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राहुल गाँधी ने अज़ान के लिए रोका भाषण: वायनाड की ‘अल्पसंख्यक’ राजनीति अब अमेठी में

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने अपना चुनावी भाषण बीच में तब रोक दिया जब उन्हें पास की किसी मस्जिद से अज़ान की आवाज सुनाई दी। मामला उनके वर्तमान लोकसभा क्षेत्र अमेठी का है, जहाँ से वह एक बार फिर निर्वाचन के लिए उम्मीदवार हैं। गौरतलब है कि अज़ान दिन के पाँचों वक्त की अनिवार्य नमाज़ के लिए इस्लाम के समर्थकों को बुलाने के लिए लगाई जाती है।

वायनाड का रुख कर चुके हैं राहुल

हालाँकि, अमेठी राहुल गाँधी के परिवार का पारंपरिक लोकसभा क्षेत्र रहा है और वह खुद यहाँ से तीन बार संसद जा चुके हैं पर इस बार वह वायनाड से भी चुनाव लड़ रहे हैं। माना जा रहा है कि उन्हें ऐसा मोदी कैबिनेट की कद्दावर मंत्री और भाजपा से दूसरी बार अमेठी की प्रत्याशी स्मृति ईरानी के चलते करना पड़ रहा है। पिछली बार स्मृति ईरानी ने उन्हें कड़ी टक्कर दी थी, और उनका जीत का अंतर 2014 में 2009 के मुकाबले केवल एक-चौथाई बचा था- वो भी तब जब स्मृति ईरानी को भाजपा ने आखिरी समय में अमेठी भेजा था।

निर्वाचन में पराजित होने के उपरांत भी स्मृति ने अमेठी आना-जाना नहीं छोड़ा, और एक जनप्रतिनिधि की भाँति ही अमेठी के लिए कार्य किया है। शायद इसीलिए राहुल गाँधी को अमेठी से बाहर एक ‘सुरक्षित’ सीट भी देखनी पड़ी है।

हिन्दू अल्पसंख्यक हैं वायनाड में

राहुल गाँधी केरल के जिस वायनाड से ‘सुरक्षित’ लोकसभा निर्वाचन की आस लगाए हैं, वहाँ हिन्दू अल्पसंख्यक हैं, और इस्लामी-ईसाई मतावलंबी बहुतायत में हैं। ऐसे में राहुल गाँधी के इस सीट को चुनने के पीछे समुदाय विशेष के तुष्टिकरण से लेकर हिन्दुओं को ‘सन्देश’ तक बहुतेरे कयास लगाए जा रहे हैं। वायनाड में जहाँ 23 अप्रैल को मतदान संपन्न हो चुका है, वहीं अमेठी में 6 मई को होना है। निर्वाचन आयोग परिणामों की घोषणा 23 मई 2019 को करेगा।

‘माया, ममता या नायडू हैं PM पद के प्रमुख दावेदार, मैं खुद इस रेस में नहीं’

लोकसभा चुनावों में NDA को बहुमत आने की संभावना नहीं के बराबर है। ऐसे में मायावती या चंद्रबाबू नायडू या ममता बनर्जी देश के अगले प्रधानमंत्री बनने के लिए सबसे उपयुक्त कैंडिडेट हैं। प्रधानमंत्री बनने से पहले नरेंद्र मोदी भी एक मुख्यमंत्री ही थे। ये तीनों भी मुख्यमंत्री हैं या रह चुके हैं। – चौथे चरण के मतदान से ठीक पहले राष्‍ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के अध्‍यक्ष शरद पवार ने यह कह कर कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी के लिए नई राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है।

शरद पवार ने टाइम्‍स ऑफ इंडिया से बातचीत में यह बात कही है। चुनाव-पूर्व गठबंधन की राजनीति में फेल रहे राहुल गाँधी के लिए यह एक स्पष्ट संकेत है। स्पष्ट संकेत इसलिए क्योंकि जो कयास शरद यादव ने NDA को लेकर लगाए हैं, अगर वो सही निकले तो चुनाव-बाद भी UPA का समीकरण कॉन्ग्रेस नहीं बल्कि क्षेत्रीय दलों द्वारा तय किया जाएगा।

राहुल गाँधी कमतर नहीं

पवार ने यह स्पष्ट किया कि उनका कहीं से भी यह मतलब नहीं है कि राहुल गाँधी मायावती या चंद्रबाबू नायडू या ममता बनर्जी से कमतर पीएम कैंडिडेट हैं। पवार को यह स्पष्टीकरण इसलिए देना पड़ा क्योंकि किसी न्यूज चैनल ने ठीक इसके उलट एक खबर चला दी थी। पवार ने सफाई देते हुए कहा कि खुद राहुल गाँधी कई बार बोल चुके हैं कि वो पीएम पद की रेस में नहीं हैं, इसलिए ऐसी बातों का कोई आधार नहीं है।

दिशाहीन ‘गठबंधन’

शरद पवार के अभी के और एक सप्ताह पहले की घटना को जोड़ कर देखेंगे तो हैरानी कम होगी, हँसी ज्यादा आएगी। हुआ यूँ कि एक सप्‍ताह पहले चंद्रबाबू नायडू और शरद पवार मुंबई में थे। तब नायडू ने कहा था कि वह पीएम पद की ओर नहीं देख रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया था कि उनका लक्ष्‍य किसी भी तरह लोकसभा चुनाव में बीजेपी को हराना है। ऐसे में दिग्गज राजनेता पवार का यह बयान समझ से परे है। चौथे चरण के लिए जब चुनाव प्रचार थम चुका है, ऐसे महत्वपूर्ण और मझधार वाले समय में भी ‘गठबंधन’ सिर्फ कयासों के दम पर राजनीति कर रही है।

आपको बता दें कि कुछ दिन पहले चुनाव प्रचार के दौरान शरद पवार ने दावा किया था कि इस बार के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को कम से कम 100 सीटें कम मिलेंगी। इसलिए विपक्ष को प्रधानमंत्री पद के लिए नए चेहरों पर विचार-विमर्श करना होगा।

खुद भी पीएम की रेस से बाहर

उन्‍होंने खुद को भी देश के शीर्ष राजनीतिक पद की रेस से बाहर बताया था। पवार ने कहा था, ‘NCP केवल 22 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। हम 22 की 22 सीटें भी जीतते हैं, तो भी पीएम बनने के बारे में सोचना तर्कहीन होगा।’

फैक्ट-चेक: 60 सेकेंड से कम समय में प्रियंका गाँधी झूठी साबित, जनता को बना रही थीं मूर्ख

कॉन्ग्रेस की पूर्वांचल प्रभारी और महासचिव प्रियंका वाड्रा ने प्रधानमंत्री मोदी पर आरोप लगाया कि उनके निर्वाचन क्षेत्र वाराणसी में पिछले 5 सालों में केवल 15 किलोमीटर की एक सड़क लाल बहादुर शास्त्री हवाई अड्डे से वाराणसी शहर के लिए बनी है, उसके अलावा कोई सड़क ही नहीं बनी है। हमने इसका फैक्ट-चेक किया जिसमें कुल 60 सेकेंड के भीतर ही उनके इस दावे की कलई खुल गई।

एक ही रिपोर्ट काफी

हमने गूगल पर केवल “varanasi road construction” सर्च किया, जिसमें से केवल एक लिंक उठा कर खोलते ही प्रियंका वाड्रा का दावा फुस्स हो गया। आउटलुक की इस एक रिपोर्ट में प्रधानमंत्री मोदी के द्वारा वाराणसी लोकसभा क्षेत्र में दो महत्वपूर्ण सड़कों के लोकार्पण की खबर है, जिनकी कुल लंबाई 34 किलोमीटर है। यह सड़कें हैं राष्ट्रीय राजमार्ग 56 पर 17.25 किलोमीटर की वाराणसी-बाबतपुर सड़क, और 16.55 किलोमीटर की वाराणसी रिंग रोड (फेज़-1)।

यानी एक ही रिपोर्ट में प्रियंका के दावे से दोगुनी से ज्यादा की सड़कें निकल आईं। हमने अपना फैक्ट-चेक उसी जगह रोक दिया क्योंकि अगर किसी के दावे के विपरीत दुगना सबूत 1 मिनट के भीतर निकल आए तो उस पर अपना और अपने पाठकों का और समय व्यर्थ करना हमने उचित नहीं समझा।

क्या केवल झूठ पर ही टिकी है कॉन्ग्रेस की राजनीति?

प्रियंका वाड्रा का यह झूठ वर्तमान निर्वाचन प्रक्रिया में झूठों की बौछार की कॉन्ग्रेस की आखिरी रणनीति का ही हिस्सा है। इसी नीति के तहत कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी राफ़ेल-राफ़ेल करते देश में घूम रहे हैं, और कोई उनके झूठ को नहीं मान रहा। इधर उन्होंने न केवल अपने झूठ को सुप्रीम कोर्ट के हवाले से बोलने शुरू कर दिए हैं (जिसके लिए उन्हें न्यायालय की अवमानना का नोटिस भी जारी हो चुका है), बल्कि अब तो वे एक निजी उद्यमी अनिल अंबानी को सीधे-सीधे नाम लेकर बदनाम करने पर तुले हैं- वह भी बिना एक कतरे सबूत के। और अब प्रियंका का यह झूठ…

झूठ भी कैसा? जो एक मिनट में धराशायी हो गया! यानी या तो प्रियंका बिना कुछ सोचे-समझे रैलियों में जो मुँह में आया बोल दे रहीं हैं, और या फिर उन्होंने देश की जनता को इतना बेवकूफ़ समझा था कि वह जानबूझकर ऐसा झूठ बोल गईं, क्योंकि उन्हें लगा कि बेवकूफ़ जनता कभी गूगल पर जाँच ही नहीं करेगी उनके दावे की। यह इस देश की राजनीति के लिए बहुत दुखद है कि देश के सबसे पुराने राजनीतिक संगठन का शीर्ष नेतृत्व आज ऐसे लोगों के हाथ में है जो या तो बिना सोचे-समझे चुनावी रैलियों में कोई भी अनर्गल दावा कर रहे हैं, और नहीं तो देश की जनता को इतना निपट मूर्ख मानते हैं कि झूठ भी मरियल-सा बोलते हैं क्योंकि उन्हें लगता है जनता में उनके झूठ पकड़ने की काबिलियत ही नहीं है।

सोना से लेकर सोने वाली ‘दवाई’ तक, नकद से लेकर शराब तक: EC द्वारा ₹3205 करोड़ की ज़ब्ती

लोकसभा चुनाव 2019 के चौथे चरण का प्रचार थम चुका है। लेकिन धनबल का हंगामा जारी है। अच्छी बात यह है कि मतदाताओं को बरगलाने से पहले ही इस पर अंकुश लगा दिया गया। आँकड़े तो यही कहते हैं। 2014 के चुनावों के मुक़ाबले नकद बरामदगी में इस बार अब तक 156.3% का इज़ाफ़ा हुआ है।

सात चरणों में सम्पन्न होने वाले लोकसभा चुनाव 2019 की शुरुआत 11 अप्रैल से हो गई थी। आँकड़े के अनुसार अब तक देश भर से कुल ₹778.9 करोड़ की नकद राशि ज़ब्त की जा चुकी है। पिछले लोकसभा चुनाव की बात की जाए, तो 2014 के चुनावों के अंत तक ज़ब्त होने वाली राशि ₹303.86 करोड़ थी।

निर्वाचन आयोग द्वारा प्रतिदिन अपडेट किए जाने वाले आँकड़ों के मुताबिक अब तक ₹3205.72 करोड़ की बरामदगी को सूचीबद्ध किया गया है। इसमें नकदी, शराब, ड्रग्स मादक पदार्थ, सोना और अन्य कीमती वस्तुएँ शामिल हैं।

ख़बर के अनुसार, 2014 में अधिकारियों द्वारा ज़ब्त की गई सामग्रियों में सोना और अन्य क़ीमती धातुएँ सूची में शामिल नहीं थीं। जबकि इस बार न सिर्फ नगद बल्कि शराब से लेकर हर उस चीज पर आयोग की नजर है, जिससे मतदाता को प्रभावित किया जा सकता है।

ज़ब्त किए सोने के आधार पर तमिलनाडु, ₹708.71 करोड़ के 3,063 किलोग्राम सोने के साथ सबसे ऊपर है। इसके बाद मध्य प्रदेश का नंबर था, जहाँ 1,263 किलो सोना जब्त हुआ है। आख़िर में उत्तर प्रदेश है, जहाँ यह आंकड़ा 709 किलोग्राम सोने के साथ है।

ज़ब्त की गई नगद राशि की बात करें तो तमिलनाडु में ₹215.14 करोड़ की नकदी बरामद की गई। यह अन्य राज्यों के मुकाबले सबसे अधिक है। आंध्र प्रदेश में ₹137.27 करोड़ और तेलंगाना में ₹68.82 करोड़ नकदी बरामद की गई।

इसके अलावा, इस वर्ष ₹1185.4 करोड़ के 62 मीट्रिक टन ड्रग्स और नशीले पदार्थ भी ज़ब्त किए गए। इनमें 19.4 टन के साथ उत्तर प्रदेश सबसे आगे है।

2019 लोकसभा चुनावों के दौरान अब तक 132.6 लाख लीटर शराब ज़ब्त की जा चुकी है। महाराष्ट्र में ₹25.24 करोड़ क़ीमत की 32.24 लाख लीटर, उत्तर प्रदेश 15.54 लाख लीटर और पश्चिम बंगाल में 14.06 लाख लीटर शराब ज़ब्त की गई। जबकि, 2014 में ज़ब्त की गई शराब की कुल मात्रा 65 लाख लीटर थी।

देश में सात चरणों में सम्पन्न होने वाली मतदान प्रक्रिया अभी जारी है, इसलिए यह मात्रा और अधिक बढ़ सकती है। 2014 में 7.64 टन ड्रग्स ज़ब्त किए गए थे।

बुरे फँसे राहुल गाँधी! 20 मई को व्यक्तिगत रूप से पटना कोर्ट में उपस्थित होने का आया आदेश

लोकसभा चुनावों के बीच कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ‘चौकीदार चोर है’ के नारे को लेकर बुरी तरह मुसीबतों में फँस गए हैं। बिहार के डेप्यूटी सीएम सुशील कुमार मोदी के द्वारा राहुल गाँधी के खिलाफ इस नारे को लेकर दायर मानहानि के केस में पटना के एक कोर्ट ने शनिवार (अप्रैल 27,2019) को समन जारी किया। समन में उन्हें 20 मई को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का आदेश दिया गया है। बिहार के आरा की सिविल कोर्ट ने भी राहुल के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया है। यह मुकदमा भी पिछले दिनों समस्तीपुर में महागठबंधन की तरफ से आयोजित संयुक्त रैली में भी राहुल गाँधी के द्वारा ‘चौकीदार चोर है’ के नारे लगाने पर दर्ज किया गया है।

जानकारी के मुताबिक, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट शशिकांत राय ने सुशील मोदी के शपथ-पत्र पर दिए गए बयान और राहुल गाँधी के भाषण की सीडी देखने के बाद आइपीसी की धारा 500 के तहत समन जारी किया है। गौरतलब है कि कोलार जिले में एक चुनावी जनसभा को संबोधित करते हुए राहुल गाँधी ने पीएम नरेंद्र मोदी के ऊपर निशाना साधने के साथ ही नीरव मोदी, ललित मोदी का नाम लेते हुए कहा था कि सभी चोरों के नाम में मोदी है। जिसके बाद बिहार के उप-मुख्यमंत्री सुशील मोदी ने राहुल गाँधी के खिलाफ आपराधिक मानहानि का मुकदमा दर्ज कराया था। सुशील मोदी की तरफ से कोर्ट में कहा गया कि राहुल गाँधी वाले भाषण में मोदी सरनेम वाले व्यक्ति को चोर बताया था, जिससे समाज में उनकी छवि धूमिल हुई है। यह एक आपराधिक कृत्य है, जिसकी सजा न्यायालय द्वारा राहुल गाँधी को मिलनी चाहिए।

वहीं, आरा सिविल कोर्ट ने समस्तीपुर में एक चुनावी रैली के दौरान बार-बार ‘चौकीदार चोर है’ के नारे लगवाने के मामले में राहुल के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है। कोर्ट ने इस मामले में राहुल के साथ-साथ आरजेडी नेता तेजस्वी यादव के खिलाफ भी केस दर्ज किया है, क्योंकि इस महागठबंधन की रैली में वो भी राहुल गाँधी के साथ मंच शेयर कर रहे थे और नारे लगवाने के दौरान वहाँ मौजूद थे। राहुल ने अपने भाषण के अंत में लोगों से बार-बार ‘चौकीदार चोर है’ के नारे लगवाए थे।

मैं खुश हूँ कि वो मारा गया, वह गलत रास्ते और गलत लोगों के साथ था: श्री लंका आतंकी की अपनी बहन

श्री लंका में पिछले रविवार हुए ईस्टर बम धमाकों के हमलावरों में से एक ज़ाहरान हाशिम की बहन को उसकी मौत का कोई अफ़सोस नहीं है। उनके मुताबिक उनका भाई गलत रास्ते पर था, और उसकी मौत की उन्हें ख़ुशी है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि उनके पति ने और उन्होंने ज़ाहरान से रिश्ते 2017 में ही तोड़ लिए थे जब वह आतंकवादियों की भाषा बोलने लगा था।

‘वे आतंकी हैं’

मदानिया नामक ज़ाहरान हाशिम की बहन ने यह सब श्री लंका की गुप्तचर टीम से इन्डियन एक्सप्रेस संवाददाता की मौजूदगी में कहा है। कल (शनिवार, 28 अप्रैल, 2019) सादे कपड़ों में श्री लंकाई सैन्य गुप्तचर विभाग (मिलिट्री इंटेलिजेंस) के अफसर कालमुनाई में हुए बम धमाकों के बाद मदानिया के घर पहुँचे थे। वह चाहते थे कि मदानिया और उनके पति शरीफ़ नियास अम्पारा शहर के पास मौजूद अस्पताल में चलकर धमाकों के लिए जिम्मेदार लाशों की शिनाख्त करें। गौरतलब है कि कालमुनाई में हुए बम धमाकों में मारे गए 15 लोग हाशिम परिवार के ही बताए जा रहे हैं। धमाके जिस घर में हुए, वह भी उनका ‘अड्डा’ माना जा रहा है, जहाँ वह ज़ाहरान के ईस्टर बम धमाकों के तीन दिन पहले से जाकर छिप गए थे।

मदानिया ने उनकी लाशें देखने से मना कर दिया और कहा कि वे केवल तस्वीरों से ही शिनाख्त करना पसंद करेंगी (उनके पति शरीफ़ ने यह बात अफ़सरों को बताई)। इस पर अफ़सरों ने उन्हें बताया कि यह उनका उनके घर वालों के अवशेषों को देखने का आखिरी मौका है। अपसरों ने कहा, “अगर वह आपके घर वाले ही निकलते हैं तो वैसे भी आप उनको आखिरी बार देख रही होंगी। वे आतंकी हैं।” लेकिन इस स्पष्ट संकेत के बाद भी मदानिया अपने बात पर टिकी रहीं।

कालमुनाई: मरने वालों में बच्चे, औरतें, बूढ़े

कालमुनाई में मरने वालों में 26-वर्षीय ज़ाहरान का एक भाई, उसकी पत्नी और दो बच्चे, एक दूसरा भाई मोहम्मद ज़ैन हाशिम (जो या तो फ़रार है, या ईस्टर धमाकों में मारा गया) की पत्नी और दो बच्चे, ज़ाहरान की एक दूसरी बहन, उसका पति और उसका बच्चा, ज़ाहरान के कम-से-कम दो बच्चे और इन सभी भाई-बहनों के बूढ़े माँ-बाप शामिल हैं। वह सभी ईस्टर धमाकों के तीन दिन पहले लापता हो गए थे। मदानिया के पति नियास, जो सेकेंड-हैंड वाहनों के छोटे-मोटे डीलर हैं, ने दावा किया कि अफ़सरों ने धमाकों में ज़िन्दा बचे दो लोगों की तस्वीर भी उन्हें दिखाई, जिन्हें उन्होंने ज़ाहरान की पत्नी और उसके बच्चों में से एक के रूप में पहचाना। हालाँकि पूछे जाने पर श्री लंका सेना के प्रवक्ता ब्रिगेडियर सुमित अटापट्टू ने इस पर टिप्पणी करने से इंकार कर दिया।

मदानिया ने यह दावा किया कि उन्हें इस्लामिक स्टेट के बारे में कोई जानकारी नहीं है। “हमारी बात 2017 में ही तब बंद हो गई जब उसने अपने भाषणों में जहर उगलना शुरू कर दिया। वह उत्तेजक भाषण देता था और भीड़ खींचने में उसे महारत हासिल थी। पर जब उसने सरकार, मुल्क, झंडे, निर्वाचन, और दूसरे मजहबों के खिलाफ तकरीरें देना शुरू कर दिया, तो मुझसे और नहीं रहा गया। उसने हमारे परिवार पर कोहराम ला दिया है।”

इन्डियन एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में यह भी लिखा है कि मदानिया और नियास का घर उस नेशनल तौहीद जमात की मस्जिद से महज़ 100 मीटर की दूरी पर है, जहाँ ज़ाहरान आतंकी बना था। स्थानीय लोगों का कहना है कि मस्जिद में पिछले दो सालों से मरम्मत का काम चालू है।

पहले ही था पुलिस की नजर में, लहराई थी तलवार

मदानिया बतातीं हैं कि उनके पति ज़ाहरान से दूर ही रहते थे क्योंकि उन्हें लगता था कि वह ऐसे रास्ते की ओर मुड़ चुका है, जो खतरनाक है। वह दूसरे मज़हबों ही नहीं, उदारवादी मुसलामानों और सूफ़ियों को भी अपशब्द कहता था – उसके लिए सूफ़ी नशेड़ी थे। पुलिस की भी उस पर नजर थी। इस बात की तस्दीक फर्स्टपोस्ट की रिपोर्ट से भी होती है, जिसमें यह दावा किया गया है कि एक दूसरे मज़हबी गुट के साथ टकराव में तलवार निकाल लेने के बाद से ज़ाहरान हाशिम पुलिस की नजरों में था।

मदानिया के मुताबिक ज़ाहरान ने सामान्य स्कूल में छठी कक्षा से ही जाना छोड़ दिया था। पर इस्लामिक पढ़ाई में उसकी रुचि बनी रही- इतनी ज्यादा कि उसने केवल कुरान रटने के लिए अरबी का कोर्स किया और 2006 में एक इस्लामिक अध्ययन केंद्र खोल डाला। मदानिया ने कहा, “उसने अल्लाह को खो दिया क्योंकि उसने हदीथ गलत लोगों से सीखी, और लोगों को मारना सीख लिया। मुझे कहना चाहिए कि मैं खुश हूँ कि वह अब इस दुनिया में नहीं है।”

188 केस है जिसके ऊपर, जो है जेल में बंद: PM मोदी के खिलाफ वाराणसी से लड़ेगा चुनाव!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी से समाजवादी पार्टी के पूर्व सांसद अतीक अहमद पीएम के खिलाफ चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं। बता दें कि उन्होंने नामांकन फॉर्म खरीदने के बाद इलाहाबाद की एमपी-एमएलए स्पेशल कोर्ट में पर्चा दाखिल करने व प्रचार के लिए तीन सप्ताह की परोल देने की माँग की है। कोर्ट ने अतीक अहमद की इस अर्जी पर सुनवाई के लिए 29 अप्रैल की तारीख तय की है। अतीक अहमद की तरफ से दी गई अर्जी में लिखा गया है कि वो जेल में हैं और वाराणसी संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ना चाहते हैं। इसके लिए उन्होंने नामांकन फॉर्म भी खरीद लिया है। मगर जेल में रहकर चुनाव प्रचार नहीं कर सकते, इसलिए उन्होंने चुनाव प्रचार करने के लिए तीन सप्ताह के लिए जमानत पर रिहा करने की कोर्ट से गुजारिश की है।

खबरों के मुताबिक, पूर्व सपा नेता शिवपाल सिंह यादव की प्रगतिशील समाजवादी पार्टी अतीक अहमद को टिकट दे सकती है। प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के प्रदेश महासचिव लल्लन राय ने पहले बताया था कि अतीक अहमद उनकी पार्टी से चुनाव लड़ेंगे। मगर शनिवार (अप्रैल 27, 2019) को देर रात उन्होंने इस बात का खंडन करते हुए स्पष्ट किया कि फिलहाल अतीक अहमद को पार्टी का उम्मीदवार नहीं बनाया गया है। उन्होंने कहा कि अतीक अहमद के आवेदन करने के बाद उनके उम्मीदवार बनाए जाने पर विचार किया जाएगा।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (अप्रैल 23, 2019) को अतीक अहमद व उसके साथियों द्वारा रियल एस्टेट डीलर मोहित जायसवाल के कथित अपहरण और अत्याचार के मामले में सीबीआई जाँच का आदेश दिया था। इसके साथ ही उत्तर प्रदेश के नैनी जेल में बंद अतीक को गुजरात के जेल में ट्रांसफर करने का भी आदेश दिया था। बता दें कि अतीक अहमद पर आरोप है कि दिसंबर 2018 में देवरिया जेल में बंद रहने के दौरान उन्होंने अपने साथियों के द्वारा लखनऊ के आलमबाग क्षेत्र के निवासी मोहित जायसवाल का अपहरण करवा लिया था और फिर जेल में ले जाकर उसके साथ मारपीट की और मोहित से संपत्ति से जुड़े कई दस्तावेजों पर दस्तखत भी करा लिए थे।

कभी अतीक अहमद ने कहा था, “मेरे ऊपर 188 मामले चल रहे हैं, अपनी आधी ज़िंदगी जेल में व्यतीत की है, इस पर मुझे गर्व है।” सीना तान कर तब अतीक ने कहा था कि वह अपने समर्थकों के लिए किसी भी हद तक जा सकता है, चाहे उसके जो भी परिणाम हों।

मीडिया गिरोह केजरीवाल के बाद अब ‘लाल सलाम’ के साथ खेलना चाहता है ‘पुण्डा-पुण्डी’

राजनीति के डाकू खड़गसिंह, यानी अरविन्द केजरीवाल का प्रकरण अभी पूरी तरह से शांत नहीं हुआ है कि भारतीय मीडिया गिरोह ने अपना दूसरा झुनझुना तलाशना शुरू कर दिया है। मीडिया गिरोह द्वारा हाल ही में गोद लिए गए इस नवीनतम झुनझुने का नाम है, कामरेड कन्हैया कुमार! JNU के इस ‘चर्चित’ नाम के ही कारण ‘बिहार की औद्योगिक राजधानी’, ‘दिनकर की धरती’, ‘पूरब का लेनिनग्राद’, जैसे नामों के बीच एक बार फिर बेगूसराय में ‘लाल झंडे’, ‘अर्बन नक्सल’ और ‘वामपंथ’ जैसे शब्दों पर चर्चा हो रही है।

अभी बहुत समय नहीं हुआ है, जब देश के कुछ प्रतिष्ठित संस्थानों में से एक माने जाने वाले JNU में देशविरोधी नारे लगाए जाने के बाद कन्हैया कुमार और उनके छुटभईये साथी गुर्गे उमर खालिद राष्ट्रीय चर्चा का विषय बना दिए गए। चर्चा में रहने के शौकीनों का पत्रकारिता में बैठे, ‘नई छत’ तलाशने वाले लोगों को बेसब्री से इंतज़ार होता है।

‘आत्ममुग्ध बौने’ को भी लिया था मीडिया गिरोह ने ‘गोद’

राजनीति और समसामयिकी में रूचि रखने वाले देश के युवाओं को अच्छे से याद है कि उनके साथ सबसे बड़ा खिलवाड़ करने वाले आम आदमी पार्टी अध्यक्ष और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल किस तरह से सोशल मीडिया द्वारा रातों-रात हीरो बना दिए गए थे। ‘आत्ममुग्ध बौने’ के नाम से जाने जाने वाले धूर्त अरविन्द केजरीवाल ने कॉन्ग्रेस के विरोध में बने माहौल का फायदा उठाकर लोगों की भावनाओं को पहले विश्वास में लिया, अपने आंदोलन को ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ का नाम दिया और ऐन समय पर कॉन्ग्रेस के साथ ही सत्ता का जोड़-तोड़ कर सरकार बनाई। आम आदमी पार्टी की सरकार बनते ही शीला दीक्षित द्वारा किए गए भ्रष्टाचारों वाली 365 पन्नों की फ़ाइल अचानक से मुद्दों से गायब हो गई।

नई वाली राजनीति के नाम पर और IIT डिग्री का झाँसा देकर अरविन्द केजरीवाल ने उस युवा को निशाना बनाया, जो वाकई में केजरीवाल से राजनीती में एक ऐतिहासिक बदलाव की उम्मीद लगा बैठा था। लेकिन IRS, IIT जैसे नामों को भुनाने के बाद अरविन्द केजरीवाल ने ये साबित कर दिया कि डिग्री इंसान के अंदर बैठी मक्कारी को रिप्लेस नहीं कर पाती है। यही वजह है कि एक ‘चायवाला चौकीदार’ देश का प्रधान सेवक बन जाता है और एक IIT से पढ़ा हुआ आदमी आत्ममुग्ध बौने में तब्दील होकर रह जाता है। ‘बड़ी यूनिवर्सिटी’ से ग्रेजुएट होना पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान, हमारे भूतपूर्व प्रधानमंत्री और अर्थशास्त्री डॉ. मनमोहन सिंह और IIT से पढ़े हुए अरविंद केजरीवाल से पहले इतनी बड़ी ‘गाली’ कभी नहीं हुआ करती थी।

हालाँकि, जल्दी ही अरविंद केजरीवाल ने जनता का यह सपना भी तोड़ दिया। सत्ता मिलते ही कमाल रशीद खान से पहले ही हर शुक्रवार को फिल्मों के रिव्यु देकर केजरीवाल ने राजनीति की नई परिभाषा गढ़नी शुरू कर दी। अब चूँकि केजरीवाल अच्छे से समझ चुके थे कि इस देश की मीडिया के भीतर किसी व्यक्ति विशेष से घृणा में किसी भी राह चलते आदमी को हीरो बना देने की व्याकुलता है, इसलिए केजरीवाल ने चर्चा में बने रहने का हर संभव षड्यंत्र रचा।

मीडिया गिरोह के कुलपतियों ने केजरीवाल को विशेष संरक्षण दिया। इंसान से लेकर जानवरों तक की जाति में रूचि रखने वाले एक ‘निष्पक्ष’ पत्रकार ने केजरीवाल द्वारा खुद को बनिया बताने के बावजूद भी अपनी गोद में बिठाकर खूब दूध पिलाया। उसी निष्पक्ष पत्रकार ने केजरीवाल के लिए इंदिरा गाँधी की कार का चालान काट देने वाली पूर्व IPS अधिकारी का पीछा कर ये साबित करने का भरसक प्रयास किया कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की कार का चालान काटना कोई बड़ी बात नहीं थी।

संयोग की बात है कि ये वही पत्रकार है जिसे आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बस एक नजर और अटेंशन का उसी तरह इन्तजार रहता है, जिस तरह एक 18 साल के प्रेम में डूबे एक युवा को प्रेमिका की बस एक नजर का इन्तजार रहता है। लेकिन, जब लाख कोशिशों के बावजूद भी प्रेमिका उसे घास नहीं डालती, तो प्रेमी अपने हाथ की नस काटने तक को तैयार हो जाता है।

कामरेड कन्हैया कुमार में मीडिया ने तलाश लिया नया ‘तैमूर’

अरविन्द केजरीवाल और प्रियंका गाँधी से एकतरफा मोहब्बत में धोखा खाने के बाद इस मीडिया गिरोह को अब बेताबी से किसी नए झुनझुने की तलाश थी। JNU जैसे संस्थान से निकले माओवंशी कामपंथियों से बढ़िया विकल्प और क्या हो सकता था?

पटियाला हाउस कोर्ट में जमकर कूटे जाने के बाद कामरेड कन्हैया कुमार का मीडिया में बने रहने का ‘पोटेंशियल’ मीडिया गिरोह ने तुरंत भाँप लिया था। इसके बाद अब तमाम छोटी-बड़ी टुकड़ियाँ कन्हैया कुमार के लिए दरबार सजाने में व्यस्त दिखाई देने लगी हैं।

बेगूसराय से भाजपा उम्मीदवार गिरिराज सिंह के खिलाफ कामरेड कन्हैया ने टिकट लिया और अपनी गरीबी के सिलेंडर को कैमरा के सामने लाकर जमकर बेच रहा है। कन्हैया कुमार के LPG सिलेंडर दिखाकर मीडिया गिरोह की TRP में भी उछाल आने के कारण कामरेड की गरीबी पर निष्पक्ष पत्रकारों को खूब चरमसुख मिलता नजर आ रहा है। लेकिन अचानक ‘वन फाइन डे’ इस LPG सिलेंडर न जुटा पाने वाले कामरेड की तस्वीरों से बेगूसराय के लगभग हर हिंदी और अंग्रेजी समाचार पत्र के पहले पन्ने भर गए।

वामपंथ के टार और मीडिया गिरोह की मक्कारी के मिश्रण से ही यह चमत्कार सम्भव हो पाता है कि एक शाम LPG सिलेंडर के लिए मशक्कत करता हुआ युवा अगली सुबह हर महँगे-सस्ते, हिंदी-अंग्रेजी अखबार का पहला पन्ना बन जाता है।

चंदा-परस्त वामपंथ

देखा जाए तो अरविन्द केजरीवाल और कन्हैया कुमार में सबसे बड़ी समानता है ‘चंदा’। अगर अरविन्द केजरीवाल राजनीति के चंदा मामा हैं तो कन्हैया कुमार राजनीति के चंदा-युवा बन गए हैं। इसी चंदे से केजरीवाल की गरीबी और आम आदमी की ‘आदमियत’ बेची गई और इसी गरीबी से कन्हैया कुमार की फिजा बनाने की तैयारियाँ की जा रही हैं।

‘चंदा-भक्षी’ शेहला रशीद हैं समर्थन में

इस ‘चंदा-धंधा’ प्रकरण में सबसे मजेदार बात यह है कि कन्हैया कुमार का समर्थन करते हुए चंदे की माँग करने वाली शेहला रशीद भी उनके साथ कंधे से कन्धा मिलाकर खड़ी है। शेहला रशीद की चंदा डकार जाने की अनोखी प्रतिभा देखकर ही उन्हें दोबारा चंदे के धंधे की बागडोर सौंपी गई है। ये वही शेहला रशीद है, जिन पर कठुआ रेप पीड़ितों के परिवार को न्याय दिलाने के नाम पर चंदा इकठ्ठा करने और चुपचाप डकार जाने का आरोप है।

40.63 लाख रुपए इकट्ठा होने की जानकारी शेहला रशिद ने ट्वीट कर खुद बताई थी। जब पीड़ित परिवार ने चंदा इकट्ठा करने वाली शेहला रशिद से उस फंड का विवरण माँगा तो अब वह दाएँ-बाएँ देखने लगी थी। पीड़ित परिवार ने आरोप लगाया था कि शेहला रशीद द्वारा इकट्ठा किए गए चंदे में से उन्हें एक रुपए तक की मदद नहीं मिली। इस मामले में केस लड़ने के लिए उन्हें अपने जीवन यापन का आधार अपने पशु भी बेचने पड़े हैं। लेकिन, मृतक मासूम बेटी को न्याय दिलाने के नाम पर उगाहे गए चंदे के पैसे आखिर हैं कहाँ? क्या अंतर्ध्यान हो गए, ये आज तक एक पहेली ही है।

कामरेड कन्हैया कुमार की दूसरी साथी हैं फिल्म एक्ट्रेस स्वरा भास्कर! जो अपनी फिल्म में खुलकर अपने ‘मन की बात’ करने के लिए फेमस हैं। यानी, कुल मिलाकर राम मिलाए जोड़ी, एक सिल्ला एक लोढ़ी।

शेहला और स्वरा के अलावा जिग्नेश मेवानी और AAP के प्रोपगैंडाबाज इंटरनेट ट्रॉल ध्रुव राठी को भी जर्मनी से उठाकर बेगूसराय की जमीनी हकीकत जाँचने और समझने के लिए उतरा गया है। अर्बन नक्सल का ये साथ और किसी को पसंद हो, ना हो लेकिन पत्रकारिता के समुदाय विशेष को ये साथ खूब पसंद है। हैरानी की बात है कि JNU में रहते हुए जो शेहला रशीद और कन्हैया कुमार कम्युनिस्ट हुआ करते थे, वो राजनीति में आते ही मुस्लिम और भूमिहार हो गए। जितनी तेजी से इन्होने रंग बदला है उस हिसाब से अरविन्द केजरीवाल कहीं भी नहीं ठहरते हैं।    

धीरे-धीरे बेगूसराय में ‘लाल आतंक’ अपना रंग दिखाने लगा है। कुछ दिन पहले ही कन्हैया कुमार की कम्युनिस्ट पार्टी के गुंडों ने स्थानीय लोगों द्वारा विरोध किए जाने पर उन्हें उनके घरों में घुसकर मारा। इसके बदले में देखने को मिला कि कुछ लोगों ने कन्हैया कुमार पर हाथ साफ कर दिए और चुनाव प्रचार के दौरान उनको कूट दिया गया। यानी अर्बन नक्सल अपने पहले चरण में लगभग कामयाब होते नजर आ रहे हैं।

केजरीवाल के डसे हुए पत्रकारिता के कुछ स्थापित मीडिया गिरोह अभी भी कमर कस के कामरेड कन्हैया कुमार की जमकर लहर बना रहे हैं। BBC ने जरा ‘हट के’ इस अर्बन नक्सल के लाडले कामरेड को लेकर अभियान चलाते हुए  ‘कन्हैया के प्रचार में दिन-रात लगी लड़कियां क्या कहती हैं’ जैसे लेख चलाए हैं।

‘निष्पक्षता’ की परिभाषा गढ़ने वाले और रोजाना अपनी मायूस शक्ल लेकर टीवी पर आकर लोगों से टीवी ना देखने की अपील करने वाले एक पत्रकार ने कन्हैया कुमार की गरीबी में घुसकर उनसे एक ऐतिहासिक सवाल पूछ डाला। ये ऐसा सवाल था जो कामरेड कन्हैया कुमार के संसद पहुँचने से पहले समाज और राजनीति को लेकर उनके उनके विजन और दर्शन को जानने में सबसे ज्यादा सहायता करने वाला था। ये सवाल था, “कन्हैया कुमार शादी कब करेंगे?”

यही पत्रकार वो महान पत्रकार हैं, जिन्हें इस बात का गम सुबह-शाम सताए जा रहा है कि आखिर नरेंद्र मोदी उन्हें क्यों नहीं इंटरव्यू देते? लेकिन नरेंद्र मोदी तो शादीशुदा हैं, उनसे शादी कब कर रहे हैं जैसी सवाल पूछने का कोई महत्त्व नहीं है, फिर भी इस पत्रकार के अंदर एक गहरी लालसा प्रतिदिन उनके स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान पहुँचा रही है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इसी वजह से आजकल स्वास्थ्य लाभ के लिए वो अपने प्राइम टाइम में आम भी खाते नजर आ रहे हैं।

खैर, लोकसभा चुनाव जारी हैं और मीडिया का ये लेटेस्ट झुनझुना यानी कामरेड कन्हैया कुमार का राजनीतिक भविष्य भी दाँव पर लगा है। मीडिया द्वारा तैयार किए जाने वाले ये चेहरे चर्चा में आते हैं, उससे दोगुने स्ट्राइक रेट से ये जमीन में धूल खाते नजर आते हैं।

केजरीवाल अभी भी चर्चा में हैं, लेकिन अब ख़बरों का ‘हिसाब‘ किताब बदल चुका है।  अब केजरीवाल की खबरें देखने और सुनने को मिलती हैं कि उनका उन्हीं के विधायकों ने मार-मार के मोर बना दिया है। तो कभी अरविन्द केजरीवाल कॉन्ग्रेस के साथ गठबंधन की भीख माँगने और गिड़गिड़ाने की ख़बरों की वजह से सनसनी बन जाते हैं।

अब यही अध्याय शायद एक बार फिर दोहराया जाना बाकी है। कामरेड कन्हैया अगर सभी को गलत साबित करते हुए आगे बढ़ते हैं, तो ये राजनीति में युवाओं के आगमन के लिए एक अच्छा संकेत साबित होगा। लेकिन, अगर वो भी अरविन्द केजरीवाल वर्जन-2.0 निकलते हैं, तो एक बार फिर हर मायने में मीडिया से लेकर तमाम समर्थकों के साथ खुला धोखा होना तय है। केजरीवाल का डसा हुआ ये आदतन लतखोर मीडिया अगर इस बार ‘लाल सलाम’ से दोबारा डसा जाए, तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

भोपाल से प्रज्ञा ठाकुर ने नामांकन लिया वापस, भाजपा ने ली राहत की साँस

मध्य प्रदेश की भोपाल लोकसभा सीट से प्रज्ञा ठाकुर ने अपना नामांकन वापस ले लिया है, लेकिन ये बीजेपी प्रत्याशी साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर नहीं बल्कि निर्दलीय प्रत्याशी प्रज्ञा ठाकुर हैं। बता दें कि प्रज्ञा ठाकुर ने भोपाल लोकसभा सीट से साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के समर्थन में अपना नामांकन वापस ले लिया है।

दरअसल, भोपाल लोकसभा सीट से बीजेपी ने साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को अपना प्रत्याशी घोषित किया है। जो दिग्विजय सिंह के खिलाफ मुख्य प्रतिद्वंदी हैं। इसी सीट पर उनकी हमनाम प्रज्ञा ठाकुर ने भी नामांकन पत्र दाखिल किया था। एक ही नाम होने से बीजेपी को इस बात की आशंका थी कि मतदाता कहीं किसी गफलत में आकर साध्वी प्रज्ञा ठाकुर की बजाय प्रज्ञा ठाकुर के नाम के आगे वाला बटन ना दबा दें। जिससे वोट बँट जाएगा, इसलिए बीजेपी ने प्रज्ञा ठाकुर से आग्रह किया कि अपना नाम वापस ले लें।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, ऐसा करने के लिए साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने खुद प्रज्ञा ठाकुर को मनाने के लिए अपने घर बुलाया। मुलाकात के बाद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने उनसे चुनाव न लड़ने की अपील की। जिसके बाद प्रज्ञा ठाकुर ने चुनाव ना लड़ने का फैसला किया। इसके बाद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने प्रज्ञा ठाकुर के घर पहुँचकर उन्हें भगवा शॉल भेंट करके उनका सम्मान भी किया। कुछ भी हो, प्रज्ञा ठाकुर के चुनाव ना लड़ने के ऐलान के बाद अब बीजेपी और साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने राहत की साँस ली है।

अभी भी वहाँ वोट काटने के लिए एक और प्रत्याशी मौजूद है, शहीद हेमंत करकरे पर दिए बयान से नाराज़ उनके जूनियर रहे रियाजुद्दीन ने भी भोपाल से नामांकन भरा है। मूल रूप से महाराष्ट्र के औरंगाबाद के रहने वाले रियाजुद्दीन ने भोपाल से लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए नामांकन पत्र दाखिल किया है। हालाँकि, अभी तक उन्होंने अपना नामांकन वापस नहीं लिया, लेकिन बीजेपी के वो उतने बड़े मुश्किल नहीं हैं।

BJP में शामिल हुए सेना के 7 रिटायर्ड अधिकारी, रक्षा मंत्री ने दिलाई सदस्यता

लोकसभा चुनाव के दौरान विभिन्न राजनीतिक दलों के साथ अलग-अलग क्षेत्रों के नामी लोगों के जुड़ने का सिलसिला जारी है। शनिवार को बीजेपी मुख्यालय में रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण की मौजूदगी में सेना के 7 रिटायर्ड अधिकारी बीजेपी से जुड़ गए। बीजेपी में शामिल हुए 7 रिटायर्ड अधिकारियों में 6 थल सेना और 1 वायुसेना के हैं। इनमें से 5 लेफ्टिनेंट जनरल रैंक के और 1 कर्नल रैंक के रिटायर्ड अधिकारी हैं, वहीं एक विंग कमांडर रैंक के हैं।

लेफ्टिनेंट जनरल जेबीएस यादव, लेफ्टिनेंट जनरल आर एन सिंह, लेफ्टिनेंट जनरल एस के पटयाल, लेफ्टिनेंट जनरल सुनीत कुमार, लेफ्टिनेंट जनरल नितिन कोहली, कर्नल आर के त्रिपाठी और विंग कमांडर नवनीत मेगन ने रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण की उपस्थिति में पार्टी की सदस्यता ग्रहण की। इससे पहले 6 अप्रैल को सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल शरत चंद भी भाजपा में शामिल हुए थे। सेना में पूर्व उप प्रमुख रहे शरत चंद विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की मौजूदगी में दिल्ली में भाजपा की सदस्यता ली थी।

सेना के सभी पूर्व अधिकारियों के भाजपा में शामिल होने पर निर्मला सीतारमण ने खुशी जताते हुए प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “पार्टी में सशस्त्र बलों के बहुत ही सुशोभित वरिष्ठ अधिकारियों को शामिल करना वास्तव में मेरी खुशी है। ऐसे वरिष्ठ पूर्व सैनिकों की उपस्थिति से भाजपा को लाभ होता है। वे राष्ट्र सुरक्षा की नीतियों पर मार्गदर्शन कर सकते हैं।”

गौरतलब है कि कुछ दिन पहले ही अभिनेता सनी देओल भाजपा में शामिल हुए हैं। सनी देओल को पार्टी ने गुरदासपुर सीट से टिकट दिया है। वहीं, दिल्ली में लोकसभा उम्मीदवारों के नाम के ऐलान से कुछ सप्ताह पहले ही पूर्व क्रिकेटर गौतम गंभीर भी पार्टी में शामिल हुए थे। गौतम गंभीर इस चुनाव में पूर्वी दिल्ली से बीजेपी के उम्मीदवार हैं।