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मोदी के नाम की टीशर्ट पहनकर लगा रहा था राहुल गाँधी के बैनर, कॉन्ग्रेस नेता भड़के

कॉन्ग्रेस मोदी के नाम से भी डरी हुई है। जिसका शिकार एक मजदूर हो गया। जयपुर में प्रधानमंत्री मोदी के नाम की टी-शर्ट पहन एक मजदूर प्रदेश कॉन्ग्रेस कार्यालय में राहुल गाँधी के बैनर लगा रहा था। अचानक से कॉन्ग्रेस नेताओं ने की नज़र उसके टीशर्ट पर पड़ी तो कॉन्ग्रेस के नेता भड़क गए।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, जयपुर में सैम पित्रोदा के बुद्धिजीवी संवाद कार्यक्रम से पहले तैयारियाँ की जा रही थीं। उसी दौरान वहाँ एक मजदूर के पीएम नरेन्द्र मोदी के नाम की टी-शर्ट पहनकर कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी का बैनर लगाते देख, वहाँ के नेताओं के लिए असमंजस की स्थिति बन गई। अब करें तो करें क्या। बताया जा रहा है उसे वहाँ से डाँटकर भगा दिया गया।

बता दें कि मजदूर ने 16 जनवरी, 2018 को बाड़मेर में आयोजित हुए बाड़मेर रिफाइनरी एवं पेट्रोकेमिकल परियोजना के शुभारंभ के दौरान तैयार करवाई गई टी-शर्ट पहन रखी थी। टी-शर्ट पर बड़े अक्षरों में योजना के नाम के साथ पीएम नरेन्द्र मोदी का नाम लिखा हुआ था।

इस घटना को देखकर कॉन्ग्रेस का डर साफ झलक रहा है। कॉन्ग्रेस नेता आज इतने असहिष्णु हो गए हैं उन्हें मोदी के नाम का टीशर्ट भी स्वीकार नहीं है। एक व्यक्ति के प्रति उनके अंदर भरी हुई घृणा आज एक सामान्य मजदूर पर इस कदर निकलेगी, शायद ही कोई सोच सकता है। दूसरा इस घटना में कॉन्ग्रेस की एलिटिस्ट मानसिकता भी साफ झलक रही है।

अगर राजनीति में आया तो मेरी पत्नी मुझे छोड़ देगी: रघुराम राजन

डर की सच्ची तस्वीरें आमतौर पर फ़िल्मों या टीवी सीरियल्स में देखने को मिलती हैं, लेकिन एक डर बीवी का भी होता है, इसकी सच्ची तस्वीर RBI के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने मज़ाकिया लहज़े में दिखाई।

दरअसल, रघुराम राजन की पुस्तक ‘द थर्ड पिलर’ के विमोचन के दौरान उनसे सवाल पूछा गया कि क्या वो राजनीति में अपनी भूमिका के लिए भारत वापस आएँगे, तो इसके जवाब में उन्होंने कहा कि उनकी पत्नी ने उनसे कहा है कि अगर वो राजनीति में गए तो वो उनके साथ नहीं रहेंगी। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि वो जहाँ हैं वहीं ख़ुश हैं, लेकिन अगर उन्हें कोई योग्य ऑफ़र मिला तो वो उस पर विचार करेंगे।

उनके इन शब्दों पर सोशल मीडिया पर यूज़र्स ने चुटकी ली। एक यूज़र ने लिखा, “सर आप पहले से ही राजनीति में हैं, लेकिन आप इसे एक अलग तरीके से सार्वजनिक करते हैं।”

एक यूज़र ने तो अपनी प्रतिक्रिया में रघुराम राजन को ‘कांग्रेसी राजन’ तक लिख दिया।

एक अन्य यूज़र ने ट्वीट किया कि, या तो आपको राजनीतिक बयान देना बंद कर देना चाहिए या इसे सार्वजनिक रूप से स्वीकार लेना चाहिए।

भले ही यह बात रघुराम राजन ने एक मज़ाकिया लहज़े में कही, लेकिन इस बात से यह तो स्पष्ट हो गया कि वो फ़िलहाल तो राजनीति में अपने क़दम नहीं रखने वाले हैं। ऐसा इसलिए, क्योंकि पिछले कुछ समय से यह अटकलें लगाई जा रही थी कि वो महागठबंधन (तृणमूल कॉन्ग्रेस, समाजवादी पार्टी, बसपा, सपा और तेलुगु देशम पार्टी) के जीतने की स्थिति में वित्त मंत्री का पदभार संभाल सकते हैं।

बता दें कि कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गाँधी ने NYAY स्कीम लॉन्च करने के बाद कहा था कि रघुराम राजन को विश्व के टॉप अर्थशास्त्रियों में से एक बताया था और कहा था कि उनकी पार्टी ने न्यूनतम आय योजना तैयार करते समय उन्हीं की सलाह ली थी।

ग़ौरतलब है कि कॉन्ग्रेस पार्टी ने देश की जनता को बरगलाने के लिए एक ऐसा पासा फेंका था जिसमें यह वादा किया गया कि यदि केंद्र में उनकी सरकार आएगी तो 5 करोड़ ग़रीब परिवारों को सालाना 72,000 रुपए दिए जाएँगे, यानी 6 हज़ार रुपए प्रतिमाह। इस राशि को गृहणी के खाते में सीधे ट्रांसफर करने की बात भी कही गई।

फ़िलहाल, रघुराम राजन शिकागो यूनिवर्सिटी के बूथ स्कूल ऑफ़ बिज़नेस में अध्यापन का कार्य कर रहे हैं। RBI के 23वें गवर्नर के रूप में रघुराम राजन का कार्यकाल सितंबर 2013 से सितंबर 2016 तक था।

SP-BSP रैली में घुसा सांड, मायावती ने कहा BJP ने ही भेजा होगा

सपा-बसपा गठबंधन जबसे हुआ है, मायावती और अखिलेश यादव को आए दिन किसी न किसी मुश्किल में पड़ते देखा जा सकता है। लेकिन हालिया परेशानी किसी इंसान को लेकर नहीं, बल्कि एक ‘मनचले’ सांड के कारण पैदा हुई है।

इन दिनों उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक सांड घुस आया है, जो चर्चा और हंसी-मजाक का विषय बन गया है।
अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव के चुनाव क्षेत्र कन्नौज में बृहस्पतिवार (अप्रैल 25, 2019) को आयोजित सपा-बसपा-आरएलडी गठबंधन की रैली में एक सांड ने जमकर आतंक मचाया था। इस पर बसपा सुप्रीमो मायावती ने बीजेपी पर कटाक्ष भी किया है। कन्नौज में अखिलेश यादव और मायावती, दोनों चुनाव प्रचार के लिए आने वाले थे। लेकिन सांड के खलल डालने से, उनकी रैली आधे घंटे लेट में शुरू हुई।

रैली के दौरान एक सांड के आ जाने से पूरी रैली में आफरा तफरी मच गई थी। सांड ने इस कदर आतंक मचाया कि अखिलेश और मायावती के हेलीकॉप्टर भी नीचे नहीं उतर पाए। बताया जा रहा है कि पुलिस के साथ कार्यकर्ता और फायर ब्रिगेड की आधे घंटे की कड़ी मशक्कत के बाद सांड पर काबू पाया जा सका। इसके बाद उनकी रैली शुरू हो पाई।

सांड के आने और आतंक मचाने की घटना को मायावती ने बीजेपी की साजिश बताया। इस प्रकरण को लेकर शुक्रवार (अप्रैल 26, 2019) को उरई की एक जनसभा में मायावती ने बीजेपी पर वार किया। उन्होंने कहा, “अब तो बीजेपी के जो आवारा जानवर हैं, हमारी चुनावी जनसभा में उनको छोड़े जा रहे हैं। कल कन्नौज में हमारी जनसभा थी वहाँ हमारे आने से पहले बीजेपी के लोगों ने ऐसा लगता है शरारत के तहत वहाँ पर आवारा जानवरों को भेजा।”

पत्नी ने ममता की पार्टी को नहीं दिया वोट, टीएमसी समर्थक पति ने उसके मुँह में उड़ेला तेजाब

पश्चिम बंगाल में चुनाव से संबंधित हिंसा थमने का नाम ही नहीं ले रही। इस बार पश्चिम बंगाल से पूरी मानवता को शर्मसार करने वाली घटना सामने आई है। पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में एक महिला के मुँह में सिर्फ इसीलिए तेजाब उड़ेल दिया गया, क्योंकि उसने कथित तौर पर कॉन्ग्रेस को वोट दिया था। जानकारी के मुताबिक, टीएमसी के एक समर्थक की पत्नी ने सत्ताधारी दल टीएमसी को वोट नहीं दिया, जिससे खफा होकर उसने अपने रिश्तेदारों के साथ मिलकर अपनी पत्नी के मुँह में तेजाब डाल दिया

अंसुरा बीबी की हालत काफी गंभीर बताई जा रही है। वह जिंदगी और मौत के बीच जूझ रही है। पीड़ित महिला अंसुरा बीबी को स्थानीय अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने महिला की गंभीर हालत को देखते हुए प्राथमिक उपचार करके उसे मुर्शिदाबाद मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पीटल रेफर कर दिया गया। इसीलिए डॉक्टरों ने उसे अगले 48 घंटे तक के लिए अपनी निगरानी में रखा है।

पुलिस ने इस मामले में केस दर्ज कर जाँच शुरू कर दी है। अत्याचार की शिकार हुई महिला के बेटे ने इस घटना की पुष्टि की है। उसने बताया कि उसकी माँ के मुँह में तेजाब डालने से पहले उसके बाल पकड़ कर घसीटा गया और उसे बुरी तरह से पीटा भी गया था।

खबरों के अनुसार, मंगलवार (अप्रैल 23, 2019) को पोलिंग बूथ पर वोट डाल कर घर लौटने के बाद से ही परिवार के सदस्यों ने उस पर अत्याचार करना शुरू कर दिया था। गौरतलब है कि, इससे पहले भी पश्चिम बंगाल में लोकसभा चुनाव के दौरान हिंसा के कई मामले सामने आए हैं। इन सब के बीच परिवार में ही राजनीतिक हिंसा की घटना काफी दुखद और शर्मनाक है।

जमानत पर सिर्फ़ साध्वी प्रज्ञा ही नहीं सोनिया, राहुल, कन्हैया भी लड़ रहे हैं लोकसभा चुनाव

इन दिनों एक ओर लोकसभा चुनाव के कारण पूरे देश का माहौल गरमाया हुआ है तो वहीं दूसरी ओर भोपाल की लोकसभा सीट पर साध्वी प्रज्ञा सिंह को टिकट मिलने से विपक्ष में भी काफ़ी हलचल है। साध्वी प्रज्ञा के मालेगाँव ब्लास्ट में आरोपित होने का उलाहना देकर विरोधी लगातार भाजपा को घेरने का प्रयास कर रहे हैं।

बार-बार इस बात को उठाया जा रहा है कि जिन साध्वी प्रज्ञा ने अपनी बिगड़ी तबियत के कारण जमानत ली थी, वो आज चुनाव प्रचार में इतनी सक्रिय कैसे हैं? प्रज्ञा के विरोध में उठने वाली ये आवाज़ दिन पर दिन बुलंद हो रही हैं। जबकि विपक्ष के कुछ नेता ऐसे हैं जिनका नाम बड़े-बड़े घोटालों में शामिल होने के बाद भी वो न केवल चुनाव लड़ रहे हैं बल्कि ‘राष्ट्रीय पार्टी’ के अध्यक्ष या फिर सबसे बड़ा चेहरा बने बैठे हैं।

1. सोनिया गाँधी

इस सूची में सबसे पहला नाम यूपीए की अध्यक्ष सोनिया गाँधी का है जो इस बार भी रायबरेली से चुनाव लड़ेंगी। सोनिया को टक्कर देने के लिए भाजपा के दिनेश प्रताप सिंह (निरहुआ) भाजपा की ओर से मैदान में उतरे हैं। सोनिया गाँधी के ख़िलाफ़ नेशनल हेरॉल्ड केस में मामला दर्ज है। ये एक ऐसा केस है जिसमें गाँधी परिवार के किसी शख्स का नाम प्रत्यक्ष रूप से शामिल है। इस केस को साल 2012 में भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी अदालत ले गए थे। इसी मामले में दिल्ली की पटियाला हाउस अदालत ने 19 दिसंबर 2015 को सोनिया और राहुल को जमानत दी थी।

2. राहुल गाँधी

यूपीए अध्यक्ष सोनिया गाँधी के बेटे और कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने भी नेशनल हेराल्ड केस के कारण खूब आलोचनाएँ झेली हैं। 2019 में राहुल वायनाड और अमेठी से चुनाव लड़ रहे हैं। अमेठी में उनके ख़िलाफ़ भाजपा ने स्मृति इरानी और वायनाड में एनडीए ने तुषार वेल्लापुली को उतारा है। राहुल गाँधी भी अदालत से जमानती कैंडिडेट हैं।

3.शशि थरूर

कॉन्ग्रेस के कद्दावर नेता शशि थरूर पर सुनंदा पुष्कर की हत्या के मामले में केस दर्ज है। घटना 2014 की है, जब शशि थरूर की पत्नी सुनंदा दिल्ली के लीला पैलेस (5 सितारा होटल) में मृत पाई गई थीं। शुरूआत में इसे स्वाभाविक मौत माना जा रहा था, लेकिन बाद में एम्स की रिपोर्ट ने खुलासा किया कि उन्हें ज़हर देकर मारा गया है। इस मामले में थरूर से पूछताछ शुरू हुई। साल 2018 में दिल्ली पुलिस ने उनकी न्यायिक हिरासत की माँग की, जिस पर थरूर ने अग्रिम जमानत की माँग की थी। इसके बाद दिल्ली के पटियाला हाउस कोर्ट द्वारा उन्हें 5 जुलाई 2018 को जमानत दे दी गई थी। साथ ही थरूर के विदेश जाने पर भी रोक लगा दी गई थी। इस बार थरूर तिरूवनंतपुरम की लोकसभा सीट पर चुनाव लड़ेंगे। पिछले दो बार से वो यहाँ जीत दर्ज कराते आ रहे हैं।

4. कन्हैया कुमार

जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार पर साल 2016 में देशविरोधी नारेबाजी करने का आरोप है। 11 फरवरी 2016 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् की शिकायत पर कन्हैया और उसके साथियों पर देशद्रोह का केस दर्ज हुआ था। 12 फरवरी 2016 इस मामले में कन्हैया गिरफ्तार हुए और 26 अगस्त को कन्हैया को जमानत मिली।

मामले के तीन साल बाद साल 2019 में फिर दिल्ली पुलिस ने केस में चार्जशीट दायर की है। जिसके मद्देनज़र कोर्ट ने दिल्ली सरकार को 23 जुलाई से पहले फैसला लेने को कहा है। कन्हैया के सुर्खियों में आने के बाद से ही अंदाजा लगाया जा रहा था कि वे साल 2019 में चुनाव लड़ सकते हैं जो कि सच हुआ। 32 साल के कन्हैया पहली बार सीपीआई की ओर से बेगुसराय सीट पर चुनाव लड़ेंगे। कन्हैया के ख़िलाफ़ भाजपा ने गिरिराज सिंह को उतारा है और आरजेडी ने तनवीर हसन को।

5. पप्पू यादव

पप्पू यादव जन अधिकार पार्टी की ओर बिहार की मधेपुर लोकसभा सीट पर चुनाव लड़ेंगे। उनके विपक्षी आरजेडी से शरद यादव और जेडीयू से दिनेश चंद्र यादव होंगे। यूं तो आपराधिक रिकॉर्डों के मामले में पप्पू का इतिहास पुराना है लेकिन हाल ही में उन्हें दो मामलों में ज़मानत दी गई है। पहली 25 साल पुराने पुलिस से बदसलूकी के मामले में और दूसरी आचार संहिता के उल्लंघन के आरोप में।

राजदीप सरदेसाई ने स्वीकारा 2002 के दंगों के लिए मोदी ज़िम्मेदार नहीं, मीडिया ने झूठ फैलाया

राजदीप सरदेसाई के लगभग पूरे करियर ने ही बीजेपी विरोध और उसमें भी मोदी विरोध की बदौलत आकार लिया है। यह ऐसे पत्रकार हैं जो बिना किसी सबूत के ही अपने मीडिया ट्रायल में खासतौर से भाजपा और उसके नेताओं को तुरंत दोषी ठहराते थे। और अगर कोर्ट ने किसी को बरी कर दिया तो भी ये अपने ही बयानों को ट्विस्ट देकर खुद को जस्टिफाई करने की लगातार कोशिश करते थे और इनके इस काम में इनका पूरा गिरोह बखूबी साथ देता था। खैर ऐसे कई मुद्दे हैं जहाँ राजदीप पहले भी बेनक़ाब हो चुके हैं, आखिरी समय तक इन्होंने कॉन्ग्रेस के लिए फील्डिंग करने में कोई कसर नहीं छोड़ी और अब उनके रुख में पिछले कुछ दिनों से बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। यह उनके लिए कुछ अच्छा बेशक हो सकता है पर गिरोह के लिए ये किसी बड़े सदमे से कम नहीं है।

हाल ही में, लेखक-पत्रकार मनु जोसेफ के साथ एक साक्षात्कार में, राजदीप सरदेसाई ने पुराने पाप धोकर गंगा नहाने की ठानी।

एक सवाल का जवाब देते हुए कि क्या 2002 में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी इस घटना के लिए किसी भी तरह से जिम्मेदार थे, राजदीप सरदेसाई ने स्वीकार किया कि वह व्यक्तिगत रूप से मानते थे कि गोधरा नरसंहार के बाद हुए 2002 के दंगों के लिए मोदी जिम्मेदार नहीं थे।

उन्होंने कहा, ”हमारे लिए यह कहना अनुचित है कि मोदी या कोई भी दंगे के लिए जिम्मेदार था। उन्होंने हिंसा को उकसाया नहीं।” फिर भी, राजदीप सरदेसाई ने दावा किया कि मुख्यमंत्री मोदी कुछ हद तक शांत थे क्योंकि उन्होंने दंगों को रोकने की कोशिश नहीं की थी। उन्होंने कहा कि राज्य पर मोदी का उतना नियंत्रण नहीं था जितना वीएचपी नेता प्रवीण तोगड़िया का वास्तविक नियंत्रण था क्योंकि मोदी 2002 में सत्ता में आए ही थे।

राजदीप सरदेसाई के अनुसार, मोदी उतने शक्तिशाली नहीं थे, जितना लोगों ने सोचा था और उन्होंने 2002 दंगों के दौरान प्रवीण तोगड़िया को अधिक स्पेस देने का समर्थन किया। हालाँकि, राजदीप का यह मानना है कि हिंसा में हमेशा कुछ राजनीतिक निवेश होता है, जो इस बात का संकेत है कि नरेंद्र मोदी 2002 की घटना से राजनीतिक रूप से लाभान्वित हुए थे।

मीडिया में दंगों की रिपोर्टिंग पर खेद व्यक्त करते हुए, राजदीप सरदेसाई ने स्वीकार किया कि गुजरात दंगों को मीडिया द्वारा सनसनीखेज बनाया गया था। राजदीप ने कहा कि दंगों जैसी संवेदनशील घटनाओं को रिपोर्ट करते समय सेल्फ सेंसरशिप की जरूरत है। राजदीप आखिरकार इस तथ्य पर सहमत हो गए कि मीडिया वास्तव में दंगों की तीव्रता को बढ़ाने के लिए ज़िम्मेदार था।

जबकि राजदीप का यह रहस्योद्घाटन अब हुआ है, हाल तक राजदीप यह कहते रहे हैं कि मोदी और भाजपा के हाथ खून से सने हैं और राजदीप ने 1984 के सिख नरसंहार की तुलना 2002 के दंगों से भी की थी जहाँ कॉन्ग्रेस के नेता सीधे तौर पर शामिल थे और राजीव गाँधी ने खुद हिंसा भड़काई थी यह भाषण देकर कि ‘जब एक बड़ा पेड़ गिरता है, तब धरती हिलती है।’ जबकि 2002 के दंगों की बात करें तो सरदेसाई ने अब स्वीकार किया कि मोदी की कोई भूमिका नहीं थी और अदालतों ने भी उन्हें क्लीन चिट दे दी है।

राजदीप 2018 में भी मोदी से 2002 के लिए माफ़ी माँगने को कह रहे थे लेकिन अब वह कह रहे हैं कि मोदी इसमें शामिल नहीं थे।

एक बात तो यह है कि राजदीप अब इस बात से सहमत हैं कि मोदी की दंगों में भूमिका नहीं थी और मीडिया ने दंगों को सनसनीखेज बना दिया था, क्या वह जानबूझकर इस ‘सनसनीखेजवाद’ को 2002 से लेकर हाल तक तक आगे बढ़ा रहे थे?

जैसा कि 2019 के लोकसभा चुनावों के पूर्व रुझानों से पता चलता है कि एनडीए सरकार सत्ता में वापस आ रही है, कॉन्ग्रेस समर्थित मीडिया पारिस्थितिकी तंत्र नरेंद्र मोदी के साथ तालमेल बिठाने का मौका खोजने की कोशिश में अपने पुराने आकाओं और गिरोहों को छोड़ने का यह एक संकेत है। या इस बात का डर कि अब और कॉन्ग्रेसी या देश विरोधी एजेंडा चलाना संभव नहीं।

राजदीप सरदेसाई जैसे वामपंथी मीडिया और उनके गिरोह के अन्य पत्रकारों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ खुले तौर पर और हमेशा के लिए पक्षपात किया क्योंकि वह गुजरात के मुख्यमंत्री थे। पीएम मोदी के खिलाफ एक अथक अभियान चलाने वाले इस पूरे पारिस्थितिकी तंत्र ने आखिरकार महसूस किया कि उनका दुष्प्रचार सोशल मीडिया के युग में और अधिक काम नहीं करता दिख रहा है। इसलिए, लुटियंस इकोसिस्टम के कुछ वर्ग द्वारा पीएम मोदी और भाजपा के खिलाफ उनके निरंतर नाकामयाब घेरेबंदी के बाद, अब हताश होकर सच बोलने की कोशिश की गई है।

क्या इंदिरा गाँधी इसी तरह मैदान छोड़कर भागतीं जिस तरह ‘इंदिरा 2.0’ भागी है?

वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान माहौल को याद करें तो हम पाएँगे कि ये वो समय था जब देश भर में मोदी लहर अपने चरम पर थी। जनता ‘अराजकतावादी’ कॉन्ग्रेस के भ्रष्टाचार, आत्मुग्धता में डूबे एकतरफा संवाद और सत्तापरस्ती से ऊब चुकी थी। ऐसे समय में लोगों को नरेंद्र मोदी के रूप में शायद पहली बार एक ऐसा चेहरा मिला, जिसमें हर किसी ने खुद की परछाईं देखी।

वहीं, दूसरी ओर सदियों से ही परिवारवाद में लिप्त कॉन्ग्रेस के सामने ऐसे माहौल में चिरयुवा राहुल गाँधी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बताकर 2014 के चुनाव में जुआ खेलना बहुत बड़ा चैलेंज बन गया था। इसका कारण बहुत ही सीधा सा था! कॉन्ग्रेस कभी नहीं चाहती कि वो पहले से ही हारी हुई लड़ाई में अपने सबसे पसंदीदा और दुलारे राजकुमार को हारने के लिए आगे खड़ा करती। ऐसे में कॉन्ग्रेस ने इन्तजार करना बेहतर समझा और अपने जीतने की तैयारियों से ज्यादा ऊर्जा पार्टी के पारंपरिक अध्यक्ष राहुल गाँधी को सुरक्षित करने और उनकी छवि बनाने पर झोंक दी।

वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले कॉन्ग्रेस के सामने यही प्रश्न फिर खड़ा हो गया कि क्या राहुल गाँधी मुख्य चेहरा बनाए जाने लायक तैयार हो चुके हैं? इसका जवाब खुद राहुल गाँधी हैं। आलू से सोना बनाने जैसी विधियों से देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का दावा करने वाले और झूठे कागजों के आधार पर मोदी सरकार को घोटालों में लिप्त बताने की नादान कोशिश करने वाले देश की सबसे बुजुर्ग राष्ट्रीय पार्टी के चिरयुवा अध्यक्ष राहुल गाँधी शायद पार्टी की उम्मीदों पर आज भी खरे नहीं उतर रहे हैं। हालाँकि, ये भी दिलचस्प बात है कि इससे उनके पार्टी अध्यक्ष होने और पार्टी में निर्विवाद रूप से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार होने पर कोई सवाल खड़ा नहीं होता है।

ऐसे समय में अब गाँधी परिवार के पास आखिरी विकल्प था राहुल गाँधी की बहन प्रियंका गाँधी! आखिरकार वो दिन भी आ ही गया जब कॉन्ग्रेस ने प्रियंका गाँधी को पूर्ण रूप से राजनीति में उतारने का फैसला लिया। इस फैसले के बाद एक ऐसा गिरोह अचानक सक्रिय हो गया, जो 2014 के आम चुनावों के बाद से, या कहा जाए तो कॉन्ग्रेस के हाथों से सत्ता छिन जाने से अपनी हर उम्मीद और आशा हारकर लगभग शिथिल पड़ चुका था।

प्रियंका गाँधी के नाम की घोषणा होते ही अचानक से इस गिरोह में शक्ति का संचार फूट पड़ा। मीडिया से लेकर समाचार पत्रों तक में एक नए उत्साह का संचार देखने को मिला। इनमें सबसे ज्यादा जोर उन लोगों ने लगाया, जो मोदी विरोध में अवार्ड वापस करना चाहते थे, लेकिन उनके पास वापस करने के लिए अवार्ड ही नहीं थे।

मीडिया ने यह बताने का हर संभव प्रयास किया कि प्रियंका गाँधी इंदिरा गाँधी की ही अवतार हैं। प्रियंका गाँधी की साड़ी से लेकर उनकी नाक, कान और बालों तक को इंदिरा के रंग में रंगने की कोशिश की जाने लगी। यहाँ तक भी चर्चा की जाने लगी कि प्रियंका गाँधी चलती भी अपनी दादी इंदिरा गाँधी की ही तरह हैं।

सारा गाँधी परिवार और उनके सिपहसालार ये बात अच्छे से जानते हैं कि भाई राहुल के सुनहरे राजनीतिक करियर के लिए उनकी बहन प्रियंका का प्रत्यक्ष रूप से राजनीति में आना ही उनके लिए सबसे बड़ी बाधा हो सकती है। फिर भी यह बड़ा निर्णय लिया गया और पार्टी महासचिव पद उन्हें सौंपकर मैदान में उतारा गया। यहीं से असल खेल शुरू हुआ।

प्रियंका गाँधी की छवि एक आदर्श भारतीय नारी के रूप में बनाने की तैयारियाँ की जाने लगीं। मीडिया ने प्रियंका गाँधी द्वारा अपने पति को लेकर दिए गए बयानों को मुख्य पेज पर छापा। कभी वो कहती सुनी गईं कि वो हर हाल में अपने पति, यानी मनी लॉन्ड्रिंग मामले में रोजाना ED ऑफिस के चक्कर काट रहे रॉबर्ट वाड्रा के साथ खड़ी रहेंगी, तो कभी वो मंच से अपने बच्चों का परिचय करवाती हुई नजर आईं।

मोदी लहर के सामानांतर ही ऐसी हवा बनाने का प्रयास किया गया जो इंदिरा गाँधी से मिलती-जुलती हो। ऐसा करते हुए विपक्ष ने बेवकूफी में यह भी साबित कर दिया कि उनके पास मोदी के बराबर तो क्या, उनके आस-पास ठहरने वाला तक कोई समकालीन नेता नहीं है और इसी कारण से उसे प्रियंका गाँधी में ही इंदिरा गाँधी की छवि ठूँसकर 2019 के चुनाव के लिए तैयार करना पड़ रहा है। कुछ समय तक ऐसी भी ख़बरें मैदान में उतारी गईं कि बनारस से नरेंद्र मोदी को टक्कर देने के लिए सीधा प्रियंका गाँधी ही अब मुकाबले में उतारी जाएँगी। लेकिन, कल बनारस में प्रधानमंत्री नरेंद्र की रैली में बिना ‘फोटोशॉप तस्वीरों’ के उमड़े जनसैलाब ने विपक्ष की हवा टाइट कर डाली।

इंदिरा गाँधी वर्जन-2 की छवि गढ़ने की प्रक्रिया युद्ध स्तर पर चल ही रहीं थी कि अचानक एक दिन मुंगेरीलाल ने सपना देखते-देखते अपने एकमात्र दूध के घड़े पर भी लात दे मारी और उसे भी फोड़ दिया। इस तरह से मीडिया गिरोह से लेकर तमाम मोदी विरोधियों के सपने और अरमानों का शीघ्रपतन हो गया।

प्रियंका गाँधी के मोदी के खिलाफ बनारस से चुनाव लड़ने की बात कॉन्ग्रेस का एक और जुमला साबित हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता में आज भी कोई कमी नहीं है, यही देखकर कॉन्ग्रेस ने अपनी आखिरी उम्मीद, यानी इंदिरा गाँधी जैसी दिखने वाली प्रियंका गाँधी को पीछे खींचना ही उचित समझा। और कल शाम तक उस तमाम मीडिया गिरोह में सन्नाटा छा गया, जिसने पिछले 2 महीने प्रियंका गाँधी के रूप में इंदिरा गाँधी से 2019 का आम चुनाव लड़ाने का सपना देखा था।

पूरे 5 साल तक कॉन्ग्रेस पार्टी अध्यक्ष राहुल गाँधी जनता से झूठे सबूतों के आधार पर सिर्फ गिनी-चुनी बातें कहता आया है। जैसे, चौकीदार चोर है, देश में अराजकता फैला रहा है, संविधान खत्म कर रहा है, देश में साम्प्रदायिकता बढ़ा रहा है, अम्बानी को देश बेच दिया। और अब इसी अध्यक्ष ने चुनाव के वक़्त बनारस में अजय राय नामक घिसापिटा प्रत्याशी मोदी के सामने उतारा है। सवाल सीधा सा है, यदि राहुल गाँधी के अनुसार मोदी देश की संपदा बेच रहा है, हत्यारा है, चोर है, कॉर्पोरेट का दलाल है, तो राजनैतिक शिष्टाचार के नाम पर उन्हें संसद में आखिर क्यों भेज रहे हो? जब अन्य राजनीतिक दल अपने प्रत्याशी चुन रहे होते हैं, तब कॉन्ग्रेस बलि के बकरे तलाशने में ही अपनी सारी शक्ति लगा देती है।

सोशल मीडिया पर कल शाम का मंजर निराश कर देने वाला था। प्रियंका गाँधी से उम्मीद लगाए हुई तमाम मोदी विरोधी खुद को कोड़े मारते नजर आए। इनकी प्रतिक्रियाएँ देखकर स्पष्ट था कि इन सबके लिए अपनी कुंठा को छुपा पाना अब संभव नहीं है। सब्र का बाँध ऐसा टूटा कि 5 साल तक अंधाधुंध तरीके से मोदी विरोध करने वाले यह तक कहते देखे गए कि प्रियंका गाँधी से ज्यादा दम तो अरविन्द केजरीवाल में था, जो कम से कम अपने कहे के अनुसार वाराणसी से मैदान छोड़कर भागा तो नहीं।

जाहिर सी बात है कि कॉन्ग्रेस वर्तमान लोकसभा चुनाव नतीजे सामने आने से पहले ही हार गई है। ये बुजुर्ग पार्टी किसी भी तरह से ICU में लेटे रहकर बस स्वयं के जिन्दा होने का प्रमाण देना चाह रही है कि आज नहीं तो कल इसके अच्छे दिन आएँगे। हालाँकि, अच्छे दिनों के लिए उन्हें परिवारवाद की लालसा से बहार निकला ही होगा लेकिन ये काम अहंकार में डूबे हुए राजनीति के इस खानदान विशेष के लिए संभव नहीं है।

एक और जनता का नेता खड़ा है और अगर कॉन्ग्रेस सोच रही है कि वंशवाद के हथियार से वो इस महामानव का मुकाबला कर पाएगी, तो यह बहुत ही बचकानी बात होगी। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि जनता इस स्नेह से आखिरी बार खुद को सिर्फ महात्मा गाँधी से ही जोड़ पाई थी। यदि गाँधी आजादी से पहले के महामानव थे, तो नरेंद्र मोदी आजादी के बाद के महामानव हैं।

फ़िलवक़्त, प्रियंका गाँधी को वाराणसी से चुनाव न लड़वाकर कॉन्ग्रेस ने एक तरह से ‘इंदिरा गाँधी 2.0’ फिल्म के फ्लॉप होने की घोषणा कर दी है। एक आखिरी सवाल जरूर बनता है कि क्या प्रियंका गाँधी जैसी दिखने वाली उनकी दादी इंदिरा भी इसी तरह से मोदी के सामने मैदान छोड़कर भाग जातीं, जिस तरह से ‘इंदिरा 2.0’ भागी हैं? जवाब एक ही है, “मोदी है, तो मुमकिन है।”

एक नजर मीडिया गिरोह विद्यालय के ‘कुलपतियों’ द्वारा की गई उन तमाम क्यूट कोशिशों पर, जो नाकाम रहीं


दुष्कर्म मामले में आसाराम का बेटा नारायण साईं दोषी करार, 30 अप्रैल को सुनाई जाएगी सजा

आसाराम बापू के बेटे नारायण साईं को दुष्कर्म मामले में दोषी पाया गया है। इस पर 30 अप्रैल को उसे सजा सुनाई जाएगी। 40 साल के नारायण साईं को हरियाणा के कुरुक्षेत्र के पास पीपली से दिसंबर 2013 में गिरफ्तार किया गया था। सूरत की रहने वाली दो बहनों ने नारायण साईं और उसके पिता आसाराम बापू के खिलाफ दुष्कर्म की शिकायत दर्ज कराई थी।

एक बहन ने साईं पर 2002 और 2005 के बीच सूरत में आश्रम में रहने पर यौन शोषण करने का आरोप लगाया था। पीड़िता की बड़ी बहन ने अहमदाबाद में 1997 और 2006 में आश्रम में रहने के दौरान आसाराम पर यौन शोषण का आरोप लगाया था।

दोनों बहनों ने साईं और आसाराम के खिलाफ कथित शोषण की अलग-अलग शिकायत दर्ज कराई थी। पुलिस ने आसाराम और उसके बेटे के खिलाफ दुष्कर्म, यौन शोषण और अवैध तरीके से बंधक बनाकर रखना और अन्य अपराध के तहत मामला दर्ज किया था। इस मामले में पुलिस ने साईं के चार साथियों को भी गिरफ्तार किया था।

FIR दर्ज होने के बाद नारायण भूमिगत हो गया था और पुलिस से बचने के लिए बार-बार अपनी लोकेशन बदल रहा था। दिसंबर, 2013 में नारायण को हरियाणा-दिल्ली सीमा के पास से गिरफ्तार किया गया था। नारायण पर जेल में रहते हुए पुलिस कर्मचारी को ₹13 करोड़ की रिश्वत देने का भी आरोप लगा था।

मोदी शो ने दी हवा, थोड़ा-सा धुआँ उठा, लिबरलों की जल गई!

आज मोदी ने बनारस ने नामांकन भरा, कल उनका रोड शो था। रोड शो कैसा था वो सारे न्यूज चैनलों ने दिखाया। आम तौर पर रोड शो या नामांकन का काफ़िला एक शक्ति प्रदर्शन के तौर पर इस्तेमाल होता रहा है। हाल ही में कन्हैया कुमार के लिए जब ऐसी ही भीड़ बेगूसराय में आई थी तो लिबरलों के पता नहीं कहाँ-कहाँ से आँसू निकल रहे थे। उनके लिए यह प्रेम था कन्हैया के लिए। वैसे ही राहुल गाँधी के वायनाड वाले शो में हरे रंग का प्रदर्शन भी दक्षिण के लोगों में कॉन्ग्रेस और राहुल की पैठ का परिचायक था।

लेकिन ज्योंहि मोदी ने बनारस में रोड शो किया, कि एवरीबडी लूज़ेज देयर माइंड्स! बनारस में ऐसा क्या था कि लिबरलों की सुलग गई? बनारस में एक खास रंग का समुद्र था। बनारस में एक खास व्यक्ति अपनी गाड़ी से हाथ हिला रहा था। बनारस में एक खास पार्टी के झंडे दिख रहे थे। बनारस में सनातन हिन्दू धर्म के प्रतीक चिह्नों का मेला लगा हुआ था। और बनारस में इस देश के हिन्दुओं की झुठलाई जाती रही संस्कृति को पुनर्जीवित करने की आशा की हवा चल रही थी।

इसी हवा ने बहुतों के दिलों में, और स्थानविशेष में पड़े, शोलों को जगा दिया और आग जल गई! मोदी शो ने दी हवा, थोड़ा सा धुआँ उठा और आग जल गई! और भाजपा भी कम नहीं है, वो हर साल दो से तीन बार ऐसे आयोजन करती है जिससे इन तथाकथित बुद्धिजीवियों, पाक अकुपाइड पत्रकारों और पत्रकारिता के समुदाय विशेष गिरोह के लोगों की कुंठा किलस-किलस कर बाहर आती रहे।

मोदी के भगवा से लिबरलों, कामपंथियों और पत्रकारिता के समुदाय विशेष की सुलगती क्यों है? आखिर क्या नकारात्मक है यहाँ? कुछ नहीं, सिवाय इसके कि इस भीड़ का रंग हरा क्यों नहीं है? दुर्भाग्य यह कि जब इनकी जलती है, तो उस आग का भी रंग ‘लगभग’ भगवा ही तो होता है!

याद कीजिए वो दौर जब सफ़ेद टोपियाँ पहने तमाम नेता इफ़्तार पार्टियों में ‘शंतिप्रियों’ से ज़्यादा ‘शांतिप्रिय’ बनने की क़वायद में लगे रहते थे। हामिद अंसारी और नजीब जंग बिना टोपी के चिल कर रहे होते हैं और केजरीवाल टोपी पहन कर सीधा मक्का में पहुँचा टाइप फ़ील करते हैं। ममता बनर्जी ऐसे दुआ में हाथ उठाती हैं और बुदबुदाती हैं मानो पूरी क़ुरान वहीं पढ़ देंगी, लेकिन जिनके यहाँ गई होती हैं, उन्हें थिएट्रिक्स की ज़रूरत नहीं होती।

ऐसा नहीं है कि समुदाय विशेष या उनके मज़हब से किसी नेता को कोई लेना-देना हो। यह न तो धर्मनिरपेक्षता है, न ही अल्पसंख्यकों के साथ खड़े होने की बात। ये सिर्फ औपचारिकता है ताकि समुदाय विशेष को लगे कि उनके प्रतीक चिह्नों को वो हिन्दू नेता ढो रहा है जिसकी पार्टी कथित अल्पसंख्यकों के हितों की बात करती है। ध्यान रहे, ‘बात करती है’, काम कोई नहीं करता।

अगर इस सम्प्रदाय विशेष के लिए कोई भी पार्टी कुछ ढंग का काम करती तो तमाम सामाजिक सूचकांकों में यह समुदाय पीछे नहीं रहता, उनके समाज में पाकिस्तान और तुर्की जैसी जगहों से नकारी गई प्रथाओं की आड़ में स्त्रियों का अपमान नहीं हो रहा होता, उनकी बच्चियों में से मात्र एक प्रतिशत ग्रेजुएट नहीं होतीं। इस मजहब के लोग भी यह सब समझते हैं लेकिन वो अभी तक इन नेताओं की नौटंकी से बाहर नहीं आ पाए हैं, और आज भी कोई इमाम उन्हें एकमुश्त वोट करने की अपील कर देता है, और शायद, वो एकमुश्त वोट कर भी देते हैं।

ख़ैर, मोदी की बात करते हैं और उस जनसैलाब की बात करते हैं जो कल वाराणसी की महान नगरी में दिखी। वाराणसी और पाटलिपुत्र, दो ऐसे शहर हैं जो दुनिया के सबसे पुराने नगरों में आते हैं जो अपनी स्थापना के बाद से लगातार जीवित हैं, जिनकी बस्तियाँ गायब नहीं हुईं। यहाँ सभ्यता की शुरुआत से शहर के लोग हैं, लगातार बसे हुए। ये जीवित शहर हैं, सबसे पुराने।

मोदी का यहाँ से चुनाव लड़ना, जीतना और इस शहर का कायाकल्प करने के प्रयास में लगा होना, बताता है कि ये सिर्फ एक शहर नहीं बल्कि सनातन अस्मिता, इतिहास और संस्कृति के कायाकल्प की कोशिश है। वाराणसी की गंगा, यहाँ के विश्वनाथ और यहाँ के महामना इतिहास के निरंतर प्रवाह के प्रतिफल को वर्तमान तक पहुँचाते हैं। उसी की कड़ी में एक प्रयास मोदी का भी है।

लिबरलों और वामपंथियों ने इस समर्थन को पंद्रह सेकेंड भी देखा होगा तो उन्हें पता चल गया होगा कि उनके हिन्दू-विरोधी प्रपंच पर पिछले पाँच सालों से शॉशांक रेडेम्पशन के एंटी डूफरेन्स की तरह एक सरकार ने धीमे-धीमे ही सही, लेकिन प्रहार तो किया है। इसलिए जब उनके इन्टॉलरेन्स राग, राग मोदी घृणा फैलावत, राग बेरोज़गारी व्यापत, राग नोटबंदी मृतक, राग जीएसटी दुकानबंदी आदि से कोई दीपक नहीं जला, लेकिन ये मान कर चल रहे थे कि वो सत्ता विरोधी लहर फैलाने में कामयाब हो जाएँगे, तभी पता चला कि उनके रेकेल वेल्च की तस्वीर के पीछे से सरकार ने वामपंथी विचारधारा की जकड़न से सनातन अस्मिता को बचा कर निकाल लिया।

और मोदी जब वाराणसी में हाथ हिलाकर अभिवादन करता है, रुक कर एक आम नागरिक की शॉल लेता है, और पूरा रास्ता मोदी-मोदी के नारों से गूँजता है तो वह सिर्फ एक रोड शो नहीं रह जाता, वो एंडी डुफरेन्स के सर गिरती पानी की वो बूँदें हैं जिसकी पवित्रता और शीतलता उसने स्वतंत्रता पाने के बाद अपने चेहरे पर महसूस की थी। मोदी के ऊपर गुलाब की पंखुड़ियों की बारिश सनातन आस्था को इन बुद्धिपिशाचों के चंगुल से छुड़ाकर बाहर लाने के आभार सदृश है।

कुछ ने भीड़ देख कर इसे हिटलर और नाज़ी जर्मनी को याद किया। ये तो उनकी अपनी चिंता है कि उन्हें लोकप्रिय नेता और बहुमत से सत्ता चलाता हुआ प्रधानमंत्री हिटलर लगता है। ये बताता है कि कुत्सित मानसिकता और दिमाग में जमा हुआ टार आपको कितना बीमार कर सकता है। हिटलर सिर्फ भीड़ जुटाने से हिटलर हो गया होता, तो वही भीड़ लालू की भी रैली में होती है, ममता की भी रैली में होती है, कॉन्ग्रेस की भी रैली में होती है। जबकि ममता के बंगाल और लालू के बिहार की जो स्थिति है, वो हिंसक तानाशाह के ज़्यादा क़रीबी होने का संकेत देती है।

किसी को इस बात से समस्या हुई कि हिन्दू आस्था का राजनीतिकरण हो रहा है! अरे चम्पू! आस्था का राजनीतिकरण बीफ पार्टी देना है, आस्था का राजनीतिकरण हिन्दू होकर इफ़्तार पार्टी में टोपी पहनकर चोरों जैसे मिसफ़िट होते हुए घुलने-मिलने की नाकाम कोशिश है, आस्था का राजनीतिकरण यह है कि तुम्हें मंदिर जाता राष्ट्राध्यक्ष गलत लगता है, लेकिन जनेऊ पहनकर बाहर आता राहुल नहीं।

अगर इनका या जिनकी चाटुकारिता में इनका दिन बीतता है, उनका जनाधार नहीं है तो यह मोदी की समस्या नहीं है। तुम जुटा लो भीड़ जहाँ से भी जुटा सकते हो, किसी ने मना तो नहीं किया। वायनाड में हरे झंडों पर चाँद-तारे की हरियाली तो पूरे देश को दिखी ही थी, किसी ने नहीं कहा कि ये रंग धार्मिक आस्था का राजनीतिकरण है।

आस्था निजी होती है, और आस्था सामुदायिक भी होती है। संविधान हमें अपना धर्म, मज़हब, रिलीजन चुनने और उसके अनुसार आचरण करने की स्वतंत्रता देता है। मोदी द्वारा गंगा आरती उनकी निजी आस्था भी है, और उन करोड़ों हिन्दुओं की सामूहिक आस्था भी जिन्होंने मोदी को सत्ता दी है ताकि उनके हितों का भी ध्यान रखे। यहाँ पर हित से तात्पर्य यह है कि पिछली सरकारों द्वारा एक तय तरीके से उनके देवताओं, मंदिरों, इतिहास और ग्रंथों को झुठलाया जाता रहा, शोध पत्र लिखे जाते रहे कि अयोध्या में मस्जिद थी, बताया गया आर्य और द्रविड़ हुआ करते थे, फैलाया गया कि दलितों पर 5000 सालों से अत्याचार हुआ!

ये प्रपंच तुमने चलाया तो खूब अच्छा। इसका आधार कुछ नहीं, बस तुमने कहना शुरु किया और खूब प्रोपेगेंडा फैलाया। तुम्हारा प्रधानमंत्री यहाँ तक कह देता है कि इस देश के संसाधनों पर पहला हक़ कथित अल्पसंख्यकों का है! क्यों? किस हिसाब से? धर्मनिरपेक्षता कहाँ गई थी उस वक्त? इसीलिए तो तुम्हारी सुलगती है जब मोदी वंचितों, ग़रीबों और बेघरों की बात करते हुए, जाति और धर्म से परे, सबको दस प्रतिशत आरक्षण देकर सामाजिक न्याय की बात सही मायनों में करता है।

ये भगवा रंग किसी को डराने के लिए नहीं है। अयोध्या का दीपोत्सव किसी को धमकाने के लिए नहीं है। क्या इफ़्तार पार्टियाँ किसी को डराने के लिए होती थीं? बिलकुल नहीं। किसी नेता को लगा कि उसे जाना चाहिए, वो गया। किसी को लगा कि दुआ पढ़ने से उसे एक मजहबी आबादी अपना नेता मान कर अगली बार वोट देगी, तो उसे कान पर साड़ी का पल्लू रख कर आँख बंद कर लिया।

ये डराने के लिए नहीं है, ये लोगों का डर भगाने के लिए है। ये संस्कृतियों के युद्ध को टालने की एक ज़रूरत है। ये भगवा रंग उन लोगों को संबल देने के लिए है कि उन्हें डरने की आवश्यकता नहीं है। उनके राम, शिव, हनुमान पर कोई किसी रैली में चप्पल नहीं मारेगा। उनकी दुर्गा को कोई वेश्या नहीं कहेगा। उनके त्रिशूलों पर कोई कंडोम नहीं चढ़ाएगा। ये उस तरह की कुत्सित कोशिशों के लिए एक संकेत है कि सुधर जाओ। ये प्रतीकात्मक रूप से यह कहना भर है कि तुम्हारी मलिन कोशिशों को अब नहीं सहा जाएगा।

ये डराना नहीं है। कोई हिटलर नहीं आया। हिन्दुओं की धरती है, सर्वसमावेशी विचार के लोग हैं, सहिष्णुता के प्रवर्तक और स्नेह में डूबे हुए लोग कि इस्लामी आक्रमणकारियों, इस्लामी बलात्कारियों, इस्लामी और विदेशी हत्यारों को भी बसने की ज़मीन दी। और कितने उदाहरण चाहिए? ऐसे लोग किसी को क्या डराएँगे? हम तो स्वयं ही हर पर्व पर एक खास तरह के आतंक से डर जीते रहे हैं। अब तो तुम हमें, जीने दो, जीने दो!

बख्तियार ख़िलजी जैसे लुटेरों के नाम पर तो हमने शहर बना रखे हैं, जिसने नालंदा विश्वविद्यालय में आग लगाई थी। हमने उन लुटेरों की संतानों को बसने दिया जिन्होंने हमें सदियों ग़ुलाम बनाए रखा। हमसे तुम्हें कैसा डर? हम तो बस रोड शो कर रहे हैं, हमने तो बस वो झंडे निकाले हैं जो वहाँ हुआ करते थे जिसे किसी ने तोड़ दिया। हमने तो बस प्रयागराज को दोबारा प्रयागराज बनाया है, इसमें डराने-धमकाने जैसी कोई बात ही नहीं है।

जैसे इस्लामी आतंकियों ने, लुटेरों और बलात्कारियों ने संस्कृति को मिटाने का सबसे उचित तरीक़ा आस्था पर प्रहार और साहित्य-इतिहास को जलाने-बदलने में ढूँढ निकाला था, हम तो उसे रीक्लेम कर रहे हैं। जो हमारा था, जैसा हमारा था, संवैधानिक दायरे में रहते हुए वही पाने की कोशिश कर रहे हैं।

ये भगवा भीड़ तो बस अपना नेता देखने आई है। ये तो वो लोग हैं जिनकी मृत आत्माओं को किसी ने संजीवनी दे दी। ये तो वसुधैव कुटुम्बकम् वाले हैं, जिसकी वसुधा से पिछली सरकारों ने उन्हीं के कुटुम्ब को खदेड़ना शुरु कर दिया था। ये वो भीड़ है जिसके भीतर आशा जगी है कि वोट देकर भी इतिहास के गौरव को वापस पाया जा सकता है।

मोदी के रोड शो की भीड़ से जलो मत, यहाँ के लोगों का प्रेम जीतने के लिए संघर्ष करो। सनातन में पापी को भी मुक्ति मिलती है। पाक अकुपाइड पत्रकार, पत्रकारिता के समुदाय विशेष गिरोह के सम्मानहीन सदस्य, लिबरलों की भीड़ के लम्पट नेतावृंद और तुष्टीकरण की टोपी लगाकर टहलने वाले लीडरों को भी मोक्ष मिल सकता है, बशर्ते वो वाराणसी की धरती पर जाएँ, नए रेलवे स्टेशन पर उतरें, गंगा घाट की सीढ़ियों का मन से प्रणाम करें और माँ गंगा से बोलें, “अब हम लम्पटई नहीं करेंगे, अब हम चिरकुट नहीं बनेंगे”।

शेहला रशीद ने कहा हिंदू और मुस्लिम साथ बैठकर खाते हैं गोमांस, गिरिराज सिंह ने किया पलटवार

बिहार की बेगूसराय लोकसभा सीट से देशद्रोह के आरोपी कन्हैया कुमार वामपंथी दल सीपीआई के टिकट से चुनाव लड़ रहे हैं। कन्हैया कुमार का प्रचार करने और उन्हें जिताने के लिए टुकड़े-टुकड़े गैंग और उनके समर्थकों ने बेगूसराय में डेरा डाला हुआ है। इन्हीं में से एक जेएनयू की छात्र नेता और फ्रीलांस प्रोटेस्टर शेहला रशीद भी है, जो हिन्दुओं को बदनाम करके कन्हैया को जिताना चाहती है।

जानकारी के मुताबिक, शेहला रशीद ने पिछले दिनों बेगूसराय में कन्हैया कुमार के लिए प्रचार करते हुए एक विवादित बयान दिया था। जिसमें उन्होंने कहा था कि बड़े शहरों में हिंदू और मुसलमान साथ बैठ कर दारू पीते हैं और बीफ (गोमांस) खाते हैं। शेहला का यह बयान ट्विटर पर वायरल हो गया है और इस पर सियासत भी गर्म चुकी है। शेहला के इस बयान को आड़े हाथों लेकर लेकर भाजपा के नेता ने सवाल उठाया है।

बेगूसराय से भाजपा प्रत्याशी गिरिराज सिंह ने शेहला रशीद के बयान पर आपत्ति जताते हुए कहा कि शेहला रशीद द्वारा हिंदू धर्म को गाली दी जा रही है और हिंदू भावनाओं को भड़काने का काम किया जा रहा है, लेकिन विपक्षी पार्टी पूरे मसले पर चुप है। ऐसे में उनकी चुप्पी कहीं न कहीं सवालिया निशान खड़ा कर रही है।

इस दौरान गिरिराज सिंह ने प्रशासन को भी निशाने पर लिया और कहा कि जब उनके द्वारा कोई बयान दिया जाता है, तो उस पर चुनाव आयोग एवं प्रशासन द्वारा तुरंत संज्ञान लेता है। इतना ही नहीं, उस समय विपक्षी पार्टियों की तरफ से उल-जुलूल बयानबाजी का दौर शुरू हो जाता है। उन्होंने विरोधियों से सवाल पूछते हुए कहा कि जब शेहला रशीद द्वारा हिंदू भावनाओं को भड़काया गया और हिंदुओं के बारे में बीफ खाने और शराब पीने की बात कही गई तो अब सारे विरोधी लोग कहाँ हैं, रशीद के इस विवादित बयान पर सभी विपक्षी चुप क्यों हैं?

आगे गिरिराज सिंह ने विरोधियों को चेताते हुए कहा कि लोग वोट के लिए हिंदुओं को गाली देना और अपमानित करना बंद करें। उन्होंने कहा कि रशीद का यह बयान हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को चोट पहुँचाता है। गिरिराज सिंह ने कहा कि हर धर्म की अपनी एक मर्यादा होती है और हिंदू धर्म के लोग गाय को पूजते हैं, न कि उनका माँस खाते हैं। गौरतलब है कि इससे पहले कन्हैया कुमार की स्टार प्रचारक शेहला ने कन्हैया के लिए प्रचार करते हुए बेगूसराय की जनता से कहा था कि अपना सांसद नहीं चुन रहे, बल्कि अपने देश के लिए भविष्य का प्रधानमंत्री चुनने जा रहे हैं।