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₹20 लाख से ₹40 लाख की गई GST छूट की सीमा, छोटे व्यापारियों को मिली बड़ी राहत

छोटे व्यापारियों को ध्यान में रखते हुए, केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने गुरुवार (जनवरी 10, 2019) को कहा कि जीएसटी (वस्तु एवं सेवा कर) परिषद ने कॉम्पोज़िशन स्कीम के लिए वार्षिक टर्नओवर की छूट सीमा दोगुनी कर दी है। निश्चित तौर पर वित्त मंत्री का यह क़दम छोटे व्यापारियों के लिए बड़ी राहत देने का काम करेगा।

वित्त मंत्री के मुताबिक़ परिषद द्वारा उत्तर-पूर्वी राज्यों के लिए जीएसटी छूट की सीमा ₹10 लाख से बढ़ाकर ₹20 लाख कर दी है और बाक़ी देश के लिए ₹20 लाख से बढ़ाकर ₹40 लाख कर दी गई।

वित्त मंत्री ने यह भी कहा कि कॉम्पोज़िशन स्कीम का वार्षिक कारोबार ₹1 करोड़ से बढ़ाकर ₹1.5 करोड़ कर दिया गया है, जो 1 अप्रैल, 2019 से प्रभावी होगा।

जेटली ने कहा कि स्कीम के तहत कारोबार करने वाले अब तिमाही आधार पर कर का भुगतान करेंगे, लेकिन रिटर्न प्रतिवर्ष दाखिल किया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि परिषद ने सेवा क्षेत्र के लिए कॉम्पोज़िशन स्कीम को मंज़ूरी दे दी है। बता दें कि जीएसटी परिषद की अध्यक्षता वित्त मंत्री ही करते हैं।

केरल के विषय में वित्त मंत्री ने कहा कि राज्य अब अंतर-राज्य व्यापार का हक़दार है और दो साल की अवधि के लिए अधिकतम 1 प्रतिशत का उप-कर (Cess) लगा सकता है।

जेटली ने कहा कि जीएसटी (वस्तु एवं सेवा कर) के तहत अचल संपत्ति और लॉटरी को शामिल करने पर परिषद ने 7 सदस्यीय समूह के गठन का फ़ैसला किया।

‘मिशेल को डिफेंस पर कैबिनेट मीटिंग और गुप्त फ़ाइलों का पता होता था’

तमिलनाडु में भाजपा कार्यकर्ताओं की मीटिंग को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अगस्ता वेस्टलैंड मामले में कॉन्ग्रेस पर जोरदार हमला किया। प्रधानमंत्री ने सभा को संबोधित करते हुए कहा “अगस्ता वेस्टलैंड के मामले में आरोपित बिचौलिया मिशेल को रक्षा मामले में कैबिनेट की मीटिंग और रक्षा से जुड़ी सरकार की गुप्त फ़ाइलों के बारे में कैसे पता चल जाता था?”

प्रधानमंत्री ने कार्यक्रम के दौरान कहा कि देश की जनता कॉन्ग्रेस से यह जानना चाहती है कि मिशेल ने देश की सुरक्षा से जुड़े इन मामलों में कैसे हस्तक्षेप किया। प्रधानमंत्री ने आगे कहा कि कॉन्ग्रेस इस बात का भी जवाब दे कि रक्षा सौदे में बिचौलिया मिशेल की क्या भूमिका रही है। वैश्विक ताकतें अक्सर यह चाहती हैं कि अपने देश की सैन्य ताकत मजबूत नहीं हो। ऐसे में रक्षा सौदे में एक विदेशी बिचौलिए की भूमिका निश्चित रूप से देश के लिए खतरनाक है। 

अगस्ता-वेस्टलैंड मामला क्या है?

भारतीय वायुसेना के लिए 12 वीवीआईपी हेलि‍कॉप्टरों की खरीद के लिए इटली की कंपनी अगस्ता-वेस्टलैंड के साथ साल 2010 में करार किया गया था। 3,600 करोड़ रुपए के करार को जनवरी 2014 में भारत सरकार ने रद्द कर दिया था। जानकारी के लिए बता दें कि इस करार में 360 करोड़ रुपए के कमीशन के भुगतान का आरोप लगा था। इटली की कंपनी और भारत सरकार के बीच के इस करार में कमीशन की ख़बर सामने आते ही 12 एडब्ल्यू-101 वीवीआईपी हेलीकॉप्टरों की सप्लाई पर सरकार ने फ़रवरी 2013 में रोक लगा दी थी।

अगस्ता मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने स्वीकारी रक्षा मंत्रालय की याचिका

रक्षा मंत्रालय ने दिल्ली हाई कोर्ट में अगस्ता-वेस्टलैंड के खिलाफ़ मध्यस्थता की कार्रवाई के लिए याचिका दायर की। सरकार के पक्ष को सुनने के लिए दिल्ली हाई कोर्ट ने रक्षा मंत्रालय की याचिका को स्वीकार कर लिया है। इसके साथ ही कोर्ट ने सुनवाई की अगली तारीख़ 28 फ़रवरी तय कर दी है। कोर्ट ने दोनों पक्षों को हलफ़नामा दायर करने के लिए 5 सप्ताह का समय भी दिया है।

क्रिश्चियन मिशेल को अगस्ता मामले में हिरासत में लिया गया था

दिल्ली के पटियाला हाउस कोर्ट अदालत ने 3,600 करोड़ रुपये के अगस्ता वेस्टलैंड वीवीआईपी हेलीकॉप्टर मामले में सीबीआई द्वारा गिरफ्तार किए गए क्रिश्चियन मिशेल को 22 द‍िसंबर को ईडी की 7 दिन की हिरासत में भेज दिया था। विशेष न्यायाधीश अरविंद कुमार ने मामले में कथित बिचौलिए मिशेल की जमानत याचिका खारिज कर दी थी।

निर्धारित समय पर भारत को मिलेगा S-400 एयर डिफ़ेन्स सिस्टम

रूस के उप विदेश मंत्री सर्जे रयाब्कोव ने बुधवार (जनवरी 9, 2019) को कहा कि रूस भारत को S-400 एयर डिफ़ेन्स मिसाइल सिस्टम पूर्व निर्धारित समय पर ही देगा तथा डिलीवरी में किसी भी प्रकार की देर नहीं की जाएगी।

गत सप्ताह सरकार ने लोक सभा में यह सूचना दी कि भारत को अगले वर्ष अक्टूबर से S-400 एयर डिफेन्स मिसाइल सिस्टम मिलना आरंभ हो जाएगा तथा वर्ष 2023 तक डिलीवरी पूरी कर दी जाएगी। भारत-रूस के मध्य 40,000 करोड़ रुपये में S-400 ट्रायंफ खरीदने का समझौता गत वर्ष सम्पन्न हुआ था जब रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भारत आए थे।

S-400 एक इंटीग्रेटड मिसाइल सिस्टम है जो दूर और पास दोनों प्रकार के लक्ष्यों को भेद सकता है। युद्धनीति के दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह एक प्रतिरक्षात्मक प्रणाली है अर्थात इसका प्रयोग पहले हमला करने के लिए नहीं किया जाता।

S-400 सतह से हवा में मार करने वाला एयर डिफेन्स मिसाइल सिस्टम है जिसका अर्थ होता है ऐसी मिसाइल जो हवा से आक्रमण कर रहे किसी भी हथियार को मार गिराने में सक्षम हो। कुछ मिसाइलें बैलिस्टिक प्रणाली पर कार्य करती हैं अर्थात वे पृथ्वी के वायुमंडल में बहुत ऊपर तक जाकर फिर गुरुत्वाकर्षण बल के कारण लक्ष्य पर गिरती हैं। अंतर्महाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) इसी श्रेणी की मिसाइलें हैं।

कुछ मिसाइलें रिमोट द्वारा नियंत्रित की जाती हैं जिन्हें गाइडेड मिसाइल कहा जाता है। S-400 बैलिस्टिक और गाइडेड दोनों प्रकार की मिसाइलों से हमारी रक्षा कर सकने में सक्षम है। यही नहीं S-400 मानव रहित विमानों और लड़ाकू विमानों को भी मार गिराने में भी सक्षम है।

यह एयर डिफेन्स मिसाइल सिस्टम 30 किमी की ऊँचाई तक चार अलग रेंज की मिसाइलें एक ही लॉन्चर से दाग सकता है। S-400 की इन चार मिसाइलों की रेंज है: 40 किमी, 120-150 किमी, 200-250 किमी और 400 किमी। S-400 को कहीं भी ले जाया जा सकता है और इसकी एक बैटरी में आठ लॉन्चर होते हैं।

यह एयर डिफेन्स मिसाइल सिस्टम 30 किमी की ऊँचाई तक चार अलग रेंज की मिसाइलें एक ही लॉन्चर से दाग सकता है। S-400 की इन चार मिसाइलों की रेंज है: 40 किमी, 120-150 किमी, 200-250 किमी और 400 किमी

S-400 के रडार L और UHF फ़्रिक्वेन्सी बैंड पर काम करते हुए एक साथ सौ लक्ष्यों पर निगरानी रख सकते हैं। इसके रडार इतने उन्नत हैं कि वे आती हुई मिसाइल या विमान की रेंज में आने से पूर्व ही उस पर हमला कर सकते हैं।

अल्माज़ आंतेय (Almaz Antey) नामक कम्पनी द्वारा निर्मित अतिउन्नत S-400 मिसाइल सिस्टम के बारे में विशेषज्ञों की राय है कि यह क्रूज़ मिसाइलों के आक्रमण को भी असफल कर सकता है। S-400 को तुलनात्मक रूप से THAAD और पैट्रियट PAC3 मिसाइल सिस्टम से बेहतर माना जाता है।

भारत के एयर डिफेन्स सिस्टम पुराने हो चुके हैं अतः अब हमें नए उन्नत हथियारों से अपने आयुध भंडार को लैस करने की आवश्यकता है ऐसे में रूस द्वारा S-400 की समय पर डिलीवरी देने का आश्वासन देना शुभ संकेत है।

अयोध्या मामले पर एक बार फिर टली सुनवाई, नई पीठ करेगी 29 जनवरी को फैसला

सुप्रीम कोर्ट में आज अयोध्या विवाद के केस पर सुनवाई हुई है। ये सुनवाई इससे पहले 4 जनवरी को होनी थी, लेकिन पिछली बार पीठ में कम सदस्य होने के कारण ये सुनवाई 10 जनवरी पर टाल दी गई थी। आज 10 जनवरी को सुनवाई शुरू होने के कुछ देर बाद ही एक बार फिर अयोध्या मामला 29 जनवरी तक स्थगित कर दिया गया।

आज हाई कोर्ट में पाँच जजों की संविधान पीठ ने सालों से चले आ रहे बेहद संवेदनशील अयोध्या मामले पर सुबह 10:30 बजे से सुनवाई शुरू की। पाँच जजों की इस संविधान पीठ में मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के अलावा न्यायमूर्ति एसए बोबड़े, न्यायमूर्ति एन वी रमण, न्यायमूर्ति उदय यू ललित और न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड़ शामिल थे।

इस पाँच न्यायाधीशों की पीठ से जब न्यायमूर्ति यूयू ललित ने खुद को अलग करने का आग्रह किया तो कोर्ट ने फैसला लिया, कि अब इस मामले पर सुनवाई 29 जनवरी को नई पीठ के गठन के साथ की जाएगी। वकील राजीव धवन ने न्यायाधीश यूयू ललित पर टिप्पणी की थी कि 1994 में वो कल्याण सिंह के वकील रह चुके हैं, जिसके बाद उन्होंने खुद को सुनवाई से अलग कर लिया। हालाँकि, धवन का कहना है कि उन्हें यूयू ललित से कोई समस्या नहीं हैं।

इस मामले की सुनवाई आगे टलने की वज़ह से कई हिंदू संगठन बेहद नाराज़ हुए, जिसकी वजह से उन्होंने कोर्ट के बाहर प्रदर्शन किया है।

आपको इस मामले पर जानकारी देते हुए बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर रजिस्ट्री दस्तावेज़ों की कॉपी मांगी है। इस मामले से संबंधित कई मूल दस्तावेज़ अरबी, फारसी, संस्कृत, उर्दू और गुरमुखी में लिखे हुए हैं। वकीलों का इसपर कहना है कि इन दस्तावेज़ों के अनुवाद की भी पुष्टि की जानी चाहिए।

अब इस पूरे मामले की सुनवाई 29 जनवरी को नई बेंच के साथ होगी।

विनम्र होकर महिलाओं से माफ़ी माँगिए राहुल गाँधी

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी के ताजा बयान महिलाओं के प्रति उनकी छोटी सोच को दर्शाते हैं। वैसे ये इतिहास में पहली बार नहीं है, जब राहुल गाँधी ने सार्वजनिक तौर पर ऐसी गलतियाँ की हैं। इस से पहले वो अलग-अलग तौर-तरीकों से ऐसी कई हरकतें कर चुके हैं जिस से उनकी पार्टी और पार्टी के नेताओं को उनका बचाव करने में भी शर्मिंदगी महसूस हुई है। लेकिन उनकी हर एक फूहड़ हरकत का बचाव करने के लिए टीवी पर प्रवक्ताओं की टोली खड़ी रहती है। लेकिन इस बार कुछ अलग हुआ है। राहुल गाँधी अक्सर झूठ बोलते रहे हैं, अपने द्वारा गिनाए जाने वाले आँकड़ों को बार-बार बदलते रहे हैं, संवेदनशील मौकों पर भी ग़ैर -ज़िम्मेदाराना ढंग से मुस्कराते रहे हैं, गली के छिछोड़ों की तरह संसद में आँख मारते रहे हैं, लेकिन इस बार उन्होंने ट्रेंड से थोड़ा सा शिफ्ट किया है।

कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री धरम सिंह के निधन के बाद शोक प्रकट करने गए राहुल गाँधी उनकी पत्नी के सामने मुस्कराते हुए।

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष ने 9 जनवरी को एक बयान देते हुए कहा कि 56 इंच वाले मोदी को एक महिला के पीछे छिपना पड़ा। राहुल गाँधी ने जयपुर की एक चुनावी सभा में कहा;

राफेल पर 56 इंच के सीने वाले प्रधानमंत्री जवाब नहीं दे पाए और उन्होंने एक महिला को आगे कर दिया। उन्होंने निर्मला सीतारमण से कहा कि आप मेरी रक्षा करो, मैं खुद अपनी रक्षा नहीं कर सकता।”

बयान के मायने और सन्दर्भ

राहुल गाँधी के इस बयान के कई मायने निकाले जा सकते हैं लेकिन उन सभी के पीछे उनकी एक ही सोच दिखती है और वो है महिलाओं के प्रति उनका छोटा नजरिया। ये नजरिया इतना ओछा है, इतना महिलाविरोधी है कि इसका हर एक महिला और महिलाधिकार के लिए लड़ने वाले संगठन को विरोध करना चाहिए। राहुल गाँधी के इस बयान का किसी भी फेमिनिस्ट और लिबरल व्यक्ति को इसीलिए विरोध करना चाहिए क्योंकि ये बयान किसी गली-मोहल्ले के नेता का नहीं बल्कि देश की सबसे पुरानी पार्टी के मुखिया का है। इस बयान के लिए उस हर एक व्यक्ति को आपत्ति जतानी चाहिए, जो महिला-पुरुष समानता की बातें करता है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल है कि क्या ऐसा होगा? इस से पहले आइए जानते हैं कि आखिर राहुल गाँधी के बयान के क्या अर्थ निकलते हैं और उसका सन्दर्भ क्या था।

दरअसल, देश की रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने 4 जनवरी को संसद में एक भाषण दिया जिसमें उन्होंने राहुल गाँधी द्वारा राफेल पर पूछे गए हर एक सवाल का बिंदुवार जवाब दिया और कॉन्ग्रेस पार्टी की एक तरह से धज्जियाँ उड़ाते हुए उनके सारे झूठे दावों की पोल खोल दी। निर्मला सीतारमण भाजपा की प्रवक्ता रही हैं और न्यूज़ चैनल पर चर्चाओं में उनकी वाक्पटुता और विषयों पर उनकी पकड़ के कारण बड़े-बड़े नेता भी उनसे उलझने से पहले बड़ी तैयारियाँ कर के आया करते थे। ऐसे में अपनी ट्विटर टीम के बलबूते फलने-फूलने वाले राहुल गाँधी उनसे उलझ गए। परिणाम प्रत्याशित रहा और संसद में रक्षा मंत्री ने राहुल गाँधी की बखिया उधेड़ दी।

भाजपा की प्रवक्ता रही निर्मला सीतारमण अपनी वाक्पटुता और विषयों पर अपनी पकड़ के कारण जानी जाती हैं।

लेकिन राहुल गाँधी तो राहुल गाँधी हैं। उन्होंने निर्मला सीतारमण के फैक्ट्स और आँकड़ों से सजे डेढ़ घंटे लम्बे भाषण को एक लाइन में ख़ारिज करते देर नहीं लगाई। उन्होंने ट्विटर पर फिर से वही सब प्रश्नों की झड़ी लगा दी, जिसका बिंदुवार जवाब सीतारमण ने संसद में दिया था। लेकिन मुद्दा यह नहीं है। ये तो सिर्फ राहुल द्वारा जयपुर में दिए गए बयान के पीछे का बैकग्राउंड था। मुद्दा ये है कि राहुल ने जयपुर की जनसभा में क्या कहा और क्यों कहा।

महिलाओं के प्रति राहुल का ओछा नजरिया

राहुल गाँधी कहते हैं कि प्रधानमंत्री ने एक ‘महिला’ को आगे कर दिया। अगर राहुल इसके बजाय ये भी कहते कि पीएम ने एक ‘केंद्रीय मंत्री’ को आगे कर दिया तो ये चल जाता क्योंकि केंद्रीय मंत्री प्रधानमंत्री के मातहत काम करते हैं। अगर राहुल गाँधी ये भी कहते तो चल जाता कि पीएम अपनी पार्टी के नेताओं के पीछे छिप रहे हैं। लेकिन उन्होंने जो कहा वो एक बेहूदा औरसेक्सिस्ट बयान था। राहुल के इस बयान से झलकता है कि किसी भी पुरुष द्वारा किसी महिला को आगे करना सही नहीं है क्योंकि पुरुष मजबूत होते हैं और महिलाएँ कमजोर होती हैं। राहुल का यह महिलाविरोधी बयान उनके इस सोच को दर्शाता है कि एक महिला को आगे आने का हक़ नहीं है, एक महिला किसी पुरुष की जगह कभी नहीं ले सकती।

आश्चर्य यह कि राहुल के इन बयानों का खुद को फेमिनिस्ट और लिबरल कहने वाले लोगों के एक बड़े वर्ग द्वारा किसी भी प्रकार का विरोध नहीं किया गया, ना ही उनसे माफ़ी मांगने की मांग की गई। और जैसा कि प्रत्याशित था, राहुल अपने इस बयान के लिए माफ़ी मांगना तो दूर, उलटा इसके बचाव में खड़े हो गए। राहुल गाँधी के बयान का तात्पर्य है कि प्रधानमंत्री मोदी ने एक ‘महिला’ से कहा कि आप मेरी रक्षा करो। इस बेतुके बयान को लेकर राहुल गाँधी से पूछा जाना चाहिए कि क्या एक महिला इतनी कमजोर होती है कि वो किसी की रक्षा या किसी के बचाव के लिये आगे नहीं आ सकती? हालाँकि राहुल के इन दावों में कोई सच्चाई नहीं है कि प्रधानमंत्री ने निर्मला सीतारमण से कहा कि आप मेरी रक्षा करो, रक्षा मंत्री ने राहुल के सवालों का जवाब दिया क्योंकि ये उनके मंत्रालय से सम्बन्धित था। राहुल गाँधी पर यह सवाल भी दागा जाना चाहिए कि अगर कोई पुरुष किसी महिला को अपना बचाव करने को कहे तो क्या उसे हीन दृष्टि से देखा जाना चाहिए?

एक गलती के बचाव में दूसरी गलती करने का नाम हैं राहुल गाँधी

कहते हैं, व्यक्ति गलतियों से सीखता हैं। अखंड भारत के सूत्रधार चाणक्य ने कहा था कि समझदार व्यक्ति दूसरों की गलतियों से सीखते हैं क्योंकि आपकी अपनी ज़िंदगी इतनी छोटी है कि आप सारी गलतियाँ कर के उनसे सीखने में अपना समय नहीं गंवा सकते। राहुल गाँधी का किस्सा एकदम उलट है क्योंकि उन्होंने सारी गलतियाँ करने की ठानी है। इतना ही नहीं, उन्होंने सभी गलतियों को ज्यादा से ज्यादा दोहराने का ट्रेंड भी पाल रखा है। सोने पे सुहागा तो ये कि उनके द्वारा दोहराई गई इन गलतियों के बचाव के लिए न्यूज़ चैनलों पर प्रवक्ताओं की एक पूरी फ़ौज खड़ी रहती है। इस मामले में भी राहुल गाँधी ने यही ट्रेंड अपनाया और इसका बचाव करते हुए एक दूसरी गलती की।

जैसा कि सभी लोग वाकिफ़ हैं, हमे दो राहुल गाँधी देखने को मिलते हैं। एक वो हैं जिन्हें मानसरोवर यात्रा से वापस आने के बाद भी उसके बारे में कुछ नहीं पता होता, और दूसरे वो जिन्हें सब कुछ पता होता है- यहाँ तक कि मानसरोवर में खींचे गए चित्र की विवेचना भी वो इस तरह से कर सकते हैं, जो उनके राजनीतिक एजेंडे में भी फिट बैठ जाए। एक वो जिन्हें NCC के बारे में भी कुछ जानकारी नहीं होती और दूसरे वो जिन्हें सेना द्वारा प्रयोग में लाए जाने वाले फाइटर जेट की भी बारीकियाँ पता होती हैं। एक वो जो विदेशों में छुट्टियाँ मनाते हैं और दुसरे वो जो किसानों के हितैषी होने का दावा करते हैं। जी हाँ, अब तक आप समझ गए होंगे कि पहले वाले वो राहुल गाँधी हैं, जो रियल वर्ल्ड में पाए जाते हैं जबकि दूसरे वाले वो हैं जो वर्चुअल वर्ल्ड में मिलते हैं। इसका अर्थ ये कि वो सिर्फ ट्विटर पर मिलते हैं।

लेकिन ये भी जानने लायक बात है कि पहले वाले राहुल गाँधी अगर एक गलती करते हैं तो दूसरे वाले उनके बचाव में दूसरी गलती करते हैं। अगले चरण में कुछ यूं हुआ कि दूसरे वाले राहुल गाँधी ने पहले के बचाव में ट्वीट किया। इस ट्वीट में वो खुद से ही प्रतिस्पर्धा कर रहे थे। इस ट्वीट में दिए गए उनके बयान जयपुर में उनके द्वारा कहे गए महिला-विरोधी शब्दों के साथ प्रतियोगिता कर रहे थे। इस ट्वीट में राहुल गाँधी ने कहा;

पुरुष बनें और मेरे सवालों का जवाब दें।

क्यों चुप हैं लैंगिक समानता के स्वयंभू ठेकेदार

राहुल के ये बयान पितृसत्तात्मकता की सारी हदें पार कर जाते हैं। याद हो कि जब ट्विटर के CEO जैक के हाथ में ‘smash Brahminical Patriarchy’ लिखा पोस्टर देकर महिलाधिकारों और सामाजिक समानता के कुछ स्वयंभू ठेकेदारों ने फोटोशूट कराया था, तब राहुल की कॉन्ग्रेस पार्टी ने इसका समर्थन किया था। वो अलग बात है कि समानता के लिए लड़ने का दावा करने वाले ये स्वयंभू ठेकेदार आज राहुल के इस बयान को लेकर उनसे सवाल नहीं पूछ रहे क्योंकि ये उनके एजेंडे को सूट नहीं करता है। पितृसत्ता को बिना किसी डाटा या सबूत के सिर्फ व्यक्तिगत विचारों के आधार पर जाति के दायरे में बाँधने वाले ठेकेदारों ने राहुल गाँधी के इन बयानों को नजरअंदाज़ कर दिया।

महिलाओं के प्रति ऐसी सोच रखना राहुल की गलती है। अपनी इस सोच को बार-बार ज़ाहिर करना उस से भी बड़ी गलती है। और, अपनी इन गलतियों का बचाव करना, माफ़ी तक नहीं माँगना- ये सबसे बड़ी गलती है। लेकिन राहुल की इन गलतियों से भी बड़ी गलती वो लोग कर रहे हैं, जो इन सबके बावजूद सब कुछ देख-सुन कर भी चुप हैं क्योंकि इस पर बोलना उनके नैरेटिव के ख़िलाफ़ हो जाता है।

ख़ैर, राष्ट्रीय महिला आयोग ने राहुल की टिप्पणी का संज्ञान लिया है और उन्हें नोटिस भेजते हुए कहा है कि उनकी टिप्पणी महिला-विरोधी, आक्रामक, अनैतिक है तथा सामान्य रूप से महिलाओं के मान एवं प्रतिष्ठा के विरुद्ध असम्मान ज़ाहिर करती है।

अब देखना यह है कि मोदी से ‘कड़े सवाल’ पूछने की हिमाक़त करने वाला स्वयंभू ठेकेदारों का वर्ग कब जागता है।

यूनिवर्सल बेसिक इनकम स्कीम: मुख्यमंत्री ने की चुनावी घोषणा, सिक्किम रचेगा इतिहास!

सिक्किम की रूलिंग पार्टी सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट (एसडीएफ) ने यूनिवर्सल बेसिक इनकम स्कीम की घोषणा की है। एसडीएफ ने विधानसभा व लोकसभा चुनाव 2019 को ध्यान में रखते हुए 2022 से राज्य में यूबीआई स्कीम को शुरू करने की घोषणा की है। यूबीआई स्कीम को एसडीएफ ने अपने चुनाव घोषणा पत्र का हिस्सा बनाया है। राज्य सरकार ने इस स्कीम को लॉन्च करने की पूरी तैयारी कर ली है।

यदि सिक्किम में सरकार बनने के बाद एसडीएफ इस घोषणा को पूरा करने में सफ़ल हो जाती है, तो सिक्किम इस महत्वपूर्ण योजना को शुरू करने वाला देश का पहला राज्य बन जाएगा।

सिक्किम दूसरे राज्यों के लिए रह चुका है रोल मॉडल

यूबीआई की घोषणा से पहले भी सिक्किम सरकार ने कई महत्वपूर्ण योजनाओं की शुरुआत की है। इन सभी योजनाओं की सफ़लता के ज़रिए सिक्किम सरकार देश के दूसरे राज्यों के लिए रोल मॉडल रह चुकी है। सिक्किम में सरकार बनाने के बाद एसडीएफ ने राज्य की शिक्षा व्यवस्था में कई अहम बदलाव किए थे।

सरकार के इस प्रयास के बाद सिक्किम में साक्षरता दर 68.8 प्रतिशत (साल 2001 में) से बढ़कर 82.2 प्रतिशत पर पहुँच गई है। यही नहीं, 2004-05 की तुलना में वर्तमान समय में राज्य की जीडीपी लगभग दोगुनी हो गई है। इसके अलावा 2004-05 में सिक्किम में रहने वाले लगभग 1.7 लाख लोग गरीबी रेखा से नीचे थे, जबकि 2011-12 में यह आँकड़ा घटकर महज 51,000 रह गया था। सिक्किम ने 2018 में पूर्ण जैविक राज्य बनने का रिकॉर्ड भी अपने नाम किया। सिक्किम को यह अवॉर्ड संयुक्त राष्ट्र के द्वारा दिया गया था।

क्या है यूनिवर्सल बेसिक इनकम?

यूनिवर्सल बेसिक इनकम एक तरह से बेरोजगारी बीमा है। इस योजना के अंतर्गत किसी क्षेत्र में रहने वाले लोगों को उस क्षेत्र की सरकार के ज़रिए भत्ता के रूप में कुछ निश्चित रकम दिए जाते हैं। अपने देश में 2016-17 की आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट में यूबीआई की चर्चा की गई थी। जिसके बाद इस बात का अंदेशा लगाया जाने लगा कि केंन्द्र सरकार यूबीआई स्कीम लागू कर सकती है। लेकिन बाद में सरकार ने साफ़ किया कि केंन्द्र सरकार इस स्कीम को लागू करने में अभी सक्षम नहीं है।

शिवराज सरकार यूबीआई तर्ज पर ला चुकी है एक योजना

2011-13 के दौरान मध्य प्रदेश में भाजपा सरकार ने यूबीआई की तर्ज पर एक योजना की शुरुआत की थी। इस योजना का नाम मध्य प्रदेश अनकंडिशनल कैश ट्रांसफ़र प्रोजेक्ट दिया गया था। इस योजना के तहत राज्य के हर युवाओं को 300 रुपए जबकि बच्चों को 150 रुपए प्रति माह के दर से दिया जाने लगा था। इस योजना से राज्य के युवाओं और बच्चों के जीवन स्तर में बेहतरीन सुधार देखने को मिला था।

शिवसेना का BJP पर हमला, ‘दफ़ना’ देने की दी धमकी

शिवसेना के वरिष्ठ नेता रामदास कदम ने गठबंधन के विषय पर कड़ा रुख़ अख़्तियार करते हुए बीजेपी को ‘दफ़ना’ देने की धमकी दी है। बता दें कि शिवसेना की यह प्रतिक्रिया बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के उस बयान के बाद आई है जिसमें उनके द्वारा कथित तौर पर यह कहा गया था कि अगर लोकसभा चुनाव से पहले गठबंधन ना हुआ, तो उनकी पार्टी अपने पूर्व सहयोगियों को क़रारी शिक़स्त देगी।

“मंगलवार (जनवरी 8) की शाम को रामदास कदम ने संवाददाताओं से बातचीत के दौरान कहा, “वे पाँच राज्यों में पहले ही चुनाव हार चुके हैं, न तो वे महाराष्ट्र में आएँ और न ही हमें धमकाएँ वरना हम आपको दफ़ना देंगे। मत भूलिए कि मोदी लहर के बावजूद हमने कुल 288 सीटों में से 63 सीटें जीतीं थी।””

इससे पहले का वाक़्या यह था कि बीते रविवार को बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने शिवसेना को कड़े शब्दों में कहा था कि अगर गठबंधन हुआ तो पार्टी अपने सहयोगियों की जीत सुननिश्चित करेगी, और ऐसा न होने पर पार्टी आगामी लोकसभा चुनाव में उन्हें शिक़स्त देगी।

थोड़ा और पहले की बात करें तो इससे पहले भी शिवसेना के तल्ख़ तेवर सामने आ चुके हैं। शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे ने तो ‘चौकीदार चोर है’ तक कह डाला था, जिस पर मुख्यमंत्री देवेंद्र फणनवीस ने प्रतिक्रिया दी थी कि समय आने पर इसका जवाब दिया जाएगा।

संवाददाताओं से बातचीत के दौरान, एक प्रश्न का उत्तर देते हुए कदम ने कहा कि अभी बीजेपी के साथ उनका कोई गठबंधन नहीं हुआ है, लेकिन दोस्ती लगभग टूटने की कग़ार पर है। इसके लिए उन्होंने बीजेपी से अपने प्रेम और अपनत्व के ख़त्म हो जाने को मुख्य वजह बताया। साथ ही उन्होंने कहा कि जब शिवसेना अपने दम पर अकेले चुनाव लड़ने में सक्षम है तो बीजेपी गठबंधन के लिए क्यों दबाव की स्थिति पैदा कर रही है।

ख़बरों के अनुसार, यह भी पता चला है कि बीजेपी नेता चन्द्रकांत पाटील ने कदम द्वारा इस्तेमाल की गई अभद्र भाषा पर कड़ी आपत्ति दर्ज की, कहा कि हम उनके जैसी भाषा का इस्तेमाल नहीं कर सकते और शिवसेना की इस तीखी आलोचना का जवाब देते हुए यह भी स्पष्ट किया कि गठबंधन को लेकर बीजेपी की कोई मजबूरी नहीं है बल्कि यह पार्टी की सहनशीलता है।

बीजेपी और शिवसेना की विचारधारा एक है इसलिए इस तरह की कोशिशें की जा रही हैं कि दोनों साथ मिलकर आगे आएँ और आगामी लोकसभा चुनाव लड़ें। अगर किन्हीं कारणों से शिवसेना और बीजेपी के बीच सीटों के बँटवारे को लेकर गठबंधन नहीं हो पाया, तो ऐसी सूरत में दोनों पार्टियाँ अलग-अलग ही चुनाव लड़ेंगी, जिसके लिए बीजेपी पूरी तरह से सक्षम है।

ट्रिपल तलाक़ बिल राज्यसभा में अटका, अब अपराध नहीं तीन तलाक़

संसद का शीतकालीन सत्र बुद्धवार (जनवरी 09, 2019) को समाप्त हो गया जिसकी वजह से ट्रिपल तलाक़ (तीन तलाक़) बिल पर राज्यसभा की मुहर नहीं लग सकी, और ट्रिपल तलाक़ संबंधी अध्यादेश एक क़ानून बनने से वंचित रह गया। ऐसा होने से यह अध्यादेश स्वत: निरस्त हो गया।

अध्यादेश के निरस्त हो जाने से ट्रिपल तलाक़ अपराध के दायरे से बाहर निकल आया है, साथ ही तलाक़शुदा महिलाओं के संरंक्षण की बात का भी अस्तित्व मिट गया है। यह बिल लोकसभा में पास हो गया था, लेकिन राज्यसभा में विपक्ष के कड़े विरोध और अल्पमत के चलते पास होने से रह गया।

क़ानूनी भाषा में इसे समझें तो यह नियम होता है कि किसी भी अध्यादेश को लाने के बाद उसे पहले ही संसदीय सत्र में पेश करना होता है। उसके बाद ही उसे क़ानून का रूप दिया जाता है।

मुस्लिम समाज की महिलाओं को बराबरी के स्तर पर लाने और उन्हें डर के साये से दूर रखने के लिए मोदी सरकार द्वारा इस अध्यादेश को सितंबर 2018 में जारी किया गया था। अब, सरकार इस अध्यादेश को 31 जनवरी से शुरू होने वाले बजट सत्र में फिर से लाएगी ताकि 2019 के चुनाव के दौरान इसे पूर्ण रूप से प्रभावी बनाया जा सके।

क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि पड़ोसी देश पाकिस्तान और बांग्लादेश सहित लगभग 22 देशों ने इस प्रथा पर प्रतिबंध लगा दिया है। वहीं, कॉन्ग्रेस ने अपराधियों के लिए तीन साल की सज़ा का पुरज़ोर विरोध किया और इस मुद्दे पर आम सहमति बनाने पर चर्चा करने की माँग की।

ट्रिपल तलाक़ संबंधी इस बिल का उद्देश्य मुस्लिम महिलाओं को तीन बार तलाक़ बोलकर पारिवारिक संबंधों से जबरन निकाल फेंकने की कुप्रथा से मुक्त करना था। सदियों से चली आ रही तीन तलाक़ से जुड़ी इस बेतुकी प्रथा की वजह से मुस्लिम महिलाएँ हमेशा से ही डर के साये में जीवन जीने को मजबूर रही हैं। ऐसे में इस विधेयक का क़ानून बनते-बनते रह जाना मुस्लिम महिलाओं के लिए काफ़ी निराशा भरा साबित होगा।

कन्हैया, उमर समेत टुकड़े-टुकड़े गैंग पर जल्द होगा आरोप पत्र दायर

जेएनयू के पूर्व छात्रसंघ नेता और ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ के सरगना कन्हैया कुमार, उमर ख़ालिद पर और अनिर्बान भट्टाचार्य समेत कई लोगों के ख़िलाफ़ देशद्रोह के मामले में दिल्ली पुलिस जल्द ही आरोप पत्र दायर करने वाली है। इस बात की जानकारी खुद दिल्ली पुलिस आयुक्त अमूल्य पटनायक ने दी है।

कुछ समय पहले पूरे देश भर में जेएनयू पर बहस करना, उसपर चर्चा करना एक बहुत बड़ा मुद्दा बन गया था। इस दौरान जगह-जगह सिर्फ दो लोगों की भीड़ थी, एक तो वो जो जेएनयू के समर्थन में थी और एक वो जो जेएनयू के विरोध में थी। दरअसल, उस समय ख़बरें थी कि जेएनयू में राष्ट्रविरोधी नारे लगाए गए हैं। जिसके बाद सामाजिक और राजनैतिक माहौल बहुत गर्मा गया था।

इन्हीं सबके बीच से कुछ ऐसे नाम निकलकर आए जो अब भी आए दिन ख़बरों का हिस्सा बन जाते हैं। इसमें कुछ को राजनीति का भावी चेहरा बताया गया तो कुछ को ISIS का। इनमें कन्हैया कुमार और उमर ख़ालिद दो बड़े नाम हैं। बता दें कि कन्हैया कुमार जेएनयू के पूर्व छात्र अध्यक्ष थे। संसद पर हमला करने वाले अफज़ल गुरू को फाँसी देने जाने के फैसले के विरोध में इन लोगों ने 2016 में कार्यक्रम किया था, जिसके बाद इन्हें देशद्रोह के मामले में गिरफ़्तार भी किया गया था।

इनकी गिरफ़्तारी के बाद कुछ लोगों द्वारा खूब हंगामा किया गया था। विपक्ष ने इस मामले पर पुलिस पर आरोप लगाया था कि भाजपा की शह पर ये सब काम कर रही है। लोगों की सबसे बड़ी असहमति इस बात पर थी कि किसी भी भारतीय विश्वविद्यालय के कैंपस पर “भारत तेरे टुकड़े होंगे” जैसे नारे कैसे लगाए जा सकते हैं?

हालाँकि, छद्म-लिबरलों और वामपंथी मीडिया गिरोह ने इसे ‘डिस्सेंट’, यानि ‘असहमति की अभिव्यक्ति’ बताते हुए सरकार को घेर लिया कि ‘फ़्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन’ या ‘अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार का हनन किया जा रहा है। जबकि, इस तरह की अभिव्यक्ति किसी भी राष्ट्र में देशद्रोह ही कहा जाएगा क्योंकि जिस देश में आप रह रहे हैं, जहाँ से आपको शिक्षा मिल रही है, संसाधनों का प्रयोग कर रहे हैं, वहाँ देश को तोड़ने के नारे लगाना सर्वथा अनुचित और निंदनीय है।

दिल्ली पुलिस द्वारा कन्हैया कुमार, उमर ख़ालिद और अनिबार्न भट्टाचार्य समेत कई लोगों  के ख़िलाफ़ दाखिल किए जाने वाला आरोप पत्र इन्हीं घटनाओं पर आधारित है। अमूल्य पटनायक का कहना है कि पुलिस के लिए ये मामला बहुत पेचीदा था, लेकिन अब ये अपने आख़िरी चरण पर है, इस मामले की जांच करने के दौरान पुलिस को अन्य राज्यों के दौरे करने पड़े, लेकिन अब आरोप पत्र जल्दी दायर किया जाएगा

आपको बता दें कि इस मामले में ‘सामाजिक कार्यकर्ता’ व वकील प्रशांत भूषण ने सरकार पर यह देश में डर का माहौल बनाने का आरोप लगाया था। उनका कहना था कि देश में सरकार के खिलाफ बोलने वालों को निशाना बनाया जा रहा है। साथ ही उन्होंने उमर ख़ालिद और कन्हैया का साथ देते हुए कहा था इन्हें सरकार के ख़िलाफ़ बोलने के कारण नक्सली और देशद्रोही करार दिया जा रहा है।

लोकसभा के बाद राज्यसभा में भी पारित हुआ आरक्षण विधेयक, क्या रही पक्ष और विपक्ष के नेताओं की राय

मोदी सरकार द्वारा लाए गए आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग (सामान्य श्रेणी) को शिक्षा एवं रोजगार में 10% आरक्षण देने के 124वें संविधान संशोधन विधेयक को बुधवार (जनवरी 9, 2019) को राज्यसभा में भी मंजूरी मिल गई। राज्यसभा में बिल के पक्ष में 165 और विपक्ष में 7 वोट पड़े। बिल को लेकर चर्चा करने के लिए 8 घंटे का समय तय था लेकिन उसे बढ़ाना पड़ा। करीब 10 घंटे की चर्चा के बाद यह विधेयक पास हुआ।

लोकसभा की तरह ही यह बिल राज्यसभा में भी सर्वसम्मति और आसानी से पारित हो गया। इस बिल पर लगभग 10 घंटे तक पक्ष और विपक्ष के सदस्यों ने चर्चा की। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के हस्ताक्षर करने के बाद यह प्रावधान एक कानून बन जाएगा। विधेयक की ख़ास बात यह है कि तमाम विरोध के बावज़ूद, सरकार इस विधेयक को संसद में उसी रूप में पारित करने में सफ़ल रही, जिस रूप में यह पेश किया गया था। इस बिल में संशोधन के तमाम प्रस्ताव सदन में गिर गए।

लोकसभा के बाद राज्यसभा में भी विधेयक पारित हो जाने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संविधान निर्माताओं और स्वतंत्रता सेनानियों को याद करते हुए लगातार तीन ट्वीट किए। पहले ट्वीट में नरेंद्र मोदी ने लिखा, “ख़ुशी है कि राज्यसभा ने संविधान (124वाँ संशोधन) विधेयक, 2019 पास कर दिया। इस विधेयक का व्यापक समर्थन देखकर वह ख़ुश हैं। सदन ने एक जीवंत बहस को देखा, जहाँ कई सदस्यों ने अपनी राय प्रकट की।”

अपने दूसरे ट्वीट में प्रधानमंत्री ने लिखा कि यह सामाजिक न्याय की जीत है। यह युवाओं के लिए एक व्यापक कैनवास सुनिश्चित करेगा, जिससे वे अपने कौशल का प्रदर्शन कर सकेंगे और भारत के परिवर्तन में योगदान कर सकेंगे।

अपने तीसरे ट्वीट में पीएम मोदी ने कहा, “संविधान (124वाँ संशोधन) विधेयक, 2019 को पारित करके, हम अपने संविधान के निर्माताओं और महान स्वतंत्रता सेनानियों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं, जिन्होंने एक ऐसे भारत की कल्पना की, जो मजबूत और समावेशी हो।”

सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलोत ने 124वाँ संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में पटल पर रखा था। विधेयक के उद्देश्य एवं कारणों में लिखा गया है कि अभी सामान्य श्रेणी के आर्थिक रूप से कमज़ोर लोग बड़े पैमाने पर उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश तथा सरकारी नौकरियों से वंचित हैं, क्योंकि वे आर्थिक रूप से मजबूत वर्ग के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाते। इस विधेयक में लिखा है, “यह सुनिश्चित करने के लिए कि आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को उच्च शिक्षा तथा सरकारी नौकरियों में उचित अवसर मिले, संविधान में संशोधन का फैसला किया गया है।”

विधेयक पेश करने के बाद इस बिल पर लोकसभा में लगभग 5 घंटे लम्बी चर्चा चली। सदन में उपस्थित अधिकांश पार्टी ने इस बिल का खुलकर विरोध नहीं किया। कॉन्ग्रेस ने बिल का विरोध नहीं किया, लेकिन पार्टी ने मांग की थी कि बिल पहले संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास भेजा जाए। राज्यसभा में विपक्ष ने कहा कि वो बिल के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन सरकार के बिल को पेश करने के तरीके के ख़िलाफ़ हैं।

लोकसभा में इस बिल के बारे में बताते हुए केन्द्रीय मंत्री गहलोत ने कहा कि इसके पूर्व 21 बार प्राइवेट मेम्बर बिल लाकर अनारक्षित वर्ग के लिए आरक्षण संबंधी सुविधाएँ प्रदान करने की माँग हुईं। मंडल आयोग ने भी इसकी अनुशंसा की थी और पी.वी. नरसिंह राव सरकार ने 1992 में एक प्रावधान किया था लेकिन संविधान संशोधन नहीं होने के कारण सुप्रीम कोर्ट ने इसे निरस्त कर दिया था।

सिन्नो कमीशन (कमीशन टू एग्ज़ामिन सब-कैटेगोराइज़ेशन ऑफ़ ओबीसी) ने 2004 से 2010 तक इस बारे में काम किया और 2010 में तत्कालीन सरकार को प्रतिवेदन दिया। गहलोत ने बताया कि पहले सरकारों द्वारा किए गए इस तरह के प्रयास सुप्रीम कोर्ट में इसलिए निरस्त हुए हैं, क्योंकि उन सरकारों ने संविधान में संशोधन किए बिना वो फ़ैसले लिए थे। मोदी सरकार ने इसी कमिशन की सिफ़ारिश के आधार पर संविधान संशोधन बिल तैयार किया है। केन्द्रीय मंत्री ने बताया कि प्रस्तावित आरक्षण का कोटा वर्तमान कोटे से अलग होगा। अभी देश में कुल 49.5% आरक्षण है। अन्य पिछड़ा वर्ग को 27%, अनुसूचित जातियों को 15% और अनुसूचित जनजाति को 7.5% आरक्षण की व्यवस्था है। बिल पर चर्चा के दौरान केन्द्रीय मंत्री थावरचंद गहलोत ने सदन को बताया कि अगर उनके फैसले के ख़िलाफ़ कोई सुप्रीम कोर्ट में भी जाता है तो यह निर्णय निरस्त नहीं हो पाएगा और सामान्य वर्ग के गरीब भी आरक्षण का लाभ ले पाएंगे। उन्होंने कहा, “हमारी सरकार ने सोच-समझकर यह निर्णय लिया है और संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 में संशोधन किए हैं।”

कॉन्ग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने इस बहस के दौरान कहा कि अगर 8 लाख रुपए कमाने वाला गरीब है, तो सरकार को 8 लाख तक की कमाई पर इनकम टैक्स भी माफ़ कर देना चाहिए। इस पर केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि राज्य चाहें तो 8 लाख रुपए की सीमा को घटा-बढ़ा सकते हैं। उन्होंने कहा, “आप विधेयक में 8 लाख की आय सीमा पर सवाल उठा रहे हैं, लेकिन बिल में प्रावधान है कि राज्य अपनी मर्ज़ी से सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से
कमज़ोर लोगों का पैमाना तय कर सकेंगे। उदाहरण के लिए, किसी राज्य को लगता है कि आमदनी का पैमाना 8 लाख रुपए नहीं 5 लाख रुपए होना चाहिए, तो वह ऐसा कर सकेगा। संवैधानिक संशोधन के ज़रिए राज्यों को यह निर्णय करने का अधिकार रहेगा।”

सिब्बल ने कहा, “सरकार को जल्दी क्यों है, ये वही जानते हैं, मंडल कमीशन के बिल को पास करने में दस साल लगे थे, अभी सरकार संविधान में संशोधन एक दिन में करने जा रही है”

केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौर ने कहा कि इस बिल के बारे में दशकों से बात हो रही थी, लेकिन किसी ने ऐसी हिम्मत अभी तक नहीं दिखाई। जबकि हमारा संविधान स्वयं कहता है कि सभी वर्गों को और नागरिकों को बराबर अवसर दिया जाना चाहिए। इस तरह से आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग हमेशा पीछे रह गए थे।

आम आदमी पार्टी नेता भगवंत मान ने कहा कि ये भाजपा का नया जुमला है। उन्होंने कहा कि अब से दस दिन बाद मोदी किसी रैली में इसका श्रेय लेते नज़र आएंगे।

अक्सर साम्प्रदायिक बयान देने के कारण चर्चाओं में रहने वाले एआईएएम नेता असदउद्दीन ओवैसी ने ट्वीट कर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “दलितों के साथ ऐतिहासिक अन्याय को सही करना आरक्षण का मतलब है। गरीबी उन्मूलन के लिए कोई भी विभिन्न योजनाएँ चला सकता है लेकिन आरक्षण न्याय के लिए है। संविधान आर्थिक आधार पर आरक्षण की अनुमति नहीं देता है।” इस बिल पर चर्चा करते हुए एआईएमआईएम के अध्‍यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने इसे धोखा बताया और कहा “मैं इस बिल का विरोध करता हूँ, क्‍योंकि ये बिल एक धोखा है। उन्होंने कहा कि इस बिल के माध्‍यम से बाबा साहब अंबेडकर का अपमान किया गया है और इस बात का कोई तथ्य या आँकड़ा नहीं है कि सवर्ण भी पिछड़े हुए हैं।

बिल का विरोध करते वक्त ओवैसी यह भूल गए कि 124वाँ संविधान संशोधन विधेयक सिर्फ सवर्णों के लिए नहीं है बल्कि आर्थिक रूप से पिछड़े सामान्य श्रेणी के सभी लोगों के लिए है। इसका मतलब इस विधेयक का सम्बन्ध जाति आधारित न होकर आर्थिक है। मतलब ओवैसी जिस मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति करते हैं, उनके भी आर्थिक तौर पर पिछड़े लोग इस विधेयक से लाभान्वित होंगे।