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कॉन्ग्रेस-DMK समर्थक द्वारा मोदी के 75 वर्षीय प्रशंसक की बेरहमी से पीटकर हत्या

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थक होने के कारण तमिलनाडु में एक 75 वर्षीय व्यक्ति की हत्या कर दी गई। ख़बर के अनुसार, बुजुर्ग व्यक्ति लोकसभा चुनाव के लिए नरेंद्र मोदी के लिए प्रचार कर रहा था। गोविंदराजन के रूप में पहचाने जाने वाले, इस व्यक्ति ने अपनी शर्ट पर मोदी और जयललिता की तस्वीरें लगा रखी थीं।

शनिवार (13 अप्रैल) की शाम को उनका सामना गोपीनाथ नाम के एक व्यक्ति से ओरथानडू में हुआ, जो कॉन्ग्रेस-डीएमके (द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम) गठबंधन का समर्थक था। उनके बीच राजनीतिक मतभेद के कारण बहस होने लगी। आपसी बहस का यह विवाद इतना बढ़ गया कि गोपीनाथ ने गुस्से में 75 वर्षीय गोविंदराजन पर हमला कर दिया। DMK समर्थक द्वारा बुज़ुर्ग को बेरहमी से पीटा गया। इसके बाद उनकी हालत काफ़ी गंभीर हो गई और अंतत: उनकी मृत्यु हो गई।

गोपीनाथ को पुलिस ने रविवार सुबह गिरफ़्तार कर लिया और अदालत में पेश किया। टाइम्स ऑफ़ इंडिया की ख़बर के अनुसार अदालत ने उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया। पुलिस ने भी इस बात की पुष्टि की कि गोपीनाथ DMK-कॉन्ग्रेस समर्थक था।

AC चलाने को कहने पर Uber ड्राइवर उस्मान ने कहा ‘गाड़ी से उतरो, मोदी से कहो गाड़ी भेजेगा’

कुछ समुदाय के लोगों में नरेंद्र मोदी के प्रति घृणा और नफरत अब सड़कों पर खुलेआम दिखाई देने लगी है। कुछ समय पहले एक शख्स ने ट्वीट करते हुए जानकारी दी थी कि उसकी गाड़ी पर वोट फॉर मोदी लिखे होने के कारण कुछ राहगीरों ने उसे घेरकर धमकी दी कि कॉन्ग्रेस के सत्ता में आने के बाद उसे बताएँगे। अब यही कुंठा मुंबई के एक उबर ड्राइवर में देखने को मिली है।

ट्विटर पर एक यूजर ने ट्वीट करके अपने साथ हुई घटना का जिक्र किया है। यूजर की मानें तो वह अपने तीन बच्चों के साथ उबर की टैक्सी में सफ़र कर रही थी। इस दौरान उसने मुंबई की भीषण गर्मी से बचने के लिए उबर ड्राइवर से एसी ऑन करने को कहा, लेकिन ड्राइवर ने उस महिला को ये कहकर मना कर दिया कि उसकी गाड़ी के इंजन पर लोड पड़ेगा। इसपर महिला ने कहा कि ऐसी स्थिति में उसे गाड़ी लेकर बाहर ही नहीं निकलना चाहिए, तो ड्राइवर ने जवाब दिया “एसी नहीं चलेगा, जाना है तो जाओ नहीं तो उतर जाओ।”

महिला की मानें तो ड्राइवर ने ऐसा जवाब तब दिया जब महिला विनम्र तरीके से उससे बात कर रही थी। इसके बाद महिला ने उससे पूछा भी कि क्या वो इसी तरह सबसे बात करता है? तो ड्राइवर ने जवाब दिया “मैं कैसे बात करेगा मेरी मर्जी, तुम मत सिखाओ और उतरो।” ड्राइवर के लगातार बदतमीजी करने पर महिला ने कहा कि वह कार से तब तक नहीं उतरेगी जब तक उसे दूसरी कार नहीं मिल जाती, क्योंकि महिला के साथ उसके तीन बच्चे भी थे।

इसके बाद महिला जैसे ही कार से उतरने लगी वैसे ही ड्राइवर ने कहा कि मोदी को बोलो गाड़ी भेजेगा। ड्राइवर के इस कथन के बाद महिला के भीतर ड्राइवर के बर्ताव को लेकर चल रहे सभी सवालों का सपष्ट जवाब मिल गया। महिला को एहसास हो गया कि ड्राइवर का यह बर्ताव इस कारण है क्योंकि वो कार में घुसते समय अपने फोन पर बात कर रही थी, और फोन के कवर पर पीएम मोदी की तस्वीर थी।

महिला ने अपने साथ हुई इस घटना पर ट्विटर यूजर्स से गुहार लगाई कि वो अब देखना चाहती है कि जो लोग मुस्लिम ड्राइवर होने के कारण किसी के कैब को कैंसिल करने पर सेक्युलर दिखने का ढोंग करते हैं और आवाज उठाते हैं, उनमें से कितने लोग उस मोदी विरोधी मानसिकता के ख़िलाफ़ खड़े होंगे जो उसे उस्मान नामक ड्राइवर के बर्ताव में झेलनी पड़ी।

‘मुलायम हैं सपा के पितामह, न होने दें रामपुर में द्रौपदी का चीरहरण’: बोलीं सुषमा स्वराज

रामपुर से भाजपा प्रत्याशी जया प्रदा पर आपत्तिजनक बयान देने के बाद सपा नेता आजम खान को हर ओर से आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने भी ट्विटर के जरिए मुलायम सिंह यादव, अखिलेश यादव और डिंपल यादव से इस मामले पर संज्ञान लेने की बात की है। सुषमा ने कहा “मुलायम भाई- आप पितामह हैं समाजवादी पार्टी के। आपके सामने रामपुर में द्रौपदी का चीर हरण हो रहा हैं आप भीष्म की तरह मौन साधने की गलती मत करिए।”

इससे पहले राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने भी ट्वीट करते हुए आजम खान की इस टिप्पणी को बेहद घिनौना करार दिया था। साथ ही रेखा ने आजम को नोटिस भेजने की बात भी कही थी।

उन्होंने ट्वीट करते हुए कहा था कि NCW चुनाव आयोग से अनुरोध करेगा कि वह आजम को चुनाव लड़ने से रोकें। बता दें आजम खान की वीडियो को एक यूजर द्वारा अपलोड करने के तुरंत बाद रेखा ने मामले पर संज्ञान लिया था।

कल (अप्रैल 14, 2019) शाहबाद में हुई जनसभा में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की मौजूदगी में रामपुर से सपा प्रत्याशी आजम खान ने जया प्रदा पर निशाना साधते हुए कहा था कि वो जो अंडरवियर पहनती हैं, उसका रंग खाकी है। इस मामले को गंभीरता से लेते हुए चुनाव आयोग ने जिलाधिकारी से इस मामले पर रिपोर्ट की। इसके बाद वीडियो अवलोकन टीम के प्रभारी द्वारा मामले की जाँच हुई और फिर पुलिस में आजम के ख़िलाफ़ FIR दर्ज की गई।

पुलिस में दर्ज हुई रिपोर्ट में आजम पर आचार संहिता का उल्लंघन करने के साथ ही महिला पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने का भी आरोप लगाया गया है। गौरतलब है इससे पहले आजम खान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, सीएम योगी और जिलाधिकारी आन्जनेय कुमार सिंह के खिलाफ भी आपत्तिजनक बयान दे चुके हैं। लेकिन मामले के तूल पकड़ने पर आजम ने बेशर्मी से दावा किया है कि अगर कोई उन्हें उनके हालिया बयान को लेकर दोषी साबित कर देगा को वह इस वर्ष चुनाव नहीं लड़ेंगे।

दलित, बहुजन और सर्वजन हितैषी बसपा है सबसे अमीर पार्टी, EC में दी जानकारी

2014 लोकसभा चुनावों में खाता तक न खोल पाने वाली बसपा ने 2019 में बैंक बैलेंस के मामले में सभी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियों को पछाड़ दिया है। यह जानकारी आधिकारिक रिकॉर्ड के जरिए सामने आई हैं। मीडिया में आई खबरों की माने तो 25 फरवरी को चुनाव आयोग को दी गई जानकारी के अनुसार एनसीआर के सरकारी खातों में मौजूद 8 खातों में बसपा के ₹669 करोड़ जमा हैं। इसके साथ ही पार्टी के पास ₹95.54 लाख कैश में मौजूद हैं।

वहीं इस सूची में दूसरा नंबर अखिलेश की समाजवादी पार्टी का है। खबरों के मुताबिक सपा के विभिन्न खातों में
₹471 करोड़ हैं। गौरतलब है कि हाल ही में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और तेलंगाना में हुए विधानसभा चुनाव के कारण पार्टी का कैश डिपॉजिट ₹11 करोड़ घट गया है।

बैंक बैंलेस की इस सूची में तीसरा नाम कॉन्ग्रेस पार्टी का है। कॉन्ग्रेस के पास ₹196 करोड़ का बैंक बैलेंस है। हालाँकि यह जानकारी पिछले वर्ष 2 नवंबर को चुनाव आयोग को दी गई जानकारी पर आधारित है, क्योंकि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और तेलंगाना में हुए चुनावों के बाद पार्टी ने अपने बैंक बैलेंस की जानकारी अपडेट नहीं की है। इसके बाद चौथे नंबर पर चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी है। रिपोर्ट के अनुसार पार्टी के पास ₹107 करोड़ की धनराशि है।

इस सूची में फिलहाल बीजेपी पाँचवें नम्बर पर है। पार्टी के पास केवल ₹82 करोड़ बैंक बैलेंस है, लेकिन भाजपा का दावा है कि पार्टी द्वारा 2017-18 में दान से प्राप्त ₹1027 करोड़ में से ₹758 करोड़ खर्च कर दिए हैं जोकि किसी भी पार्टी द्वारा खर्च की गई राशि से अधिक है।

सजदे में झुकती महिलाओं के स्तन से पैंटी के रंग बताने तक मजहबी नेता काफी आगे आ गए हैं

हाजी अली दरगाह के ट्रस्टी ने महिलाओं की एंट्री बंद होने के संदर्भ में एक दलील दी थी कि वहाँ सजदे में झुकती महिलाओं के स्तन दिख जाते हैं, इसलिए उन्हें प्रवेश देना गलत है। ये बात और है कि उन्होंने यह नहीं बताया कि दरगाह पर जो मर्द जाते हैं, वो औरतों के स्तन को क्यों देखते हैं। ट्रस्टी साहब ने यह भी नहीं बताया कि ये उनके निजी विचार थे या ट्रस्ट के बाकी मेंबरान भी स्तनखोजी प्रवृति के थे।

ट्रस्टी साहब ने यह भी नहीं बताया इस निर्णय तक पहुँचने के लिए उन्होंने अपनी खोजी निगाहों को ही आधार बनाया था या कोई सर्वेक्षण किया था जिसमें क़रीब 83% मर्दों ने स्वीकारा कि वो दरगाह में स्त्रियों के स्तन देखने आते हैं। ऐसा कोई सर्वेक्षण नहीं हुआ था, ये ट्रस्टी साहब के निजी उद्गार ही थे। मुझे याद है कि इस पर कोई बवाल नहीं हुआ था क्योंकि ट्रस्टी भी मजहब विशेष से, हाजी अली भी मजहब विशेष से, महिलाओं पर प्रतिबंध लगा, वो भी अधिकतर मजहब विशेष से हैं।

समुदाय का आदमी कुछ भी बोलता है, उस पर मीडिया में आउटरेज नहीं होता। यह दूसरी सबसे बड़ी आबादी होकर भी अल्पसंख्यक है, वह बाय डिफ़ॉल्ट सेकुलर है, बाय डिफ़ॉल्ट सेकेंड क्लास सिटिज़न है, बाय डिफ़ॉल्ट बहुसंख्यक आबादी का सताया हुआ है, वह मोदी राज में डर कर जीता है, और यह कह कर बच निकलता है कि जया प्रदा की पैंटी का रंग क्या है।

मजहब के नेता हैं आज़म खान। जब मैं ‘मजहब के नेता’ कहता हूँ तो मेरे शब्द का बिलकुल वही अर्थ है क्योंकि मजहब के नेता मजहबी आबादी के ही नहीं, अपने क्षेत्र के नहीं, अपने राज्य या देश के भी नहीं, वो कौम के नेता हो जाते हैं। वो समाज, गाँव, ज़िला, क्षेत्र, राज्य और देश की परिभाषाओं से कहीं ऊपर, पूरे इस्लाम के लिए नेता हो जाते हैं। वो जब बात करते हैं तो मजहब के हक़ की बात करते हैं, वो जब बात करते हैं तो मजहब के लिए बातें करते हैं, वो जब बात करते हैं तो उनके हर वाक्य में इस्लाम सहज रूप से अभिव्यक्त होता है।

इसमें गलत क्या है? गलत कुछ भी नहीं, सिवाय इसके कि जब वो बेहूदगी करेंगे तो वो भी पूरे इस्लाम के सर ही मढ़ा जाएगा क्योंकि तथाकथित अच्छे ‘सेक्युलर लोग’ इन बातों पर मौन रहना पसंद करते हैं। जब आप अपने आप को सारे मजहब का नेता मान कर, उनका नेतृत्व करने निकलते हैं, और भीड़ में किसी प्रतिद्वंद्वी या विपक्ष की पार्टी के प्रत्याशी के बारे में टिप्पणी करते हुए उसके अंडरवेयर तक पहुँचते हैं तो मैं बिम्ब और संदर्भ नहीं देख पाऊँगा, मैं आपके ठरकपन, आपकी मूर्खता और आपके सड़े हुए विचारों को शब्दशः देखूँगा और याद दिलाऊँगा कि आपकी सोच कितनी गिरी हुई है।

सत्ता से दूर और लगातार क्षेत्र की आबादी द्वारा नकारे जाते हुए आज़म खान जब ‘उर्दू गेट’ के गिराने को इस्लाम पर हुए अतिक्रमण से जोड़ सकते हैं, तो उनकी बेहूदगी किसी की पैंट से पैंटी और ब्रा तक ही नहीं रुकेगी। ये देखने वाली बात होगी कि आने वाले दिनों में मजहब के महान नेता आज़म खान अंतःवस्त्रों के रंग से नीचे उतरते हुए जननांग और स्तनों के कप साइज से मजहब की भीड़ का ज्ञानवर्धन किस महिला का नाम लेकर करेंगे।

भीड़ के सामने पोस्टर पर अखिलेश और मायावती की बड़ी तस्वीरें थीं, आज़म खान ने टोपी और चश्मा लगा कर अपनी ज़हीन शख़्सियत को आगे करते हुए कहा कि कैसे उन्होंने इस व्यक्ति (जया प्रदा) को रामपुर की गलियों तक का ज्ञान कराया, कैसे उन्होंने किसी को उनके नज़दीक नहीं आने दिया, गंदी बातें नहीं करने दी। उन्होंने बताया कि लोग राजनीति में कितना नीचे गिर जाते हैं। फिर उन्होंने बताया कि जया प्रदा के अंडरवेयर का रंग ख़ाकी है।

एक पैराग्राफ़ बोलते हुए, इस लम्पट आज़म खान ने स्वयं ही यह भी कहा कि राजनीति में लोग कितने गिर जाते हैं, और वो खुद ही रंग बताते हुए बहुत नीचे गिर गए। उन्होंने स्वयं कहा कि जया के पास भी किसी को आने नहीं दिया, छूने नहीं दिया, गाली देने नहीं दिया किसी को, और फिर अंत में स्वयं ही ऐसी बात कह दी कि पहले की बातें बेकार साबित हो गईं।

ये कौम के पढ़े-लिखे नेता हैं। ये रामपुर के नहीं, यूपी के नहीं, भारत के नहीं, मजहब के नेता हैं। ये मैं पहले भी कह चुका हूँ, और बार-बार कहूँगा। ये मैं तब तक कहूँगा जब तक कि ऐसे लोग साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करते हुए, हिन्दू बनाम मजहब विशेष की राजनीति करेंगे और ‘शांतिप्रिय’ और उनके हिमायती बस यह सोच कर मुँह बंद रखेंगे क्योंकि वो मजहबी है इसलिए उसे मुँह से विष्ठा करने की आज़ादी है।

आप राजनीति में मर्यादा खोजते हैं, आप उस गठबंधन का हिस्सा बनते हैं जो महिला सशक्तिकरण की बात दिन में दस बार यह कह कर करता है कि मोदी ने बीवी को छोड़ रखा है, और माँ से मिलने नहीं जाता। फिर आपके मन में महिलाओं की इतनी इज़्ज़त है कि आप अपनी जाहिलियत पर ठीक तरीके से उतरें तो अंडरवेयर का रंग क्या, उसके भीतर भी प्रवेश कर सकते हैं।

और, ग़ज़ब की बात तो यह होगी कि आपका समाज, आपको मजहब का नेता कहने वाले, आपको स्वीकारने वाले लोग तब भी यही सोच कर खुश होते रहेंगे कि विरोधी को नंगा किया, बहुत अच्छा किया। फिर आपका समाज क्यों पिछड़ा नहीं रहेगा? फिर आपके समाज से मात्र एक प्रतिशत लड़कियाँ ही ग्रेजुएशन क्यों नहीं करेंगी? फिर आपके समाज से ट्रिपल तलाक और हलाला जैसी वाहियात प्रथाओं को मौन ही नहीं, मुखर सहमति क्यों नहीं मिलेगी?

आपकी कुंठा इसी तरीके से तो शांत होती है कि किसी ने एक हिन्दू स्त्री के अंतःवस्त्र का रंग बता कर उसे पूरी रैली में ज़लील किया। आपकी कुंठा प्रत्याशी की पार्टी के नाम लेने, सामाजिक मुद्दों को गिनाने, क्षेत्र के पिछड़ेपन पर चर्चा करने से शांत नहीं होती, आपकी कुंठा तब शांत होती है जब आप किसी के बारे में ऐसी बेहूदी बातें पब्लिक में कहते हैं, और पब्लिक तालियाँ बजाती हैं।

बाहरहाल, आज़म खान जी, अपनी परवरिश, अपनी मरी हुई माताजी (जिसकी कसम आपने उसी आधे मिनट में खाई), अपने क़ौम और अपनी पार्टी का नाम इसी तरह रौशन करते रहिए। जिन्हें आपको वोट देना है, वो देंगे ही क्योंकि ये बेहूदगी भी अपने आप में वैसी ही क़ाबिलियत है जैसे काफ़िरों को मारने के लिए ‘वो तीन शब्द’ कहते हुए कोई इस्लाम के नाम पर खुद को बम से उड़ा देता है।

इसलिए, आपकी जाहिलियत को क़ाबिलियत मान कर वाह-वाही मिलती रहेगी। इसे भी डिस्कस नहीं किया जाएगा जैसे आप ही के मजहबी भाई और पार्टी के नेता फ़िरोज़ खान की टिप्पणी पर कोई चर्चा नहीं हुई थी। मुझे लगता है कि आपके इलाके का इस्लाम और वहाँ की इस्लामी आबादी बिलकुल सही हाथों में है क्योंकि अगर वो ऐसी बातों पर ताली पीटते हैं, तो वो आप जैसे चिरकुट और लम्पटों को ही डिजर्व करते हैं। लगे रहिए। आपके मुँह से, किसी और सभा में, किसी प्रत्याशी की सलवार के नाड़े या ब्रा के कप साइज के बारे में नए शोध के इंतज़ार में पूरा हिन्दुस्तान है।

हिंदुस्तान के उत्थान में रमता था बाबा साहब का मन, उनके नाम पर विघटन-घृणा का बीज बोना वामपंथियों की साजिश

सामाजिक लोकतंत्र के हिमायती बाबा साहब भीमराव अम्बेदकर का जन्म मध्य भारत प्रांत वर्तमान मध्य प्रदेश के सैन्य छावनी ‘महू’ में एक मराठी परिवार में हुआ था। वह रामजी मालोजी (ब्रिटिश सेना में सूबेदार) और भीमाबाई की 14वीं संतान थे। वर्ष 1897 में, भीमराव अपने परिवार साथ मुंबई चले गए और वहाँ एल्फिंस्टन हाई स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की। अप्रैल 1906 में, जब वह 15 वर्ष के थे, तब उनका विवाह 9 वर्ष की लड़की रमाबाई से हुआ।

वर्ष 1913 में, उन्हें सयाजीराव गायकवाड़ तृतीय (बड़ौदा के गायकवाड़) द्वारा स्थापित एक योजना के तहत न्यूयॉर्क स्थित कोलंबिया विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर शिक्षा के अवसर प्रदान करने हेतु 3 साल के लिए ₹755 प्रति माह बड़ौदा राज्य की छात्रवृत्ति प्रदान की गई थी। जिसके चलते 22 साल की उम्र में वह संयुक्त राज्य अमेरिका चले गए। अक्टूबर 1916 में, डॉ॰ भीमराव अम्बेदकर लंदन चले गए और वहाँ ‘ग्रेज़ इन’ में बैरिस्टर कोर्स (विधि अध्ययन) के लिए दाखिला लिया और साथ ही लंदन स्कूल ऑफ़ इकनॉमिक्स में दाखिला लिया। जहाँ उन्होंने अर्थशास्त्र की डॉक्टरेट थीसिस पर काम करना शुरू किया।

जून 1917 में, वह अपना अध्ययन अस्थायी रूप से बीच में ही छोड़ कर भारत लौट आए। भारत लौटने पर भीमराव बड़ौदा राज्य के सेना सचिव के रूप में कार्य करने के लगे। जहाँ कुछ दिन बाद उन्हें पुनः भेदभाव का सामना करना पड़ा। अंत में, बाबा साहेब ने नौकरी छोड़ दी और एक निजी ट्यूटर और एक लेखाकार के रूप में काम करने लगे। वर्ष 1918 में, वह मुंबई में सिडेनहम कॉलेज ऑफ कॉमर्स एंड इकनॉमिक्स में राजनीतिक अर्थव्यवस्था के प्रोफेसर बने। बाद की कहानी से आप वाकिफ हैं कि तरह से उन्होंने सामाजिक सुधर और दलितों के उत्थान के लिए कार्य किया और बाद में संविधान सभा में संविधान निर्माण में प्रमुख भूमिका निभाई।

आज पूरा देश डॉ. भीम राव अम्बेदकर की 128वीं जयंती मना रहा है। तो ऐसे समय में जीवन की कठिन परिस्थितियों के बीच भी रास्ता निकालकर न सिर्फ खुद को ऊपर उठाया बल्कि सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े समाज को भी एक ऐसा आदर्श दिया कि अगर कोई ठान ले तो अपनी परिस्थितियों के कुचक्र को तोड़कर नई राह पर आगे बढ़ सकता है। चलिए आज बाबा साहब के तमाम वैचारिक और वैयक्तिक पहलुओं पर गौर करते हैं, जो उनकी विचारधारा और भारत के बदलते परिदृश्य के मूल धरोहर है।

हालाँकि, आज जिस तरह से वामपंथियों ने बाबा साहब के विचारों में घालमेल कर राष्ट्र उत्थान के हर कार्य में विघ्न डालने के लिए बाबा साहब के विचारों के नाम पर खिचड़ी परोसकर विनाश लीला रचने की कोशिश की है, वह पूरा सच नहीं है। बाबा साहब ने सामाजिक विसंगतियों को महसूस किया था जिससे उन्हें दलितों के उत्थान के प्रति कार्य कार्य करने की प्रेरणा मिली। उसके लिए वो वैचारिक रूप से गाँधी से भी टकराने या उनसे अपनी बात मनवाने से पीछे नहीं हटे। लेकिन आज जिस तरह से वामपंथी पक्षकार उनकी छवि को अतिशय आक्रामक बनाकर पेश करते हैं, क्या उनका व्यक्तित्व उतना ही विध्वंशक था। किसी की उन्नति के लिए कार्य करने का यह मतलब नहीं होता कि दूसरे का समूल नाश करना। जैसा की आज वामपंथी बाबा साहब के नाम से हर विघटनकारी बात आगे बढ़ाते हैं, उनका उद्देश्य बाकी समुदायों का विनाश कभी नहीं रहा।

आज कॉन्ग्रेस से लेकर पूरा वामपंथी गिरोह जिस तरह से बाबा साहब को ऐसा दिखाने कि कोशिश करता है कि जैसे वही बाबा साहब के सपनों के भारत के सबसे बड़े हिमायती हैं। जबकि सच्चाई यह है कि जब वह जीवित थे तब न कॉन्ग्रेसी उनके साथ थे और न वामपंथी। वैसे वामपंथी विचारधारा का मक़सद ही विनाश और चलती व्यवस्था को पटरी से उतारना रहा है। कभी भी वामपंथियों ने अपने कार्यों से ऐसा कोई उदहारण नहीं प्रस्तुत किया कि विनाश और विरोध छोड़ लोग उनके रचनात्मक कार्यों के हिमायती बनें।

अपनी बात को उस समय के कुछ उदाहरणों के साथ रखता हूँ। आज़ादी के बाद जब संविधान निर्माण की बात आई, तब संविधान सभा में लगभग सभी विचारधारा के लोगों का समावेश था। सब मिलकर राष्ट्र हित की चर्चाओं में मशगूल थे। संविधान सभा में बाबा साहब जिन मुद्दों पर अडिग थे, कॉन्ग्रेस उन पर आजतक सहमत नहीं है। फिर चाहे वो समान नागरिक संहिता हो, अनुच्छेद 370 हो, आर्यों के भारतीय मूल की बात हो, या संस्कृत को उस समय राजभाषा बनाने की बात। बाबा साहब देश में सामान नागरिक संहिता के मुखर पक्षधर थे।  साथ ही उनका दृढ़ मत था कि अनुच्छेद 370 देश की अखंडता के साथ समझौता है।

इन सभी समस्याओं के क्या नतीजे निकले, आज देश उनसे वाकिफ है। किस तरह से संस्कृत क्या हिंदी को राजभाषा बनाने के नाम पर भी विघटनकारी राजनीति के हिमायती वामपंथी और कॉन्ग्रेसियों ने लटकाए रखा और उसे इतना उलझा दिया कि आज तक वह मुद्दा उलझा ही हुआ है। इन सभी मामलों को उलझाने में नेहरू के ‘योगदान’ को यह देश सदियों तक नहीं भुला पाएगा।

आज हर तरफ सेक्युलर शब्द का जोर है, हर पक्षकार सेक्युलर का चोला ओढ़े वो सब कर रहा है जो वो भी नहीं करते, जिन्हें ये पूरा गिरोह सांप्रदायिक कहता है। संविधान निर्माण के प्रणेता बाबा साहब की दूरदर्शिता क्या कालांतर में इंदिरा से कम थी, जो उन्होंने देश के मूल ताने-बाने को कभी भी छद्म सेक्युलर होने के नकलीपन में नहीं लपेटा। ‘सेक्युलर’ शब्द को इंदिरा गाँधी ने अपने शासन काल में संविधान का हिस्सा ज़रूर बनाया पर वह कितनी ‘सेक्युलर’ थी, ये शायद सबको पता है।

बाबा साहब के इन सपनों से ऐसे छद्म पक्षधरों का इतना विरोधाभाष क्यों है? जब अम्बेदकर राजनीति में थे तो कॉन्ग्रेस ने क्या किया था ये भी किसी से छिपा नहीं है। आज यह पूरा गिरोह बाबा साहब के नाम पर विघटनकारी राजनीति का सिरमौर बना फिर रहा है। लेकिन कभी भी अम्बेदकर इनके आचरण का हिस्सा नहीं रहे। अछूत और दलित भेदभाव के खिलाफ जीवन भर संघर्ष करने वाले बाबा साहब कॉन्ग्रेस के 60 साल तक सत्ता में रहने तक अछूत बने रहे। देश को दीमक की तरह चाटने के बाद भी नेहरू और इंदिरा ने खुद को भारत रत्न घोषित करवा लिया लेकिन उन्हें अम्बेदकर भारत रत्न नहीं लगे।

डॉ. अम्बेदकर के सम्पूर्ण वांग्मय के खंड-5 में लिखा है, “डॉ अम्बेदकर का दृढ़ मत था कि मैं हिंदुस्तान से प्रेम करता हूँ। मैं जियूँगा हिंदुस्तान के लिए और मरूँगा हिंदुस्तान के लिए। मेरे शरीर का प्रत्येक कण हिंदुस्तान के काम आए और मेरे जीवन का प्रत्येक क्षण हिंदुस्तान के काम आए, इसलिए मेरा जन्म हुआ है।” जो इंसान आखिरी साँस तक हिंदुस्तान के लिए कार्य करना चाहता है, उसके नाम पर कटुता फैलाना, उसका अपमान है। पर इससे क्या! आज जो वामपंथी बाबा साहब को अपने खेमे का बता कर उन पर एकाधिकार और उनके नाम से घृणा की राजनीति का कारोबार चलाने की कोशिश कर रहे हैं, ये उस महापुरुष का घोर अपमान है। अम्बेदकर सभी के हैं, उन्होंने जो आदर्श स्थापित किया उससे सभी को प्रेरणा लेने का हक़ है। उनके नाम पर गंदगी फैलाना बंद कर दो वामपंथियो।

समानता की बात पर जोर देने वाले बाबा साहब ने इस्लाम और ईसाईयत के मौलवियों और पादरियों के आग्रह के बाद भी बौद्ध धर्म अपनाया। बौद्ध धर्म कहीं बाहर से नहीं आया था बल्कि इसी संस्कृति में विकसित हुआ धर्म है। आज ये वामपंथी ऐसा दिखाने की कोशिश करते हैं जैसे बौद्ध धर्म ही अब इनकी विघटनकारी एजेंडे का पर्याय हो। वामपंथियों ने सदैव देश को बाँटने का काम किया है। कभी पिछड़ों को भड़काकर, तो कभी मुस्लिमों को झूठा डर दिखाकर।

ऐसा बहुत कुछ है, जिसे ये छिपा जाते हैं जैसे मुस्लिम लीग पर संविधान सभा के प्रथम अधिवेशन में 17 दिसंबर 1946 को दिया गया उनका वक्तव्य भी उनके हिंदुस्तान के प्रति अटूट दृढ़ता का प्रतीक है। उन्होंने कहा था कि आज मुस्लिम लीग ने भारत का विभाजन करने के लिए आन्दोलन छेड़ रखा है, दंगे फसाद शुरू किए हैं, लेकिन भविष्य में एक दिन इसी लीग के कार्यकर्त्ता और नेता अखंड भारत के हिमायती बनेंगे, यह मेरी श्रद्धा है। आज पाकिस्तान की जो हालत है वह किसी से छिपी नहीं है। क्या हुआ उसे हासिल? आज न वह खुद चैन से है और न ही पड़ोसियों को चैन से रहने दे रहा है। आतंक की खेती का गढ़ बन चुका है, फिर भी वामपंथियों पक्षकारों का प्यार जब तब उसके लिए उमड़ता रहता है। देश आए दिन उनकी हर विघटनकारी, देश विनाशक गतिविधि पर रिएक्ट करता है। ऐसे में इन्हें कभी लोकतंत्र तो कभी कुछ और खतरे में नज़र आने लगता है।

हिन्दू धर्म अपने आप में सदैव विकसित होते रहने वाला धर्म है। यहाँ बाकी धर्मों की तरह जड़ता या रिजिडीटी कभी नहीं रही। ऐसा नहीं है कि बुराइयाँ कभी नहीं रही पर हाँ जैसे-जैसे समाज विकसित होता गए, समाज से निकले जागरूक लोगों ने उसमें आवश्यक सुधार किया। देश ने उन सुधारों को स्वीकार किया। कहीं-कहीं विरोध ज़रूर हुआ लेकिन वह विरोध चंद लोगों तक सीमित रहा। कोई भी विरोध इतना उग्र नहीं हुआ कि विनाश की लीला ही रच दे।

बाबा साहब ने भी अपने समय की बुराइयों पर चोट किया, बदलाव की पहल की, उसी दौर में गाँधी जी भी वही काम कर रहे थे। हाँ, गाँधी और अम्बेदकर में थोड़े मतभेद ज़रूर रहे लेकिन ध्येय समाज के कल्याण का ही रहा। कभी भी समाज तोड़ने या विघटनकारी राजनीति को बढ़ावा नहीं दिया गया। ये सब तब राजनीति में हावी हुआ जब राजनीति में कॉन्ग्रेसी और वामपंथियों का वर्चस्व बढ़ा। इन लोगों ने देश के नैसर्गिक प्रगति को रोकने की कोशिश की, उसे जातिगत झगड़ों और धर्म की राजनीति में उलझाकर।

अपने ही समाज की बुराइयों पर चोट करते हुए भी बाबा साहब भारतीयता की मूल अवधारणा और अपने हिन्दू हितों को नहीं भूलते हैं। महार माँग वतनदार सम्मलेन सिन्नर (नासिक) में 16 अगस्त 1941 को बोलते हुए उन्होंने कहा था, “मैं तमाम वर्षों में हिन्दू समाज और इसकी अनेक बुराइयों पर तीखे एवं कटु हमले करता रहा हूँ लेकिन मैं आपको आश्वस्त कर सकता हूँ कि अगर मेरी निष्ठा का उपयोग बहिष्कृत वर्गों को कुचलने के लिए किया जाता है तो मैं अंग्रेजों के खिलाफ हिन्दुओं पर किए हमले की तुलना में सौ गुना तीखा, तीव्र एवं घातक हमला करूँगा।’

हाँ, कहीं-कहीं अति थी, कुछ अत्याचार भी हुए कमजोर वर्गों में लेकिन ऐसा लगभग हर दौर में रहा। लगभग हर दौर में ताकतवर लोगों ने कमजोरों को दबाना चाहा। हर दौर में कमजोरों को ऊपर उठने के लिए संघर्ष करना पड़ा।

कभी बाबा साहब को मंदिर जाने के लिए संघर्ष करना पड़ा था। वर्ष 1930 में, भीमराव अम्बेदकर ने कालाराम मंदिर सत्याग्रह को शुरू किया। जिसमें लगभग 15,000 स्वयं सेवको ने प्रतिभाग लिया था। यही नहीं इस आंदोलन में जुलूस का नेतृत्व एक सैन्य बैंड ने किया था और उसमें एक स्काउट्स का बैच भी शामिल था। पहली बार पुरुष और महिलाएँ भगवान का दर्शन अनुशासन में कर रहे थे। जब सभी आंदोलनकारी मंदिर के गेट तक पहुँचे, तो गेट पर खड़े अधिकारियों द्वारा गेट बंद कर दिया गया। विरोध प्रदर्शन उग्र होने पर गेट को खोल दिया गया। जिसके परिणामस्वरूप दलितों को मंदिर में प्रवेश की इजाजत मिलने लगी। क्या ऐसा किसी धर्म की वजह से था? उस दौर में अधिकांश मंदिर जमींदारों, राजाओं या उच्च वर्गीय कुलीनों द्वारा बनवाया गया होता था। मंदिर उनका तो सर्वाधिकार भी उनका, वाली बात होती थी। लेकिन देश आज़ाद होने के बाद उनका अधिपत्य टूटा। आज शयद ही किसी मंदिर में आने-जाने पर रोक हो। पर वामपंथी आज भी ऐसा दिखाने की कोशिश करते हैं जैसे अभी भी वही पुरानी हज़ारों साल पीछे वाला दौर और कुरितियाँ जारी हो। वैसे धर्म आस्था का विषय है, हो सकता है जो किसी को कुरीति लगे वह किसी की आस्था-परम्परा का हिस्सा हो।

आइए आज के दौर में बाबा साहब के सपनों के भारत, नए भारत पर हम सब मिलकर काम करें। आज के विघटनकारी, प्रपंचकारी ताकतों से दूर रहकर सबका साथ-सबका विकास मूलमंत्र के साथ बढ़ें यही बाबा साहब को उनके जन्मदिवस पर सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

अगर BJP सत्ता में लौटी, तो अल्पसंख्यकों को जला दिया जाएगा: गोवा के पादरी ने उगला ‘जहर’

धर्म की आड़ में राजनीति के माध्यम से चुनावों को प्रभावित करने का एक और मामला सामने आया है। गोवा के एक पादरी ने अपने अनुयायियों को सांप्रदायिक और घृणास्पद उपदेश जारी किया है। इसमें यह दावा किया गया है कि अगर भाजपा वापस सत्ता में आती है, तो गोवा में ईसाइयों को जला दिया जाएगा।

गोवा के एक चर्च में कोंकणी भाषा में पादरी द्वारा दिए गए एक उपदेश में, उसे भाजपा के ख़िलाफ़ लोगों को उकसाते हुए पाया गया। उसे यह कहते हुए सुना जा सकता है कि भाजपा के लोगों ने बच्चों पर पेट्रोल डाला और उन्हें ज़िंदा जला दिया।

पादरी ने डर के माध्यम से लोगों को भड़काते हुए दावा किया कि भविष्य में बच्चे और पोते भाजपा का समर्थन करने की भारी क़ीमत चुकाएँगे। “ईसाई बच्चों पर पेट्रोल डाला गया था और उन्हें जला दिया गया था। उनसे कहा गया कि वे यीशु का नाम लेना बंद करें। लेकिन बच्चे यीशु का नाम लेते रहे, तब भी जब उनकी त्वचा आग से पिघल गई। यह भाजपा है।”

पादरी ने अपनी भड़ास को जारी रखते हुए स्वतंत्र मीडिया को यह कहकर डरा दिया कि अधिकांश मीडिया ने भाजपा से पैसा लिया है। पादरी ने अमित शाह को ‘शैतान’ कहते हुए कहा, “जब वह गृह मंत्री थे, एक पादरी आए थे, उन्होंने बताया कि अमित शाह मुस्लिम नौजवानों को गिरफ़्तार करते थे और उन्हें गोली मार देते थे, और वे कहते थे, उन्हें गोली मार दी गई क्योंकि वे भाग रहे थे।”

पादरी ने कहा, “मोदी ने गुजरात में हज़ारों मुस्लिमों को ज़िंदा जला दिया है, जिसमें संसद सदस्य भी शामिल हैं। उसने घर में आग लगा दी। पाँच महिलाओं सहित सभी को ज़िंदा जला दिया गया। यह मोदी और भाजपा है।”

पादरी ने एक कथा का मंचन करते हुए झूठे प्रचार का सहारा लिया, जब उन्होंने कहा, “पुर्तगाली शासन के तहत 500 वर्षों के लिए, हिन्दू, मुस्लिम और ईसाई शांति से रहते थे। बीजेपी ने इसे 5 वर्षों में नष्ट कर दिया।

इसके अलावा, उन्होंने गोवा के पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर को बुरा-भला भी कहा, जिनका हाल ही में कैंसर से लंबी लड़ाई के बाद निधन हो गया।

उन्होंने कहा कि पर्रिकर ने फ्रांसिस जेवियर की छुट्टी को लेकर क़ानून में बदलाव किया और इसी दर्द से उनकी मौत हो गई।

कॉन्ग्रेस जैसे राजनीतिक दलों के माध्यम से ईसाई धार्मिक निकाय गोवा की राजनीति पर एक बड़ा प्रभाव डालते हैं। आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने धर्म, जाति या भाषा के नाम पर वोट माँगने पर रोक लगा दी थी। हालाँकि, लगता है कि चर्च ने चुनावों में हस्तक्षेप करने के लिए एक आसान रास्ता खोजा है, जिसका ख़ूब लाभ उठाया जा रहा है। किसी विशेष उम्मीदवार या पार्टी के लिए ‘वोट’ माँगने के बजाय, चर्च ने लोगों को यह बताया कि किसे वोट नहीं देना है।

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब धार्मिक निकायों विशेषकर ईसाई निकायों ने ‘धर्मनिरपेक्ष’ राजनीतिक दलों की सहायता के लिए घृणा का सहारा लिया हो। पिछले साल, दिल्ली के आर्कडीओसीज़ के आर्कबिशप अनिल कॉटो ने भारत में कैथोलिकों को एक पत्र जारी किया था। पत्र, जिसे दिल्ली आर्कडीओसीज़ के तहत सभी पादरी इलाकों में पढ़ा गया था। इस पत्र में भारत के कैथोलिकों द्वारा 2019 में आगामी आम चुनावों के लिए उपवास और प्रार्थनाओं का अभियान शुरू करने का आह्वान किया गया था।

सिर्फ़ आम चुनाव ही नहीं बल्कि चर्च कई राज्यों के चुनावों के बारे में भी चिंतित रहा है। नागालैंड विधानसभा चुनाव से पहले, नागालैंड बैपटिस्ट चर्च काउंसिल ने विश्वासियों से त्रिशूल और क्रॉस के बीच चयन करने का आग्रह किया गया था। इसके अलावा आपको बता दें कि केवल त्रिशूल ही उनकी एकमात्र चिंता नहीं थी बल्कि योग को भी उन्होंने एक गहन हिन्दू अभ्यास कहा था और अपने विश्वासियों को इससे दूर रहने का आदेश दिया था। गोवा चुनावों से पहले, एक कैथोलिक पत्रिका ने राज्य में मतदाताओं से भाजपा को वोट न देने के लिए कहा और दावा किया कि देश संवैधानिक प्रलय का सामना कर रहा है।

J&K के किश्तवाड़ आतंकी हमले में RSS नेता चंद्रकांत की हत्या में आरोपित जाहिद हुसैन की हुई पहचान

जम्मू कश्मीर के किश्तवाड़ में मंगलवार (अप्रैल 9, 2019) को आरएसएस नेता और उनके गार्ड पर हुए हमले में हमलावर आतंकी की पहचान कर ली गई है। साथ ही हत्या में इस्तेमाल की गई कार को भी जब्त कर लिया गया है। जानकारी के मुताबिक, मामले में गुलाम मोहम्मद सागर के बेटे जाहिद हुसैन सागर की पहचान आरोपी के तौर पर की गई है। जब्त की गई कार उसी ने इस्तेमाल किया था। बताया जा रहा है कि वह एक मोटरवाहन मैकेनिक है।

जाहिद हुसैन ने अपने साथियों के साथ मिलकर इस साजिश को अंजाम दिया था। हमले में शामिल कार जाहिद ने ही खरीदी थी। वह हिज्बुल मुजाहिद्दीन की किलर टीम का सदस्य है। 25 वर्षीय जाहिद का दो भाई भी आतंकी रह चुका है। पुलिस अब जाहिद की तलाश में जुट गई है। जाहिद किलर टीम का हिस्सा है। किश्तवाड़ पुलिस ने अपराधी को गिरफ्तार करने के लिए आम लोगों से मदद माँगी है। किश्तवाड़ पुलिस ने तीन अन्य संदिग्धों को भी हिरासत में लिया है।

गौरतलब है कि किश्तवाड़ में आतंकियों ने 9 अप्रैल को आरएसएस नेता चंद्रकांत को निशाना बनाया था। इस हमले में चंद्रकांत जख्मी हो गए थे, जबकि उनके गार्ड की मौके पर ही मौत हो गई थी। यह हमला अस्पताल के अंदर ओपीडी में किया गया। यहाँ चंद्रकांत अपने बॉडीगार्ड के साथ मौजूद थे। इसी दौरान बुर्का पहने हुए एक व्यक्ति ने उन पर फायरिंग शुरू कर दी। इससे वहाँ पर अफरा-तफरी मच गई। इसी माहौल के बीच हमलावर मौके से फरार होने में भी कामयाब हो गया था। हमले के बाद जख्मी चंद्रकांत को जम्मू के गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया था और उन्हें जल्द ही दिल्ली शिफ्ट किए जाने की बात कही जा रही थी, लेकिन उन्होंने इलाज के दौरान ही दम तोड़ दिया था।

मोदी-शाह को हराने के लिए कुछ भी करने को तैयार, BJP कर रही EVM से छेड़छाड़: केजरीवाल

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने कहा है कि वो मोदी-शाह को हराने के लिए सब करने को तैयार हैं, कुछ भी करने को तैयार हैं। कॉन्ग्रेस से गठबंधन के लिए लगातार प्रयास कर रहे केजरीवाल ने ईवीएम पर भी सवाल खड़े किए। केजरीवाल ने कहा कि ईवीएम तो ठीक है और उसमें कोई गड़बड़ी नहीं है लेकिन भाजपा उसमें छेड़छाड़ कर रही है। बता दें कि आम आदमी पार्टी लगातार कॉन्ग्रेस के साथ दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और चंडीगढ़ में गठबंधन करने को कह रही है। अभी हाल ही में केजरीवाल और दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने भी कॉन्ग्रेस से गठबंधन के लिए अपील की।

अरविन्द केजरीवाल द्वार कॉन्ग्रेस के सामने बार-बार गिड़गिड़ाने को लेकर भी सोशल मीडिया पर ख़ूब मज़ाक चल रहा है। लोगों का कहना है कि केजरीवाल कॉन्ग्रेस के बार-बार पाँव पड़ रहे हैं। सिसोदिया ने अपने ट्वीट में लिखा, “अब भी वक़्त है जब दिल्ली के साथ हरियाणा और चंडीगढ़ में गठबंधन कर भाजपा को 18 सीटों पर हराया जा सकता है। अब कॉन्ग्रेस को तय करना है कि इस समय प्राथमिकता मोदी-शाह की जोड़ी को हराना है, या ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने का रिकॉर्ड बनाना है।

पंजाब में मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह के कड़े रुख के कारण कॉन्ग्रेस ने गठबंधन की सारी संभावनाओं को नकार दिया। वहीं दिल्ली के अलावा हरियाणा और चंडीगढ़ को लेकर भी बातचीत पर अच्छे परिणाम नहीं मिले। आप नेता संजय सिंह ने भी कहा था कि अब गठबंधन की सारी सम्भावनाएँ ख़त्म हो चुकी हैं। लेकिन, हर एक दिन के अंतराल के बाद गठबंधन की सम्भावनाएँ ज़िंदा हो जा रही हैं और फिर इसे लेकर बातचीत शुरू हो जा रही है।

उधर केन्द्रीय आवास एवं शहरी विकास राज्यमंत्री हरदीप सिंह पुरी ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर जाति और आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति करने का आरोप लगाते हुए कहा कि जनता के काम नहीं करने के कारण ही उन्हें कॉन्ग्रेस के साथ गठबंधन करने के लिए गिड़गिड़ाना पड़ रहा है। पुरी ने कहा, “केजरीवाल के बारे में अपने अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूँ कि विकास कार्यों में इनकी कतई रुचि नहीं है। इनका मूल मकसद वोट बैंक की राजनीति करना मात्र है।”

गीता कहती है हिन्दू बनो: सेक्स कांड में ‘बदनाम’ कॉन्ग्रेसी नेता ने भगवद्गीता को लेकर फैलाया झूठ

कॉन्ग्रेस पार्टी के प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी सोशल मीडिया पर पवित्र पुस्तक भगवद्गीता को लेकर झूठ फैलाते हुए पकडे गए हैं। अभिषेक मनु सिंघवी ने ट्विटर पर दावा किया, “गीता कहती है हिन्दू बनो” जबकि गीता में कहीं भी ऐसा नहीं कहा गया है। कॉन्ग्रेस सांसद ने बाबा साहब भीमराव अम्बेदकर की जयंती के अवसर पर भारतीय संविधान से गीता की तुलना करते हुए ये बातें कही। उन्होंने गीता से ‘बाबा साहब के संविधान’ की तुलना करते हुए कहा कि संविधान कहता है कि मनिष्य बनो। जो शब्द गीता में लिखा ही नहीं है, उसका ज़िक्र कर बुरे फँसे सिंघवी ने माफ़ी माँगने से भी इनकार कर दिया। बाद में सुदर्शन टीवी के मुख्य सम्पादक सुरेश चव्हाणके ने उन्हें कड़ी डाँट पिलाई।

चव्हाणके ने सिंघवी को चुनौती देते हुए कहा कि आप गीता की वो पंक्ति बता दो जिसमें श्रीकृष्ण ने हिन्दू बनने को कहा हो लेकिन सिंघवी ने उनकी इस चुनौती का कोई जवाब नहीं दिया। चव्हाणके ने सिंघवी को वेद समझाते हुए बताया कि वेदों का भी कहना है कि मनुर्भव अर्थात मनुष्य बनो। बाद में सहज अरोड़ा नाम के एक वकील ने ट्विटर पर सिंघवी की बखिया उधेड़ते हुए चुनौती दी कि अगर वो गीता में ‘हिन्दू’ शब्द का जिक्र दिखा दें तो वो मुफ़्त में सिंघवी के दफ़्तर में कार्य करेंगे।

इसके बाद जब सिंघवी को कोई उत्तर नहीं सूझा तो उन्होंने कहा कि बाबा साहब का सन्देश उन लोगों के लिए था जो गीता में विश्वास रखते हैं, अर्थात हिन्दुओं के लिए था। सिंघवी ने ये लिखते समय ये नहीं सोचा कि सिर्फ़ हिन्दू ही नहीं बल्कि गीता में कई संप्रदाय के लोगों द्वारा विश्वास रखने की ख़बर आती रहती है। सिंघवी को जानना चाहिए कि न सिर्फ़ महात्मा गाँधी बल्कि अल्बर्ट आइंस्टीन, एनी बेसेंट, सुनीता विलियम्स जैसे विभिन्न सम्प्रदायों की कई प्रसिद्ध वैश्विक हस्तियों ने गीता में अपना विश्वास जताया है।

एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी कॉन्ग्रेस के पुराने प्रवक्ताओं में से एक हैं और एक महिला के साथ आपत्तिजनक रूप में उनकी सीडी वायरल होने के बाद उन्होंने पार्टी से इस्तीफा दे दिया था। अपने दफ़्तर के ख़र्चों का विवरण देने में नाकाम होने के बाद उन पर इनकम टैक्स ने 57 करोड़ रुपए का जुर्माना भी लगाया था। सिंघवी का विवादों से पुराना नाता रहा है।