भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के वैज्ञानिकों ने शुक्रवार (जनवरी 18, 2019) को संकेत दिया कि देश के पहले मानवयुक्त अंतरिक्ष मिशन ‘गगनयान’ से जाने वाले अंतरिक्ष यात्री पायलट हो सकते हैं। इसके लिए उड़ान का पर्याप्त अनुभव रखने वाले लोगों की तलाश इसरो द्वारा की जा रही है। इसरो के चेयरमैन के. सीवन ने कहा कि मानव अंतरिक्ष मिशन के लिए अंतरिक्ष यात्रियों के चयन में भारतीय वायुसेना और अन्य एजेंसियों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होगी।
बता दें कि गगनयान प्रोजेक्ट की घोषणा पिछले साल पीएम मोदी ने की थी। पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा था कि वर्ष 2022 तक आज़ादी के 75 साल पूरे होने के अवसर पर, भारत का बेटा या बेटी अंतरिक्ष में जाएगा। साल 2022 या उससे पहले ही, भारतीय वैज्ञानिकों ने मानवसहित गगनयान लेकर अंतरिक्ष में तिरंगे के साथ जाने का दृढ संकल्प लिया है। इस लक्ष्य के हासिल होते ही भारत मानव मिशन भेजने वाले दुनिया के शीर्ष देशों में चौथा देश होगा।
एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए सीवन ने कहा कि पहले मानवरहित ‘गगनयान’ को दिसंबर 2020 में प्रक्षेपित किए जाने की योजना है। दूसरा मानवरहित यान जुलाई 2021 तक भेजे जाने की उम्मीद है और फिर अंतत: दिसंबर 2021 तक पहला मानवयुक्त गगनयान मिशन पूरा किए जाने की सम्भावना है।
चंद्रयान-2 प्रतीकात्मक चित्र
बीते कुछ वर्षों में भारत ने अंतरिक्ष विज्ञान में कई बड़ी उपलब्धियाँ हासिल की हैं। इसरो प्रमुख के सीवन ने बताया कि भारत इस साल अप्रैल तक चंद्रयान-2 के लॉन्चिंग के लिए भी तैयार है। चंद्रयान -2 मिशन पर कुल 800 करोड़ रुपए खर्च किया जाना है। इस मिशन की मदद से चाँद से जुड़ी कुछ अहम जानकारियाँ जुटाने की कोशिश की जाएगी। इस मिशन लेकर इसरो पूरी तैयारी कर चुका है।
गगनयान की कुछ ख़ास बातें
1- गगनयान के तहत शुरुआती ट्रेनिंग भारत में होगी जबकि इसकी एडवांस ट्रेनिंग रूस में दी जाएगी। अंतरिक्ष में जाने वाले दल में महिला अंतरिक्ष यात्री के भी शामिल होने की संभावना है।
2- गगनयान मिशन को केंद्र सरकार ने ऐतिहासिक बताते हुए इसके लिए 10,000 करोड़ रुपए का फंड जारी किया था।
3- गगनयान मिशन में भारत, रूस और फ्रांस से भी मदद ले रहा है। इसरो अभी तक इस मिशन पर 173 करोड़ रुपए खर्च कर चुका है।
4- इसरो अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरिक्ष में भेजने के लिए सबसे बड़े रॉकेट जीएसएलवी मार्क-3 का उपयोग करेगा।
5- अंतरिक्ष में जाने वाले अंतरिक्ष यात्रियों को ‘व्योमनॉट्स’ के नाम से जाना जाएगा। व्योम शब्द का अर्थ अंतरिक्ष होता है।
प्रयागराज में होने वाला इस वर्ष का कुंभ मेला न सिर्फ़ अपनी भव्य तैयारियों के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि इसलिए भी केंद्र बिंदु बना हुआ है क्योंकि इस विशेष कुंभ मेले की धार्मिक मंडली की तैयारियों की समीक्षा ख़ुद देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की है। जहाँ एक तरफ इस कुंभ मेले के सफल आयोजन पर प्रधानमंत्री मोदी के कार्य की प्रशंसा हो रही है, वहीं दूसरी तरफ उनके आलोचक उन्हें घेरने से बाज नहीं आ रहे हैं।
हाल ही में, विनोद कापड़ी (फ़िल्म पिहू के निर्देशक, ज़ी न्यूज़ और इंडिया टीवी के पूर्व संपादक) ने जवाहरलाल नेहरू की एक फोटो को ट्विटर पर पोस्ट किया। इसमें उन्होंने दावा किया कि नेहरू ने 1954 के कुंभ मेले के दौरान डुबकी लगाई थी।
उनके ट्वीट का जवाब देते हुए एक यूज़र ने कॉन्ग्रेस नेता ए.गोपन्ना (A. Gopanna) की नेहरू की जीवनी – जवाहरलाल नेहरू: एन इलस्ट्रेटेड बायोग्राफी (Jawaharlal Nehru: An Illustrated Biography) – से वही फोटो पोस्ट की, जिसमें फोटो का जो कैप्शन दिया गया था, ‘1931 में इलाहाबाद में अपने पिताजी के अस्थि विसर्जन के दौरान जवाहरलाल नेहरू।’
Dont lie @vinodkapri This is Nehru immersing his father’s ashes in the Ganga at Allahabad. (A Gopanna’s biography of Nehru released today, p. 73). pic.twitter.com/1jAsxbZMo7
इस प्रकरण के चलते कापड़ी और उस ट्विटर यूज़र के बीच शब्द-जंग छिड़ गई। कापड़ी ने दावा किया कि यह फोटो नेहरू के पिता के अस्थि विसर्जन की नहीं हो सकती क्योंकि उस समय नेहरू की उम्र 42 वर्ष की थी। कापड़ी ने तर्क दिया कि जो फोटो उन्होंने पोस्ट की, उसमें नेहरू बड़े दिख रहे हैं। इसलिए वह फोटो 1954 के कुंभ की ही है, जब नेहरू की उम्र 65 वर्ष थी।
Dont lie @vinodkapri This is Nehru immersing his father’s ashes in the Ganga at Allahabad. (A Gopanna’s biography of Nehru released today, p. 73). pic.twitter.com/1jAsxbZMo7
बता दें कि ए गोपन्ना एक कॉन्ग्रेसी नेता हैं और फ़िलहाल वो एक प्रवक्ता होने के अलावा तमिलनाडु कॉन्ग्रेस के मीडिया विभाग के अध्यक्ष भी हैं। कॉन्ग्रेस नेता ए गोपन्ना ने नेहरू की जीवनी में नेहरू की इस फोटो को शामिल करते हुए कहा था कि यह 1931 में नेहरू द्वारा अपने पिता के अस्थि को विसर्जित करने से संबंधित है। पिछले साल मई में उनके द्वारा रचित ‘भारत के पहले प्रधानमंत्री की उनकी सचित्र जीवनी’ का अनावरण भारत के पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा किया गया था। इसलिए, बहुत कम संभावना है कि गोपन्ना अपनी पुस्तक में नेहरू की छवि को ग़लत बताएंगे।
इसके अलावा, ट्विटर यूज़र द्वारा ट्वीट की गई फोटो को पत्रकार विकास पाठक ने भी पिछले साल मई में पोस्ट किया था।
#nehru wearing a janeu immerses his father’s ashes in the Ganga at Allahabad. (A Gopanna’s biography of Nehru released today, p. 73). pic.twitter.com/jmbYR4Diwi
बता दें कि इस फोटो का उपयोग इंडिया टुडे के एक लेख में भी किया गया है। इसमें यह दावा किया गया कि यह फोटो नेहरू की माँ के अस्थि विसर्जन (1938) की है। नेहरू की माँ के अस्थि विसर्जन वाला तथ्य ओपन मैगज़ीन में प्रकाशित एक लेख में 1938 में भी दिया गया। ए गोपन्ना लिखित जीवनी, इंडिया टुडे और ओपन मैगज़ीन के लेख से तो यही स्पष्ट होता है कि नेहरू की यह फोटो उनके माता या पिताजी के अस्थि विसर्जित करने से संबंधित है। दोनों ही मीडिया तंत्रों में से किसी ने भी इस फोटो को 1954 के कुंभ से नहीं जोड़ा है।
यदि हम केंद्रीय कारागार नैनी से नेहरू की एक और फोटो को देखें, जो 19 अक्टूबर 1930 से 26 जनवरी 1931 के बीच उनके पाँचवें कारावास के दौरान ली गई थी, तो नेहरू अपनी उस फोटो में विवादित फोटो से मिलते-जुलते दिखते हैं।
नेहरू अपने पाँचवें कारावास के दौरान नैनी सेंट्रल जेल में, सौजन्य: http://nehruportal.nic.in
जब कॉन्ग्रेस पार्टी के एक नेता ने अपनी पुस्तक में इस विवादित फोटो को जवाहरलाल नेहरू के पिताजी के अस्थि विसर्जन से संबंधित दिखाया है और कुछ मीडिया हाउसों ने उसी फोटो को उनकी माँ के अस्थि विसर्जन से संबंधित कर प्रकाशित किया है तो फिर इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है कि यह फोटो 1954 के कुम्भ के आस-पास की तो बिल्कुल नहीं है।
ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब विनोद कापड़ी को झूठ फैलाते हुए पकड़ा गया हो। इससे पहले, कापड़ी को हिंसा के बारे में झूठ फैलाते पकड़ा गया था, जिसका संबंध उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर की हिंसा से था। जब झूठ पकड़ा गया, तो उन्होंने पुलिस पर ही उलटे-सीधे सवाल खड़े कर दिए थे।
भारतीयों के लिए तिरंगा सिर्फ एक ध्वज नहीं है, यह एक भावना है। इसे देखकर इंसान के भीतर का राष्ट्रवाद स्वत: ही जागरूक हो उठता है। ऐसे में तिरंगे का अपमान शायद ही कोई ऐसा भारतीय होगा, जो झेल सकता है।
2014 में लोकसभा चुनावों के दौरान केजरीवाल पर राष्ट्रीय ध्वज के अपमान का मामला सामने आया था। इसमें याचिका दर्ज करने वाले की शिकायत थी कि आम आदमी पार्टी के चुनाव चिह्न ‘झाड़ू’ को तिरंगे के साथ में लहराया गया है। अब कोर्ट ने इस पूरे मामले पर दिल्ली के सीएम केजरीवाल तथा आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं के खिलाफ FIR की अनुमति दी है।
मध्य प्रदेश के सागर जिले की एक अदालत ने आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल पर FIR की अनुमति 5 साल पहले के पुराने मामले में दे दी है। इस याचिका को दर्ज करने वाले का नाम राजेंद्र मिश्र है। इनकी शिकायत है कि 2014 में लोकसभा के चुनावों के दौरान केजरीवाल के साथ उनकी पार्टी के कुछ कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को झाड़ू के साथ लहराया था।
राजेंद्र मिश्र ने झाड़ू के साथ राष्ट्रीय ध्वज को लहराने पर इसे राष्ट्रध्वज का अपमान बताया और कोर्ट में याचिका दर्ज की। इस आधार पर ही कोर्ट ने फैसला लिया। फिलहाल केजरीवाल या आम आदमी पार्टी के किसी भी नेता ने इस मामले पर कोई भी बयान नहीं दिया है।
आपको याद दिला दें 2016 में योग दिवस के दिन पीएम मोदी द्वारा तिरंगे को ओढ़ने पर उन्हें काफी ट्रोल किया गया था, जिसमें कई राजनैतिक दल भी शामिल थे। ट्रोलिंग में आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता भी थे। अब सवाल यह है कि 2014 के इस मामले के दोबारा उजागर होने के बाद वही लोग क्या अपनी पार्टी और पार्टी के संयोजक केजरीवाल पर इस तरह के प्रश्न चिह्न लगाएँगे या फिर उनके समर्थन में सफाई पेश करेंगे।
पर्यावरण को जीवन देने वाले, 8 साल की उम्र से पर्यावरण के प्रति समर्पित होने वाले, विश्वेश्वर दत्त सकलानी का 96 की उम्र में निधन हो गया। उन्होंने अपना जीवन पर्यावरण को समर्पित कर दिया। जब वो आठ साल के थे, तब उन्होंने पहला पौधा लगाया था। अंतिम सांस लेने तक परिवार के मुताबिक उन्होंने करीब 50 लाख पौधे लगाए।
पर्यावरण के प्रति उनके समर्पण भाव को इस बात से समझा जा सकता है कि उनके परिवार में चार बेटे और पाँच बेटियाँ थीं, लेकिन उनके बेटे संतोष की मानें तो वो हमेशा कहा करते थे, “मेरे नौ बच्चे नहीं, 50 लाख बच्चे हैं, और मैं अब उन्हें जंगलों में तलाशा करूंगा।”
भाई और पत्नी की मृत्यु के बाद नहीं
टूटे विश्वेश्वर
भाई और पत्नी के निधन के बाद विश्वेश्वर के लिए उनका दुख भूल पाना मुश्किल था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। मौत का दुख सहने के लिए पौधे लगाने लगे। और अंतिम साँस लेने तक उन्होंने पर्यावरण को सुरक्षित करना अपना ज़िम्मा समझा। विश्वेश्वर नेटिहरी-गढ़वाल में पर्यावरण की तस्वीर बदल दी और करीब 50 लाख पौधे लगाए। पत्नी की मृत्यु के बाद आई दूसरी पत्नी भी उनकी इस मुहीम में शामिल हो गईं और लोगों को पर्यावरण के महत्व को समझाने लगीं।
1986 में प्रधानमंत्री ने किया सम्मानित
1986 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी भी उनके इस कार्य से प्रभावित हुए। तब विश्वेश्वर को इंदिरा प्रियदर्शिनी अवार्ड से सम्मानित किया गया था। उनके बेट संतोष स्वरूप सकलानी कहते हैं, “उन्होंने करीब 10 साल पहले देखने की शक्ति खो दी थी। पौधे रोपने से धूल और कीचड़ आँखों में जाता था, जिससे उन्हें परेशानी होने लगी थी। पिता जी जब छोटे थे, तब से उन्होंने पौधे रोपना शुरू किया था।” संतोष कहते हैं, “1958 में माँ का निधन हो गया, इसके बाद वो पेड़-पौधों के और करीब हुए।”
विश्वेश्वर ने तैयार कर दिया एक घना जंगल
सकलानी का काम भले ही उत्तराखंड तक ही सीमित रहा हो, लेकिन अपने जिले में उन्होंने पर्यावरण को बचाने का काम बखूबी किया। सूरजगांव के आस-पास उन्होंने एक घना जंगल तैयार किया, हालाँकि अब वह तेज़ी से गायब हो रहा है। उनके बेट संतोष कहते हैं, “दुर्भाग्य से जंगल का बड़ा हिस्सा पिछले कुछ सालों में खत्म हो गया है क्योंकि लोगों को दूसरे कार्यों के लिए जगह चाहिए।”
कहा जाता है अगर क्षमता हो तो इंसान क्या नहीं कर लेता, साधारण मिट्टी से भगवान की मूरत बनाने वाला एक कारीगर, मूर्ति निर्माण करके न केवल अपनी कारीगरी को जीवंत करता है अपितु उस मिट्टी को भी पूजन योग्य बना देता है, जिसके ज़मीन पर पड़े रहने की वज़ह से लोग केवल उसे धूल समझते हैं।
अपनी क्षमता का विस्तार करते हुए कुछ ऐसा ही कारनामा गुजरात के आणंद जिले में आने वाले झरोखा गाँव के जयेश पटेल ने कर दिखाया है। अभी तक आपको गाय का गोबर सिर्फ उपला (कंडा) बनाने वाली चीज़ लगती होगी। लेकिन जयेश ने गोबर से वो सभी चीज़ें निर्मित की हैं, जिनके बारे में कोई आम सोच वाला व्यक्ति सोच भी नहीं सकता है।
पर्यावरण का ख़्याल रखते हुए जयेश ने गोबर की मदद से इकोफ्रेंडली गमले, प्लाईवुड और अगरबत्ती निर्मित की है, जिनकी बिक्री गुजरात में धड़ल्ले से हो रही है। जयेश आज के समय में न केवल गाय का दूध बेचकर पैसे कमा रहे हैं, बल्कि गाय के गोबर से कई प्रयोग करके भी वो मालामाल हो रहे हैं।
जयेश हमारे आज के समाज में एक प्रेरणा की तरह हैं, जो अपने कार्य से इस बात की शिक्षा देते हैं कि गाय कोई ऐसा जानवर नहीं है, जिसका लालन-पालन केवल दूध के लालच में किया जाए।
जयेश के पास एक या दो गाय नहीं है बल्कि 15 गाय है। वो बेहद खुलकर इस पर बात करते हुए कहते हैं कि वो पहले गाय का दूध बेचकर पैसे कमा रहे थे लेकिन अब वो गाय के गोबर के प्रयोग से और भी ज्यादा धनवान बनते जा रहे हैं।
जयेश को एक किलो गोबर से 10 रुपए मिलते हैं और रोज़ाना के हिसाब से वो पूरे 14 से 15 किलो गोबर बेचते हैं। अपने द्वारा किए जा रहे गोबर के साथ प्रयोगों से हटकर जयेश ने बताया कि यदि चाहें तो इससे जैविक खाद बनाकर ऊँचे दामों पर बेचा जा सकता है।
इसके अलावा जयेश ने बताया कि वो गाय के गोबर का अधिक से अधिक उपयोग करने की कोशिशें करते हैं। इसलिए उन्होंने गोबर को सुखाने की मशीन भी बनाई है।
इस मशीन में वो गाय के गोबर को पहले सुखाते हैं और फिर उसका पाउडर बनाते हैं। इस पाउडर से वो अलग-अलग प्रॉडक्ट बनाने का प्रयास करते हैं और जो नहीं बना पाते हैं, उसे वो कच्चे माल के रूप में बेच कर भी पैसा कमा लेते हैं। अपने इस अनोखे विचार के कारण जयेश को गुजरात सरकार द्वारा 10 अवार्ड भी दिया जा चुका है।
नॉर्थ ईस्ट की नेशनल पीपुल्स पार्टी, मिजो नेशनल फ्रंट समेत नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक एलायंस (नेडा) की अन्य पार्टी के नेताओं ने राजनाथ सिंह से मिलकर नागरिकता संसोधन बिल को ठंडे बस्ते में डालने का आग्रह किया।
नागरिकता संसोधन बिल के मुद्दे पर राजनाथ सिंह से मिलने के लिए नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक एलायंस (नेडा) के सात नेता दिल्ली पहुँचे थे। नेडा की तरफ से राजनाथ सिंह से मिलने आए नेताओं में मुख्य रूप से मेघालय के मुख्यमंत्री कॉनराड संगमा, मिजोरम के मुख्यमंत्री जोरामथांगा और भाजपा नेता मित सिंह शामिल थे।
गृहमंत्री राजनाथ सिंह से मिलने आए नेडा के सभी नेताओं ने नागरिकता संसोधन बिल पर अपनी राय रखी। नेडा के नेताओं ने इस मुद्दे पर नॉर्थ ईस्ट की जनता व सिविल सोसाइटी के लोगों की भावनाओं के बारे में भी गृहमंत्री को बताया।
नेडा के सात नेताओं में से ज्यादातर लोगों ने बिल के विरोध में अपनी राय रखी। उन्होंने देश के गृहमंत्री से कहा कि बिल पर हमें पुनर्विचार की जरूरत है। संगमा ने इस मीटिंग के बाद कहा कि नॉर्थ ईस्ट के ज्यादातर मुख्यमंत्री इस मसले पर एकमत हैं।
ऐसे में बेहतर होगा कि सरकार इस बिल पर पुनर्विचार करे। गृहमंत्री ने इस मुलाकात के बाद कहा कि हम जल्द ही नॉर्थ ईस्ट के सभी मुख्यमंत्रीयों के साथ बैठकर नागरिकता संसोधन बिल पर गहराई से बात करेंगे।
नागरिकता संसोधन विधेयक एक नज़र में
राजीव गांधी सरकार के दौर में असम गण परिषद से समझौता हुआ था कि 1971 के बाद असम में अवैध रूप से प्रवेश करने वाले बांग्लादेशियों को निकाला जाएगा। 1985 के असम समझौते (ऑल असम स्टूडेंट यूनियन ‘आसू’ और दूसरे संगठनों के साथ भारत सरकार का समझौता) में नागरिकता प्रदान करने के लिए कटऑफ तिथि 24 मार्च 1971 थी। नागरिकता बिल में इसे बढ़ाकर 31 दिसंबर 2014 कर दिया गया है। यानी नए बिल के तहत 1971 के आधार वर्ष को बढ़ाकर 2014 कर दिया गया है। नागरिकता (संशोधन) विधेयक 2016 के तहत पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी व ईसाई शरणार्थियों को 12 साल के बजाय छह साल भारत में गुजारने पर नागरिकता मिल जाएगी।
ऑल असम स्टूडेंट यूनियन (आसू) के सलाहकार समुज्जल भट्टाचार्य के अनुसार इस विधेयक से असम के स्थानीय समुदायों के अस्तित्व पर खतरा हो गया है। वे अपनी ही ज़मीन पर अल्पसंख्यक बन गए हैं। कैबिनेट द्वारा नागरकिता संशोधन बिल को मंजूरी देने से नाराज़ असम गण परिषद ने राज्य की एनडीए सरकार से अलग होने का ऐलान किया है।
यह संशोधन विधेयक 2016 में पहली बार लोकसभा में पेश किया गया था। विधेयक के खिलाफ धरना-प्रदर्शन कर रहे लोगों का कहना है कि ये विधेयक 1985 के असम समझौते को अमान्य करेगा। इसके तहत 1971 के बाद राज्य में प्रवेश करने वाले किसी भी विदेशी नागरिक को निर्वासित करने की बात कही गई थी, भले ही उसका धर्म कुछ भी हो।
नया विधेयक नागरिकता कानून 1955 में संशोधन के लिए लाया गया है। भाजपा ने 2014 के चुनावों में इसका वादा किया था। कॉन्ग्रेस, तृणमूल कॉन्ग्रेस, सीपीएम समेत कुछ अन्य पार्टियाँ लगातार इस विधेयक का विरोध कर रही हैं। उनका दावा है कि धर्म के आधार पर नागरिकता नहीं दी जा सकती है, क्योंकि भारत धर्मनिरपेक्ष देश है। भाजपा की सहयोगी पार्टी शिवसेना और जेडीयू ने भी ऐलान किया था कि वह संसद में विधेयक का विरोध करेंगे। बिल का विरोध कर रहे बहुत से लोगों का कहना है कि यह धार्मिक स्तर पर लोगों को नागरिकता देगा। तृणमूल सांसद कल्याण बनर्जी के अनुसार केंद्र के इस फैसले से करीब 30 लाख लोग प्रभावित होंगे। विरोध कर रही पार्टियों का कहना है कि नागरिकता संशोधन के लिए धार्मिक पहचान को आधार बनाना संविधान के आर्टिकल 14 की मूल भावनाओं के खिलाफ है। जबकि भाजपा नागरिकता बिल को पारित करके असम व दूसरे राज्यों में रहने वाले बाहरी लोगों को देश से बाहर निकालना चाहती ताकि नॉर्थ ईस्ट के मूल नागरिकों को किसी तरह से कोई समस्या न हो।
मोदी सरकार की चर्चा में न रहनेवाली योजनाओं ने कितने लोगों के जीवन पर प्रत्यक्ष प्रभाव डाला है, वो नीचे दिए गए आँकड़ों से सामने आता है। न सिर्फ़ घर, बल्कि उसमें बिजली, पानी, गैस सिलिंडर की सुविधा के साथ-साथ रोज़गार की गारंटी को सम्मिलित करते हुए सरकार ने साबित किया है कि एक योजना में बाक़ी योजनाओं के समावेश से ग़रीबों के जीवन पर कितना फ़र्क़ पड़ सकता है।
राज्यों के सहयोग से ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा अप्रैल 2014 से 1.37 करोड़ आवासों का निर्माण कार्य पूरा किया गया। आवासों के निर्माण कार्य पूरा होने का वर्षवार ब्यौरा (प्रत्येक आवास का तस्वीर सहित संपूर्ण ब्यौरा pmay-g.nic.in पर उपलब्ध है) निम्न है :
आवासों के निर्माण कार्य पूरा होने का वर्षवार ब्यौरा
सारणी से स्पष्ट है कि जहाँ 2014-15 में 12 लाख आवासों का निर्माण हुआ था, वहीं 2018-19 में यह संख्या पाँच गुनी बढ़कर 65 लाख हो जाने वाली है।
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने 20 नवंबर, 2016 को प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण का शुभारंभ किया था। राज्यों के सहयोग से ग्रामीण विकास मंत्रालय को विश्वास है कि मार्च, 2019 तक एक करोड़ आवासों का लक्ष्य पूरा कर लिया जाएगा। पीएमएवाई-जी योजना के अंतर्गत निर्धनतम लोगों को आवास देने का लक्ष्य रखा गया है जो अभी कच्चे घरों में रहते हैं। 4.75 लाख घरों के निर्माण की मंजूरी लंबित है क्योंकि राज्य सरकारों द्वारा भूमिहीनों को ज़मीन देने का कार्य पूरा नहीं हो पाया है। ऐसे मामले तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और बिहार से संबंधित है।
ग्रामीण आवास कार्यक्रम से न सिर्फ गरीबों को आवास मिलता है बल्कि उन्हें महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत 90/95 दिनों का रोज़गार भी प्राप्त होता है। इन आवासों को सौभाग्य योजना के तहत विद्युत आपूर्ति की जाती है तथा उज्ज्वला योजना के तहत एलपीजी कनेक्शन दिए जाते हैं।
इन आवासों में स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत शौचालयों का निर्माण किया जाता है। 1.37 करोड़ ग्रामीण आवासों के लाभान्वितों के लिए दीनदयाल अंत्योदय योजना – राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत आजीविका के अवसर उपलब्ध कराए जाते हैं। पीएमएवाई-जी योजना के तहत निर्धनतम लोगों के चयन के लिए त्रिस्तरीय प्रक्रिया अपनाई जाती है – सामाजिक-आर्थिक जनगणना 2011, ग्राम सभा और जीयो–टैगिंग।
रक्षा मंत्री निर्मला सीतरमण ने सेना के मिलिट्री पुलिस कोर्प्स में महिला जवानों को शामिल करने के निर्णय को मंजूरी दे दी है। पूरी प्रक्रिया के तहत 20% महिलाएँ शामिल की जाएँगी।
रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने शुक्रवार (जनवरी 18,2019) को कहा कि सरकार ने सशस्त्र बलों में अपना प्रतिनिधित्व बढ़ाने के उद्देश्य से सैन्य पुलिस में महिलाओं को शामिल करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया है।
अभी तक महिलाएँ सेना में सिर्फ अधिकारी के पद पर, वो भी कुछ सीमित शाखाओं जैसे, मेडिकल, कानूनी, शैक्षणिक, सिग्नल और इंजीनियरिंग जैसी चुनिंदा शाखाओं में ही प्रवेश कर पाती थीं।
To improve representation of women in our armed forces Smt @nsitharaman takes a historic decision to induct women for the first time in PBOR role in Corps of Military Police 1/2 pic.twitter.com/PmEVEZ9h03
महिलाओं को सेना के सैन्य पुलिस के कुल कोर का 20% शामिल करने के लिए एक श्रेणीबद्ध तरीके से शामिल किया जाएगा। रक्षा मंत्री के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से इस खबर की घोषणा की गई।
इस साल सेना दिवस पर, महिलाओं ने इतिहास में पहली बार एक महिला, लेफ्टिनेंट भावना कस्तूरी ने समस्त पुरुष सेना की टुकड़ी की परेड की, जिसमें 144 पुरुष शामिल थे।
एक अन्य पहल में, एक महिला अधिकारी ने सेना की ‘डेयरडेविल्स मोटरसाइकिल डिस्प्ले’ टीम का नेतृत्व करते हुए मेहमानों को सलामी दी। कप्तान शिखा सुरभि ने 33 पुरुषों की टीम का नेतृत्व किया।
इस निर्णय के अनुसार, महिलाओं को सैन्य पुलिस के कुल कोर का 20% शामिल करने के लिए एक श्रेणीबद्ध तरीके से शामिल किया जाएगा। उनकी भूमिका बलात्कार और छेड़छाड़ के मामलों की जांच करने से लेकर सेना की सहायता के लिए जहां भी आवश्यकता होगी। इसे सेना में लैंगिक समानता की दिशा में एक अहम कदम के तौर पर देखा जा रहा है।
इस महीने की शुरुआत में, राज्यसभा में एक प्रश्न के लिखित जवाब में रक्षा मंत्रालय में राज्य मंत्री सुभाष भामरे ने कहा था कि सेना के पास महिलाओं के रूप में 3.80% कर्मचारी हैं, वायु सेना के पास 13.09% और नौसेना में 6% हैं।
मित्रो! 2010 में जब लगा था कि कश्मीर में आईएएस अफ़सर बनकर ये फ़ैसल अब उन लोगों से अपने बाप का दादा, परदादा का और बाकी सब का बदला लेगा, जिनकी गोलियों से बचकर वो भारतीय प्रशासनिक सेवा का हिस्सा बना है, तब किसी ने नहीं सोचा होगा कि एक दिन यही फैसल ‘डेफिनिट’ बनकर राजनीति में आने का ‘केजरीवाल टर्न’ ले लेगा।
जबसे ‘नई वाली राजनीति’ फ़ेम और मशहूर फ़िल्म समीक्षक सर अरविंद केजरीवाल प्रशासनिक सेवाओं को छोड़कर राजनीति में आए हैं, तब से आम आदमी जब किसी अफ़सर के राजनीति में आने की ख़बरें सुन लेता है, तो हफ़्ता भर वो खुद को चूँटी काटकर यकीन दिलाना चाहता है कि क्या वाक़ई में ये भी फ़िल्म रिव्यु लिखकर देश बदलने आया है?
भाई साहब ,ये किस लाइन में आ गए आप?
देश जानता है कि पिछले कुछ सालों में इस देश में ‘नई वाली राजनीति’ और ‘नई वाली हिंदी’ आज के युवा के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरी हैं। जो जलवा इन दोनों ने काटा हुआ है, तो जनता बस यही सवाल पूछ पा रही है, “कहें तो कहें क्या, करें तो करें क्या?” जातिवाचक पत्रकार चाहे गोदी मीडिया का नाम लेते हों लेकिन इस देश में छोटी गंगा बोलकर गंदे नाले में कुदा देने का जो गोरखधंधा है, उसकी TRP सबसे ज़्यादा है।
2010 में देश की सबसे प्रतिष्ठित संस्था का हिस्सा बनकर ‘मुस्लिम यूथ आइकन’ बने शाह फ़ैसल जम्मू कश्मीर चुनाव से पहले अपना पद छोड़ देते हैं और सबसे पहले उमर अब्दुल्ला से मिलने पहुंचते हैं, क्योंकि उनका मानना है कि उमर अब्दुल्ला कश्मीर के लिए फ़िक्र करते हैं। जबकि कई पीढ़ियों से कश्मीर पर राज करने वाले अब्दुल्ला परिवार ने कश्मीर की आवाम का आज तक कौन-सा भला किया है, शायद यह सब जानकारी सामरिक कारणों से गुप्त ही रखे गए होंगे, या फिर कभी हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की खुदाई में उस भलाई के कुछ अवशेष मिल सकें।
कौन नहीं जानता है कि उमर अब्दुल्ला और उनके परिवार ने कश्मीर की आवाम के लिए उतने ही प्रयास किए हैं, जितने कॉन्ग्रेस दलितों के लिए आज़ादी के बाद से करती आई है। हर चुनाव में दलितों का हितैषी माना जाने वाला राजपरिवार दलितों का कितना हिमायती है इस बात का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पंचवर्षीय आती और जाती रहीं, लेकिन देश का पिछड़ा दलित कभी अगड़ा नागरिक नहीं बन सका।
उसी तरह से संसद में पाक अधिकृत कश्मीर के मसले पर “POK क्या तुम्हारे बाप का है?” जैसे नज़रिया देने वाले फ़ारूक़ अब्दुल्ला उसी उमर अब्दुल्ला के बापू हैं, जो आपको कश्मीर के शुभचिंतक नज़र आते हैं। भारत-पाकिस्तान बँटवारे पर इन्हीं फ़ारूक़ अब्दुल्ला साहब की राय थी कि जिन्ना ने नहीं बल्कि नेहरू, गाँधी, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और सरदार पटेल ने मिलकर बँटवारा कराया था।
आपके कथनी और करनी दोनों से ही आप कश्मीर के युवाओं को ही नहीं, उन जैसे, और अपने जैसे युवाओं पर भी भरोसे करने जैसे विचारों को भी एकदम सड़क पर ला देते हैं। शाह साहब, आप वही हैं जिसने भारत को रेपिस्तान कहा था, इसलिए कन्हैया कुमार और JNU के देशद्रोही गिरोह से आपका सहानुभूति रखना तो बनता ही है।
रेपिस्तान वाला बयान सुनकर DSP भूरेलाल भी कह रहे हैं…
तो जनाब! अब बात करते हैं मुद्दे की। कश्मीर के 2010 बैच के IAS अफसर शाह फ़ैसल आ गए हैं नौकरी-पेशा का टंटा खत्म कर के उसी फ़िल्ड में, जिसके लिए प्राचीन दन्तकथाओं में एक राजमाता ने कहा था ‘बेटा सत्ता ज़हर है’। लेकिन क्या इसे महज़ इत्तेफ़ाक़ ही कहेंगे कि दन्तकथा के अगले अध्याय में वही राजमाता कहती हैं कि बेटा ज़हर की खेती करने वालों को सत्ता मत दो।
कितनी बड़ी दुविधा शाह फ़ैसल के जीवन में आ कर खड़ी हो गई है कि एक ओर जहाँ सामान्य श्रेणी का एस्पिरेंट UPSC लिखते-लिखते ‘मनोहर’ कहानियों को टक्कर देने वाला लेखक बन जाता है, लेकिन अफ़सर नहीं बन पाता है, वहीं शाह फ़ैसल अफ़सर बनने के दिन से ही कश्मीर के युवाओं के लिए कभी प्रेरणा बने, कभी क्रन्तिकारी बने, कभी उग्र अभिव्यक्तिकार बने, लेकिन कभी नेता नहीं बन पा रहे थे। सो वो अब दफ़्तर से अपना बोरिया-बिस्तरा उठाकर राजनीति की गलियों में क़दम रखने जा रहे हैं।
जबकि, प्रशासन में रहते हुए शाह फ़ैसल खनन घोटाला अधिकारी भी बन सकते थे, लेकिन अब उन्होंने शायद खनन घोटाला मंत्रालय चुनना बेहतर समझ लिया है। आईएस अफ़सर वाला जो स्वैग आईएस चंद्रकला सोशल मीडिया पर झोंका करती थी, मुखर्जी नगर में आधी भीड़ उसी स्वैग को लेकर उमड़ी हुई है। लेकिन अफ़सर बन जाने के बाद कमाई में इतना इज़ाफा होने की ख़बरें जबसे बाज़ार में गर्म हैं, उस दिन से भीड़ बढ़ ही रही है, कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। हालात ये हैं कि आज की डेट पर मुखर्जी नगर में उतने विश्वामित्र नहीं हैं, जितनी मेनकाएँ नज़र आती हैं। हालाँकि, ये मेरे जैसे एक ‘मिसोज़िनिस्ट’ का व्यक्तिगत मत हो सकता है।
सूत्र तो यह भी बता रहे हैं कि शाह फ़ैसल ने यह निर्णय ट्विटर पर चल रहे #10YearsChallenge की वजह से लिया है। 10 साल पहले जो हालात राजनीति में थे, वो उनको ही ‘रीस्टोर’ करने के मकसद से शायद राजनीति में उतरना चाह रहे हों। क्योंकि 10 साल में इस देश में हो चुकी है भैया लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की जमकर हत्या, जिस वजह से गुलफ़ाम हसन साहब का भी दम यहाँ घुटने लगा है।
अब आ ही गए हो तो ये लो यार अँगूर खाओ
मने हम कह सकते हैं कि JNU में जनता के टैक्स के पैसों, जिसमें मनुवादी, ब्राह्मणवादी सवर्णों का भी पैसा शामिल है, से मिलने वाली सब्सिडी पर नारे लगा रहे कन्हैया कुमार पर लगे देशद्रोह के आरोपों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उपहास बताकर राजनीति में पहला कदम तो शाह फ़ैसल आज रख ही चुके हैं। इसके बाद हमारी दिलचस्पी इस बात में और बढ़ गई है कि शाह फ़ैसल अब जब इस ज़हरीली राजनीति में उतर ही गए हैं, तो उनके अगले कदम क्या हो सकते हैं?
इसी उत्सुकतावश, हमारे स्लीपर सैल संवाददाता, अलीगढ़ जाकर ‘लाल कुँआ, पिलर लम्बर बारा’ के ठीक नीचे बैठे बाबा से मिले और उनसे आपके राजनीतिक भविष्य के बारे में उन्होंने राय माँगी। जिसके बाद बाबा ने हमें व्हाट्सएप्प यूनीवर्सिटी पर कुछ तस्वीरें भेजकर शाह फ़ैसल के रुझान जारी किए हैं, जिन्हें हम ‘ऐज़ इट इज़’ और बिना किसी एडिटिंग के एक्स्क्लुसिव्ली आपके साथ शेयर कर रहे हैं:
रामभक्तों के बीच अपनी सेक्युलर छवि को बुलंद करते फैजल महागठबंधन को अपनी नम आँखों से साक्षात देखते फैजलफ़िल्म रिव्यू देने की ज़िम्मेदारी लेकर सर केजरी के कामों में हाथ बंटाकर उनका काम हल्का करते फैजलमोदी जी के बदले व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी के प्रोपैगेंडापति को इंटरव्यू देते फैजलयोगी जी को गौरक्षा का वचन देते फैजलसामान्य वर्ग को 10% आरक्षण देने पर मोदी जी के गले पड़ते फैजलकुनाल कामरा को राहुल गाँधी से ज्यादा कॉमेडी करने और कट्टर हिन्दुओं के प्रति सतर्क करते फैजलकैंडिड तस्वीर लेते हुए लप्रेकी फैजल लालू जी का चारा तलाशते हुए फैजल
आप हमारे इरादों और मसख़री को दिल पर ना लें साहब! हम केजरीवाल के जले हैं, सो फ़ैसल को फूँक-फूँक कर पीना हमारी मज़बूरी हो चुका है।
किसानों से वादे करके सत्ता में आई कॉन्ग्रेस कर्ज़माफ़ी के नाम पर घोटाला और किसानों को गुमराह कर रही है। मध्यप्रदेश के खरगोन में किसानों से कर्ज़माफ़ी के नाम पर मज़ाक किया जा रहा है। दो महीने से कर्ज़माफ़ी का इंतजार कर रहे कुछ किसानों के पैरों तले जमीन तब खिसक गई, जब कर्ज़माफ़ी की सूची में उन्होंने देखा कि सूची में सिर्फ़ 25 और 300 रुपए माफ़ होना दर्शाया गया है।
अब सवाल उठता है कि 2 लाख रुपए तक कर्ज़माफ़ी का वादा कहाँ गया? मामले पर प्रशासन भी कोई हिसाब नहीं लगा पा रहा है। प्रशासन का कहना है कि 31 मार्च 2018 तक की अवधि में जिन किसानों पर ऋण है, उन्हीं की सूची जारी की गई है। ‘जय किसान ऋण मुक्ति योजना’ के तहत स्थानीय टाउन हॉल में कर्ज़माफ़ी की ये सूची लगाई गई थी।
ढाई लाख के कर्ज़ में हुई 25 रुपए की माफ़ी
जिन किसानों पर हज़ारों का कर्ज़ लदा हुआ था, उनका सिर्फ़ नाम मात्र का कर्ज़ माफ़ किया गया। जैतपुर के किसान प्रकाश की मानें तो उनपर ढाई लाख रुपए का कर्ज़ था लेकिन सिर्फ 25 रुपए माफ़ किया गया। इसी तरह सिकंदरपुरा के अमित के 300रुपए माफ़ होने का जिक्र है। अमित का कहना है कि उन पर 30 हजार रुपए का कर्ज़ था।
किसानों की मानें तो किसी भी असुविधा से बचने के लिए उन्होंने अपने स्तर पर कर्ज़ की राशि जुटाकर बैंक में जमा करवाई और खाता शून्य कर फिर से कर्ज़ लिया, लेकिन जारी की गई सूची में इस बात उल्लेख नहीं किया गया है। कृषि विभाग का कहना है कि जिले में 2,57,600 संभावित ऋणी कृषक हैं। इनमें सहकारी बैंक के 1,52,000 और राष्ट्रीयकृत बैंकों के 20,600 कृषक शामिल हैं।
उड़द खरीदी को लेकर भी नाराज़ है किसान
किसानों की मुश्किल सिर्फ कर्ज़माफ़ी तक ही सीमित नहीं है। शायद यही वजह है कि किसानों को अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करनी पड़ी, और उन्होंने औक दमोह-सागर हाईवे को जाम कर दिया। दरअसल, किसान उड़द ख़रीदी में कई समस्याओं से परेशान हैं। किसानों का आरोप है कि उनकी समस्या नहीं सुनी जा रही है और मामले का निराकरण नहीं हो रहा है।
कर्नाटक में भी मिल चुका है किसानों को धोखा, 397 किसान कर चुके हैं आत्महत्या
मध्यप्रदेश में कॉन्ग्रेस का ये पहला कारनामा नहीं है, यही कारण है कि केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावडेकर ने कॉन्ग्रेस पर आरोप लगाते हुए इस बात को स्पष्ट किया था कि कर्नाटक में 45 हज़ार करोड़ रुपए का कृषि ऋण माफ़ होना था, लेकिन 75 करोड़ रुपए का भी भुगतान नहीं किया।
इसके कारण किसानों को बैंक का नोटिस मिल रहा है। यही कारण है कि कॉन्ग्रेस सरकार के छह महीने के शासनकाल में 397 किसान आत्महत्या कर चुके हैं। किसानों के कुल 90 हजार करोड़ रुपए के ऋण के लिए कॉन्ग्रेस ने बजट में 3 करोड़ रुपए भी आवंटित नहीं किए हैं।
जिन किसानों ने नहीं लिया ऋण, उनको भी मिली ‘माफ़ी’
बीते दिनों मध्य प्रदेश के ग्वालियर में किसानों के साथ धोखा देने और घोटाला करने का का कारनामा सामने आया था। जिसमें सहकारी समितियों द्वारा जारी की गई ऋणदाताओं की सूची में उन किसानों का नाम भी डाल दिया गया था, जिन्होंने कोई कर्ज़ लिया ही नहीं। बावजूद इसके उनका कर्ज़ माफ़ कर दिया गया। जिसके बाद किसानों ने नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए जिला सहकारी केंद्रीय बैंक की शाखा व समितियों पर पहुंच कर आपित्त जताई थी कि बिना कर्ज़ के कैसी कर्ज़माफ़ी?
किसानों के कर्ज़माफ़ी की स्थिति नहीं बता पा रही कॉन्ग्रेस
राजस्थान में किसानों की कर्ज़माफ़ी का विवरण नहीं दिया जा रहा है। विधानसभा में सरकार से किसानों की कर्ज़माफ़ी व इससे जुड़ी औपचारिकताओं पर स्थिति स्पष्ट करने में भी नाकाम साबित हो रही है। प्रतिपक्ष के नेता गुलाब चंद कटारिया ने कहा, “सरकार ने इस प्रकार का लंगड़ा आदेश निकाल कर किसानों को भ्रमित किया है, सरकार स्पष्ट करे कि कर्ज़माफ़ी की घोषणा के एक महीना एक दिन के बाद कितना पैसा किसानों के खाते में पहुंचा।”