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BBC की Fake News: संजीव भट्ट ‘whistle blower’ और कारसेवकों की मौत एक हादसा

गुजरात की घटना के बाद से ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लिबरल गिरोह और मीडिया गिरोह के गले की फाँस बने हुए हैं, और खासकर बीबीसी जैसे विदेशी मीडिया ने पूरे देश में न केवल प्रधानमंत्री बल्कि हिंदू समुदाय की छवि को धूमिल करने की पुरजोर कोशिश की। अपनी इन्हीं कोशिशों के मद्देनजर बीबीसी ने पूर्व आईपीएस संजीव भट्ट को मिले आजीवन कारावास के बचाव में तमाम झूठी और ऐसी खबरें पेश की, जो अपने आप में ही बेहद उलझीं हुई थीं। साथ ही संजीव भट्ट पर रिपोर्टिंग करते हुए बीबीसी ने कारसेवकों को जिंदा जला देने की बात पर भी लगातार झूठ बोला।

बीबीसी ने अपने लेख की शुरूआत में ही पाठकों को बरगलाना शुरू कर दिया। क्योंकि जिस मामले में संजीव भट्ट को दोषी करार दिया गया है उसका प्रधानमंत्री मोदी से कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन फिर आर्टिकल में उनका नाम जबरदस्ती लिखा गया। 30 अक्टूबर 1990 में लाल कृष्ण आडवाणी की गिरफ्तारी के बाद बुलाए बंद के बाद संजीव भट्ट ने जमजोधपुर शहर में करीब 150 लोगों को सांप्रदायिक दंगों के इल्जाम में गिरफ्तार किया था। इनमें एक प्रभुदास वैष्णवी नाम का भी व्यक्ति था, जिसकी हिरासत से छूटने के बाद मौत हो गई थी। प्रभु के भाई ने पुलिस में संजीव भट्ट समेत 6 पुलिस ऑफिसरों पर एक एफआईआर दर्ज करवाई थी। इस एफआईआर में शिकायत की गई थी कि संजीव भट्ट समेत 6 पुलिस कर्मियों ने शिकायतकर्ता के भाई को हिरासत में लेकर इतना मारा कि उसकी मौत हो गई।

बीबीसी के लेख का स्क्रीनशॉट

उल्लेखनीय है 1990 में नरेंद्र मोदी पार्टी को आगे लाने में प्रयासरत थे और 2001 में वो गुजरात के मुख्यमंत्री बने थे। अब ऐसे में बीबीसी या कोई अन्य मीडिया संस्थान बिना किसी सबूत के संजीव भट्ट के मामले में प्रधानमंत्री का नाम कैसे जोड़ रहे हैं ये अपने आप में एक रहस्य है।

बीबीसी ने अपने लेख में संजीव भट्ट को मामले को उजागर करने वाला यानी ‘whistle blower’ बताया जो कि बिलुकल गलत है। शायद बीबीसी को याद नहीं है या जानबूझकर अनजान बन रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संजीव भट्ट ने अपने ड्राइवर पर अपने ऐसा हलफनामा दायर करने के लिए दबाव बनाया था ताकि वो यह गवाही दे कि 27 फरवरी 2002 को भट्ट मोदी की एक मीटिंग में उपस्थित थे जहाँ मोदी ने (भट्ट के अनुसार) कहा था कि हिंदुओं को मुस्लिमों के प्रति अपना गुस्सा निकालने देना चाहिए। जबकि रिकॉर्ड्स के मुताबिक कांस्टेबल के डी पंथ (भट्ट के ड्राइवर) 25 फरवरी 2002 से लेकर 28 फरवरी 2002 गुजरात में ही नहीं थे।

भट्ट के कहने पर ड्राइवर ने पहले इस बारे में बयान दिया था लेकिन बाद में इससे इंकार कर दिया। इतना ही नहीं भट्ट ने इस बात पर भी दबाव बनाया था कि उसके ड्राइवर से SIT जाँच में पूछताछ उसकी देखरेख में हो। साथ ही भट्ट चाहता था कि पंथ ऐसी गवाही दे कि वो खुद भट्ट को मुख्यमंत्री मोदी के घर तक लेकर गया, जिसके लिए वो उसे गुजरात कॉन्ग्रेस अध्यक्ष और लीगल सेल के अध्यक्ष के घर भी लेकर गया।

इसके बाद भट्ट और एक पत्रकार के बीच में ईमेल के जरिए कुछ बातचीत हुई, जिसमें भट्ट ने यह दर्शाने की कोशिश की कि वह पत्रकार 27 फरवरी को हुई मीटिंग के दौरान भट्ट से मिला। इसके बाद भट्ट ने यह ईमेल टीवी चैनल के एक सदस्य को भेज दिया, ताकि वो हलफनामा दायर कर पाए कि वो उस दिन पत्रकार के साथ था। भट्ट की इन कोशिशों पर सुप्रीम कोर्ट ने संजीव भट्ट को कहा था कि उस रात हुए ईवेंट्स को दोबारा रिक्रिएट करने की कोशिश कर रहे हैं।

जबकि सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि संजीव भट्ट और हरेन पांड्या उस मीटिंग में मौजूद ही नहीं थे। उनकी सेल फोन लोकेशन ने इस बात को साबित किया कि वो भट्ट के सभी बयान झूठे हैं। खासकर ये कि वो प्रधानमंत्री मोदी के घर मीटिंग में गया था और प्रधानमंत्री ने हिंदुओं और मुस्लिमों को लेकर ऐसी टिप्पणी की है जिसका उपर उल्लेख है।

इन सभी आधारों पर किसी को भी हैरानी होगी कि बिना तथ्यों को जाने परखे, बीबीसी संजीव भट्ट के लिए ‘WHISTLEBLOWER’ शब्द का प्रयोग कैसे कर सकता है। बीबीसी का झूठ यही पर नहीं रुका।

बीबीसी की रिपोर्ट में कहा गया कि ट्रेन में लगी आग का कारण अभी स्पष्ट नहीं हो पाया है, हिंदू समुदाय का कहना है कि ट्रेन में आग इस्लामी भीड़ ने लगाई है जबकि हाल ही में आई जाँच में खुलासा हुआ कि ये एक एक्सीडेंट था।

गोधरा कांड मामले पर बीबीसी ने अपने अनेक झूठ को दो छोटे वाक्यों में समेट दिया। 2011 में बीबीसी ने खुद रिपोर्ट की थी कि इस्लामी भीड़ ने साबरमती एक्सप्रेस पर हमला किया था, जिसमें 31 लोग दोषी पाए गए थे। इन सभी 31 लोगों को कारसेवकों को जिंदा जलाने के आरोप में अपराधी पाया गया था। खास बात ये थी कि ये सभी समुदाय विशेष से थे।

कोर्ट ने सुनवाई के दौरान इनमें से कुछ को आजीवन कारावास की सजा सुनाई तो कुछ को सजा-ए-मौत मिली। इस दौरान कोर्ट ने माना था कि ये एक पूर्व तैयारी के साथ अंजाम दी गई घटना है क्योंकि इसमें पेट्रोल भी एक दिन पहले ही खरीदा गया था।

न्यायाधीश जी टी नानावटी और न्यायाधीस अक्षय एच मेहता के नानावटी आयोग ने भी अपनी रिपोर्ट में यही कहा कि कारसेवकों को जिंदा जलाना कोई दुर्घटना नहीं थी बल्कि इस्लामी भीड़ का किया काम है।

यह लेख www.opindia.com पर प्रकाशित नूपुर शर्मा के लेख पर आधारित है। पूरी रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

संसद में कुछ बच्चे मोबाइल पर गेम खेलते हैं, योग उनका बचपना दूर करेगा: राम माधव

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी गुरुवार (जून 20, 2019) को संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण के दौरान मोबाइल फोन पर बिजी नज़र आए। जिसको लेकर राहुल गाँधी से सोशल मीडिया पर भी सवाल किया गया कि वह अपना दायित्व भूलकर फोन में क्यों लगे हुए हैं? अब इस मामले में भाजपा महासचिव राम माधव ने राहुल गाँधी पर तंज कसा है। उन्होंने शुक्रवार (जून 21, 2019) को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर केरल के तिरुवनंतपुरम में भाजपा की ओर से आयोजित किए गए कार्यक्रम को संबोधित करने के दौरान राहुल को निशाने पर लेते हुए कहा कि संसद में कुछ बच्चे मौजूद हैं, योग उनका बचपना दूर करने में उनकी मदद करेगा।

योग दिवस कार्यक्रम में स्कूली बच्चों के बीच राम माधव ने कहा, “कई बार कक्षा में शिक्षक जो पढ़ा रहे होते हैं, उस पर फोकस करना कठिन होता है। परीक्षा के दौरान किताबों पर फोकस करना भी कठिन होता है। हमें नींद आने लगती है और हम सो जाते हैं। पर चिंता करने की कोई बात नहीं! स्कूली बच्चों की तरह संसद में भी कुछ बच्चे हैं। वो हमारे राष्ट्रपति के भाषण पर भी ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते हैं। उन्हें अपना मोबाइल देखना होता है, मैसेज चेक करना होता है, या फिर वीडियो गेम खेलना होता है। अस्थिर दिमाग का यह अजीब स्वभाव है। ऐसे में इसे नियंत्रित करने की आवश्यकता है, जिसके लिए योग को अपनाना चाहिए। योग बचकानी हरकत दूर करने में योग उनकी मदद करेगा।”

इसके साथ ही भाजपा महासचिव ने सबरीमला मुद्दे पर भी बात की। उन्होंने कहा कि कुछ लोग सोचते हैं कि इस देश में हर परंपरा को या तो खत्म कर दिया जाना चाहिए या फिर उससे नफरत किया जाना चाहिए। चाहे वह सबरीमला वाला मामला हो या फिर योग का। वो लोग इससे नफरत करते हैं, क्योंकि ये भारतीय परंपरा है।

राम माधव ने कहा कि जो लोग इसे नष्ट करना चाहते हैं, उन्हें इस बात का एहसास नहीं है कि ये परंपरा, ये संस्कृति, ये वो मूल्य प्रणाली है जो अंततः दुनिया को बचाने और शांति, समृद्धि और विकास के रास्ते पर ले जाने वाली है। ऐसे लोगों को भी योग सिखाने की ज़रूरत है।

मौत तो केवल आँकड़ा है: क्या एक बुरी घटना के कारण सारे अच्छे कार्यों को रोक दिया जाए?

हाँ, मैं संवेदनहीन हो गया हूँ। मेरे देश में मौतें होती रहती हैं और जान महज एक संख्या बन कर रह गई है- चाहे वो किसी ग़रीब की हो, बच्चे की हो या फिर बलिदानी जवानों की हो। मैं संवेदनहीन हो गया हूँ क्योंकि हर दिन, हर पल, हर घण्टे और हर मिनट कोई न कोई मर रहा है। मेरे देश की बुनियाद ही मौत पर रखी गई थी। मेरा देश जब बँटा था, तभी 20 लाख लोग मारे गए थे। जब मेरे देश के राष्ट्रपिता की हत्या हुई थी, तब भी 10 हज़ार ब्राह्मणों को मार डाला गया था। मेरे देश में मौत महज एक आँकड़ा है, गणित है, अंक है।

मेरे देश में बच्चे जन्म लेते मारे जाते हैं। कई तो पैदा होने से पहले भी मार दिए जाते हैं। अरे, 10 लाख शिशु तो अकेले 2017 में मर गए थे। पानी, स्वच्छता, स्वास्थ्य सेवा और अच्छा पोषण नहीं मिला था। ख़ैर, मुझे इसका बहुत दुःख हुआ। लेकिन हाँ, मेरा दुःख तभी गायब हो गया जब मुझे पता चला कि 2 लाख लड़कियाँ हर साल तो पैदा होने से पहले पेट में ही मार दी जाती हैं। मेरे देश में माँ-बाप ही ऐसे हैं तो सरकार की क्या तारीफ़ करूँ। मेरा देश महान है।

अब आप बताइए, मेरे देश में ये सब नॉर्मल है या नहीं? संवेदनाएँ क्यों जताएँ? कहाँ से लाऊँ मैं इतनी संवेदनाएँ? नहीं हैं, आती ही नहीं हैं। जनसंख्या ज्यादा है न। इतनी ज्यादा है कि 50 हज़ार माँए तो प्रत्येक वर्ष अपने बच्चे को जन्म देकर ही मर जाती हैं। बच्चे रह जाते हैं, जिनमें से बहुतेरे अनेक कारणों से बाद में मर जाते होंगे। मैं चैंपियंस ट्रॉफी देखता हूँ, आईपीएल देखता हूँ, वर्ल्ड कप देखता हूँ और कभी-कभी तो हॉकी-फुटबॉल वगैरह में भी रुचि दिखाते हुए भारत को चीयर करता हूँ।

हमारे यहाँ तो एक आंदोलन भी पैदा होता है तो कुछेक हज़ार को यूँ ही निगल जाता है। 35 हज़ार तो इस्लामिक आतंकियों ने स्वर्ग भेज दिए। बाकी जो कुछेक थे, उनमें से 15,000 से अधिक नागरिकों को तो नक्सलियों ने ही निपटा दिया। मेरे देश में पेट भरने वाला भी मरता है। मरता नहीं है, ख़ुद को मारता है। पिछले 25 वर्षों में 3 लाख किसानों ने आत्महत्या की। मौसम की मार, कम पैदावार, पानी की कमी, सरकार की अनदेखी- तमाम कारण है, क्या-क्या गिनाएँ? हाँ, मौतें गिनी जाती हैं हमारे यहाँ, कारण नहीं।

जब सरकारी डेटा ही कहता है कि पिछले 12 वर्षों में 40 लाख मौतें ऐसी थी, जो टाली जा सकती थीं। लेकिन यमराज की ग़लती, ले गए। 40 लाख अप्राकृतिक मौतें। क्या किया जाए? बारिश आती है तो मर जाते हैं, गर्मी बढ़ती है तो मरते हैं, शीतलहर से भी मरते हैं। जिनके आँकड़े अब सौ में गिनाउँगा तो शायद आपको अच्छे न लगें, इसीलिए मैनें ज्यादा खँगाला ही नहीं। अरे हाँ, हमारे यहाँ तो राजनीतिक पार्टियाँ भी मारती हैं। ना ना, बंगाल और केरल के आँकड़े कम हैं, चुभेंगे। 1984 में 20 हज़ार सिखों को काट डाला गया था।

इस्लामिक आतंक की पैरवी करने वाले भी बैठे हैं, नक्सलियों के भी हित चाहने वाले बैठे हुए हैं, ऐसे में स्वास्थ्य और स्वच्छता सेवाओं की हालत जर्जर होने से मरने वालों का पूछना ही क्या? स्वच्छता अभियान के दुश्मन बैठे हैं, आयुष्मान भारत के दुश्मन बैठे हैं, उज्ज्वला योजना के दुश्मन बैठे हैं और योग दिवस के दुश्मन तो आपको अभी दिखेंगे। क्या किया जा सकता है? जहाँ इतने लोग सिर्फ़ एक कारण से मर जाते हों, जितनी यूरोप के कई देशों की जनसंख्या है, तो कैसे होगा विकास?

मैंने देखा है मातृत्व मृत्यु दर में अभूतपूर्व कमी होते, मैंने देखा है शिशु मृत्यु दर को लगातार घटते, मैंने देखा है नक्सलियों-आतंकियों के कारण होती मौतों को घटते, मैंने देखा है आतंकियों और नक्सलियों का सफ़ाया होते। जिसके कारण यह सब देखने को मिल रहा है, उसका मनोबल कैसे तोड़ दूँ? किसी के घर में भी मृत्यु होती है तो रिश्तेदार 3 दिन बाद हाहा-हीही करते मिलते हैं, मैं अप्राकृतिक मौत की बात कर रहा हूँ। वो तो प्रधानमंत्री है, वो नहीं रुक सकता, एक पल भी नहीं, सब कुछ सामान्य रहेगा पहले की ही तरह।

मैंने देखा है उज्ज्वला के आने के बाद से फेफड़े व श्वास रोगों में कमी आते, देखा है छोटे बच्चों (चूल्हे की वजह से जिनकी श्वास नाली काली पड़ जाती थी) को लाभ होते। प्रधानमंत्री सब जानता होगा। शायद उसे मुजफ्फरपुर वाली घटना भी पता होगी, अगर ग़लती हुई है तो उसे एहसास भी होगा, लेकिन हाँ, फिर भी जो सारी अन्य प्रक्रियाएँ हैं, क्रियाकलाप हैं- सब सामान्य तरीके से पूर्ववत चलते रहेंगे। संसद भी चलेगी। सब अच्छे नहीं हैं, एक पर सब टिका है, कब तक टिका रहेगा यह समय बताएगा।

जनता को क्या करना चाहिए? शायद हमें अब सिर्फ़ और सिर्फ़ समाधान की चर्चा करनी चाहिए, कहीं उसके कानों तक पहुँचे। चीजें अस्पताल और संसद भवन से नहीं, किसी गाँव के गंदे मुसहरटोली से शुरू होनी चाहिए यह सरकार को बताना पड़ेगा। गोरखपुर व आसपास के 14 ज़िलों में जो इसी पार्टी की सरकार ने सिर्फ़ 1 साल में कर दिखाया है, बिहार में भी उसे कर दिखाना होगा। मेरे देश को ऐसा बनना पड़ेगा, जहाँ एक भी मौत पर पूरा भारत उस दिन के लिए बन्द रहे। उसके लिए स्वच्छता और स्वास्थ्य पर नीचे, बहुत नीचे, काफ़ी नीचे से काम करना होगा।

सरकार को दिक्कतें आती हैं। जब तक राज्य, जिला या फिर स्थानीय जनप्रतिनिधि और प्रशासन कोई कार्ययोजना नहीं बनाएगा, तब तक केंद्र फंडिंग किस चीज के लिए करेगा? जहाँ तक मैंने देखा है, केंद्र ने रुपयों को लेकर अनदेखी नहीं की है। हाँ, ज़िम्मेदारियाँ नहीं निभाई गई हैं- स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा, प्रशासन द्वारा। अब केंद्र सरकार को मॉनिटरिंग की व्यवस्था करनी पड़ेगी, दिन दर दिन, हफ्ता दर हफ्ता। शायद तब कहीं बात बने। जहाँ कुछ भी नहीं है, सब कुछ जीरो है- वहाँ दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का पीएम आकर भी कुछ नहीं कर सकता, वह लाचार है। उससे नहीं होगा। उससे कुछ नहीं होगा।

लेकिन अगर उसने जीवन स्तर बेहतर बनाने का वादा किया है तो वह कर के दिखा देगा, जैसा कि उसने कई क्षेत्रों में किया है। मैं अपने लिए कुछ नहीं माँगता, मेरे देश में ये जो मौतें सामान्य हो गई हैं, जो कारक इसके पीछे काम कर रहे हैं, उसे ठीक कर दो। तुम नहीं ठीक करोगे तो कोई ऐसा आकर बैठ जाएगा, जिससे लोग कुछ माँग ही नहीं करेंगे क्योंकि उन्हें पहले से पता होगा कि कोई फायदा नहीं है जैसे 2014 के पहले 10 साल तक हुआ था।

योग ज़रूरी है, स्वच्छता ज़रूरी है- पीएम ने झाड़ू पकड़ा तो यह जनांदोलन बन गया। पीएम ने योगाभ्यास किया तो यह गलियों से लेकर संयुक्त राष्ट्र तक पहुँच गया। जैसे वित्त मंत्रालय में 30 के करीब सुस्त अधिकारियों को भगा दिया गया है, ऐसा ही आमूलचूल परिवर्तन स्वास्थ्य मंत्रालय में भी कर दो। काम कहाँ अटक रहा है, देखना पड़ेगा। कुछ ऐसा ही उठा लो हाथ में, जिससे स्वास्थ्य सेवाएँ भी जन आंदोलन बन कर घर-घर पहुँच जाए। हो सकता है, हुआ है, तुमने किया है, ये भी कर दो। क्योंकि मुझे पता है कोई और नहीं कर सकता।

नेताओं को तो जनता ने चुना है लेकिन परफॉरमेंस के आधार पर जयशंकर, हरदीप पुरी और अजीत डोभाल जैसे लोगों को आगे बढ़ा कर काम कराने वाला व्यक्ति यह भी कर देगा। अब देखना है, इस बजट में सुशील मोदी क्या कार्ययोजना बना कर जाते हैं और किस चीज के लिए फंडिंग बढ़ाने की बात करते हैं। जो भी हो, सुशील मोदी कुछ चूक करे या नीतीश कुमार, गाली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ही पड़नी है, पड़ती रही हैं, भले ही लोगों को यह तक न पता हो कि ये एकमात्र पीएम है जो अधिकारियों के साथ बैठक पर बैठक कर के 100 दिन का एजेंडा तय करवा रहा है।

चीजें अब मध्यम वर्ग से नीचे, ग़रीब, अत्यंत ग़रीब और धनहीनों तक पहुँचनी चाहिए। काम में रफ्तार चाहिए। कुछ मंत्री अच्छे हैं तो वहाँ काम सही से हो रहा और कुछ अगर औसत भी हैं तो काम ख़राब हो रहा। लेकिन सही कहते हैं लोग, जब वोट मोदी के नाम पर दिया है तो खोजेंगे भी मोदी को ही। धैर्य का बाँध टूटना नहीं चाहिए, क्योंकि कुछ आदमखोर और रक्तपिपासु दीमक इसी इंतजार में बैठे हैं। उन्हें रोकना पड़ेगा। इसके लिए मौतें रोकनी पड़ेंगी। भले ही यह दशकों से सामान्य हो, इस माहौल को बदलने के लिए वैसी परिस्थितियाँ पैदा करनी होंगी।

अब फिर कुछ फोटो शेयर होंगे कि बच्चे मर रहे हैं और पीएम हाथ-पैर हिला कर राँची में योग कर रहा है, लेकिन डिगने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि देश साथ खड़ा है एक भरोसा लिए, एक उत्साह लिए, एक ऊर्जा लिए- उसका समुचित उपयोग करना है और उस ऊर्जा को बचाए रखना है। अगर कहीं ग़लत हुआ है तो उसके लिए जो सही है, उससे पीछे हटने की ज़रूरत नहीं है। अगर वर्ल्ड कप को 15 मिलियन लोग देख रहे हैं तो प्रधानमंत्री उस बारे में कुछ ट्वीट करे, यह सामान्य है। पीड़ाएँ महसूस कर-कर के और करा-करा कर एक ही बात पता चली है- साम, दाम, भय, भेद कुछ भी अपनाओ पर समाधान करो।

ये दीमक काम पर लग गए हैं। इन मौतों को तमाम सरकारी योजनाओं से लेकर राम मंदिर और धारा 370 तक से जोड़ा जाएगा लेकिन कहीं से एक भी कदम पीछे खींचने की ज़रूरत है ही नहीं। सब अनवरत चलता रहे लेकिन जो भी इन मौतों के ज़िम्मेदार हैं, उनका भविष्य भी उसी अनुरूप ढाला जाए। हमने देखा है कि कैसे देश के कृषि मंत्री से मजदूरों की जान न बचाने की कीमत मंत्रिमंडल से हटा कर उससे बेहतर को शामिल कर चुकाई गई, शायद भविष्य में ऐसी घटनाएँ न हों। हमें अगले साल इस मौसम से 3 महीने पहले जागना पड़ेगा- रिमाइंडर सेट कर लीजिए- अभी के अभी।

मध्यावधि चुनाव होंगे इसमें कोई शक नहीं, उन्होंने 5 साल समर्थन देने को कहा था लेकिन उनका रवैया देखिये: देवगौड़ा

कर्नाटक में सियासी संकट गहरा गया है। जनता दल सेक्युलर (जेडीएस) के वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा ने शुक्रवार (21 जून) को जो बयान दिया उससे यह संकेत मिलता है कि राज्य में कभी भी मध्यावधि चुनाव हो सकते हैं। फ़िलहाल, राज्य में कॉन्ग्रेस-जेडीएस की गठबंधन सरकार है।

पूर्व प्रधानमंत्री देवगौड़ा के इस बयान से यह संकेत स्पष्ट नज़र आता है कि कॉन्ग्रेस-जेडीएस गठबंधन सरकार में सब कुछ ठीक नहीं है। दोनों दलों के बीच खटास उभरकर सामने आ रही है। ख़बर के अनुसार, कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने केंद्रीय नेतृत्व से कहा है कि कॉन्ग्रेस को इस गठबंधन का लाभ न होकर नुक़सान हुआ है। इस बात को ध्यान में रखते हुए जल्द से जल्द पार्टी नेतृत्व को निर्णय लेना चाहिए।

इससे पहले, कर्नाटक में कॉन्ग्रेस विधायकों के बीजेपी में शामिल होने की अटकलें भी लगती रही हैं। कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धरमैया के बयान के बाद एचडी देवगौड़ा की यह प्रतिक्रिया बेहद अहम मानी जा रही है। देवगौड़ा ने कहा, “कुछ लोग जेडीएस के साथ कॉन्ग्रेस का गठबंधन नहीं चाहते। गठबंधन सरकार चलानी है अथवा नहीं, इसका फ़ैसला जनता को कर लेने दें।”

ऐसा पहली बार नहीं है कि जब गठबंधन सरकार में खींचतान की ख़बरें सामने आई हों, इससे पहले भी मुख्यमंत्री कुमारस्वामी कई बार गठबंधन सरकार चलाने का दर्द बयाँ कर चुके हैं। हाल ही में उन्होंने बयान दिया था कि वो रोज जिस ‘दर्द’ से गुज़रते हैं, वो उसे जनता से बयाँ नहीं कर सकते। एक रैली को संबेधित करते हुए उन्होंने कहा था, “मैं आपको बता नहीं सकता खुल के कि मैं किन समस्याओं का सामना कर रहा हूँ। मैं मुख्यमंत्री हूँ लेकिन मैं हर दिन जो दर्द सहता हूँ वह बाँट नहीं सकता। अगर मैं करूँगा (दर्द साझा) तो मुझ पर यह सवाल उठेगा कि मैं लोगों की समस्याएँ कैसे सुलझा रहा हूँ। एक ओर मुझे सरकार के शांतिपूर्वक चलते रहने का ध्यान रखना पड़ता है, दूसरी ओर नौकरशाहों को यह यकीन दिलाना पड़ता है कि यह सरकार सुरक्षित है। यह सब ज़िम्मेदारियाँ हैं मुझ पर।”

कर्नाटक के मुख्यमंत्री कुमारस्वामी इससे पहले भी कई बार अपना दुःख प्रकट कर चुके हैं। लोकसभा निर्वाचन के समय प्रचार करते हुए उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के चेहरे की कथित ‘वैक्सिंग’ पर नाराज़गी जताई थी, और कहा था कि मोदी को मीडिया अधिक इसीलिए दिखाता है क्योंकि उनके चेहरे पर वैक्सिंग की चमक है, जबकि कुमारस्वामी (और अन्य ‘आम’ नेता) एक बार सुबह नहा कर निकलते हैं तो फिर अगले दिन सुबह ही नहाते हैं। इसीलिए उनका चेहरा टीवी पर अच्छा नहीं लगता और मीडिया उन्हें दिखाना पसंद नहीं करता। इसके अलावा अपने गठबंधन साथी कॉन्ग्रेस के ‘दुर्व्यवहार’ से नाराज़ होकर वह इस्तीफे की भी धमकी दे चुके हैं,कॉन्ग्रेस पर खुद को ‘क्लर्क’ बना देने का भी आरोप उन्होंने लगाया था।

असली गिद्ध कौन है? आपकी संवेदना बस एक नकली ब्यूटी फ़िल्टर है, और कुछ नहीं

‘मैं बंद कमरे में बैठ कर चिल्लाना चाहता हूँ, रोना चाहता हूँ’, ‘मैं इतनी पेरशान हूँ कि रातों को रोते-रोते सोई’, ‘इस घटना ने मुझे इतना विचलित कर दिया है कि मैं किसी से गले लग कर बस रोना चाहता हूँ’ आदि से लेकर ‘मोदी के पास एक ट्वीट करने का समय नहीं है?’, ‘चाँद पर आदमी भेजने वाले देश को अपने चाँद के टुकड़ों की चिंता नहीं’, ‘बच्चे मर रहे हैं और मोदी को योग सूझ रहा है’ आदि तक आप संवेदनशील होने से ज़्यादा संवेदनशील होता दिखना चाहते हैं।

अभिव्यक्ति के माध्यमों की बाढ़ आने से हर व्यक्ति, हर विषय पर राय देना चाहता है। कई बार ऐसा होता है कि जिस विषय को हम जानते भी नहीं, वहाँ भी हमारी राय होती है। जब एक खाली डिजिटल डिब्बा आपसे यह पूछता रहे कि ‘आपके दिमाग में क्या चल रहा है’ तो इसका कम्पल्शन, जो कि दिन में औसतन दो सौ बार फोन उठाने से आता है, कुछ न कुछ लिखने या ग्रहण करने के रूप में फलित होता है।

चूँकि, आप एक विषय पर कुछ पढ़ते हैं, और वो इतना सरल होता है, तो आपको लगता है कि आपको भी उस पर कुछ लिखना चाहिए। फिर आप लिख देते हैं कि ‘मुज़फ़्फ़रपुर में बच्चे मर रहे हैं और मोदी को योग के आसन सूझ रहे हैं’। आपको न तो संदर्भ पता है, न ही आपको मुज़फ़्फ़रपुर के बच्चों से कोई खास मतलब है, या आप इस बात से अनभिज्ञ हैं कि प्रधानमंत्री करता क्या है।

जब आप ऐसे मुद्दों पर इस तरह की बचकानी बातें करते हुए सीधा प्रधानमंत्री तक पहुँच जाते हैं तो आपके मन में संवेदना नहीं, उस व्यक्ति के खिलाफ लिखने की लालसा होती है क्योंकि वो करना सबसे आसान है। जो लोग लिख रहे हैं कि उनका जी रोने का कर रहा है, छाती पर हाथ मार कर चिल्लाने का कर रहा है, रात में रोते-रोते सोने का कर रहा है, बेशक कर रहा होगा, लेकिन आप ये फेसबुक पर क्यों बता रहे हैं? ताकि यह पता चले कि ये आदमी बिहार के एक जिले की त्रासदी पर फेसबुक के माध्यम से संवेदनशील हो रहा है? अगर आपका उद्देश्य लोगों को यह बताना नहीं है, और आप बिलकुल वैसा ही महसूस कर रहे हैं जैसा उस बच्चे की माँ या पिता, तो फिर आप फेसबुक पर टाइप कैसे कर रहे हैं?

आप वो इसलिए कर रहे हैं ताकि लोगों को लगे कि आप भी संवेदनशील हैं। आपको भी बहुत कष्ट पहुँचा है। जबकि कष्ट पहुँचने का सीधा-सा समीकरण है: सामयिकता और दूरी। वह घटना किस समय हुई और आपसे कितनी दूर है, इस हिसाब से मानव संवेदनशील होता है। तुरंत हुई, किसी ने फोटो लगाए, किसी ने उसकी भयावहता पर लिखा और हम तक पहुँचा तो हमें ‘शॉक’ लगता है। हम अचंभित होते हैं कि यह क्या हो गया। चूँकि ये तुरंत होता है तो यह एक सहज मानवीय प्रक्रिया होती है।

लेकिन आप इसे पढ़ने के बाद क्या करते हैं? आप सब्जी काटती हैं, नॉवेल पढ़ती है, पावर प्वाइंट प्रेजेन्टेशन बनाते हैं, लेख लिखते हैं, फ़ाइलों पर दस्तखत करते हैं, कुदाल चलाते हैं, बरामदा धोते हैं, कूलर में पानी भरते हैं, खाना खाते हैं… यानी, आप हर वो चीज करते हैं जो आप कल भी कर रहे थे। आपकी प्रतिक्रिया सहज थी, स्वाभाविक थी क्योंकि आप उस ख़बर से विचलित होते हैं।

लेकिन, अगर यह घटना आपके घर में होती तो सब काम रुक जाता, पड़ोस में होती तो थोड़े समय के लिए सब काम रुक जाता। गाँव या मुहल्ले में होती तो आप वहाँ जा कर देख आते और फिर इस पर घर में बात कर के अपने काम पर चले जाते। जिले में होती तो आप पढ़ लेते इसके बारे में और इस पर चकित होने के साथ-साथ कपड़ों में आयरन करते हुए ब्रेड का स्लाइस खा रहे होते कि ‘देश में हो क्या रहा है’। आपके राज्य में होती तो आप फेसबुक आदि जैसे माध्यमों पर लिख कर खानापूर्ति करते हुए आगे चले जाते। देश में होती तो सारे काम करते हुए समय मिलने पर चर्चा करते। देश से बाहर होती तो अपनी विचारधारा के हिसाब से उस पर लिखते।

खुद से पूछिए कि क्या आप इस दायरे से बाहर हैं? क्या हर घटना पर, जो कि भारत जैसे विशाल देश में हर सप्ताह नए रूप में आती है, आप यही पैटर्न नहीं दिखाते? क्या हमारी या आपकी संवेदनाओं के अभिव्यक्त हो जाने के बाद, हम अपने कार्य में मशगूल नहीं हो जाते? क्या यही फेसबुक स्टेटस लगाने के बाद अपनी प्रेमिका से शाम को मिलने का वादा नहीं करते? क्या दूसरे मज़ाक़िया स्टेटस पर ‘हा-हा’ वाला रिएक्शन नहीं देते? क्या हम दूसरे विषय पर नहीं लिखते, किसी के द्वारा शेयर किए गए मीम पर स्टिकर नहीं चिपकाते?

हो सकता है कि हम में से कोई एक व्यक्ति ऐसा हो जो ऐसा न करता हो। हो सकता है वो आप हों। हो सकता है कि आप बिलकुल ही असहज हो गए हों इस घटना से क्योंकि आप एक माँ हैं, एक पिता हैं, भाई या बहन हैं, जिसके घर में ऐसे ही छोटे बच्चे हैं। हो सकता है कि हम में से एक को ऐसी घटनाओं के बारे में जानने पर तेज धड़कनों के साथ ऐसा महसूस हुआ हो कि ये मेरी भी बिटिया हो सकती थी। हो सकता है कि हममें से किसी एक ने आँसू बहाए हों। हो सकता है कि आप संवेदनशील हों और आप का दिल बैठ गया हो इस त्रासदी से। इससे इनकार नहीं है।

मैं यह नहीं मानता कि हमारी संवेदनाएँ मर चुकी हैं। लेकिन मैं यह ज़रूर मानता हूँ कि आज के दौर में उस एक को छोड़ कर निन्यानवे व्यक्ति अपने विचारों को लिखने से पहले यह देखता है कि उसकी विचारधारा के अनुरूप है वह बात या नहीं। इसलिए, जब आप बताते हैं कि आप को नींद नहीं आ रही और आप रोते-रोते सो रहे हैं, तो आप लोगों को ठग रहे हैं। आप बस यह बताना चाह रहे हैं कि इस त्रासदी पर भी आप संवेदनशील हुए जैसे आपने ‘जे सुई शार्ली’ करते हुए नीस आतंकी हमलों के बाद फ़्रांस के झंडे का फ़िल्टर प्रोफाइल पिक्चर पर लगाया था।

मोदी योग कैसे कर रहा है?

आप भोजन कैसे ग्रहण कर रहे हैं? आप पानी कैसे पी रहे हैं? आप ऑफिस कैसे जा रहे हैं? आपने तो जिस हिसाब की बातें लिखी हैं, उससे तो प्रतीत होता है कि आपने सब कुछ छोड़ रखा है, और आप हर सप्ताह नई घटना पर ऐसे ही सब कुछ छोड़ देते हैं, फिर तो वैज्ञानिक रूप से आपका लिखने लायक स्थिति में होना असंभव दिखता है!

सरकार की ज़िम्मेदारी तो आत्महत्या करते हुए व्यक्ति के जान बचाने की भी है। सरकार की ज़िम्मेदारी तो घोड़े ती टाँग टूटने को लेकर भी है, सड़क दुर्घटना में मरने वाले उस व्यक्ति की भी है जिसने हेलमेट नहीं पहना या कोहरे के बीच एक्सप्रेसवे पर सौ की स्पीड से गाड़ी चला रहा था। सरकार की ज़िम्मेदारी हर अप्राकृतिक मौत की है क्योंकि वो मौत अप्राकृतिक है और वो जान बचाई जा सकती थी।

ध्यान रहे वो ज़िम्मेदारी सरकार की है, जिसका मुखिया प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री होता है। उसके नीचे मंत्री होते हैं, डिपार्टमेंट होते हैं, अधिकारी होते हैं, पूरा तंत्र होता है जिससे सब कुछ एक तय तरीके से चलता है। इसलिए, कभी भी किसी त्रासदी के बाद कोई देश या राज्य रुकता नहीं। कई बार कुछ सरकारें इन मामलों में उदासीन रवैया अपनाती हैं, उनके मंत्री बेहूदा बयान देते हैं, और बहुत देर से प्रतिक्रिया होती है। ये दुःखद है, लेकिन यही वास्तविकता है हमारे राजनैतिक तंत्र की।

जो लोग ‘मोदी के पास समय नहीं है एक ट्वीट का’, ‘मोदी शिखर धवन को ट्वीट कर रहा है’, ‘मोदी योग करने में व्यस्त है’ आदि कह रहे हैं, वो अपनी जगह से सही भी हैं, और गलत भी। ये बात सच है कि मोदी ने ट्वीट नहीं किया, और अगर वो शिखर धवन की उँगली के लिए ट्वीट कर या करा सकता है तो एक लाइन इस त्रासदी पर भी लिख या लिखवा सकता है।

लेकिन, उसके ऐसा न करने से यह साबित नहीं होता कि उसे इस त्रासदी की फ़िक्र नहीं है, या उसने स्थिति का जायज़ा नहीं लिया। चूँकि स्वास्थ्य व्यवस्था राज्य सरकार के ज़िम्मे है, और वहाँ की निकम्मी सरकार अब हरकत में आ गई है, और यहाँ से केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री भी वहाँ पहले ही जा चुके हैं तो फिर मोदी के जाने, या न जाने, से क्या फ़र्क़ पड़ेगा मुझे नहीं पता। हमारे पास यह साबित करने का कोई तरीक़ा नहीं है कि मोदी ने कहा हो कि ‘जो हो रहा है होने दो, हमें क्या। हमें तो कल योग के आसन करने हैं।’

लेकिन हम में से कुछ लोग हैं जिन्हें लगता है कि मोदी को मानवीयता के कारण एक बयान तो देना ही चाहिए क्योंकि इतनी बड़ी घटना हो गई। दुर्भाग्य यह है कि अगर मोदी ने एक ट्वीट किया होता तो यही फेसबुक पोस्ट करने वाले कुछ इस तरह से प्रतिक्रिया देते:

  • ट्वीट करने से क्या होता है?
  • बस ट्वीट कर लिया मोदी जी ने और सारे बच्चे ज़िंदा हो गए
  • अरे देखो, मोदी की नींद टूटी
  • ट्वीट में बस ये लिखा कि वो स्थिति की जानकारी ले रहे हैं, अपनी सरकार को फटकार भी नहीं लगाई
  • फटकार लगाने से क्या होगा, ये तो बस दिखावा है
  • उस मंत्री को बर्खास्त क्यों नहीं किया अब तक
  • हॉस्पिटल क्यों नहीं बनवाया एक भी, डॉक्टरों को नौकरी से क्यों नहीं निकाला

इन प्रतिक्रियाओं का कोई अंत नहीं है। अंत इसलिए नहीं है कि हमें मोदी के ट्वीट या बयान से मतलब है ही नहीं, हमें मतलब है ये चिल्लाने से कि मोदी ने क्या नहीं कहा। और मोदी तब तक आपकी बातों पर खरा नहीं उतरेगा जब तक वो आपसे फोन पर पूछ न ले कि फ़लाँ विषय पर वो ट्वीट करने जा रहा है, क्या-क्या लिखना सही रहेगा। क्या वो एक ट्वीट करे या पूरा थ्रेड लिखे? हर व्यक्ति फेसबुक पर उस ट्वीट या बयान का अलग मतलब निकाल कर, उसमें क्या रह गया, यह बताने पर आ जाएगा। ये पहले हो चुका है, और आगे भी हम इसी तरह करते रहेंगे।

तो क्या हम प्रतिक्रिया देना बंद कर दें?

फिर बात आती है कि आम आदमी क्या करे? आम आदमी हमेशा यह ख़्याल रखे कि तंत्र कैसे चलता है और वो जो माँग रहा है, वो पूरा हो सकता है या नहीं। जब हमारे पास यह जानने का ज़रिया नहीं है कि प्रधानमंत्री ने इस पर संज्ञान लेकर अपने स्वास्थ्य मंत्री को बिहार भेजा या नहीं, तो हमें यह कहने का हक़ नहीं है कि उसकी मानवता मर गई है, अपना बच्चा मरता तो शायद पता होता आदि।

एक पूरा समूह ऐसा है जो गिद्ध की तरह ऐसे मौक़ों पर पूरी सरकार को नाकाम बताने में लगा रहता है। ये पूरा गिरोह हर ऐसी त्रासदी पर सीधा इस्तीफा माँगने से लेकर, सरकारों के हर अच्छे काम को भी नकार देता है, पर वह यह नहीं बता पाता कि चलो भाजपा सरकार इस्तीफा दे देगी लेकिन ऐसी कौन-सी सरकार है जिसमें ऐसी त्रासदी न हुई हो, और उसने बाकी काम करना बंद कर पूरे मंत्रीमंडल के साथ घटनास्थल पर टेंट लगा कर डेरा डाल दिया हो कि इसको सही करो तभी जाएँगे।

अगर आप इतनी संवेदना उड़ेलने के बाद भी ऑफिस जाते हैं क्योंकि आपकी मजबूरी है, तो मोदी के भी ऑफिस की भी तो मजबूरी है जिसके सर पर पूरे देश की ज़िम्मेदारी है! एक ही व्यक्ति तो पूरे तंत्र का हर हिस्सा नहीं देख रहा, वरना मंत्रियों की, राज्य सरकारों की, उनके मंत्रियों की, विभागों की, कर्मचारियों की, अफ़सरों की क्या ज़रूरत है?

मोदी की जवाबदेही कॉन्ग्रेस शासित सरकारों के राज्य में हो रही किसानों की आत्महत्या की भी उतनी ही है जितनी भाजपा शासित राज्यों में हो रही इन बच्चों की मौतों की। त्रासदी आने पर देश न तो रुकता है, न रुकना चाहिए। लेकिन इसका मतलब यह नहीं होता कि उसके भीतर की संवेदना मर चुकी है या उसे पता ही नहीं है कि वहाँ सौ से ज़्यादा बच्चे मर गए। चूँकि मोदी ने हमें फेसबुक लाइव के ज़रिए नहीं बताया कि वो इस स्थिति पर नजर जमाए हुए है, और रिपोर्ट ले रहा है, तो इसका मतलब यह नहीं कि वो काम हो ही नहीं रहा। हम मोदी के कितने ट्वीट पढ़ते हैं, और कितनी देर की बातें जानते हैं? क्या उन चंद मिनटों के अलावा मोदी सोता रहता है?

फिर आप क्या कर रहे हैं? हमारे देश की स्वास्थ्य व्यवस्था बेकार है। लेकिन पिछले पाँच सालों में जागरुकता और बचाव के तरीके अपना कर क्या हमने बाल मृत्यु दर नहीं घटाई? क्या स्वच्छता अभियान के कारण बीमारियों में कमी नहीं आई? क्या हरियाणा जैसे राज्य में लैंगिक अनुपात बढ़ा नहीं? क्या ज़्यादा बच्चे स्कूल नहीं जा रहे? क्या कुपोषण आदि से बचने के लिए हर स्तर पर आँगनबाड़ी से लेकर सस्ते दामों पर अनाज उपलब्ध कराने के लिए सरकारों ने प्रयास नहीं किए?

लेकिन, फिर भी चूक होती है। मुज़फ़्फ़रपुर में बच्चों की मौत दो वजहों से हुई हैं। पहला यह कि सरकार ने जागरुकता अभियान नहीं चलाया ताकि लोगों को पता चले कि सीज़न की शुरुआत में सफ़ाई रखनी है, पानी कहाँ से पीना है, क्या खाना है, कहाँ सोना है आदि। दूसरा यह कि बीमारी के लक्षण दिखते ही उन्हें हॉस्पिटल ले जाना। साथ ही, प्राइमरी हेल्थ सेंटर नाम की चीज़ें बस काग़ज़ों में ही हैं। डॉक्टरों की कमी है, मेडिकल शिक्षा महँगी है, सरकारी जगहों पर सीट बहुत कम है, जनसंख्या बहुत ज़्यादा है। ये सारी ज़िम्मेदारी सरकार की ही है।

इसके लिए बजट में प्रावधान होते हैं। लेकिन बजट तो सीमित है। इसी बजट से पाकिस्तान और चीन को देखने के लिए भी पैसे चाहिए, प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक के शोध के लिए भी पैसे चाहिए, वेलफ़ेयर स्कीम के लिए भी पैसे चाहिए, इन्फ़्रास्ट्रक्चर के लिए भी पैसे चाहिए, रोजगार सृजन को बढ़ावा देने के लिए लोन के लिए भी पैसे चाहिए… कुल मिला कर बात यह है कि स्वास्थ्य और शिक्षा किसी भी सरकार के लिए युद्धस्तर की प्राथमिकता नहीं रही है। बाकी की क्षति सिस्टम में व्याप्त भ्रष्टाचार कर देती है क्योंकि जिस कुपोषण ने इन बच्चों की जानें ली हैं, उसके लिए कई योजनाएँ हैं लेकिन वो इन तक पहुँच नहीं रही।

इसके लिए कौन ज़िम्मेदार है? प्रधानमंत्री मोदी के साथ-साथ सारे जनप्रतिनिधि। आप इन बातों को तार्किकता के साथ रखिए और कोसिए कि कहाँ का बजट स्वास्थ्य में डाला जाए, कैसे भ्रष्टाचार को रोका जाए, कैसे मेडिकल शिक्षा में बेहतरी की जाए। ये बातें सबकी समझ में आती हैं लेकिन इन पर लिखना मुश्किल है। इसके लिए आपको पता करना होगा कि बजट कितना था, पहले से ज्यादा था कि कम, हॉस्पिटल कितने हैं, कितना पैसा किस योजना में गया, स्वास्थ्य का मुद्दा किस सरकार के अंतर्गत आता है, उसमें कौन सा विभाग ऐसी हत्या के लिए ज़िम्मेदार है।

ये करना बहुत कठिन है। आसान है यह लिख देना कि बच्चे मर रहे हैं और मोदी जी को योग सूझ रहा है। इससे आप संवेदनशील होते भी दिख जाते हैं, और आपकी पोलिटिकल प्वाइंट स्कोरिंग में भी गोल्ड क्वाइन वाली चमक आ जाती है। इससे तुरंत आप मोदी को धोबीपछाड़ दे देते हैं और फेसबुक पर मोदी अपना मुँह छुपाता फिरता है। और आपसे वो आँखें तो बिलकुल नहीं मिला पाएगा, लेकिन क्या आप अपनी गिद्धों वाली इन करतूतों के बाद, खुद से आँखें मिला पाते हैं?

अंततः, वाक्य के आधे हिस्से में संवेदना दिखाते हुए, दूसरे हिस्से में जो आप सिनिकल हो जाते हैं उससे पता चलता है कि आपको बच्चों की मौत से कोई मतलब नहीं। आपको मुद्दा चाहिए ताकि आप आउटरेज करते रहें। आप चौबीस घंटे इसी मोड में रहते हैं, जैसे कि सत्ता के पक्ष में लिखने वाला चौबीस घंटे उसके बचाव में लगा रहता है। दोनों को ही बच्चों की मौत से कोई वास्ता नहीं, क्योंकि दोनों का लक्ष्य एक व्यक्ति है। इसलिए, इन संवेदनशील होते दिखने वाले लोगों को मैं गिद्ध कहता हूँ जो बच्चों की मौतों को अपनी पोलिटिकल लीनिंग्स के हिसाब से भुनाना चाहते हैं।

फेसबुक पर मौजूद लोगों में से एक बहुत बड़ा हिस्सा कभी भी मुद्दे पर विवेचना करना नहीं चाहता क्योंकि उसकी इच्छा चर्चा करने की नहीं है। वो चाहता है कि उसे एक नाम पकड़ा दे कोई और फिर वो जी भर कर उसे कोस दे। ताकि उसकी टाइम लाइन पर आने वाले लोगों को लगे कि ये आदमी सही है, ये सत्ता के विरोध में है, इसकी लेखनी में आग है, ये सीधा सत्ताधीश से सवाल पूछ लेता है, असली काम तो यही कर रहा है, आखिर मोदी योग कैसे कर रहा है! सारा प्रयास खुद को कुछ ऐसा करते दिखाने में है जो आप वास्तव में कर नहीं रहे। चूँकि आपका पूरा जीवन इसी दिखावे की वृत्ति में गुज़रा है तो आपको दरकार होती है प्रधानमंत्री से भी एक दिखावे की कि वो ट्वीट क्यों नहीं कर रहा!

CWG-2022 में महिला क्रिकेट हो सकता है शामिल, निशानेबाजी आउट

इन दिनों पूरी दुनिया पर क्रिकेट का खुमार छाया हुआ है। सबकी नज़रें इंग्लैंड में चल रहे विश्व कप पर टिकी हुई हैं और इसी बीच क्रिकेट फैंस, खासकर महिला क्रिकेट फैंस के लिए एक अच्छी खबर आ रही है। खबर के अनुसार, 2022 में बर्मिंघम में होने वाले कॉमनवेल्थ गेम्स में महिला क्रिकेटर चौके-छक्के मारती दिखेंगी। 2022 के कॉमनवेल्थ के लिए गुरुवार (जून 20, 2019) को कॉमनवेल्थ गेम्स फेडरेशन (CGF) द्वारा इसका नामांकन किया गया। इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल (ICC) और इंग्लैंड एंड वेल्स क्रिकेट बोर्ड (ECB) ने कॉमनवेल्थ गेम्स फेडरेशन के इस फैसले का स्वागत किया है।

हालाँकि, आईसीसी ने एक विज्ञप्ति जारी करते हुए इस बात की जानकारी दी कि सीजीएफ सदस्यों द्वारा अभी इस पर अंतिम मंजूरी दी जानी बाकी है। जानकारी के मुताबिक, इसका अंतिम फैसला 71 सदस्यीय संघ द्वारा दिए गए वोट पर निर्भर करता है। इसके लिए सीजीएफ के 51 फीसदी सदस्यों की मंजूरी मिलना जरूरी होता है। 6 सप्ताह के भीतर इस पर लिया गया अंतिम निर्णय सार्वजनिक किया जाएगा। बर्मिंघम गेम्स 2022 के सीईओ इयान रीड ने इस बारे में बात करते हुए कहा, “हमने काफी समीक्षा के बाद महिला क्रिकेट, बीच वॉलीबॉल और पैरा टेबल टेनिस को शामिल करने का सुझाव दिया।”

आईसीसी ने हाल ही में महिला क्रिकेट को कॉमनवेल्थ गेम्स में शामिल करने की वकालत की थी। परिषद का कहना है कि वह क्रिकेट के जरिए महिला सशक्तीकरण को दुनिया में बढ़ावा देना चाहता है। आईसीसी के मुख्य कार्यकारी मनु साहनी ने कहा, “हम महिला क्रिकेट को बर्मिंगम खेल 2022 में शामिल करने की पेशकश का स्वागत करते हैं। मैं सीजीएफ और बर्मिंगम 2022 में सभी को धन्यवाद देता हूँ।”

वहीं, दूसरी तरफ कॉमनवेल्थ गेम्स 2022 में निशानेबाजी को शामिल नहीं किया गया है। इससे भारत को करारा झटका लगा है क्योंकि निशानेबाजी में भारत हमेशा ही अच्छा प्रदर्शन करता है और यह उन खेलों में शामिल है जिसमें भारत सबसे ज्यादा पदक जीतता है। साल 2018 में हुए कॉमनवेल्थ गेम में  भारत ने 7 स्वर्ण समेत 16 पदक जीते थे।

Make in India की नई मिसाल: भारत में ही बनेंगी नौसेना की 6 पनडुब्बियाँ

भारतीय नौसेना ने मेक इन इंडिया के तहत करीब 45 हजार करोड़ की लागत से 6 पी-75(आई) पनडुब्बियों के निर्माण के लिए संभावित रणनीतिक भागीदारों (potential strategic partners) को छाँटने के लिए कॉन्ट्रैक्ट जारी किया है। इसकी जानकारी रक्षा मंत्रालय ने बृहस्पतिवार (जून 20, 2019) को दी।

नौसेना के मुताबिक इस प्रोजेक्ट से देश में पनडुब्बियों के निर्माण की दिशा में स्वदेशी डिजाइन और निर्माण की क्षमता विकसित होगी और परियोजना के हिस्से के तौर पर पनडुब्बी का आधुनिक डिजाइन एवं प्रौद्योगिकी देश को हासिल होगा।

नवभारत टाइम्स में प्रकाशित खबर के मुताबिक रक्षा खरीद परिषद (Defence Acquisition Council) ने इस प्रोजेक्ट के लिए 31 जनवरी को मंजूरी दी थी। जिसके मद्देनजर अब भारतीय रणनीतिक भागीदारों के चयन के लिए सर्कुलर रक्षा मंत्रालय और भारतीय नौसेना की वेबसाइट पर उपलब्ध होगा। नौसेना ने बताया है कि मूल उपकरण निर्माताओं के चयन के लिए 2 सप्ताह में सर्कुलर जारी किए जाएँगे।

बता दें रणनीतिक भागीदारों को मूल उपकरण निर्माताओं के साथ मिलकर देश में इन पनडुब्बियों के निर्माण हेतु संयंत्र लगाने को कहा गया है। बताया जा रहा है ऐसा करने के पीछे देश को पनडुब्बियों के डिजाइन एवं उत्पादन का वैश्विक केंद्र बनाना है।

आतंकी हमले के समय उरी में तैनात कमांडरों को किया जा सकता है सेवानिवृत्त

सितंबर 2018 में जम्मू-कश्मीर के उरी सेक्टर में भारतीय सेना के कैंप पर आतंकी हमला हुआ था। उस समय सुंजवान मिलिट्री कैंप और नगरोटा आर्मी बेस के कमांडर उरी ब्रिगेड के प्रभारी थे। सरकार ने उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करने का मन बना लिया है। सरकार को यह लगता है कि उस आतंकी हमले के दौरान सुरक्षा में हुई चूक के लिए वरिष्ठ कमांडर ज़िम्मेदार हैं।

हिंदुस्तान टाइम्स में छपी ख़बर के अनुसार, नाम न बताने की शर्त पर एक वरिष्ठ अधिकारी ने इस बात की जानकारी दी कि सरकार ने भारतीय सेना को अपने इस फ़ैसले से अवगत भी कराया है। उन्होंने बताया कि सरकार अनिवार्य रूप से यह चाहती है कि अधिकारी स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले लें। सरकार का यह भी कहना है कि स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने वाले अधिकारियों को वे सभी लाभ प्राप्त होंगे जिसके वे हक़दार हैं।

एक अन्य अधिकारी ने भी नाम न उजागर करने की शर्त पर बताया कि भारत सरकार और सेना के बीच हुई चर्चा में यह तय किया गया था कि नई सरकार के शपथ ग्रहण के बाद कमांडर्स अपनी स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति संबंधी दस्तावेज़ जमा करा दें।

भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) द्वारा अप्रैल-मई के आम चुनाव में बहुमत हासिल करने के बाद लगातार दूसरे कार्यकाल के लिए शपथ लेने के बाद एक महीने से भी कम समय में सरकार का यह निर्णय सामने आया है।

ख़बर के अनुसार, उरी में तीन हमलों में कुल 36 सैन्यकर्मियों की मौत हुई थी। इनमें से दो- 2016 में नगरोटा बेस और उरी ब्रिगेड पर हुए थे, और तीसरा हमला- सुंजुवान कैंप पर हुआ था। कमांडर्स की स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति से संबंधित इस जानकारी की पुष्टि के लिए जब भारतीय सेना के प्रवक्ता से पूछा गया जो उन्होंने कहा, “मेरे पास कोई जानकारी नहीं है।”

उरी हमले ने भारतीय सेना को 28 सितंबर, 2016 को आतंकवादी शिविरों पर सीमा पार “सर्जिकल स्ट्राइक” करने के लिए प्रेरित किया। यह एक ऐसी कार्रवाई थी जिसने भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध की आशंकाओं को जन्म दिया।

एक तीसरे अधिकारी के अनुसार, कमांडर्स के ख़िलाफ़ इस तरह की कार्रवाई कोई नया प्रस्ताव नहीं है। एनडीए के पिछले शासन के दौरान, तत्कालीन रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमन ने ऐसे मामलों में कड़ी कार्रवाई पर ज़ोर दिया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सेना और वायु सेना प्रमुखों के साथ बातचीत में हमलों पर अपनी अत्यधिक नाराज़गी व्यक्त की थी। अधिकारी ने यह भी बताया कि सेना ने सरकार के इस निर्णय का विरोध किया था। नाम न छापने की शर्त पर चौथे वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि सरकार उन वरिष्ठ नेतृत्व (कमांडर्स) को ज़िम्मेदार ठहराना चाहती है जो आतंकी हमलों का ख़ुद भी शिकार हो सकते थे।

भारतीय सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि भारतीय सेना ऑपरेशनल मुद्दों के कारण कमांडर्स को सेवानिवृत्त करने के लिए उत्सुक नहीं है। हमलों की जाँच की गई है। आवश्यक कदम पहले ही उठाए जा चुके हैं। दिलचस्प बात यह है कि बेस के एक कमांडर ने हमले के दो दिन पहले ही कमान संभाली थी।

सेना ने सरकार द्वारा इस आधार पर अधिकारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई शुरू करने के पिछले प्रयासों का विरोध किया था कि इस तरह की कोई भी कार्रवाई एक बुरी मिसाल कायम कर सकती है और ऐसे निर्णय से भविष्य में आतंकवाद रोधी कार्रवाई में बाधा उत्पन्न हो सकती है। सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत का भी कहना था कि “कमांड (सेवा) से हटा दिया जाना अपमानजनक होता है।”

हिस्ट्रीशीटर फ़िरोज़ करता था पागलपन का नाटक, जब पहुँचा ‘मेंटल वार्ड’ तो खुल गई पोल

एक हिस्ट्री शीटर अपराधी की उल-जुलूल हरकतों से परेशान होकर पुलिस ने उसे सबक सिखाने के लिए दिमागी रूप से बीमार लोगों के अस्पताल में भेज दिया। कमाल की बात ये हुई कि पुलिस की तरकीब काम कर गई और दोषी ने 24 घंटों के अंदर ही वहाँ से बाहर आने के लिए स्वीकार कर लिया कि वो ऐसी हरकतें इसलिए करता था ताकि पुलिस की हिरासत से छूट सके।

पुणे मिरर में प्रकाशित खबर के मुताबिक फिरोज़ मकबूल खान उर्फ़ बबली नामक यह व्यक्ति नानापीठ का रहने वाला है। 46 वर्ष की आयु में इस व्यक्ति पर मारपीट और संपत्ति अपराध के 49 मामले दर्ज हैं। साथ ही ये व्यक्ति आर्म्स एक्ट और आईपीसी धारा 392 और 506(2) के तहत गिरफ्तार भी हो चुका है। जानकारी के मुताबिक 8 जून को फिरोज ने एक सिगरेट बेचने वाले से मारपीट की क्योंकि दुकानदार ने उसे मुफ्त में सिगरेट देने से मना कर दिया था। इस घटना के बाद दुकानदार आरीफ़ रमजान तंबोली ने अगले दिन शिकायत दर्ज करवाई और क्राइम ब्रांच पुलिस ने फिरोज को उसके घर से 14 जून को गिरफ्तार किया।

इसके बाद पुलिस जैसे ही उसे थाने लेकर आई तो फिरोज ने वहाँ अपने नाटक शुरू कर दिए और पागलों जैसी हरकतें करने लगा। पुलिस ने उसे लश्कर थाने में बंद किया, लेकिन वहाँ भी उसके नखरे कम नहीं हुए। 15 जून को 1:30 बजे खान को ससून जनरल अस्पताल में भर्ती करवाया गया। फिरोज़ ने यहाँ भी अपना नाटक बंद नहीं किया। फिरोज़ के इन हरकतों को देखकर डॉक्टर और पुलिस ने तय किया कि उसे वार्ड नंबर 26 में भेजा जाएगा जो दिमागी रूप से बीमार लोगों का वार्ड था।

इस फैसले के बाद 24 घंटों के भीतर ही फिरोज अपने असली रूप में आ गया। वार्ड में मरीजों की हालत देखकर उसने वहाँ खाना और दवाई लेने से मना कर दिया। उसे डर था कहीं वाकई में उसकी दिमागी हालत पर फर्क न पड़ जाए। उसने तुरंत डॉक्टर और जाँच अधिकारी को बुलवाया और उसे वहाँ से बाहर ले जाने की भीख माँगने लगा। उसे लग रहा था कि उसे जल्द ही यरवदा के पागलखाने भेज दिया जाएगा। लेकिन सच्चाई बताने के बाद भी डॉक्टरों ने फैसला किया कि आगे की जाँच के लिए उसे तीन दिन तक अस्पताल में रखा जाएगा। जाँच पूरी होने के बाद 18 जून को उसे कोर्ट में हाजिर किया गया जहाँ ससून के डॉक्टर ने फ़िरोज़ को मानसिक रूप से स्वस्थ करार दिया। इसके बाद उसे दो दिन की पुलिस कस्टडी में रखा गया।

इस तरह फिरोज के खेल में पुलिस ने बड़ी समझदारी से उसे हराया। पुलिस ने बताया कि हर बार जब भी उसे हिरासत में लिया जाता था तो वो अजीब-अजीब हरकतें करता था। कभी वो अपने मुँह में ब्लेड दबा लेता था तो कभी खिड़की से कूद जाने की धमकी देता था। इन हरकतों से कोर्ट फिरोज की मानसिक हालत पर सहानुभूति दिखाती थी और उसके पक्ष में अपना फैसला देती थी। आरोपित ने खुद स्वीकारा कि वो दिमागी रूप से बीमार नहीं है, वो ऐसी हरकतें इसलिए करता था ताकि वो पुलिस से बच सके।

अवैध मस्जिद निर्माण के खिलाफ बोलने पर BJP सांसद को ‘मीम सेना’ ने दी धमकी

पश्चिमी दिल्ली से भाजपा सांसद प्रवेश वर्मा को सरकारी जमीन और सड़क के किनारे अवैध रुप से मस्जिदों के निर्माण का मामला उठाने के मामले में धमकियाँ मिल रही हैं। प्रवेश वर्मा ने गुरुवार (जून 20, 2019) को पुलिस कमिश्नर अमूल्य पटनायक को चिट्ठी लिखकर बताया है कि उन्हें फोन पर एसएमएस भेजकर और सोशल मीडिया के जरिए जान से मारने की धमकियाँ दी जा रही है। उन्होंने इस मामले की जाँच कर आरोपितों का पता लगाने और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने की माँग की है।

प्रवेश का कहना है कि उन्होंने 17 जून को वेस्ट दिल्ली में सरकारी जमीनों पर अवैध कब्ज़ा कर वहाँ मस्जिदें और कब्रिस्तान बनाने का मुद्दा उठाते हुए दिल्ली के उप राज्यपाल को चिट्ठी लिखी थी। इसमें उन्होंने माँग की थी कि सभी संबंधित विभागों के अधिकारियों की कमिटी का गठन करके इस पूरे मामले की जाँच कराई जाए और अवैध निर्माणों को हटाया जाए जिसके बाद से उन्हें इस तरह की धमकियाँ मिलनी शुरू हुईं हैं।

अपनी चिट्ठी के साथ प्रवेश ने धमकी भरे मैसेज के फोटो खींचकर भी बतौर सबूत पेश किया है। प्रवेश के मुताबिक, मीम सेना नामक एक संगठन के नैशनल प्रेसिडेंट शादाब चौहान के नाम से उन्हें धमकी भरे मैसेज भेजकर चेतावनी दी जा रही है कि अगर उन्होंने मस्जिदों को टारगेट किया, तो मीम सेना उन्हें सबक सिखाएगी। ट्विटर पर मिली धमकी में लिखा गया है, “अगर तुमने हमारी मस्जिदों को निशाना बनाया तो तुम्हें सबक सिखा दिया जाएगा। तुम हमारी ताकत नहीं जानते, मैं तुम्हें चैंलेज करता हूँ, तुम हमारी एक भी अवैध मस्जिद को छूकर दिखाओ।”