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जल्द ही भारत को विजय माल्या के स्विस बैंक खातों का विवरण दे सकती है स्विट्जरलैंड सरकार

भारत को जल्द ही भगौड़े कारोबारी विजय माल्या के स्विस बैंक खातों की जानकारी और अन्य विवरण प्राप्त हो सकते हैं। स्विटजरलैंड की शीर्ष अदालत द्वारा सूचना प्रदान करने को मंजूरी मिलने के बाद दोनों देशों के अधिकारियों द्वारा पहल शुरू की जा चुकी है।

रिपोर्ट्स के अनुसार जेनेवा और नई दिल्ली के अधिकारियों ने मामले की जानकारी देते हुए कहा कि फ़ेडरल कोर्ट ने माल्या की अपील को रद्द कर दिया है।

विजय माल्या ने अगस्त 14, 2018 को स्विस बैंकों में उनके द्वारा रखे गए तीन बैंक खातों से संबंधित दस्तावेजों को भारतीय अधिकारियों को प्रेषित करने के लिए जेनेवा के सरकारी वकील के निर्णय को चुनौती दी थी।

जेनेवा के कार्यालय ने ईमेल द्वारा दिए जवाब में पुष्टि की है कि भारतीय अधिकारियों के अनुरोध को स्वीकार कर लिया गया है। स्विस फ़ेडरल कोर्ट के अनुसार, कार्यालय ने भारतीय जाँच एजेंसियों द्वारा माल्या के 3 स्विस बैंक खातों की जाँच शुरू कर दी है।

केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) ने विजय माल्या से सम्बंधित बैंक खातों में धनराशि को अवरुद्ध करने के लिए स्विस अधिकारियों से अनुरोध किया था, साथ ही खातों का विवरण प्रदान करने की भी माँग की थी।

कुछ समय पहले सीबीआई ने स्विस अधिकारियों से इस बात का अनुरोध किया था कि वो भगौड़े व्यापारी विजय माल्या के चार बैंक अकाउंट में आने वाले फंड को रोक दें।

जिसके बाद जेनेवा के सरकारी वकील ने न केवल सीबीआई द्वारा किए इस अनुरोध का 14 अगस्त 2018 को पालन किया है, बल्कि माल्या के अन्य तीन बैंक अकाउंट की जानकारियों को भी साझा किया है। साथ ही उन पाँच कंपनियों की भी जानकारी दी है जिनका संबंध माल्या से है।

इन पाँच कंपनियों में लेडीवॉक इंवेस्टमेंट, रोज़ कैपिटल वेंचर्स, कॉन्टीनेंटल एडमिनिस्ट्रेशन सर्विसज़, फर्स्ट यूरो कमर्शियल इन्वेस्टमेंट्स और मॉडल सेक्योरिटी का नाम शामिल है। जिनकी जानकारी स्विस सरकार ने सीबीआई के साथ साझा की है।

इन कंपनियों ने स्विस कोर्ट की तरफ रुख़ करते हुए कहा है कि उनकी कंपनियों के अकाउंट वो अकाउंट नहीं थे जिसकी जानकारी सीबीआई द्वारा मांगी गई है तो फिर उनकी जानकारियाँ क्यों भेजी गई हैं।

इसके अलावा माल्या ने अपनी स्विस की कानूनी टीम की मदद से वहाँ के न्यायलय में सीबीआई को जानकारी देने के मामले पर सवाल उठाए हैं। माल्या का कोर्ट में कहना रहा कि भारत में पहले ही घोटालों से जुड़े मामलों पर गंभीर तनाव वाली स्थिति बनी हुई। क्योंकि सीबीआई के जिस अफसर को माल्या और राकेश अस्थाना के ख़िलाफ़ जाँच करनी थी वो खुद ही इस समय में भ्रष्टाचार के मामले में आरोपित है।

माल्या ने खुद के बचाव में यूरोपीय अदालत के अनुच्छेद 6 का हवाला देते हुए मानवाधिकारों के बारे में भी स्विस कोर्ट में बात की। माल्या ने अपने अधिकारों के बारे में बात करते हुए कहा कि जब तक वो दोषी नहीं साबित होते तबतक उनके अधिकारों के प्रति निष्पक्ष सुनवाई हो।

लेकिन, आपको बता दें कि संघीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 26 और 29 नवंबर, 2018 लिए फ़ैसलों ने माल्या की बात को ख़ारिज कर दिया और कंपनियों द्वारा अपील को अस्वीकार कर दिया और प्रत्येक असफल अपीलकर्ता को 2,000 स्विस फ़्रैंक (1.4 लाख रुपए) का भुगतान करने का आदेश दिया।

न्यूनतम आमदनी योजना: क्या मोदी सरकार बजट में लेगी यह रिस्क?

यूनिवर्सल बेसिक इनकम पूरी दुनिया में चर्चा का विषय है। अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड सहित कई यूरोपीय देशों के साथ-साथ ईरान और इराक़ जैसे मध्य एशिया के देशों में भी लागू है।

हो सकता है कि मोदी सरकार भी इस बजट सत्र में यूनिवर्सल बेसिक इनकम से जुड़ा कोई बड़ा ऐलान कर दे। माहौल भाँपते हुए राहुल गाँधी भी एक रैली में बेसिक इनकम से जुड़ी योजना की घोषणा को हवा दे चुके हैं। अब देखना ये है कि क्या ऐसी कोई योजना निकट भविष्य में लागू होती है, ज़रूरी होने के बावज़ूद संसाधनों के अभाव में टल जाती है या महज़ एक चुनावी घोषणा ही बनकर रह जाती है।

यूनिवर्सल बेसिक स्‍कीम की चर्चा लंबे समय से की जा रही थी। लेकिन मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, कहा जा रहा है कि हाल ही में विभिन्न मंत्रालयों से इस संबंध में राय माँगी गई है। PMO, बेसिक इनकम पर अलग-अलग मंत्रालयों के साथ बैठकें कर उनकी राय के अनुसार इसकी रूप रेखा पर अंदरखाने काम भी कर रहा है। हालाँकि, अभी इस बात की ख़बर नहीं है कि कौन-कौन इसमें शामिल होगा और इसके लिए संसाधन कहाँ से जुटाए जाएँगे।

फिर भी, मीडिया के सूत्रों का ऐसा कहना है कि सरकार यूनिवर्सल बेसिक इनकम के तहत जीरो इनकम वाले सभी नागरिकों के बैंक खातों में एक तयशुदा रकम सीधा ट्रांसफर करेगी। जीरो इनकम वाले नागरिकों का मतलब साफ़ है कि वो नागरिक जिनके पास कमाई का कोई साधन नहीं है। इसमें किसान, छोटे व्यापारी और बेरोज़गार युवा शामिल होंगे। इस योजना के तहत देश के हर साधनहीन नागरिक को 2,000 से 2,500 रुपए तक हर माह दिए जा सकते हैं।

बता दें कि इस स्कीम के तहत क़रीब 10 करोड़ लोग लाभान्वित हो सकते हैं, ऐसा अभी तक अनुमान है। साल 2016-17 के आर्थिक सर्वेक्षण में सरकार को इस योजना को लागू करने की सलाह दी गई थी। उम्‍मीद की जा रही है कि नए साल के बजट में मोदी सरकार इस बड़ी योजना का ऐलान कर सकती है।

UBI पर वैश्विक सोच क्या है

एक तरफ़ जहाँ अर्थशास्त्री आर्थिक असमानता, आय में धीमी वृद्धि के कारण UBI की वकालत कर रहे हैं। उनके हिसाब से आने वाले कई दशक विश्व भर में व्यापक बदलावों से भरे हैं। तकनिकी उन्नयन, ऑटोमेशन, बड़े मशीन, रोबोट, आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस के प्रयोग से नौकरियाँ के न सिर्फ़ भारत में बल्कि यूरोप, मध्य एशिया, रूस तथा अमेरिका में भी तेज़ी से कम होने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। यही कारण है कि हाल के वर्षों में वैश्विक स्तर पर यूनिवर्सल बेसिक इनकम लागू करने की माँग तेज़ हुई है।

भारत में UBI लागू होने की सम्भावना

अगर भारत की बात करें तो यहाँ आबादी का एक बड़ा हिस्सा अभी भी ग़रीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने को मज़बूर है। तमाम रक्षात्मक उपायों के बाद भी ग़रीबों को सब्सिडी एवं सहायता प्रदान करने वाली कई सरकारी योजनाएँ विभिन्न समस्याओं से ग्रस्त हैं। इन योजनाओं में GDP का एक बड़ा हिस्सा ख़र्च होने के बावजूद भी इनके क्रियान्वयन में समस्या आती है।

बता दें कि, वर्तमान में मोदी सरकार की देश की जनता के उत्थान के लिए कुल 950 फ़्लैगशिप योजनाएँ चल रही हैं। इन योजनाओं को चलाने के लिये GDP का करीब 5% ख़र्च होता है। ये योजनाएँ ग़रीबों, वंचितों, अनुसूचित जातियों, जनजातियों को लाभ पहुँचा रही हैं या नहीं या कितना पहुँच रहा है। इसके भी कुछ योजनाओं को छोड़कर, कोई वास्तविक आँकड़े मौजूद नहीं है।

आर्थिक सर्वेक्षण- 2016-17 में भी इस बात को स्वीकार किया गया है कि इन सभी योजनाओं को यदि बंद कर इनमें ख़र्च होने वाले पैसे को UBI की ओर ले जाया जाए तो ग़रीबों तक डायरेक्ट पैसा पहुँचेगा और उनकी स्थिति में वास्तविक सुधार नज़र आएगा। लाख कोशिशों के बाद भी सिस्टम में अनेक खामियों के चलते जिन लोगों को वास्तव में सरकारी सहायता की ज़रूरत होती है, उन तक कई योजनाओं के लाभ नहीं पहुँच पाते। इसलिये यह तर्क दिया जाता है कि यूनिवर्सल बेसिक इनकम देश के सभी ज़रूरतमंद नागरिकों को बेसिक आय प्रदान कर इन समस्याओं को दूर कर सकती है।

UBI लागू करने की राह में कौन-सी प्रमुख अड़चने हैं

दुनिया भर में उच्च असमानता की स्थिति और ऑटोमेशन के कारण रोज़गार के नुकसान की संभावना ने कई उन्नतशील अर्थव्यवस्थाओं को भी यूनिवर्सल बेसिक इनकम (UBI) पर विचार करने को प्रेरित किया है। ताकि, उनके नागरिकों को न्यूनतम स्तर की ज़रूरी नियमित आय की गारंटी दी जा सके। हालाँकि, कई विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि सबके लिए बेसिक इनकम का बोझ कोई बहुत विकसित अर्थव्यवस्था ही उठा सकती है। जहाँ सरकार का ख़र्च सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 40% से ज़्यादा हो और सरकार का टैक्स से होने वाली आय का आँकड़ा भी इसके आसपास ही हो।

यदि हम भारत के सन्दर्भ में बात करें तो टैक्स और GDP का यह अनुपात 17% से भी कम बैठता है। समुचित टैक्स संग्रहण न होने के कारण, हम तो बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं और आधारभूत ढाँचे के अलावा बाह्य और आंतरिक सुरक्षा, मुद्रा और बाहरी वैश्विक संबंधों से जुड़ी संप्रभु प्रक्रियाओं का बोझ भी उठाने में कठिनाई महसूस करते हैं।

भारत सहित दुनिया के वो देश जहाँ UBI पायलट प्रोजेक्ट के रूप में लागू है या लागू हो चूका है

बेसिक इनकम की जब भी बात होती है तो उसकी राह में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि ‘बेसिक आय’ का स्तर क्या हो? अर्थात वह कौन-सी राशि होगी जो व्यक्ति की न्यूनतम ज़रूरतों को पूरा कर सके? चलिए मान लेते हैं यदि हम ग़रीबी रेखा का पैमाना भी लेते हैं, जो कि औसतन 40 रुपए रोज़ाना है (गाँव में 32 रुपए और शहर में 47 रुपए), तो इस हिसाब से प्रत्येक व्यक्ति को लगभग 14000 रुपए वार्षिक या 1200 रुपए प्रति माह की न्यूनतम आय की गारंटी देनी होगी।

पहली नज़र में यह न्यूनतम राशि व्यावहारिक प्रतीत हो रही है लेकिन यदि हम ग़रीबी रेखा की इन आँकड़ो की नज़र से ही देखें तो अपनी कुल जनसंख्या की 25% शहरी वंचितों को सालाना 14000 रुपए और अन्य 25% ग्रामीण आबादी को वार्षिक 7000 रुपए देने की ज़रूरत पड़े और बाकी आबादी को कुछ भी न दें तो भी योजना की लागत आएगी प्रति वर्ष 6,93,000 करोड़ रुपए। हालाँकि, इस तरह के भेदभाव से शहरों की तरफ़ पलायन बढ़ेगा, जो एक नई समस्या को निमंत्रण देना होगा, कहने का तात्पर्य यह है कि इस प्रकार के भेदभाव को व्यवहारिक नहीं कहा जा सकता।

ग़ौरतलब है कि यह राशि वित्तीय वर्ष 2016-17 में सरकार के भुगतान बज़ट के 35% के बराबर है। इस गणित के हिसाब से वर्तमान परिस्थितियों में यह आवंटन सरकार के लिये संभव नज़र नहीं आ रहा। हो सकता है सरकार इस बोझ को कम करने के लिए पायलट रूप में योजना को कई चरणों में लागू करे या और भी कोई नया प्रावधान कर सकती है। वो क्या होगा? सरकार कौन से क़दम उठाएगी, इस पर अभी कुछ और कहना जल्दबाज़ी होगी। फिर भी मोदी सरकार की कार्यप्रणाली पर पिछले लगभग पाँच सालों तक बारीक़ नज़र रखने के आधार पर अभी ऐसी भविष्यवाणी की जा सकती है।

सम्भावित राह: मोदी सरकार से उम्मीदें

अहम सवाल ये है कि सबको पैसा देने के लिये धन कहाँ से आएगा? मोदी सरकार एक झटके में नोटबंदी की तरह यदि फ़्लैगशिप योजनायें बंद करती है तो विपक्ष को चुनावी साल में फिर से बवाल काटने का हथियार मिल जाएगा। विपक्ष के पिछले प्रदर्शन को देखते हुए शायद ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसा कोई क़दम उठाएँ। अब अगर वर्तमान में लागू जन-कल्याणकारी योजनाओं के साथ-साथ UBI को लागू करना हो, तो इसके लिए अनुमानित राशि कहाँ से आएगी, ये सवाल और भी स्वाभाविक और गंभीर रूप में हमारे सामने आता है।

इसीलिये, यह माना जाता है कि भारत जैसे देश में UBI तभी संभव है, जब कर संरचना (Tax Structure) में व्यापक बदलाव कर, उसे प्रगतिशील या रैडिकल बनाया जाए। टैक्स स्ट्रक्चर में परिवर्तन के संकेत मोदी सरकार पहले भी नोटबंदी जैसा बड़ा क़दम उठा के दे चुकी है। आँकड़ों के हिसाब से नोटबंदी के बाद से टैक्स से प्राप्त आय में कई गुना बढ़ोतरी हुई है। साथ ही GST के लागू होने से भी भारत सरकार का कर संग्रह बढ़ा है।

बता दें कि विकसित देशों में न्यूनतम मानव श्रम के उपयोग के साथ उत्पादन करने वाली मशीनों पर टैक्स लगाने का विचार चर्चित रहा है। और लोग वहाँ स्वतः भी ईमानदारी से टैक्स भरते हैं। हमारे यहाँ सारे जतन कर चोरी के लिए किये जाते हैं। इन बातों से सीख लेते हुए भारत में भी ऑटोमेशन का इस्तेमाल करने वाली कंपनियों पर ज़्यादा टैक्स लगाया जा सकता है तथा कर संरचना में सुधार कर, उस पैसे को UBI में इस्तेमाल किया जा सकता है।

हालाँकि, पूरे भारत में एक साथ UBI लागू करना अभी भी एक बड़ी चुनौती है। फिर भी, कुछ आवश्यक रक्षात्मक क़दम उठाकर इस चुनौती का समाधान किया जा सकता है।

वर्तमान में मोदी के वैश्विक प्रयासों से दक्षिण एशिया में स्थिरता का माहौल है एवं चीन, पाकिस्तान तथा अन्य पड़ोसी देशों के साथ भारत के बेहतर संबंध को देखते हुए, यदि तेल के आयात व रक्षा ख़र्च में कमी कर दी जाए तो शायद इतना पैसा बचाया जा सकता है कि भारत आने वाले समय में UBI पर गंभीरता से विचार कर सकता है। एक गणना के मुताबिक, UBI को यदि वास्तव में यूनिवर्सल रखना है तो उसके लिये जीडीपी का लगभग 10% ख़र्च करना होगा। यदि इसे सीमित दायरे में सिर्फ़ कुछ तबकों के लिये ही लागू किया जाता है, तो फिर इस योजना को ‘यूनिवर्सल’ न कहकर ‘बेसिक इनकम’ कहना ज़्यादा समीचीन होगा।

इसमें दो राय नहीं है कि बेसिक इनकम का विचार भारत की जनता के स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य नागरिक सुविधाओं में सुधार के साथ-साथ देश के वंचित, साधनहीन जनसँख्या के जीवन-स्तर को भी ऊपर उठाने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण प्रयास होगा लेकिन सबके लिये एक बेसिक इनकम तब तक संभव नहीं है जब तक कि वर्तमान में सभी योजनाओं के माध्यम से दी जा रही सब्सिडी को ख़त्म न कर दिया जाए। अतः सभी भारतवासियों के लिये एक बेसिक इनकम की व्यवस्था करने की बजाए यदि मोदी सरकार सामाजिक-आर्थिक जनगणना की मदद से समाज के सर्वाधिक वंचित तबके के लिये एक निश्चित न्यूनतम आय की व्यवस्था करती है तो यह कहीं ज़्यादा प्रभावी और व्यावहारिक होगा।

बेसिक इनकम के माध्यम से लोगों के जीवन में प्रत्यक्ष सुधार की उम्मीद की जा सकती है, साथ ही इससे सामाजिक सुधार को भी बल मिलेगा। पिछले पाँच सालों में जिस तेज़ी से मोदी सरकार भारत के बुनियादी विकास की रूप रेखा बना रही है वह आशा कि किरण है। हाल ही में प्रधानमंत्री ने अपने विकसित भारत के सपने को साकार करने के लिए, ‘सबका साथ, सबका विकास’ मूल मंत्र पर चलते हुए सूरत की एक रैली में देश के लोगों से पुनः बहुमत की सरकार चुनने की अपील की। जिस तरह से देश उनके विज़न के प्रति उत्साह दिखा रहा है, वह आने वाले भारत के लिए सुखद उम्मीदों से परिपूर्ण है।

‘मोदी हिटलर’, ‘राहुल मुसोलिनी’ कांड के बाद नीति आयोग ने लीक रोज़गार रिपोर्ट पर दी सफ़ाई

सरकार ने बृहस्पतिवार (जनवरी 31, 2019) को लीक हुए रोज़गार रिपोर्ट पर स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि रिपोर्ट अभी भी तैयार की जा रही है और पूरी तरह से तैयार होने पर जारी की जाएगी। नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने कहा, “सरकार ने नौकरियों से सम्बंधित डेटा जारी नहीं किया, क्योंकि यह अभी तैयार किया जाना बाकी है। आँकड़े तैयार किए जाने के बाद ही सार्वजनिक किए जाएँगे।”

इसके साथ ही राजीव कुमार ने कहा, “आँकड़े एकत्र करने की प्रक्रिया अब भिन्न है, हम नए सर्वेक्षण में कंप्यूटर की मदद से व्यक्तिगत साक्षात्कारकर्ता के द्वारा सर्वे कर रहे हैं। 2 अलग तरह से जुटाए आँकड़ों की तुलना करना सही नहीं है। यह डेटा अभी सत्यापित नहीं है। इस कारण से इस रिपोर्ट को अंतिम रूप में उपयोग करना अनुचित है।”

उन्होंने कहा कि सरकार के थिंक-टैंक ने कहा है कि देश नए लोगों के लिए पर्याप्त नौकरियाँ पैदा कर रही है, भले ही वो अभी उच्च-गुणवत्ता वाले नहीं हैं। नीति आयोग के वीसी ने यह भी संकेत दिया कि अंतिम रिपोर्ट को मार्च के अंत तक अंतिम रूप दिया जा सकता है।

इन्फोसिस के पूर्व सीएफओ मोहनदास पई ने कहा है कि नौकरियों पर यह आधिकारिक डेटा नहीं है। हमें नहीं पता कि वह सही भी है या नहीं। ऐसे में जब तक सरकार आँकड़े जारी नहीं करती, तब तक इंतज़ार किया जाना चाहिए। आज हमारे पास डेटाबेस के लिए वैकल्पिक स्रोत हैं, जो कि बताते हैं कि पिछले साढ़े चार सालों में भारी संख्या में नौकरियाँ सृजित की गईं।

इससे पहले राहुल गाँधी ने ट्वीट करते हुए मोदी सरकार को घेरा था कि देश में बेरोज़गारी का स्तर 45 सालों में सबसे ज़्यादा है। राहुल गाँधी के ट्वीट का आधार नौकरी के सृजन से जुड़ा एक रिपोर्ट कार्ड था जो मीडिया में लीक हुआ था। इसमें 2017-18 में भारत में बेरोज़गारी दर 6.1% थी जो कि 1972-73 के बाद सबसे ज़्यादा है।

राहुल गाँधी ने मोदी को हिटलर कहते हुए इसे राष्ट्रीय आपदा कहा, “फ़्यूहरर ने हर साल 2 करोड़ नौकरियों का वादा किया था। 5 साल बाद ये लीक हुई रिपोर्ट बताती है कि यह एक राष्ट्रीय आपदा बन चुकी है।”

भाजपा तुरंत बचाव में आई और इसे ‘फ़ेक न्यूज़’ कहकर राहुल गाँधी को मुसोलिनी कहा, “ऐसा ट्वीट वही आदमी कर सकता है जिसने पूरे जीवन में कभी भी ढंग की नौकरी न की हो और बिलकुल बेकार बैठकर फ़र्ज़ी ख़बरें शेयर करता रहता हो।”

नागरिकता संशोधन विधेयक पर हुई हिंसा, असम में BJP नेता की पिटाई

भारतीय जनता पार्टी के नेता और तिनसुकिया ज़िले के अध्यक्ष लखेश्वर मोरन पर नागरिकता संशोधन विधेयक का विरोध कर रहे लोगों द्वारा हमला किया गया। यह घटना कथित तौर पर तिनसुकिया में घटित हुई है, जहाँ नेता लोक जागरण मंच की बैठक में भाग लेने के लिए पहुँचे थे। इसका आयोजन विवादास्पद बिल के बारे में ग़लत जानकारी से निपटने के लिए किया गया था।

नॉर्थ ईस्ट नाउ की रिपोर्ट के अनुसार, मोरन को प्रदर्शनकारियों द्वारा दिखाए गए काले झंडे के साथ स्वागत किया गया। इसके बाद, कुछ प्रदर्शनकारियों ने नेता का पीछा करना शुरू कर दिया। वीडियो में लोगों को बीजेपी नेता मोरन के ऊपर टायर और पत्थर फेंकते हुए देखा जा सकता है। इसके मद्देनज़र, पुलिस ने हस्तक्षेप किया और आगे की हिंसा से बचाते हुए मोरन को सुरक्षित बाहर निकाला।

बीजेपी नेता ने कहा कि प्रदर्शनकारियों ने उन पर लाठियाँ और लातें बरसाईं लेकिन पुलिस ने हस्तक्षेप नहीं किया। भीड़ के उपद्रव से बचने के लिए जब उन्होंने भागने का प्रयास किया तो प्रदर्शनकारियों द्वारा उनका पीछा किए जाने की वजह से वो गिर गए। उसके बाद मोरन फिर से भागने की कोशिश करने लगे लेकिन साइकिल से टकराने के बाद एक बार फिर से नीचे गिर गए।

घटना के बाद, बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष रंजीत कुमार दास ने इस घटना की निंदा की और यह भी कहा कि प्रदर्शनकारियों को ‘लक्ष्मण रेखा’ को पार नहीं करना चाहिए। उन्होंने राज्य सरकार से अपराधियों को बयाना देने की भी अपील की है। उन्होंने कहा कि बीजेपी प्रशासन को दबाने के लिए गुरुवार को अपने नेताओं को तिनसुकिया ज़िले में भी भेजेगी और हमलावरों को पकड़ने के लिए आग्रह करेगी।

नागरिकता संसोधन विधेयक एक नज़र में

राजीव गांधी सरकार के दौर में असम गण परिषद से समझौता हुआ था कि 1971 के बाद असम में अवैध रूप से प्रवेश करने वाले बांग्लादेशियों को निकाला जाएगा। 1985 के असम समझौते (ऑल असम स्टूडेंट यूनियन ‘आसू’ और दूसरे संगठनों के साथ भारत सरकार का समझौता) में नागरिकता प्रदान करने के लिए कटऑफ तिथि 24 मार्च 1971 थी। नागरिकता बिल में इसे बढ़ाकर 31 दिसंबर 2014 कर दिया गया है। यानी नए बिल के तहत 1971 के आधार वर्ष को बढ़ाकर 2014 कर दिया गया है। नागरिकता (संशोधन) विधेयक 2016 के तहत पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान से आए हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी व ईसाई शरणार्थियों को 12 साल के बजाय छह साल भारत में गुजारने पर नागरिकता मिल जाएगी।

ऑल असम स्टूडेंट यूनियन (आसू) के सलाहकार समुज्जल भट्टाचार्य के अनुसार इस विधेयक से असम के स्थानीय समुदायों के अस्तित्व पर ख़तरा हो गया है। वे अपनी ही ज़मीन पर अल्पसंख्यक बन गए हैं। कैबिनेट द्वारा नागरकिता संशोधन बिल को मंजूरी देने से नाराज़ असम गण परिषद ने राज्य की एनडीए सरकार से अलग होने का ऐलान किया है।

यह संशोधन विधेयक 2016 में पहली बार लोकसभा में पेश किया गया था। विधेयक के ख़िलाफ़ धरना-प्रदर्शन कर रहे लोगों का कहना है कि ये विधेयक 1985 के असम समझौते को अमान्य करेगा। इसके तहत 1971 के बाद राज्य में प्रवेश करने वाले किसी भी विदेशी नागरिक को निर्वासित करने की बात कही गई थी, भले ही उसका धर्म कुछ भी हो।

नया विधेयक नागरिकता कानून 1955 में संशोधन के लिए लाया गया है। बीजेपी ने 2014 के चुनावों में इसका वादा किया था। कॉन्ग्रेस, तृणमूल कॉन्ग्रेस, सीपीएम समेत कुछ अन्य पार्टियाँ लगातार इस विधेयक का विरोध कर रही हैं। उनका दावा है कि धर्म के आधार पर नागरिकता नहीं दी जा सकती है, क्योंकि भारत धर्मनिरपेक्ष देश है।

बीजेपी की सहयोगी पार्टी शिवसेना और जेडीयू ने भी ऐलान किया था कि वह संसद में विधेयक का विरोध करेंगे। बिल का विरोध कर रहे बहुत से लोगों का कहना है कि यह धार्मिक स्तर पर लोगों को नागरिकता देगा। तृणमूल सांसद कल्याण बनर्जी के अनुसार केंद्र के इस फ़ैसले से क़रीब 30 लाख लोग प्रभावित होंगे।

विरोध कर रही पार्टियों का कहना है कि नागरिकता संशोधन के लिए धार्मिक पहचान को आधार बनाना संविधान के आर्टिकल 14 की मूल भावनाओं के खिलाफ है। जबकि भाजपा नागरिकता बिल को पारित करके असम व दूसरे राज्यों में रहने वाले बाहरी लोगों को देश से बाहर निकालना चाहती ताकि नॉर्थ ईस्ट के मूल नागरिकों को किसी तरह से कोई समस्या न हो।

₹614 करोड़: अगस्ता वेस्टलैंड+एयर इंडिया घोटाले का यह है कच्चा चिट्ठा – एकदम Exclusive

अगस्ता वेस्टलैंड मामले और एयर इंडिया घोटाले में दुबई से प्रत्यर्पण कर लाए गए दीपक तलवार और राजीव सक्सेना को कस्टडी में भेज दिया गया है। दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने इन दोनों को ईडी (ED) को 4 दिनों की कस्टडी सौंपी है।

दीपक तलवार और उसका धंधा

दीपक तलवार उन आरोपितों में से एक है, जिसने तत्कालीन नागरिक उड्डयन मंत्री की सहायता से प्राइवेट एयरलाइंस को मदद उपलब्ध कराई थी। यह मदद एयर इंडिया के लाभ वाले रूटों को बंद करवा के की गई थी। ऐसा करने से इन रूटों पर निजी एयरलाइंस के विमान को सीधा-सीधा लाभ पहुँचा था।

दीपक तलवार को एयर इंडिया के द्वारा विभिन्न विमानों की ख़रीद पर मिली किक बैक्स की बैंक डिटेल्स

दीपक तलवार ने कैसे और किन-किन निजी एयरलाइंस को फ़ायदा पहुँचाया था, इस तथ्य की पुष्टि उन निजी एयरलाइंस द्वारा किए गए भुगतान से होता है। क़तर, इमिरेट्स और एयर अरबिया इस हवाला के माध्यम से फायदा लेने वालों में से थे। इसके एवज़ में एक विदेशी बैंक एकाउंट (बैंक ऑफ़ सिंगापुर) में ₹212 करोड़ की घूस (किक बैक्स) ट्रांसफर की गई थी। यह अकाउंट जिस कंपनी के नाम पर था, उसका मालिक दीपक तलवार ही था। इस ₹212 करोड़ के अलावा ऊपर जो स्क्रीनशॉट दिया गया है, उससे भी दीपक तलवार ने ₹88 करोड़ की कमाई की।

राजीव सक्सेना: बड़ी मछली, बड़ा पैसा

राजीव सक्सेना वो शख़्स है, जो स्विट्ज़रलैंड में अलग-अलग बैंक एकाउंट्स को चलाता है। इन बैंक अकाउंट्स में अगस्ता वेस्टलैंड से आई किक बैक्स की रकम डाली गई थी। 8 सितंबर 2017 (या यह 9 अगस्त 2017 भी हो सकता है) तक राजीव सक्सेना के इन बैंक अकाउंट्स में कुल ₹314 करोड़ की राशि जमा की गई थी। इस पर अभी जाँच जारी है कि आख़िर यह किक बैक्स किसके फायदे के लिए की गई थी और किसके इशारे पर इन बैंक एकाउंट्स को रखा गया था।

राजीव सक्सेना द्वारा संचालित स्विट्ज़रलैंड के बैंक अकाउंट्स और उसमें आई किक बैक्स के पैसे

आपको बता दें कि भारत ने अगस्ता वेस्टलैंड घोटाले पर कार्रवाई तेज़ करते हुए क्रिस्चियन मिशेल के बाद दो अन्य दलालों को दुबई से प्रत्यर्पित करने में सफलता पाई है। घोटाले के सह-अभियुक्त राजीव सक्सेना को बुधवार (जनवरी 30, 2019) सुबह 9:30 बजे उनके आवास से UAE की सुरक्षा एजेंसी द्वारा उठा लिया गया और शाम 5:30 को भारत के लिए प्रत्यर्पित किया गया। वहीं एक अन्य सफल कार्रवाई में दीपक तलवार को भी भारत लाया गया है, जिसे दुबई के अधिकारियों ने पकड़ा था।


चाहे गोलियॉं खानी पड़े लेकिन 21 फरवरी से राम मंदिर बनाएँगे: शंकराचार्य स्वरूपानंद

धार्मिक नेता शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने बुधवार (जनवरी 30, 2019) को बयान दिया कि अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण की शुरुआत 21 फरवरी को होगी, चाहे फिर वहाँ सभा करने वालों को गोलियों का सामना करना पड़े।

प्रयागराज में कुंभ मेले में 3 दिनों की मंडली के अंत में राम मंदिर शिलान्यास करने की योजना बनाई गई थी। शंकराचार्य ने कहा कि साधु बसंत पंचमी (10 फरवरी) के बाद प्रयागराज से अयोध्या के लिए मार्च शुरू करेंगे। उन्होंने कहा कि वे गोलियों का सामना करने के लिए तैयार हैं और गिरफ़्तारी या इस प्रकार की अन्‍य किसी कार्रवाई से संतों के इस अभियान पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

शंकराचार्य ने भारतीय जनता पार्टी नेतृत्व वाली सरकार की मंदिर निर्माण के लिए कानून नहीं लाने के लिए आलोचना की, उन्होंने कहा कि उनके पास लोकसभा में पूर्ण बहुमत था फिर भी प्रयास नहीं किए गए। प्रयागराज में चल रहे कुंभ में आज वृहस्पतिवार से विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) की दो दिवसीय धर्म संसद की शुरुआत होने जा रही है। धर्म संसद के दौरान राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत भी मौजूद होंगे।

स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने यह घोषणा ऐसे समय में की है, जब केंद्र सरकार ने अयोध्या में विवादास्पद राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद स्थल के पास अधिग्रहण की गई 67 एकड़ जमीन को उसके मूल मालिकों को लौटाने की अनुमति माँगने के लिये उच्चतम न्यायालय का रुख किया था। एक नई याचिका में केन्द्र ने कहा कि उसने 2.77 एकड़ विवादित राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद स्थल के पास 67 एकड़ भूमि का अधिग्रहण किया था।

याचिका में कहा गया कि राम जन्मभूमि न्यास (राम मंदिर निर्माण को प्रोत्साहन देने वाला ट्रस्ट) ने 1991 में अधिग्रहित अतिरिक्त भूमि को मूल मालिकों को वापस दिए जाने की माँग की थी। शीर्ष अदालत ने पहले विवादित स्थल के पास अधिग्रहण की गई 67 एकड़ जमीन पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था। केंद्र सरकार ने 1991 में विवादित स्थल के पास की 67 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया था।

ममता सरकार शारदा चिट फंड घोटाले की जाँच में बाधा उत्पन्न कर रही है : CBI

केंद्रीय जाँच ब्यूरो ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सरकार पर करोड़ों रुपये के शारदा पोंजी घोटाले की जाँच में रुकावट डालने का आरोप लगाया है। सीबाआई ने आरोप लगाया है कि राज्य सरकार के ‘शत्रुतापूर्ण’ व्यवहार के चलते अंतिम आरोप पत्र दाखिल करने में देरी हो रही है।

“राज्य सरकार सीबीआई से शत्रुतापूर्ण व्यवहार कर रही है और शारदा घोटाले मामले में, राज्य स्तर के सरकारी तंत्र ने सभी सबूतों को नुक़सान पहुँचाया है।” यह बात सीबीआई के एक वरिष्ठ अधिकारी ने रिपोर्टों के हवाले से कही थी। यही कारण है कि, अधिकारी ने कहा, चार्जशीट दाखिल करने में देरी हो रही है।

रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि बैंकिंग सुरक्षा धोखाधड़ी शाखा, विशेष अपराध शाखा और प्रीमियर जाँच एजेंसी के आर्थिक अपराधियों को ग़ैर-संचालित करार दिया था, क्योंकि पश्चिम बंगाल ने पिछले साल सीबीआई से सामान्य सहमति वापस ले ली थी। अधिकारी ने आगे कहा “केवल आर्थिक अपराध IV (चिट फंड जाँच विंग) राज्य में काम कर रहा है।”

इस महीने की शुरुआत में, सीबीआई ने रोज़ वैली चिट फंड घोटाले के सिलसिले में श्री वेंकटेश फिल्म्स के प्रमुख श्रीकांत मोहता को नामजद किया था। ऐसा आरोप लगाया जाता है कि मोहता के प्रोडक्शन हाउस को रोज़ वैली द्वारा 17 फ़िल्मों के निर्माण के लिए ₹25 करोड़ का भुगतान किया गया था।

शारदा घोटाला 2013 में उजागर हुआ था। कई राजनीतिक नेता इस पोंजी योजना से जुड़े थे जो 200 से अधिक कंपनियों के सहयोग से चलाया गया था। शारदा समूह ने कथित रूप से लाखों छोटे निवेशकों से 200 बिलियन से अधिक रुपये इकट्ठे किए थे। यह समूह अप्रैल 2013 में ध्वस्त हो गया था और एक साल बाद, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने CBI को राज्य स्तर की SIT द्वारा जाँच कराए जाने का आदेश दिया था।

बता दें कि CBI ने हाल ही में शारदा चिट फंड घोटाले में पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम की पत्नी नलिनी चिदंबरम के ख़िलाफ़ भी आरोप पत्र दायर किया है।

पश्चिम बंगाल में CBI एकमात्र संस्थान नहीं है, जिसने राज्य सरकार पर इसका अनुपालन न करने का आरोप लगाया है। पिछले साल, एक आरटीआई के माध्यम से भी यह ख़ुलासा हुआ था कि पश्चिम बंगाल सरकार भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) को योजनाओं और ई-ख़रीद से संबंधित विवरण साझा करने से मना कर रही थी।

भारतीय थलसेना का पुनर्गठन: कोल्ड स्टार्ट डॉक्ट्रिन और इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप

गत वर्ष (अक्टूबर 9-15, 2018) में हुई आर्मी कमांडर्स कॉन्फरेंस में भारतीय थलसेना के पुनर्गठन संबंधी चार अध्ययन रिपोर्ट प्रस्तुत की गईं जिन पर पर गहन विमर्श हुआ। थलसेना के पुनर्गठन और बदलते सामरिक परिवेश के अनुसार अत्याधुनिक ढाँचे में ढालने के लिए जनरल बिपिन रावत ने एक-एक लेफ्टिनेंट जनरल रैंक के अधिकारी की अध्यक्षता में 25-25 सदस्यों वाली चार अध्ययन समितियाँ बनाई थीं जिन्हें अपनी रिपोर्ट सौंपनी थी।

पहली रिपोर्ट भारतीय थलसेना को पुर्नसंगठित कर उसके आकार को छोटा किंतु अधिक मारक बनाने पर केंद्रित है। दूसरी अध्ययन रिपोर्ट सेना मुख्यालय के पुनर्गठन पर केंद्रित है। तीसरी रिपोर्ट अधिकारियों के कैडर रिव्यु और चौथी रिपोर्ट सेना को जवान और स्वस्थ रखने तथा मनोबल बढ़ाने के उपायों पर केंद्रित है। यह चारों रिपोर्ट जनरल रावत और रक्षा मंत्रालय को सौंप दी गई हैं। यदि इनपर अमल किया जाता है तो विगत 35 वर्षों में किया गया यह सबसे महत्वपूर्ण सैन्य सुधार होगा।

थलसेना के पुनर्गठन की योजना में सबसे महत्वपूर्ण घटक है इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप जो कि पाकिस्तान के विरुद्ध भारत की ‘कोल्ड स्टार्ट’ कही जाने वाली युद्धनीति का एक अंग है। कोल्ड स्टार्ट की अवधारणा तब बलवती हुई थी जब सन 2001 में पाकिस्तानी आतंकियों ने संसद पर हमला किया था। तब भारत ने प्रतिक्रियात्मक कार्यवाही में ऑपरेशन पराक्रम आरंभ किया था। ऑपरेशन पराक्रम के दौरान हमें अपनी स्ट्राइक कोर की कमियाँ दिखाई पड़ी थीं।

दरअसल 1971 के पश्चात भारत ने पाकिस्तान और चीन के विरुद्ध दो मोर्चों पर एक साथ युद्ध छिड़ने पर ‘strike-hold-strike’ की रणनीति अपनाई थी। इस नीति के अंतर्गत हम पहले पाकिस्तान पर हमला करते किंतु उस दौरान चीन के प्रति रक्षात्मक रहते। पाकिस्तान पर तीव्रता से हमला करने के साथ ही हम उत्तर-पूर्वी मोर्चे पर चीन को रोककर रखते। पाकिस्तान को नियंत्रण में लेने के बाद हम चीन पर हमलावर होते।

इस रणनीति के लिए भारतीय सेना ने दो प्रकार की कोर बनाई थी: स्ट्राइक और होल्डिंग कोर। स्ट्राइक कोर तुरंत हमला करने के लिए और होल्डिंग कोर रक्षात्मक प्रतिक्रिया के लिए थी। एक कोर में लगभग 50-60,000 सैनिक होते हैं। एक कोर में प्रायः तीन डिवीज़न, एक डिवीज़न में तीन ब्रिगेड तथा प्रत्येक ब्रिगेड में 3 बटालियनें होती हैं। सैनिकों की संख्या न्यूनाधिक हो सकती है लेकिन भारतीय थलसेना में बल की संरचना मोटे तौर पर इसी प्रकार की होती है।

कारगिल की लड़ाई और सन 2001-02 के बीच हुए ऑपरेशन पराक्रम में जब हमने सेना को सीमा पर मोबिलाइज़ करना प्रारंभ किया तो उस प्रक्रिया में आवश्यकता से अधिक समय लगा। तब हमें अपनी मिलिट्री डॉक्ट्रिन में कमियाँ पता चलीं और सेना ने अपनी सभी होल्डिंग कोर को ‘पिवट’ (pivot) कोर बनाने का निर्णय लिया। पिवट कोर का अर्थ था कि स्ट्राइक कोर तो अपना काम करेंगी ही लेकिन आदेश मिलते ही होल्डिंग कोर भी हमला करने को तैयार रहे उन्हें इस लायक बनाया गया।  

ऑपरेशन पराक्रम से पहले भारत होल्डिंग कोर और कम से कम तीन स्ट्राइक कोर (मथुरा स्थित 1 Corps, अम्बाला स्थित 2 Corps और भोपाल स्थित 21 Corps) के साथ पाकिस्तान के क्षेत्र में भीतर तक हमला करने की रणनीति में विश्वास करता था। यह डॉक्ट्रिन इस प्रकार बनाई गई थी कि तुरंत आदेश मिलते ही भारतीय सेना की तीनों स्ट्राइक कोर पाकिस्तान की उत्तरी 1 कोर और दक्षिणी 2 कोर पर हमला कर रणनीतिक दृष्टि से पाकिस्तान के लिए अति महत्वपूर्ण संसाधनों पर कब्जा कर लेती। यह सिद्धांत 1981-82 में जनरल के वी के राव के समय अपनाया गया था और 1987 में ब्रासटैक्स सैन्य अभ्यास के समय इसका परीक्षण भी किया गया था।

लेकिन ऑपरेशन पराक्रम के दौरान कोर स्तर की सैन्य टुकड़ी को सीमा पर पहुँचाने में हुए विलंब ने आर्मी कमांडरों के कान खड़े कर दिए। तब ‘कोल्ड स्टार्ट’ डॉक्ट्रिन अपनाई गई जिसके दो महत्वपूर्ण घटक हैं: पहला तो यह कि पिवट कोर की क्षमता बढ़ाई जाए और उन्हें अधिक मारक (offensive) बनाया जाए।

दूसरा यह कि डिवीज़न से छोटी लेकिन ब्रिगेड से बड़ी तथा अत्याधुनिक युद्धक तकनीक से युक्त एक ऐसी मारक सैन्य टुकड़ी बनाई जाए जो आदेश मिलते ही अत्यंत तीव्र गति से पाकिस्तान के भीतर घुसकर उसे घुटने टेकने पर विवश कर दे। इसे ‘इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप’ (IBG) का नाम दिया गया है।

युद्ध के दौरान IBG का प्रयोग पाकिस्तान को परमाणु अस्त्र के बारे में सोचने से पहले ही उसके सैन्य संसाधनों को नष्ट करने की योजना पर आधारित है। एक IBG में इन्फैंट्री, एयर डिफेन्स, आर्टिलरी, आर्मर, सिगनल, मैकेनाइज़्ड इन्फैंट्री सहित सेना के सभी अंगों को समाविष्ट किया जाएगा। यह अपने आप में पूर्ण, सर्व संसाधन युक्त, तीव्र और स्वतंत्र युद्धक इकाई होगी। चीन और पाकिस्तान दोनों ही विरोधियों को एक साथ परास्त करने की रणनीति के अंतर्गत IBG बनाई जाएँगी।

थलसेनाध्यक्ष जनरल बिपिन रावत ने कई साक्षात्कारों में यह स्वीकार किया है कि IBG का निर्माण युद्धस्थल की भौगोलिकता को ध्यान में रखकर किया जाएगा। ऐसी IBG बनाई जाएँगी जो राजस्थान के मरुस्थल से लेकर उत्तर भारत के मैदान और हिमालय के पहाड़ों पर भी उतनी ही दक्षता से लड़ सकें। एक IBG को मेजर जनरल रैंक का अधिकारी कमांड करेगा।

कुछ सामरिक चिंतकों का मानना है कि कोल्ड स्टार्ट डॉक्ट्रिन के अंतर्गत करीब 8-10 IBG बनाई जा सकती हैं। कुछ विचारकों का यह मानना है कि 14,000 सैनिकों वाली प्रत्येक इन्फैंट्री डिवीज़न को समाप्त कर 140 IBG बनाई जानी चाहिए। बहरहाल, जनरल रावत के बयान के अनुसार विभिन्न युद्धक परिस्थितियों में पहले सभी IBG का परीक्षण किया जाएगा और सब कुछ ठीक रहा तो यह प्रक्रिया वर्ष 2019 के अंत तक पूर्ण कर ली जाएगी।  

मायावती की ₹1400 करोड़ के घोटाले से जुड़ी फ़ाइलों से हटेगी धूल!

लखनऊ में आज ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) ने स्मारक घोटाले मामले में कई जगहों पर छापेमारी की है। इस छानबीन में ईडी की टीम कई फर्म के साथ निर्माण निगम इंजीनियर्स के ठिकानों पर पहुँची। ईडी के सूत्रों की मानें तो स्मारक घोटाले में ईडी को मनी लॉन्ड्रिंग के सबूत मिले हैं।

बता दें कि बसपा प्रमुख मायावती के कार्यकाल के दौरान यूपी के लखनऊ और नोएडा में स्मारक निर्माण का कार्य हुआ था। इस निर्माण में क़रीब ₹1400 करोड़ का घोटाला सामना आया था। इस घोटाले की जाँच अब अंतिम पड़ाव पर है।

पाँच एजेंसियों से माँगी ईडी ने जाँच की सूची

इस पूरे मामले में ईडी ने यूपी की सभी जाँच एजेंसियों से पाँच करोड़ से ज्यादा के घोटालों से जुड़ी सूची माँगी है। सभी जाँच एजेंसियों को पत्र लिखे गए हैं।

सीबी सीआईडी, ईओडब्ल्यू, एसआईटी, विजिलेंस और ऐंटी करप्शन ऑर्गेनाइजेशन को लिखे पत्र में ईडी ने जानकारी माँगी है कि उनके यहाँ पाँच करोड़ से ज़्यादा के घोटाले के कौन-कौन से मामले हैं। साथ में पत्र में इन मामलों की क्या स्थिति है इसके बारे में भी पूछा है।

स्मारक घोटाले में ईडी के साथ विजिलेंस ने भी केस को दर्ज कर रखा है। पूरे मामले में अभी तक भी विजिलेंस की तरफ से कोई आरोप पत्र दाखिल नहीं किया गया है। इसके कारण इन मामलों में कोई छापेमारी और गिरफ़्तारी नहीं हुई है। इसी वजह से ईडी की जाँच भी आगे नहीं बढ़ पा रही है। बता दें ईडी स्मारक घोटाले जैसे मामलों पर एजेंसियों को भेजे गए पत्रों से ब्यौरा जुटाएगी।

दिग्गज़ नेता और अधिकारियों के ख़िलाफ़ है ये पूरा मामला

अब विजिलेंस (जाँच सतर्कता आयोग) इस मामले पर जल्द ही जाँच पूरी करने जा रही है। जिसके चलते बसपा सरकार के दो दिग्गज़ मंत्रियों नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी और बाबू सिंह कुशवाहा के साथ तीन दर्जन से ज़्यादा इंजीनियरों और अन्य विभागों के अधिकारियों का फंसना तय बताया जा रहा है।

कई मुश्किलों के बाद भी विजिलेंस इस मामले से जुड़ी रिपोर्टों को शासन को जल्द से जल्द सौंपने की तैयारी में है। सपा सरकार के लोकायुक्त की जाँच रिपोर्ट मिलने के बाद विजिलेंस को इस पूरे मामले की ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी। इस मामले पर हुई जाँच के बाद विजिलेंस ने प्रदेश की राजधानी के गोमतीनगर थाने में क़रीब 100 आरोपितों के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज की थी।

लेकिन, मुक़दमा दर्ज होने के तीन साल तक इस मामले पर ध्यान नहीं दिया गया। यहाँ तक इस मामले से जुडे़ पूर्व मंत्रियों के बयान तक दर्ज नहीं किए गए थे। लेकिन अब सत्ता बदलने के बाद स्मारक घोटाले की फाइलों को दोबारा से खोला जा रहा है। इस मामले पर पुख़्ता जाँच के लिए सात इंस्पेक्टरों की एक एसआईटी टीम का भी गठन हुआ है। ये टीम पूरे मामले के अंतिम निष्कर्ष पर पहुँचकर अपनी रिपोर्ट को शासन को सौंपने की तैयारी में है।

स्मारक घोटाला

स्मारक घोटाले के बारे में आपको बता दें कि इस मामले में उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर हुई थी। इसमें अंबेडकर स्मारक परिवर्तन स्थल लखनऊ, गौतमबुद्ध उपवन, मान्यवर कांशीराम स्मारक स्थल, इको पार्क, रामबाई आंबेडकर मैदान स्मृति उपवन, नोएडा आंबेडकर पार्क आदि के निर्माण में 14,10,83,43,000 रुपए के घोटाले का आरोप लगाया गया था।

कॉन्ग्रेस के नए जोगी-जोगन की जटाएँ रामावतार राहुल और दुर्गावतार प्रियंका बन कर बाहर आ रही हैं

चुनाव आते जा रहे हैं, और धर्म को नकारने वाले, राम को मिथक कहकर झुठलाने वाले, अब राम और दुर्गा बनकर सामने आने लगे हैं। कल की ख़बर में राहुल गाँधी को राम के रूप में दिखाया गया था, और वहीं प्रियंका गाँधी को ‘गंगा की बेटी’ कहकर एक पोस्टर लगाया गया था।

आज प्रियंका गाँधी को दुर्गा के रूप में दिखाया जा रहा है। इस से पहले एक रोचक बात शशि थरूर के ट्विटर से आई थी जहाँ उन्होंने गंगा को हमाम और उसमें नहाने वालों को पापी और नंगा कहा था।

कॉन्ग्रेस का नेतृत्व कन्फ़्यूज़्ड है कि वो अपना जनेऊ दिखाता फिरे, या फिर नए-नए जोगी की सामाजिक स्वीकार्यता के लिए धूल और राख मिलाकर तुरत-फुरत में बनाई जटाओं को अपनी पहचान बनाए, या योगियों और संतों को गंगास्नान करते हुए देखने पर पापी कहता फिरे।

हम आपके लिए राहुल और प्रियंका की कुछ तस्वीरें छोड़ रहे हैं ताकि आप उन्हें देखकर शशि थरूर की भाषा में कॉन्ग्रेसियों की तरह पाप धो लें।

दुर्गा रूप में प्रियंका
गंगा की बेटी प्रियंका
राम के रूप में राहुल गाँधी
भगवान परशुराम के वंशज राहुल
रामभक्त पंडित राहुल गाँधी
थरूर
शशि थरूर का हिन्दू संतों और प्रतीकों को लेकर नज़रिया