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ब्राह्मण, ब्राह्मणवाद और अब ब्राह्मणवादी पितृसत्ता

कुछ दिन पहले ट्विटर के संस्थापक जैक डोरसी कुछ तथाकथित महिला एक्टिविस्टों के साथ मीटिंग में थे और वहाँ से निकले तो बवाल हो गया। बवाल इसलिए हुआ कि जैक भैया ने एक फोटो खिंचाई, जिसमें उन्होंने ‘स्मैश ब्रैह्मिणिकल पैट्रियार्की’ का एक पोस्टर पकड़ा हुआ था। 

उस ग्रुप फोटो में बरखा दत्त भी थी। ज़ाहिर है कि उनके नाम भी गालियाँ पड़ीं। गालियों (जिसे ट्रोलिंग भी कहा जाता है) का मूल उद्देश्य यह बताना था कि पेट्रियार्की बस पेट्रियार्की है, और इसमें ब्राह्मणों को खींच लाना मूर्खता और अनभिज्ञता है। साथ ही, ऐसे पोस्टर के साथ खड़े होने का अर्थ है कि आप एक जाति के लोगों को बेवजह अपनी घृणा का निशाना बना रहे हैं, जबकि आपके पास आपकी बात को साबित करने का कोई प्रत्यक्ष या परोक्ष ज़रिया नहीं। 

पेट्रियार्की या पितृसत्ता लगभग हर समाज में है। इसमें जाति की गुंजाइश बिलकुल ही नहीं है क्योंकि हर जाति के, अधिकांश घरों में मर्दों ने हर समय औरतों को सताया है, उनकी पढ़ाई रोकी है, उनको बाहर जाने से रोका है, घसीटा है, पीटा है, नीचा दिखाया है। आप बुरी बातें सोचिए, और वो बातें हर समाज में, आर्थिक स्थिति, जाति, धर्म आदि से परे औरतों के साथ हो रही हैं, और वही पितृसत्ता का भयावह रूप है। 

इस पोस्टर के बाद हुई फ़ज़ीहत को बरखा दत्त ने, और उसी गिरोह के कई सदस्यों ने ये कहकर पोतने की कोशिश की कि ‘हमारे साथ तो ये ट्रोलिंग रोज होती है, वेलकम टू द गैंग’। अब आप यह बात देखिए कि किसी बात के हर दिन होने का ये क़तई मतलब नहीं कि वो सही है, या गलत। हर दिन बहुत सारे लोग सड़क पर गलत ट्रैक में चलते हैं, लेकिन वो सही नहीं हैं। हर दिन स्वरा भास्कर ट्रोल नहीं होती, वो ट्रोल तब होती है जब बकवास करती है, और मुद्दों को मरोड़कर चर्चा में आना चाहती है। 

बरखा दत्त ने, इस बवाल पर, ट्वीटों की झड़ी लगाकर ये कहना चाहा कि पेट्रियार्की तो हर जगह है लेकिन लाखों दलित महिलाओं के लिए पेट्रियार्की और सेक्सिज्म में अंतर नहीं। और इस बात के लिए ‘ब्रैह्मिनिकल पैट्रियार्की’ एक टर्म है जो इस्तेमाल में आता रहा है। 

ये बात कोरी गप्प है, और मैंने इस पोस्टर वाली नौटंकी से पहले इस नए मुहावरे के बारे में नहीं सुना था। अभी तक नारीवाद की बात होती रही तो पितृसत्ता को हर वर्ग के लोगों ने लताड़ा है। इसमें ब्राह्मणों को घुसाना इस सामाजिक समस्या को अचानक से एक पोलिटिकल टोन देने जैसा है। पोलिटिकल टोन से तात्पर्य है कि रेप, मर्डर, लिंचिंग जैसे हर सामाजिक मुद्दे की तरह इसे भी दलित-ब्राह्मण के डिस्कोर्स में घसीटकर ले आया गया है, जिसका कोई अर्थ नहीं है। 

बरखा दत्त लाख चीख़कर अंग्रेज़ी में फ़र्ज़ी बातें लिखे, लेकिन उससे समाज का यह सत्य कि पितृसत्ता का कोढ़ रंग, जाति, धर्म, और कई बार लिंग तक से ऊपर होता है, झुठलाया नहीं जा सकता। पितृसत्ता में पली लड़कियाँ स्वयं ही एक समय बाद, पावर के पोजिशन में जाने पर, पितृसत्ता का स्तंभ बन जाती है। जिन दलितों की बात बरखा कर रही हैं, शायद कभी उनके मुहल्ले में गई नहीं।

अगर वो वहाँ जाती तो देख पाती कि वहाँ की नारियाँ इस कैंसर को लेकर ऊँची जाति के महिलाओं से ज़्यादा मुखर हैं। लेकिन मुखर होने का यह मतलब बिलकुल नहीं कि वहाँ पेट्रियार्की नहीं है। इसका मतलब यह है कि इन जातियों की महिलाएँ स्वयं मज़दूरी भी करती हैं, तो आर्थिक रूप से सक्षम होने के कारण अपने पतियों को गाली देने से भी नहीं हटती। वो पिटती रहेगी, जो कि पितृसत्ता का उदाहरण है, लेकिन वो गाली भी देती रहती है, जो कि उनके संघर्ष का उदाहरण है। 

ये समझ पाना बहुत कठिन नहीं है। लेकिन, जब आपकी मंशा गलत हो, और आपकी बातों में एक जाति विशेष को हमेशा निशाने पर रखने का अघोषित लक्ष्य रहे, तो फिर आप अपने पेट खराब होने पर भी ब्राह्मणों को दोषी ठहरा देंगे ये कहकर कि वो तंत्रविद्या के उपासक रहे हैं। हालाँकि, आप पहले ही तंत्रविद्या को दक़ियानूसी बताकर उस पर विश्वास न करने का दावा भी ठोक चुकी होंगी। 

बात घूम-फिरकर यही है कि जैक जैसे आदमी को यो-यो टाइप, बिना टाय-पैंट वाला हैप सीईओ बनने के चक्कर में किसी भी समाज के, किसी भी वर्ग के लोगों द्वारा थमाए पोस्टर को बस इसलिए नहीं उठा लेना चाहिए कि उसमें से दो शब्द उसको समझ में आ रहे हैं। जिस समाज को आप नहीं समझते, वहाँ बस अपनी विचारधारा से मिलते लोगों को साथ मिल लेने से आप ज्ञानी नहीं हो जाएँगे, न ही इन्क्लूसिव और प्लूरलिस्ट। आप वहाँ अपनी अज्ञानता के कारण जैक से जैकऐस बन जाएँगे। 

ट्विटर ने इस पर प्रतिक्रिया दी कि ये पोस्टर सीईओ या कम्पनी की पॉलिसी का प्रतिनिधित्व नहीं करता। फिर आखिर वो करता क्या है? जैक की राहुल गाँधी या नरेन्द्र मोदी से मुलाक़ात किस कैपेसिटी में थी? क्या भारत के प्रधानमंत्री से, या राहुल गाँधी से कोई भी टॉम, डिक या हैरी मिल सकता है? जैक को दूसरे जैक, जैक मा, से पूछना चाहिए कि उसका भी नाम तो जैक ही है, उससे मोदी क्यों नहीं मिलते।  

ट्विटर ने ये कहा कि ऐसी मुलाक़ातें ट्विटर के वैल्यूज़ का प्रतिनिधि हैं जहाँ हम हर पक्ष को सुनते और समझते हैं। लोगों ने पूछा कि भाई हर पक्ष का मतलब क्या है, और दूसरे पक्षों से हुई मुलाक़ातों के फोटो या विवरण कहाँ हैं? ट्विटर जवाब नहीं दे पाया। 

ट्विटर और ट्विटर इंडिया की पॉलिसी हमेशा दक्षिणपंथी विचारधारा को हेट-स्पीच के नाम पर शैडोबेनिंग से लेकर ब्लॉक और सस्पैंड करने की रही है जबकि यहाँ आतंकवादियों और उसके हिमायतियों के हैंडल सदाबहार चलते रहे हैं। जब आप किसी स्टेट के द्वारा अपराधी साबित हो चुके आतंकी को अपना समर्थन देने वालों को, या उनके वैसे ट्वीट्स को बंद नहीं करते, तो फिर आपकी मंशा और पॉलिसी के बारे में डॉक्यूमेंट पढ़ने की ज़रूरत नहीं। 

भारत की उस अल्पसंख्यक आबादी को निशाना बनाना, जिसके ख़िलाफ़ चंद लोगों के अनुवाद किए विचार हैं, तथ्य नहीं, बताता है कि आपकी दिशा किस तरफ की है। यहाँ भारतीय राजनीति और लिबरल, वामपंथी और बिलबिलाते चिरकुट गिरोह का दर्द है क्योंकि सत्ता की चाबुक खींचकर मारनेवालों के हाथ से वो चाबुक छीन ली गई है। जिन्हें वो चाबुक मारते थे, उन्होंने चाबुक पकड़ लिए हैं। तो विक्टिम कार्ड खेलने से लेकर, नए प्रतिमान मैनुफ़ैक्चर करने का उद्योग तो फलेगा ही। 

इसीलिए, इस तरह की शब्दावली और एक खास जाति को सामूहिक निशाना बनाना आपकी समझ पर सवाल खड़े करता है। ब्राह्मणों को जो भी मिला है, वो उनकी विद्या और मेहनत का नतीजा है। उन्हें किसी ने आरक्षण नहीं दिया, किसी ने मुफ़्त में पढ़ने के लिए उपाय नहीं किए। कितने ब्राह्मणों का परिवार आज मिडिल/अपर इनकम ग्रुप में आता है, इसका कोई सर्वे अगर हो, तो पता चल जाएगा कि कौन क्या कर रहा है। 

सच तो यह है कि सत्ता, या पावर, सिर्फ एक बात पर निर्भर है, और वो है पैसा। जिसके पास पैसा है, वो चाहे जाति का दलित हो या सवर्ण, उसकी हर बात ज़ायज हो जाती है। ये बात भी है कि दलितों के पास पैसा बहुत कम केस में आया है। लेकिनजब दलित की बात करने वाला लालू यादव या मधु कोड़ा बन जाता है तो वो समाज को कैसे लूटता है ये जगज़ाहिर है। ऐसा आदमी पैसों के बल पर सत्ता के क़रीब जा सकता है, सत्ता पर क़ाबिज़ हो सकता है, अपराध करके बरी हो सकता है, किसी दूसरे समाज के लोगों पर क़हर बरपा सकता है। उसके लिए जाति महज़ एक शब्द बनकर कहीं दूर छूट जाती है। वो जाति से ऊपर उठ जाता है। 

बरखा दत्त जैसे लोग यह तो स्वीकारते हैं कि वो एक ऊँचे पोजिशन पर हैं, लेकिन यह नहीं स्वीकारते कि इसी ऊँचाई की वजह से वो सच्चाई से भी बहुत दूर हैं। दूसरी बात यह भी है कि कई बार लोग अपने किसी लक्ष्य का पीछा करते हुए, अपना ज़मीर त्याग देते हैं। बरखा दत्त ने वही किया है। 

सबरीमाला: केरल के वरिष्ठ नेता का आया भड़काऊ बयान, मंदिर के पुजारी को बोला ‘दानव ब्राह्मण’

सबरीमाला विवाद के चलते केरल के एक वरिष्ठ नेता का ऐसा बयान सामने आया है, जो मौजूदा स्थितियों को और भी ज्यादा बिगाड़ सकता है।

सबरीमाला मंदिर के मुख्य पुजारी को केरल के एक वरिष्ठ नेता ने ‘दानव ब्राह्मण’ कहकर बुलाया है। दरअसल, मन्दिर में दो महिलाओं में घुसने के आने के बाद मुख्य पुजारी द्वारा मंदिर के शुद्धिकरण समारोह को आयोजित करने की वज़ह से उन्हें वरिष्ठ नेता द्वारा ‘ब्राह्मण दानव’ (Brahmin monster) जैसा उपनाम दिया गया।

44 वर्षीय कनकदुर्गा और 42 वर्षीय बिंदु, हाल ही में सदियों पहले से चली आ रहीं परंपरा को दरकिनार करते हुए, सबरीमाला मंदिर में घुस गईं थीं। जिसके बाद कंदरु राजीवरू नाम के पुजारी ने पवित्र स्थान की पवित्रता बनाए रखने के लिए शुद्धिकरण समारोह का आयोजन किया।

पुजारी द्वारा इस शुद्धिकरण समारोह को आयोजित करने पर सार्वजनिक कार्य विभाग मंत्री और सीपीएम के वरिष्ठ नेता जी. सुधाकरण ने पुजारी के बारे में कहा है- “अगर किसी औरत के साथ अपवित्रों जैसा बरताव करेगा तो आप क्या उसे इंसान मानेंगे?”

शुद्धिकरण समारोह के कारण मंत्री जी ने पुजारी को जाति दानव कहा है। उन्होंने पुजारी को ब्राह्मण न होकर दानव ब्राह्मण बताया है। उनके अनुसार एक ब्राह्मण यदि दानव बन जाए, तो वो आतंक का रूप ले लेता है।

मंत्री जी ने पुजारी पर आरोप लगाया है कि वो शुद्ध ब्राह्मण नहीं हैं। उनके भीतर प्रभु अयप्पा के लिए न प्रेम भावना है, न इज्ज़त है, न निष्ठा है।

सबरीमाला मंदिर का इतिहास

आख़िर क्यों सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के अंदर जाने से मचता है बवाल…

इस मंदिर में भगवान अयप्पा विराजमान हैं। केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम से लगभग 175 किलोमीटर दूर स्थित पेरियार टाइगर रिजर्व क्षेत्र में यह मंदिर स्थित है। इस मंदिर की ऊंचाई समुद्रतल से एक हजार किलोमीटर है। यह हिंदुओं के तीर्थ स्थलों में प्रमुख स्थल है। प्रत्येक वर्ष इस मंदिर में करोड़ों की संख्या में भगवान अयप्पा का दर्शन करने भक्त आते हैं।

भगवान अयप्पा पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान विष्णु के मोहिनी स्वरूप और शिव के समागम का प्रतिफल बताए जाते हैं। पौराणिक मान्यता है कि भगवान परशुराम ने ही भगवान अयप्पा मंदिर की स्थापना की थी। लेकिन इतिहास की बातों के अनुसार अयप्पा केरल के पांडलम राजवंश के राजकुमार थे। भगवान अयप्पा को वानप्रस्थ आश्रम का प्रतीक माना जाता है। इसके साथ ही वे ब्रह्मचारी हैं। जिसकी वजह से विशेष उम्र की महिलाओं को उनके दर्शन करने की मनाही है।

नसीरुद्दीन शाह ने फिर दिया ‘अर्बन नक्सल’ के समर्थन में देश विरोधी बयान

बॉलीवुड के मशहूर एक्टर नसीरुद्दीन शाह अपने ताजा बयान के कारण एक बार फिर से विवादों में हैं। इससे पहले उन्होंने यूपी के बुलंदशहर कांड का जिक्र कर हिंदुस्तान में डर लगने जैसा बयान देकर देश विरोधी एजेंडे को हवा दी थी। उनके बयान का एक ऐसा ही वीडियो दोबारा सामने आया है, जो देश के खिलाफ इंटरनेशनल साज़िश की ओर इशारा कर रहा है। जिसे एमनेस्टी इंटरनेशनल ने हाथों-हाथ लिया।

भारत में धर्म के नाम पर घृणा की दीवार एक बार फिर खड़ी हो गई है। जो अन्याय के खिलाफ हैं उन्हें दण्डित किया जा रहा है। जो अधिकार माँग रहे हैं उन्हें जेलों में डाला जा रहा है। कलाकारों, अभिनेताओं, विद्वानों, कवियों को डराया जा रहा है। पत्रकारों को बोलने से रोका जा रहा है।


नसीरुद्दीन शाह

साथ ही उन्होंने ये भी कहा, “जो अन्याय के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं, उनके ऑफ़िसों पर छापे डाले जा रहे हैं, उनके लाइसेंस रद्द किये जा रहे हैं, उनके बैंक अकाउंट फ्रीज़ किये जा रहे हैं।”

उनका ये बयान एक तरह से ‘अर्बन नक्सल’ का खुला समर्थन है।

नसीरुद्दीन शाह का यहाँ तक कहना है, “आज जहाँ हमारा देश खड़ा है, वहाँ असहमतियों के लिए कोई जगह नहीं है। देश में केवल अमीरों और ताक़तवर लोगों को सुना जा रहा है। गरीब और वंचित कुचले जा रहे हैं। जहाँ कभी न्याय हुआ करता था वहाँ अब केवल अंधकार है।”

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने उनके बयान को #AbakiBaarManavAdhikaar हैशटैग के साथ न सिर्फ ट्वीट किया बल्कि ये दावा भी किया कि ‘भारत में फ्रीडम ऑफ़ स्पीच को दबाया जा रहा है। और मानव अधिकार कार्यकर्ताओं को डराया जा रहा है।’

देश में एक बार फिर नसीरुद्दीन शाह के बयान की आड़ लेकर विपक्षियों, छिपे ‘अर्बन नक्सल’ और वामपंथी गिरोहों के द्वारा फ़र्ज़ी डर और असहिष्णुता का माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है।

इससे पहले भी नसीरुद्दीन शाह का नाम देश-विरोधी बयानबाज़ी में शामिल रहा है। यूँ तो उनके कथनानुसार 2014 में मोदी के प्रति उन्होंने गहरा विश्वास जताया था, लेकिन तब की उनकी गतिविधि देखी जाए (तस्वीर देखें) तो उनके ‘गहरे विश्वास’ का मतलब समझ में आ जाता है। हम सोचने पर मज़बूर हैं कि अब ऐसा क्या हो गया है जो अतिसुरक्षित होने के बावजूद भी उन्हें इस देश में डर लग रहा है। कहीं इसके पीछे आने वाले चुनाव से पहले फिर से फ़र्ज़ी असहिष्णुणता का माहौल बनाने की कोई साज़िश तो नहीं!

स्क्रीन शॉट- साभार- इण्डिया टुडे

नसीरुद्दीन शाह एक कलाकार हैं उन्हें स्क्रिप्ट के आधार पर बोलने की आदत है। इस संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि उनका ताज़ा बयान एमनेस्टी से पैसे लेकर उसके द्वारा गढ़ी गई फ़र्ज़ी स्क्रिप्ट पढ़कर देश का माहौल ख़राब करने और विरोधियों को फ़र्ज़ी मुद्दा थमाने का हो।

चलते-चलते ये सूचना भी देता चलूँ कि नसीर जी की पिछले 7 सालों में 35 फ़िल्मों को बॉक्सऑफिस इंडिया पर ‘डिज़ास्टर’ की रेटिंग मिली है जो कि ऐसे महान अदाकार को लेकर देश के जनता की असहिष्णुता ही कही जा सकती है। ‘उह ला ला’ इनका आख़िरी हिट गाना है।

लंबी दूरी की ट्रेनों में लगाए जाएँगे मॉडर्न कोच, सरकार ने लिया अहम फ़ैसला

लंबी दूरी की ट्रेनों में सफर करने वाले यात्रियों की सुविधा को ध्यान में रखकर रेलवे मंत्रालय ने बड़ी घोषणा की है। राज्यसभा में रेल मंत्री पीयूष गोयल ने कहा, “यात्रा को आरामदेह बनाने के लिए सरकार पुराने कोच की जगह पर मॉडर्न लिंक हॉफमेन बुश कोच लगाने वाली है।”

आपको बता दें इस कोच की सबसे अच्छी ख़ासियत यह है कि सीबीसी कपलिंग होने की वजह से कोच के पलटने और आपस में टक्कर होने की संभावना कम हो जाती है। यदि आप सोच रहे हैं कि यह सीबीसी कौन सी बला है, ऐसे में आपको बता दें कि सीवीसी का पूरा नाम ‘सेंटर बफर कपलर’ है। यह एक आधुनिक तकनीक है, जिसकी वजह से ट्रेन के कोच आपस में नहीं टकराते हैं।

सदन में सवाल जवाब के दौरान मंत्री ने कहा, “एक सप्ताह की रिव्यू मीटिंग गुवाहाटी में आयोजित की गई थी, जहाँ हमने यह महत्वपूर्ण फ़ैसला लिया।” एक सवाल के जवाब में यह भी बताया गया कि किस तरह से इस सरकार के आने के बाद देश में मानव-रहित रेलवे क्रॉसिंग की संख्या में कमी आई है। यही नहीं पिछले नौ महीने में एक्सीडेंट की संख्या में भी अप्रत्याशित रूप से कमी आई है।

भाजपा सरकार ने रेलवे का काफी तेजी आधुनिकीकरण किया है। यही नहीं किसी भी सरकारी घोषणा के क्रियान्वयन के क्षेत्र में सरकार ने उल्लेखनीय काम किया है। सुरेश प्रभु के कार्यकाल के दौरान रेलवे के आधुनिकीकरण और पीयूष गोयल के नेतृत्व में परियोजनाओं के त्वरित कार्यान्वयन ने रेलवे की महत्वपूर्ण प्रगति में काफी मदद की है। मेट्रो ट्रांजिट सिस्टम, बुलेट ट्रेन, हाइपरलूप और अन्य हाई-स्पीड रेल परियोजनाएँ भी पाइपलाइन में हैं।

इस दर पर भारतीय रेलवे बाजार वैश्विक रेलवे बाजार का 10% यानी कि तीसरा सबसे बड़ा बाजार होगा और मेट्रो रेल 70% के साथ भारत के कुल रेलवे बाजार का सबसे बड़ा हिस्सा होगा।

भाजपा सरकार ने इन संभावनाओं की पहचान करने में काफी सफलता प्राप्त की है और रेलवे में भारी निवेश किया है। यूपीए कार्यकाल में लालू प्रसाद यादव और ममता बनर्जी जैसे बड़े नेताओं के रेलवे मंत्री होने के बावजूद दोनों सरकारों के बीच अंतर बहुत बड़ा है।

राजस्थान के शिक्षा मंत्री ने रॉबर्ट वाड्रा को दिया क्लीन चिट

राजस्थान की कॉन्ग्रेस सरकार में उच्च शिक्षा मंत्री भंवर सिंह भाटी ने रॉबर्ट वाड्रा को क्लीन चिट देते हुए कहा है कि उनके द्वारा जमीन खरीद में किसी भी तरह की अनियमितता नहीं की गई है। भाटी ने कहा कि राज्य और केंद्र में भाजपा के सरकार के रहते हुए जितने भी जांच कराए गए, उन सब में कहीं भी ऐसा साबित नहीं हुए कि जमीन खरीद में अनियमितता बरती गई है। भाटी ने रॉबर्ट वाड्रा का बचाव करते हुए उनके खिलाफ चल रहे मुकदमों को भाजपा की ओछी राजनीती और राजनितिक हथकंडा बताया।

यूपीए अध्यक्षा सोनिया गाँधी के दामाद वाड्रा का बचाव करते हुए कांग्रेस के मंत्री ने कहा;

“राज्य और केंद्र में 5 साल तक भारतीय जनता पार्टी की सरकार रहने के बाद भी इस मामले में जांच होने के बावजूद अब तक सिर्फ आरोप लगा सकी है। जिससे साफ पता चलता है कि इसमें कोई भी सच्चाई सामने नहीं है, इस मामले में राजनीतिक द्वेष के कारण ये आरोप लगाए जा रहे हैं।”

ज्ञात हो कि भंवर सिंह भाटी उसी कोलायत से विधायक हैं जहां रॉबर्ट वाड्रा की कम्पनी ने जमीन खरीद की थी। ज्ञात हो कि भंवर सिंह भाटी उसी कोलायत से विधायक हैं जहां रॉबर्ट वाड्रा की कम्पनी ने जमीन खरीद की थी। भाटी ने वाड्रा पर लगे आरोपों को अनर्गल बताया और कहा कि इनका सच्चाई से कोई वास्ता नहीं है। उन्होंने कहा कि भाजपा ने जनता से किये गए किसी भी वाडे को पूरा नहीं किया है और इसीलिए वो ऐसे आरोप लगा रही है। बता दें कि बीकानेर पहुंचे भाटी से जब वाड्रा के बारे में ये सवाल पूछा गया तब इन्होने ये बातें कही। ये मामला वाड्रा की कम्पनी को बीकानेर में 270 बीघा जमीन गलत तरीके से आवंटन करने से जुड़ा हुआ है, जिसका कांग्रेस के मंत्री ने बचाव किया है।

उधर आज ही डिफेंस डील के एक मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने दिल्ली की एक अदालत में रॉबर्ट वाड्रा के करीबी मनोज अरोड़ा की गिरफ्तारी के लिए याचिका दायर की है जिस से वाड्रा की परेशानियां बढ़ सकती है। ED ने अदालत से अरोड़ा के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी करने की मांग की। अभी कुछ दिनों पहले ही वाड्रा के अन्य करीबी जगदीश शर्मा से भी ED ने पूछताछ की थी जिसमे उसने बताया था कि उसे मनोज अरोड़ा के बारे में कोई जानकारी नहीं है। ईडी के अनुसार अरोड़ा इस मामले में एक महत्वपूर्ण व्यक्ति है जिस से पूछताछ के बाद कई राज से पर्दा उठ सकता है।

बता दें कि रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ कई राज्यों में जमीन खरीद में अनियमितता बरतने के केस चल रहे हैं। एक अन्य मामले उनपर हरियाणा के अमीपुर गाँव में अवैध रूप से पचास एकड़ जमीन खरीदने का मामला चल रहा है। उस समय हरियाणा में कांग्रेस की सरकार थी। इस मामले की जांच सीबीआई द्वारा की जा रही है। पिछले साल अगस्त में ही वाड्रा के खिलाफ सीबीआई ने राजस्थान में जमीन आवंटन से जुड़े अठारह मामलों में केस दर्ज किया था। पिछले महीने की शुरुआत में ही ईडी ने वाड्रा को समन किया था और उन्हें जांच एजेंसी के समक्ष पेश होने को भी कहा था।

विजय माल्या भगोड़ा आर्थिक अपराधी घोषित, अब होगी संपत्ति ज़ब्त

कर्ज़ में डूबी एयरलाइंस किंगफिशर के मालिक विजय माल्या को कड़ा झटका देते हुए मुंबई की धनशोधन निरोधक क़ानून (पीएमएलए) की विशेष अदालत ने उसे भगोड़ा ‘आर्थिक अपराधी’ घोषित कर दिया है। इस अधिनियम के तहत जिसे आर्थिक भगोड़ा घोषित किया जाता है, उसकी संपत्ति तुरंत प्रभाव से ज़ब्त कर ली जाती है।

आर्थिक अपराधी एक ऐसा व्यक्ति होता है जिसके विरुद्ध सूचीबद्ध अपराधों के लिए ग़िरफ़्तारी का वारंट जारी किया गया हो; या जो भारत छोड़ चुका हो ताकि यहाँ हो रही आपराधिक कार्रवाई से बचा जा सके; या वो विदेश में रहने लगा हो और इस तरह की आपराधिक कार्रवाई से बचने के लिए भारत आने से मना कर रहा हो। इस तरह के क़ानून के तहत 100 करोड़ रुपये से ज़्यादा की घोखाधड़ी, चेक का अनादर और लोन डिफ़ॉल्ट से संबंधित मामले आते हैं।

अदालत के इस फ़ैसले के बाद बैंकों के लगभग 9,000 हज़ार करोड़ रुपये के कर्ज़दार माल्या की संपत्तियों को अब ज़ब्त किया जा सकेगा। जानकारी के मुताबिक प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने विशेष अदालत के समक्ष विजय माल्या को भगोड़ा आर्थिक अपराधी घोषित करने संबंधी एक याचिका दायर की थी।

इस याचिका के परिणामस्वरूप अब भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम (एफईओए) के तहत माल्या का नाम पहले भगोड़े आर्थिक अपराधी के रूप में दर्ज हो गया है। ऐसा होने से अब माल्या के ख़िलाफ़ नए आर्थिक अपराध क़ानून के तहत कार्रवाई होगी।

विजय माल्या वर्ष 2016 में हज़ारों करोड़ रुपयों का गबन करके ब्रिटेन भाग गया था। गौरतलब है कि पिछले साल 10 दिसंबर को लंदन की वेस्टमिनिस्टर अदालत ने माल्या के प्रत्यर्पण पर भारत के पक्ष में फ़ैसला दिया था और उसे भारत भेजने की अनुमति दे दी थी।

राहुल गाँधी के महागठबंधन को कड़ा झटका, AAP के बाद SP और BSP ने भी किया किनारा

2019 लोकसभा चुनाव में भाजपा के सभी विरोधी दलों के एक साथ संगठित होने की अटकलों पर विराम लग गया है। आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह के बयान के बाद अखिलेश यादव और मायावती ने भी महागठबंधन से किनारा कर लिया है।

बीते शुक्रवार को दिल्ली में मायावती के आवास पर दोनों नोताओं के बीच बातचीत हुई। इस बैठक के बाद इंडिया टुडे रिपोर्ट के मुताबिक इस बात की अटकलें लगाई जा रही हैं कि उत्तर प्रदेश में सपा 35 जबकि बसपा 36 सीटों पर चुनाव लड़ सकती है। इसके अलावा 4 सीटों पर आरएलडी चुनाव लड़ेगी जबकि 4 सीटों को अभी रिज़र्व में रखा गया है।

यही नहीं इस रिपोर्ट में इस बात की भी चर्चा है कि राहुल और सोनिया के ख़िलाफ़ अमेठी और रायबरेली की सीटों पर दोनों ही दलों की तरफ से कोई उम्मीदवार नहीं उतारा जाएगा।

पिछले दिनों आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह ने एक इंटरव्यू के दौरान महागठबंधन को खारिज कर दिया था। इस इंटरव्यू में संजय सिंह ने कहा कि उनकी पार्टी दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और गोवा में किसी भी पार्टी के साथ गठबंधन नहीं करेगी। इस तरह आम आदमी पार्टी की तरफ से यह बयान आने के बाद महागठबंधन पर संकट के बादल साफ़ दिख रहे हैं।

दिल्ली में सपा–बसपा के इस मीटिंग के बाद कॉन्ग्रेस पार्टी को करारा झटका लगा है। तीन राज्यों में कॉन्ग्रेस द्वारा सत्ता में आने के बावजूद 2019 में मोदी लहर से अकेले पार पाना उसके लिए आसान नहीं होगा। भाजपा को रोकने के लिए राहुल गाँधी सभी नेताओं को एक मंच पर लाना चाहते थे। लेकिन मध्य प्रदेश मुख्यमंत्री शपथ ग्रहण समारोह में मायावती, ममता और अखिलेश की अनुपस्थिति ने राहुल के आरमानों पर पानी फेर दिया था।

IAS बी. चंद्रकला के घर में पड़ा CBI का छापा, इस आरोप में फँसी हैं बुरी तरह

आईएएस बी. चंद्रकला वो शख़्स हैं, जो हमेशा से ही अपने तेज-तर्रार रवैये की वज़ह से खबरों में आती रहती हैं। कभी अपने फैसलों को लेकर तो कभी अपने एक्शन को लेकर, लेकिन इस बार वो जिस कारण खबरों में आई हैं, वो उनकी छवि पर सवालिया निशान लगा सकता है।

आज शनिवार (5 जनवरी 2019) की सुबह लखनऊ में उस समय बवाल मच गया, जब सीबीआई का छापा आईएएस बी चंद्रकला के हुसैनगंज स्थित सफायर अपार्टमेंट पर पड़ा। ये छापेमारी अवैध खनन रखने के आरोप में की गई। सीबीआई ने ये जाँच की कार्रवाई हाई कोर्ट के आदेश पर की। इस छापेमारी के दौरान सीबीआई ने महिला आईएएस के घर से कई महत्त्वपूर्ण काग़ज़ात ज़ब्त किए हैं।

एक तरफ जहाँ सीबीआई की एक टीम सफायर अपार्टमेंट के फ्लैट नंबर 101 में छापेमारी कर रही थी, वहीं सीबीआई की दूसरी टीम हमीरपुर में 2 बड़े व्यवसायियों के निवास स्थान पर छापा मारा। इन दो बड़े व्यवसायियों का नाम रमेश मिश्रा और सत्यदेव दीक्षित हैं। ये दोनों ही शहर के दो बड़े मौरंग व्यापारी हैं। जाँच के दौरान सीबीआई ने कोई कोताही नहीं बरती। सोफे से लेकर बेड के अंदर तक देखा गया।

आईएएस बी. चंद्रकला की जिलाधिकारी के रूप में पहली बार पोस्टिंग अखिलेश सरकार के काल में हमीरपुर में ही हुई थी। चंद्रकला पर आरोप है कि उन्होंने 2012 में मौरँग खनन के पट्टे कर दिए थे। उस समय ऐसा करना नियमों के ख़िलाफ़ जाना और उनका उल्लंघन करने जैसा था क्योंकि उस समय ई-टेंडर के जरिये मौरँग के पट्टों को स्वीकृत करने का प्रावधान था।

आईएएस बी. चंद्रकला

आपको बता दें, बी चंद्रकला 2008 में आईएएस बनीं थीं। मूलरूप से तेलाँगना की निवासी बी. चंद्रकला को यूपी कैडर दिया गया था। इसके बाद मथुरा और इलाहाबाद में पोस्टिंग के दौरान वो अपने फ़ैसलों और तेज-तर्रार रवैये के कारण खूब चर्चा में रहीं। सोशल मीडिया पर सबसे एक्टिव रहने वाले आईएएस की सूची में वो सबसे जाना-माना नाम हैं, लेकिन अपनी एक गलती के कारण उन्हें सीबीआई की छापेमारी तक झेलनी पड़ी है। अब देखना ये है कि उन पर लगे इन संगीन आरोपों से वो खुद को कैसे बचा पाती हैं।

कुमारस्वामी ने UPA सरकार की योजना को बताया बोगस

कर्नाटक में कॉन्ग्रेस की मदद से सरकार चला रहे मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी ने अपने ही गठबंधन साथी कॉन्ग्रेस की योजना पर निशाना साधा है और उसे फर्जी करार दिया है। RTE यानी शिक्षा के अधिकार योजना को आड़े हाथों लेते हुए कुमारस्वामी ने कहा कि ये एक ऐसी योजना है जिसकी मदद से निजी विद्यालय काफी बड़े स्तर पर लूट मचा रहे है। सीएम ने ये बातें 84वें कन्नड़ साहित्य सम्मलेन में कही। कुमारस्वामी ने कहा कि RTE को सबको शिक्षा का अधिकार देने के लिए अस्तित्व में लाया गया था लेकिन अब यह निजी विद्यालयों के लिए ज्यादा से ज्यादा पैसे कमाने का जरिया बन रहा है और इसकी कीमत सरकारी स्कूलों को चुकानी पड़ रही है।

बता दें कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम को अप्रैल 2010 में तत्कालीन यूपीए सरकार द्वारा पूरे देश में लागू किया गया था। इस अधिनियम के तहत यह लक्ष्य रखा गया था कि पांच साल के भीतर 6 से 14 वर्ष तक की आयु के सभी बच्चों तक बुनियादी शिक्षा पहुंचा जाएगी। हलांकि ये क़ानून अपने लक्ष्य से काफी पीछे रह गया था और 2015 के शुरुआत में जब इसके पांच साल पूरे हुए तब ये खुलासा हुआ कि देश के 92 प्रतिशत विद्यालय इसके मानकों को पूरा नहीं कर रहे थे। उस समय जारी हुई “डाईस रिपोर्ट 2013-14” में कहा गया था कि इस क़ानून के मापदंडों को पूरा करने के लिए करीब 14 लाख और शिक्षकों की आवश्यकता है।

कुमारस्वामी का ताजा बयान इसीलिए चौंकाने वाला है क्योंकि वो अभी कॉन्ग्रेस की मदद से ही कर्नाटक में सरकार चला रहे हैं और मुख्यमंत्री बने हुए हैं और ये कानून भी तभी पारित किया गया था जब केंद्र में कॉन्ग्रेस नीत गठबंधन की सरकार थी। इसके अलावा सीएम ने कर्नाटक के सरकारी विद्यालयों में अंग्रेजी शिक्षा की भी वकालत की और कहा कि वो कन्नड़ को बचाने और उसे बढ़ावा देने के लिए पूरी तरह संकल्पित हैं लेकिन सरकारी विद्यालयों में अंग्रेजी लाने के लिए वह बाध्य हैं। उन्होने कहा कि ये विद्यार्थियों के भविष्य के लिए किया गया है।

ज्ञात हो कि बीते जुलाई में कर्नाटक सरकार ने प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षा के माध्यम को अंग्रेजी रखने का फैसला लिया था। इस का पूरे राज्य भर में विरोध हुआ था और आलोचकों ने जेडीएस सरकार पर मातृभाषा कन्नड़ को नजरअंदाज करने का आरोप लगाया था।

अभी कल ही कुमारस्वामी के पिता और जेडीएस के अध्यक्ष एचडी देवेगौड़ा का भी ऐसा ही कुछ बयान आया था जिससे पता चलता है कि कर्नाटक में जेडीएस-कॉन्ग्रेस में सबकुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री देवेगौड़ा ने कॉन्ग्रेस को नसीहत देते हुए कहा था कि वो क्षेत्रीय दलों से अच्छा बर्ताव करे। उसके इस बयान पर कॉन्ग्रेस ने भी प्रतिक्रिया दी थी और पार्टी के राज्याध्यक्ष दिनेश गुंडू ने राज्य के जेडीएस नेताओं को सार्वजनिक तौर पर ऐसे बयान न देने की सलाह दी थी। उन्होंने कहा था उन नेताओं को जमीनी हकीकत समझनी चाहिए।

इसके अलावा देवेगौड़ा ने अपने बेटे मुख्यमंत्री कुमारस्वामी के बारे में कहा था कि उन्हें गठबंधन सरकार चलाने के लिए काफी पीड़ा उठानी पड़ रही है। उन्होंने उन्हें ये पीड़ा बर्दाश्त करने की सलाह दी थी। विश्लेषकों का मानना है कि जेडीएस इस साल होने वाले लोकसभा के चुनावों में राज्य की एक तिहाई सीटों पर दावेदारी ठोकना चाहती है जिसके लिए ऐसे बयान देकर कॉन्ग्रेस पर दबाव बनाया जा रहा है।

बता दें कि आगामी लोकसभा चुनावों के लिए सीटों के बटवारे को लेकर अभी तक कॉन्ग्रेस और जेडीएस के बीच कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है और नेताओं ने कहा कि अभी इस बारे में बातचीत चल रही है।

SC ने ख़ारिज की हिज़्बुल मुजाहिदीन के सरगना सैयद सलाउद्दीन के बेटे की ज़मानत याचिका

सुप्रीम कोर्ट ने हिज़्बुल मुजाहिदीन सरगना और आतंकवादियों की घोषित वैश्विक सूची में शामिल सैयद सलाउद्दीन के पुत्र शाहिद युसुफ़ की ज़मानत याचिका ख़ारिज कर दी है। न्‍यायालय ने कहा कि निचली अदालत द्वारा जाँच पूरी करने के लिए राष्‍ट्रीय जाँच एजेंसी को और समय दिए जाने के बाद अभियुक्‍त को ज़मानत नहीं दी जा सकती।

जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ और हेमंत गुप्ता की पीठ ने कहा कि ट्रायल कोर्ट और दिल्ली उच्च न्यायालय के फ़ैसलों में कोई अवैधता नहीं है जिसने पहले उनकी ज़मानत याचिकाओं को ख़ारिज कर दिया था।

फ़िलहाल युसुफ़ न्यायिक हिरासत में है जिसे राष्ट्रीय जाँच एजेंसी ने 24 अक्टूबर 2017 को सेंट्रल कश्मीर के बड़गाम से गिरफ़्तार किया था। राष्ट्रीय जाँच एजेंसी ने आरोप लगाया है कि शाहिद युसुफ़ का संबंध प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन हिज़्बुल मुजाहिदीन से थे और वह अपने पिता के निर्देश पर सऊदी अरब में एक आतंकवादी संगठन से धन एकत्र कर रहा था। आतंकवाद फैलाने के लिए पाकिस्तान से जम्मू और कश्मीर तक हवाला के ज़रिए फंड भेजे जाने की सूचना के आधार पर यूसुफ़ के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया गया था।