गैर-मौजूदगी को भी आरजेडी के इस मामले के उदासीन होने के रूप में देखा जा रहा है।

सावरकर पर ‘नायक या खलनायक’ कार्यक्रम चलाना ABP माझा के लिए पड़ा महँगा

एबीपी समूह के स्वामित्व और नियंत्रण वाले मराठी क्षेत्रीय चैनल एबीपी माझा द्वारा वीर सावरकर की जयंती पर एक विवादस्पद शीर्षक, ‘सावरकर-एक नायक एक खलनायक?’ से एक विशेष कार्यक्रम (बहस) किया गया था। इस कार्यक्रम के शीर्षक पर वहाँ मौजूद पैनलिस्ट ने कड़ी आपत्ति दर्ज की थी। ख़बर है कि एबीपी चैनल ने कार्यक्रम के विवादास्पद शीर्षक के लिए सार्वजनिक भावनाओं को आहत करने के लिए माफ़ी माँगी है।

एबीपी माझा ने एक स्पष्टीकरण जारी करते हुए कहा, “स्वातंत्र्यवीर वीर सावरकर की जयंती पर, ‘सावरकर-एक नायक या एक खलनायक’ शीर्षक से एक बहस का कार्यक्रम- एबीपी माझा पर प्रसारित किया गया था। इस शीर्षक से लोगों की भावनाओं को आहत करने या वीर सावरकर का अनादर करने का माझा (चैनल) का कोई इरादा नहीं था। वास्तव में, माझा ने 2 शो टेलीकास्ट किए थे कि वीर सावरकर का जीवन कितना प्रेरणादायक था। यदि बहस और शीर्षक ने दर्शकों की भावनाओं को आहत किया है, तो हमें इसके लिए खेद है और हम इसके लिए माफ़ी माँगते हैं।”

ख़बर के अनुसार, 28 मई 2019 को वीर सावरकर की जयंती के मौके पर कुछ हफ़्ते पहले, एबीपी माझा ने ‘सावरकर-एक नायक या एक खलनायक?’ शीर्षक से एक बहस शुरू की थी- जिसे लोगों ने वीर सावरकर के अपमान के रूप में लिया और अपनी कड़ी प्रतिक्रिया दर्ज की क्योंकि भारत के स्वतंत्रता संग्राम में उनका बहुत बड़ा योगदान था।

ABP के एक ग्राहक, कॉटन किंग, जो लंबे समय से एबीपी माझा पर विज्ञापन देते रहे हैं, उन्होंने चैनल से अपने सभी विज्ञापन वापस ले लिए और चैनल के विवादित कार्यक्रम के कारण चैनल का आर्थिक बहिष्कार शुरू कर दिया।

ब्रिटिश उत्पीड़न के ख़िलाफ़ लड़ने व अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह में सेलुलर जेल में क़ैद की सजा भुगतने वाले वीर सावरकर को अक्सर अपमानित किया जाता रहा है। जबकि सच्चाई यह है कि वो भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रबल सेनानी एवं प्रखर राष्ट्रवादी नेता थे। वीर सावरकर विश्वभर के क्रांतिकारियों में अद्वितीय थे। उनका नाम ही भारतीयों के लिए उनका संदेश था। वे एक ऐसे महान क्रांतिकारी, इतिहासकार, समाज सुधारक, विचारक, चिंतक और साहित्यकार थे। उनकी पुस्तकें क्रांतिकारियों के लिए गीता के समान थीं। उनका जीवन बहुआयामी था।