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सऊदी गया था क़ुरान पढ़ाने, बना दिया गया सफाईकर्मी, भारत लौटकर सुषमा को कहा शुक्रिया

हैदराबाद के रहने वाले एक क़ुरान टीचर ने सऊदी से लौटने के बाद भारतीय दूतावास के साथ विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को धन्यवाद दिया है। हाफिज मोहम्मद बहाउद्दीन नाम के इस शख्स ने बताया कि उन्हें एक एजेंट ने सऊदी के किसी दूरदराज क्षेत्र में भेज दिया था जहाँ उनसे सफाई का काम कराया जाता था।

मीडिया खबरों के मुताबिक हाफ़िज ने बताया कि वे वहाँ काम के दौरान बीमार हो गए थे, लेकिन उनके मालिक ने उन्हें अस्पताल ले जाने से इंकार कर दिया। हाफिज़ का कहना है कि सऊदी से उन्हें भारतीय दूतावास के अधिकारियों ने बचाया है। अधिकारियों ने उनका हैदराबाद का टिकट जारी किया, इसलिए वह अधिकारियों के साथ विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को शुक्रिया अदा करना चाहते हैं।

अपने बारे में बताते हुए हाफ़िज ने कहा कि वो हैदराबाद में एक कुरान टीचर के रूप में काम करते थे। इस बीच एक एजेंट ने उनके सामने सऊदी अरब की अल बहाह मस्जिद में काम करने का प्रस्ताव रखा। एजेंट ने उन्हें बताया कि उन्हें इस काम के लिए 95 हजार रुपए मिलेंगे।

हाफिज द्वारा प्रस्ताव स्वीकारने के बाद उन्हें 21 मार्च को सऊदी के अल बहाह शहर भेज दिया गया। वहाँ पहुँचने के बाद उन्हें काफी दूर भेजा गया, जहाँ उनसे क्लीनर का काम कराया जाने लगा। हाफिज बताते हैं कि वहाँ उनका मालिक उनसे दिन-रात काम करवाता था। वहाँ कुछ दिन काम करने के बाद उनकी तबियत खराब होने लगी लेकिन उनके मालिक ने उन्हें अस्पताल ले जाने से इंकार कर दिया।

इसके बाद हाफ़िज ने अपनी हालत के बारे में अपनी पत्नी को बताया और पत्नी ने विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को पत्र लिखकर शिकायत की। हाफ़िज बताते हैं कि उनकी पत्नी ने भारतीय दूतावास से उन्हें वहाँ से छुड़ाने की अपील की थी, जिसके बाद उन्हे भारत लाने का इंतजाम किया गया। हाफिज अब भारत में हैं और अपने परिवार से मिलकर काफ़ी खुश हैं।

अल्पसंख्यक कॉलेज में बुर्क़े पर प्रतिबंध लगाने पर मिली जान से मारने की धमकी

सुरक्षा कारणों के मद्देनज़र केरल के एक अल्पसंख्यक कॉलेज द्वारा कॉलेज में बुर्क़ा पहनकर आने पर प्रतिबंध लगाने का निर्णय लिया गया था। इस प्रतिबंध पर कई मुस्लिम संगठनों ने विरोध जताया था। इस संदर्भ में एक और खबर सामने आई है कि मुस्लिम एजुकेशन सोसायटी (MES) के अध्यक्ष पी ए फ़ज़ल गफ़ूर को मारने की धमकी मिली है। इस बाबत उन्होंने केरल के कोझिकोड में पुलिस स्टेशन में शिक़ायत दर्ज की है।

श्री लंका में बुर्क़े पर प्रतिबंध लगाने की बात चल ही रही थी कि इसी बीच केरल के एक अल्पसंख्यक कॉलेज ने बुर्क़ा पहनकर आने पर पाबंदी लगाने से संबंधित सर्कुलर जारी किया गया था। ख़बर के अनुसार, केरल के मलप्पुरम में चल रहे इस अल्पसंख्यक कॉलेज में बुर्के पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। यह कॉलेज मुस्लिम एजुकेशन सोसायटी द्वारा संचालित है। इस सर्कुलर के ख़िलाफ़ कुछ स्थानीय संगठनों ने आपत्ति दर्ज की।

ऐसा माना जा रहा है कि लोकसभा चुनाव के मद्देनज़र यह फ़ैसला लिया गया है, इसलिए इसका विरोध किया जा रहा है। ज्ञात हो कि अभी कुछ रोज पहले श्री लंका में आतंकी हमला हुआ था जिसमें 300 से अधिक लोगों के मारे जाने की ख़बर थी और लगभर 500 लोग घायल हुए थे। वहाँ की सरकार ने पहचान छिपाने वाले हर तरह के कपड़ों पर प्रतिबंध लगाने का फ़ैसला लिया था।

इसी के मद्देनज़र शिवसेना ने अपने अपने मुखपत्र ‘सामना’ में बाक़ायदा संपादकीय लेख के माध्यम से प्रधानमंत्री मोदी से भारत में बुर्क़े पर प्रतिबंध लगाने की माँग की थी। शिवसेना की इस माँग का समर्थन भोपाल से बीजेपी उम्मीदवार साध्वी प्रज्ञा ने भी किया था, लेकिन सरकार ने इस पर कोई गंभीरता न दिखाते हुए इस माँग को ख़ारिज करना उचित समझा। बीजेपी प्रवक्ता जीवीएल नरसिम्हा राव ने ‘सामना’ के संपादकीय पर अपनी प्रतिक्रिया दर्ज करते हुए कहा कि इस तरह के प्रतिबंध की आवश्यकता नहीं है। बीजेपी के अलावा एनडीए के ही एक अन्य सहयोगी रामदास आठवले ने शिवसेना की माँग को एक सिरे से ख़ारिज किया। उनका कहना था कि यह एक परंपरा का हिस्सा है, जिस पर प्रतिबंध लगाने की ज़रूरत नहीं है।

शिवसेना की माँग पर ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने कड़ा ऐतराज़ जताया। उन्होंने कहा कि यह हमारा मानवाधिकार है जोकि संविधान में निहित है। सभी पर हिन्दुत्व नहीं लागू किया जा सकता। हो सकता है कि कल को यह कह दिया जाए कि आपके चेहरे पर दाढ़ी ठीक नहीं है, टोपी मत पहनिए।

‘BJP ने कम से कम हिम्मत तो दिखाई’: ट्रिपल तलाक पर मुस्लिम महिलाओं ने कहा

आम चुनावों में एक ओर जहाँ कॉन्ग्रेस अल्पसंख्यक वोट बैंक को अपनी सबसे बड़ी ताकत मानकर चल रही है और कथित अल्पसंख्यक तुष्टिकरण को अपना सबसे बड़ा हथियार मानते हुए इस आबादी के मतों पर अपना अधिकार मानती आई है वहीं, मोदी सरकार के इन 4 सालों में जमीनी हकीकत कुछ और ही कहती नजर आ रही हैं।

लखनऊ की रहने वाली एक 33 साल की एक समुदाय विशेष की ही महिला ने तीन तलाक देने की वजह से अपने पति के खिलाफ कोर्ट केस किया था। यह पहला मौका था, जब उसने अपने परिवार की इच्छा के खिलाफ कोई फैसला लिया था। ब्यूटीशियन का काम करने वाली इस महिला का कहना है कि वह एक बार फिर परिवार की इच्छा के खिलाफ कदम उठाने वाली है और वह 6 मई को भारतीय जनता पार्टी को वोट देगी।

गत वर्ष कॉन्ग्रेस के लिए प्रचार करने वाली इस महिला ने इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में कहा, “मोदी सरकार ने तीन तलाक की प्रथा के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत दिखाई है। कोई दूसरी पार्टी तो इस बारे में बात भी नहीं कर रही।”

2014 के चुनाव में कॉन्ग्रेस के लिए किया था प्रचार

2014 में इस महिला को उसके पति ने बिना कोई कारण बताए शादी के महज 22 दिन बाद तलाक दे दिया था। महिला के मुताबिक, उसने पिछले चुनाव में कॉन्ग्रेस की रीता बहुगुणा जोशी के लिए प्रचार किया था। महिला ने कॉन्ग्रेस पर सवाल उठाते हुए कहा, “उन्होंने हमारे लिए क्या किया? बीजेपी ने कम से कम हमारी खराब स्थिति को लोगों के सामने रखा। मोदी सरकार ने पेंशन स्कीम से लेकर LPG कनेक्शन तक, हमारे लिए बहुत कुछ किया है।” महिला ने अपने इंटरव्यू में कहा, “मैंने पढ़ा है कि मोदी सरकार ने क्या किया है। मैं जरूर उनको ही वोट दूँगी।”

ट्रिपल तलाक को लेकर CM योगी आदित्यनाथ से टि्वटर पर मदद माँगी थी मदद

इस महिला की तरह ही 26 साल की निशात फातिमा ने भी ट्रिपल तलाक बिल की वजह से इस बार बीजेपी को वोट देने का मन बनाया है। दो बच्चों की मां निशात को शादी के 5 बरस बाद उनके पति से फोन पर तीन तलाक दे दिया था। निशात ने यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ से टि्वटर पर मदद माँगी थी। वह बीजेपी की ओर से तीन तलाक पर कराए गए सेमिनार में भी मौजूद रही हैं। इस कार्यक्रम में गवर्नर राम नाइक भी मौजूद थे। बता दें कि यूपी में कम से कम 20% आबादी मुस्लिमों की है।

हालाँकि, इन दो महिलाओं के उलट इस समुदाय की कई अन्य महिलाएँ ऐसी भी हैं, जिन्हें ट्रिपल तलाक या तलाक-ए-बिद्दत की प्रथा तक की भी जानकारी नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, जब उन्होंने इन महिलाओं से इससे जुड़े सवालों पर जब बात की तो वो नजरें फेर लेती हैं या फिर बहस का टॉपिक बदल देती हैं। जो बात करने के लिए तैयार भी हैं, उनके मुताबिक, उन्हें पता ही नहीं कि सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 2018 में इस प्रथा पर रोक लगा दी थी। इनमें से कुछ ने बीजेपी पर धार्मिक मामलों में दखलंदाजी का आरोप भी लगाया। 23 साल की फरजाना अहमद का कहना है कि मोदी सरकार अपने फायदे के लिए इस मुद्दे का राजनीतिकरण कर रही है।

अखिलेश यादव ने दिया था लैपटॉप, सपा को देंगे वोट

हालाँकि, कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्होंने वोट देने के लिए मोदी सरकार द्वारा किए गए काम को ही अकेला आधार बनाने से इंकार करते हुए कहा, “ट्रिपल तलाक को अपराध के दायरे में लाने का क्या फायदा, जब पति मेरे साथ रहना ही नहीं चाहता। क्या कानून के डर से उसे मेरे साथ रहने के लिए मजबूर करने से मकसद हल होगा?” फरजाना शिक्षा और स्कॉलरशिप को चुनावी मुद्दा मानते हुए आरोप लगाती हैं कि वर्तमान सरकार सिर्फ हिंदू और ‘मजहब’ वालों की लड़ाई पर बातें करती है। पूर्व की अखिलेश यादव सरकार द्वारा लैपटॉप दिए जाने का जिक्र करते हुए वह कहती हैं कि वह सपा को वोट देंगी।

वहीं, डालीगंज की रहने वालीं 60 साल की सूफिया रहमान कहती हैं, “हम कौन होते हैं मियाँ-बीवी के बीच में दखल दे कर, किसी को सजा देने वाले।” लखनऊ की सामाजिक कार्यकर्ता ताहिरा हुसैन का मानना है कि बीजेपी इस संवेदनशील मुद्दे का गलत इस्तेमाल कर रही है और इस पर बिल लाने से पहले समुदाय की राय नहीं ली गई। ताहिरा ही नहीं, रिटायर्ड आईआरएस अफसर परवीन तल्हा और ऑल इंडिया मुस्लिम वुमन पर्सनल लॉ बोर्ड की डायरेक्टर शाइस्ता अंबर भी मानती हैं कि बीजेपी को समुदाय विशेष की कोई परवाह नहीं है।

‘काशी’ पर लिखा गया साहित्य: काशीनाथ सिंह के अलावा भी है बहुत कुछ

अभी चुनावों के कुछ चरण बाकी हैं, और रह-रह के वाराणसी का ज़िक्र आ जाता है। जब भी ऐसा ज़िक्र होता है तो मुझे लगता है कि बनारस बड़ी अजीब जगह होगी। अजीब इसलिए कि जब यहाँ से चुनाव लड़ने की बात चली तो मैदान में एक तो भगोड़ा सिपाही उतरा। दाल के मनमोहनी दौर के बाद से ही हम कहते हैं कि दाल फ्राई के लिए रोने वाली कौमें जंग नहीं लड़ा करती मियाँ! और ये भगोड़ा दाल के लिए ही भागा था! दूसरी जो घोषित सूरमा थी वो पहले भगोड़ी नहीं थी, लेकिन वाराणसी जैसे पुराने शहर और विपक्षी जैसे पुराने राजनीतिज्ञ के लिए शायद उन्हें अपनी नई नाक दाँव पर लगाना उचित नहीं लगा। वो बाद में भगोड़ी हो गईं।

किताबों में रुचि होने की वजह से हमें वाराणसी के साथ-साथ ‘काशी का अस्सी’ भी याद आ जाती है। एक वामी मजहब के लेखक की इस किताब को पढ़ने के बाद शायद ही कोई उर्दू भाषा से प्रेरित गाली होगी, जिसे सीखना बाकी रह जाता होगा। जी हाँ उर्दू गालियों की ज़बान है, उसके इस्तेमाल के बिना गालियाँ देना मुश्किल होगा। यकीन ना हो तो सोचकर देख लीजिये कि ‘मादर’ लफ़्ज कौन सी जबान का लगता है। वैसे तो बिहार-यूपी के इलाकों में ये अनकहा सा नियम चलता है कि स्त्रियाँ या बच्चे-बुजुर्ग अगर आसपास से गुजरते दिख जाएँ तो भाषा तुरंत संयमित हो जाती है। पता नहीं क्यों, वामी मजहब के लेखक ने ‘काशी का अस्सी’ में इस सांस्कृतिक पक्ष पर ध्यान नहीं दिया और सबको भाषाई तौर पर उच्छृंखल ही दर्शाया है।

वाराणसी के ज़िक्र पर और कौन सी किताबें याद आती हैं? हिन्दी में भी वाराणसी को पृष्ठभूमि बनाकर लिखी गई किताबों की कमी नहीं है। समस्या है हिन्दी साहित्य की गिरोहबाजी। साहित्यिक गिरोहों ने कभी अपने विरोधी विचारों को पनपने नहीं दिया। उन्हें अच्छा या बुरा कहना तो दूर, उनके जिक्र तक से परहेज रखा। अछूत घोषित कर दिए गए ऐसे साहित्यकारों की कृतियाँ हैं तो, मगर आमतौर पर उनके बारे में कुछ भी कहा-सुना नहीं जाता। उदाहरण के तौर पर अगर आप शिवप्रसाद शर्मा की ‘वैश्वानर’ को इन्टरनेट पर ढूंढें तो शायद ही आपको कोई समीक्षा मिल पाएगी। कुछ लोग सोच सकते हैं कि 1928 में जन्मे और 1998 में दिवंगत हो गए लेखक की कृतियों पर समीक्षा का इन्टरनेट पर न होना आश्चर्य का विषय क्यों होगा?

अब आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के बारे में सोचिये। ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ जैसी कृतियों के रचनाकार आचार्य खासे प्रसिद्ध भी थे और काफी पुराने दौर के भी थे। वो शिक्षक भी थे और उनके दो शिष्य काफी प्रसिद्ध रहे हैं। उनके एक शिष्य थे वामी नामवर सिंह। उनकी समीक्षाओं ने कई लेखक बनाए और बिगाड़े। निर्मल वर्मा को कथाकार और गजानन माधव मुक्तिबोध को कवि के तौर पर स्थापित करने वाले भी नामवर सिंह ही थे। उसी आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के दूसरे प्रसिद्ध शिष्य थे शिवप्रसाद सिंह। संभवतः ‘गली आगे मुड़ती है’ और ‘नीला चाँद’ जैसी रचनाओं के लिए आपने इनका नाम सुना होगा। ये दोनों उपन्यास भी वाराणसी की पृष्ठभूमि पर ही लिखे हुए उपन्यास हैं।

कभी-कभी उनकी ‘अलग अलग वैतरणी’ की तुलना आंचलिक उपन्यासों के कीर्तिमान ‘रागदरबारी’ से भी होती है। हरिवंश राय बच्चन मानते थे कि ‘रागदरबारी’ का शिवपालगंज और ‘अलग-अलग वैतरणी’ का करैता दोनों एक ही हैं। शिवप्रसाद सिंह ने काशी या वाराणसी पर दो नहीं बल्कि तीन किताबें लिखी थीं, जिन्हें वो काशी-त्रयी भी कहते थे। इस त्रयी का पहला उपन्यास है ‘वैश्वानर’, जिसका शाब्दिक अर्थ अग्नि या आग होता है। वो आग जिसे वैदिक मान्यताओं में स्वयं भी पवित्र माना जाता है, और ये भी माना जाता है कि ये जिसे छुएगी उसे भी पवित्र कर देती है। ये मुख्यतः धन्वन्तरि नाम के एक वैद्य की कहानी के साथ-साथ चलता उपन्यास है।

उपन्यास की कथा के मुताबिक सरस्वती नदी के सूखने के काल में कुछ आर्यजन गंगा और वरुणा नदी के संगम के क्षेत्र में आकर बस जाते हैं। इस शाखा के लोगों के प्रमुख धन्वन्तरि हैं और अग्नि यानी वैश्वानर इस शाखा के कुलदेवता हैं। यहीं वाराणसी में एक महामारी फैल जाती है और वैद्य धन्वन्तरि इस रोग का निदान ढूँढने में जुटे होते हैं। जब तक वो बीमारी से निदान पाते, तब तक हैहयवंशी सहस्त्रार्जुन काशी पर कब्जा जमाने की सोचने लगता है। यहाँ से बूढ़े धन्वन्तरि के परपोते की भूमिका शुरू हो जाती है। अपनी छोटी सी सेना के बल पर वो कैसे
सहस्त्रार्जुन से मुकाबला करेगा, ये इस पौराणिक उपन्यास का आधार बन जाता है। कह सकते हैं कि इसमें दो कथाएँ मिली हुई हैं। एक करुणा दर्शाती है तो दूसरी शौर्य।

वैश्वानर काफी मोटी सी किताब है, इसलिए इसे पढ़ने में समय लगेगा। मेरे खयाल से ये किताब रोचक है, इसके मोटे होने से डरने की जरुरत नहीं है। इसमें वेदों के कई संस्कृत वाक्य हैं, लेकिन उनके साथ ही उनका अर्थ मिल जाएगा, इसलिए कोई हिस्सा समझ नहीं आया, ऐसी शिकायत भी नहीं रहती। अगर कहीं मदालसा का नाम सुना हो, तो वो इस किताब की नायिका है, यानि धन्वन्तरि के परपोते प्रतर्दन की प्रेयसी। उसके होने से उपन्यास में नायिका की कमी या प्रेम का ना होना जैसी शिकायत भी जाती रहती है। 1996 में प्रकाशित ये उपन्यास कम चर्चा में क्यों है, हमें मालूम नहीं। बाकी काशी के बारे में कथेतर के बदले कथा ढूँढने निकलें तो इसे भी देखिएगा। ऐतिहासिक उपन्यासों में रुचि के लिए तो देखा ही जा सकता है।

सीरियल ब्लास्ट के आत्मघाती हमलावरों ने कश्मीर में ली थी ट्रेनिंग: श्री लंका सेना प्रमुख

श्री लंका में ईस्टर संडे के मौके पर चर्च और होटलों में हुए सिलसिलेवार धमाकों को लेकर एक बड़ा खुलासा हुआ है। श्रीलंका सेना के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल महेश सेनानायक ने कहा है कि 21 अप्रैल को हुए बम धमाकों को अंजाम देने वाले कुछ हमलावरों ने कश्मीर और केरल की यात्रा की थी। उन्होंने आशंका जताई है कि हो सकता है कि वो लोग वहाँ पर आतंकी ट्रेनिंग लेने के लिए गए होंगे। बता दें कि, श्री लंका में हुए बम धमाकों की जिम्मेदारी आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट ने ली थी।

श्रीलंका के सेना प्रमुख ऐसे पहले वरिष्ठ अधिकारी हैं जिन्होंने इस बात की पुष्टि की है कि ईस्टर के मौके पर धमाकों को अंजाम देने वाले आतंकियों ने भारत की यात्रा की थी। सेना प्रमुख ने कहा कि उनके पास मौजूद जानकारी के अनुसार, हमालवरों ने भारत के बेंगलुरु, कश्मीर और केरल की यात्रा की थी। वहीं जब उनसे इस यात्रा के पीछे के उद्देश्य के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि यह किसी तरह के प्रशिक्षण के लिए या देश के बाहर मौजूद संगठनों के साथ लिंक स्थापित करने के लिए की गई यात्रा हो सकती थी। इस मामले को लेकर केरल और तमिलनाडु के कुछ हिस्सों में राष्ट्रीय जाँच एजेंसी एनआईए ने छापे मारे। इस दौरान कुछ लोगों को इस्लामिक स्टेट के साथ लिंक होने के संदेह में हिरासत में लिया गया।

भारतीय गृह मंत्रालय की तरफ से श्री लंका के सेना प्रमुख के बयान पर अभी तक किसी तरह की कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। मगर सुरक्षा प्रतिष्ठान के एक अधिकारी का कहना है, “श्री लंका ने हमारे साथ इस तरह की कोई जानकारी साझा नहीं की है। अहम बात यह है कि श्रीलंका सुरक्षा एजेंसियों ने खुद जाँच के बाद इससे इनकार कर दिया था।”

भारतीय अधिकारियों का मानना है कि इस्लामिक उपदेशक मौलवी बिन हाशिम ने भारत की यात्रा की थी। हाशिम को श्री लंका धमाकों का मुख्य साजिशकर्ता माना जा रहा है। वो श्री लंका में नैशनल तौहीद जमात (एनटीजे) का नेता था। हालाँकि भारतीय अधिकारियों ने हाशिम की भारत यात्रा के बारे में जानकारी देने से इनकार कर दिया, लेकिन एक अधिकारी का कहना है कि हाशिम शुरुआत में तमिलनाडु तौहीद जमात (टीएनटीजे) के साथ जुड़ा था और इस संस्था का आतंकी गतिविधियों में कोई हाथ नहीं था। लेकिन फिर बाद में हाशिम ने टीएनटीजे को छोड़कर नैशनल तौहीद जमात की स्थापना की थी। जहाँ उसने इस्लाम के हिंसक रूप का प्रचार करना शुरू कर दिया।

‘रेपिस्ट’ है पाकिस्तानी फ़ौज: बलात्कार करने घुसे फौजी को लड़की ने मारी गोली

पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा इलाके में पड़ने वाले मोहमंद जिले में एक लड़की ने पाकिस्तानी फौजी को गोली मार दी। खबरों के मुताबिक वो फौजी और उसका एक साथी महिलाओं का यौन उत्पीड़न करने के इरादे से जबरन घर में घुस आए थे।

पत्रकार ताहा सिद्दीकी के मुताबिक, पाकिस्तानी फौजियों ने देर रात उस घर में घुसने की कोशिश की जिसमें औरतों के अलावा कोई नहीं था। घर के सभी पुरुष रोजगार के लिए दूसरे शहर गए हुए थे।

घर में रहने वाली महिला ने आरोप लगाया कि फौजी घर में घुसने के बाद उनका यौन शोषण करने का प्रयास करने लगे। इस बीच एक लड़की ने बंदूक निकाली और उनमें से एक को मार दिया। ये ‘मोहमंद राइफल्स’ के फौजी थे जो पाकिस्तानी फ़ौज का एक हिस्सा है।

ऐसा भी नहीं था कि वहाँ पर किसी तरह के सर्च ऑपरेशन तहत ये फौजी घर में घुसे हों, क्योंकि वहाँ के स्थानीय प्रशासन ने यह साफ़ कर दिया हैं कि उस क्षेत्र में ऐसी कोई गतिविधि ही नहीं हुई है।

इस मामले को देखते हुए वहाँ के स्थानीय लोगों ने पीड़ितों के लिए न्याय की माँग की है। बता दें कि इस तरह के आरोप पाकिस्तानी फौज पर पहले भी लग चुके हैं लेकिन उन पर आवाज नहीं उठी, लेकिन अब वहाँ के लोगों ने तय किया कि वो पाकिस्तान फौजियों के इस रवैये पर चुप नहीं रहेंगे। इससे पहले वजीरिस्तान प्रांत में भी एक ऐसा मामला सामने आ चुका है।

मोहम्मद फैज को लेकर NIA ने अमरोहा में की छापेमारी, देर रात तक जुटाए साक्ष्य

दिल्ली से गिरफ़्तार हुए संदिग्ध आतंकी मोहम्मद फ़ैज़ को लेकर NIA की टीम गुरुवार (मई 2, 2019) को अमरोहा में सैदपुर इम्मा गाँव पहुँची। यहाँ NIA की टीम आधी रात तक सबूत जुटाने में लगी रही। इस दौरान टीम फैज को लेकर पूर्व में पकड़े गए दो संदिग्ध आतंकी सईद और रईस की दुकान पर भी पहुँची। यहाँ पूछताछ के दौरान फैज की फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी की गई।

अमरोहा पहुँचकर सबसे पहले टीम ने मदरसा जामा मस्जिद में फैज़ की निशानदेही पर सबूत जुटाए, क्योंकि जाँच में फैज़ ने बताया था कि कुछ दिन पहले आतंकी संगठन हरकत-उल-हर्ब-ए-इस्लाम के मुखिया के बुलावे पर वह अपने दो साथियों के साथ अमरोहा आया था और इस दौरान वो जामा मस्जिद में ठहरा था।

जाँच के दौरान टीम ने प्रबंधन समिति से बात करने के साथ वहाँ के रिकॉर्ड को भी चेक किया। इसके बाद उसे मुफ़्ती सुहैल के घर ले जाया गया और बाद में टीम ने मुहल्ला दरबार स्थित उसके ससुराल पर भी छापा मारा। टीम ने इन सब जगह साक्ष्य जुटाए। देर रात होने के कारण टीम नगर कोतवाली में ही ठहरी।

बता दें कि 20 अप्रैल को बांसखेड़ी गाँव के निवासी मौलाना गुफरान की गिरफ्तारी के बाद 9 दिन के भीतर NIA ने अमरोहा में दूसरी बार छापेमारी की है। गुफरान को पाँच दिन की रिमांड पर लिया गया। शुक्रवार (मई 4, 2019) शाम उसकी रिमांड खत्म हो गई परंतु मोहम्मद फैज अभी भी एनआइए की गिरफ्त में है।

इससे पहले पिछले साल 26 दिसंबर को NIA ने अमरोहा में छापा मारकर आतंकी संगठन हरकत-उल-हर्ब-ए-इस्लाम के कथित सरगना मुफ्ती सुहैल के साथ दो सहे भाईयों सईद व रईस तथा मुहल्ला पचदरा के निवासी और आटो चालक इरशाद को भी गिरफ्तार किया था।

बिहार की बच्चियों का कोई माय-बाप नहीं: बलात्कार से हत्या तक सिर्फ़ एक चुप्पी है

मेरे मित्र प्रवीण जी ने लिखा कि बिहार के इस मुज़फ़्फ़रपुर बालिका शेल्टर होम कांड पर सारे मीडिया वाले चुप हैं। उन्होंने मुझे भी कोसा कि मैंने एक एडिटर के तौर पर क्या किया, मैं इस चुप्पी का हिस्सा क्यों हूँ जबकि मैं बिहार का हूँ और इस स्थिति में हूँ कि दस लोग मेरी बात सुन और पढ़ सकें। आख़िर ये ख़बर मुझ तक ख़बर बन कर ही क्यों पहुँची वो भी तब जब सीबीआई ने इस पर कुछ किया।

ये सारी बातें सही हैं। कई बार कुछ चीज़ें इतनी आम हो जाती हैं कि एक पत्रकार के रूप में आपकी संवेदनाएँ या तो मर जाती हैं, या कहीं खो जाती हैं क्योंकि आपको हर आतंकी हमले के बाद लिखना होता है कि कितने वीरगति को प्राप्त हुए; आपको हर बलात्कार की ख़बर पर उस कहानी को दोहराना होता है जो आप नहीं चाहते; आपको हर ऐसे शेल्टर होम कांड पर, चाहे देवरिया हो या मुज़फ़्फ़रपुर, उन बच्चियों की चीख़ को दबा कर उनकी कहानी कहनी होती है। पेशे की यह मजबूरी है जिससे हर पत्रकार का सामना होता रहता है।

ब्रजेश ठाकुर की मुस्कुराहट आपको बहुत कुछ कहती है। ब्रजेश ठाकुर इसी मुज़फ़्फ़रपुर शेल्टर होम, या बालिका आसरा गृह, का सर्वेसर्वा है। पुरानी ख़बरों के अनुसार, मई 2018 में इस जगह से बहुत बड़ी ख़बर सामने आई जिसमें वहाँ की 42 बच्चियों में से 34 के साथ सेक्सुअल अब्यूज, यानी यौन शोषण, मेडिकली कन्फर्म हुआ। आज की ख़बर है कि जो 11 बच्चियाँ गायब थीं, उनकी शायद हत्या कर दी गई हो।

आप सोचिए कि 11 एक संख्या नहीं है। वो भले ही अनाथ हों, या घर से गायब कर दी गई हों, या उनके परिवार वालों से किसी भी ग़ैरक़ानूनी तरीके से दूर कर दी गई हों, इन बच्चियों के जीवन की भी अहमियत है। अहमियत इसलिए है कि सरकारों की एक बुनियादी ज़िम्मेदारी होती है राज्य या देश के नागरिकों को एक बेहतर जीवन प्रदान करना। इन मौतों की ज़िम्मेदारी भी उन्हीं की है।

लालू और राबड़ी के दौर को तो हर बिहारी अनंत काल तक जंगलराज का पर्याय कहता रहेगा, लेकिन हमने नीतीश के भी पंद्रह साल देख लिए। एक बिहारी के तौर पर अगर क़ानून-व्यवस्था की बात की जाए तो बहुत ज़्यादा अंतर नहीं आया है। भले ही राजनैतिक हत्याओं का सिलसिला थम गया हो (हालाँकि जब लालू के साथ गठबंधन था तो क़रीब 578 लोगों की हत्या सिर्फ़ पहले दो महीने में हुई थी), और अपहरण का संगठित रोज़गार ख़त्म हो चुका हो, लेकिन अपराधों में कोई बड़ी कमी तो नहीं आई है। सुशासन का एक बड़ा हिस्सा क़ानून-व्यवस्था है, जिसमें नीतीश पूरी तरह से विफल रहे हैं।

आख़िर ब्रजेश ठाकुर जैसे लोग पुलिस की गिरफ़्त में भी मुस्कुराते क्यों हैं? ये मुस्कुराहट पावर के क़रीब होने की गर्मी से आती है। यूँ तो इस कांड में किसी भी बड़े नेता का नाम नहीं आया है, लेकिन जिस तरह की चुप्पी छाई रही है, संभव है कि इसके तार बिहार के बड़े नामों से जुड़े हों। इन नामों में नेता से लेकर तीनों स्तम्भों के वफ़ादार शामिल हो सकते हैं। अगर ऐसा नहीं है तो फिर इतने बड़े कांड पर चुप्पी क्यों है? इस पर मीडिया स्टूडियो में चर्चा क्यों नहीं हो रही?

अगर नीतीश भाजपा का क़रीबी है तो भाजपा-विरोधी मीडिया इसमें रुचि क्यों नहीं दिखाती? इस पर तो घेर कर सरकार गिराई जा सकती है। इसी कारण मैं यह लिख सकता हूँ कि इनमें जो नाम होंगे वो बहुत बड़े नाम होंगे। बड़े नामों तक सेक्स की निरंतर सप्लाय की भी बातें गुपचुप तौर पर होती रही हैं। दबी ज़ुबान में बहुत सारी बातें कही जाती हैं कि फ़लाँ अधिकारी ऐसा है, फ़लाँ नेता को हर रात लड़की चाहिए, फलाँ साहब को बिना सेक्स नींद ही नहीं आती, फलाँ आदमी का होटल में कमरा बुक रहता है…

कहने को तो यह सब पब्लिक इमेजिनेशन है, कोरी अफ़वाह है। मैं भी इस पर बहुत कुछ नहीं लिख सकता क्योंकि न तो मेरे पास सबूत हैं, न ही मैंने बालिका गृह जाकर किसी से बात करने की कोशिश की है। मेरे लिए मेरी तार्किकता यही कहती है कि आख़िर सुप्रीम कोर्ट को नीतीश कुमार पर बरसने की ज़रूरत क्यों पड़ती है? आख़िर कठुआ की एक पीड़िता पर इतना बवाल होता है तो फिर यहाँ 11 बच्चियाँ गायब हैं, या मृत हैं, 34 का बलात्कार होता रहा है, और इस पर कोई चर्चा ही नहीं हो रही!

ब्रजेश ठाकुर अपनी गिरफ़्तारी में जिस मुस्कुराहट के साथ कोर्ट पहुँचता है वो सत्ता के मुँह पर थूकने जैसा है। सत्ताधीश भी उस थूक को पोंछ ही सकता है, क्योंकि उसमें सामर्थ्य नहीं कि ऐसे दरिंदों पर नकेल कसी जाए। क्या सत्ता के लोकतांत्रिक नेता इस बात से डर रहे हैं कि ब्रजेश ठाकुर का मुँह खुला तो बहुत लोगों के नाम बाहर आ जाएँगे?

यह बात भी जान लीजिए कि किसी दिन ब्रजेश ठाकुर ही मरा हुआ मिल सकता है। ख़ैर, उसकी मौत पर मुझे आश्चर्य नहीं होगा क्योंकि ऐसे लोगों को क़ानूनन फाँसी ही मिलनी चाहिए जो छोटी बच्चियों को आसरे के नाम पर बलात्कार का शिकार बनाने से लेकर हर रात किसी की यौन कुंठा मिटाने भेज देता है। ऐसे लोगों को तो जो भी सज़ा मिले कम ही होगी।

इस बात का दूसरा पहलू यह भी है कि भारत ही नहीं, दुनिया के तमाम देशों में चाइल्ड शेल्टर होम में सेक्स का कारोबार ख़ूब होता है। मजबूर, बेसहारा बच्चियों और युवतियों की ब्लैकमेलिंग, चर्चों से लेकर इस तरह के एनजीओ संचालित आसरा गृहों में ख़ूब होती है। चूँकि सरकारी तंत्र पूरी तरह से इन मामलों में विफल रहा है, ज़रूरत है कि सुप्रीम कोर्ट स्वतः संज्ञान लेकर, भारत के हर ज़िले के ऐसे शेल्टर होम की ऑडिटिंग करवाए और बच्चियों से बात करे कि उनके साथ क्या-क्या होता है।

जिनके पास कहीं जाने को नहीं, जिन्हें यह भी पता नहीं कि उनके साथ जो हो रहा है वो क्या हो रहा है, जिन्हें यह समझा दिया जाता है कि ज़िंदा रहने के लिए यह करना ज़रूरी है, वो आख़िर करेंगी भी तो क्या! हम जिस समाज में रहते हैं, वहाँ घरों में ही सौ में से 99 लड़कियाँ और कई लड़के यौनशोषण का शिकार होते रहते हैं। ऐसे समाज में एक छोटी बच्ची की क्या अहमियत जिसका परिवार भी नहीं है।

सरकारों और न्यायालयों से आग्रह है कि इन बच्चियों के माता-पिता बन कर, इन्हें न्याय दिलवाएँ। जो बच्चियाँ अब हमारे बीच नहीं हैं, उनके लिए विनम्र श्रद्धांजलि, लेकिन उन हज़ारों, या लाखों बच्चियों को इन शेल्टर होम्स के नरकों से मुक्ति मिले जहाँ हर पल कुछ न कुछ बहुत बुरा घटित हो रहा है। मेरा सबसे बड़ा डर यही है कि मीडिया के इस सन्नाटे के नीचे उन बच्चियों की चीख़ें गायब न हो जाएँ।

मेरी बाध्यता है कि मैं सिर्फ़ लिख ही सकता हूँ। मेरा काम है लिखना। मैं जज नहीं, मैं मंत्री नहीं। मैं एक आम नागरिक के तौर पर बस यह कह सकता हूँ कि इस पर वैसे लोग कुछ करें, जो करने की स्थिति में हैं। यह छोटी घटना नहीं है। घरों से बच्चियाँ गायब हो जाती हैं। मेले में जो बिछड़े हैं वो किसी ऐसे ही दरिंदे के ‘आसरा गृह’ में पहुँचा दिए जाते हैं। हमारे आँगनों से हमारी बहनें, बेटियाँ अचानक से गायब हो जाती हैं। जब कोई ख़बर आती है कि कहीं बिना शिनाख़्त की कुछ बच्चियों की हड्डियाँ पोटली में मिली हैं, तो दिल बैठ जाता है। वो मेरी बहन हो सकती थी, वो किसी की बेटी रही होगी।

खुलासा: राहुल गाँधी के बिज़नेस पार्टनर को कॉन्ग्रेस राज में मिला था डिफेंस ऑफसेट

इस चुनावी मौसम में राहुल गाँधी की कथित ब्रिटिश नागरिकता का मुद्दा तो उछल ही रहा है साथ में एक और खुलासा सामने आया है। राहुल गाँधी ने एक ब्रिटिश कंपनी, ‘बैकॉप्स’ के दस्तावेज़ों पर हस्ताक्षर किए थे, जिसमें ब्रिटिश नागरिक के रूप में 65% शेयर उनके थे। इस मामले में गृह मंत्रालय ने राहुल गाँधी को नोटिस भेजा था और उन्हें जवाब देने के लिए 15 दिन का समय दिया था।

इस ख़बर में अब एक नया मोड़ आया है जिसके मुताबिक़ 35% शेयरों की स्वामित्व वाली ब्रिटिश कंपनी बैकॉप्स में राहुल गाँधी के पूर्व साथी को कॉन्ग्रेस शासन के दौरान डिफेंस ऑफ़सेट का कॉन्ट्रेक्ट मिला था। इंडिया टुडे की ख़बर में यह खुलासा किया गया है कि उलरिक मैकनाइट (Ulrik Mcknight), की बैकॉप्स यूके में 35% हिस्सेदारी थी। इस कंपनी में 2003 से 2009 के बीच राहुल गाँधी का 65% इक्विटी का मालिकाना हक़ था। उलरिक मैकनाइट को यूपीए शासनकाल में 2011 में स्कॉर्पीन पनडुब्बियों का ऑफसेट कॉन्ट्रैक्ट मिला था।

रिपोर्ट में पाया गया कि 2009 में राहुल गाँधी द्वारा दोनों कम्पनियाँ छोड़ने के बाद, भारत में Backops Private Limited (जिसमें प्रियंका गाँधी को तब निदेशक बताया गया) और Backops UK, कंपनियों को जल्द ही बंद कर दिया गया था। स्कॉर्पीन पनडुब्बियों के निर्माण के लिए 2011 में फ्रेंच नेवल फर्म को कॉन्ग्रेस सरकार ने कॉन्ट्रैक्ट दिया था। कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा कॉन्ट्रैक्ट दिए जाने के बाद, भारतीय फर्म फ्लैश फोर्ज को DCNS इंडिया के माध्यम से एक हिस्सेदार बनाया गया था

2011-12 में, फ्लैश फोर्ज ने यूके आधारित कंपनी ऑप्टिकल आर्मर का अधिग्रहण किया और मैकनाईट कंपनी के निदेशक के रूप में ऑप्टिकल आर्मर से जुड़ गया। 2012-13 में, मैकनाईट को ऑप्टिकल आर्मर कंपनी के 4% शेयर आवंटित किए गए थे।

2013 में, फ्लैश फोर्ज ने एक अन्य यूके आधारित कंपनी का अधिग्रहण किया, जिसका नाम Composit Resin Developments Limited था और उसी वर्ष, मैकनाईट ने फ्लैश फोर्ज लिमिटेड के दो निदेशकों के साथ एक अन्य कंपनी को भी शामिल कर लिया। 2015 में, वेबसाइट PGurus पर प्रकाशित लेख के अनुसार जो प्रोफेसर वैद्यनाथन के ब्लॉग पर पुन: पेश किया गया था, उसमें भी राहुल गाँधी के साथी मैकनाईट पर सवाल उठाए गए थे और कॉन्ग्रेस शासन के तहत एक प्रतिष्ठित रक्षा सौदे के रूप में स्वीकर भी किया।

लेख में निम्नलिखित आरोप लगाए गए थे:

  • राहुल गाँधी और उल्रिक आर मैककनाइट बैकॉप्स के निदेशक थे, जिसे उन्होंने 2009 में बंद कर दिया था।
  • फ्रांस की डीसीएनएस, स्कॉर्पीन पनडुब्बियों के निर्माता ने एक घोषणा की, जिसमें 20,000 करोड़ रुपए ($ 4.5 बिलियन) के सौदे के तहत भारत में 6 पनडुब्बियों की आपूर्ति करना था। यह घोषणा जून 2011 के समय में की गई थी।
  • Ulrik McKnight को 6 जून, 2012 को Optimal Armor Limited (OAL) में एक निदेशक के रूप में नियुक्त किया गया। उसका कहना है कि उसकी राष्ट्रीयता संयुक्त राज्य अमेरिका है और वो वहीं रहता है।
  • उलरिक मैक्नाइट 19 फरवरी, 2013 को कम्पोजिट रेजिन डेवलपमेंट्स (CRDL) लिमिटेड में निदेशक बन गया। उसने कहा कि वह आमतौर पर अमेरिका में रहता है जबकि उसकी राष्ट्रीयता स्वीडिश है।
  • दो भारतीय नागरिक, गौतम मक्कड़ और सुनील मेनन, जो भारतीय कंपनी फ्लैश फोर्ज प्राइवेट लिमिटेड में निदेशक हैं, इन्हें एक ही समय में ऑप्टिमल आर्मर और कम्पोजिट राल डेवलपमेंट में निदेशक के रूप में भी नियुक्त किया गया।
  • फ्लैश फोर्ज ने 20 दिसंबर, 2013 को कम्पोजिट रेसिन में और 23 मार्च, 2012 को ऑप्टिमल आर्मर में हिस्सेदारी का अधिग्रहण किया।

ऑपइंडिया ने इस स्पष्टीकरण के बारे में एक ख़बर की थी और कॉन्ग्रेस द्वारा इस आरोप के बचाव में तर्क दिया गया कि राहुल गाँधी ने ब्रिटिश नागरिक के रूप में दस्तावेज़ो पर हस्ताक्षर किए थे। हमने पाया कि कॉन्ग्रेस के स्पष्टीकरण ने पहले से अधिक प्रश्नों को जन्म दिया।

हमने पाया कि उलरिक मैकनाइट पत्रकार और NYT स्तंभकार सोनिया फलेइरो के पति हैं। और फिर सोनिया फलेरो कौन है? वह एडुआर्डो फलेइरो की बेटी हैं, जो जीवन भर कॉन्ग्रेस की राजनीतिज्ञ रही हैं और यहाँ तक ​​कि 5 साल तक केंद्रीय मंत्री भी रही हैं। यहाँ कुछ भी अवैध नहीं है, लेकिन अब हम जानते हैं कि राहुल गाँधी उल्रिक मैक्नाइट से कैसे मिले होंगे।

जिस कंपनी के दस्तावेज़ कॉन्ग्रेस ने साझा किए थे (जहाँ राहुल गाँधी ने भारतीय नागरिक के रूप में हस्ताक्षर किए थे), ब्रिस्टल लीगल सर्विसेज लिमिटेड में पंजीकृत है। 6 लोअर पार्क रो, ब्रिस्टल बीएस 15BJ ये वो पता है जो Paul थॉमस पॉल रसेल से संपर्क साधने का भी पता है। यह Services Bourse Company Services नामक एक कंपनी का पता भी है जो कंपनियों को पंजीकृत करने में व्यक्तियों की मदद करती है। कंपनी 70 से अधिक अन्य कंपनियों के साथ अपना पता साझा करती है। थॉमस पॉल रसेल कौन है, इस पर शायद ही कुछ उपलब्ध हो। ऊपर वर्णित ब्रायन लवग्रोव ने भी अपना पता 6, लोअर पार्क रो, ब्रिस्टल के रूप में ही स्थापित किया।

कई अन्य प्रश्न थे जो कॉन्ग्रेस के स्पष्टीकरण के साथ उठाए गए थे और हमारी पूरी ख़बर यहाँ पढ़ी जा सकती है

‘इस्लाम कुबूल करता तो माँ मुझे मार ही डालती, झूठ बोल रहे हैं केजरीवाल’: हंसराज हंस

उत्तर पश्चिम दिल्ली लोकसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार और प्रसिद्ध पंजाबी लोक गायक हंस राज हंस ने शुक्रवार (मई 3, 2019) को कहा कि वे अरविंद केजरीवाल के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर करेंगे। दरअसल, आम आदमी पार्टी ने हंसराज हंस के ऊपर आरोप लगाया था कि उन्होंने धर्म परिवर्तन कर इस्लाम कबूल कर लिया है और वह अनुसूचित जाति की सुरक्षित सीट से चुनाव नहीं लड़ सकते हैं। AAP के इसी आरोप का जवाब देते हुए हंसराज हंस ने केजरीवाल को निशाने पर लिया और कहा, “झूठे आदमी ने फिर से झूठ बोला है। गंदगी की परिभाषा को उजागर करने वाली शख्सियत को देखना हो तो वो केजरीवाल हैं।” इसके साथ ही उन्होंने मानहानि का मुकदमा और एससी/एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज कराने की भी बात कही।

हंसराज हंस ने कहा कि उनका जन्म एक वाल्मीकि परिवार में हुआ है और उनकी माँ वाल्मीकि की पूजा करती है। उन्होंने कहा कि अगर वो धर्म परिवर्तन करके इस्लाम कबूल करते तो उनकी माँ उन्हें मार ही डालती। उन्होंने कहा कि अरविंद केजरीवाल ने वाल्मीकि समाज और भगवान वाल्मीकि का भी अपमान किया है। वहीं, केंद्रीय राज्य मंत्री विजय गोयल ने कहा कि हंसराज हंस वाल्मीकि समाज से हैं। वह लोकप्रिय सूफी गायक हैं और जो लोग उनकी लोकप्रियता से घबरा रहे हैं वह उनके खिलाफ झूठ फैला रहे हैं ऐसे लोगों को उनसे माफी माँगनी चाहिए।

गौरतलब है कि गुरूवार (मई 2, 2019) को AAP के राजेंद्र पाल गौतम ने कहा था कि भाजपा प्रत्याशी हंसराज हंस 20 फरवरी 2014 को धर्म परिवर्तन कर इस्लाम कबूल कर चुके हैं। गौतम के अनुसार इस संबंध में देश के कई प्रतिष्ठित अखबारों में खबर छपी थी और मीडिया चैनल पर इस संबंध में स्टोरी भी चलाई गई थीं। राजेंद्र का कहना है कि हंसराज हंस ने धर्म परिवर्तन कर अपना नाम मोहम्मद यूसुफ रख लिया था। इसके साथ ही उनका ये भी कहना है कि इस दौरान हंसराज ने कहा था कि उन्होंने धर्म परिवर्तन कर लिया है, लेकिन वह फ़िल्म इंडस्ट्री में अपने पुराने नाम से ही काम करते रहेंगे जिसके बाद अरविंद केजरीवाल ने भी ट्वीट कर यह मुद्दा उठाया था।