गणतंत्र दिवस के मौके पर सम्मानित किए जाने वाले लोगों में एक नाम बछेंद्री पाल का भी है। जिन्हें सरकार द्वारा पद्म भूषण देने की घोषणा की गई।
बछेंद्री पाल का इस सम्मान पर कहना है कि यह पद्म भूषण का मिलना उनके लिए बेहद हैरान करने वाला है। उन्होंने मोदी सरकार का आभार जताया। उन्होंने कहा कि उन्होंने कभी भी किसी अवार्ड के लिए आवेदन नहीं किया था। उन्होंने इस अवार्ड को अपने माता-पिता को सादर समर्पित किया।
Mountaineer Bachendri Pal on being conferred with the Padma Bhushan: I was really shocked, it was a surprise for me as well, and I want to thank Modi govt. I haven’t ever applied for any award. I would like to dedicate this award to my parents. (ANI) pic.twitter.com/QpYhK22Mh7
बता दें कि सरकार द्वारा जारी की गई पद्म पुरस्कारों की सूची में उन नागरिकों का नाम शामिल है जिन्होंने देश में तमाम क्षेत्रों में अपना अहम योगदान दिया है।
पद्म पुरस्कारों की सूची में भारतीय खिलाड़ियों का नाम भी शामिल है। इसी सूची में दिग्गज पर्वतरोही बछेंद्री पाल का नाम भी है। बछेंद्री पाल पहली भारतीय महिला है जिन्होंने 1984 में माउंट एवरेस्ट की ऊँचाईयों को छुआ वहीं विश्व में उनका नम्बर पाँचवाँ है।
24 मई 1954 को जन्मी बछेंद्री इस समय 64 वर्ष की हैं। वर्तमान में वे टाटा स्टील में कार्यरत हैं। यहाँ वह चुने हुए कर्मचारियों को रोमाँचक अभियानों का प्रशिक्षण देती हैं।
आपको बता दें कि बछेंद्री को अपने जीवन में सर्वप्रथम पर्वतरोहण का मौका 12 साल की उम्र में मिला था। उस समय उन्होंने अपने स्कूल के साथियों के साथ 400 मीटर की चढ़ाई की थी। 1984 में जब भारत का चौथा एवरेस्ट अभियान शुरू हुआ तो बछेंद्री उस टीम का हिस्सा थी।
इस टीम में 7 महिलाओं के साथ 11 पुरूष थे। एक तरफ जहाँ 23 मई 1984 में दोपहर 1:07 मिनट पर 29,028 फुट की ऊँचाई पर इस टीम ने एवरेस्ट पर भारत का झंडा फहराया था, वहीं इस चढ़ाई के साथ एवरेस्ट पर भारतीय महिला के रूप में सागरमाथे पर पहला कदम रखने वाली बछेंद्री पहली भारतीय महिला बन गई थीं।
आज देश में जहाँ एक तरफ गणतंत्र मनाए जाने की धूम है, तो वहीं दूसरी तरफ सैनिकों का बलिदान भी यादगार है। भारतीय सैनिकों के बलिदान को देश की मिट्टी भला कैसे भूल सकती है। सेना के जाबाज़ जवानों और उनके जज़्बों के आगे देश का हर नागरिक हमेशा से ही नतमस्तक रहा है। दिन-रात देश की चौकसी में जुटे ये प्रहरी जैसे थकना ही ना जानते हों। नई दिल्ली के इंडिया गेट पर 24 घंटे और सातों दिन लगातार प्रज्वलित लौ ‘अमर जवान ज्योति’ उनके इसी जज़्बे और बलिदान को सलाम करती है।
अमर जवान ज्योति एक भारतीय स्मारक है जिसे 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध में शहीद हुए भारतीय सैनिकों की याद में प्रज्वलित किया गया। 3 दिसम्बर से 16 दिसम्बर 1971 तक पूर्वी पाकिस्तान अर्थात आज के बंग्लादेश में मुक्ति सेना की मदद करते हुए भारतीय सेना ने पाकिस्तानियों को घुटने टेकने पर मज़बूर कर दिया। बांग्लादेश को पाकिस्तान से आज़ाद कराने के मुहीम में हज़ारों भारतीय सैनिक शहीद हो गए थे।
शहीद हुए भारतीय सैनिकों की याद में 26 जनवरी 1972 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने आधिकारिक रूप से अमर जवान ज्योति स्मारक का उद्घाटन किया था। 1972 के बाद से प्रत्येक वर्ष गणतंत्र दिवस के अवसर पर (गणतंत्र दिवस की परेड से पहले) देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, आर्मी चीफ़ के साथ वायु, जल एवं थल सेना प्रमुख़ एवं अन्य मुख्य अतिथि अमर जवान ज्योति पर पुष्पांजलि अर्पित करते हैं।
राजपथ पर स्थित इंडिया गेट स्थित अमर जवान ज्योति वर्ष 1972 से लगातार प्रज्वलित है। इसका आसन संगमरमर का बना हुआ है जिस पर स्वर्ण अक्षरों से ‘अमर जवान’ अंकित है। स्मारक के ऊपर L1A1 आत्म-लोडिंग राइफ़ल भी लगी हुई है, जिसके बैरल पर सैनिक का हेलमेट लटका हुआ है।
अमर जवान ज्योति की प्रज्वलित लौ के पास तटस्थ मुद्रा में खड़े जवान की ज़िम्मेदारी होती है कि वो उस प्रज्वलित लौ का ध्यान रखे और उसे बुझने ना दे। साल 2006 तक अमर जवान ज्योति को जलाने के लिए एलपीजी का इस्तेमाल होता था, लेकिन अब सीएनजी का इस्तेमाल होता है। कस्तूरबा गाँधी मार्ग से इंडिया गेट तक क़रीब 500 मीटर लंबी गैस पाइप लाइन बिछी है। स्थापित चार में से एक मशाल साल भर प्रज्ज्वलित रहती है। स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के अवसर पर ही चारों मशालों को प्रज्जवलित किया जाता है।
शहीदों की याद में प्रज्वलित इस लौ को ‘अजर अमर’ भी कहा जाता है। भारतीय सेना के बलिदान की भरपाई तो कभी नहीं की जा सकती। लेकिन हाँ इतना ज़रूर है कि देश का हर नागरिक उनके बलिदान से सदैव वाक़िफ़ रहेगा और नतमस्तक भी।
एक साइट है ऑल्ट न्यूज़, मसीहाई की हद तक अपने आप को मानवता की धरोहर बताता है। नैतिकता और प्राइवेसी पर ज्ञान इनके साइट पर इतना ज़्यादा है मानो इन्हें देख लें तो दस-पाँच जनम के पाप धुल जाएँ। इसके यीशु मसीह हैं प्रतीक सिन्हा, जिनकी आजकल, और पिछली हरकतों से उन्हें बहुत ज़्यादा सम्मान दिया जाए तो भी एक ही शब्द निकल कर आता है: चिरकुट!
‘चिरकुट’ शब्द इसलिए क्योंकि प्रतीक सिन्हा का यही काम है, चिरकुटई। ज्ञान देने में तो इस लम्पट की साइट, प्राइवेसी पॉलिसी से लेकर, प्राइवेसी पर कवर किए गए तथाकथित ‘एक्सपोज़े’ तक, उस ऊँचे स्तर पर ख़ुद को रख देती है, जहाँ आज की दुनिया में पहुँचना असंभव लगता है। यही कारण है कि हमने इसके दोमुँहेपन पर इसी की साइट पर, किसी ‘फ़ॉल्ट न्यूज़’ वाली रॉकेट साइंस और रीवर्स इमेज मैनिपुलेशन, सॉफ़्टवेयर के इस्तेमाल या क्लासिफाइड स्पेस साइंस का प्रयोग किए बग़ैर ही थोड़ा स्क्रीनशॉट और हाइपरलिंक बेस्ड ‘शोध’ किया।
इनकी साइट पर जाकर अगर आप अंग्रेज़ी में ‘प्राइवेसी’ (privacy) लिखकर सर्च करेंगे तो कई लिंक आते हैं। इसमें से एक लिंक ‘प्राइवेसी पॉलिसी‘ का है, जो कि आपको प्रतीक सिन्हा की ज्ञानगंगा ऑल्ट न्यूज़ के उस पन्ने पर ले जाता है जहाँ वो बातें लिखी हुई हैं, जिनमें प्रतीक सिन्हा को स्वयं ही कोई विश्वास नहीं।
वहाँ लिखा है कि ‘हमारे लिए हमारे विज़िटर्स की प्राइवेसी अत्यंत महत्वपूर्ण है’। आगे वो टिपिकल बातें लिखी हैं जो रहती हर जगह पर, लेकिन कोई ध्यान नहीं देता। थोड़ी दूर नीचे आपको ये भी लिखा मिलेगा कि वो ऐसी कोई जानकारी इकट्ठी नहीं करते जो किसी की निजी पहचान को बाहर लाता हो। यानी, ऑल्ट न्यूज़ (प्रतीक सिन्हा जिसका संस्थापक है) प्राइवेसी और पर्सनल इन्फ़ॉर्मेशन को लेकर बेहद सजग और गम्भीर है। शायद, ये लम्पट जानता है कि किसी की निजी बातें कहीं और चली जाएँ तो वो घातक हो सकती हैं।
प्राइवेसी पॉलिसी का स्क्रीनशॉट
प्रतीक सिन्हा इन ख़तरों को जानता तो है, लेकिन मानता नहीं। साइट पर लिखना और ज्ञान देना एक बात है, लेकिन उसकी हाल की हरकतों, या कहें कि घटिया हरकतों से लगता नहीं कि उसे इसका तनिक भी भान है कि प्राइवेसी के मायने क्या हैं, और किसी की निजी जानकारी बाहर ला दी जाए तो वो किस तरह से उसे मानसिक और भावनात्मक यातनाओं से रूबरू कर सकती है। ताज़ा उदाहरण स्क्विंट नियॉन नाम के एक ट्विटर यूज़र का है, जिसकी निजी जानकारी को प्रतीक सिन्हा ने ‘फ़ैक्ट चेक’ के नाम पर सार्वजनिक कर दी।
फिर आप ग़ौर से पढ़ेंगे तो आप समझ जाएँगे कि प्रतीक सिन्हा के लिए कुछ लोगों के नाम, पता और पर्सनल डीटेल्स सार्वजनिक करने में थोड़ी भी शर्म क्यों नहीं आई: वहाँ लिखा है ‘आवर विज़िटर्स’। ये लोग तो ख़ैर ‘आवर विजिटर्स’ में आते भी नहीं, इनकी प्राइवेसी पर प्रतीक सिन्हा को घंटा फ़र्क़ नहीं पड़ता!
ये दोगलापन है। और हाँ, दोगलापन गाली नहीं है, दोगलापन एटीट्यूड है, जहाँ आप लिखते कुछ हैं, करते कुछ और। दोगलापन इसलिए क्योंकि जिस ‘प्राइवेसी’ के सर्च में प्राइवेसी पॉलिसी आई, उसी में एक हेडलाइन दिखी जहाँ लिखा था कि ‘क्या पीएम मोदी का ऐप निजी जानकारियों को थर्ड पार्टी के साथ, आपकी सहमति के बिना, शेयर करता है? हाँ’। अंग्रेज़ी में चूँकि बड़े अक्षरों के प्रयोग से आप अपनी बात कहने के लिए ‘यस’ को ‘YES’ लिखते हैं, तो पता चलता है कि आप महज़ हेडलाइन नहीं बना रहे, अपने विचार भी इम्फ़ैटिकली (ज़ोर देकर) रख रहे हैं। मैं भी इस बात से इत्तेफ़ाक़ रखता हूँ कि किसी भी ऐप को मेरी जानकारी, मेरी सहमति के बिना, किसी को भी देना बिलकुल गलत है।
पर्सनल डेटा को लेकर प्रतीक सिन्हा की चिंतनीय लेख
एक और ख़बर है जो सिन्हा ने ही तैयार की है जिसमें नरेन्द्र मोदी ऐप द्वारा ‘प्राइवेसी पॉलिसी’ पर यू-टर्न मारने की बात कही गई है। वहाँ भी यही तर्क दिया गया है कि इस ऐप के द्वारा किसी थर्ड पार्टी को ऐप उपयोगकर्ताओं की जानकारी भेजी जा रही है। ये सिर्फ़ आर्टिकल नहीं है, ये एक स्टैंड लेने जैसा है, और जो सही है, कि किसी भी ऐप द्वारा किसी की भी निजी बातें, कहीं भी, बिना उसकी सहमति से नहीं भेजी जानी चाहिए। फिर, स्टैंड लेकर प्रतीक सिन्हा ये भूल गए कि ट्विटर पर किसी की सारी निजी बातें बता देना भी ‘सहमति के बिना’ डेटा शेयर करने जैसा ही है।
नरेन्द्र मोदी ऐप पर प्रतीक सिन्हा द्वारा ‘प्राइवेसी’ को लेकर उठाए गए सवाल
फिर प्रतीक सिन्हा ने क्या सोचकर इन लोगों की निजी जानकारी ट्विटर पर सार्वजनिक कर दी? ‘थर्ड पार्टी’ को ऐप की जानकारी जाने पर पूरा आर्टिकल लिखा, और स्वयं ही उससे भी घातक काम किया कि उस नवयुवक को गालियाँ, जान से मारने की धमकी और उसके परिवार को हिंसक बातें कही जा रही हैं! अबे, थोड़ी कन्सिसटेन्सी तो रख लो अपनी बातों में! ऑनलाइन जिहादियों को किसी की जानकारी दे दी क्योंकि उसके विचार तुमसे नहीं मिलते?
कैसे बेहूदा आदमी हो यार? ‘कन्सेन्ट’ शब्द सुना है कभी, उसका मतलब समझते हो? बिना पूछे किसी की जानकारी सार्वजनिक करना असंवैधानिक है, फ़ैक्ट चेकिंग के यीशु मसीह! ‘राइट टू प्राइवेसी’ और ‘विदाउट कन्सेंट’ जानकारी बाहर करने का परिणाम देखो नीचे। लेकिन क्यों, तुम्हें तो मजा आ रहा होगा क्योंकि कहीं न कहीं तुम्हारी मंशा भी यही थी!
ट्विटर यूज़र @squintneon को मिली धमकियों के स्क्रीनशॉट्स
‘पर्सनल’ और ‘पब्लिक’ शब्द पर ही पत्रकार राहुल कँवल द्वारा राहुल गाँधी की निजी तस्वीरें अपने फ़ेसबुक पेज पर शेयर करने के ऊपर एक पूरा आर्टिकल है जिसमें हेडलाइन से लेकर अंतिम पैराग्राफ़ तक कई ऐसी बातें हैं जो प्रतीक सिन्हा पढ़ ले तो उसे अपने ‘ऑल्ट न्यूज़ स्टाफ़’ पर गर्व होगा, और अपने बारे में ‘डाउनराइट पैथेटिक’ भी फ़ील कर पाएँगे।
पर्सनल और पब्लिक बातों को ऑल्ट न्यूज़ का स्टाफ़ तो सीरियसली लेता दिखता है, प्रतीक सिन्हा नहीं
इसी आर्टिकल में प्राइवेसी के हनन पर पक्ष लेते हुए लिखने वाले ने पूछा है कि ‘आख़िर राहुल कँवल ने राहुल गाँधी की पर्सनल पिक्चर्स अपने फ़ेसबुक पर क्यों पोस्ट कीं? क्या मोटिव है उनका?’ सही सवाल है। इसी स्टाफ़ को अपने मालिक से यही सवाल पूछना चाहिए कि स्क्विंट नियॉन (@squintneon) की पर्सनल जानकारी अपने ट्विटर पर पोस्ट करने के पीछे क्या मोटिव है?
बिलकुल सही सवाल, आख़िर मोटिव क्या होता है ऐसी बातों को सार्वजनिक करने के पीछे?
इस आर्टिकल को लिखने वाला स्टाफ़ सिर्फ़ एक स्टाफ़ नहीं, जज़्बाती स्टाफ़ लगता है क्योंकि लिखते-लिखते वो अंतिम पैराग्राफ़ में यहाँ तक लिख गया, ‘किसी दूसरे ने किसी का फोटो पोस्ट किया और आपने इसी कारण कर दिया तो ये एक बिलकुल बेकार हरकत है’। उसने ‘डाउनराइट पैथेटिक’ लिखा है, जिसे सुनकर मुझे अब प्रतीक सिन्हा का ही चेहरा याद आता है।
प्रतीक सिन्हा का कुकर्म भी ‘डाउनराइट पैथेटिक’ की ही श्रेणी में आता है
राहुल गाँधी एक पब्लिक फ़िगर हैं, फिर भी मेरी सहमति है कि बिना सहमति के किसी की भी निजी तस्वीरों या जानकारियों को सार्वजनिक करना गलत है। स्क्विंट नियॉन एक कम उम्र का लड़का है, जो न तो पब्लिक फ़िगर है, न ही उसके पास इतनी शक्ति या सामर्थ्य है कि वो अपने ऊपर आने वाले ख़तरे से बचाव कर सके। ऐसे वल्नरेवल इन्सान की प्रोफ़ाइल से जुड़ी गोपनीय बातें सार्वजनिक करने के पीछे प्रतीक सिन्हा का क्या उद्देश्य है?
क्या प्रतीक सिन्हा ने यह मूर्खतापूर्ण कार्य बदले की भावना में आकर नहीं किया? क्या उसकी विचारधारा के ख़िलाफ़ जाने वालों के नाम सार्वजनिक करने के पीछे दुर्भावना नहीं? क्या वो अपने पास के संसाधनों का प्रयोग किसी की तरफ घृणा और हिंसा के पूरे इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा घोषित तरीक़ों को मोड़ने के लिए नहीं कर रहा है? एक नवयुवक की जानकारी पब्लिक किस बात पर? तुम होते कौन हो ये करने वाले? स्वयंभू फ़ैक्ट चेकर जिसके नाम तमाम फ़ेक न्यूज़ फैलाने की बातें हर जगह उपलब्ध हैं?
अच्छी बात है कि ऑल्ट न्यूज़ में ऐसे जज़्बाती स्टाफ़ भी हैं। यूँ तो मालिक ही अपनी हरकतों से एक बेग़ैरत इन्सान मालूम पड़ता है पर क्या पता एक-दो अच्छे स्टाफ़ की संगति में थोड़ा सुधार आ ही जाए। वैसे प्रतीक सिन्हा के कुकर्मों की शृंखला से यह संभावना तो लगती नहीं कि इसमें सुधार की गुंजाइश है, फिर भी उम्मीद पर दुनिया क़ायम है।
आज देश 70वाँ गणतंत्र दिवस मना रहा है। देश के अलग-अलग हिस्से से लहराते हुए तिरंगे की खूबसूरत तस्वीरे हमारे सामने आ रही हैं। लेकिन लद्दाख में ITBP जवानों के द्वारा तिरंगा फरहाने का वीडियो सोशल मीडिया से लेकर विभिन्न मीडिया माध्यमों पर खूब पसंद किया जा रहा है।
हिमवीर के नाम से प्रसिद्ध आईटीबीपी के जवानों ने गणतंत्र दिवस के अवसर पर 18,000 फीट की ऊँचाई पर तिरंगा फहराकर प्रत्येक भारतीय का सीना चौड़ा कर दिया है। बता दें कि 24 अक्टूबर 1962 को आईटीबीपी की स्थापना की गई थी।
युद्ध क्षेत्र में दुनिया का सबसे मुश्किल इलाक़ा माना जाता है लद्दाख
एक तरफ़ देश में कड़ाके की ठंड पड़ रही है, जहाँ लोग अपने घर से बाहर निकलने को भी तैयार नहीं हैं वहीं दूसरी ओर ITBP के जवानों ने उस पर्वत की चोटी पर भारतीय तिरंगा फहराया, जहाँ चारो तरफ़ सिर्फ़ बर्फ की चादर है और तापमान माइनस-30 डिग्री।
इतना कम तापमान में हम बामुश्किल अनुमान कर सकते हैं की किस तरह से भारतीय जवान भारत की दुर्गम सीमाओं पर देश वासियों के रक्षार्थ खड़े हैं। लद्दाख के इस इलाके को युद्ध क्षेत्र के लिहाज से दुनिया के सबसे मुश्किल इलाकों में माना जाता है। यहाँ अक़्सर तापमान शून्य से भी काफी नीचे रहता है।
नक्सलियों के माँद में घुसकर शान से फहराया गया तिरंगा
छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित सुकमा जिले के पालमअड़गु इलाके में गणतंत्र दिवस के अवसर पर तिरंगा फहराया गया। यह इलाका नक्सलियों का गढ़ माना जाता है। सुरक्षा बलों ने साहस का परिचय देते हुए उन्हें चुनौती देते हुए यहाँ पहली बार तिरंगा फहराया। यहाँ नक्सली हमेशा से काला झंडा फहराते आए हैं। गणतंत्र दिवस के मौके पर सीआरपीएफ 74 वाहिनी के जवानों के साथ ही जिला बल के जवानों ने यहाँ तिरंगा फहराते हुए मिठाई बाँटी।
गणतंत्र दिवस के अवसर पर 74 वाहिनी के जवान झंडारोहण करते हुए
57 साल बाद गणतंत्र दिवस पर फहराया गया तिरंगा
बिहार के 62 फीट ऊँचे ऐतिहासिक दरभंगा राज किले पर 57 साल बाद गणतंत्र दिवस के अवसर पर तिरंगा फहराया गया। गौरवशाली दरभंगा और मिथिला स्टूडेंट्स यूनियन संगठन ने तिरंगा फहराते हुए भारत माता की जय के नारे लागाए।
दरभंगा राज किले पर 57 साल बाद गणतंत्र दिवस पर तिरंगा झंडा फहराया गया
गौरवशाली दरभंगा के सदस्य संतोष कुमार चौधरी ने कहा, “57 साल पहले दरभंगा महाराज कामेश्वर सिंह ने 1962 में आखिरी बार यहाँ तिरंगा फहराया था। पिछले साल 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर ये परंपरा शुरू की गई।”
मोर, जिसका ख़्याल आते ही एक ऐसा मनमोहक दृश्य उभरकर सामने आता
है, जो बेहद सुखद एहसास कराता है। मोर को नाचते हुए देखना भला किसे रोमांचित नहीं
करता। अपने एक रंग-बिरंगे पंखों से मंत्रमुग्ध कर देना वाला पक्षी ‘मोर’ का अस्तित्व केवल एक पक्षी होने तक
ही नहीं सीमित है बल्कि यह हमारा राष्ट्रीय पक्षी भी है।
आपको बता दें कि भारत सरकार द्वारा मोर को 26 जनवरी,1963 में राष्ट्रीय पक्षी के रूप में घोषित किया गया। ‘फैसियानिडाई’ परिवार के सदस्य मोर का वैज्ञानिक नाम ‘पावो क्रिस्टेटस’ है, इंग्लिश भाषा में इसे ‘ब्ल्यू पीफॉउल’ अथवा ‘पीकॉक’ कहते हैं। संस्कृत भाषा में मोर को ‘मयूर’ कहा जाता है।
मोर को राष्ट्रीय पक्षी घोषित किया गया
जानकारी के मुताबिक़, राष्ट्रीय पक्षी के रूप में मोर का चयन यूँ ही रातों-रात नहीं हुआ था बल्कि इस पर काफ़ी सोच-विचार किया गया था। माधवी कृष्णन द्वारा 1961 में लिखे गए उनके एक लेख के अनुसार भारतीय वन्य प्राणी बोर्ड की ऊटाकामुंड में बैठक हुई थी। इस बैठक में राष्ट्रीय पक्षी के लिए अन्य पक्षियों भी विचार किया गया था, जिनमें सारस, क्रेन, ब्राह्मिणी काइट, बस्टर्ड और हंस का नाम शामिल थे। दरअसल राष्ट्रीय पक्षी के चयन के लिए जो गाइडलाइन्स थीं उनके मुताबिक़ जिसे भी राष्ट्रीय पक्षी घोषित किया जाए उसकी देश के सभी हिस्सों में मौजूदगी भी होनी चाहिए।
इसके अलावा इस बात पर भी ग़ौर
किया गया कि जिस भी पक्षी का चयन किया जाए, उसके रूप से देश का हर नागरिक वाक़िफ़ हो
यानी उसकी पहचान सरल हो। इसके अलावा राष्ट्रीय पक्षी को पूरी तरह से भारतीय
संस्कृति और परंपरा से ओत-प्रोत होना चाहिए।
बैठक में गहन चर्चा के बाद
मोर को इन सभी मानदंडों पर खरा पाया गया जिसके परिणामस्वरूप मोर को भारत का राष्ट्रीय
पक्षी घोषित कर दिया गया क्योंकि यह शिष्टता और सुंदरता का प्रतीक भी है। इसके
अलावा आपकी जानकारी के लिए बता दें कि नीला मोर हमारे पड़ोसी देश म्यांमार और
श्रीलंका का भी राष्ट्रीय पक्षी है।
राजाओं-महाराजाओं व कवियों की भी पसंद था मोर
हिन्दु मान्यताओं के अनुसार मोर को कार्तिकेय के वाहन ‘मुरुगन’ के रूप से भी जाना जाता है। कई धार्मिक कथाओं में भी मोर का ज़िक्र होता है। भगवान कृष्ण ने तो अपने मुकुट में मोर पंख धारण किया हुआ है, और इसी से मोर के धार्मिक महत्व को समझा जा सकता है। महाकवि कालिदास ने अपने महाकाव्य ‘मेघदूत’ में मोर को राष्ट्रीय पक्षी से भी ऊपर का दर्जा दिया है।
अनेकों राजाओं-महाराजाओं को भी मोर से काफ़ी लगाव था। जिसका प्रमाण उस दौर के राजाओं के शासनकाल के दौरान कुछ तथ्यों से मिलता है। सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य के राज्य में जिन सिक्कों का चलन था उनके एक तरफ मोर बना होता था। मुगल बादशाह शाहजहाँ जिस तख़्त पर बैठते थे, उसकी संरचना मोर जैसे आकार की थी। दो मोरों के बीच बादशाह की गद्दी हुआ करती थी और उसके पीछे पंख फैलाए मोर। हीरे-पन्नों जैसे क़ीमती रत्नों से जड़ित इस तख़्त का नाम ‘तख़्त-ए-ताऊस’ था, जिसे अरबी भाषा में ‘ताऊस’ कहा जाता था।
मोर को राष्ट्रीय पक्षी के रूप में घोषित किए जाने के पीछे केवल उसकी सुंदरता ही नहीं बल्कि उसकी लोकप्रियता भी है। एक ऐसी लोकप्रियता जिसका नाता आज से नहीं बल्कि पिछले कई वर्षों से है।
गणतंत्र दिवस से ठीक एक दिन पहले यानी 25 जनवरी को देश में उन लोगों के नाम की घोषणा की गई है जिन्हें पद्म पुरस्कारों से सम्मानित किया जाएगा।
इस सूची में 4 हस्तियों को पद्म विभूषण, 14 को पद्म भूषण, और 94 लोगों को पद्मश्री से सम्मानित किया जाएगा। इस सूची में एक व्यक्ति ऐसा भी है जिसके बारे में बहुत ही कम लोग जानते हैं लेकिन अपने लगातार प्रयासों से वह जो काम कर रहे हैं वह किसी मिसाल से कम नहीं है।
डी प्रकाश रॉव नाम के यह शख्स ओडिशा में कटक का रहने वाले हैं। जिनका ज़िक्र प्रधानमंत्री ‘मन की बात’ में भी कर चुके हैं। डी प्रकाश पिछले 67 सालों से चाय बेचने का काम करते हैं। प्रकाश को चाय बेचकर जितना भी पैसा मिलता है वो उन पैसों का एक बड़ा हिस्सा समाज सेवा में लगा देते हैं। उनके इस समाज सेवा की जज़्बे को समाज ने भी मान दिया। ऐसे लोग बेशक़ थोड़े हैं पर प्रेरणा के स्रोत है।
अपनी चाय की दुकान पर प्रकाश रॉव
उनके इसी कार्य से प्रभावित होकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनसे पिछले साल मुलाकात भी की थी। इस मुलाकात के बाद 30 मई 2018 को मन की बात कार्यक्रम के दौरान पीएम मोदी ने प्रकाश के बारे में बताते हुए कहा था कि उन्हें उड़ीसा स्थित कटक के पास एक चाय बेचने वाले डी प्रकाश राव से मुलाकात करने का मौक़ा मिला। पीएम मोदी ने ही प्रकाश के बारे में आगे बताते हुए यह कहा था कि वह पिछले 5 दशक से चाय बेच रहे हैं लेकिन वह जो काम कर रहे हैं उसके बारे में जानकर आप हैरान रह जाएंगे।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने, प्रकाश रॉव के बारे में बताया कि वह चाय की आमदनी से आर्थिक रूप से कमज़ोर 70 से भी अधिक बच्चों को पढ़ाते हैं।
आर्थिक रूप से कमज़ोर बच्चों को पढ़ाते डी प्रकाश रॉव
आपको बता दें कि प्रकाश पिछले 67 सालों से चाय बेचने का कार्य कर रहे हैं और वह अपनी कमाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा गरीब बच्चों को पढ़ाने में लगाते हैं। रॉव अपने दम पर एक स्कूल भी चलाते हैं जहाँ जाकर वह झुग्गी के बच्चों को मुफ़्त में पढ़ाते हैं। यही नहीं रॉव रोज़ अस्पताल जाते हैं, वहाँ भी मरीजों और उनके परिजनों की सेवा करते हैं और उन्हें गर्म पानी पहुँचाते हैं। ये सभी कार्य उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं। ज़रूरत पड़ने पर वह रक्तदान करने से भी पीछे नहीं हटते हैं।
प्रकाश के बारे में सबसे ख़ास बात यह है वह कभी स्कूल न जाने के बाद भी हिंदी और इंग्लिश दोनों भाषा अच्छे से बोल लेते हैं। यही कारण है कि वह स्कूल के बच्चों के पसंदीदा अध्यापक हैं।
अगस्ता वेस्टलैड घोटाले में सह-आरोपी वकील गौतम खेतान को कालेधन और मनी लॉन्ड्रिंग के मामले प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने गिरफ़्तार किया है। गौतम को ब्लैकमनी एक्ट के तहत गिरफ़्तार किया गया। खेतान पर कानून का उल्लंघन करते हुए विदेशी खाते चलाने का आरोप है। कल खेतान को दिल्ली के पटियाला हाउस कोर्ट में पेश किया जाएगा। बता दें कि काले धन के मामले में ही खेतान के ठिकानों पर पिछले हफ़्ते भी आयकर विभाग ने छापेमारी कर कार्रवाई की थी।
Gautam Khaitan has been arrested by Enforcement Directorate (ED) in a case of black money under the Black Money Act. https://t.co/y66EcrX5Cx
बताया जा रहा है कि गौतम के नाम का खुलासा अगस्ता वेस्टलैंड मामले में बिचौलिया क्रिश्चियन मिशेल से पूछताछ के दौरान हुई। मिशेल ने ही ईडी को खेतान के कालेधन के बारे में जानकारी दी है। बता दें कि कॉन्ग्रेस के कार्यकाल में हुए अगस्ता वेस्टलैंड वीवीआइपी चॉपर घोटाले में भी खेतान का नाम सीबीआइ और ईडी की चार्जशीट में शामिल है।
इससे पहले भी अगस्ता मामले में सितंबर 2014, और दिसंबर 2016 में खेतान को गिरफ़्तार किया गया था। लेकिन, दोनों बार वो जमानत पर छूट गया था। खेतान की गिरफ़्तारी पर ईडी ने जानकारी दी है कि आयकर कानून का उल्लंघन करने के चलते खेतान पर ब्लैक मनी एक्ट के तहत शिकायत दर्ज करते हुए कालेधन के मामले में गिरफ़्तार किया गया है।
वहीं रिपोर्ट की मानें तो आयकर विभाग द्वारा कालाधन एवं कराधान अधिनियम 2015 की धारा 51 के तहत उसके ख़िलाफ़ एक मामला दर्ज किए जाने के आधार पर ईडी ने पीएमएलए के तहत एक नया आपराधिक मामला दर्ज किया है।
अगस्ता-वेस्टलैंड मामला क्या है?
भारतीय वायुसेना के लिए 12 वीवीआईपी हेलिकॉप्टरों की खरीद के लिए इटली की कंपनी अगस्ता-वेस्टलैंड के साथ साल 2010 में करार किया गया था। 3,600 करोड़ रुपये के करार को जनवरी 2014 में भारत सरकार ने रद्द कर दिया। जानकारी के लिए बता दें कि इस करार में 360 करोड़ रुपये के कमीशन के भुगतान का आरोप लगा था। इटली की कंपनी और सरकार के बीच के इस करार में कमीशन की ख़बर सामने आते ही 12 एडब्ल्यू-101 वीवीआईपी हेलीकॉप्टरों की सप्लाई पर सरकार ने फ़रवरी 2013 में रोक लगा दी थी।
जीएसएलवी एमके-II की एक बेहद निराश कर देने वाली तस्वीर नीचे है। यह अप्रैल 15, 2010 को बंगाल की खाड़ी में दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी। अन्य की तुलना में यह अधिक पेलोड (भार) ले जाने की क्षमता रखता था, जिससे देश को बहुत ज्यादा उम्मीदें थीं।
इस घटना में प्रमुख निराशा का कारण स्वदेशी तुषारजनिक (क्रायोजेनिक) रॉकेट इंजन की विफलता थी। क्रायोजेनिक इंजन सबसे शक्तिशाली रॉकेट इंजन होता है, जो भारी उपग्रहों को कक्षा तक ले जाने का एकमात्र तरीका है।
इसी तकनीक ने ही अमेरिका को चंद्रमा तक पहुँचने में मदद की है। क्रायोजेनिक इंजन में महारत हासिल करना ही भारत के लिए वैश्विक अंतरिक्ष क्लब जैसी बड़ी संस्था में प्रवेश करने का एकमात्र रास्ता था। बेशक, दुनिया में कोई भी हमें इस तकनीक को देने के लिए तैयार नहीं होता, ऐसे में हमें स्वयं ही इस तकनीक का पता लगाना था।
आपकी प्रतिक्रिया क्या होगी यदि मैं आपको बताऊँ कि दशकों पहले, हमारे पास एक ऐसा असाधारण वैज्ञानिक था, जो स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन पर काम कर रहा था? साथ ही यह कि उन्हें नौकरी से ‘देशद्रोही’ जैसे आरोप लगाकर निकाल दिया गया और हमारी तत्कालीन ‘सेक्युलर’ सरकार द्वारा उनका जीवन बर्बाद कर दिया गया? क्या आप उन लोगों को कभी माफ़ कर पाएंगे?
मिलिए इसरो वैज्ञानिक नम्बी नारायण से, जिन्हें कल (जनवरी 25, 2019) पद्म भूषण से सम्मानित किया गया है।
विद्वान और देशभक्त वैज्ञानिक नम्बी नारायणन
पीएसएलवी (PSLV) को याद करिए, जिसने वर्ष 2014 में मंगलयान को संचालित किया था और मंगल ग्रह पर भारतीय ध्वज लहराया था। पीएसएलवी, जिसने वर्ष 2008 में चंद्रयान को संचालित किया और इस बात की पुष्टि की कि चंद्रमा पर निश्चित रूप से पानी की बर्फ है।
जनवरी 5, 2014 को भारत ने अंतरिक्ष में लम्बी छलांग लगाकर नया इतिहास रचा था। स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन के बूते रॉकेट को अंतरिक्ष में भेजने का परीक्षण 100% ख़रा उतरा था। इस लम्बी छलांग के पीछे असल में कौन था? लेकिन उस दौरान पूरी खबरों में कहीं भी उस वैज्ञानिक का उल्लेख तक नहीं था। उस वैज्ञानिक का नाम है प्रोफैसर नम्बी नारायणन।
सबसे पहले 1970 में ‘तरल ईंधन रॉकेट’ तकनीक लाने वाले वैज्ञानिक रहे नम्बी नारायणन 1994 में इसरो में क्रायोजेनिक विभाग के वरिष्ठ अधिकारी थे। अफ़सोस की बात है कि उन्हें सत्ता और सियासत के षड्यंत्र का शिकार बनाया गया। जिस व्यक्ति को राष्ट्रीय अलंकरण देकर सम्मानित किया जाना चाहिए था, उसे ही जेल की सलाखों के पीछे बन्द कर दिया गया। उन्हें देश का गद्दार करार दिया गया। हमारे देश की विडम्बना है कि जो लोग देश के लिए कुछ कर गुजरने का हौंसला रखते हैं, उनको किसी न किसी तरह से हतोत्साहित कर रोक दिया जाता है।
नम्बी नारायणन और उनके साथी डी. शशिकुमार को वर्ष 1994 में केरल पुलिस ने जासूसी और भारत की रॉकेट प्रौद्योगिकी शत्रु देशों को बेचने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था। तब मीडिया ने इन ख़बरों को बहुत उछाला था। मीडिया ने बिना जाँचे-परखे पुलिस की इस ‘थ्योरी’ पर विश्वास करके उन्हें राष्ट्रद्रोही के रूप में प्रस्तुत किया था। पुलिस ने इसे सैक्स जासूसी स्कैंडल की तरह पेश किया था। सीआईए ने मालदीव की 2 ऐसी महिलाओं को तैयार किया जिनके पास ऐसे रहस्य थे, जिनकी जानकारी न पुलिस को थी, न मीडिया को।
PSLV ने हमें हमेशा गौरवान्वित किया है। पीएसएलवी रॉकेट स्वदेशी “विकास इंजन” पर चलता है और नम्बी नारायणन ने इसे बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
1990 के दशक में, नम्बी नारायणन भारत के शीर्ष वैज्ञानिकों में से एक थे, जो स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन पर काम कर रहे थे। इससे पहले, भारत ने रूस से इस तकनीक को खरीदने की कोशिश की थी, लेकिन अमेरिकियों ने पूरी लड़ाई लड़ी और इसे रोक दिया। स्वाभाविक है कि जिन लोगों के पास यह तकनीक होगी, वे अन्य देशों से ईर्ष्या के कारण इस तकनीक की रक्षा करेंगे।
अमेरिकी दबाव में रूस ने क्रायोजेनिक इंजन देने से इन्कार कर दिया था। तब नम्बी नारायणन ने ही सरकार को भरोसा दिलाया था कि वह और उनकी टीम देसी क्रायोजेनिक इंजन बनाकर दिखाएँगे। भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को ध्वस्त करने के लिए अमेरिका ने साजिश रची और केरल की वामपंथी सरकार उसका हथियार बन गई।
हैरानी की बात तो यह है कि केन्द्र में तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार की भूमिका भी संदिग्ध रही थी, जिसने इतने बड़े वैज्ञानिक के ख़िलाफ़ साजिश पर ख़ामोशी अख्तियार कर ली थी। मीडिया में ऐसी रिपोर्ट वर्णित थी कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए भारत में ऊपर से नीचे तक के नेताओं और अफ़सरों को मोटी रकम पहुँचाती थी।
फिर, यह सब हुआ।
वर्ष 1994 में, नम्बी नारायणन पर अचानक जासूसी और विदेशी एजेंटों को रॉकेट सम्बंधित संवेदनशील जानकारी लीक करने का आरोप लगाया गया था। उन्हें गिरफ़्तार कर जेल में डाल दिया गया, इसके साथ ही उनका करियर ख़त्म हो गया।
वर्ष 1994 में ही नम्बी नारायणन की गिरफ़्तारी के साथ, भारत के स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन के निर्माण का सपना दशकों पीछे चला गया। वर्ष 2010 के अंत तक, भारत उस क्रायोजेनिक इंजन को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहा था।
क्रायोजेनिक इंजन के निर्माण में सफलता आखिरकार जनवरी 2014 में मिली।
वर्ष 1994 और 2014 के बीच उन 20 वर्षों के लिए भारत को हुए इस नुकसान का भुगतान कौन करेगा? यक़ीनन कह सकते हैं कि ‘भारतीय धर्मनिरपेक्षता’ तो कभी भी नहीं कर सकती है।
जैसे-जैसे नम्बी नारायणन का मामला अदालत में लाया गया, मामले ने करवट लेनी शुरू की। सीबीआई ने स्वीकार किया कि आईबी ने इस केस को तैयार किया था।
वहीं वर्ष 1998 का ‘आउटलुक’ का यह लेख भी हमें बताता है कि सीबीआई ने जून 03, 1996 को अपनी रिपोर्ट में क्या कहा था।
“6 निर्दोष व्यक्तियों की गिरफ्तारी, जिससे उन्हें मानसिक और शारीरिक पीड़ा हुई।” यह कितना बड़ा अन्याय है!
लेकिन अभी वाक़या और भी है।
इस नाम पर ध्यान दें: ‘आउटलुक’ के लेख के अनुसार, आर बी श्रीकुमार स्पष्ट रूप से जाँच में अपने कर्तव्य के निर्वहन मामले में निष्पक्ष रहने में असफल पाए गए थे।
लेकिन, हमने आर बी श्रीकुमार के बारे में और कहाँ सुना है?
यहाँ आप देख सकते हैं कि आर बी श्रीकुमार काफ़ी ‘प्रसिद्ध’ व्यक्ति हैं। जो अपनी ‘न्याय की ललक’ के लिए जाने जाते हैं।
कहानी यहीं पर ख़त्म नहीं होती, किस्सा अभी और भी है।
ये भी ज़रूर देखिए
अपने ‘शानदार’ करियर के दौरान, आर बी श्रीकुमार ने कई दिल जीते हैं। कई पुरस्कार और कई उपाधियाँ जीती हैं। अप्रैल 24, 2008 को ‘द हिंदू’ में प्रकाशित इस तस्वीर से एक लाज़वाब चीज देखने को मिली है। तस्वीर में बाईं ओर “सर्वोत्तम मलयालम पुलिस अधिकारी” का पुरस्कार प्राप्त करते हुए बी आर आर श्रीकुमार हैं। उन्हें पुरस्कार प्रदान करने वाला व्यक्ति है, CPI(M) राज्य सचिव पिनाराई विजयन, जो अब केरल राज्य के मुख्यमंत्री हैं। तस्वीर के बीच में मुस्कुरा रही हैं “मानवाधिकार कार्यकर्ता” तीस्ता सीतलवाड़।
इस पूरे तंत्र पर एक नज़र डालते हैं –
सिर्फ CPIM और पिनारई विजयन पर ही गुस्सा मत करिए। वर्ष 2011 में, कॉन्ग्रेस के मुख्यमंत्री ओमन चांडी, जिन्होंने उस दौरान मात्र 43 दिनों के लिए कार्यालय सम्भाला, ने उन पुलिस अधिकारियों के ख़िलाफ़ सभी आरोप हटा दिए थे, जिन पर नम्बी नारायणन मामले में गलत कार्य, यानि कदाचार का आरोप लगाया गया था।
पुलिस अधिकारी सिबी मैथ्यू, जिनकी टीम उपरोक्त ‘जासूसी की कहानी’ लेकर आई थी, केरल के मुख्य सूचना आयुक्त बनने के लिए उठे और वो बने भी।
यह भारतीय धर्मनिरपेक्षता का सबसे महत्वपूर्ण प्रकरण है।
इस बीच, नम्बी नारायणन अभी भी अपनी खोई हुई गरिमा और न्याय के लिए निरंतर लड़ रहे थे।
आखिरकार सितंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें ₹50 लाख का मुआवजा देने की घोषणा की और साथ ही केरल पुलिस अधिकारियों की भूमिका की जाँच करने के लिए न्यायमूर्ति डी के जैन की अध्यक्षता में एक समिति बनाई।
जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की बेंच ने कहा था कि 76 वर्षीय नम्बी नारायणन का मामला मानसिक प्रताड़ना से जुड़ा है। इसलिए केरल सरकार 8 हफ्तों के भीतर उन्हें ₹50 लाख मुआवजा दे। अदालत ने कहा था कि केवल मुआवजा दिया जाना ही पूर्ण न्याय नहीं है। इसीलिए बेंच ने इस मामले में केरल पुलिस अधिकारियों की भूमिका की जाँच के लिए 3 सदस्यीय कमिटी का भी गठन किया।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का यह दूसरा हिस्सा, जो केरल पुलिस अधिकारियों के करतबों के बारे में था, मीडिया की सुर्खियों में ज्यादा जगह नहीं बना सका। निश्चित रूप से भारतीय ‘धर्मनिरपेक्षता’ के कारणों से ही यह नहीं हो पाया।
वर्ष 2016 की शुरुआत में, मोदी सरकार ने जेएनयू में कुछ छात्र संगठनों के दुर्व्यवहारों पर नकेल कसी। उन ‘असंतुष्टों’ ने हर शहर में ‘उदारवादियों’ यानि तथाकथित ‘लिबरल’ लोगों की भीड़ को संबोधित किया और कम समय में ही एक जाना-पहचाना नाम बन गए। ये असंतुष्ट सेलिब्रिटी ‘Free Speech’ कार्यकर्ता बन गए। वास्तव में यह नालायक बेरोजगार ‘छात्रों’ का एक समूह मात्र है, जो कर अदा करने वाले लोगों के पैसे से लंबे समय तक जेएनयू में किसी ना किसी डिग्री लेने के बहाने बैठा रहता है।
देखिए कि इन नालायकों की तुलना में नम्बी नारायणन, जिस व्यक्ति के करियर और जीवन को भारतीय धर्मनिरपेक्षता के मुखौटे के तहत कुचल दिया गया, की इस कहानी को कितने लोग जानते हैं? उनका दोष यह है कि वह भारत के लिए रॉकेट इंजन बना रहे थे और ‘भारत के टुकड़े होंगे’ के नारे नहीं लगा रहे थे। जिस वजह से भारतीय ‘सेक्युलरिज़्म’ ने उन्हें समाप्त कर दिया।
लेकिन हम यह बताना तो भूल ही गए कि नम्बी नारायणन को प्रिंसटन यूनिवर्सिटी से अपनी डिग्री पूरी करने में मात्र 10 महीने ही लगे थे। मात्र 10 महीने? जेएनयू के ‘सेलेब्रिटी छात्रों’ ने अकेले टीवी स्टूडियो में ही 10 महीने से अधिक समय बिता दिया होगा।
लेकिन भारतीय ‘धर्मनिरपेक्षता’ ने नम्बी नारायणन को समाप्त कर दिया। जिस ‘क्रायोजेनिक इंजन’ पर वह काम कर रहे थे, उसके निर्माण में भारत को 20 साल लग गए, यह चौंका देने वाला तथ्य है। अपनी दिल दहला देने वाली दास्तान को वैज्ञानिक नम्बी नारायणन ने अपनी पुस्तक ‘रेडी टू फायर’ में लिखा है। देश के इस महान वैज्ञानिक के साथ साजिश के ख़िलाफ़ भारतीय जनता पार्टी को छोड़ किसी ने भी आवाज नहीं उठाई थी। भाजपा सांसद और अधिवक्ता मीनाक्षी लेखी ने कुछ वर्ष पहले मीडिया के सामने पूरी साजिश का ख़ुलासा किया था।
यह गणतंत्र दिवस है। अर्थात भारत देश के ‘सम्पूर्ण प्रभुत्वसंपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य’ को मनाने का एक क्षण, जैसा कि यह संविधान प्रस्तावना में ही वर्णित है। आपातकाल के समय ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी द्वारा डाला गए थे। एक प्रचलित कहावत के अनुसार, सत्य आपको मुक्त कर देगा, लेकिन पहले, यह आपको परेशान करेगा।
ऑल्ट न्यूज़ के संस्थापक प्रतीक सिन्हा ने कल कई लोगों की निजी जानकारियों को सार्वजनिक कर दिया था। ये वैसे लोग थे, जिनके विचार प्रतीक सिन्हा से नहीं मिलते। फ़ैक्ट चेकिंग की आड़ में सिन्हा ने ऐसे लोगों की निजी जानकारी सार्वजनिक करते हुए इस्लामी कट्टरपंथियों और जान लेने की धमकी देने वाले जिहादियों के लिए एक रास्ता दे दिया।
ऐसे लोगों की जानकारी बाहर आते ही इन सारे यूज़र्स को हत्या से लेकर तमाम तरह की हिंसक धमकियाँ मिलने लगीं, जो कि इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा सुनियोजित तरीके से चलाई जाती हैं। इनमें से एक यूज़र जिसका हैंडल @squintneon है, उसे लगातार ऑनलाइन जिहादियों से धमकियाँ दी जा रही हैं कि अब वो उसे पहचान सकते हैं और वो उसे छोड़ेंगे नहीं।
स्क्विंट नियॉन के ट्वीट का स्क्रीनशॉट
स्क्विंट नियॉन ने लगातार ऐसे इस्लामी जिहादियों को एक्सपोज़ किया था, जिसके कारण, अब उसकी पहचान सार्वजनिक होने पर उसे ये आंतिकी विचारों वाले लोग ढूँढ रहे हैं। मुहम्मद ज़ुबैर नाम के सहयोगी के साथ प्रतीक सिन्हा ने डॉक्सिंग करते हुए जानबूझकर स्क्विंट नियॉन को इन ऑनलाइन जिहादियों के समक्ष ला दिया। ऐसा यह यूज़र मानता है और मिल रही धमकियों से यह साबित भी हो रहा है। उसने पहले ‘लव जिहाद’ जैसे विषयों पर लिखा था।
स्क्विंट नियॉन के 25 जनवरी के ट्वीट का स्क्रीनशॉट (अकाउंट सस्पैंड होने के कारण इम्बेड नहीं किया जा सकता)
उनका मानना है कि प्रतीक और ज़ुबैर जैसे लोगों को उनके ऐसे पोस्टों से परेशानी होने लगी थी, जहाँ ऐसे जिहादियों और आतंकी विचारों वाले लोगों को एक्सपोज़ किया जाने लगा था। यही कारण है कि प्रतीक सिन्हा ने निजी जानकारियों को पब्लिक कर दिया ताकि वो डर जाएँ और चुप होकर रहें।
इसके बाद अजीबोग़रीब तरीक़े से ट्विटर ने पीड़ित का ही अकाउंट सस्पैंड कर दिया है! जिस पीड़ित पर हिंसक हत्या से लेकर परिवार को भद्दी गालियाँ देते हुए कई ट्विटर अकाउंट साफ़ दिख रहे हैं, उसी को ट्विटर ने सस्पैंड कर दिया है। ट्विटर की कार्यप्रणाली लोगों की समझ से बाहर है, जहाँ उस व्यक्ति को कोई कुछ नहीं कह रहा, जिसने किसी व्यक्ति की प्राइवेसी पर हमला किया, हत्या की धमकियाँ दिए जाने का कारण बना, सोशल मीडिया पर बेशर्मी से उसे परेशान किया।
कई लोगों ने इस बात पर ट्विटर और ट्विटर इंडिया को ज़लील किया कि ये पहली बार नहीं है जब ट्विटर ने कन्ज़र्वेटिव विचार रखने वालों का पक्ष लिया है। ट्विटर का ये व्यवहार कट्टरपंथियों की तरफ़ पूरी तरह बायस्ड है। ट्विटर के सीईओ तो ये कह कर पहले भी फँस चुके हैं कि उनके स्टाफ़ वामपंथ से प्रभावित हैं।
भाजपा के सांसद महेश गिरी ने भी ट्विटर के इस बर्ताव पर सवाल पूछा कि आखिर पीड़ित को ही सस्पैंड करने के पीछे उनकी क्या मंशा है?
Hello @TwitterIndia, Why has @squintneon been suspended? Just yesterday Congress trolls targeted one of their alleged admins & today the handle is suspended. Are you too playing from their side? @misskaul@PayalKamat
और तो और, एक ट्विटर यूज़र ने (जो प्रतीक सिन्हा की डॉक्सिंग का शिकार बन चुके हैं) बताया कि उनके द्वारा कई बार ज़ुबैर, ऑल्ट न्यूज़ के सह-संस्थापक, को रिपोर्ट किया जा चुका है, और ट्विटर ने ये बात भी मानी की उनके ट्वीट ट्विटर के नियमों का उल्लंघन करते हैं, फिर भी कोई एक्शन नहीं लिया गया।
I have more than 10 such replies from twitter saying Zubair was found violating rules of twitter but they never took any action. pic.twitter.com/Mp4d9KhEVL
प्रतीक सिन्हा ने जो किया है, वो निम्न स्तर का घटिया व्यवहार है जहाँ निजी खुन्नस के कारण उसने एक नवयुवक को जिहादियों की हिंसक विचारों के सामने ला खड़ा किया है। प्रतीक सिन्हा वामपंथी गिरोह के आँख का तारा है, जिसने तमाम लोगों के बुनियादी संवैधानिक अधिकारों पर हमला किया है। ट्वीटर ने इस नवयुवक का अकाउंट सस्पैंड करके बता दिया है कि वैचारिक स्वतंत्रता सिर्फ़ उन्हीं के लिए है, जो उनकी भाषा में, उनके विचारों को सहमति देते हैं।
बात लगभग 1995 के दौर की है, सत्ता की कुर्सी को लेकर केरल की कॉन्ग्रेस में भीतरी घमासान चल रहा था। उस दौर में मुख्यमंत्री के करुणाकरण के सुपुत्र ने अपने पिता के गुट के कुछ कॉन्ग्रेसी नेताओं का अपमान कर दिया था और विरोधी गुट के ए के एंटनी, इसका फ़ायदा उठाते हुए ख़ुद मुख्यमंत्री बनना चाहते थे। एंटनी के क़रीबी थे ओमन चंडी जो उस समय करुणाकरण के मंत्रालय में वित्त मंत्री थे।
करुणाकरण की ख़ास बात ये थी कि उनकी पुलिस विभाग में ख़ासी पहुँच और बड़ा रसूख था। रमन श्रीवास्तव (आईजी) जैसे अफ़सर उनके क़रीबी हुआ करते थे। पर अफ़सोस, अच्छे से अच्छे लोगों के भी विरोधी तो होते ही हैं और उस समय के एक डीआईजी सीबी मैथ्यूज (जो ओमन चंडी के करीबी थे) की रमन श्रीवास्तव से पटती नहीं थी।
मैथ्यूज को पता था कि रमन श्रीवास्तव के रहते वो डीजीपी नहीं बन सकते। तो करुणाकरण को सिंहासन से उखाड़ फेंकने की योजना बनी। इसी दौर में वहाँ आईबी के एडिशनल डायरेक्टर रतन सहगल थे जिन्हें बाद में सीआईए का एजेंट पाए जाने पर और इसरो के क्रायोजेनिक इंजन प्रोग्राम को बर्बाद करने कि उनकी साज़िशों का भंडाफोड़ होने पर उन्हें आईबी से निकाल बाहर किया गया था। रतन सहगल के सहयोगी थे आर बी श्रीकुमार, जो पहले से एंटनी गुट के क़रीबी थे और करुणाकरण सरकार को गिराने की साज़िश में शामिल भी थे।
मालदीव की मरियम रशीदा इसी वक़्त अपना वीज़ा बढ़वाने सीनियर इंस्पेक्टर विजयन के पास पहुँची। मौक़े का फ़ायदा उठाकर विजयन ने बदले में उनके सामने कुछ अनुचित ‘माँगें’ रखी। फ़लस्वरूप, रशीदा ने विजयन को झिड़का ही नहीं बल्कि आईजी से उनकी शिक़ायत करने की बात भी कह दी।
इतने ढेर सारे नाम सुनने पर शायद आपको आर बी श्रीकुमार का नाम जाना पहचाना-सा लगा होगा? ये वही हैं जिन्होंने बाद में मोदी पर 2002 के दंगों का फ़र्ज़ी आरोप लगाया था। आजकल ये आपको आम आदमी पार्टी की टोपी लगाए दिख जाएँगे। इतने लोगों के साथ आ जाने पर ये तय हो गया था कि मालदीव की कुछ औरतों, एक आईपीएस अफ़सर और कुछ इसरो के वैज्ञानिकों की कीमत पर जाल बुना जा सकता है।
अमेरिका भारत को क्रायोजेनिक तकनीक देने से मना कर चुका था और रूस से भी अब कोई उम्मीद नहीं थी। फिर भी, नाम्बी नारायणन और शशि कुमार इस प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे। जालसाज़ों को इतना पता था कि इनके ना होने से ये क्रायोजेनिक इंजन का प्रोग्राम डूबेगा और भारत का अन्तरिक्ष और मिसाइल कार्यक्रम कई साल पीछे चला जाएगा।
एक दिन सुबह अचानक ख़बर आनी शुरू हुई कि मालदीव की दो सुंदरियों मरियम रशीदा और फव्जिया हसन ने भारत के दो वैज्ञानिकों को हनी ट्रैप में फँसा लिया है। ज़िस्म और कुछ लाख डॉलर के बदले में इन वैज्ञानिकों ने भारत के क्रायोजेनिक इंजन का प्रोग्राम बेच डाला था!
मलयालम मीडिया से शुरू हुई इस ख़बर को राष्ट्रीय मीडिया में भी जगह मिली। फिर बी ग्रेड की फिल्मों जैसा कथानक लिखने वालों की ख़ोज हुई और मालदीव की औरतों, वैज्ञानिकों और मुख्यमंत्री के क़रीबी कहे जाने वाले बड़े पुलिस अधिकारियों की मसालेदार कहानियाँ गढ़ी गयीं। थोड़े ही दिन में लोगों को भी लगने लगा कि इसरो के इस जासूसी काण्ड में मुख्यमंत्री की भी मिली भगत है। आईजी रमन श्रीवास्तव और करुणाकरण पर शिकंजा कसने लगा।
लगातार अख़बारों में आती ख़बरों के मद्देनजर हाई कोर्ट ने मामले का संज्ञान लिया और ओमन चंडी ने इसी वक़्त इस्तीफ़ा दे दिया। आख़िरकार करुणाकरण को भी इस्तीफ़ा देना पड़ा और एंटनी मुख्यमंत्री बने। उन्हें पता था कि मामला तो कुछ है ही नहीं इसलिए केस सीबीआई को सौंप दिया गया।
नारायणन और शशि कुमार की घनघोर भर्त्सना हुई। ऑटो रिक्शा वाले तक नारायणन की पत्नी को पहचानकर बिठाने से इनकार करने लगे। यहाँ तक कि उनके बच्चों को भी जासूस-गद्दार का बच्चा बताया गया। सीबीआई ने जाँच शुरू की तो पहले ही हफ़्ते में पता चल गया कि शुरूआती सबूत ही फ़र्ज़ी हैं और इसमें कोई मुक़दमा नहीं बनता। फिर भी, मीडिया में वैज्ञानिकों के घर से काफ़ी नगद मिलने की ख़बरें उड़ाई गयी जो कि सीबीआई को कभी मिली ही नहीं थी।
सीबीआई ने अदालत में कहा कि ये केरल पुलिस की काफ़ी सोची समझी साज़िश थी। केरल पुलिस के सीबी मैथ्यूज, विजयन और के के जोशुआ के अलावा आईबी के आर बी श्रीकुमार पर मुक़दमा चलाने की सिफ़ारिश सीबीआई ने कर दी। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सभी अभियुक्तों को रिहा किया और केरल सरकार को पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई करने कहा।
सीबी मैथ्यूज को ओमन चंडी ने मुख्यमंत्री बनने पर चीफ़ इनफार्मेशन कमिश्नर बनाया। रतन सहगल भारत के परमाणु कार्यक्रम सम्बन्धी राज सीआईए को बेचते पकड़े गए और वो यूएसए भाग गए। आपको आर बी श्रीकुमार तीस्ता शीतलवाड के बगल में बैठे नजर आ जाएँगे। एंथनी तो भारत के रक्षा मंत्री ही हो गए और उनके बाद इस सरकार की शुरुआत में सेना के पास बीस दिन का गोला-बारूद था। हाँ, दोनों वैज्ञानिक फिर से शोध में नहीं गए और उन्हें क्लर्क वाला काम थमा दिया गया।
आप समझ सकते हैं कि इससे भारत के अन्तरिक्ष और मिसाइल कार्यक्रम का क्या हुआ होगा? शायद वो अंदाज़ा लगाना अब मुश्किल नहीं है।
हाल ही में, 2017 में जब कॉन्ग्रेस अन्तरिक्ष में जाने वाले क्रायोजेनिक इंजन का श्रेय लूट रही थी तो उन्होंने भारत को ये नहीं बताया था कि एक मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए उन्होंने भारत के इस सपने का क्या किया था?
भारत सरकार ने नारायणन को उनके वैज्ञानिक शोध के लिए पद्म सम्मान देने का फ़ैसला किया है। उनके शोध को छोड़ भी दें, तो राजनैतिक षड्यंत्रों से इतनी लम्बी लड़ाई लड़कर जीतने वाले के सम्मान में तालियाँ तो बनती ही हैं!