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फैक्ट चेक: गोरखनाथ मंदिर के बारे में ‘द वायर’ की पत्रकार ने फैलाया फेक न्यूज़, ट्विटर पर छिड़ा घमासान

यह तो सर्वविदित है कि वामपंथियों, इस्लामियों और पत्रकारिता के समुदाय विशेष के लोगों को हिन्दू धर्म से सख्त नफ़रत है। अब ऐसे में अगर कोई इन तीनों विशेषताओं से लैस हो, जैसे ‘द वायर’ की आरफ़ा खानम शेरवानी, तो ज़ाहिर है हिन्दुओं को नीचा दिखाने के लिए किसी भी हद तक खुद नीचे जाया जा सकता है- फ़ेक न्यूज़ भी फैलाई जा सकती है। शेरवानी जी ने भी यही किया- यह बात और है कि सोशल मीडिया पर पकड़ीं गईं।

हिन्दू मंदिर को बताया मुगल शासक के ‘अहसानों’ की ज़मीं पर बना

आरफ़ा खानम शेरवानी ने ट्वीट कर बताया कि वह गोरखपुर में हैं- इमामबाड़े में। साथ में उन्होंने यह बताया कि योगी आदित्यनाथ का मठ, जिसके वह मठाधीश हैं, एक मुस्लिम नवाब आसिफ़-उद्-दौला के ‘अहसान’ से उनके द्वारा दान की गई जमीन पर बना है। यानि एक तरह से, अव्यक्त तौर पर, हिन्दुओं को उनके ‘शासित’ स्टेटस की याद दिला दी।

ट्रू इंडोलॉजी ने दिखाया आईना

भारत के इतिहास के बारे में वामपंथी इतिहासकारों द्वारा फैलाए जा रहे भ्रम को दूर करने के लिए जाने जाने वाले ट्विटर हैंडल ट्रू इंडोलॉजी ने आरफ़ा खानम के ट्वीट पर एक के बाद एक ट्वीट कर फैक्ट-चेक करना शुरू किया। उन्होंने यह दिखाया कि कैसे यह मंदिर कम-से-कम 800 साल पुराना है, जबकि शेरवानी जी के प्रिय नवाब आसिफ़-उद्-दौला केवल सवा दो सौ साल पहले के।

उन्होंने अलग-अलग किताबी और आर्कियोलोजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया आदि का सन्दर्भ देकर आरफा खानम के झूठ के गुब्बारे को पंचर कर दिया। साथ ही यह भी बताया कि इस अफ़वाह की शुरुआत कहाँ से हुई।

हिन्दूफोबिया से निकला है यह झूठ  

सवाल केवल एक ऐतिहासिक तथ्य का नहीं है- उसमें गलती किसी से भी हो सकती है। पर आरफ़ा खानम के ट्वीट एक नैरेटिव बुनने के लिए था- हिन्दुओं को मानसिक रूप से दबाने और इस्लामी संप्रभुता को अपने ऊपर स्वीकार कर लेने का नैरेटिव। यह एक अकेली या विशेष घटना नहीं, एक श्रृंखला का हिस्सा है, जिसका अंतिम ध्येय पिछले हज़ार वर्षों से अधिक समय से यही रहा है कि किसी तरह हिन्दू अपनी संस्कृति, सभ्यता, अपने धर्म को आक्रान्ताओं से निम्न कोटि का मान लें, जिससे उन्हें ‘इकलौते सच’ का मुरीद बनाया जा सके। और पत्रकारिता का समुदाय विशेष इस पाक जंग की पहली पंक्ति की टुकड़ी है।

मैं कन्हैया समर्थक, उसे टिकट न देकर RJD ने की बहुत बड़ी ग़लती, गाँधी-मार्क्स एक जैसे: दिग्विजय

मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने अपने-आप को कन्हैया कुमार का बड़ा समर्थक बताया है। कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय ने वामपंथी पार्टी सीपीआई के नेता कन्हैया कुमार की तारीफों के पुल तब बाँधे हैं जब सीपीआई और कॉन्ग्रेस गठबंधन में नहीं है। बेगूसराय में राजद-कॉन्ग्रेस महागठबंधन के प्रत्याशी तनवीर हसन हैं और दिग्विजय ने अपने गठबंधन के प्रत्याशी का समर्थन न करके कन्हैया की प्रशंसा की है। दिग्विजय सिंह ने इस बारे में बोलते हुए कहा, “मैं कन्हैया कुमार का समर्थक हूँ। मैंने अपनी पार्टी में भी इस बात को कहा था कि राजद ने बहुत बड़ी ग़लती की है। मैंने इस बात के लिए प्रयास भी किए कि ये सीट (बेगूसराय) सीपीआई के हिस्से में दे दी जाए।

भोपाल से कॉन्ग्रेस प्रत्याशी दिग्विजय सिंह ने बताया कि 8 और 9 मई को कन्हैया कुमार उनके पक्ष में चुनाव प्रचार करने के लिए भोपाल आ रहे हैं। दिग्विजय ने उक्त बातें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यालय पहुँच कर कही। भाकपा कार्यालय पहुँचे ‘दिग्गी राजा’ ने कॉन्ग्रेस को एक इंद्रधनुष बताते हुए कहा कि उनकी पार्टी में लेफ्ट भी है और राइट भी है। उन्होंने यूपीए की पहली जीत का श्रेय भी लेफ्ट को दिया। कन्हैया पर देशविरोधी नारे लगाने के आरोपों को उन्होंने झूठा करार दिया। उन्होंने दावा किया कि एक चैनल ने भाजपा-संघ के लड़कों को खड़ा करा कर देशविरोधी नारे लगाए और कन्हैया को फँसा दिया।

दिग्विजय यहीं नहीं रुके, उन्होंने महात्मा गाँधी और कार्ल मार्क्स की तुलना करते हुए कहा कि दोनों में थोड़ा ही फ़र्क़ था। भारतीय कम्युनियस्ट पार्टी की भोपाल इकाई ने दिग्विजय सिंह का समर्थन करने की बात कही है। भोपाल के चुनाव पर पूरे देश की नज़रें हैं क्योंकि भाजपा द्वारा साध्वी प्रज्ञा को मैदान में उतारने के बाद यह सीट हाई प्रोफाइल हो गई है। पिछले डेढ़ दशक से दिग्विजय ने कोई लोकसभा या विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा है। ऐसे में, उनकी चुनावी वापसी की राह में साध्वी प्रज्ञा के आने से दिग्विजय भोपाल में पूरा ज़ोर लगा रहे हैं।

वहीं अगर कन्हैया कुमार की बात करें तो बेगूसराय में सीपीआई प्रत्याशी के रूप में उनका मुक़ाबला भाजपा के फायरब्रांड नेता गिरिराज सिंह और राजद प्रत्याशी तनवीर हसन से है। जहाँ कन्हैया के लिए जेएनयू से आए लोग प्रचार कर रहे हैं, हसन ने भी एएमयू से लड़कों को चुनाव प्रचार के लिए बुलाया है। दिग्विजय द्वारा कन्हैया की प्रशंसा भोपाल में भाकपा का समर्थन पाने के बाद किया गया। बेगूसराय में कॉन्ग्रेस राजद के साथ है और सीपीआई के विरुद्ध है जबकि भोपाल में कॉन्ग्रेस सीपीआई का समर्थन ले रही है।

भाजपा को हराने के लिए डाल आओ महागठबंधन के गुंडे को भी वोट: आप नेता

आम आदमी पार्टी भाजपा को हराने के लिए किस हद तक तड़फड़ा रही है, यह रह-रह कर हास्यास्पद तरीकों से सामने आ रहा है। कभी केजरीवाल राहुल गाँधी से कातर स्वर में गठबंधन की भीख माँगने लगते हैं, कभी भाजपा के सत्ता में लौटने की भविष्यवाणी कर के कॉन्ग्रेस को दोष देने लगते हैं। अब उनकी नेता आतिशी ने महागठबंधन के गुंडे नेताओं को भी ‘मन मार के’ वोट करने की अपील की है, ताकि भाजपा को हराया जा सके।

ट्विटर पर आया वीडियो

“हम सबकी ज़िम्मेदारी बनती है कि हमें वहाँ पे वोट ऐसे कैंडिडेट को, ऐसी पार्टी को डालना है, जो वहाँ पर बीजेपी को हरा सके। लेकिन हमें ये भी पता है सबको कि ये एक फैक्ट है कि पूरे देश भर में कोई ऐसी सिंगल पार्टी नहीं है जो बीजेपी को हरा सके। अलग अलग स्टेट्स में अलग-अलग पार्टियाँ हैं जो बीजेपी को हराने का माद्दा रखतीं हैं। फॉर इग्ज़ाम्पल (उदाहरण के तौर पर) आज या कल में यूपी का एक फेज़ था। तो अगर आप यूपी में देखें तो यूपी में बीजेपी को सिर्फ एसपी और बीएसपी की कोएलीशन (गठबंधन) हरा सकती है और कोई नहीं हरा सकता। सो इफ़ वे वर यूपी वोटर्स (तो अगर हम यूपी के मतदाता हैं) तो हमें क्या करना चाहिए था? हमें अपना वोट जा के एसपी-बीएसपी के गठबंधन को देना चाहिए, चाहे उनका जैसा भी कैंडिडेट हो। हमारे एक जानकार हैं उनसे बात हो रही थी। तो कहते हैं जी हमारे इलाके का (महागठबंधन) कैंडिडेट गुंडा है, मैं क्या करूँ? आइ सेड (मैंने कहा) अभी आँख बंद कर के कोएलीशन को डाल दो वोट। बिकॉज़ दिस इज़ एन इलेक्शन (क्योंकि यह एक ऐसा चुनाव है) जहाँ पर बीजेपी को हराना ज़रूरी है।”

ऐसे ही तैयार हुआ है महागठबंधन

आतिशी जिस प्रकार की वोटिंग की बात कर रहीं हैं, महागठबंधन वैसी ही वैचारिक भूमि पर तैयार हुआ है। दो दशक से ज्यादा समय तक एक दूसरे से लड़ने वाले सपा-बसपा साथ आ खड़े हुए हैं, कॉन्ग्रेस किसी राज्य में महागठबंधन का नेतृत्व कर रही है, किसी में तीसरे-चौथे नंबर की साझीदार है और किसी-किसी में महागठबंधन के खिलाफ़ ही चुनाव लड़ रही है। दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल कभी देश में खुद को भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा शत्रु बताते थे, अब वह राहुल गाँधी से गठबंधन के लिए मनुहार करने से लेकर लालू यादव के गले लगने तक सब कर चुके हैं।

लिंगलहरी कन्हैया कुमार के गुंडे चुनावी गाड़ियों में डंडे-ईंट-पत्थर लेकर क्यों चलते हैं?

कुछ दिन पहले जेएनयू के पूर्व लिंगलहरी अध्यक्ष श्री कन्हैया कुमार के गुंडों का चुनावी क़ाफ़िला बेगूसराय के टेकनपुरा गाँव से निकला। काली स्थान के पास उनकी गाड़ी रुकी तो कुतूहल में अंकित नाम के लड़के ने गाड़ी के पास जा कर देखने की कोशिश की। अंकित के शर्ट पर भाजपा का सफ़ेद कमल वाला चिह्न लगा हुआ था। फिर गुंडों ने बाताबाती की, और थोड़ी ही देर में गाड़ी से डंडे निकाल कर अंकित को बुरी तरह पीट दिया।

अंकित समेत कई ग्रामीणों ने बताया कि उनके पास ‘हथियार’ या बेगूसराय की बोलचाल की भाषा में ‘समान’ भी था। बेगूसराय में ‘समान’ का मतलब ‘सामान’ यानी पिस्तौल या बंदूक जैसा हथियार होता है। कन्हैया के मुँह से शराब की गंध आ रही थी, और सिर्फ गाड़ी के पास किसी भाजपा समर्थक को देख कर उसने उसका कॉलर पकड़ा और उसके गुंडों ने पुलिस की मौजूदगी में मार-पीट की।

कन्हैया कुमार एक छोटे नेता हैं जो जेएनयू में पहले लड़कियों के सामने लिंग लहरा कर सार्वजनिक स्थल पर मूत्र विसर्जन करने और लड़कियों को धमकाने के दोषी पाए जा चुके हैं। साथ ही उनकी ख्याति में ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ वाला कलंक भी लगा हुआ है। इनकी बुद्धि का स्तर इतना ज़्यादा है कि सिलिंडर चार दिन में खत्म हो जाता है। लेकिन, सब ने इनको चढ़ा दिया है तो ये गाड़ी पर चढ़ कर घूम रहे हैं, और जेएनयू कैम्पस से सीधे सांसद होने के लिए माओवंशी कामपंथियों के सारे तरीके अपना रहे हैं।

अगर वहाँ पुलिस नहीं होती, तो ‘समान’ का वामपंथी तरीके से इस्तेमाल करते हुए सर्वहारा की ख़ूनी क्रांति की बलि अंकित वैसे ही चढ़ जाते जैसे अस्सी और नब्बे के दशक में कन्हैया के गाँव बीहट में हर दूसरे दिन चढ़ जाया करते थे।

बीहट गाँव मेरे पूर्वजों का गाँव है। उस गाँव ने लगभग 15 साल कम्यूनिस्टों के उस ख़ूनी दौर को झेला है जब वामपंथियों और उनके विरोधियों में लाश का जवाब लाश से दिया जाता था। ये बिहार का वह बुरा दौर था जब गुंडई, रंगदारी और हत्याओं के तमग़े सर पर लेने वाले विधायक हुआ करते थे, और किसी को सबक सिखाना, वामपंथी तरीके से उसकी हत्या करना ही हुआ करता था।

बेगूसराय के इस गाँव ने वो बुरा दौर देखा है जब लगातार खबरों में किसी की हत्या हुआ करती थी। बड़े जतन से इस गाँव ने उस दौर से पीछा छुड़ाया है। आपको मौका लगे तो 45-50 साल के ऊपर के किसी भी ग्रामीण व्यक्ति से बीहट के उस दौर की बात कीजिए, पता चल जाएगा कि वो कम्यूनिस्टों का गढ़ क्यों था।

ख़ैर, लिंगलहरी कन्हैया कुमार छोटे नेता हैं, इसलिए जान नहीं ली। ‘समान’ लेकर चलते हैं, लेकिन फायर नहीं कर पाए क्योंकि ये नब्बे का बिहार नहीं है कि पुलिस भी मूक दर्शक बनी देखती रहती। बड़े नेता होते और बीहट में नब्बे की तारीख़ होती तो अंकित शायद अगले दिन किसी खेत में, कई टुकड़ों में कटा हुआ मिलता। वो अगले दिन के अख़बार में ‘बीहट में हुई एक और हत्या’ की एक संख्या बन कर रह जाता।

लेकिन, ये नब्बे का बीहट नहीं है, ये नब्बे का बिहार नहीं है, और ये नब्बे का वामपंथ नहीं है। हिंसक विचारधारा से और क्या उम्मीद की जा सकती है। कन्हैया उसी माहौल की पैदाइश है जहाँ विश्वविद्यालय चुनावों में अपने मतलब के लिए नजीब अहमद को गायब कर दिया जाता है। ये उसी माहौल से बाहर आए हैं जहाँ विरोधियों को पीटना, घेर कर बुरी तरह से मार देना, और हाँ, सीडी देने के बहाने नशा मिला कर बलात्कार करना एक आम बात है।

कन्हैया कुमार के पीछे उसके विश्वविद्यालय के वामपंथी कामरेडों का पूरा इतिहास चलता है जहाँ वो अपने महिला काडरों का इस्तेमाल विरोधियों पर सेक्सुअल मोलेस्टेशन के आरोप लगा कर उनकी छवि धूमिल करने के लिए करते रहे हैं। हिंसा और सेक्स तो कामरेडों का प्रमुख हथियार है, यूनिवर्सिटी में तो जबरदस्ती करते ही हैं, बाद में, विद्यार्थी से नक्सली बनने तक, जंगलों में ‘नारी देह कम्यून की प्रॉपर्टी है’ के नाम पर महिला काडरों को आईसिस की तर्ज़ पर सेक्स स्लेव बना कर रखते हैं। जब कोई इस नर्क से बाहर निकल कर आती है, तो पता चलता है कि सर्वहारा की क्रांति में महिला काडरों की योनियों का कितना बड़ा योगदान, वामपंथी जबरदस्ती लेते हैं।

तो, कन्हैया ने जो किया या जो आगे भी करेगा, वो आश्चर्यजनक नहीं है। आश्चर्यजनक यह है कि अंकित ज़िंदा है और विडियो पर हिम्मत के साथ बता पा रहा है कि कन्हैया के गुंडों ने उसके साथ डंडों से मार पीट की और उसकी गाड़ी में ईंट-पत्थर और डंडे थे, तथा उसके साथ के गुंडों की कमर में ‘समान’ था।

ये बात और है कि कल को रवीश कुमार कन्हैया की गाड़ी में डंडे, ईंट और पत्थर के टुकड़े होने की बात पर चालीस मिनट का प्राइम टाइम या रवीश की रिपोर्ट कर दें और कन्हैया की गाड़ी में कैमरा घुसा कर यह स्क्रिप्ट पढ़ दें: “मैं अभी कन्हैया की गाड़ी के पास हूँ। यह वही गाड़ी है जिसके भीतर डंडे, ईंट और पत्थर के टुकड़े होने की बात कही गई है। मैं अपने सहयोगी कैमरामैन से कहूँगा कि वो गाड़ी खोलने से लेकर, उसकी सीटों के नीचे तक दिखाएँ ताकि पता चले कि मोदी जी के समर्थक डर के मारे कन्हैया पर जो आरोप लगा रहे हैं उनमें कितनी सच्चाई है।

“आप देख सकते हैं कि मटिहानी के बलुआ मिट्टी और बभनगामा के गोरकी माटी की धूल के अलावा, इस गाड़ी में कुछ भी नहीं है। हाँ हैं तो कुछ पानी की बोतलें जो एक गरीब घर का बेटा किसी के दिए चंदे से पी पा रहा है। कन्हैया से मैंने पूछा कि वो मिनरल वाटर कैसे पीते हैं तो उन्होंने कहा कि सिर्फ बोतल ही मिनरल वाटर की है, इसमें पानी तो रास्ते के किसी चापाकल का ही है।

“कार में तो खैर कुछ नहीं निकला, अब मैं इनके साथियों की कमर में कैमरा घुसाऊँगा और दर्शकों को दिखाऊँगा कि कन्हैया के साथियों की कमर में सिवाय काली डोरी के, जिसे बेगूसराय में डरकडोर कहते हैं जो बुरी नज़रों से बचाने के लिए बच्चों की कमर में बाँधा जाता है, यहाँ कोई हथियार या समान नहीं है। मैं यह देख पा रहा हूँ कि सत्ताधीश, सुप्रीम लीडर जब डर जाता है तो वो एक छोटे से लड़के पर, जो चंदा माँग कर चुनाव लड़ रहा है, जिसके समर्थन में कश्मीर से लेकर कर्नाटक और बम्बई से लेकर बिहार तक के लोग आ जाते हैं, वो सत्ताधीश इन पर किस तरह के हमले करता है।”

मीडिया के एक गिरोह को केजरीवाल से लेकर प्रियंका गाँधी ने जिस तरह से धोखा दिया है, अब उनकी सारी उम्मीद इस लिंगलहरी पर ही टिकी हुई है। लेकिन कन्हैया कुमार नामक चैप्टर इस देश की परिचर्चा से तीस मई तक गायब हो जाएगा, जब वामपंथियों के ढाबे की उड़ी हुई छत और बैठने के पत्थरों के नीचे की ज़मीन जा चुकी होगी।

कन्हैया इस गिरोह का एक प्रयोग है। कन्हैया की गुंडई में पुरानी वामपंथी परिपक्वता नहीं आई है। वो अभी लिंग लहराने और नारेबाज़ी में शरीक होने तक ही आ पाया है। उसे केरल के वामपंथियों की तकनीक नहीं पता कि कैसे सड़क पर भाजपा या संघ के कार्यकर्ता को फूल बेचते वक्त काट दिया जाता है। उसे अपने केरल के वैचारिक पूर्वजों की वह तकनीक नहीं मालूम कि नमक की बोरियों के साथ कैसे ज़िंदा दफ़नाने पर हड्डियाँ भी नहीं मिलती।

कन्हैया कुमार इस चुनाव के बाद डिबेट से भी गायब हो जाएगा, और उसकी आमदनी जो भाषणों से होती थी, वो भी बंद हो जाएगी। उसे एक उम्मीद के तौर पर पाक अकुपाइड पत्रकारों से लेकर छद्म बुद्धिजीवियों का समर्थन मिलता रहा है वरना इस व्यक्ति को न तो बोलने का सहूर है, न सही तरीके से मूत्र त्यागने का। ये वो महानुभाव हैं जो लालू के पाँव छूते हैं जिसने चंद्रशेखर जैसे प्रभावशाली छात्र नेता को सहाबुद्दीन की मदद से मरवाया था।

वही चंद्रशेखर जो मेरे सैनिक स्कूल के सीनियर थे। वही चंद्रशेखर जिसकी वक्तृता का ‘व’ कन्हैया अपने पूरे जीवन में हासिल नहीं कर सकता। वही चंद्रशेखर जिसमें यह हिम्मत थी कि वो सड़कों पर खड़े होकर लालू के प्राइम टाइम में उसकी गुंडागर्दी के खिलाफ घंटों बोल सकता था। वही चंद्रशेखर जिसे सुनने के लिए जेएनयू के प्रांगण में लोग अटते नहीं थे।

दुर्भाग्य से कन्हैया भी उसी विश्वविद्यालय की एक सड़ी-गली सोच की पैदाइश है। कन्हैया भी उसी बिहार का बदबूदार उत्पाद है जिसने महानता के सिवाय और कुछ देखा ही नहीं था। कन्हैया उसी बेगूसराय की धरती का बेटा बन कर आज कल खुद को बेच रहा है जहाँ से दिनकर जैसे लोग पैदा हुए हैं।

सतमासू कम्युनिस्ट और कर भी क्या पाएगा। इन्क्यूबेटर से निकले चूज़ों के लिए बाहर में सर्वाइव करना मुश्किल होता है। ये प्रयोगशाला के अविकसित और विकृत भ्रुण हैं जिन्होंने न विचार को समझा, न समाज को। विचार से हिंसा उठाई और समाज को उपहार स्वरूप बाँट रहे हैं। ये न ठीक से वामपंथी हो पाए, न भारत के नागरिक। वामपंथ से बस लाठी, ईंट और पत्थर ही उठा पाए हैं। इनकी बैसाखियाँ मई के अंत तक झटके से खींच ली जाएगी, तब यही यूथ आइकॉन रेंग भी नहीं पाएगा।

CRPF की वर्दी में संदिग्ध नदीम ख़ान को CISF ने किया गिरफ्तार, पूछताछ जारी

दिल्ली के चाँदनी चौक मेट्रो स्टेशन पर शनिवार (अप्रैल 27, 2019) को केंद्रीय औद्यौगिक सुरक्षा बल (CISF) ने एक शख्स को हिरासत में लिया है, जो कि केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल (CRPF) की वर्दी में था। CISF ने गुप्त सूचना के आधार पर इस संदिग्ध व्यक्ति को शनिवार की शाम लगभग 8:22 बजे गिरफ्तार किया।

ख़बर के अनुसार, पकड़े गए संदिग्ध शख्स को पूछताछ के लिए CISF के सुरक्षा कक्ष में ले जाया गया, जहाँ उसने कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया और ना ही उसके पास से CRPF का कोई आईडी कार्ड या फिर फोर्स से जुड़ा कोई सबूत मिला। मगर इस जाँच के दौरान उसके पास से अलग-अलग जन्म तिथि, पिता के नाम और पते वाला दो आधार कार्ड और एक मोबाइल फोन बरामद किया गया है।

पूछताछ के दौरान शख्स ने अपना नाम नदीम खान और शामली का रहने वाला बताया, साथ उसने दावा किया कि वो CRPF में ट्रेनी है और श्रीनगर में उसकी ट्रेनिंग चल रही है। उसने बताया कि वो अपनी माँ के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए शामली आया था। मगर जब उसके द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर श्रीनगर में CRPF और शामली पुलिस से बात की गई तो उसका दावा झूठा निकला।

जाँच में पता चला कि यह शख्स श्रीनगर में ट्रेनिंग नहीं कर रहा है और साथ ही इसके माता-पिता भी एकदम ठीक हैं। मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई के लिए संदिग्ध व्यक्ति से बरामद किया गया सामान दिल्ली मेट्रो रेल पुलिस स्टेशन (DMRP) कश्मीरी गेट को सौंप दिया गया है।

शिकायत के बाद सचिन ने कहा: Mumbai Indians से एक रुपया भी नहीं लेता

महान बल्लेबाज़ सचिन तेंदुलकर ने मुंबई इंडियंस टीम मैनेजमेंट में किसी भी प्रकार का दखल रखने की बात से साफ़ इनकार कर दिया है। तेंदुलकर ने कहा कि वो मुंबई इंडियंस के ‘आइकॉन’ हैं और निर्णायक मंडली में भी शामिल नहीं हैं। सचिन ने हितों के टकराव के मामले में भारत में क्रिकेट की गवर्निंग एजेंसी बीसीसीआई को जवाब देते हुए कहा कि वे मुंबईं इंडियंस के मार्गदर्शक हैं वो अपने अनुभवों के आधार पर खिलाड़ियों को सही रास्ता दिखाते हैं। सचिन के ख़िलाफ़ दर्ज की गई शिकायत में कहा गया था कि वह मुंबईं इंडियंस में लाभ का पद धारण करने के साथ-साथ बीसीसीआई की क्रिकेट एडवाइजरी कमेटी (CAC) के भी सदस्य बने हुए हैं। ख़ुद को मिली नोटिस के जवाब में औपचारिक प्रतिक्रिया देते हुए सचिन ने मुंबई इंडियन से किसी प्रकार का मुआवजा या सैलेरी न लेने की बात बताई है।

पूर्व भारतीय कप्तान सचिन तेंदुलकर ने अपने जवाब में कहा;

“मेरा किरदार बस फ्रैंचाइजी मुंबई इंडियंस का मार्गदर्शन करने तक सीमित है। मैं मुंबईं इंडियंस के ‘मैनेजमेंट’, ‘गवर्नेंस’ या फिर ‘एम्प्लॉयमेंट’ में शामिल नहीं हूँ। मेरी भूमिका खिलाड़ियों ख़ासकर युवाओं को सिखाने, उनका मार्गदर्शन करने, अपनी अंतर्दृष्टि रखने और अपने अनुभव साझा करने तक सीमित है। मैं बस टीम का मेंटर हूँ जो मैनेजमेंट के भीतर नहीं आता। मुंबईं इंडियंस के पास हेड कोच के अलावा और भी कई कोच हैं जो अन्य कार्यों को देखते हैं।”

भारत रत्न सचिन तेंदुलकर के ख़िलाफ़ दायर की गई शिकायत में कहा गया था कि वह डगआउट में मुंबई इंडियंस के खिलाड़ियों के साथ बैठे रहते हैं। इसका जवाब देते हुए सचिन ने इस शिकायत को अजीब बताया। उन्होंने कहा कि इस बेतुके लॉजिक के हिसाब से तो टीम के सपोर्टिंग स्टाफ, ट्रेनर, थेरेपिस्ट ये सभी के सभी मैनेजमेंट के भीतर आ जाएँगे। बता दें कि मुंबई इंडियंस सचिन तेंदुलकर को टीम का ‘मेंटर’ या ‘आइकॉन’ के रूप में प्रचारित करती है। मुंबई के मैचों में अक़्सर उपस्थित रहते हैं और टीम के खिलाड़ियों को प्रैक्टिस कराते हुए भी देखे जा सकते हैं।

अभी चल रही आईपीएल के मौजूदा सीजन में चेन्नई सुपर किंग्स शीर्ष पर काबिज़ है और अंक तालिका में मुंबई इंडियंस दूसरे नंबर पर है। मुंबई ने चेन्नई को दोनों मैच हरा डाले हैं। सचिन तेंदुलकर सीडब्ल्यूसी के भी सदस्य हैं जो बीसीसीआई को महत्वपूर्ण मुद्दों पर राय देती है।

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में जिन्ना का अहम योगदान: राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस नेता ने चला मुस्लिम कार्ड

राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी ने शत्रुघ्न सिन्हा के उस बयान का बचाव किया है जिसमें उन्होंने मोहम्मद अली जिन्ना को कॉन्ग्रेस परिवार का हिस्सा बताया था। पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना की प्रशंसा करने के कारण विवादों में आए शत्रुघ्न सिन्हा का बचाव करते हुए एनसीपी नेता मजीद मेमन ने कहा कि शत्रुघ्न सिन्हा कल तक भाजपा के साथ थे, इसीलिए उन्होंने अगर कुछ देश-विरोधी बात कही भी है तो ये भाजपा की शिक्षा है। मेमन ने कहा कि अमित शाह को याद रखना चाहिए कि सिन्हा कुछ दिनों पहले तक उनके ही साथ थे। जिन्ना का बचाव करते हुए मेमन ने भारत की स्वतंत्रता संग्राम में उनका ‘अहम योगदान’ बताया। उन्होंने कहा कि जिन्ना को लेकर सिन्हा द्वारा दिए गए बयान पर लोग आपत्ति इसीलिए जता रहे हैं क्योंकि जिन्ना एक मुस्लिम थे।

हाल ही में शत्रुघ्न सिन्हा ने मोहम्मद अली जिन्ना के बारे में कहा था,

“कॉन्ग्रेस परिवार महात्मा गाँधी से लेकर सरदार वल्लभ भाई पटेल तक, मोहम्मद अली जिन्ना से लेकर जवाहर लाल नेहरू तक, इंदिरा गाँधी से लेकर राजीव गाँधी और राहुल गाँधी तक की पार्टी है। भारत की आज़ादी और विकास में इन सभी का योगदान है। इसलिए मैं कॉन्ग्रेस पार्टी में आया हूँ। और, एक बार आ गया हूँ तो पहली और शायद आख़िरी बार कॉन्ग्रेस पार्टी में तो मुड़कर कहीं वापस नहीं जाऊँगा।”

बाद में इस बयान को लेकर चौतरफा आलोचना से घिरे शत्रुघ्न सिन्हा ने ‘ज़बान फिसलने’ का बहाना बनाया था। उन्होंने कहा कि वो मौलाना आज़ाद का नाम लेना चाह रहे थे लेकिन ग़लती से मुँह से जिन्ना का नाम निकल गया। उन्होंने माफ़ी माँगने से इनकार करते हुए कहा कि उनसे कोई ग़लती नहीं हुई है। अब मज़ीद मेमन ने सिन्हा के इसी बयान का बचाव किया है। बता दें कि शत्रुघ्न सिन्हा पटना साहिब लोकसभा क्षेत्र से कॉन्ग्रेस के उम्मीदवार हैं।उनका मुक़ाबला भाजपा के रविशंकर प्रसाद से होगा। दशकों से भाजपा में रहे सिन्हा हाल ही में पार्टी छोड़कर कॉन्ग्रेस में शामिल हो गए थे।

कॉन्ग्रेस नेता पी चिदंबरम ने भी सिन्हा के इस बयान से पल्ला झाड़ते हुए कहा कि उनके जो भी विचार हैं, उसे उन्हें ही एक्सप्लेन करनी चाहिए। चिदंबरम ने उल्टा भाजपा से सवाल पूछ दिया कि सिन्हा अब तक भाजपा में क्यों थे? उन्होंने झल्लाते हुए कहा कि उन्हें पार्टी के हर सदस्य के बयानों पर सफाई नहीं देनी है। शत्रुघ्न सिन्हा की पत्नी लखनऊ से सपा उम्मीदवार हैं और उनके लिए लखनऊ में शत्रुघ्न चुनाव प्रचार भी कर चुके हैं।

PM मोदी की प्रस्तावक डॉ अन्नपूर्णा शुक्ला: वो महिला जिसने ब्रिटेन की एक इंडस्ट्री को झुका दिया था

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार (अप्रैल 26, 2019) को जब वाराणसी से नामांकन दाखिल किया, तो इस दौरान उनके चार प्रस्तावकों को लेकर खूब चर्चा रही। पीएम मोदी ने 2019 के नामांकन में चार अलग-अलग क्षेत्र के प्रस्तावकों को शामिल किया। ये प्रस्तावक थे- डोमराज परिवार के जगदीश चौधरी, सामाजिक कार्यकर्ता सुभाष गुप्ता, बीएचयू महिला महाविद्यालय की पूर्व प्राचार्या डॉक्टर अन्नपूर्णा शुक्ला और कृषि वैज्ञानिक राम शंकर पटेल।

इन चारों प्रस्तावकों में से सबसे अधिक चर्चा में रहीं डॉक्टर अन्नपूर्णा शुक्ला। इसके पीछे वजह यह रही कि जब पीएम नामांकन के लिए कलेक्ट्रेट परिसर पहुँचे, तो वहाँ उन्होंने डॉक्टर शुक्ला के पैर छूकर आशीर्वाद लिया। ऐसे में लोग इस बात से चकित हो गए कि आखिर ये महिला कौन है और पीएम ने नामांकन से पहले इनके पैर क्यों छुए?

पंडित मदन मोहन मालवीय ने दिया था आशीर्वाद

ख़बर के अनुसार, डॉ अन्नपूर्णा शुक्ला को मदन मोहन मालवीय की मानस पुत्री माना जाता है। वो मदन मोहन मालवीय का आशीर्वाद पाने वाली एकमात्र जीवित पूर्व प्राचार्या हैं। यही वजह है कि उन्हें मालवीय की दत्तक पुत्री भी कहा जाता है। 91 वर्षीय अन्नपूर्णा शुक्ला पीएम की प्रस्तावक बनकर बेहद खुश दिखीं। उन्होंने टाइम्स ऑफ इंडिया से बातचीत में कहा, “जब मोदीजी आए और मेरे पैर छुए तो मैंने एक माँ की तरह उन्हें आशीर्वाद दिया। मैंने उनसे यह भी कहा कि आप ऊँचे शिखर पर जाओगे।”

पीएम मोदी की प्रस्तावकों में शामिल होने पर चर्चा में आई डॉक्टर अन्नपूर्णा शुक्ला के नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य में उनके योगदान के बारे में काफी कम लोग ही जानते हैं। कुछ ही लोगों को पता होगा कि डॉ शुक्ला ने 1969-72 में रिसर्च करके इस बात का पता लगाया था कि माँ का दूध नवजात के लिए बेहद जरूरी है। नवजात शिशु को 6 महीने तक माँ का दूध ही देना चाहिए। इससे बच्चों में रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास होता है। डॉ शुक्ला के इस शोध के बाद ब्रिटेन की एक बेबी फूड कंपनी ने इस खास मैसेज को पैकेजिंग के साथ प्रकाशित करना शुरू किया। बहरहाल, अब इस संदेश को दुनियाभर की कंपनियों द्वारा प्रकाशित किया जाता है और इस बात के लिए दुनिया भर की माँओं को उनका शुक्रिया अदा करना चाहिए।

डॉ शुक्ला ने बच्चों के शरीर के कुल वजन, कैलोरी की मात्रा, दूध पिलाने के तरीके और मोटापे जैसे मापदंडों के बारे में अध्ययन किया। डॉ. शुक्ला की रिसर्च पूरी तरह से वैदिक परंपरा पर आधारित थी। जिस तरह बच्चों के 6 महीने का होने पर उसका अन्नप्राशन कराया जाता है और उसके बाद ही उसे दूध और चावल की खीर यानी ठोस आहार दिया जाता है। इस रिसर्च के दौरान डॉ. शुक्ला ने पाया कि जिन बच्चों को स्तनपान नहीं करवाया जाता था और ठोस आहार दिया जा रहा था, वे शिशु स्थूल थे और उनका वजन भी अधिक था।

जब डॉक्टर अन्नपूर्णा शुक्ला की यह रिसर्च प्रकाशित हुई, तो सरकार ने तुरंत बच्चों के लिए खाद्य सामग्री बनाने वाली कंपनियों के लिए निर्देश जारी किए कि वह इस चेतावनी को उत्पादों की पैकेजिंग में जरूर दर्शाएँ कि माँ के दूध का कोई विकल्प नहीं है। डॉ शुक्ला कहती हैं कि हालाँकि इससे उस समय कई कंपनियों को परेशानी हुई, मगर आज हम इस जानकारी के जरिए बच्चों को बचा पा रहे हैं।

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के संस्थापक पंडित मदन मोहन मालवीय ने डॉ शुक्ला को काफी प्रभावित किया। वो बताती हैं कि जब वो सिर्फ पाँच साल की थी, तभी मदन मोहन मालवीय जी ने उनसे पूछा था कि वो क्या बनना चाहती है, तो उन्होंने कहा था कि वो डॉक्टर बनना चाहती है। महामनाजी (मदन मोहन मालवीय) ने उनसे कहा था, “एक दिन जब मैं डॉक्टर बनूँ तो वापस लौटकर बीएचयू आऊँ और वो मुझे जॉब देंगे।”

वो कहती हैं कि उन दिनों परिवार, महिलाओं को पढ़ाने के पक्षधर नहीं होते थे। डॉ शुक्ला की माँ डिप्टी कलेक्टर की बेटी थीं, लेकिन फिर भी वो अपने सिर पर कुएँ से पानी भर कर लाती थीं। हालाँकि आज बीएचयू जाने-माने मेडिकल कॉलेजों में गिना जाता है, लेकिन उन दिनों चिकित्सा संबंधी कोर्स यहाँ उपलब्ध नहीं थे। तब डॉ शुक्ला ने 1945 में पटना के प्रिंस ऑफ वेल्स मेडिकल कॉलेज (अब पटना मेडिकल कॉलेज ऐंड हॉस्पिटल) से एमबीबीएस की पढ़ाई की।

विनम्र स्वभाव के साथ-साथ ममता की मूरत हैं डॉक्टर अन्नपूर्णा शुक्ला

एमबीबीएस पूरा करने के बाद उनकी शादी हो गई और वह महिला महाविद्यालय में बतौर मेडिकल ऑफिसर काम करने लगीं। उन दिनों वह वाराणसी की चार महिला डॉक्टरों में से एक थीं। पंडित मदन मोहन मालवीय के बेटे गोविंद मालवीय के आग्रह पर वह उन दिनों गृह विज्ञान का लेक्चर भी बीएचयू में देती थीं। उस समय यूनिवर्सिटी में मेडिकल कॉलेज नहीं था। डॉ अन्नपूर्णा शुक्ला एक पढ़े-लिखे परिवार से ताल्लुक रखती हैं। उनके पिता बीएचयू के प्रवक्ता के रूप में कार्यरत थे और मदन मोहन मालवीय के करीबी थे। उनके पति बीएम शुक्ला गोरखपुर विश्वविद्यालय के वीसी पद से रिटायर हुए हैं। वहीं, चर्चित लेखक अमीश उनके भतीजे हैं। अमीश बताते हैं कि बुआजी (डॉ शुक्ला) अद्भुत महिला हैं। वो पारंपरिक, विनम्र और सशक्त महिला होने के साथ-साथ ममता की मूरत भी हैं।

नशे में धुत्त कन्हैया कुमार की गुंडई: कमल निशान देख कर BJP समर्थकों को पीटा, Video से हुआ खुलासा

बिहार आजकल बेगुसराय के नाम से ज्यादा चर्चा में बना हुआ है। इसी बेगुसराय के टेकनपुरा में वामपंथी उम्मीदवार कन्हैया कुमार और उसके गुंडों द्वारा बीजेपी समर्थकों को पीटने की ख़बर सामने आई है। यह घटना 25 अप्रैल रात 8:30 बजे से 9 बजे की है। दरअसल, 3-4 साथियों का एक ग्रुप खाली जगह पर बैठा हुआ था। कन्हैया कुमार का क़ाफ़िला उधर से गुज़र ही रहा था कि उनकी नज़र 3-4 साथियों में से एक यानी अंकित कुमार पर जा टिकी जिसकी शर्ट की जेब में कमल के फूल का बैच लगा हुआ था। इससे उन्हें पता चल गया कि वो बीजेपी समर्थक है। इतना जानने के बाद कन्हैया कुमार ख़ुद गाड़ी से उतर कर आया और गाली-गलौच के साथ उसके साथ मारपीट करने लगा।

इस मारपीट में कन्हैया कुमार का साथ उसके गुंडों ने भी दिया और अंकित कुमार को ज़ख़्मी कर दिया। बता दें कि अंकित ने अभी तक पुलिस में इस बाबत रिपोर्ट नहीं की है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि घटना के दौरान वहाँ मौजूद पुलिस (कन्हैया का गार्ड) भी तमाशा देख रही थी। इसी डर से अंकित ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाने में दिलचस्पी नहीं दिखाई।

टेकनपुरा के लोगों ने इस घटना की कड़ी निंदा की है। उन्होंने पूरे घटनाक्रम को सिलसिलेवार ढंग से बताया और इसका जवाब मतदान के रूप में देने की बात कही। गाँव वालों ने ऑपइंडिया को जो बताया, ऊपर वीडियो में पूरा देख सकते हैं।   

इस मामले पर अंकित कुमार (पीड़ित) ने बताया, “सभी दोस्त एक साथ बैठे हुए थे कि तभी हम लोग की नज़र कन्हैया कुमार के क़ाफ़िले पर पड़ी। जब वो क़फ़िला मेरे नज़दीक आया तो गाड़ी देखने के लिए मैं उसके पास पहुँचा। वहाँ पहुँचने पर उन लोगों की नज़र मेरी पॉकेट पर लगे बीजेपी के बैच पर पड़ी। वो हमसे ठेठ भाषा में बोला ये क्या है। हम कुछ नहीं बोले, लेकिन इतने में ही उसके कार्यकर्ता लोग गाली-गलौच करते हुए गाड़ी से नीचे उतर आए और मेरे साथ मारपीट करने लगे। मेरी जान बचाने के लिए आए मेरे 2-3 दोस्तों को भी लाठी-डंडे से मारा।” अंकित ने बताया कि वहाँ मौजूद पुलिस ने कुछ नहीं किया केवल तमाशबीन बनी रही और गार्ड ने कन्हैया के कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाया। अंकित ने इस बात की भी जानकारी दी कि कन्हैया के साथियों के पास हथियार भी मौजूद थे।

अंकित कुमार के दोस्त आदर्श कुमार के अनुसार, कन्हैया कुमार और उसके साथियों ने इतनी शराब पी हुई थी कि उनसे बाइक तक नहीं संभल रही थी। बीजेपी का समर्थक होने की वजह से उसके दोस्त पर कन्हैया कुमार समेत उसका पूरा क़ाफ़िला मारपीट के लिए टूट पड़ा। भद्दी गालियाँ देने के अलावा उसे गंभीर रूप से घायल भी कर दिया।

टेकनपुरा क्षेत्र के निवासी राम विनोद ने बताया कि शर्ट की पॉकेट में केवल एक कमल का फूल लगा लेने से भड़के कन्हैया कुमार और उसके गुंडों ने अंकित को काफी बुरी तरह से मारा-पीटा। इस कारण उसकी कमर में चोट भी आई है।

एक अन्य निवासी चंद्रशेखर सिंह ने बताया कि कन्हैया कुमार जो कम्यूनिस्ट उम्मीदवार हैं, उसका रोड शो चल रहा था। एक खाली स्थान पर 2-3 लड़के खड़े थे, उनमें से जिस लड़के (अंकित कुमार) के साथ मारपीट हुई उसकी शर्ट पर फूल का बैच लगा हुआ था। कन्हैया कुमार की गाड़ी जब मुड़ी तो अंकित कुमार उत्सुकतावश उस गाड़ी को देखने पहुँचे, जहाँ उनसे पूछा गया कि तुम्हारी शर्ट पर क्या लगा हुआ है, इसके बाद कन्हैया कुमार गाड़ी से उतरा और उसका कॉलर खींचकर उसको अपशब्द कहे और ख़ुद उसे मारने-पीटने लगे। साथ में कन्हैया कुमार के गुंडे भी अंकित कुमार पर टूट पड़े और पत्थरों से उसको पीटने लगे। उन्होंने बताया कि कन्हैया कुमार और उनके गुंडे अपनी गाड़ी में डंडा, ईंट के टुकड़े, पत्थर आदि सब रखते हैं। चंद्रशेखर सिंह ने स्पष्ट किया कि यहाँ ऐसा माहौल है कि अगर किसी के पास कमल का फूल भी देख लिया गया तो उसे अपना विरोधी मानकर उसके साथ जमकर मारपीट की जाती है।

इस घटना को पूरी तरह से सच बताने वाले कन्हैया प्रसाद ने बताया कि घटना के वक़्त भले ही वो वहाँ मौजूद नहीं थे लेकिन जिस लड़के को बेरहमी के साथ मारा-पीटा गया, उससे मिलने पर पता चला कि उसकी पॉकेट में कमल का फूल लगा हुआ था जिसकी वजह से कन्हैया कुमार और उसके समर्थक काफ़ी भड़क गए। उन्होंने यह भी बताया कि कमल का फूल या बीजेपी समर्थकों के साथ यह मारपीट का यह मामला पहला नहीं है, इससे पहले भी इस तरह की घटना को अंजाम दिया जा चुका है। कोरए गाँव में हुई घटना तो इससे भी अधिक भयावह थी, वहाँ जिसके साथ मारपीट की गई उसके सिर में गंभीर चोट (सिर फट गया) आई थी। इस तरह की घटनाओं का जवाब देने के लिए उन्होंने कहा, “हम लोग वोट के ज़रिए ही इसका बहिष्कार करेंगे।” कन्हैया कुमार को दबंग बताते हुए उन्होंने कहा कि इस तरह की घटनाओं के ज़रिए जनता पर दबाव बनाया जा रहा है कि किसी और को नहीं केवल उसे ही वोट दो।

कन्हैया कुमार की यह दबंगई सिद्ध करती है कि वो देश में किस तरह के लोकतंत्र को लाने के हितैषी हैं। बीजेपी समर्थकों पर खुलेआम हमलावर रुख़ इस बात को स्पष्ट करता है कि वो क्षेत्र में दबाव की राजनीति को हवा दे रहे हैं। अपने राजनीतिक करियर की लंबी उड़ान भरने की ख़्वाहिश में कन्हैया कुमार जानलेवा हरक़तों से भी बाज नहीं आते। अत: यह कहने में कोई गुरेज़ नहीं होनी चाहिए कि देश को ऐसे अराजकत तत्वों की आवश्यकता बिल्कुल नहीं है, जो लोकतंत्र के नाम पर गुंडागर्दी पर उतारू हैं।

फैक्ट चेक: आर्मी, PM मोदी और सर्जिकल स्ट्राइक पर काल्पनिक कहानीकार रामचंद्र गुहा ने बोला झूठ

ख़ुद को इतिहासकार मानने वाले रामचंद्र गुहा ने इस बार एक और झूठ फैलाया है। गुहा अक़्सर कभी बीफ तो कभी कुछ और के लिए विवादित चीजें लिखते रहते हैं, बोलते रहते हैं और ट्वीट करते रहते हैं। नेहरूवादी इतिहास लिखकर घटनाओं को तोड़-मरोड़ कर पेश करने में महारत हासिल कर चुके गुहा ने अब ताज़ा झूठ बोला है कि ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ शब्द भारतीय सेना ने नहीं बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईज़ाद किया था। उनके कहने का अर्थ था कि शुरुआत में इस शब्द का प्रयोग सेना ने नहीं किया था। लेफ्ट विंग मीडिया ‘द टेलीग्राफ’ में लिखे गए एक प्रोपेगंडा लेख में गुहा ने दावा किया कि नरेंद्र मोदी और उनके ख़ेमे ने एक अजेंडे के तहत पाकिस्तान के भीतर भारतीय सेना द्वारा किए गए आतंकरोधी ऑपरेशन को ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ नाम दिया, सेना ने ऐसा नहीं किया।

सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर रामचंद्र गुहा ने फैलाया झूठ

रामचंद्र गुहा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधने के चक्कर में अक़्सर ऐसे फैक्ट्स का जिक्र किया है, जिसका सच्चाई से कोई वास्ता नहीं होता। अब हम आपको सच्चाई बताते हैं। जनता को सच्चाई जाननी ज़रूरी है कि पाकिस्तान में हुए आतंकरोधी ऑपरेशन को ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ किसने नाम दिया। असल में ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ का प्रयोग डायरेक्टर जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशन्स (DGMO) द्वारा 29 सितंबर, 2016 को किए गए प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान किया गया था। ये प्रेस कॉन्फ्रेंस पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों को तबाह करने के बाद किया गया था। इसीलिए इस सम्बन्ध में ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ का प्रयोग भारतीय सेना ने ही पहली बार किया गया था।

DGMOकी प्रेस कॉन्फ्रेंस

गुहा की विचारधारा से ही ताल्लुक रहने वाले विवादित पत्रकार रवीश कुमार ने भी भारतीय ऑपरेशन के तुरंत बाद ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ को लेकर एक प्राइम टाइम किया था। अगर इस हिसाब से देखें तो क्या रवीश कुमार भी आने वाले प्रोपेगंडाबाज़ हैं। रामचंद्र गुहा नेहरू परिवार के क़रीब माने जाते हैं और सोशल मीडिया पर नेहरू परिवार को सही दिखाने के लिए उनके द्वारा अक़्सर झूठ फैलाया जाता रहा है। लोग उनका झूठ पकड़ कर उन्हें सोशल मीडिया पर लताड़ते भी रहते हैं लेकिन गुहा झूठ फैलाना और ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ करना नहीं छोड़ते।

पिछले वर्ष नवंबर में एबीवीपी ने वाईस चांसलर को पत्र लिखकर गुहा का अपॉइंटमेंट कैंसल करने की गुज़ारिश की थी। इसके पीछे उनकी हिन्दू-विरोधी मानसिकता और भारत की हिन्दू संस्कृति के प्रति घृणा के भाव को कारण बताया गया था। इसके बाद गुहा ने ‘परिस्थितियाँ नियंत्रण से बाहर’ होने की बात कह ख़ुद को ही टीचिंग असाइनमेंट से बाहर कर लिया था।