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मुज़फ़्फ़रपुर शेल्टरहोम केस में मिली हड्डियों की पोटली: CBI ने जताई लड़कियों की हत्या की आशंका

बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर शेल्टरहोम केस में शुक्रवार (मई 4, 2019) को सीबीआई ने सर्वोच्च न्यायालय में 11 लड़कियों के मर्डर की आशंका जताई है। सर्वोच्च न्यायालय में दायर किए हलफनामे में सीबीआई ने कोर्ट को बताया है कि जाँच के दौरान दर्ज किए गए पीड़ितों के बयान में 11 लड़कियों के नाम सामने आए हैं, जिनकी आरोपितों ने कथित रूप से हत्या की थी। जाँच एजेंसी के मुताबिक एक आरोपित के कहने पर श्मशान के एक खास स्थान की खुदाई की गई, जहाँ से हड्डियों की पोटली बरामद की गई।

शुक्रवार को प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। सीबीआई ने कोर्ट में यह हलफनामा सामाजिक कार्यकर्ता निवेदिता झा की ऐप्लीकेशन के बाद दायर किया। इस आवेदन में निवेदिता ने सीबीआई पर आरोप लगाया है कि एजेंसी पीड़ितों के बयान न लेकर, ब्रजेश ठाकुर समेत अन्य आरोपितों को बचाने की कोशिश कर रही है।

इसके बाद पीठ ने कहा है कि इस आवेदन पर कोर्ट सीबीआई को औपचारिक नोटिस जारी करेगा, जिसका जवाब एजेंसी को 4 दिन के भीतर देना होगा। पीठ ने संक्षिप्त दलीलों को सुनने के बाद इस मामले की सुनवाई के लिए 6 मई की तारीख तय की है।

इस पूरे मामले को लेकर लालू प्रसाद यादव के बेटे और राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के नेता तेजस्वी यादव ने नीतीश सरकार पर जमकर निशाना साधा है। उन्होंने कहा, “नीतीश कुमार के करीबी दुलरवा ब्रजेश ठाकुर ने सीएम के संरक्षण में 34 बच्चियों का सत्ताधारी नेताओं द्वारा सामूहिक बलात्कार उपरांत 11 बच्चियों को मारकर गाड़ दिया। हिंदू रीति से दाह संस्कार भी नहीं किया। बाकी बच्चियाँ अभी भी गायब हैं। नीतीश सरकार नंगी हो चुकी है।”

बता दें बिहार के मुजफ्फरपुर में एक एनजीओ द्वारा संचालित शेल्टर होम में कई लड़कियों का कथित रूप से बलात्कार और यौन उत्पीड़न किया गया था और टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान की रिपोर्ट के बाद यह मुद्दा उछला था। जिसके बाद इस मामले की जाँच सीबीआई को सौंपी गई थी और एजेंसी ने ब्रजेश ठाकुर सहित 21 लोगों के ख़िलाफ़ आरोपपत्र दायर किया था। 

‘फोनी’ तूफान: जानिए कैसे नए वार्निंग सिस्टम ने ओडिशा में बचाई हजारों जानें

ओडिशा के तटीय जिलो में शुक्रवार (मई 3, 2019) को ‘फोनी’ तूफान ने अपना कहर बरपाया, मगर वॉर्निंग सिस्टम और युद्ध स्तर की तैयारियों की वजह से हजारों लोगों की जान बच गई। सरकार ने आधिकारिक तौर पर मृतकों की संख्या 6 बताई है जबकि न्यूज एजेंसियों की रिपोर्ट में मृतकों की संख्या 8 बताई जा रही है। ओडिशा में तबाही मचाने के बाद यह तूफान अब पश्चिम बंगाल से टकरा चुका है। तूफान की भीषण स्थिति को देखा जाए तो मौत का आँकड़ा काफी कम है, और ये सब कुछ भारतीय मौसम विज्ञान की सतर्कता, बेहतर वॉर्निंग सिस्टम, केन्द्र और राज्य सरकार के बीच बेहतर तालमेल और बड़ी राहत और बचाव दल टीम के होने के कारण संभव हो पाया।

ऐसा भी नहीं था कि तूफान की गिरफ्त में आने वाले इलाके में सब कुछ सही ही रहा। तूफान के रास्ते में आने वाले क्षेत्र इससे अनछुए नहीं रहे। ओडिशा के पुरी जिले में कच्चे घरों को भारी नुकसान पहुँचा है और इस तूफान की चपेट में आए 160 लोगों को इलाज के लिए अस्पतालों में भर्ती करवाया गया है। तूफान से पुरी के डीएम और एसपी आवास भी क्षतिग्रस्त हुए हैं। तूफान आने से पहले ही बिजली की सप्लाई काट दी गई थी ताकि कोई अनहोनी न हो जिसके चलते वहाँ बिजली आपूर्ति पूरी तरह से बाधित रही। हालाँकि मौसम विभाग के नए क्षेत्रीय तूफान मॉडल (जो भारत की चक्रवातों में जीरो कैजुएलिटी का हिस्सा है) की मदद से हजारों लोगों की जान बचाने में मदद मिली और साथ ही इस सिस्टम ने ये भी दिखा दिया कि साल 1999 के भीषण चक्रवात के बाद से मौजूदा समय तक लैंडफॉल पर नजर रखने और पूर्वानुमान लगाने में हमने काफी तरक्की कर ली।

अक्टूबर 2013 में आए ‘फैलिन’ और अक्टूबर 2014 में आए ‘हुदहुद’ तूफान दौरान पाई गई सफलता के बाद केंद्रीय एजेंसियाँ और राज्य सरकारें बड़े पैमाने पर राहत और बचाव प्रबंधन में काफी ज्यादा सक्षम हो गई थीं लेकिन ‘फोनी’ तूफान से राहत और बचाव का अभियान काबिले तारीफ रहा। ‘फोनी’ तूफान के आने से पहले ही मौसम विभाग की तरफ से लगातार चेतावनी दे रहीं थी, जिसकी वजह समुद्र के किनारे और तूफान के रास्ते में आने वाली जगहों पर रहने वाले लोगों को समय रहते सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाकर पहले की तुलना में ज्यादा आसानी से बचाया जा सका।

‘फोनी’ तूफान आने से पहले ओडिशा में स्थानीय आपदा प्रबंधन बल और NDRF की टीमें सक्रिय हो गई थीं। NDRF ने ‘फोनी’ तूफान से निपटने की लिए 65 टीमें उतारी थीं, जिसमें प्रति टीम 45 लोग थे। आपको बता दें कि यह अब तक किसी भी रेस्क्यू ऑपरेशन की सबसे बड़ी तैनाती है। पिछले तीन दिनों में ओडिशा, आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल से लगभग 11.5 लाख से अधिक लोगों को निकाल कर सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाया गया। वहीं कानून व्यवस्था, भोजन और सड़कें दुरुस्त करने के लिए अतिरिक्त टीमें लगाई गई हैं।

पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (Ministry of Earth Science) के सचिव माधवन राजीवन ने कहा कि यह IMD के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण उपलब्धि है। उन्होंने इस बड़े संकट से निपटने के लिए इसके महानिदेशक के जे रमेश को बधाई दी है। उन्होंने कहा कि विभाग ने अन्य मौजूदा मॉडलों के अलावा अपने क्षेत्रीय तूफान मॉडल (Regional Hurricane Module) का सफलतापूर्वक उपयोग किया है। राजीवन ने टाइम्स ऑफ इंडिया से बात करते हुए बताया कि मौजूदा प्रणाली की समीक्षा 13 मई को की जाएगी, ताकि पूर्वानुमान एजेंसी अपने चक्रवात की पूर्व चेतावनी प्रणाली में और अधिक सुधार कर सके।

बता दें कि, ओडिशा में आए तूफान ‘फानी’ से निपटने के लिए वहाँ पर युद्धस्तर की तैयारियाँ की गई थी। नौ सेना ने राहत एवं बचाव के लिए 6 जहाजों को तैनात किया था और साथ ही मेडिकल और डाइविंग टीम अलर्ट पर थीं। भारतीय वायु सेना ने दो C -17, दो C -130 और चार AN-32 को स्टैंडबाय पर रखा था। वहीं, गोपालपुर में सेना की तीन टुकड़ी स्टैंडबाय पर थी और पनागर में इंजीनियरिंग टास्क फोर्स थी। इसी तरह कोलकाता, बैरकपुर, सिकंदराबाद और कांकिनारा में भी सेना तत्पर थी।

नरेंद्र मोदी और अमित शाह को EC ने दी क्लिनचिट, आचार संहिता का उल्लंघन नहीं

शुक्रवार (मई 4, 2019) को चुनाव आयोग ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आचार संहिता उल्लंघन के 2 मामलों में क्लिनचिट दे दी है। प्रधानमंत्री के साथ भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को भी नागपुर में दिए भाषण पर क्लिनचिट मिली है। वहीं दूसरी ओर राहुल गाँधी को आचार संहिता उल्लंघन मामले में जवाब दाखिल करने की मोहलत बढ़ा दी गई है।

कुछ दिन पहले नरेंद्र मोदी पर वाराणसी और नांदेड़ में दिए चुनावी भाषणों को लेकर शिकायत दर्ज़ हुई थी जिसपर निर्वाचन आयोग का अपना फैसला आया है। आयोग के अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने वाराणसी में दिए भाषण में किसी भी प्रकार से आचार संहिता का उल्लंघन नहीं किया था और न ही नांदेड़ में उनकी टिप्पणियों में आयोग ने कुछ गलत पाया। बता दें कि नांदेड़ में पीएम ने कॉन्ग्रेस को ‘डूबता टाइटैनिक जहाज’ बताया था और वाराणसी में उन्होंने एक रैली को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा पर बल दिया था और कहा था कि नया भारत आतंकवाद का मुँहतोड़ जवाब देता है।

नरेंद्र मोदी को अब तक निर्वाचन आयोग की ओर से पाँच मामलों में क्लिनचिट मिल चुकी है। खबरों के अनुसार आयोग ने कहा कि शिकायत आने के बाद मामले की विस्तृत जाँच की गई है। आयोग का मानना है कि इन मामलों में किसी भी तरह से मौजूदा प्रावधानों का उल्लंघन नहीं हुआ।

वहीं भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के ख़िलाफ़ भी 22 अप्रैल को पश्चिम बंगाल के नदिया जिले में आचार संहिता के उल्लंघन की शिकायत की गई थी। यह शिकायत कॉन्ग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला द्वारा की गई थी। इस मामले में भी अमित शाह को आयोग ने क्लिन चिट दे दी है।

इसके अलावा कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी पर भी 23 अप्रैल को मध्यप्रदेश के शाहडोल में आचार संहित उल्लंघन का आरोप लगा था, जिसपर आयोग ने 1 मई को नोटिस जारी करते हुए 48 घंटे के भीतर जवाब माँगा था। आयोग ने यह समय सीमा 7 मई तक बढ़ा दी है।

जावेद भाई, उस ‘आवरण’ का इस्तेमाल बम फोड़ने के लिए भी होता है… 11 से 4 ज़्यादा मुल्कों ने बैन किया है

1892 में ओटोमन साम्राज्य में एक व्यक्ति ने बुर्क़े की सहारा लेकर डकैती की कोशिश की। कहते हैं कि उस समय के सुल्तान अब्दुल हमीद द्वितीय ने बुर्क़े पर प्रतिबंध लगा दिया। अगर आधुनिक दौर की बात करें तो बुर्क़े का सहारा लेकर 1937 में अमीन अल हुसैनी नामक अपराधी फ़िलिस्तीन से बुर्क़ा पहन कर भागने में सफल हुआ और लेबनान जाकर नाज़ी समर्थित गतिविधियों में शामिल रहा। उसके बाद 1948 के एक वाकये में इराक़ी सेना ने बुर्क़ा पहन कर फ़िलिस्तीन में घुसपैठ किया।

इसके बाद लंदन, टोरंटों, पुणे, ग्लासगो, फिलाडेल्फिया से ज़ेवरों की चोरी से लेकर, दुकानों से दारू चुराने, लाहौर में चर्चों पर बम फेंकने, कहीं बच्चे चुराने, कहीं किसी आतंकी को जेल से भगाने, सैनिकों और पुलिसकर्मियों को अफ़ग़ानिस्तान में कई बार बम से उड़ाने, पैंपोर पुलिस चीफ़ मंजूर अहमद को मारने, एवम् दसियों बार बैंकों में डाका डालने से लेकर ब्रिटेन से संदिग्ध आतंकी यासिन ओमर का भाग निकलने, पाकिस्तान में 2007 में बन्नू में 15 को मारने, पेशावर चेकप्वाइंट पर तालिबानी महिला के खुद को उड़ाने, रोटरडम में पॉकेटमारी में अचानक वृद्धि आने, कर्बला जाते हुए इस्कंदरिया में इराकी शिया श्रद्धालुओं की सुसाइड बॉम्बिंग, मुंबई हमले, जॉर्डन में 2008-9 में 50 लोगों द्वारा 170 अपराधी वारदातें, सोमालिया के 2009 वाले होटल बॉम्बिंग में, सिंगापुर के आतंकी क़ैदी के भागने में, 2010 में पाकिस्तान के खार में 41 लोगों की सुसाइड बॉम्बिंग में हत्या, उसी दिसंबर में सउदी पुलिस पर गोली चलाने में, 2011 में सोमालिया के आंतरिक मंत्री की हत्या में, उसी साल पाकिस्तान में बम धमाकों की जाँच करती पुलिस टोली पर महिला बमबाजों के हमले में, काबुल के रिसॉर्ट होटल पर हमले में, इस्ताम्बुल पुलिस स्टेशन पर 2015 के सुसाइड बॉम्बिंग में, बोको हरम के जिहादियों के भागने में, सउदी मस्जिद पर हुए आत्मघाती हमले में, चैड के अंज़ेमीना बाजार के धमाके में, येमेन के सना में शिया मस्जिद पर हुए हमले में, बलूचिस्तान के इमामबर्गा शिया मस्जिद की सुसाइड बॉम्बिंग में, इंडोनेशियाई बलात्कारी और क़ातिल अनवर के जेल से भागने में, इराक़ के पश्चिमी अनबर इलाके में विस्थापित लोगों के कैम्प पर हुए सुसाइड बॉम्बिंग में पेशावर के कृषि कॉलेज पर हुए तालिबानी हमले में, अफ़ग़ानिस्तान के शिया मस्जिद पर हुए टेरर अटैक में, श्री लंका के ईस्टर हमलों में… सबमें एक ही चीज कॉमन है: बुर्क़ा।

इसमें दसियों मामले ऐसे हैं जो बैंकों में डकैती से लेकर घड़ियाँ छीन कर भागने और बुर्क़े में होने का लाभ उठाकर पॉकेटमारी तक के हैं। पूरे यूरोप और अमेरिका में बैंकों में डाका डालने का यह एक पसंदीदा तरीक़ा है क्योंकि इस पर आप सवाल नहीं कर सकते। सवाल इसलिए नहीं कर सकते क्योंकि आपको संवेदनहीन से लेकर बिगट और रेसिस्ट तक के टैग झेलने पड़ सकते हैं।

जिस तुर्की के चाँद को देख कर भारत के लोग ईद मनाते थे, वहाँ भी हिजाब या किसी भी तरह के वैसे कपड़े पर प्रतिबंध लगा, हटा और फिर लग गया जिससे लोगों की पहचान छुपती हो। साथ ही ऑस्ट्रिया, डेनमार्क, फ़्रान्स, बेल्जियम, ताजिकिस्तान, लातविया, बुल्गारिया, कैमरून, चैड, कॉन्गो-ब्रैज़ाविल, गेबोन, नीदरलैंड्स, चीन, मोरक्को और श्री लंका में बुर्क़े पर प्रतिबंध है।

इन सारी जगहों पर प्रतिबंध का मुख्य कारण अपराध या आतंक ही है जो कि बुर्क़े की ओट में होता रहा है। ये सारी सूचनाएँ आपको बहुत ही आसानी से एक ही जगह, सारे लिंक्स के साथ यहाँ मिल जाएँगी। मुझे इस आर्टिकल को स्क्रॉल करने में क़रीब साढ़े तीन मिनट लगे, पढ़ने की बात तो खैर रहने ही दीजिए।

आप गूगल पर कुछ शब्द टाइप करेंगे जिसमें बुर्क़ा, क्राइम, टेरर आदि हैं, और आपके लिए सैकड़ों खबरें आ जाएँगी जिसके केन्द्र में एक ऐसा लिबास है जो आपके सर के बालों से लेकर चप्पलों के रंग तक को छुपा लेता है मज़हब के नाम पर। आप सवाल करेंगे तो आपको साम्प्रदायिक कहा जाएगा, आपको कहा जाएगा कि तुम्हें दूसरी संस्कृतियों का सम्मान करना चाहिए। आपको संवेदनहीन कहा जाएगा और आप पर तमाम अंग्रेज़ी ठप्पे लग जाएँगे जिसका मतलब न तो सुनाने वाले को पता है, न आपको। ट्विटर पर ऐसे विशेषण टहलते रहते हैं तो लोग बिना अर्थ जाने भी फेंक कर मारते हैं।

अब गूगल पर बुर्क़ा हटा दीजिए और जावेद अख़्तर द्वारा दिए गए बयान वाला ‘घूँघट’ टाइप कर दीजिए। कुछ परिणाम नहीं आएगा सिवाय उन चंद वामपंथी लेखों के जिसमें घूँघट को बंधन, पिछड़ेपन, पितृसत्ता और दासता की निशानी बताया जा रहा होगा। इन्हीं पोर्टलों और वेबसाइटों पर आपको अनिएसा हसीबुआँ के डिज़ायनर हिजाबों द्वारा 2016 न्यूयॉर्क फ़ैशन वीक में समुदाय विशेष की महिलाओं के सशक्तीकरण की बात मिल जाएगी कि आप हिजाबों में भी अब डिजाइन चुन सकते हैं। फिर आपको 2017 में नाइकी द्वारा नए सशक्तीकरण और महिला एथलीटों को ‘इनेबल’ करने के लिए डिज़ायनर हिजाब पर लेख मिल जाएँगे।

हिजाब और बुर्क़ा इनेबलर हैं, समुदाय विशेष की महिलाओं को डिज़ायनर सशक्तीकरण देते हैं क्योंकि अब उनके पास गर्मी में किस रंग और डिजाइन के बुर्क़े में पसीने से तर होना है, इसके लिए विकल्प हैं। अब हिजाब द्वारा सर का ढका रहना अपनी तथाकथित कल्चरल आइडेंटिटी को बरक़रार रखने की तरफ एक सशक्त क़दम है। लेकिन घूँघट! वो तो बंधन की निशानी है, उसका संस्कृति से कोई मतलब नहीं, पब्लिक में अपने सर और शरीर को ढकना सनुदाय विशेष की महिलाओं का चुनाव है, हिन्दुओं को लिए वही सर ढकना पितृसत्ता की एक पीछे ले जाती सोच।

यही कारण है कि आम तौर पर अपने आप को एथीईस्ट मानने वाले जावेद अख़्तर ने श्रीलंका द्वारा बुर्क़े पर लगे प्रतिबंध के बाद, शिवसेना द्वारा भारत में भी इस पर प्रतिबंध लगाने की बात पर घूँघट को बुर्क़े के समकक्ष ला दिया है। उन्होंने कहा है कि दोनों पर बैन लगना चाहिए, अगर बुर्क़ा पर लगाना ही है तो।

जावेद अख़्तर गीत लिखते हैं, फ़िल्मों की पटकथा भी लिखते रहे हैं जिसमें उन्होंने कुछ पीढ़ियों को सहज रूप से यह बताया कि ब्राह्मण, बनिया आदि व्यभिचारी और सूदखोर ही होते हैं, लेकिन अहमद, एंथनी जैसे लोग दयालु, दानी और परोपकारी होते हैं। जिनको लगता है कि यह संयोग मात्र है उनसे कहूँगा कि जावेद साहब द्वारा लिखी फ़िल्मों को दोबारा देखें और उनमें नायकों और बाकी के छोटे नायक/नायिकाओं के नाम और आचरण पर ध्यान दें।

ये सारी बातें इतने सूक्ष्म रूप से फ़िल्मों में डाली गईं हैं कि हम ये मानने लगे कि बनिया तो सूदखोर और अत्याचारी ही होता है, और पंडितों का काम है आँखों में धूल झोंक कर पैसे कमाना। वहीं, ईसाई और समुदाय विशेष का पात्र आपको कभी लाचार, गरीब बच्चे को पालता दिखेगा, या फिर खुदा से दो बेटे माँगता जो देश पर शहीद हो जाए। मुझे इस बात से गुरेज़ नहीं कि ईसाई या समुदाय विशेष वाले नाम के पात्र अच्छे दिखाए जाते हैं। बिलकुल दिखाए जाने चाहिए ताकि समाज में व्याप्त भेदभाव मिटे, लेकिन हर ब्राह्मण ने सबको लूटा, हर बनिए ने सबका पैसा मारा, ऐसा मैं नहीं मानता।

खैर, आगे बढ़ते हुए जावेद अख़्तर जी को बुर्क़े की चर्चा में घूँघट को घुसाने के लिए तो ‘नमन रहेगा’। पहली बात यह है कि लेखक हो कर भी संदर्भ कैसे भूल गए जावेद जी? संदर्भ यह है कि बुर्क़े का इस्तेमाल आतंकी गतिविधियों के लिए होता है और वो किसी भी देश की सुरक्षा के लिए ख़तरा हैं। दूसरी बात यह है कि बुर्क़ा इस्लाम का अभिन्न अंग नहीं है, बल्कि मज़हब के कुछ ठेकेदारों की करतूत है। ये एक थोपी हुई परम्परा है जिसमें महिलाओं को एक वस्तु की तरह मान कर, उसे कैसे बाहर में जाना चाहिए, इस पर मर्दों ने साज़िशन एक नियम बना दिया है। ये वैसा ही है जैसे तीन तलाक और निकाह हलाला जिसमें कई बार मौलवी साहब ही हलाला की रस्म पूरी कर रहे होते हैं।

बुर्क़ा की बनावट ऐसी है कि उसमें चेहरा तो छोड़िए आदमी ही गायब हो जाता है। उसके भीतर अगर आपने बमों से लैस बेल्ट बाँध लिया हो, आरडीएक्स या आईईडी बैग में लेकर घूम रहे हों, विस्फोटकों को एक जगह से दूसरी जगह ले जा रहे हों, भीड़ भरी जगह में आ जा रहे हों जहाँ कैमरा तक लगा हुआ है, आप पर संदेह नहीं किया जा सकता क्योंकि उसके भीतर एक गर्भवती महिला हो सकती है, एक मोटी महिला हो सकती है, या एक एक महिला हो सकती है जो कोई सामान पीठ पर रखे हुए है। बुर्क़े के भीतर कुछ भी हो सकता है लेकिन आपको यही मानना होगा कि भीतर एक मुस्लिम महिला है जिसे उसका मज़हब इसी तरीके से उनके कल्चर को ढोने के लिए निर्देश देता है।

यूँ तो जावेद साहब ने घूँघट शब्द पर डायलॉग और गाने दोनों ही लिखे होंगे, फिर भी लगता है कि अपनी साम्प्रदायिकता में वो यह भूल गए कि आज तक किसी महिला ने घूँघट ओढ़ कर ‘जय श्री राम’ कहते हुए बाज़ार में खुद को बम से नहीं उड़ाया। आज तक किसी भी महिला की ऐसी तस्वीर नहीं मिली जिसमें वो घूँघट काढ़ कर चेहरे पर आरडीएक्स बाँध कर चर्चों में घुस रही हो। आज तक पुलिस ने एक स्केच जारी नहीं किया है जिसमें साड़ी का घूँघट बनाए एक महिला ने सर पर कूकर प्रेशर बम रखा हो जिसे उसने एक मस्जिद के सामने फोड़ दिया हो।

जानते हैं जावेद जी ऐसा क्यों है? पहली बात तो यह है कि हिन्दुओं ने कभी भी धर्म के नाम पर आतंक नहीं मचाया है। आपके दोस्तों ने एक टर्म ज़रूर बनाया था, पर सत्य सामने आ गया। दूसरी बात यह है कि घूँघट के नीचे सच में बम नहीं छुपाया जा सकता। न तो ऐसा हो सकता है, न ही एक हिन्दी फिल्म की नायिका के साड़ी (या घाघरे) के नीचे जाँघ पर रायफल बाँधने के अलावा कोई उदाहरण मुझे याद आता है जिसमें ऐसी कोई वारदात हुई हो।

इसलिए, जब आपके जैसे लोग इस तरह की बातें करते हैं तो आप हर दिन अपनी क्रेडिबिलटी खोते हैं। आपका झूठ सामने आता है कि आप एथीईस्ट हैं जबकि आप भीतर से ‘मजहबी’ हैं जिसे इस बात की चिंता है कि बुर्क़ा तो इस्लाम का अंग है, इसे कैसे हटा देगा कोई। हमें इससे मतलब नहीं है जावेद जी कि बुर्क़ा हटे या रहे। समय आने पर समुदाय विशेष की महिलाएँ खुद सड़क पर आएँगी कि उन्हें गर्मियों में सोलर कूकर नहीं बनना और उन्हें हवा के थपेड़ों को अपने चेहरे पर महसूस करना है।

वो समय हो सकता है सौ साल बाद आए। लेकिन तब तक, दो बातों को, संदर्भ से बिलकुल हटा कर, अपनी अश्लील हँसी के साथ परोसना बंद कीजिए। ध्यान रहे कि बुर्कों का इस्तेमाल बम फोड़ने के लिए होता रहा है, घूँघट राष्ट्रीय सुरक्षा का मसला नहीं है।

हिन्दूफ़ोबिक द वायर, मंदिर में पूजा-पाठ और यज्ञ-हवन ही होते हैं

‘लोग हिन्दू होना बंद कर दें’ ही पत्रकारिता के समुदाय विशेष का ‘Endgame’ था, और अब इन असुरों ने अपने पत्ते खोलने भी शुरू कर दिए हैं। ‘क्यों बने भई राम का मंदिर? घर में ही पूजा कर लो’ से शुरू हुआ प्रोजेक्ट ‘सबरीमाला मंदिर में हमारे हिसाब से पूजा होगी (नहीं तो नहीं होगी), ‘शिवरात्रि का दूध शिवलिंग पर मत चढ़ाओ’ से होता हुआ ‘मंदिर में भी हवन-पूजा-यज्ञ क्यों होना चाहिए? यह अन्धविश्वास है, असंवैधानिक है’ के अवश्यम्भावी उपसंहार पर आ गया है। पत्रकार से प्रपोगंडाकार बने सिद्धार्थ वरदराजन के हिन्दूफोबिक पोर्टल ‘द वायर’ में आज छपा लेख सीधे-सीधे मंदिरों में भी पूजा-पाठ, हवन-यज्ञ किए जाने का विरोध करता है।

हुआ यह कि तमिलनाडु के भारी अकाल को लेकर वहाँ की अन्नाद्रमुक सरकार ने अपने हड़पे गए, अपने चंगुल में फँसे 4000 मंदिरों को सर्कुलर दिया कि वह शास्त्रों में वर्णित वह यज्ञ-हवन आदि करें जिससे शास्त्रों में बारिश होने की बात कही गई है। उसी को पकड़ कर वायर उगलता है मंदिरों में पूजा-पाठ कराए जाने का आदेश ‘असंवैधानिक’ है, ‘संविधान में वर्णित ‘साइंटिफिक टेम्पर’ लोगों में लाने के आदेश के खिलाफ है’, ‘ये (दुष्ट) भाजपा करवा रही है यह सब’ वगैरह का विशुद्ध जहर।

सबसे पहले तो मंदिर का काम ही है पूजा-पाठ करना। वो अर्बन नक्सलियों का दिल्ली प्रेस क्लब या जेएनयू नहीं होता। वहाँ लोग भी हवन-यज्ञ के लिए ही जाते हैं और इसीलिए वहाँ पुजारी भी होते हैं। इसलिए वहाँ किसी भी प्रकार का कर्म-कांड होना गलत नहीं, सही है। गलत अगर कुछ है तो वायर की सोच, जो हर चीज इनके अब्राहमी, क्रिस्लामोकॉमी (ईसाई, मुस्लिम और कम्युनिस्ट विचारधारा के घालमेल से बने लेंस से) मानदंडों पर देखती है, और जो न समझ आए उसे नष्ट कर देने पर उतारू हो जाती है।

अब दूसरी बात यह कि पूजा-पाठ करने से ‘क्या’ होता है इसका जवाब क्रिस्लामोकॉमी गिरोह को देना जरूरी नहीं। हर किसी को अपनी आस्था मानने का पूरा हक़ होना चाहिए, चाहे और किसी के कितना भी समझ में न आए। किसी को समझाने का ठेका नहीं लिया हिन्दुओं ने। और जो हिन्दू नहीं है, उसे यह सब जानने में इतनी दिलचस्पी क्यों? हिन्दुओं को अपने योग-आध्यात्म-धर्म के गुरुओं से पता चल जाता है कि शिवलिंग पर दूध क्यों, मंदिर में हवन क्यों।

तीसरी बात ‘साइंटफिक टेम्पर’ की तो, जाओ नहीं करते वह डेवलेप। क्या कर लोगे? आप आए हैं उन्हें ‘साइंटिफिक टेम्पर’ सिखाने जो अपनी धार्मिक सभ्यता के ही चरम पर शून्य, धातुशोधन (metallurgy), चिकित्सा से लेकर स्थापत्य कला के सिरमौर थे। किस चीज में ‘साइंटिफिक’ होना है किसमें नहीं, हमें यह सिखाने वाले पहले खुद में हिन्दुओं के धर्म, आस्था, परंपरा के लिए थोड़ी ‘सहिष्णुता’ विकसित कर लें।

अब तुम्हारे आखिरी सवाल की बात, कि राज्य सरकार ऐसा सर्कुलर क्यों दे रही है तो वह इसलिए आदमपिशाचों कि तुम्हारी ‘सेक्युलर’ सरकारें HR&CE जैसे विभाग बनाकर हमारे मंदिर खा जातीं हैं, हमारे मंदिरों की तिजोरी से अरबों की दान दक्षिणा पर सरकारी डाका डालने और गैर-सरकारी गबन करने के बाद भी हमारे पुजारियों को 19 रुपए, 215 रुपए जैसी नीच तनख्वाहें देतीं हैं। अब जब मंदिर अपने कब्जे में रखा है सरकार ने, सारा चढ़ावा खुद डकार रही है तो पूजा का सर्कुलर सऊदी या वैटिकन से आएगा क्या?

मंदिर किसी के बाप की जागीर नहीं है

हिन्दुओं के मंदिरों में सरकारी हस्तक्षेप से आज वही हो रहा है जिसकी हमेशा से आशंका जताई जा रही थी। इसकी आशंका हमेशा से हिन्दू गुरु जताते थे, पर सेक्युलरिज्म के नशे में अंधी सरकारों के कान पर जूँ नहीं रेंगी। सरकार के हाथों में चले जाने से कोई भी चीज ‘पब्लिक प्रॉपर्टी’ हो ही जाती है- इसी लॉजिक से सबरीमाला को ‘पब्लिक प्लेस है, सबको घुसने मिलना चाहिए’ का हवाला देकर मंदिर की पवित्रता भंग की गई, इसी (कु)तर्क से मदिर टूरिस्ट प्लेस बन रहे हैं और इसी लॉजिक से सरकारें मंदिरों की मलाई काटने की तो हक़दार हैं पर उनसे उम्मीद यह की जाती है कि वे पुजारियों को ज्यादा पैसा न दें (क्योंकि पूजा का काम ‘प्रोडक्टिव’ नहीं है) और पूजा-पाठ में तो सीधा-सीधा विघ्न उत्पन्न करें।

पप्पू यादव ने लालू यादव के दोनों बेटों को कहा कुपुत्र, RJD को बताया BJP की B-टीम

जन अधिकार पार्टी (लोकतांत्रिक) के राष्‍ट्रीय संरक्षक सह सांसद पप्‍पू यादव ने RJD अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव के बेटों को कुपुत्र करार दिया है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा है कि RJD ने बिहार में मुस्लिम उम्मीदवारों को हराने के लिए भाजपा से समझौता कर लिया है।

जहानाबाद में चुनाव प्रचार के लिए पहुँचे पप्पू यादव ने कहा, “मैं बीजेपी की बी-टीम से बिहार को बचाना चाहता हूँ। लालू के 2 कुपुत्र (तेजस्वी यादव और तेजप्रताप यादव) महागठबंधन के खिलाफ काम कर रहे हैं। चतरा में गुंडे को कॉन्ग्रेस प्रत्याशी मनोज यादव के खिलाफ टिकट दिया गया। सुपौल में महागठबंधन की उम्मीदवार रंजीता रंजन को हराने के लिए अपना उम्मीदवार उतारा। RJD ने बेगूसराय में बीजेपी के समर्थन में अपना उम्मीदवार उतारा है। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी की सभा में बुलाने पर भी तेजस्वी नहीं गए।”

मधेपुरा से प्रत्याशी हैं पप्पू यादव

मधेपुरा से प्रत्याशी पप्पू यादव ने आगे कहा, “राजद और तेजस्वी यादव ने भाजपा से समझौता कर चुनाव में महागठबंधन को कमजोर किया है। और इस बात को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने भी कहा है कि NDA सिर्फ बिहार की सीटों पर अच्छा कर रही है। तेजस्वी जहाँ-जहाँ मुस्लिम उम्मीदवार खड़े हैं, उन्हें हराने का काम कर रहे हैं। RJD और नीतीश कुमार मिलकर 2019 का नहीं, बल्कि 2020 का चुनाव लड़ रहे हैं।”

गौरतलब है कि जन अधिकार पार्टी (लोकतांत्रिक) ने कन्हैया कुमार, मधुबनी में निर्दलीय शकील अहमद और जहानाबाद में सांसद अरुण कुमार को समर्थन दिया है। पप्पू यादव को महागठबंधन में शामिल होने से अंतिम समय में रोक दिया गया था।

कुणाल कामरा सस्ते कॉमेडियन ज़रूर हैं, लेकिन उन्हें ग्लोबल आतंकी बताना गलत: UN

जैश-ए-मोहम्मद प्रमुख मसूद अजहर को ग्लोबल आतंकवादी घोषित किए जाने के बाद सोशल मीडिया पर दहशत का माहौल देखने को मिला है। सोशल मीडिया पर युवाओं ने मसूद अजहर की ‘क्यूटी पाई’ तस्वीर के अभाव में किसी ऐसे सज्जन की तस्वीर उठाकर शेयर कर डाली, जिसका वैश्विक आतंकवाद से कोई सम्बन्ध नहीं है। व्हाट्सएप्प ग्रुप्स में खुद ही ‘हेलो जी, स्वीट निनी जी’ तस्वीरें ‘वायरल’ कर उसका #Fact Check करने वाले सॉल्ट न्यूज़ नामक गिरोह ने भी इस तस्वीर को तत्परता से आड़े हाथों लेते हुए इस युवक की तस्वीर का भंडाफोड़ करते हुए लिखा है, “नहीं, तस्वीर दिखने वाला व्यक्ति नहीं है ग्लोबल आतंकी मसूद अजहर।”

ऑपइंडिया ‘तीखी मिर्ची सेल’ ने इस तस्वीर को चारों ओर से घेर लिया

इसके बाद जब हमने इस तस्वीर की वास्तविकता जाँचने के लिए ऑपइंडिया तीखी मिर्ची सेल के पास फैक्ट चेक के लिए भेजा, तो हमें इसमें कुछ गैर-राजनीतिक और चौंकाने वाले साक्ष्य नजर आए।

ऑपइंडिया तीखी मिर्ची सेल ने जो जानकारी दी है वो ‘भोत हार्ड’ है। तीखी मिर्ची सेल ने बताया कि तस्वीर में दिखने वाला यह शख़्स ग्लोबल आतंकी मसूद अजहर नहीं बल्कि एक छुटभैय्या कॉमेडियन है, जो सड़कों पर लोगों से गैर-राजनीतिक तरीके से मोदी को वोट ना देने की भीख माँगता है। तीखी मिर्ची सेल ने यह भी बताया कि इस सस्ते कॉमेडियन के तार भारत की बुर्जुर्ग राष्ट्रीय पार्टी कॉन्ग्रेस से भी जुड़े हैं और यह उनका गैर-राजनीतिक पार्टी प्रवक्ता भी है। हालाँकि, इसके बाद जब तीखी मिर्ची सेल ने कुणाल कामरा से बात करने की कोशिश की तो उन्होंने यह नहीं बताया कि उन्हें कॉन्ग्रेस से जुड़े होने के बाद भी कॉमेडी ना कर पाने की वजह से टारगेट किया जा रहा है।

सड़कों पर ‘एंटी मोदी कॉमेडी’ करने की वजह से बन गया है ‘चूसा हुआ आम’

हालाँकि, गर्मी में सड़कों पर दिन-रात एक कर के मोदी को वोट ना देने की अपील करने के कारण कॉन्ग्रेस के इस पार्टी प्रवक्ता की हड्डियाँ शिथिल पड़ गई हैं, जिस कारण ये ग्लोबल आतंकवादी मसूद अजहर जैसे नजर आने लगा है। लेकिन, फिर भी सोशल मीडिया पर लोगों का यह दावा सिरे से गलत है कि यही ग्लोबल आतंकवादी मसूद अजहर है।

सड़कों पर कूटे जाने के भी हैं प्रमाण, इसके बाद ही अपनाया था ‘न्यू लुक’

इस सस्ते कॉमेडियन का फैक्ट चेक करने पर तीखी मिर्ची सेल के हाथ एक पुराना ‘वायरल वीडियो’ भी हाथ लगा है, जिसमें यही मसूद अजहर जैसा दिखने वाला कॉमेडी के नाम पर खुद कॉमेडी, यानी कुणाल कामरा सड़क पर कुछ मनचले युवाओं द्वारा कूटे जा रहे हैं और वो अपनी करतूतों के लिए माफ़ी माँगते हुए भी देखे गए हैं। सूत्रों का यहाँ तक कहना है कि कुणाल कामरा ने इस घटना के बाद ही अपना लुक बदलने के लिए नया भेष धरा था, लेकिन इस नए रूप में वो पूरे आतंकवादी मसूद अजहर की तरह नजर आने लगे और सोशल मीडिया पर अनपेड ट्रॉल्स द्वारा ट्रॉल किए गए। हालाँकि, ऑपइंडिया इस तरह की किसी भी हिंसा की कड़ी निंदा करता है।

हमारी राय

हमारी राय यही है कि लोगों को सोशल मीडिया पर इस प्रकार की तस्वीरों को वायरल करने से बचना चाहिए। कॉन्ग्रेस के गैर-राजनीतिक पार्टी प्रवक्ता होने मात्र से कुणाल कामरा ग्लोबल आतंकवादी ठहराया जाना निंदनीय है और इसकी कड़ी से कड़ी निंदा की जानी चाहिए।

वायरल तस्वीरों की एक झलक

राहुल गाँधी ने कहा ‘चौकीदार चोर है’ ग्रामीण महिलाओं ने लगाए ‘मोदी जिंदाबाद’ के नारे

राहुल गाँधी के लिए झारखण्ड में अत्यंत असहज स्थिति पैदा हो गई जब उनके “चौकीदार चोर है” के जवाब में सभा में मौजूद महिलाओं ने “मोदी जिंदाबाद” के नारे लगाने शुरू कर दिए। मौके पर मौजूद पत्रकारों के पूछने पर महिलाओं ने बताया कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का समर्थन इसलिए कर रहीं हैं क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें शौचालय, गैस कनेक्शन, बिजली आदि दिए।

कॉन्ग्रेस के प्रत्याशी की थी सभा, महिलाओं ने पूछा, ‘ये बात नोट किए हो न?’

मामला झारखण्ड के सिमडेगा का है। वहाँ कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी पार्टी के एक प्रत्याशी के पक्ष में जनसभा को  संबोधित करने पहुँचे थे। उनका भाषण खत्म होने के बाद जब मंच से ‘चौकीदार चोर है’ के नारे लगने शुरू हुए, तो जनसभा की अग्रिम पंक्ति में बैठी महिलाएँ “मोदी जिंदाबाद” के नारे लगाने लगीं

पहले तो वहाँ उपस्थित पार्टी कार्यकर्ता सकते में आ गए। इस बीच सभा कवर कर रहे मीडियाकर्मी लपक कर महिलाओं तक पहुँचे और उनसे राहुल गाँधी की सभा में यह नारे लगाने का कारण पूछा। उन्होंने जवाब दिया कि प्रधानमंत्री की विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं में उन्हें शौचालय, गैस कनेक्शन, बिजली, पक्का मकान इत्यादि मिले हैं, इसलिए वह मोदी समर्थक हैं। महिलाओं का उत्साह इस कदर था कि वह केवल पत्रकारों को यह बयान देकर ही नहीं रुकीं, बल्कि यह पूछा भी कि उनकी नारेबाजी को नोट किया गया है या नहीं।

जनकल्याणकारी योजनाएँ बनाम राफ़ेल आरोप

भाजपा जहाँ अपनी जनकल्याणकारी योजनाओं के बलबूते पुनर्निर्वाचन की ताल ठोंक रही है, वहीं कॉन्ग्रेस ने राफेल में हुए तथाकथित ‘घोटाले’ को अपना मुख्य मुद्दा बना रखा है। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष लगातार देश भर में “चौकीदार चोर है” के नारे लगा और लगवा रहे हैं, वहीं उनके इस नारे के प्रत्युत्तर में मोदी ने “मैं भी चौकीदार” अभियान प्रारंभ किया। इसके अंतर्गत उन्होंने अपने नाम के आगे ट्विटर पर ‘चौकीदार’ जोड़ लिया और अन्य लोगों से भी ऐसा करने की अपील की। उनके अभियान से जुड़ कर आज ट्विटर पर करोड़ों लोगों ने अपने नाम में ‘चौकीदार’ जोड़ लिया है।

सर्जिकल स्ट्राइक का मजाक उड़ाने वाले आज कह रहे हैं MeToo-MeToo: PM मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार (मई 3, 2019) को राजस्थान के सीकर में की गई रैली में कॉन्ग्रेस के ऊपर जमकर हमला बोला। पीएम ने कॉन्ग्रेसी नेता द्वारा सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर दिए गए उस दावे पर तंज कसा, जिसमें कॉन्ग्रेस कहती है कि उनके कार्यकाल में भी सर्जिकल स्ट्राइक हुए थे। पीएम ने कहा कि कॉन्ग्रेस ने ऐसे सर्जिकल स्ट्राइक किए, जिसके बारे में किसी को कुछ पता ही नहीं चला। उन्होंने कहा कि ये कैसी सर्जिकल स्ट्राइक थी कि न तो आतंकियों को, न पाकिस्तान को और न ही हिंदुस्तान में किसी को इसके बारे में पता चला।

पीएम मोदी ने कहा कि कॉन्ग्रेस पहले कहती थी कि सर्जिकल स्ट्राइक कुछ नहीं होती। ये तो सेना हर दिन करती थी। उन्होंने सर्जिकल स्ट्राइक का मजाक उड़ाया और जब देखा कि जनता मोदी के साथ खड़ी है तो विरोध करना शुरू किया और जब इससे जनता का समर्थन बढ़ गया, तो जनता का समर्थन हासिल करने के लिए वो भी कहने लगे कि उन्होंने भी स्ट्राइक की थी। यानी पहले मजाक उड़ाया, फिर विरोध किया और अब मीटू-मीटू करने लगे हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने आगे कहा कि कॉन्ग्रेस पार्टी केवल एसी कमरों में बैठकर कागजों पर सर्जिकल स्ट्राइक करने का दावा कर सकती है। पहले उन्होंने कहा कि हमने 3 बार सर्जिकल स्ट्राइक की, कल कहा कि हमने 6 बार की और अब कुछ दिनों में वो कहेंगे कि उन्होंने हर दिन सर्जिकल स्ट्राइक किया। इतना ही नहीं, 23 मई के बाद तो वो ये भी कहेंगे कि उन्होंने 600 बार सर्जिकल स्ट्राइक किया था।

इस दौरान पीएम मोदी ने कहा कि पहले ऐसी सरकारें थी, जिन्होंने भारत के हक का पानी पाकिस्तान को दिया। उन्होंने कहा कि वो वादा करते हैं कि जब 23 मई को चुनाव के नतीजे आएँगे और एक बार फिर से उनकी सरकार बनेगी तो आज भारत का जो पानी पाकिस्तान जा रहा है, उसे पाकिस्तान जाने से रोक दिया जाएगा और वो पानी हिंदुस्तान के खेतों में जाएगा। गौरतलब है कि, साल 2014 में, पीएम नरेंद्र मोदी ने राजस्थान में सभी 25 सीटों पर जीत हासिल की थी।

काशी विश्वनाथ कॉरिडोर से 40 प्राचीन मंदिरों को मिलेगा भव्य स्वरुप, आस्था और आधुनिकता का अनूठा संगम

दुनिया के सबसे प्राचीन शहरों में से एक काशी अर्थात वाराणसी विश्व पटल पर अपने पुराने गौरव के साथ सभी का स्वागत करने के लिए तैयार है क्योंकि काशी विश्वनाथ मंदिर गलियारे का निर्माण कार्य प्रगति पर है। 39,000 वर्ग मीटर के क्षेत्र में विस्तृत 700 करोड़ रुपए के निवेश से निर्मित विश्वनाथ मंदिर गलियारा 12 ज्योतिर्लिंग मंदिरों में से एक प्राचीन मंदिर को वाराणसी के प्रसिद्ध घाटों से जोड़ेगा।

पीएम मोदी ने इस महत्वाकांक्षी परियोजना का 8 मार्च, 2019 को खुद शिलान्यास किया था। 1780 ई के बाद, वाराणसी शहर सबसे बड़े परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। इससे पहले इंदौर की मराठा रानी अहिल्याबाई होल्कर ने मंदिर और आस-पास के इलाकों का जीर्णोद्धार किया था। इसके बाद 1853 ई. में, सिख महाराजा रणजीत सिंह ने काशी विश्वनाथ मंदिर के शिखर को सोने से मढ़वाया था और अब पीएम मोदी के नेतृत्व में, शहर का भव्यतम निर्माण कार्य काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के रूप में परिवर्तन की आधुनिक लहर से गुजर रहा है।

चूँकि, गलियारे के निर्माण की प्रक्रिया प्रगति पर है, इसलिए घाटों और मंदिरों की ओर जाने वाली संकरी गलियों से सटी हुई इमारतों को ध्वस्त कर दिया गया है। ध्वस्तीकरण की प्रक्रिया से क्षेत्र में 40 मंदिरों की खोज हुई है, जो अब तक इसी क्षेत्र के कई इमारतों और संरचनाओं के अंदर कैद थे। पीएम मोदी ने कहा है कि इन प्राचीन मंदिरों को जनता के दर्शन के लिए संरक्षित किया जाएगा।

एक ऐसे शहर की सांस्कृतिक विरासत को  संरक्षित करने के लिए जो प्राचीन काल से ही हिंदू धर्म, आस्था और हिंदू पौराणिक कथाओं का प्रमुख केंद्र रहा है। सरकार के लिए यह सब इतना आसान नहीं था। काशी विश्वनाथ मंदिर के आसपास की अनावश्यक संरचनाओं को नष्ट करने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति का होना अनिवार्य था, और ऐसा करने के लिए महादेव की नगरी में स्वयं भगवान शिव की तरह विध्वंसक रूप अख्तियार किए बिना संभव नहीं था। कॉरिडोर परियोजना के सीईओ ने दावा किया है कि सभी कानूनी अधिकार धारकों को उचित मुआवजा दिया गया है।

कई निवासी 40 मंदिरों के पुनः प्राचीन स्वरुप के अस्तित्व में आने से गदगद थे जो न जाने कब से क्षेत्र में फैली हुई आवासीय और व्यावसायिक संरचनाओं के नीचे छिप गए थे। उनमें से अधिकांश ने काशी विश्वनाथ मंदिर के गलियारे को मंजूरी पर ख़ुशी ज़ाहिर करते हुए कहा कि गलियारे के निर्माण से न सिर्फ पर्यटन में इजाफा होगा बल्कि और अधिक पर्यटकों के काशी आगमन से शहर के आधुनिकीकरण का मार्ग भी प्रशस्त होगा।