ईस्टर पर हुए आतंकी हमले के बाद श्री लंका में अब तक हालात सामान्य नहीं हो पाए हैं। रविवार को देश के पश्चिमी तटीय शहर चिलॉव में मुस्लिमों और ईसाइयों के बीच हुई झड़प के कारण वहाँ मध्य रात्रि से फेसबुक और व्हाट्सअप पर अस्थाई रूप से प्रतिबंध लगा दिया गया है। ताजा जानकारी के अनुसार कई मस्जिदों और मुस्लिमों को टार्गेट किया गया है।
गौरतलब है कि कल (मई 12, 2019) स्थानीय आबादी और मुस्लिमों के बीच तनातनी एक फेसबुक पोस्ट को लेकर हुई थी और देखते ही देखते कर्फ्यू लगाने की स्थिति आ गई। स्थानीय पुलिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए सोमवार (अप्रैल 13, 2019) की सुबह 6 बजे तक कर्फ्यू लगा दिया।
रॉयटर्स के अनुसार, रविवार को फेसबुक पर एक पोस्ट को लेकर तनाव का मामला इतना बढ़ गया कि चिलॉव स्थित तीन मस्जिदों और मुस्लिमों की कुछ दुकानों पर स्थानीय ईसाई समुदाय के लोगों ने पथराव किया था।
फेसबुक पर किसी यूजर ने सिंहलीज़ में लिखा था – “हमें रुलाना इतना आसान नहीं।” इसके साथ ही उसने मुस्लिमों के लिए एक स्थानीय गाली का भी प्रयोग किया। इसी पोस्ट पर अब्दुल हमीद मोहम्मद हसमार ने अंग्रेजी में कॉमेंट किया – “Dont laugh more 1 day u will cry.” मतलब ज्यादा हँसो मत, एक दिन तुम रोओगे।
खबरों के मुताबिक अधिकारियों ने बताया है कि उन्होंने विवादस्पद फेसबुक पोस्ट करने वाले अब्दुल हमीद को गिरफ्तार कर लिया है। इसके अलावा अधिकारियों ने कुलियापितीय और दुम्मलासुरिया क्षेत्र के पास से एक समूह को भी गिरफ्तार किया है, जो गिरफ्तार आरोपी को रिहा करने की माँग कर रहे थे।
ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखकर फोनी तूफान से मची तबाही से उबरने के लिए केंद्र सरकार की तरफ से ओडिशा सरकार को दी गई मदद के लिए शुक्रिया अदा किया है। पटनायक ने अपने पत्र में ओडिशा में हुए नुकसान का जिक्र करते हुए पुनर्वास के लिए केंद्र से मदद का अनुरोध किया है। उन्होंने चक्रवात से प्रभावित लोगों के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण (पीएमएवाई-जी) के तहत 5 लाख घर बनाए जाने की माँग की है।
नवीन पटनायक ने PM मोदी को चिट्ठी लिखकर जताया आभार, पुनर्वास के लिए मदद का अनुरोध
Chief Minister of Odisha Naveen Patnaik writes to Prime Minister Narendra Modi thanking the Union Government for the help rendered to the state during #CycloneFani and to consider sanctioning 5 lakh PMAY(G) special houses. pic.twitter.com/BMpYjG26Af
नवीन पटनायक ने खत में लिखा है कि चक्रवात से प्रभावित जिलों में बड़ी संख्या में लोग मुश्किलों से गुजरे हैं, उनका आसरा भी छिन गया है। प्रदेश सरकार नुकसान का आकलन कर रही है, जिसके काफी जल्द पूरा होने की संभावना है। तबाह घरों की सटीक संख्या और इससे जुड़ी जानकारी सर्वे पूरा होने के बाद ही मिल पाएगी। हालाँकि शुरुआती सर्वे की मानें तो सबसे ज्यादा प्रभावित 14 जिलों में तकरीबन 5 लाख घर या तो पूरी तरह नष्ट हो चुके हैं या काफी बड़े स्तर पर उन्हें नुकसान पहुँचा है। सबसे ज्यादा क्षति पुरी जिले में हुई है। इसके साथ ही सीएम ने 6 मई को प्रधानमंत्री के साथ हुई बैठक में उठाई गई माँग को दोहराते हुए कुछ खास आवंटनों के लिए परमानेंट वेट लिस्ट (पीडब्लूएल) में छूट देने की बात कही है।
पत्र के अंत में पटनायक ने लिखा है कि जल्द ही बारिश का मौसम आने वाला है और 10 जून तक मानसून भी ओडिशा में दस्तक दे सकता है। इससे पहले प्रभावित लोगों को पक्का मकान मिल सके, इसके लिए केंद्र सरकार के प्रस्तावों के मद्देनजर ओडिशा सरकार 1 जून 2019 से कार्य आदेश पारित करने जा रही है। गौरतलब है कि 3 मई को ओडिशा में आए चक्रवाती तूफान फोनी से हुई क्षति का जायजा लेने के लिए प्रधानमंत्री मोदी 6 मई को भुवनेश्वर पहुँचे थे। इस दौरान उन्होंने हवाई सर्वेक्षण के जरिए तूफान से हुए नुकसान का जायजा लिया। इस आपदा से उबरने के लिए केंद्र सरकार की तरफ से ओडिशा सरकार को कुल ₹1381 करोड़ की मदद दी गई।
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल का पारा सातवें आसमान पर नज़र आ रहा है। पंजाब में आम आदमी पार्टी के सुप्रीमो का स्वागत जनता ने कुछ यूँ किया, कि मंच से केजरीवाल ने भाषण देने की जगह आग उगला। पंजाब की सभी 13 सीटों पर लोकसभा चुनाव के अंतिम चरण के अंतर्गत 19 मई को मतदान होना है। हर राजनीतिक पार्टी की नज़र अब पंजाब पर है और सभी यहाँ अपना-अपना वोट बैंक तलाशने पहुँच गए हैं। इसी क्रम में यहाँ चुनाव-प्रचार के लिए पहुँचे केजरीवाल का स्वागत काले झंडों से किया गया। जनता ने उन्हें काले झंडे दिखाए उनके ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन किया। ये सब हुआ, पंजाब के संगरूर में। लोगों का कहना भी जाएज़ था, वो आम आदमी पार्टी से नाराज़ थे।
जनता ने विरोध करते हुए कहा कि उन्होंने 2014 लोकसभा चुनाव में कई आप सांसदों को जीत दिला कर भेजा, लेकिन उनमें से किसी एक ने भी पॉंच वर्षों तक जनता की सुध तक न ली। लोगों ने केजरीवाल के विरोध का कारण बताते हुए कहा कि आम आदमी पार्टी के सांसदों द्वारा जनता व क्षेत्र की उपेक्षा किए जाने से वे नाराज़ हैं। लोगों का कहना था कि अरविन्द केजरीवाल ने पिछले चुनावों से पहले पंजाब में ड्रग्स समस्या को लेकर तो बड़े-बड़े भाषण दिए लेकिन चुनाव ख़त्म होते ही बादलों से माफ़ी माँग ली। विरोध-प्रदर्शन कर रही जनता ने आप और केजरीवाल को धोखेबाज़ बताया। उन्होंने कहा कि केजरीवाल ने उन्हें ठगने का काम किया है।
इतने विरोध प्रदर्शनों के बाद मंच पर पहुँचे केजरीवाल ने अपना आपा खो दिया। इससे पहले केजरीवाल को दिल्ली में भी काले झंडे दिखाए गए, जिसके बाद गुस्से में आग बबूला होकर उन्होंने भले-बुरे शब्द कहे। उन्होंने भाजपा को जी भर धमकी दी और कई विवादित शब्दों का भी प्रयोग किया। सार्वजानिक मंच से बोलते हुए केजरीवाल ने कहा, “मैं बीजेपी वालों को भी चेतावनी देता हूँ, अपनी औकात में रहो। दिल्ली की जनता से पंगा मत लो वरना ये तुम्हारे घर में घुस कर इतने जूते मारेंगे, इतने जूते मरेंगे, कि तुम्हारी शक्ल ही नहीं दिखेगी।” अरविन्द केजरीवाल के भाषण में जगह-जगह उन्हें दिखाए जाने वाले काले झंडों को लेकर उनका गुस्सा साफ़-साफ़ नज़र आ रहा था।
दिल्ली और पंजाब में नाराज़गी झेल रहे केजरीवाल कॉन्ग्रेस से गठबंधन करने में सफल न होने के कारण भी नाराज़ हैं। संगरूर में उनकी प्रतिष्ठा इसीलिए भी दाँव पर है क्योंकि पंजाब में आप के बड़े नेता भगवंत मान यहाँ से मौजूदा सांसद हैं और पार्टी ने एक बार फिर से उन पर विश्वास जताया है। कॉन्ग्रेस ने यहाँ से केवल सिंह ढिल्लों को उम्मीदवार बनाया है। वहीँ भाजपा गठबंधन की ओर से शिरोमणि अकाली दल के प्रत्याशी परमिंदर सिंह ढींढसा मैदान में हैं। कई आप विधायकों द्वारा पार्टी छोड़ने से केजरीवाल की पार्टी को झटका लगा है और आम आदमी पार्टी का ग्राफ लगातार नीचे गिर रहा है।
पंजाब में कॉन्ग्रेस, भाजपा-शिअद गठबंधन और आम आदमी पार्टी के बीच त्रिकोणीय मुक़ाबला है।। डेरा सच्चा सौदा के अप्रासंगिक होने और आम आदमी पार्टी की लोकप्रियता घटने के बाद यहाँ के राजनीतिक समीकरण बदल गए हैं। अतः अंतिम चरण में सभी दल यहाँ ज़ोर लगा रहे हैं।
भारत और बांग्लादेश के बीच सीमा का निर्धारण इच्छामति नदी के द्वारा होता है। प्रत्येक वर्ष दुर्गा पूजा के दौरान दोनों देशों के हिन्दू नदी किनारे एकत्रित होकर मूर्ति विसर्जन करते हैं। इस अवसर पर दोनों देशों के बीच आपसी प्रेम और सौहार्द का प्रत्यक्ष दर्शन होता है। लेकिन, इसी अवसर का लाभ उठाते हुए कुछ लोग अवैध तरीक़े से भारतीय सीमा में प्रवेश कर जाते हैं। तमाम इंतजाम किए जाने के बावजूद बड़ी संख्या में बांग्लादेशी नागरिक नदी पार करके भारत आने में कामयाब हो जाते हैं।
सुरक्षा बलों की सक्रियता के बावजूद अवैध रूप से भारत आने वाले लोग चिंता का विषय हैं, क्योंकि इससे देश की सुरक्षा को ख़तरा हो सकता है। ख़बर के अनुसार, लाखों ऐसे विदेशी नागरिक हैं जो अवैध रूप से भारत की सीमा में घुस जाते हैं और फिर यहीं बस जाते हैं। ऐसा काफी समय से होता आया है और कभी इस मुद्दे को गंभीरता से नहीं लिया गया। लेकिन मोदी सरकार ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए इस पर अपना विरोध जताया। भारत में अवैध रूप से रहने वाले बांग्लादेशी नागरिकों को बाहर करने के लिए राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) और नागरिकता संशोधन विधेयक के मुद्दे को पुरज़ोर तरीक़े से उठाया।
बीजेपी के कार्यकाल में ‘नागरिकता संशोधन विधेयक 2016’ पास हुआ था। भाजपा ने इस विधेयक को पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान, बांग्लादेश से विस्थापन की पीड़ा झेल रहे हिन्दू, पारसी, ईसाई, बौद्ध, जैन और सिख अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए अहम फ़ैसला बताया है। बिल के पारित होने पर गृहमंत्री श्री राजनाथ सिंह ने लोकसभा में अपने भाषण में कहा, “नागरिक संशोधन विधेयक सिर्फ़ असम के लिए नहीं है, बल्कि अन्य राज्यों में रह रहे प्रवासियों पर भी लागू होता है। यह कानून देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लागू होगा। असम का भार सिर्फ़ असम का नहीं है, पूरे देश का है।”
#CitizenshipAmendmentBill सिर्फ असम के लिए नहीं है, बल्कि अन्य राज्यों में रह रहे प्रवासियों पर भी लागू होता है।
यह कानून देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लागू होगा। असम का भार सिर्फ असम का नहीं है, पूरे देश का है: गृहमंत्री श्री @rajnathsinghpic.twitter.com/mN9uUfo17J
वहीं तृणमूल कॉन्ग्रेस ने संसद में इस विधेयक को बाँटने वाली राजनीति करार देते हुए इस पर अपना विरोध दर्ज किया था। वहीं एक और बात का ख़ुलासा हुआ था कि TMC बांग्लादेश में अपनी पार्टी का चुनाव प्रचार भी कर रहीं थीं, जिसमें वो अपने पक्ष में वोट की अपील करते भी पाई गईं थी।
दरअसल, एक वीडियो सामने आया था जिसमें ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली TMC (तृणमूल कॉन्ग्रेस) के आधिकारिक फेसबुक पेज पर सूचना और विज्ञापनों पर जब क्लिक किया गया, तो आप उन देशों को देख सकते हैं जहाँ TMC लोकसभा चुनाव में वोट देने की अपील करती नज़र आई। ड्रॉप-डाउन वाले विकल्प पर क्लिक करने पर जब एक देश के रूप में ‘बांग्लादेश’ का चयन किया गया तो वहाँ TMC अपने पक्ष में वोट माँगने की अपील करती नज़र आई। इससे यह साफ़ हो गया है TMC अपने देश के अलावा दूसरे देश में भी प्रचार कर रही थी। भारत में प्रचार करना तो समझ में आता है, लेकिन पड़ोसी देश बांग्लादेश में प्रचार करने का भला क्या मतलब हो सकता था?
ऐसी ही एक और ख़बर सामने आई थी जब बांग्लादेशी अनिभेता फ़िरदौस का बिज़नेस वीज़ा रद्द हो गया था। उस समय इस बात का ख़ुलासा हुआ था कि वो पश्चिम बंगाल में TMC के उम्मीदवार कन्हैया लाल अग्रवाल का प्रचार कर रहा था। नोटिस मिलने के बाद उसे बांग्लादेश वापस जाना पड़ा था।
फ़िरदौस अकेला ऐसा शख़्स नहीं था जो TMC का प्रचार करने में शामिल था, उसके अलावा बांग्लादेशी फ़िल्म इंडस्ट्री के दो अन्य लोग अंकुश हाज़रा और पायल सरकार भी प्रचार-अभियान में शामिल थे। उस समय में बीजेपी ने फ़िरदौस द्वारा चुनाव किए जाने पर आपत्ति जताई थी और उसके ख़िलाफ़ चुनाव आयोग में शिकायत करने के साथ-साथ उसकी गिरफ़्तारी की माँग भी की थी। इस पर भारत में बांग्लादेश उच्चायोग ने भी फ़िरदौस को वापस जाने को कहा था। बता दें कि फ़िरदौस की वापसी का मामला थमा भी नहीं था कि TMC का प्रचार करने में जुटे एक और बांग्लादेशी अभिनेता गाज़ी अब्दुन नूर का नाम सामने आया था, जो दमदम क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे TMC उम्मीदवार सौगात के लिए प्रचार कर रहा था।
TMC द्वारा बांग्लादेशी अभिनेताओं से चुनाव-प्रचार कराने पर बीजेपी के महासचिव राहुल सिन्हा ने तर्क दिया था कि कल को ममता बनर्जी पाकिस्तान से भी अभिनेताओं को अपने पक्ष में चुनाव-प्रचार के लिए बुला सकती हैं।
लोकसभा चुनाव 2019 के अंतिम चरण में बशीरघाट में मतदान होगा। ध्यान देने वाली बात यह है कि बशीरघाट में 50 फ़ीसदी से अधिक लोग मुस्लिम हैं। पिछले साल वहाँ 2 बार साम्प्रदायिक हिंसा की घटनाएँ हो चुकी हैं। TMC ने इदरिस अली की जगह अदाकारा नुसरत जहाँ को टिकट दिया है, और कॉन्ग्रेस ने क़ाज़ी अब्दुल रहीम को टिकट दिया है, बता दें कि अब्दुल रहीम के पिता अब्दुल गफ्फार इलाक़े से सम्मानित व्यक्तियों में से एक रहे हैं। इन सब बातों को ध्यान में रखकर ऐसा प्रतीत होता है कि सूबे की कमान सँभालने वाली ममता बनर्जी को बांग्लादेश से बड़ी उम्मीदें हैं। शायद उन्हें यह लगता है कि भारत में उनकी राजनीति बांग्लादेश के बलबूते ही चमकेगी। स्थिति भले ही कुछ भी हो लेकिन सीधे तौर पर यह मुक़ाबला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच दिख रहा है।
नवजोत सिंह सिद्धू की आवाज़ पर एक बार फिर से ख़तरा मँडराने लगा है। ताज़ा ख़बरों के अनुसार, उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है,जहाँ उनका इलाज चल रहा है। उनकी हालत ख़राब होने की वजह से उन्हें ‘Steroid Meditation’ पर रखा गया है और उन्हें कई इंजेक्शन भी दिए गए हैं। उनके ‘Vocal Chords’ को काफ़ी नुक्सान पहुँचा है और इलाज ख़त्म होने के बाद ही वह फिर से प्रचार अभियान में लौट पाएँगे। इससे पहले दिसंबर 2018 में भी ख़बर आई थी कि लगातार बोलने के कारण सिद्धू अपनी आवाज़ खोने की कगार पर पहुँच गए हैं।
पंजाब केसरी में छपी ख़बर के मुताबिक़, डॉक्टरों ने सिद्धू को अपने गले पर एक ख़ास बाम लगाने को कहा है। दिक्कत यह है कि उस बाम को लगाने के बाद सिद्धू 4 दिनों तक बोलने में अक्षम होंगे। वहीं अगर वो इंजेक्शन और दवाओं का सहारा लेते हैं तो उन्हें 48 घंटे आराम करना पड़ेगा। सिद्धू ने फिलहाल चुनाव को देखते हुए दवाओं व इंजेक्शन का सहारा लिया है। वो चुनाव बाद नियमित और स्थायी उपचार के लिए जाएँगे। उधर रविवार (मई 12, 2019) को मध्य प्रदेश में उनकी सभाएँ रद्द होने के कारण कॉन्ग्रेस नेताओं को जनता के आक्रोश का सामना करना पड़ा। पुनासा में सिद्धू के न पहुँच पाने के लिए कॉन्ग्रेस नेताओं द्वारा मोदी को ज़िम्मेदार ठहराया और कहा गया कि उनके हैलीकॉप्टर को इंदौर में ईंधन नहीं दिया गया। इसके बाद ग्रामीणों ने हंगामा किया।
Navjot Singh Sidhu’s office: Navjot Singh Sidhu put on steroid medication and injections due to continuous speech damaging his vocal cords. At the moment Mr. Sidhu is under the medication & in process of a quick recovery to return-back to campaigning at the earliest. (file pic) pic.twitter.com/RI2mgML99l
दिसंबर में मामले की गंभीरता को देखते हुए डॉक्टरों ने उन्हें पाँच दिन पूरी तरह आराम करने की सलाह दी थी। डॉक्टरों ने कहा था कि अब यदि अधिक बोला तो उनकी आवाज़ जा सकती है। छह महीने पहले उनके ख़ून के कई परीक्षण करने के बाद नतीजों का गम्भीरतापूर्वक मूल्यांकन किया गया था। इसके बाद सिद्धू किसी अज्ञात स्थान पर चले गए थे। सिद्धू को कई दिनों से फ़िज़ियोथेरेपिस्ट कई तरह की प्रैक्टिस करा रहे थे और उन्हें विशेष दवाएँ देने के साथ-साथ साँस लेने का अभ्यास भी कराया जा रहा था।
ख़बरों के अनुसार, पंजाब सरकार में कैबिनेट मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू कॉन्ग्रेस के सबसे सक्रिय स्टार प्रचारकों में से एक रहे हैं। उन्होंने अब तक पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश से लेकर कई राज्यों में जनसभाएँ की है और लगातार बोलते रहने के लिए जाने जाने वाली सिद्धू लोकसभा चुनाव 2019 में अब तक 80 के आसपास सभाओं को सम्बोधित कर चुके हैं। 19 मई को अंतिम चरण के चुनाव के तहत पंजाब में मतदान होना है और सिद्धू की अनुपस्थिति से कॉन्ग्रेस को तगड़ा झटका लगा है।
पिछले वर्ष यह भी ख़बर आई थी कि लगातार हेलीकॉप्टर और विमान यात्रा करने के कारण उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ा था। इससे पहले वह एंबोलिज्म (धमनी में खून का थक्का जमना या हवा का बुलबुला बनना) के लिए उपचार करवा रहे थे। उन्हें कुछ साल पहले अत्यधिक हवाई यात्रा करने के कारण सिद्धू को डीप वेन थ्रोबोसिस (डीवीटी) का भी सामना करना पड़ा था। लगातार चुनावी सभाओं को सम्बोधित कर रहे सिद्धू पंजाब में कॉन्ग्रेस का अहम चेहरा हैं और उन्हें सुनने के लिए लोग भी जुटते हैं। हाल ही में कई विवादित बयानों के कारण वे ख़ासे चर्चा में रहे हैं।
कमल हासन के नए काण्ड की बात तो हम करेंगे, लेकिन उससे पहले एक कहानी बताना चाहता हूँ आप लोगों को। ये कहानी उस बड़े अभिनेता की है, जिसे अपनी ज़िंदगी में कई भाषाओं में अभिनय करते-करते इतने अवॉर्ड मिले कि अंत में उसे फ़िल्मफेयर को लिखना पड़ा कि अब उन्हें अवॉर्ड्स न दिए जाएँ। ये क़रीब डेढ़ दशक पुरानी बात है। इसके बाद भी फ़िल्मों में वह अभिनेता सक्रिय रहा। लेकिन, जनवरी 2013 में एक फ़िल्म आई, जिसका नाम था विश्वरूपम, और इसके बाद सब कुछ बदल गया। कमल हासन के आलोचक भी मानते हैं कि विश्वरूपम एक उम्दा फ़िल्म थी और अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में इस्लामिक आतंक को इससे बेहतर शायद ही किसी भारतीय फ़िल्म में दिखाया गया हो। इस फ़िल्म को लिखने वाले, इसका निर्देशन करने वाले और इसके मुख्य अभिनेता, तीनो ही कमल हासन थे। अतः इसका पूरा का पूरा श्रेय उन्हें ही जाता है।
लेकिन, क्या आपको पता है कि इस फ़िल्म की रिलीज पर संकट उत्पन्न हो गया था? इस संकट का कारण वही लोग थे, जिन्हें लुभाने के लिए कमल हासन आज गली-गली में घूम कर कॉन्ग्रेस द्वारा यूपीए शासनकाल में क्राफ्ट किए गए ‘हिन्दू आतंकवाद’ वाले नैरेटिव को आगे बढ़ा रहे हैं। कमल हासन ने विशाल भारद्वाज वाली ग़लती की है। कश्मीर में सेना के कथित अत्याचारों को दिखने वाले विशाल भारद्वाज ने हाल ही में नाथूराम गोडसे को स्वतंत्र भारत का पहला आतंकी बताया था। कमल हासन ने एक तरह से उन्हीं की बातों को दुहराया है। हाँ, तो विश्वरूपम में आतंकियों को मुस्लिमों वाली टोपी पहने दिखाया गया था। इसमें कोई दो राय नहीं कि अफ़ग़ानिस्तान के बैकड्राप में बनी इस फ़िल्म में ये चीज ग़लत नहीं दिखाई गई थी।
विश्वरूपम का ट्रेलर आया। ट्रेलर में ही आतंकियों को मजहब विशेष वाली टोपी पहने गोलियाँ चलाते हुए देखा गया। ये सच्चाई थी। अफ़ग़ानिस्तान के तालिबानी आतंकियों की वेश-भूषा वही होती थी या है, जो एक कट्टरपंथी की होती है। स्कल कैप, टखने तक पजामा और कुर्ता, बिना मूछों वाली दाढ़ी और जबान पर बात-बात पर अल्लाह का नाम। कमल हासन ने ‘हे राम’ में नाथूराम गोडसे का किरदार भी अदा किया था, लेकिन उस वक़्त उनकी फ़िल्म की रिलीज रोकने की धमकी नहीं दी गई थी। ऐसा इसीलिए, क्योंकि पूरा भारत मानता है कि गोडसे एक हत्यारा था। उस पर हत्या का आरोप सिद्ध हुआ था और इसकी सजा उसे मिली थी। लेकिन, मारते समय उसने राम का नाम नहीं लिया था, गाँधीजी ने मरते वक़्त ‘हे राम’ कहा था।
गोडसे का पक्ष जानने के लिए लोग उन्हें और उनके विचारों को पढ़ते हैं, इसमें कोई बुराई नहीं। जब लाशें बिछाने वाले हिटलर की ऑटोबायोग्राफी पढ़ी जाती है तो गोडसे ने तो एक ही हत्या की थी (जिसकी निंदा की जाती है) तो उन्हें पढ़ने में क्या बुराई है। लेकिन हाँ, उन्होंने गाँधी को मारते वक़्त ‘अल्लाहु अकबर’, ‘वाहेगुरु’ या ‘जय श्री राम’ नहीं कहा था। विश्वरूपम की रिलीज रोकने में वही शांतिप्रिय समाज के लोग शामिल थे, जिन्हें इस बात पर आपत्ति थी की फ़िल्म में उन्हें आतंकी दिखाया गया है। कमल हासन ने गोडसे को दिखाया, वे जैसा चाहते थे उसी तरह से गोडसे को प्रदर्शित किया, लेकिन उन्होंने देश छोड़ने की बात विश्वरूपम के समय कही। विश्वरूपम को मद्रास हाई कोर्ट के ऑर्डर के बावजूद समय पर रिलीज नहीं किया जा सका था।
कमल हासन ने उस समय कहा था कि वो तमिलनाडु छोड़ देना चाहते हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने भारत छोड़ने की बात भी कही, वही देश जहाँ वो 1960 से ही अभिनय कर रहे हैं। एक बाल कलाकार के रूप में साठ के दशक से लेकर सुपरस्टार और फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति पाने के बाद भी, कमल हासन को देश छोड़ने की ज़रूरत पड़ गई। क्यों? क्योंकि कमल हासन की राय थी कि वह एक धर्मनिरपेक्ष जगह, राज्य या देश में जाकर बसना चाहते हैं। उन्हें भारत धर्म निरपेक्ष नज़र नहीं आ रहा था क्योंकि 2013 में ऐसे विषय पर 100 करोड़ रुपए से भी अधिक बजट वाली फ़िल्म बनाना एक साहस का कार्य था और उन्होंने लगभग अपनी ज़िंदगी भर की कमाई, मेहनत और अनुभव का इस्तेमाल इसमें कर दिया था। उन्हें कंगाल होने का ख़तरा नज़र आ रहा था। ख़ुद को संभावित आर्थिक संकट को देखते हुए उनके मन में भारत छोड़ने का विचार आया।
कौन लोग थे कमल हासन की इस पीड़ा के पीछे? जब पूरा का पूरा समुदाय विशेष उनके विरोध में खड़ा हो गया था और उन्हें भारत एक सांप्रदायिक राष्ट्र लगने लगा था, उस समय के वो साम्प्रदायिकता फैलाने वाले लोग आज उनके लिए सहानुभूति के पात्र कैसे हो गए? जो देश के सबसे बड़े और पुराने अभिनेताओं में से एक को देश छोड़ने को मज़बूर कर दे, वो समाज होता है सांप्रदायिक। जो सबसे ज्यादा फ़िल्मफेयर अवॉर्ड्स जीतने वाले अभिनेताओं में से एक को देश में डरा कर रख दे, उस समाज को कहते हैं सांप्रदायिक। वह कौन सा समाज था, वो कौन से लोग थे, इसका उत्तर कमल हासन से बेहतर कोई नहीं जानता। कमल हासन ने बाद में अपने बयान पर कायम रहने की बात करते हुए कहा था कि अगर आगे ऐसा कुछ होता है तो वह फिर से देश छोड़ने की सोचेंगे। बस कुछ दिनों के विरोध के कारण कमल हासन को उस समय 60 करोड़ का घाटा हुआ था।
राजनेता कमल हासन को समुदाय विशेष का वोट चाहिए। अभिनेता कमल हासन कहीं गुम हो गया है। उस अभिनेता की फ़िल्म को जब समुदाय विशेष ने रोक दिया था, तब रजनीकांत और जयललिता जैसी शख़्सियतों ने आगे आकर कमल का समर्थन किया था। राजनेता कमल हासन के लिए हिन्दू आतंकवाद एक सच्चाई है, कॉन्ग्रेस का वो नैरेटिव, विशालक भारद्वाज की वह सोच, कमल हासन इन सबके प्रमुख वाहक हो चुके हैं। आतंकवाद क्या है और इसकी परिभाषा क्या है, अगर कमल हासन ये पढ़ लें तो उन्हें भी पता चल जाएगा कि गोडसे कहीं से भी इस परिभाषा में फिट नहीं बैठते। व्यक्तिगत दुश्मनी पाल कर एक हत्या करने वाला अगर आतंकी है तो ‘अल्लाहु अकबर’ बोलकर अब तक हज़ारों लाशें बिछा चुके कौन लोग हैं, ये सवाल हम हर उस व्यक्ति से पूछते हैं जिसे हिन्दू आतंकवाद के अस्तित्व पर विश्वास है।
कमल हासन ने अरवाकुरीचि में ये बात कही। उनके मन में कहीं न कहीं खोट था, क्योंकि अपने इस बयान के बाद उन्होंने जो सफ़ाई दी, उससे साफ़ पता चलता है कि उनकी सोच क्या थी? कमल हासन ने कहा कि वो सिर्फ़ इसीलिए गोडसे को आतंकी नहीं बोल रहे क्योंकि यह एक मजहब विशेष के प्रभाव वाला इलाक़ा है, ऐसा वो गाँधीजी की प्रतिमा को सामने देख कर कह रहे हैं। कमल हासन की इन बातों से ही पता चल जाता है कि उन्होंने गोडसे को आतंकी क्यों कहा। एक हत्या करने वाला व्यक्ति आतंकी है तो गाँधीजी की हत्या भी आज़ादी के 5 महीनों बाद हुई थी। उस दौरान न जाने कितने ख़ून-ख़राबे हुए और कितने ही लोगों की जानें गई। कमल हासन को उन सबके नाम खोजकर लाने चाहिए क्योंकि हत्याएँ उस समय भी हुईं थी और हासन की परिभाषा के अनुसार, वो सभी आतंकी थे। उनकी थ्योरी में यहीं त्रुटि निकल आती है, अगर अपराध और हत्या ही आतंकवाद है तो फिर इस शब्द की ज़रुरत ही क्या थी?
सोशल मीडिया के विशाल वटवृक्ष के नीचे बैठे हुए ट्रोलाचार्य का सर झुका हुआ और नयन अधखुले थे, दृष्टि बाएँ हाथ में स्थित मोबाइल की स्क्रीन पर स्थिर थी। स्क्रीन से आता हुआ प्रकाश उनके मुख पर पड़ता तो वे चन्द्रमा के समान दमक उठते थे। यदा-कदा अनुयायी फ़्लैश सहित छायाचित्र खींचकर उनका प्रकाशाभिषेक करते। अनंत अनुयायी सामने बैठे हुए, ट्रोलाचार्य की अगली गतिविधि की प्रतीक्षा में थे। ट्रोलाचार्य सूत्रपात करते और अनुयायी शृंखला अभिक्रिया में जुट जाते।
ऐसे में ट्रोल की संज्ञा प्राप्त कर किसी लुटियन-मोहिनी द्वारा अभी-अभी ब्लॉक हुए एक ट्रोल ने प्रश्न किया, “हे ट्रोलाचार्य! आज मुझे ट्रोल कहलाने का प्रथम अनुभव हुआ है। अब मैं स्वयं को जानना चाहता हूँ। विस्तारपूर्वक मार्गदर्शन करें कि ट्रोल कौन हैं और इन्हें किस प्रकार पहचाना जाता है। इनका प्रादुर्भाव किस प्रकार हुआ?” ट्रोलाचार्य ने प्रेमपूर्वक कहा, “हे अनुयायी! आपने उत्तम प्रश्न किया है, अब इसके उत्तर का ध्यानपूर्वक श्रवण करो- जब सत्यान्वेषियों के प्रयासों से प्राणियों ने जाना कि स्वधन्य पत्रकार विषवमन करने वाले भयंकर षड्यंत्रकारी हैं।”
“समाज ने स्वयं ही सामाजिक-संचार की व्यवस्था को जन्म दिया। स्वधन्य पत्रकारों के प्रत्येक कथन का परीक्षण होने से उनके अहं पर गंभीर चोट पहुँची। फिर भी असत्य बोलते रहने पर वे और उनके मित्र उपहास का पात्र बने, वे हाहाकार कर उठे। उनका आवरण हटा कर उनकी वैचारिक नग्नता को सामने लाने वालों को उन्होंने ट्रोल की संज्ञा दी। विशेषकर जिसने भी वामपंथ के प्रचारकों के षड्यंत्रों का रहस्योद्घाटन किया वह ट्रोल कहा गया। यह ट्रोलवाद का उदय था। ट्रोल समाज के मार्गदर्शन करने हेतु मैंने यह ट्रोलाचार्य का अवतार लिया है। शृंखला अभिक्रिया ट्रोलवाद का मुख्य लक्षण है।”
“क्या वामपंथियों में कोई ट्रोल नहीं होता ट्रोलाचार्य?”, अनुयायी ट्रोल ने प्रश्न किया। ट्रोलाचार्य ने कहा, “उन्हें स्टैंड-अप-आर्टिस्ट कहा जाता है, और ये विशेष सम्मान प्राप्त करते हैं। लिट्फेस्ट आदि में ससम्मान बुलाए जाते हैं। ये अत्यंत भयानक अपशब्द बोलने वाले व अशिष्ट हो सकते हैं। अश्लीलता ही हास्य है ऐसा मानने वाले स्टैंड-अप-आर्टिस्ट मूलाधार चक्र से ऊपर उठ ही नहीं पाते। इनका सम्पूर्ण जीवन-दर्शन-चिंतन-सृजन मूलाधार चक्र में ही घूमता रहता है। सनातन धार्मिक भावनाओं का उपहास कर ये स्वयं ही स्वयं से आनंदित होते हैं।”
“वामपंथियों द्वारा ट्रोलीकरण की क्रिया को “फ्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन” कहा जाता है जिससे उन्हें किसी भी प्रकार की निम्नस्तर की बात किसी के भी विरुद्ध करने की स्वतंत्रता प्राप्त होती है। लुटियन सुंदरियाँ उनके अपशब्दों पर अट्टहास करती हैं।”
ट्रोल ने पुनः प्रश्न किया, “मुझे एक ट्रोल के रूप में क्या करना चाहिए और मेरे निहित अधिकार और कर्तव्य क्या हैं?” ट्रोलाचार्य ने उत्तर दिया, “ट्रोल करना ही ट्रोल का परम कर्तव्य है। दोहा से दुपाया, चौपाई से चौपाया जीव को ट्रोलित करते रहना चाहिए। कभी कभी कुछ विभूतियाँ लिखे हुए से कम ट्रोल होती हैं ऐसे में उन पर चित्रकला द्वारा ट्रोल करने का विधान है। चित्र अथवा चलचित्र के माध्यम से ट्रोल करने वाले ट्रोल लोक में पूजनीय होते हैं। ये उन विभूतियों को भी ट्रोल करने में सक्षम होते हैं जो मानव भाषा नहीं समझते।”
“थ्रेड में ट्रोल करने वाले अधम प्रकार के विस्तारवादी ट्रोल होते हैं। ये प्रायः लम्बे थ्रेड लिखकर ट्रोल करते हैं। इन्हें एक बार में उठाकर पटकने में आनंद नहीं आता। जब तक दस बारह बार उठाकर पटक नहीं लेते ये शांत नहीं होते। मध्यम कोटि के ट्रोल एक ट्वीट में चेतना शून्य कर देने वाले होते हैं। उत्तम कोटि के ट्रोल एक वाक्य में ही अचेत कर देते हैं और सर्वोत्तम ट्रोल एक शब्द लिखकर ही नासिका लाल कर कर्णछिद्रों से धूम्र-वाष्प निष्कासन की प्रक्रिया का सूत्रपात कर देते हैं।”
अनुयायी ने पूछा, “हे ट्रोलाचार्य! ट्रोलगति क्या है? ट्रोलगति को कौन प्राप्त होते हैं? ट्रोल को ब्लॉक क्यों किया जाता है?” इस पर ट्रोलाचार्य ने कहा, “किसी का उपहास करने पर दण्डात्मक कार्यवाही का पात्र हो जाना ही ट्रोलगति है। न्यायायिक प्रक्रिया के बिना कारावास प्राप्त होना गंभीर ट्रोलगति है, ब्लॉक किया जाना सामान्य ट्रोलगति है। वे तीक्ष्णबुद्धि जो अपनी छोटी सी बात से बड़े बड़े महलों को हिलाने में सक्षम हैं वे ट्रोलगति को प्राप्त होते हैं। हे ट्रोल! ट्रोल को ब्लॉक किये जाने के अनेक कारण हैं। उसमे प्रमुख कारण ट्रोल का किसी विवाद में विजयी होना प्रमुख है।”
“जब ट्रोलित होने वाले के पास कोई उत्तर न रह जाए, या उसकी गलती पकड़ी जाए, अथवा वह हास्य का पात्र बन जाए तो वह ट्रोल को ब्लॉक कर स्वयं को शांति प्रदान करता है। कभी-कभी ट्रोल भावनाओं में बहकर स्वयं को स्टैंड-अप-आर्टिस्ट के सामान समझकर अश्लीलता कर बैठते हैं, जिससे कुपित होकर ट्रोल को ब्लॉक कर दिया जाता है। ट्रोल को शालीनता के साथ रहने का नियम है, अश्लीलता का अधिकार वामपंथ का है अतः उनके पास ही रहने देना चाहिए।”
अनुयायी ने पुनः प्रश्न किया, “अधिट्रोलः कथं कोऽत्र सोशल-मीडियाऽस्मिन् ट्रोलाचार्य?” (सोशल मीडिया पर ट्रोलित होने का अधिकारी कौन है और किसे ट्रोल नहीं करना चाहिए?) ट्रोलाचार्य ने सहज भाव से उत्तर दिया, “ट्रोल किसी को भी किया जा सकता है, कैसे भी किया जा सकता है, सामाजिक मंच पर जो भी है वह बिना भेदभाव के ट्रोलित होने का अधिकारी है। पूर्व दिशा में स्थित पश्चिम बंगाल में ट्रोल करना दुःख का कारण बनता है। पूर्व में रहते हुए भी पश्चिम हुए जा रहे बंगाल में अलग विधि विधान है।”
“ट्रोल करने पर जेल में ठूंस देने वाली शासक का भयानक आतंक है। वह कभी भी किसी भी बात से स्वयं को ट्रोलित जानकर आक्रामक हो उठती है। एक बार ऐसे ही किसी कन्या ने उस शून्यात्मा का परिहास करते हुए चित्र बनाया जिसपर उसे कारावास में डाल दिया गया। पश्चिम बंगाल में न्यायालय भी मुंह में रोशोगुल्ला भर कर नयन मूँद लेते हैं। किसी को छोड़ देना भी ट्रोलधर्म नहीं है किन्तु ऐसे विषादग्रस्त, जीवन से निराश, सदा खिन्न रहने वालों को ट्रोलित करना आत्मघात के समान है।”
अनुयायी- “फिर ट्रोलधर्म का पालन कैसे किया जाए?” ट्रोलाचार्य मुस्कुराए, और तत्काल एक ट्वीट किया जिसमे लिखा था- “दीदी, जय श्रीराम!” शीतल पवन के प्रवाह से वातावरण में आनंद था, पृष्भूमि में झींगुरों का स्वर सुनाई दे रहा था। ट्रोलाचार्य पुनः अपने मोबाइल की स्क्रीन में लीन हो गए।
चंद्रयान, मंगलयान, ‘मिशन शक्ति’, PSLV-C37 से 104 उपग्रह एक बार में ले जाने जैसी सफलताओं बाद भारत ने अंतरिक्ष में अपने दम पर अंतरिक्षयात्री भेजने के लिए कमर कस ली है। साल 2022 में स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूरे होने पर इस मिशन को लॉन्च करने की तैयारी है। बेंगलुरु स्थित भारतीय वायुसेना के एयरोस्पेस आयुर्विज्ञान संस्थान (IAM) ने दो या तीन सदस्यीय अभियान दल के चयन को अंतिम रूप देना शुरू कर दिया है।
उपरोक्त जानकारी सशस्त्र सेना चिकित्सकीय सेवाओं के महानिदेशक (DG-AFMS) लेफ्टिनेंट जनरल बिपिन पुरी ने दी। लेफ्टिनेंट जनरल पुरी सेना के कृत्रिम अंग केंद्र के 70 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में उपस्थित थे, और यह बातें उन्होंने समारोह से इतर टाइम्स ऑफ़ इंडिया से बात करते हुए बताईं। इससे पहले रूसी मिशन के साथ अंतरिक्ष में जाने वाले प्रथम भारतीय स्क्वाड्रन लीडर (तत्कालीन) राकेश शर्मा भी उस समय (1982) में वायुसेना के अधिकारी थे।
IAM और इसरो में हो चुकीं हैं कई बैठकें
अंतरिक्षयात्रियों के चयन को लेकर IAM और इसरो के बीच पिछले कुछ महीनों में कई बैठकें हो चुकीं हैं। बैठकें मुख्यतः अंतरिक्षयात्रियों के चयन में मेडिकल पैमानों के पहलुओं पर स्पष्टता को लेकर हुई हैं। सरकार ने IAM को मिशन में शामिल करने का निर्णय अभियान के लिए उपयुक्त अभ्यर्थियों के चयन के लिए लिया है क्योंकि इसके पास उड़ान और एयरोस्पेस चिकित्सा/शरीरविज्ञान दोनों ही विषयों पर पर्याप्त जानकारी और अनुभव है।
IAM संस्थान के पास विशेषज्ञ शिक्षकीय संकाय भी है, जो एयरोस्पेस मेडिसिन के विभिन्न उपविभागों में सिद्धहस्त हैं। कई अंतरराष्ट्रीय एयरोस्पेस मेडिसिन विशेषज्ञों, मनोविज्ञानियों, एयरोनॉटिकल इंजीनियरों, एविएशन जीवाणु विज्ञानियों आदि के सतत संपर्क में संस्थान रहता है ताकि वर्तमान ट्रेंड्स की उचित समझ विकसित हो सके।
“संस्थान ने कई एयरोस्पेस अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है”, एक वरिष्ठ वायुसेना अधिकारी ने कहा, “जिनमें कई-कई घंटों की लड़ाकू विमानों की उड़ानें भी शामिल हैं।”
सबसे पहले तो यह बात साफ कर देना आवश्यक है कि वेश्यावृति से मुझे कोई समस्या नहीं रही। लोगों के सामने ऐसी परिस्थितियाँ आती हैं, या वो उनमें ढकेल दिए जाते हैं कि उन्हें वो भी करना पड़ता है जो वो करना नहीं चाहते। कुछ के लिए बेहतर विकल्प के अभाव में ऐसा करना उचित जान पड़ता है, कुछ के पास कोई भी विकल्प होता ही नहीं, कुछ लोग (कई देशों में) शायद थोड़े समय में कुछ पैसों के लिए ऐसा करना चाहते हैं। ये मजबूरी हो सकती, विकल्पहीनता हो सकती है, चुनाव हो सकती है।
कारण जो भी हो, उसकी परिणति जैसी भी रही हो, लेकिन जब आप वेश्यालय की ओर रुख़ करते हैं तो आपको पता होता है कि आपको वहाँ क्या मिलेगा। वेश्यालय ईमानदारी से चलता है कि आप वहाँ जो करने जा रहे हैं, वही होगा, न कि आपको जबरदस्ती टूथपेस्ट बेच दिया जाएगा।
ज़्याँ जेने एक फ्रान्सिसी नाटककार हैं जिन्होंने एक नाटक लिखा था ‘ले बालकन’ या ‘द बालकनी’। फ़्रान्स में ‘बालकनी’ शब्द का प्रयोग वेश्यालयों के लिए भी होता है। यह नाटक वेश्यालयों पर आधारित है, लेकिन ये थोड़ा अलग क़िस्म का वेश्यालय है। यहाँ कई तरह के लोग, पावरफुल व्यक्ति आते हैं और अपनी कुंठा को मिटाते हैं। कुंठा कैसे मिटाते हैं? कोई जज बन कर एक चोर को सजा देता है, कोई सेनाधीश बन जाता है, कोई पादरी आदि। ये एक तरह से रोल-प्ले होता है जिसमें आप भीतरी इच्छाओं को नाटकीयता के ज़रिए बाहर निकालते हैं। इसके दूसरे हिस्से में कुछ और होता रहता है, जिससे नाटक के और भी मायने निकल कर आते हैं, लेकिन बीबीसी के कुकृत्यों के लिए इतना ही जानना ज़रूरी है।
बीबीसी, या Big BC, ज़्याँ जेने की इसी बालकनी में फँसा हुआ एक चरित्र सदृश हो गया है। यह मीडिया संस्थान कुंठित है, और यह कुंठा शायद इनके मालिकों द्वारा भारत को अभी भी ग़ुलाम की ही तरह समझने की अभिजात्यता से विकसित होती है। इन्हें लगता है कि ये तो ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन हैं जिनकी मोनेपॉली ऐसी थी कि जो ये लिखते थे, वही सत्य हुआ करता था, तो अब भी जो भी BC या BS करेंगे, वो लोग कान में रेडियो सटा कर सुनेंगे और कहेंगे ‘आह बीबीसी, वाह बीबीसी’।
खैर, भारत में जब से सत्ता परिवर्तन हुआ है, तब से अपनी ज़हर और घृणा को इन्होंने और तेज कर दिया है। हाल ही में इन्होंने एक फर्जी रिसर्च जारी किया था जिसे हमारी टीम ने तथ्यों और तर्कों से इतना बींध दिया कि उन्हें वो पूरी तथाकथित रिसर्च हटानी पड़ी थी। उसके बाद, हमारी टीम ने उनके द्वारा फैलाए गए फेक न्यूज की लिस्ट जारी की तो वो इतनी लम्बी हो गई कि हमने सोचा कि जो फेक न्यूज ही छाप रहा हो, कितने हिस्सों में उसके कुकर्मों को गिनाते रहें! हमने कुछ आर्टिकल लिख कर छोड़ दिया।
साथ ही, बीबीसी की स्थिति अब ऐसी है, खास कर हिन्दी की, कि ये किसी को भी पत्रकार बना देते हैं। योग्यता के लिए पत्रकारिता का अनुभव या ज्ञान नहीं, ‘आप मोदी या भारत से कितना घृणा करते हैं’, का जवाब आपके पास होना चाहिए। यही कारण है कि इन्होंने एक के बाद एक घटिया खबरें लिखीं, बेशर्मी से उसे चलाया और झूठ साबित होने पर माफ़ी नहीं माँगी। इसीलिए, इसे अब Big BC भी कहा जाता है क्योंकि वहाँ खबरें नहीं, BC ही चल रही हैं।
कल आईपीएल फ़ाइनल में मुंबई इंडियन्स की टीम ने चेन्नई को एक रन से हरा दिया। जिसने भी मैच देखा वो जानता है कि ये मैच दोनों में से कोई भी टीम जीत सकती थी, और अधिकतर बार ऐसा लगा कि चेन्नई जीतेगी।
चूँकि ये बीबीसी वाले हैं, और हिन्दी में खबरें बेचने पर उतरे हुए हैं जहाँ इन्हें भारतीय समाचार पोर्टलों से लगातार कम्पटीशन मिल रहा है, तो क्या करेंगे? ऐसे में अपने चमन चिंटुओं पर विश्वास दिखाना जरूरी हो जाता है। फिर, एक खेल के मैच रिपोर्ट की ख़बर इस तरीके से आती है जिसमें किसी भी तरह से मोदी को खींच लिया जाता है।
पत्रकारिता में हेडलाइन से बहुत खेला जाता है। ‘सिंगल कोट्स’ का प्रयोग करते हुए, आप टेक्निकली बच जाते हैं यह कह कर कि आपने जो हेडलाइन लगाया है, वो आपके संस्थान के विचार नहीं बल्कि किसी व्यक्ति के हैं। फिर आप ट्विटर पर जाते हैं, और जहाँ आपके मतलब का ट्वीट दिखता है, जो आपके पूर्वग्रहों पर सटीक बैठता हो, उस चुटकुले को आप हेडलाइन में डाल कर बेच लेते हैं।
किसी अनजान व्यक्ति का ट्वीट, बिना किसी टिप्पणी के लगाना, जो उस आर्टिकल के साथ शेयरिंग के वक्त दिया जाता है, बताता है कि आपकी मंशा क्या है। एक आईपीएल के मैच की रिपोर्ट में मोदी और अम्बानी को घुसाना बताता है कि एडिटर की जगह कोई निहायत ही बेशर्म चिरकुट व्यक्ति बैठा हुआ है जिसे मैच से कुछ नहीं, सस्ती लोकप्रियता से ज़्यादा लेना-देना है।
इस हेडलाइन को बाद में बदल दिया गया, क्योंकि लिंक पर क्लिक करने पर आपको दूसरी हेडलाइन दिखेगी (नीचे तस्वीर में देखें) जो मैच रिपोर्ट जैसी है। लेकिन ट्विटर पर ऐसे शेयर किया है जैसे ये एक रिपोर्ट नहीं, बीबीसी के विचार हों जहाँ यह बताया जा रहा है कि मैच में खिलाड़ियों और टीम का योगदान नहीं था, बल्कि टीम अम्बानी की थी, और राहुल गाँधी कहते हैं कि अम्बानी मोदी का दोस्त है, तो मोदी के कार्यकाल में आखिर अम्बानी की टीम नहीं जीतेगी तो कौन जीतेगा!
BBC हिन्दी का वह ट्वीट जो इन्होंने डिलीट कर दिया।
और, अब तो इन्होंने वो ट्वीट ही डिलीट कर दिया! लेकिन, सोशल मीडिया या इंटरनेट पर जो एक बार लग गया, सो लग गया। ये अब माफ़ी भी नहीं माँगेंगे क्योंकि भारत के ग़ुलाम लोगों की भाषा में ब्रिटेन की किसी बड़ी संस्था ने कुछ लिखा, और गलत लिखा, तो भी क्या! इसके लिए ग़ुलामों से माफ़ी थोड़े माँगेंगे! अरे श्वेत चमड़ी वालों की संस्था है!
ये पत्रकारिता नहीं, ये दोगलापन कहा जा सकता है। मेरे शब्दों के चुनाव पर आपको आपत्ति हो सकती है लेकिन इससे बेहतर शब्द मेरे पास नहीं हैं। ये मेरे निजी विचार हैं जो बीबीसी जैसे घटिया न्यूज पोर्टलों के कारण पूरी पत्रकरिता को ‘प्रेश्या’ या ‘प्रेस्टीट्यूट’ जैसे संबोधनों का शिकार बनाने के कारण उपजे हैं।
बीबीसी को चाहिए कि वो ‘बालकनी’ ही खोल ले। जब पत्रकारिता की जगह ‘रोलप्ले’ ही करना है, तो फिर इतनी टायपिंग की क्या ज़रूरत है। ट्वीट घुसाकर, विचारों जैसे हेडलाइन के साथ, ट्विटर रिएक्शन्स वाली पत्रकारिता ही करनी है, तो वेश्यावृति या सॉफ़्ट पोर्न वाली हेडलाइन से करें, उसमें ज़्यादा हिट्स मिलेंगे।
लेकिन कैसे करेंगे! व्हाइट मेन्स बर्डन है, व्हाइट सुप्रीमैसिज्म का अलग रूप है इनके भीतर। पत्रकारिता के बीकन लाइट हैं ये, पोर्न कैसे बेचेंगे! लेकिन हिट्स भी तो चाहिए। फिर, धूर्त आदमी क्रिकेट की खबरों में मोदी को ले आता है क्योंकि मोदी इनकी दुकान चला देगा।
बीबीसी हिन्दी वालो, विकल्प है तुम्हारे पास: वेश्यावृति की ईमानदारी या पत्रकारिता के नाम पर वैचारिक दोगलापन, चुन लो। प्लीज!
पिछले काफ़ी समय से विपक्ष के लिए एक मुद्दा चर्चा का विषय बना हुआ है, वो मुद्दा है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का साक्षात्कार। ऐसा लग रहा है जैसे उनका साक्षात्कार न होकर कोई षड्यंत्र हो जिसकी हर क़दम पर आलोचना की गई। इन आलोचनाओं में कॉन्ग्रेस और उनके कुछ निष्ठावान मीडियाकर्मी यह आरोप लगाते हैं कि पीएम मोदी के साक्षात्कार में उनसे कठिन सवाल नहीं पूछे जाते, केवल हँसी-ठिठोली होती है, मनोरंजन किया जाता है और उनके मनपसंद व्यंजन पूछे जाते हैं।
हाल ही में, रवीश कुमार ने राहुल गाँधी का साक्षात्कार लिया था। रवीश कुमार लंबे समय से NDTV से जुड़े हुए हैं और अपने टीवी शो में वो अक्सर एक प्रश्न ज़रूर उठाते हैं कि साक्षात्कार के नाम पर पीएम मोदी से कोई कठिन सवाल नहीं पूछता, जबकि वो ख़ुद राहुल गाँधी के प्रति बेहद नरम रवैया अपनाते हैं, जो उनके द्वारा लिए गए साक्षात्कार में स्पष्ट दिखा। इस बात की पुष्टि उन्हीं के प्रशंसक निखिल वागले ने सोशल मीडिया पर की, जिन्होंने उन्हें ‘भक्त’ तक की उपाधि दे डाली।
I find nothing extraordinary about Rahul’s interview by Ravish.This is a kid glove interview in typical Ravish style. Show me one inconvenient or different question. I like Ravish, but we don’t have to praise him for wrong reasons. Journalism doesn’t need Bhakts!
इसी बीच सोशल मीडिया पर एक पुराना वीडियो वायरल हुआ है। इस वीडियो में NDTV का एक पत्रकार अमेठी में राहुल गाँधी के पीछे भागता हुआ दिखाई दे रहा है, जो उनसे एक बेहद मुश्किल सवाल पूछता है कि ‘समोसा का स्वाद कैसा था?’
— Chowkidar Maithun MI (@Being_Humor) May 13, 2019
इस वीडियो में आप देख सकते हैं कि NDTV के उमाशंकर सिंह नामक पत्रकार ने राहुल गाँधी से समोसे के बारे में पूछा तो राहुल ने उनके मुँह में समोसा डाल दिया। मतलब यह कि, ‘समोसे के सवाल पर जवाब में समोसा ही खिला दिया, यानी इस कठिन सवाल का जवाब तो उन्हें नहीं मिला, लेकिन मिला तो क्या मिला केवल समोसा’।
NDTV के हठी पत्रकार को जब अपने इस सवाल का जवाब नहीं मिला तो वो भीड़तंत्र को चीरते हुए राहुल गाँधी की गाड़ी के पास जा पहुँचा और राहुल गाँधी से शिकायती अंदाज़ में पूछा, “आपने जवाब नहीं दिया, समोसा कैसा था?” लेकिन, इस बार पत्रकार महोदय को जवाब मिल जाता है, और राहुल बताते हैं कि हाँ उन्हें समोसा अच्छा लगा।
सवाल पूछना पत्रकार का काम होता है जिसके लिए जिज्ञासु प्रवृति का होना भी आवश्यक है। इसी का प्रमाण NDTV के पत्रकार उमाशंकर ने भी दिया। उन्होंने अपनी जिज्ञासावश राहुल गाँधी से अगला कठिन सवाल पूछा, “आपके पास जलेबियाँ भी थीं, क्या आपको जलेबियाँ पसंद थीं?” इस बार भी सवाल का जवाब पाने में पत्रकार को सफलता मिली।
इसके बाद NDTV के पत्रकार उमाशंकर ने राहुल गाँधी से अपना अगला कठिन सवाल पूछा, “आपने कुछ जलेबी भी खाई, उसका टेस्ट कैसा था?” इसका जवाब भी मिल गया कि जलेबियाँ अच्छी थीं। पत्रकार साहब को तो ये तक मालूम था कि राहुल गाँधी ने जो जलेबियाँ खाई थी, वो गुड़ की बनी हुई थी। भई वाह! मान गए, पत्रकार महोदय की बुद्धि को और उनके ज्ञान को। इसी बुद्धि और ज्ञान का सम्मिश्रण ही है NDTV, जो आए दिन मोदी-विरोधी ख़बरों को प्रचारित और प्रसारित करने में लगा रहता है। जबकि ख़ुद के दामन के दाग उन्हें आज भी नहीं दिखाई देते, जो अनगिनत हैं।
चलिए अब आगे बढ़ते हैं और NDTV के पत्रकार के कुछ और कठिन सवालों पर नज़र डालते हैं, जिनके कठिन सवालों से तो यही लगता है जैसे कि भारत का भविष्य उन समोसे और जलेबियों पर ही निर्भर करता हो, पत्रकार साहब राहुल से आगे पूछते हैं कि ‘क्या आप अपने स्वास्थ्य के बारे में चिंतित नहीं हैं’? इस पर राहुल की एक स्माइल से ही पत्रकार को संतोष करना पड़ा।
हाल ही में, राहुल गाँधी का एक और पुराना वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें उन्होंने बड़े धूमधाम से गंगा आरती की थी और उसके बाद NDTV के एक पत्रकार ने उनसे पूछा कि ‘क्या उन्होंने प्रार्थना की, तो राहुल ने जवाब दिया, “मुझे नहीं पता, मुझे यहाँ आने के लिए कहा गया था, इसलिए मैं यहाँ हूँ।”
वहीं, हम प्रधानमंत्री मोदी की बात करें तो उनसे राजनीतिक और गै़र-राजनीतिक दोनों तरह के साक्षात्कार लिए गए। हाल में तो लगभग हर बड़े मीडिया संस्थान ने उनका साक्षात्कार लिया। लेकिन अगर हम कठिन सवालों भरे साक्षात्कार का रुख़ करें तो न्यूज़ एजेंसी ANI की पत्रकार स्मिता प्रकाश ने पीएम मोदी से एक घंटे से भी अधिक समय तक एनडीए सरकार की आर्थिक नीतियों, विमुद्रीकरण, जीएसटी और अन्य सभी चुनौतियों से जुड़े सवाल पूछे थे, जिन्हें सरल तो नहीं कहा जा सकता था। वहीं राहुल गाँधी ने इस साक्षात्कार को “व्यवहारिकता वाली पत्रकारिता” का नाम दिया था।
ऐसे में राहुल गाँधी ख़ुद से पूछे गए सवालों को किस श्रेणी में रखेंगे, उसकी न तो उन्हें कोई समझ है और न ही वो इतने परिपक्व हैं कि इन पत्रकारों को सही पत्रकारिता से अवगत करा सकें। अच्छा यही होगा कि देश की जनता ख़ुद ‘कठिन सवाल’ और ‘सरल सवालों’ के बीच के अंतर को समझ जाए, जिससे विकास की इस राह में वो अपना सकारात्मक योगदान दे सकें।