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वेरी शौरी साहब! आपको दलदल से कोई और नहीं, सिर्फ ‘शौरी’ ही निकाल सकते हैं

आए दिन ऐसी ख़बरें आती रहती हैं जब हमें किसी नेता के दल बदलने की बात पता चलती है या फिर किसी राजनीतिक दल के इस गठबंधन से उस गठबंधन में जाने की बात पता चलती है। मतलब नेताओं के लिए पाला बदलना अब एक सामान्य ख़बर हो गई है। नेताओं की यह ‘बीमारी’ अब एक कदम आगे बढ़कर कुछ और लोगों को भी लग गई है। मसलन, आजकल के पत्रकार भी कई धुरों में बँटे हुए हैं, मीडिया हाउसेज का तो कहना ही क्या! ट्रेन की डिज़ाइन में खोट निकालना हो या ‘क्रान्तिकारी’ बयान को काट-छाँट कर पेश करना- आजकल के पत्रकार इन सबमें माहिर हो चुके हैं। अजेंडा विशेष पर काम करता आज का मीडिया और उसके एक वर्ग द्वारा झूठ फैलाना भी सामान्य हो गया है।

अब बात थोड़ी ऊपर लेवल की। आप एक ऐसे बुद्धिजीवी के बारे में क्या कहेंगे, जो राजनीति के दलदल में ऐसा उतर आया हो कि उसे ख़ुद की भी सुध नहीं रही? एक जमाने में पत्रकारिता के पुरोधा रहे उस व्यक्ति के बारे में क्या कहेंगे, जो आज उन्हीं की गोद में जाकर बैठ गया है जिनके ख़िलाफ़ लिख कर उसे प्रसिद्धि मिली? उस नेता के बारे में क्या कहेंगे, जो आज उसी पार्टी के विरोध में खड़ा है, जिसने उसे पहली बार संसद दिखाया, मंत्री बनाया, अपने हिसाब से कार्य करने की खुली छूट दी और सत्ता का स्वाद चखाया? उस बेस्टसेलर लेखक के बारे में क्या कहेंगे, जो आज अपनी ही किताबों में लिखी गई बातों को धता बता रहा है? उस अर्थशास्त्री के बारे में आपकी क्या राय होगी, जो आज अनर्थ पर तुल आया हो?

ये सब अलग-अलग लोग नहीं हैं बल्कि एक ही नाम है इनका- अरुण शौरी। नेताओं और आजकल के पत्रकारों के ‘गिरने’ की कई ख़बरें हम सुनते हैं और वो हमें चकित नहीं करतीं लेकिन 77 साल के एक बुज़ुर्ग का पाला बदल लेना, वो भी बिना किसी ठोस कारण के- हमें चकित करता है। हमें चकित करता है कि आख़िर क्यों कभी संघ की पैरवी करने वाला आज उन्हीं की गोद में जा बैठा है, जो संघ को गाली देते नहीं थकते। ऐसा नहीं है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का एजेंडा बदल गया है, ऐसा भी नहीं है कि भाजपा ने अपनी नीतियाँ बदल दी हैं- दोनों की विचारधाराएँ वही हैं, लेकिन शौरी कहीं और भटक रहे हैं।

भाजपा और संघ के विरोध से हमें कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए। अगर शौरी हमेशा से भाजपा और संघ के ख़िलाफ़ रहते तो शायद हम आज उन पर नहीं लिख रहे होते, लेकिन एक दलबदलू नेता को भी पीछे छोड़ते हुए जिस तरह उन्होंने सत्तालोलुपों के बीच अपनी जगह बनाई है- ये उन्हें अपनी प्रेरणा मानने वालों के लिए गहरा धक्का है। ये करारी चोट है पत्रकारिता में आए उन युवाओं पर, जो आपातकाल के दौरान शौरी की साहस भरी लेखनी से प्रभावित रहे हैं। वो कौन सी मज़बूरी है, जिसने ऐसे बुद्धिजीवी की सोच-शक्ति छीन कर उसे प्रशांत भूषण जैसों के साथ ला खड़ा किया!

आज हम में से कोई इतना बड़ा नहीं है जो शौरी की उपलब्धियों पर सवाल कर सके, उन्हें सिखा सके कि करना क्या है? लेकिन हाँ, अगर ख़ुद अरुण शौरी ही अरुण शौरी को बताएँ कि आप गलत हैं तो कैसा रहेगा? हमारी यही कोशिश है कि शौरी को शौरी ही आइना दिखा कर यह सूचित करें कि आप गलत जगह पर हैं, आप ऐसे लोगों के साथ हैं, जो आपकी क़द्र नहीं करते, आप ऐसे लोगों के साथ हैं जो सिर्फ़ और सिर्फ़ आपके मोदीविरोधी बयानों के कारण आपको तवज्ज़ो देते हैं, आप ऐसे लोगों के साथ हैं, जो सत्ता मिलने पर न आपकी मानेंगे न आपका कहा करेंगे।

आपके सेक्युलर एजेंडा का क्या हुआ शौरी साहब?

1997 में अरुण शौरी की एक क़िताब आई थी- ‘अ सेक्युलर एजेंडा‘। इस किताब को लिखने वाले अरुण शौरी मायावती की पार्टी के साथ मंच साझा करने वाले अरुण शौरी को ऐसा आइना दिखाने की ताकत रखते हैं, जो शायद कोई और चाह कर भी उन्हें न दिखा पाए। उस क़िताब में अरुण शौरी लिखते हैं कि हिन्दुओं की कड़ी प्रतिक्रिया सरकार के प्रो-माइनॉरिटी (Pro-Minority) रुख का एक स्वाभाविक परिणाम है। आज वाले अरुण शौरी यह नहीं मानते। वो नहीं मानते कि हिन्दुओं की प्रतिक्रिया स्वाभाविक है, क्योंकि वो तो उनके साथ बैठते हैं जो हिन्दू आतंकवाद की बातें करते हैं। किताब वाले शौरी साहब ममता के अतिथि शौरी से पूछते हैं कि अगर हिन्दुओं की प्रतिक्रिया नेचुरल है, स्वाभाविक है- जैसा कि आपने अपने किताब में लिखा है, तो फिर आप उस स्वाभाविक प्रतिक्रिया को आतंकवाद कहने वालों के साथ मंच क्यों साझा कर रहे हैं?

अपनी इस पुस्तक में शौरी साहब यूनिफार्म सिविल कोड की वकालत करते हैं लेकिन आज उन्हीं मायावती की पार्टी के साथ मंच साझा करते हैं, जो शरीयत क़ानून में किसी भी तरह की सुधार की गुंजाइश को सिरे से नकारती है। इस पुस्तक में अरुण शौरी ने बताया था कि कैसे पत्रकारों का एक सूडो-सेक्युलर (Pseudo-Secular) गैंग समाचारों को तोड़-मरोड़ कर पेश करता है, बयानों को गलत तरीके से दिखाता है और बनावटी स्टोरीज से लोगों को दिग्भ्रमित करता है ताकि हिन्दू-मुस्लिम रिश्तों को खराब कर सके। लेकिन आज शौरी साहब उसी भाषा में बात करते हैं, जिसमे सुडो-सेक्युलर गैंग बात करता है। क्यों?

सर्जिकल स्ट्राइक पर भी ख़ुद को आइना दिखा सकते हैं शौरी

अरुण शौरी ने 2008 मुंबई हमलों के बाद एक लेख लिखा था, जिसमें उन्होंने सरकार को आतंकियों के प्रति किसी भी तरह की नरमी न बरतने की सलाह दी थी। लेकिन एक दशक बाद वाले अरुण शौरी उस लेख वाले अरुण शौरी से अलग हैं। लेख वाले शौरी आतंकियों के बारे में कहते हैं:

‘एक आँख के बदले एक आँख नहीं। एक आँख के बदले दोनों आँख लो। एक दाँत के बदले एक दाँत नहीं, एक दाँत के बदले पूरा का पूरा जबड़ा उखाड़ लो।’

सितम्बर 2016 में भारतीय सेना ने यही किया। लेकिन अब ये लेख वाले शौरी नहीं थे, अब जो शौरी थे, वो सर्जिकल स्ट्राइक के विरोधी थे। अब शौरी के अनुसार भारतीय सेना का पाकिस्तान में घुसकर आतंकियों को मारना फर्ज़ीकल स्ट्राइक था। दाँत के बदले जबड़ा लाने की बात करने वाले शौरी के लिए अब भारतीय सेना का साहस फ़र्जीकल स्ट्राइक है! वो लेख वाले शौरी साहब सांसद थे। ये वाले न जाने क्या हैं! लेकिन वो लेख वाले सांसद शौरी बहादुर थे, सरकार को एक आँख के बदले दोनों आँखे लाने की सलाह देते थे। अभी वाले सर्जिकल स्ट्राइक का सबूत माँगने वाले केजरीवाल के सुर में सुर मिलते हैं।

तब मोदी की प्रशंसा, अब अंधविरोध

2014 में ET Now को दिए एक इंटरव्यू में अरुण शौरी ने नरेंद्र मोदी की प्रशंसा करते हुए कहा था कि मोदी को तानाशाह बता कर उनकी आलोचना की जाती है लेकिन ये देश के लिए बिलकुल सही है क्योंकि लोग चाहते हैं कि मोदी सत्ता में आएँ और कड़े निर्णय लें। इस इंटरव्यू में समाचार चैनल ने कहा था कि अरुण शौरी मोदी सरकार में वित्त मंत्री हो सकते हैं। क्या इंटरव्यू वाले शौरी अभी वाले शौरी से यह पूछ सकते हैं कि क्या उनको वित्त मंत्री नहीं बनाया जाना ही उनकी नाराज़गी की वज़ह है?

तो क्या यह मान लिया जाए कि यशवंत सिन्हा की तरह अरुण शौरी भी इसीलिए उल्टे-सीधे बयान दे रहे हैं क्योंकि उन्हें मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिल पाई? कभी तानाशाही को सही ठहराने वाले शौरी अब मोदी सरकार की आलोचना के लिए विकेन्द्रिकित आपातकाल का बहाना बनाते हैं। लेकिन कभी तानाशाही के पैरोकार रहे शौरी साहब को विकेन्द्रीकृत शासन (बकौल शौरी अगर ऐसा है भी तो) से किस तरह की परेशानी है?

आपातकाल ने आपको अरुण शौरी बनाया, भूल गए?

इसमें कोई शक़ नहीं कि अरुण शौरी को पत्रकारिता के क्षेत्र में जितने भी अवॉर्ड मिले हैं, जितनी भी प्रसिद्धि मिली है- वो सब आपातकाल के दौरान उनकी सरकार विरोधी लेखनी की देन है। उपर्युक्त इंटरव्यू में शौरी कहते हैं कि आज की स्थिति आपातकाल से भी बदतर है। बकौल शौरी, इंदिरा गाँधी ने क़ानून के अनुसार काम किया था और 1,75,000 लोगों को जेल में डालने के बाद भी इंदिरा गाँधी को अपनी सीमा का भान था

दिमाग काम नहीं कर रहा मेरा! क़रीब दो लाख लोगों को गिरफ़्तार करना सीमा नहीं है, तो भगवान जाने शौरी की नज़र में सीमा क्या होती है! आज की स्थिति को आपातकाल से भी बदतर बताने वाले शौरी क्या यह बता सकते हैं कि अगर 2 लाख लोगों को जेल में ठूँस देना सीमा है तो फिर मोदी सरकार ने कितनों को जेल में भेजा है? पीएम मोदी के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल करने वाले जिग्नेश, हार्दिक, अकबरुद्दीन, इरफ़ान अंसारी, मणिशंकर अय्यर तक को भाजपा सरकार जेल नहीं भेज पाई, आपातकाल ख़ाक लगाएगी!

अरुण शौरी जी, आपको 2014 से पहले वाले शौरी चीख-चीख कर कह रहे हैं कि चेत जाइए वरना जिन सत्तालोलुपों के साथ आप मंच साझा कर रहे हैं- उनका काम बन जाने पर एक दिन वही आपको दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल फेकेंगे। आप न जनाधार वाले नेता हैं न आपकी राजनीतिक दलों में पैठ है। आपके पास भले अर्थशास्त्र का ज्ञान होगा लेकिन उनका इन गिरगिटों की नज़र में न कोई मोल रहा है, और न कभी होगा। आप लाख कोशिशें कर लें, मायावती की कैबिनेट में वित्त मंत्री तो राहुल गाँधी ही बनेंगे

सामान्य वर्ग को 10% आरक्षण लाभ मामले में हिमाचल बना चौथा राज्य

हिमाचल प्रदेश सरकार ने भी सामान्य वर्ग के गरीबों को 10 प्रतिशत आरक्षण बिल को राज्य में मंजू़री दे दी है। इससे पहले गुजरात, झारखंड और उत्तर प्रदेश में इस बिल को मँजू़री मिल चुकी है। गुजरात पहला ऐसा राज्य था, जहाँ इसे म़ँजूरी मिली थी। बिल लागू होने के बाद से अब सरकारी नौकरियों और शिक्षा के क्षेत्र में सामान्य वर्ग को 10% आरक्षण का लाभ मिल सकेगा।

बिल को मिल चुकी है राष्ट्रपति की मँजू़री

संसद के दोनों सदनों में पास होने के बाद संविधान संशोधन (124वां) विधेयक, 2019 को 12 जनवरी को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने मँजू़री दे दी थी। इस संशोधन में आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग को सरकारी नौकरियों और शिक्षा क्षेत्र में 10% आरक्षण का प्रावधान है।

बिल के विरोध में खड़ी DMK पार्टी

सामान्य वर्ग के आरक्षण बिल को राष्ट्रपति से म़ँजूरी मिलने के बाद से डीएमके पार्टी इसका विरोध कर रही थी। डीएमके ने बिल पर विरोध जताते हुए इसके खिलाफ मद्रास हाई कोर्ट में याचिका दायर कर दी है। हाई कोर्ट में दायर याचिका में डीएमके ने कहा है कि आर्थिक आधार पर आरक्षण संविधान के मूल ढाँचे के ख़िलाफ़ है। पार्टी के अनुसार संविधान के हिसाब से आर्थिक रूप से कमजोर लोग आरक्षण के योग्य नहीं हैं।

21 बांग्लादेशी घुसपैठियों को भेजा गया उनके देश

असम में भारत-बांग्लादेश अंतरराष्ट्रीय सीमा पर सुतारकांडी-करीमगंज में अवैध रूप से रह रहे 21 बांग्लादेशी नागरिकों को उनके देश वापस भेजा दिया गया। इसमें दो महिलाएँ भी शामिल थीं। दो साल बाद आव्रजन जाँच चौकी से इनको कानूनी तरीके से वापस भेजा गया। बता दें कि इन्हें बिना पासपोर्ट, वीज़ा के घुसने के जुर्म में असम की बॉर्डर पुलिस ने गिरफ़्तार किया था।

बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय को सौंपे गए नागरिक

सभी 21 बांग्लादेशी नागरिकों को असम बॉर्डर पुलिस और बीएसएफ की अगुवाई में बांग्लादेश राइफल्स और बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय के अधिकारियों को सौंप दिया गया। बता दें कि आए दिन बांग्लादेशी नागरिकों के चोरी-छिपे भारतीय सीमा में घुसने का मामला सामने आता रहता है। चूँकि बांग्लादेश के गरीब और मजदूर वर्ग के लोगों के लिए भारत में आसानी से मज़दूरी करने और रोज़गार के मौके मिल जाते हैं, इसी आस में सीमा पार कर ये लोग अक्सर भारत में घुस आते हैं।

घुसपैठ के खिलाफ हो चुका है आंदोलन

बता दें कि बांग्लादेशी घुसपैठ से परेशान होकर 1979 से 1984 तक 6 साल ‘अखिल असम छात्र संघ’ ने इनके खिलाफ आंदोलन किया था। इसके बाद असम में 1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के साथ असम समझौता (असम एकॉर्ड) पर हस्ताक्षर हुआ था। इसमें असम की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक अधिकारों की रक्षा और उनके क्रियान्वन के लिए कई माँगों पर सहमति बनी थी।

भ्रष्टाचारियों का है महागठबंधन, हमारा गठबंधन सवा सौ करोड़ जनता से: PM मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आगामी लोकसभा चुनाव की तैयारियों को ध्यान में रखते हुए लगातार कार्यकर्ताओं से संपर्क बनाए हुए हैं। इसी कड़ी में उन्होंने ‘नमो ऐप’ के जरिए महाराष्ट्र और गोवा के कार्यकर्ताओं से बातचीत की। इस दौरान पीएम ने विपक्ष पर भी जमकर हमला बोला। उन्होंने कहा कि पिछली सरकारों के चलते राजनीतिक कार्यकर्ताओं को आमतौर पर दलाल समझा जाता है। हालाँकि हमारे कार्यकर्ताओं को माँ भारती के लाल के तौर पर समझा जाता है।

कोलकाता ब्रिग्रेड पर पीएम का हमला

प्रधानमंत्री मोदी ने शनिवार को कोलकाता में हुई विपक्षी पार्टियों की रैली पर तंज कसते हुए कहा कि जिस मंच से ये लोग देश और लोकतंत्र बचाने की बात कह रहे थे, उसी मंच पर एक नेता ने बोफोर्स घोटाले की याद दिला दी।

आखिर सच्चाई कैसे छुप सकती है? पीएम ने ‘लोकताँत्रिक जनता दल’ के अध्यक्ष शरद यादव के कोलकाता के उस भाषण का कोट दिया, जिसमें शरद ने कहा कि बोफोर्स की लूट, फौज का हथियार और फौज का जहाज यहाँ लाने का काम हुआ। जवान सीमा पर शहादत दे रहे हैं और डकैती डालने का काम बोफोर्स में हुआ है।

‘हमारा गठबंधन सवा सौ देशवासियों से है’

पीएम मोदी इस दौरान महागठबंधन पर जमकर निशाना साधते हुए कहा, “ये महागठबंधन एक अनोखा बंधन है। ये बंधन नामदारों का बंधन है। ये बंधन भाई-भतीजावाद का बंधन है। ये बंधन भ्रष्टाचार और घोटालों का बंधन है। ये बंधन नकारत्मकता का बंधन है।”

पीएम मोदी ने आगे कहा, “ये बंधन अस्थिरता और असमानता का बंधन है। महागठबंधन वाले वही लोग हैं, जो बिना सोचे-समझे देश के हर संवैधानिक संस्था को बदनाम करते हैं। उन्होंने एक दूसरे के साथ गठबंधन किया है। हमने सवा सौ करोड़ देशवासियों के साथ गठबंधन किया है।”

10 फीसदी आरक्षण के चुनावी बताने वालों को पीएम ने जवाब देते हुए कहा कि बताइए देश में कब चुनाव नहीं होता है? अगर इससे पहले हम ये फैसला लेते तो लोग कहते कि चुनाव के दौरान फैसला लिया गया। हमारे इस फैसले से विपक्षी दलों की नींद हराम हो गई है। इसलिए वो तरह-तरह की अफवाहें फैला रहे हैं।

‘हमारे कार्यकर्ताओं से लोगों को जुड़ाव है

पीएम मोदी ने कार्यकर्ताओं की तारीफ करते हुए कहा कि बीजेपी कार्यकर्ता चाहे नया हो या पुराना, उसे लेकर लोगों में एक अच्छा प्रभाव है, एक जुड़ाव है। लोगों को भरोसा है कि यह सुख-दुःख में काम आने वाला व्यक्ति है। देश और समाज की चिंता करने वाला व्यक्ति है।

उन्होंने कहा, “कई स्थान ऐसे थे जहाँ हमारी पार्टी की उपस्थिति बहुत कम है। लेकिन आज कई ऐसे स्थान हैं जहाँ सांसद, विधायक, कॉरपोरेटर सभी बीजेपी के ही हैं। लेकिन सभी जगह जो बात सामान्य थी वो है बीजेपी कार्यकर्ताओं का जज़्बा, ईमानदारी, मेहनत और मज़बूती के साथ खड़े रहने की ताक़त।”

कर्नाटक में कॉन्ग्रेस के 2 MLA भिड़े, सिर पर मारी बोतल

कॉन्ग्रेस के अंदरुनी खेमें से खटपट की ख़बरें आए दिन उजागर होती रहती हैं। इससे पार्टी की बिगड़ती छवि तो दिखती ही है, साथ में पार्टी के अंदर फैला गहरा असंतोष भी जगज़ाहिर होता है। कर्नाटक में कॉन्ग्रेस के दो विधायक किसी बात को लेकर आपस में न सिर्फ़ भिड़ गए बल्कि बात हाथापाई की नौबत तक आ गई।

बेंगलुरू के जिस होटल में कॉन्ग्रेसी विधायक आनंद सिंह और जेएन गणेश ठहरे हुए थे, वहीं यह झड़प हुई। किसी बात को लेकर दोनों में आपसी विवाद इतना बढ़ गया कि जेएन गणेश ने आनंद सिंह के सिर पर बोतल से वार कर दिया। घायल स्थिति में उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया।

कर्नाटक के डिप्टी सीएम जी परमेश्वर ने कहा कि दोनों विधायकों के बीच हुई लड़ाई की जानकारी उन्हें मीडिया के ज़रिए मिली है। आपसी विवाद के बारे में उन्हें पार्टी से अब तक कोई जानकारी नहीं मिली है। जैसे ही कोई जानकारी मिलेगी, वो साझा करेंगे।

बीजेपी ने इस हाथापाई पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि कॉन्ग्रेस के भीतरी खेमे में कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है। इसके लिए किसी और प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। रिजॉर्ट में हुई आपसी भिड़ंत के चलते एक कॉन्ग्रेसी विधायक अस्पताल में भर्ती है। इसके अलावा बीजेपी ने घायल विधायक आनंद सिंह के जल्दी ठीक होने की कामना भी की।

बीजेपी ने कहा कि यह बड़े दुर्भाग्य की बात है कि केरल प्रदेश कॉन्ग्रेस कमेटी (KPCC) के प्रमुख भी इस लड़ाई को रोकने में असमर्थ थे। दिनेश गुंडू राव (Dinesh Gundu Rao) अब बीजेपी पर दोष नहीं मढ़ सकते, क्योंकि रिजॉर्ट में जो हुआ वो किसी की नज़र से दूर नहीं है।

माखनलाल यूनिवर्सिटी की जाँच समिति के गठन पर ख़ुद घिरी कॉन्ग्रेस

मध्य प्रदेश में कॉन्ग्रेस को सत्ता पर आसीन हुए अभी जुम्मा-जुम्मा कुछ ही दिन हुए हैं और पार्टी ने अपना असली रंग दिखाना शुरू कर दिया है। अभी-अभी सत्ता पर विराजमान हुई कमलनाथ सरकार ने आईएएस अधिकारी पी नरहरी को माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में नियुक्त किया।

कुलपति बनाए गए पी नरहरी कॉन्ग्रेस द्वारा संचालित राजीव गाँधी फाउंडेशन का प्रचार अपने सोशल मीडिया से कर चुके हैं। राजीव गाँधी फाउंडेशन जैसे गैर-सरकारी तंत्र का प्रचार करने वाले को एकाएक कुलपति नियुक्त करना किस हद तक न्यायोचित है? क्या उनकी सबसे बड़ी क़ाबिलियत फाउंडेशन का प्रचार करना है या फिर इसके पीछे कॉन्ग्रेस की राज्य सरकार की कुछ और ही मंशा छिपी हुई है?

अभी हाल ही में माखनलाल विश्वविद्यालय को लेकर मध्य प्रदेश सरकार द्वारा एक जाँच समिति का गठन किया गया है। इसके अध्यक्ष के रूप में एक आईएएस अधिकारी एम गोपाल रेड्डी को नियुक्त किया गया है। एम गोपाल रेड्डी की छवि भी बेदाग नहीं है। यह वही रेड्डी हैं, जिनके ख़िलाफ़ सेवा के दौरान भ्रष्टाचार समेत तमाम आरोप लगे थे। इनके ख़िलाफ़ जालसाज़ी जैसे गंभीर मामले भी दर्ज़ हुए थे। भ्रष्टाचार मामलों में आरोपित रेड्डी को अध्यक्ष बनाना कितना न्यायसंगत है, इसे समझना किसी के लिए कोई मुश्किल काम नहीं है। साथ ही यह कॉन्ग्रेस की मंशा को भी स्पष्ट करता है।

आपको बता दें कि माखनलाल विश्वविद्यालय की स्थापना मध्य प्रदेश सरकार द्वारा पारित अधिनियम से हुई थी। भारत के उपराष्ट्रपति इसके विजिटर हैं। ऐसे में ताज्जुब की बात है कि इस जाँच समिति का गठन उपराष्ट्रपति को जानकारी दिए बिना ही हो गया। कॉन्ग्रेस का यह एक-तरफा निर्णय उसके तानाशाही स्वभाव को व्यक्त करता है।

इस पूरे मामले की तह तक जाने पर कॉन्ग्रेस की भ्रष्ट सोच सामने आती है। क्योंकि सवाल अब यह है कि कॉन्ग्रेस 2003 के बाद की ही नियुक्तियों की जाँच अपने दागी अधिकारियों से क्यों करवाने पर तुली है? क्या इसके पीछे कोई राजनीतिक साज़िश या खेल है, जिसे कॉन्ग्रेस किसी प्रायोजित तरीक़े से अंजाम देने की कोशिश कर रही है? और यह मान भी लिया जाए कि कॉन्ग्रेस जाँच करा ही रही है, तो फिर उसके लिए साल 2003 ही क्यों निर्धारित किया गया?

विश्वविद्यालय की नींव 1991 में रखी गई थी। उसके बाद तो कॉन्ग्रेस ने ही वहाँ वर्षों तक एकछत्र राज किया था। तब क्या कॉन्ग्रेस गहरी नींद में सोई हुई थी या इतनी आश्वस्त थी कि उसके शासनकाल में कोई गड़बड़ी ही नहीं हुई! उस समय दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री थे। सवाल यह है कि जाँच करने पर अमादा कॉन्ग्रेस, विश्वविद्यालय की स्थापना के समय से ही जाँच क्यों नहीं कर रही है। क्या कॉन्ग्रेस इस बात से डरी हुई है कि अगर जाँच शुरुआत से हुई तो कहीं उनके काले-चिट्ठे सामने ना आ जाएँ?

Subtitle – मध्य प्रदेश की सरकार 2003 के बाद की नियुक्तियों की जाँच अपने दागी अधिकारियों से क्यों करवाने पर तुली है? इसके पीछे कोई साज़िश या खेल है जिसे कॉन्ग्रेस प्रयोजित तरीक़े से अंजाम तक ले जाने की कोशिश में है
Excerpt – एक भगोड़े और मनी लॉन्ड्रिंग के दोषी ज़ाकिर नइक से कॉन्ग्रेस की इतनी गहरी दोस्ती की आख़िर क्या वजह हो सकती है

बजट को समझना-बूझना है तो इन 32 शब्दों को ठीक से जान लें

संसद का बजट सत्र 31 जनवरी से 13 फरवरी तक आयोजित किया जाएगा। हालाँकि संसद के कामकाज को देखते हुए इसे बढ़ाया भी जा सकता है। 31 जनवरी को राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद के लोकसभा और राज्यसभा के संयुक्त बैठक संबोधन के साथ बजट सत्र शुरू किया जाएगा।

वित्त मंत्री बजट दिवस पर खर्च, राजस्व, घाटा ऋण आदि सहित सरकार के वित्त का एक व्यापक विवरण प्रस्तुत करते हैं। लेकिन बजट के दस्तावेजों को समझने के लिए उसमें प्रयुक्त होने वाली शब्दावली को समझना बेहद ज़रूरी है। आइए आपको दस्तावेजों और शब्दावली के बारे में बताते हैं।

सकल आर्थिक डेटा (Aggregate Economic Data): यह देश में हुए कुल व्यय और संपूर्ण अर्थव्यवस्था से संबंधित वस्तुओं और सेवाओं के कुल उत्पादन की व्याख्या करता है।

वार्षिक वित्तीय विवरण (Annual Financial Statement): यह वित्तीय विवरण अनुच्छेद 112 पर आधारित होता है। इसमें आने वाले साल और पिछले वर्ष हुए खर्चे के बारे में बताया जाता है।

विनियोग विधेयक (Appropriation Bill): अनुच्छेद 114(3) के अंतर्गत संसद की ओर से कोई भी कानून बनाए बिना संचित निधि से पैसे नहीं निकाले जा सकते। यह एक दस्तावेज है, जो सरकार को अपने वार्षिक खर्चों को पूरा करने के लिए संचित निधि से धन निकालने का अधिकार देता है।

संतुलित बजट (Balanced Budget): ऐसा बजट जिसमें सार्वजनिक व्यय और कुल राजस्‍व प्राप्तियाँ बराबर हों। इसका मतलब न तो कोई घाटा है और न ही कोई अधिशेष।

बजट एक नज़र में (Budget at a Glance): यह एक दस्तावेज है, जो कर राजस्व, खर्च और अन्य प्राप्तियों व विवरणों का संक्षिप्त ब्यौरा दिखाता है।

बजट चक्र (Budget Cycle ): इसमें बजट के बारे में निर्णय लेने और उन निर्णयों को लागू करने की बात होती है। यह आमतौर पर चार चरण का होता है – बजट तैयार करना, अधिनियमित करना, निष्पादन लेखा परीक्षण और मूल्यांकन।

बजटीय कमी (Budgetary Deficit): यह सरकार के राजस्व और पूंजी खाते दोनों में सभी प्राप्तियों और खर्चों के बीच का अंतर है।

भुगतान संतुलन (Balance of Payments): इस शब्द का उपयोग किसी अवधि में देश के बाहर और देश के भीतर भुगतान के बीच कुल अंतर को दर्शाने के लिए किया जाता है।

केंद्रीय योजना परिव्यय (Central Plan Outlay): यह अर्थव्यवस्था में विभिन्न क्षेत्रों और सरकार के मंत्रालयों के बीच मौद्रिक संसाधनों का विभाजन है।

समेकित बजट (Consolidated Budget): इसमें सभी स्रोतों से प्राप्त राजस्व और सभी गतिविधियों के लिए खर्च का विवरण शामिल होता है।

ऋण (Debt): सरकारी ऋण वह बकाया राशि है, जो निजी कर्जदाताओं को तय समय पर सरकार देने के लिए बाध्य होती है।

विनिवेश (Disinvestment): विनिवेश प्रकिया में निवेश का उल्टा होता है। निवेश यानी किसी कारोबार में, किसी संस्था में, किसी परियोजना में रकम लगाना और विनिवेश यानी किसी चीज या संस्था को बेचकर उस रकम को वापस निकालना।

व्यय बजट (Expenditure Budget): यह विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के राजस्व और पूँजी के खर्च को दर्शाता है और ‘योजना’ तथा ‘गैर-योजना’ के तहत प्रत्येक के संबंध में अनुमान प्रस्तुत करता है।

अतिरिक्त-बजटीय (Extra-governmental): ये बजट में शामिल न होने वाले सरकारी लेनदेन को संदर्भित करता है।

वित्त विधेयक (Finance Bill): बजट में प्रस्तावित नए कर लगाने, कर प्रस्तावों में परिवर्तन या मौजूदा कर ढाँचे को जारी रखने के लिए संसद में प्रस्तुत विधेयक को वित्त विधेयक कहते हैं।

राजकोषीय नीति रणनीति विवरण (Fiscal Policy Strategy Statement): यह कराधान, खर्च, उधार, निवेश, प्रशासित मूल्य निर्धारण और गारंटी से संबंधित सरकार की रणनीतिक प्राथमिकताओं को दर्शाता है।

राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit): यह सरकार के कुल खर्च और उसकी प्राप्तियों तथा गैर-ऋण पूँजी प्राप्तियों के बीच का अंतर होता है। आय और खर्च के अंतर को दूर करने के लिए हर साल सरकार की ओर से लिया जाने वाला अतिरिक्त कर्ज राजकोषीय घाटा कहलाता है।

राजकोषीय नीति (Fiscal Policy): राजकोषीय नीति वह नीति है, जिसमें सरकार अपने व्यय तथा आय के कार्यक्रम को राष्ट्रीय आय, उत्पादन तथा रोजगार पर वांछित प्रभाव डालने और अवांछित प्रभावों को रोकने के लिए प्रयुक्त करती है।

वित्तीय वर्ष (Fiscal Year): वित्तीय वर्ष सरकार द्वारा लेखाँकन और बजट उद्देश्यों के लिए उपयोग की जाने वाली अवधि है।

सकल घरेलू उत्पाद (Gross Domestic Product): एक वर्ष के दौरान देश में उत्पादित अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का कुल मूल्य है। इसमें बदलाव के आधार पर देश के आर्थिक विकास को मापा जाता है।

आयकर (Income Tax): यह प्रत्येक व्यक्ति की आय पर भारत सरकार द्वारा लगाया जाने वाला एक कर है। आयकर सरकारों के क्षेत्राधिकार के भीतर स्थित सभी संस्थाओं/व्यक्ति द्वारा उत्पन्न वित्तीय आय पर लागू होता है।

मुद्रास्फीति (Inflation): मुद्रास्फीति वस्तुओं और सेवाओं की सामान्य कीमत में वृद्धि है। मुद्रास्फीति को मुद्रा की क्रय शक्ति में गिरावट के रूप में भी परिभाषित किया जा सकता है।

संयुक्त खाता (Joint Account): एक ऐसा खाता, जो दो से अधिक विभाग/संस्था/लोग से संबंधित हो।

मैक्रो-इकोनॉमिक (Macro-Economic): इसमें अर्थशास्त्र में समस्त आर्थिक क्रियाओं का संपूर्ण रूप से अध्ययन किया जाता है। जैसे राष्ट्रीय आय, उत्पादन, रोजगार/बेरोजगारी, व्यापार चक्र, मुद्रा संकुचन, आर्थिक विकास, अंर्तराष्ट्रीय व्यापार, जैसी आर्थिक क्रियाएँ।

माइक्रो-इकोनॉमिक (Micro-Economic): यह शब्द अर्थशास्त्र के उस भाग से संबंधित है, जो व्यक्तिगत बाजारों, कीमतों, उद्योगों, मांग और आपूर्ति जैसे विषयों का अध्ययन करता है।

गैर-योजना व्यय (Non-plan expenditure): सरकार की कर्ज़ अदायगी, पेंशन भुगतान, राज्यों को किया जाने वाला वैधानिक अन्तरण, सुरक्षा, विदेशी मामलों, नोट-सिक्के बनाने, पूर्व निर्मित परिसम्पत्तियों का रख-रखाव, सामाजिक सुविधाओं को पूर्ववत रखने आदि पर किया जाने वाला व्यय ही गैर योजनागत व्यय है।

आउटकम बजट (Outcome Budget): इसका उद्देश्य जिम्मेदारी तय करना है। यानी किसी विभाग या मंत्रालय को आवंटित बजट और उससे निर्धारित व प्राप्त लक्ष्यों का लेखा-जोखा। इससे पता चलता है कि सरकार या कौन विभाग बजटीय अपेक्षाओं पर कितना खरा उतर रहा है।

योजना व्यय (Plan Expenditure): केंद्र सरकार कुल व्यय का एक महत्वपूर्ण अनुपात बनाती है। योजनागत व्यय विभिन्न मंत्रालयों और योजना आयोग द्वारा मिल कर बनाया जाता है। इसमें मोटे तौर पर वे सभी व्यय आते हैं, जो विभिन्न विभागों द्वारा चलाई जा रही योजनाओं पर किया जाता है।

राजस्व (Revenue): सरकार द्वारा अपनी संप्रभु शक्तियों के तहत एकत्रित की गई वार्षिक आय ही राजस्व है।

कर राजस्व (Tax revenue): कोई सरकार टैक्स लगा कर जो रेवेन्यू हासिल करती है, उसे टैक्स रेवेन्यू कहा जाता है। सरकार विभिन्न प्रकार के टैक्स लगाती है। यह सरकार की आय का प्राथमिक और प्रमुख स्रोत है।

मूल्य वर्धित कर (Value-Added Tax): कोई भी उत्पाद विभिन्न चरणों से होकर अंतिम उत्पाद के तौर पर मार्केट में पहुँचता है। ऐसे में उत्पाद के प्रथम चरण की लागत और अंतिम चरण की कीमत पर ही टैक्स लगाया जाता है। VAT से कमोडिटी टैक्स में पारदर्शिता आती है।

शून्य-आधारित बजट (Zero-based budgeting): इसके तहत किसी विभाग या संगठन द्वारा प्रस्तावित खर्च की हर मद को बिलकुल नई मद मानकार या उसका आधार शून्य मानते हुए फिर से मूल्याँकन किया जाता है।

पिया वही जो दुल्हन मन भाए

एक ऐसी बारात की कल्पना कीजिए जिसमें दूल्हा ना हो, दूल्हे के स्थान पर एक आश्वासन हो कि आप बस हाँ कीजिए, हम बढ़िया वाला ला कर देंगे। क्या दूल्हा पढ़ा लिखा, ईमानदार, नौकरीपेशा, पाँच अंकों में, सुंदर, सुशील, कॉन्वेंट एजुकेटेड और गृह कार्य में दक्ष है? उत्तर यह प्राप्त होता कि आप ब्याह तो कराएँ, दूल्हे के विषय में पता चलते ही सूचित किया जाएगा।

बिहार में नब्बे के दशक में पकड़ौआ विवाह की चर्चा हुई थी, आज हम बुझौआ विवाह की बात कर रहे हैं, जिसमें सुगढ़ वधू की भाँति मँडप में स्वप्न लिए बैठी कन्या को तो हम जानते हैं किंतु वर “बूझो तो जानें” “फास्टेस्ट एंड वाइलडेस्ट फ़िंगर फर्स्ट” तथा “बिग बॉस” विधि के द्वारा तय किया जाएगा। मुद्दा सिर्फ़ यह है कि सर्वप्रथम विजातीय विधर्मी प्रेम में पड़ी कन्या को प्रेमपाश से मुक्त किया जाए, फिर किसी के भी गले में डाल दिया जाए।

अब इस पारिवारिक सी भान होने वाली समस्या को राष्ट्रीय राजनीति के पटल पर प्रक्षेपित करें और कल बंगाल में हुए विपक्षी सम्मेलन के परिपेक्ष्य में देखें। इस महासम्मेलन का मूलभाव संदेश जनता को यह था कि गोलमाल के भवानीशंकर के शब्दों में कहें तो- तुम्हारा विवाह उससे नहीं होगा जिससे तुम प्रेम करती हो, तुम्हारा विवाह उससे होगा जिससे मैं, यानी विपक्ष, प्रेम करता है। और ये भवानीशंकर से भी अधिक चंठ है कि जहाँ भवानीशंकर रामप्रसाद की ओर इंगित करते थे, यह रामसे के चलचित्र की भाँति दर्शक को सोच में छोड़ देते हैं कि क्या दस जनपथ की पुरानी हवेली का बूढ़ा चौकीदार ही प्रेत है जिससे कालांतर में अबोध कन्या के विवाह की प्रस्ताव है?

23 दलों के श्राद्धभोजन समान दिखने वाली सभा के सस्पेंस के मूल में निर्दोष दिशाहीनता नहीं है, बल्कि एक कुटिल गणित है। इसके मूल में संविधान-संगत सर्वोच्च प्रधानमंत्री पद के प्रति और मतदाता के विवेक के प्रति ठेठ निरादर का भाव है। इनका ध्येय वही सोनिया गाँधी और एनजीओ मंडल (यही वह अंडा था जिससे चुनाव दर चुनाव अंडे देने वाली मुर्गी का जन्म हुआ था) वाला मॉडल है, जिसमें प्रधानमंत्री का महत्व फ़ाइलों पर पार्टी अध्यक्ष द्वारा क्लीयर की गई फ़ाइलों पर तितली बिठाने से अधिक नहीं है। इस मॉडल में प्रधानमंत्री की जवाबदेही जनता के प्रति नहीं पार्टी अध्यक्ष के प्रति होती है, क्योंकि वह निर्वाचित ना होकर चयनित प्रधानमंत्री होता है।

मज़े की बात यह है कि जो लोग संविधान को लेकर सबसे अधिक चिंतित होते है, उन्हें इस पर चिंता नहीं होती है कि संविधान में क्या परिभाषित है, पर वह इस पर त्योहार मना रहे हैं कि विपक्ष उस के आधार पर राजनीति बना रहा है जो परिभाषित नही है। कर्नाटक में मुख्यमंत्री के रूप में सरकारी भाषा में कहे तो लोअर डिविज़न क्लर्क बिठाने के बाद विपक्ष अब केंद्र में प्रधानमंत्री के रूप में अपर डिविज़न क्लर्क नियुक्त करना चाहता है। इसका कारण सिर्फ़ यह नहीं है कि विपक्ष अपने इतिहास और वर्तमान के प्रकाश में नरेंद्र मोदी के समक्ष खड़ा करने के लिए समकक्ष नेता नही ढूँढ पा रहा है जो कि सर्वमान्य हो क्योंकि यह संगठन महात्वकांक्षा प्रचुर है। इसका कारण यह है कि यह ऐसे दलो का गठबंधन है जो राष्ट्रीय आकांक्षाओं से इतर छोटे समूहों के छोटे स्वार्थों के ऊपर खड़ा है।

इस स्वार्थ पर आधारित समूह के अपने सिद्धांत एक दूसरे को काटते हैं। जैसे तृणमूल कॉन्ग्रेस का बंगालीवाद राष्ट्रीय भाव के विरूद्ध है मानो सारा भारत (जिसमें तमिलनाडु, महाराष्ट्र और कर्नाटक भी है) उसे लीलने आ रहा है; वहीं तमिलनाडु का डीएमके शेष भारत को शत्रु बता कर स्वार्थ सिद्ध करता है।

मायावती अपने उस वोट बैंक पर निर्भर है जो तिलक तराजू और तलवार को जूते चार मारने की इच्छा रखती है विकास और शिक्षा की नहीं, तेजस्वी यादव का दल भूरा बाल (भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण, लाला) साफ़ करना चाहता है। इनके छोटे-छोटे गिरोहों का स्वार्थ दूसरे गिरोहों के विनाश पर अधिक और अपने विकास पर कम आधारित होता है। सो इनके लिए अपने सीमित वोटबैंक के पास जा कर गठबंधन के लिए मत माँगना कठिन है क्योंकि जहाँ उसमें भारत विरोधी नेशनल कॉन्फ्रेंस है, यादव विरोधी मायावती हैं, मायावती विरोधी अखिलेश हैं, उत्तर विरोधी दक्षिण में सीमित डीएमके है, उत्तर भारत तक सीमित दल राजद- बसपा -सपा हैं, आरक्षण विरोधी हार्दिक है, आरक्षण समर्थक जिग्नेश मेवानी हैं, कॉन्ग्रेस विरोधी केजरीवाल है, और स्वयं कॉन्ग्रेस है। कुल मिला कर यह गठबंधन ऐसे विरोधाभासों से भरा है कि इसे चुनाव पूर्व स्थापित कर के वोट बैंक के पास जाने से स्वार्थ-सम्मत वोट बैंक छितर जाने का भय इन घाघ राजनेताओं को भी है।

अत: नेतृत्वविहीन और नीतिविहीन हो कर मतदाता के पास जाना इनकी अपरिहार्य नियति है। एक भ्रामक संरचना और संवाद इस गठबंधन की सोची-समझी साज़िश है कि कोई कल को चेन्नई में स्तालिन से ना पूछे कि क्या हिंदीभाषी अखिलेश हमें निगल जाएगा, कोलकाता के हिंदू ममता से यह ना पूछें कि क्या फ़ारूख अब्दुल्ला कश्मीरी पंडित मॉडल बंगाल में लागू कर के आज़ादी दिलाएँगे, दिल्ली में केजरीवाल से यह प्रश्न ना पूछा जाए कि कॉन्ग्रेसियों के भ्रष्टाचार की बहुप्रचारित 370 पन्ने की किताब में क्या अगला नाम स्वयं उनके हैं। यह कुटिल राजनीति है। प्रत्येक दल की अपनी राजनैतिक महत्वकांक्षा अलग समस्या है।

कुल मिला कर यह गठबंधन मतदाताओं को मोदी के विरोध में मत डालने को कहता है किंतु यह नहीं बताता कि मत किसके पक्ष में डालना है। यह वो बारात है जिसका हर बाराती स्वयं को दूल्हा मान कर आया है ताकि वधू प्रेमी को प्रेमपाश से मुक्त किया जा सके और वधू दूल्हों की भीड़ में जयमाल थामें किंकर्तव्यविमूढ़ सी खड़ी है।

कौन बनेगा PM और कैबिनेट में होगा कौन… चुनने का आख़िरी मौक़ा सिर्फ़ यहाँ!

तारीख़ – 27 मई
साल – 2019
दिन – सोमवार

पंचांग देखेंगे तो तो इस दिन में अशुभ काल शुभ समय पर भारी है। लेकिन सोमवार तो भोलेनाथ का दिन है। और बंदा ठहरा महाकाल का भक्त – एकदम औघड़। कसौल वाली हाई क्वॉलिटी माल का अखण्ड धुआँ छोड़ते हुए चिल्लाया – ‘अकाल मृत्यु वो मरे जो काम करे चांडाल का, काल उसका क्या करे जो भक्त हो महाकाल का।’

औघड़ कौन? वही, जिसने महागठबंधन को बाँध कर रखने वाली बूटी दी। जो अलीगढ़ के वशीकरण और #@$करणी वाले बाबाओं का बाबा है। हाँ, हाँ… भगंदर-फिशर शाही दवाखाना वाला! अब इनकी बूटी तो काम आनी ही थी। सो आ गई।

चारों ओर जीत का शंखनाद फूँका जा रहा है। देश को ‘संघी-सांप्रदायिक’ ताक़तों से छुटकारा मिल गया है। समाजवाद-लालवाद-बेटावाद-दाढ़ीवाद से लेकर दीदी-बुआवाद सब मिलकर अब माल-वाद की मलाई खाएँगे।

लेकिन कौन कितना खाएगा? इस समस्या के समाधान के लिए 48 साल के चिर-युवा नेता राहुल गाँधी जी ने ऑपइंडिया को अपना पार्टनर चुना है। वो क्या है कि उनका शक्ति ऐप छोटा भीम लेकर भाग गया है। ख़ैर! हम उनको देंगे समाधान, लेकिन माध्यम होंगे आप। क्योंकि राहुल जी को ‘लोकतंत्र’ में है विश्वास! और कैबिनेट भी वो ‘लोकतांत्रिक’ तरीके से ही चुनेंगे। तो शुरू करते हैं पहले सवाल से…


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अब ज़रा इनके प्रोफ़ाइल को भी देख लें। देश वाली बात है, ग़लती की कोई गुंजाइश नहीं।

राहुल गाँधी – ‘गिनीज़ बुक’ में दर्ज़ महाकाल के सबसे असली वाले भक्त। कैलाश पर्वत को 2 दिन में नाप देने वाला ‘पैर’बली। पिछत्तीस से एक ज़्यादा राज्य के अकेले राजकुमार। PM जैसा देखने में लगने वाला अखण्ड भारत का अकेला चेहरा।

ममता बनर्जी – माँ, माटी, मानुष को लाल सलाम से ‘मुक्ति’ दिलाने वाली क्रांति की मसीहा। यह अगर राजनीति में नहीं आतीं तो वेस्ट बंगाल में कुछ भी ‘बेस्ट’ नहीं होता। दुर्गा पूजा पंडालों पर इनके काम को देखकर यूनाइटेड नेशन्स ने इन्हें ‘धरोहर’ की संज्ञा दी है।

मायावती – हाथियों का कष्ट इनसे देखा नहीं जाता। जंगल में उन्हें ठंड न लगे, इस कारण से उनके लिए पार्क बनवा दिया। अब सब हाथी बड़े मज़े में वहाँ खड़े रहते हैं। अपने जन्मदिन पर खुद केक न खाकर भूखे-नंगों को खिलाने की वज़ह से यह कलियुग की ‘लेडी कर्ण’ हैं।

अखिलेश – युवा हैं। लोग इन्हें प्यार से भैया कहते हैं। और डिंपल जी को ‘भाभी’। डिंपल जी इनकी धर्मपत्नी हैं। अपने पिताजी की ‘असाध्य सेवा’ करने के कारण राजनीति के गलियारों में इन्हें श्रवण कुमार कहा जाने लगा है।


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एमके स्टालिन – नाम से ही भारी-भरकम लगते हैं। दुश्मन देश पहले से ही डर जाएगा। भ्रष्टाचार इनके परिवार को ‘छू’ तक नहीं पाया है।

फ़ारुक़ अब्दुल्ला – सीमांत प्रदेश से आते हैं। मतलब भारत की रक्षा करना इनके ख़ून में है। जम्मू-कश्मीर अगर आज ‘स्वर्ग’ है, तो इनके परिवार की ही बदौलत।

शत्रुघ्न सिन्हा – ख़ैर… इनका तो नाम ही शॉटगन है। अपने-आप में रक्षा-सुरक्षा कवच। इनका ‘ख़ामोश’ बोलना और बॉर्डर का सिक्यॉर होना – आधुनिक हिन्दी व्याकरण में पर्यायवाची के तौर पर संकलित कर लिया गया है।


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जयंत चौधरी – लंदन स्कूल ऑफ़ इकॉनमिक्स से पढ़े हैं। लेकिन ‘बात’ खेती-किसानी की करते हैं। इनके पापा अजित सिंह भी खुद को ‘किसानों’ का ही नेता मानते हैं।

शरद पवार – बाप रे! हम-आप जो चीनी खाते-पीते हैं, वो इनकी ही देन है। जैसे हम माँ का कर्ज़, दूध का कर्ज़ नहीं चुका सकते, ठीक उसी तरह पवार साब की ‘चीनी का कर्ज़’ शायद ही कभी चुकाया जा सके।

एचडी देवगौड़ा – अब ये तो पीएम भी रह चुके हैं – 325 दिन तक। किसान-पुत्र हैं। फ़िलहाल बेटे के ग़म में डूबे रहते हैं। सुना है इनका बेटा ‘क्लर्क’ है।


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तेजस्वी यादव – अखण्ड भारत के इतिहास में सबसे ‘ऊँची 9वीं कक्षा’ तक शिक्षा ग्रहण की। मतलब ये जहाँ खड़े होते हैं, शिक्षा वहीं से शुरू होती है। इनके पप्पा का नाम लालू यादव है। विपक्ष की ‘साज़िश’ के कारण जेल में हैं। वैसे शोले वाली मौसी बता के गईं हैं कि सीधे आदमी हैं।

हार्दिक पटेल – युवा दिलों की धड़कन हैं। शिक्षा के साथ-साथ विद्यार्थियों से इतना लगाव कि दो बार में ग्रैजुएशन पास किया। नंबर 50 फ़ीसदी से कम ही आए, लेकिन वो विपक्ष की ‘साज़िश’ थी।

हेमंत सोरेन – भारत के सबसे यंग मुख्यमंत्री का रिकॉर्ड रखते हैं… और क्या चाहिए भाई! वैसे इंटरमीडिएट तक पढ़े हैं। उसके बाद पूरी जवानी ‘राज्य-हित’ में झोंक दी।


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शशि थरूर – इनके बाल बहुत सिल्की हैं। फांय-फांय अंग्रेज़ी बोलते हैं। मतलब महिलाओं को अच्छे लगते हैं। और हाँ… महिलाओं का कल्याण तो छोड़िए, उन्हें मोक्ष दिलाने को ये किसी भी ‘हद’ तक चले जाते हैं।

ममता बनर्जी और मायावती के प्रोफ़ाइल को दोबारा पढ़ने की हिम्मत रखने वाले ‘वीर’ कृपया ऊपर जाकर पढ़ें।


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(Error-404… के कारण सभी विकल्प राहुल गाँधी को ही दिखा रहा है। वित्त का प्रभार सिर्फ़ गाँधी फैमिली के पास हो, कम्प्यूटर जी ऐसी मंशा नहीं है।)

PS: सभी प्रश्नों में राहुल गाँधी जी को विकल्प के तौर पर रखने का मक़सद उस पद की गरिमा को कम आँकना नहीं है बल्कि यह दर्शाता है कि गाँधी की जेनेटिक्स के कारण उनमें वो सभी गुण हैं, जो किसी भी पद के लिए फिट है। मतलब गाँधी से पद है, पद से गाँधी नहीं।

आख़िर क्या कारण है कि ‘लेफ़्ट’ इतना बलवान और ‘राइट’ इतना कमज़ोर?

एक राइट विंग मीडिया में काम करते समय मैं नियमित रूप से ‘ऑप इंडिया’ की पाठक हुआ करती थी और आज भी हूँ। “राइट” के संपर्क में आने के बाद मुझे धीरे-धीरे लेफ़्ट और राइट विंग मीडिया के बीच अंतर का आभास भी हुआ। पत्रकारिता में डिग्री पाते समय हमें इतना ज्ञान नहीं था कि देश की पत्रकारिता इस हद तक गिर चुकी होगी। हमें लगता था कि पत्रकारिता से हम समाज को बदल सकते हैं। हमारे कलम में तलवार से भी ज़्यादा ताक़त है और हम बिना रक्त बहाए बदलाव लाएँगे।

संविधान के चार अंगों में से एक अंग है पत्रकारिता। हम इस अंग पर आँख मूंद कर विश्वास किया करते थे। हमें यह पता ही नहीं चला कि जिस तरह वामपंथियों ने देश की शिक्षा व्यवस्था की जड़ों को ही खोखला कर दिया है, उसी प्रकार पत्रकारिता को भी खोखला कर दिया होगा। पत्रकारिता अपनी विश्वसनीयता खोती जा रही थी। समझ नहीं आ रहा था कि ऐसा क्यों? क्यों मीडिया में सत्य से परे एक तरफ़ा समाचार दिखाया जा रहा था? क्यों देश विरोधी अजेंडा चलाया जा रहा था?

पिछले एक वर्ष में मुझे मेरे सारे सवालों का जवाब मिल गया है। केवल भारत में ही नहीं अपितु समूचे विश्व में लेफ़्ट और राइट के बीच में संघर्ष चल रहा है। अपने झूठ के जंजाल और उसके माध्यम से वामपंथी विचारधारा लोगों के मस्तिष्क में घर कर चुकी है। चार साल पहले भारत में राइट विंग का अस्तित्व ना के बराबर था। आज ऐसा नहीं है। राइट विंग मीडिया देश में अपना अस्तित्व क़ायम कर चुका है। पत्रकारिता को बेचने वाले वामपंथियों के झूठ से त्रस्त होकर लोग अब राइट की ओर रुख़ कर रहे हैं। यह और बात है कि सत्य के साथ खड़े होने के कारण राइट विंग को बड़ी कठिनाइयों का सामना भी करना पड़ रहा है। लेकिन बिना संघर्ष के सफलता प्राप्त भी कहाँ होती!

पिछले एक साल में राइट विंग के लिए काम करते समय एक बात मैंने जाना कि लेफ़्ट बहुत बलवान है और राइट बहुत कमज़ोर। लेफ़्ट इसलिए बलवान नहीं है कि उसके पास पैसा है। लेफ़्ट इसलिए भी बलवान नहीं है कि उसके पीछे विदेशी ताकते हैं। बल्कि लेफ़्ट इसलिए बलवान है क्योंकि उनमें एकता है। जैसे मुहल्ले के सारे कुत्ते एक साथ, एक सुर में भौंक कर अपने विरोधी को भगाते हैं, उसी प्रकार ये सारे वामपंथी विचारधारा वाले एक साथ, एक ही सुर में गाते हैं। आपसी मतभेद को वो जगज़ाहिर नहीं करते। बल्कि एक साथ वे अपने विरोधियों पर टूट पड़ते हैं और विरोधियों को कमज़ोर करते हैं।

हम हज़ारों वर्ष पूर्व जैसे थे, आज भी वैसे ही हैं। राइट वाले आपस में ही लड़ते हैं। हमें यह आभास ही नहीं है कि जब मुट्ठी बंद होती है, तभी शत्रु के मुँह पर मुक्का मारा जा सकता है। राइट विंग मीडिया भी कुछ ऐसे ही बिखरा हुआ है। लेफ़्ट की तरह ‘कोरस’ में गाना हमें नहीं आता, इसलिए हमारी आवाज़ लोगों के कानों के परदे फाड़ने में असमर्थ रहती है। जब तक राइट विंग मीडिया एक ‘सुर में गाने’ का अभ्यास नहीं करेगी, तब तक राइट की आवाज़ लोगों तक नहीं पहुँचेगी। हम सभी जानते हैं कि ‘एकता में बल है’… पर अफ़सोस, कभी एकता दिखाते नहीं हैं! अब शायद वक़्त आ गया है!