Sunday, September 27, 2020
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भ्रष्टाचार के ‘मोहरे’ और नेहरू से राहुल तक गाँधी परिवार का शातिर खेल

कहा जाता है कि नेहरू के समय तीन व्यक्ति अति भ्रष्ट थे और ये तीनों नेहरू के बेहद करीबी भी थे। इनमें से एक थे रक्षा मंत्री वी के कृष्णा मेनन, वित्त मंत्री टीटी कृष्णमचारी और पंजाब के कॉन्ग्रेसी मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरो। इनके भ्रष्टाचार के किस्से उजागर होने के बाद भी नेहरू ने इन्हें बर्खास्त करने के बजाय ईनाम दिया और कैबिनेट में रखे रहे।

अभी उत्तर प्रदेश के अंबेडकरनगर के एक दूरदराज गाँव में जाना हुआ। गाँव की चौपाल में ग्रामीण चर्चा कर रहे थे कि कॉन्ग्रेस की यूपीए सरकार में राहुल गाँधी के बिज़नेस साझेदार को 20 हजार करोड़ के पनडुब्बी रक्षा सौदे में ऑफसेट ठेका मिलने का खुलासा बताता है कि गाँधीपरिवार की दलाली व भ्रष्टाचार का खेल कितना शातिराना है। बीस इक्कीस साल का एक नौजवान कह रहा था, “गाँधी परिवार ही अपने आप में घोटाला है, नेहरू से लेकर राहुल और प्रियंका तक खुद को निरंकुश राजा मानते हुए भ्रष्टाचार को जन्मसिद्ध अधिकार मानते हैं।”

इस चर्चा से याद आया कि महात्मा गाँधीके निजी सचिव रहे वी कल्याणम ने अक्टूबर 2011 में सार्वजनिक मंच से कहा था, “आज देश में भ्रष्टाचार चरम पर है और इसके लिये मैं जवाहर लाल नेहरू को जिम्मेदार मानता हूँ। ब्रिटिश राज में इतना भ्रष्टाचार नहीं था। लेकिन आजादी के तुरंत बाद भ्रष्टाचार शुरू हो गया और आज यह करोड़ों में होता है।” कल्याणम 1943 से 1948 तक महात्मा गाँधीके निजी सचिव रहे थे। उनका कहना था, “नेहरू वैसे ही ईमानदार थे, जैसे कि मनमोहन सिंह। आज के भ्रष्टाचार के लिये मनमोहन सिंह भी जिम्मेदार हैं। मनमोहन सिंह व्यक्तिगत रूप से बहुत ईमानदार थे, लेकिन उन्होंने भ्रष्टाचार का संरक्षण किया। ऐसा ही नेहरू ने किया।”

1947 में आजादी मिलने के बाद जब जवाहर लाल नेहरू प्रधानमंत्री बन गए तो इसके एक महीने के भीतर ही महात्मा गाँधीके पास 50 चिट्ठियाँ आई थीं, जिसमें से दस चिट्ठियाँ देश में चल रहे भ्रष्टाचार के शिकायत की थीं। कल्याणम बताते हैं कि नेहरू के लिये भ्रष्टाचार मुद्दा ही नहीं था। एक व्यक्ति ने जब नेहरू से बढ़ रहे भ्रष्टाचार की शिकायत की तो उन्होंने जवाब दिया, “भद्र पुरुष, इन छोटे-मोटे भ्रष्टाचार की चिंता मत करो।” तब उस व्यक्ति ने नेहरू को करारा जवाब देते हुए कहा, “श्रीमान, छोटा भ्रष्टाचार छोटे भ्रूण की तरह है जो बढ़ता जाता है।”

कहा जाता है कि उस समय के तीन व्यक्ति अति भ्रष्ट थे और ये तीनों नेहरू के बेहद करीबी भी थे। इनमें से एक थे नेहरू के रक्षा मंत्री वी के कृष्णा मेनन, वित्त मंत्री टीटी कृष्णमचारी और पंजाब के कॉन्ग्रेसी मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरो। इनके भ्रष्टाचार के किस्से उजागर होने के बाद भी नेहरू ने इन्हें बर्खास्त करने के बजाय ईनाम दिया और कैबिनेट में रखे रहे। मेनन वही थे, जिनकी संलिप्तता देश के पहले रक्षा घोटाले यानी जीप घोटाले में सामने आई थी, लेकिन नेहरू ने उन्हें मंत्रिमंडल से हटाया नहीं।

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बाकी भ्रष्ट लोगों को भी नेहरू ने मंत्रिमंडल में रखकर संरक्षण दिया। इसीलिये इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि मेनन, कृष्णामचारी आदि केवल चेहरा थे, भ्रष्टाचार के असली सरपरस्त तो नेहरू थे। कल्याणम द्वारा बताए गये इस सच को सुनकर भ्रष्टाचार के उन मामलों की मॉडस ऑपरेंडी पता चलती है, जिनमें गाँधीपरिवार का नाम आया। वह मॉडस ऑपरेंडी यह है कि भ्रष्टाचार के लिये चेहरा किसी और रखो ताकि सीधा लिंक न आए।

नेहरू के समय हुये मूंदड़ा घोटाले का तरीका याद कीजिये। कलकत्ता के उद्योगपति हरिदास मूंदड़ा से जुड़े घोटाले को आज़ाद भारत के पहले ऐसे घोटाले के तौर पर याद किया जाता है जिसे तब प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से जोड़कर देखा गया। 1957 में मूंदड़ा ने सरकारी इंश्योरेंस कंपनी एलआईसी के ज़रिए अपनी छह कंपनियों में 12 करोड़ 40 लाख रुपए का निवेश कराया। यह निवेश सरकारी दबाव में एलआईसी की इन्वेस्टमेंट कमेटी की अनदेखी करके किया गया।

जब तक एलआईसी को पता चला उसे कई करोड़ का नुक़सान हो चुका था। इस घोटाले का खुलासा नेहरू के दामाद फिरोज गाँधीने ही किया था। प्रश्न उठता है कि यह सरकारी दबाव क्या था? क्या यह दबाव प्रधानमंत्री के रूप में नेहरू की तरफ से आया होगा? इस घोटाले को नेहरू ख़ामोशी से निपटाना चाहते थे क्योंकि इससे उनका नाम जुड़ रहा था और उन्होंने अपने वित्तमंत्री टीटी कृष्णमचारी को बचाने की कोशिश भी की। इस घोटाले में भी हरिदास मूंदड़ा और कृष्णमचारी को मोहरा बनाकर गाँधी परिवार ने बच निकलने की कोशिश की।

फिर इंदिरा राज में हुये ऑयल घोटाला, मारुति घोटाला आदि। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी और उनके बेटे संजय को यात्री कार मारुति बनाने का लाइसेंस मिला था। वर्ष 1973 में सोनिया गाँधी को मारुति टेक्निकल सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड का प्रबंध निदेशक (एमडी) बनाया गया, हालाँकि सोनिया के पास इसके लिए जरूरी तकनीकी योग्यता नहीं थी। बताया जा रहा है कि कंपनी को सरकार की ओर से टैक्स, फंड और कई छूट मिली थी।

स्विस मैगजीन स्विजर इलस्ट्रिअरटिन ने नवंबर 1991 में एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसमें कहा कि राजीव गाँधी का स्विस बैंक में खाता है जिसमें 13,200 करोड़ रुपये जमा हैं। इस रिपोर्ट को गाँधी परिवार ने आज तक न कभी नकारा है न ही रिपोर्ट प्रकाशित करने के लिए इस पत्रिका के खिलाफ कोई मुकदमा ही किया है। इसका अर्थ यह क्यों न माना जाए कि यह रिपोर्ट सच है। राजीव गाँधीके ऊपर लगा 1497 करोड़ रुपए के बोफोर्स दलाली कांड अभी भी लोगों के दिमाग में ताजा है। मैगज़ीन ने छापा था कि स्वीडन की तोप बनाने वाली कंपनी बोफ़ोर्स ने भारतीय सेना को अपनी 155 एमएम हॉवित्जर तोपें बेचने के लिये कमीशन के रूप में 64 करोड़ रुपए राजीव गाँधी समेत कई कॉन्ग्रेस नेताओं को दिए थे। स्वीडन के पूर्व पुलिस चीफ स्टेन लिंडस्ट्राम ने बोफोर्स दलाली मामले के दस्तावेज लीक किए थे तो ये मामला बाहर आया।

बोफोर्स मामले में एक मोहरा इटली का बिचौलिया ओट्टावियो क्वात्रोची भी था। आरोप लगा था कि इसी बिचौलिये क्वात्रोची के जरिये बोफोर्स का कमीशन राजीव गाँधी तक पहुँचा था। क्वात्रोची वही व्यक्ति था जो राजीव गाँधीके प्रधानमंत्रित्व काल में गाँधी परिवार का बेहद करीबी था और राजीव की मौत के बाद 21 बार सोनिया गाँधीसे मिला था। इंडिया टुडे ने 8 जनवरी 2011 को एक विस्तृत रिपोर्ट में क्वात्रोची और राजीव गाँधी व सोनिया गाँधी के बीच संबंधों को उजागर किया था। क्वात्रोची राजीव गाँधी के समय प्रधानमंत्री आवास में बेरोकटोक जाता था और विदेशी दौरे के समय खुद राजीव गाँधी परिवार व बच्चों के साथ क्वात्रोची के घर जाते थे। सोनिया गाँधी क्वात्रोची के घर रुकती थीं।

लेकिन वी पी सिंह की सरकार जाने के बाद कॉन्ग्रेस सरकार आई और राजीव गाँधी द्वारा बोफोर्स खरीद में दलाली खाने की जाँच को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया और फिर लीपापोती कर दी गयी। भारत सरकार ने क्वात्रोची के लंदन के दो बैंक खातों को वहाँ की सरकार से कहकर फ्रीज करा दिया था, लेकिन 2004 में अटल जी की सरकार जाने के बाद यूपीए सरकार आई तो दिसम्बर 2005 में केंद्र सरकार ने क्वात्रोची के इन फ्रीज खातों को फिर खुलवा दिया, ताकि वह अपना पैसा निकालकर ले जा सके। इतना ही नहीं कॉन्ग्रेस राज में क्वा​त्रोची व अन्य आरोपितों के नाम हटाने की साजिश भी रची गई। तब भी यह प्रश्न उठा था कि क्या दलाल क्वात्रोची पर केंद्र की कॉन्ग्रेस सरकार की इस मेहरबानी का राज सोनिया गाँधी से उसके संबंधों के कारण है?

अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर खरीद में रिश्वत खाने के आरोपों से घिरी कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गाँधी का नाम इटली के मिलान शहर की अदालत में चले इस मामले के मुकदमे के फैसले के पृष्ठ संख्या 193 और 204 पर चार बार आया है। इसमें उनके नाम की स्पेलिंग Signora Gandhi लिखा गया था। इस अदालत ने कहा कि सोनिया गाँधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल ने बिचौलिये के जरिए 125 करोड़ रुपए कमीशन लिया। कुल 225 करोड़ रुपए रिश्वत की लेनदेन हुई, जिसमें से 52 प्रतिशत हिस्सा कॉन्ग्रेस के नेताओं को दिया गया। 28 प्रतिशत सरकारी अफसरों को और 20 प्रतिशत एयरफोर्स के अफसरों को मिला। इस केस में तब के एयरफोर्स चीफ एसपी त्यागी को भी आरोपी बनाया गया।

सोनिया व राहुल गाँधी के नेशनल हेराल्ड घोटाले, राहुल की बहन प्रियंका के पति राबर्ट वाड्रा का बीकानेर जमीन घोटाला, डीएलफ जमीन स्कैम की पड़ताल करने पर साफ होता है कि नेहरू काल के भ्रष्टाचार की इसी विरासत और इसी मॉडस ऑपरेंडी को आगे बढ़ाया। नेशनल हेराल्ड मामले में गाँधी परिवार पर अवैध रूप से नेशनल हेराल्ड की मूल कंपनी एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (एजेएल) की संपत्ति हड़पने का आरोप है।

वर्ष 1938 में कांग्रेस ने एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड नाम की कंपनी बनाई थी। यह कंपनी नेशनल हेराल्ड, नवजीवन और कौमी आवाज नाम से तीन अखबार प्रकाशित करती थी जो 1 अप्रैल, 2008 को बंद हो गए। मार्च 2011 में सोनिया और राहुल गाँधीने ‘यंग इंडिया लिमिटेड’ नाम की कंपनी खोली और एजेएल को 90 करोड़ का ब्याज-मुक्त लोन दिया। एजेएल यंग इंडिया कंपनी को लोन नहीं चुका पाई। इस सौदे की वजह से सोनिया और राहुल गाँधी की कंपनी यंग इंडिया को एजेएल की संपत्ति का मालिकाना हक मिल गया।

इस कंपनी में मोतीलाल वोरा और ऑस्कर फर्नांडीज के 12-12 प्रतिशत शेयर हैं, जबकि सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी के 76 प्रतिशत शेयर हैं। यानी नेशनल हेराल्ड गबन मामले में भी गाँधी परिवार ने वही खेल किया कि पहले फ्राड के लिये मोहरों से एक कंपनी बनाई और उस कंपनी के जरिये नेशनल हेराल्ड की संपत्ति अपने पास मंगवाकर हड़प ली। वाड्रा के जमीन घोटालों में भी यही तरीका अपनाया कि दूसरों के नाम से हजारों एकड़ जमीन सरकार से ली और फिर इसे अपने नाम करवा कर ऊँचे दाम पर बेचकर मुनाफा कमाया।

इसी प्रकार ताजा मामला कॉन्ग्रेस की यूपीए सरकार द्वारा 2011 में 20 हजार करोड़ के स्कॉर्पीन पनडुब्बी घोटाले में राहुल गाँधी के बिजनेस पार्टनर उलरिक मैकनाइट को ऑफ़सेट ठेका दिलाने का है। इसमें कहानी यह है कि राहुल गाँधी ने ब्रिटेन में ‘Backop’ लिमिटेड नाम से कंपनी बनाई और इस कंपनी का 65 प्रतिशत स्वामित्व स्वयं और 35 प्रतिशत मैकनाइट का रखा। ये दोनों इसके संस्थापक निदेशक थे। यह कंपनी 2003 से 2009 तक रही। फिर 2.5 लाख रुपए की दिखावे की नाममात्र की पूंजी से भारत में इसी नाम से कंपनी का गठन किया और उसमें अपनी बहन और कांग्रेस की वर्तमान महासचिव प्रियंका गाँधी को सह निदेशक बनाया।

इस कंपनी में राहुल गाँधी का स्वामित्व 83 प्रतिशत शेयर के साथ था। 2010 में इस भारतीय कंपनी को भी बंद करने का दिखावा किया गया। 2011 में स्कॉर्पीन पनडुब्बी की फ्रांसीसी निर्माता कंपनी नवल ग्रुप (पूर्व में डीसीएनएस) ने भारत की विशाखापत्तनम के फ्लैश फोर्ज प्राइवेट लिमिटेड को मुंबई के मझगांव डाक लिमिटेड (एमडीएल) में बनाए जा रहे स्कॉर्पीन पनडुब्बी के क्रिटिकल पुर्जों की आपूर्ति के लिए ऑफ़सेट ठेका दिया। 2011 में ही भारतीय कंपनी फ्लैश फोर्ज ने ब्रिटेन की कंपनी ऑप्टिकल आर्मर का अधिग्रहण किया।

8 नवंबर, 2012 में जिस दिन दो व्यक्ति ऑप्टिकल आर्मर कंपनी में निदेशक बनाए गए, राहुल के बिजनेस पार्टनर उलरिक मैकनाइट को भी कंपनी ने निदेशक बनाया और उन्हें कंपनी का 4.9 प्रतिशत शेयर भी आवंटित किया। 2013 में फ्लैश फोर्ज ने ब्रिटेन की कंपनी कंपोजिट रेजिन ​डेवलपमेंट लिमिटेड का अधिग्रहण किया और इसी साल मैकनाइट ने फ्लैश फोर्ज के दो निदेशकों के साथ निदेशक का पद ग्रहण किया।

अब जरा भ्रष्टाचार के इस खेल में गाँधीपरिवार की भूमिका की पड़ताल करें तो तमाम प्रश्न खड़े होते हैं। 2011 में यूपीए सरकार के समय अपने बिजनेस पार्टनर को स्कॉर्पीन पनडुब्बी का ऑफसेट ठेका दिए जाने से पूर्व 2009 में शातिराना तरीके से बैकआप्स लिमिटेड ब्रिटेन को बंद घोषित किया गया। क्या इसलिये कि स्कॉर्पीन के ऑफ़सेट मिलने पर राहुल गांधी, प्रियंका गाँधी और गाँधी परिवार के सदस्यों से सीधा लिंक न मिले? इसके लिए इनका तरीका वही नेशनल हेराल्ड वाला रहा। पहले एक कंपनी बनाओ, फिर उस कंपनी में पूंजी डालकर ‘व्हाइट’ बनाओ, कंपनी बंद करो और दूसरी कंपनी का अधिग्रहण करके पूंजी स्थानांतरित करो और फिर धीरे से अपना नाम हटाने के बाद सरकारी ठेके दिलवाओ।

पहले एक व्यक्ति के साथ कंपनी खोलना और उसके बाद दूसरी कंपनी का अधिग्रहण करके उसमें उस व्यक्ति को स्वामित्व दिलवाना और अपनी सरकार में उस व्यक्ति को सरकारी ठेका दिलाना। ये घटनाक्रम इस धारणा की ओर ले जाता है कि राहुल गाँधी द्वारा बैकऑप्स कंपनी बनाने का उद्देश्य यूपीए की कॉन्ग्रेस सरकार के दौरान ठेका पाना था।

राफेल डील में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर झूठा आरोप लगाने वाले राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस यूपीए सरकार द्वारा अपनी ही कंपनी के साझेदार को रक्षा सौदे में ऑफ़सेट दिलाने पर चुप आखिर क्यों है? यह सवाल तो उठेगा ही कि स्कॉर्पीन पनडुब्बी के ऑफसेट ठेके का लाभ राहुल गाँधी, प्रियंका और गाँधी परिवार तक पहुँचाने के लिये कंपनी बनाने, खत्म करने का दिखावा करने और फिर दूसरी कंपनी का अधिग्रहण करने का नाटक किया गया, ठीक नेशनल हेराल्ड के एजेएल की तरह?

दरअसल, गाँधी परिवार के शासनकाल में सामने आए  सभी घोटालों का तरीका यही रहा कि उसमें सामने मोहरे रखे गए, जबकि पर्दे के पीछे गाँधी परिवार उन मोहरों का संरक्षण करता रहा। नेहरू से लेकर इंदिरा, राजीव, सोनिया, राहुल, प्रियंका और राबर्ट वाड्रा से जुड़ी भ्रष्टाचार की हर कहानी में कोई न कोई ऐसा किरदार मिलेगा, जो गाँधी परिवार का बेहद करीबी होगा और उनकी सरपरस्ती में लाखों-करोड़ों के घोटाले करेगा, लेकिन जब घोटाले पकड़े जाएँगे तो गाँधी परिवार हाथ झाड़कर यह कह देगा कि उससे उसका क्या लेना-देना?

भारत में गाँधी परिवार दिखावे के लिए गरीब बना रहेगा और विदेशों में बड़ी-बड़ी कारोबारी कम्पनियाँ चलाएगा। सवाल तो यह है कि क्या गाँधी परिवार का ये कारोबार तकनीकी और शातिर चाल के जरिये भारत के सरकारी व रक्षा सौदों में दलाली का खेल जारी रखने का है? इन मामलों की निष्पक्ष जाँच हो जाए तो गाँधी परिवार का बच्चा-बच्चा जेल जा सकता है। हालाँकि अब तक गाँधी परिवार के सदस्यों के भ्रष्टाचार की दास्तानें सुनाई जाती रही हैं और उनके भ्रष्टाचार का सबूत देते दस्तावेज भी सामने आए हैं, लेकिन अब लगता है कि अपनी शातिर चालों से बचने वाले गाँधी परिवार के पाप का घड़ा भर चुका है और उनके कर्मों का हिसाब भारत का कानून करेगा।

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Harish Chandra Srivastavahttp://up.bjp.org/state-media/
Spokesperson of Bharatiya Janata Party, Uttar Pradesh

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