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‘भारत माता की जय’ के नारे को सुन भड़के स्कूल प्रिंसिपल फादर एडमंड, 3 छात्रों को बेरहमी से पीटा: VHP ने ऑपइंडिया को बताया- स्टाफ से लेकर पीड़ित के माता-पिता तक में फादर का डर

केंद्र शासित प्रदेश दीव के एक अंग्रेजी स्कूल में ‘भारत माता की जय’ और ‘जय हिंद’ बोलने पर स्कूल प्रिंसिपल द्वारा कुछ छात्रों की पिटाई का मामला सामने आया है। जानकारी होने के बाद से हिंदू संगठन सक्रिय हैं।

प्रिंसिपल का नाम फादर एडमंड मैस्करेनियस है। बताया जा रहा है कि उन्होंने प्रार्थना सभा के दौरान बच्चों को इसलिए मारा क्योंकि वे ‘भारत माता की जय’ और ‘जय हिंद’ कह रहे थे। मामला उठने के बाद प्रिंसिपल के खिलाफ शिकायत भी हो गई है।

शिक्षक दिवस पर प्रिंसिपल ने बच्चों को पीटा

जानकारी के मुताबिक, घटना 5 सितंबर की है। स्कूल में शिक्षक दिवस मनाया जा रहा था। प्रार्थना के दौरान राष्ट्रगान हुआ और उसके बाद कुछ बच्चों ने मिलकर ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाए। इन्हीं नारों की आवाज सुन प्रिंसिपल नाराज हो गए।

उन्होंने तीनों बच्चों को एक पंक्ति में खड़ा किया और फिर उन्हें बेरहमी से पीटा। अजीब बात ये है कि प्रिंसिपल को पता तक नहीं था वो नारेबाजी किसने की है, लेकिन फिर भी उन्होंने उन तीनों को पकड़कर मारा।

कहा जा रहा है कि अन्य बच्चे प्रिंसिपल से इतना डरते थे कि कोई भी उन्हें रोकने आगे नहीं आया। बच्चों के माता-पिता भी इस घटना पर डर से चुप्पी साधे रहे कि अगर उन्होंने आवाज उठाई तो इसका असर आगे चलकर उनके बच्चों पर पड़ेगा।

हिंदू संगठनों के कारण उठा मामल

बाद में इस घटना की जानकारी विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल जैसे संगठनों को सोशल मीडिया के जरिए हुई। उन्होंने ये मामला उठाया और जिला कलेक्टर को शिकायत पत्र भेजकर हेडमास्टर के खिलाफ शिकायत की, जिसकी प्रति ऑपइंडिया के पास मौजूद है।

मामले के संबंध में जब ऑपइंडिया को सूचना मिली तो हमने हिंदू संगठन के जिला समन्वयक भरतभाई सोलंकी से बात की। उन्होंने बताया कि निर्मला माता इंग्लिश स्कल दीव में है। नियमानुसार स्कूल में राष्ट्रगान बजाया जाता है, लेकिन समापन के बाद कोई ‘भारत माता की जय’ या कोई अन्य जयकार नहीं होती। पिछली 5 तारीख को जब स्कूल में शिक्षक दिवस मनाया जा रहा था तो कुछ स्कूली बच्चों ने भारत माता के नाम का जयकारा लगाया।

उन्होंने कहा, ”राष्ट्रगान खत्म होते ही एक बच्चे ने ‘भारत माता की जय’ चिल्लाया तो फादर तीन बच्चों को शेड में ले गए और बेरहमी से उनकी पिटाई की। बच्चे कहते रहे कि उन्होंने कुछ नहीं किया, लेकिन फिर भी उन्हें पीटा गया। घटना के बाद दो अन्य बच्चों को भी पीटा गया। इस तरह तीन बच्चों की पिटाई हुई।

जिला कलेक्टर को शिकायत देकर कार्रवाई की माँग

सोलंकी ने बताया कि उन लोगों को इस मामले की सूचना सोशल मीडिया के जरिए मिली थी। पूछताछ करने पर पता चला कि स्थानीय लोग फादर से डरते हैं। कारण यही है कि ज्यादातर आबादी गरीब और अशिक्षित है। उन्हें लगता है कि अगर कुछ कहा तो बच्चे को स्कूल से निकाल दिया जाएगा। फादर के खिलाफ स्टाफ तक मुँह नहीं खोलता।

हिंदू संगठनों ने इस मामले को सक्रियता से उठाया है। जिसके बाद दीव पुलिस ने आरोपित प्रिंसिपल एडमंड मैस्करेनियस के खिलाफ केस दर्ज किया। उसके खिलाफ बीएनएस की धारा 115 (2) और किशोर न्याय अधिनियम की धारा 82 (1) के तहत एनसी (असंज्ञेय अपराध) शिकायत दर्ज की गई है। ऑपइंडिया ने मामले पर अधिक जानकारी पाने के लिए दीव पुलिस से संपर्क करने की कोशिश की लेकिन नहीं हो सका। अधिक जानकारी प्राप्त होने पर लेख को अपडेट किया जाएगा।

पैसा दो, मुस्लिम बनो या फिर घर छोड़ दो… इस्लामी आतंकियों का ईसाइयों को अल्टीमेटम, रिपोर्ट्स में बताया- माली की 71 लाख जनता पीड़ित

पश्चिम अफ्रीका के देश माली में इस्लामी आतंकी समूहों ने ईसाई नागरिकों को इस्लाम कबूल कर लड़ने और पैसे देने या फिर घर छोड़ने का अल्टीमेटम दिया है। इस्लामी आतंकवाद के कारण अब माली में ईसाइयों के अस्तित्व पर प्रश्न खड़े हो गए हैं। इस्लामी आतंकवादी ईसाइयों को उनका देश की सेना के खिलाफ साथ देने के लिए धमका रहे हैं।

ईसाइयों के उत्पीड़न पर नज़र रखने वाले संगठन ‘ओपन डोर्स’ के अनुसार, इस्लामी आतंकियों ने माली मध्य क्षेत्र में रहने वाले ईसाइयों को धमकी दी है कि वह इस्लाम अपना लें और साथ ही अपना पैसा-रुपया भी आतंकवाद के लिए लड़ने को दें या फिर इलाका छोड़ दें।

इस क्षेत्र के ईसाई पादरियों को यह धमकी दी गई है। ईसाइयों को धमकियाँ देने वाले इस संगठन का नाम जमात नुसरत अल-इस्लाम वाल मुस्लिमीन (JNIM) है। JNIM आतंकवादियों ने ईसाई पादिरयों से बताया कि उन्हें सेना के खिलाफ लड़ने के लिए अपने लोग देने होंगे।

यह ऐसा अकेला मामला नहीं है। इस इलाके में इस्लामी आतंकी ईसाइयों, मुसलमानों और जनजातीय लोगों से ‘ज़कात’ वसूल रहे हैं। ओपन डोर से बात करते हुए, यहाँ के पादरी याबागा डायरा ने कहा, “उनलोगों ने इस जमीन पर कब्जा कर लिया है, उन्हें लगता है कि यह जमीन उनकी है। इसीलिए वह ईसाइयों से ज़कात देने के लिए कह रहे हैं जो मुस्लिमों को देना होता है। मुस्लिम गैर-ईसाई जनजातियाँ पहले से ही इसे अदा कर रही हैं।”

इस्लामी आतंकियों ने 2012 में माली में हमले चालू किए थे। इस दौरान आतंकियों ने सेना पर हमला करके उत्तरी हिस्सा कब्जा लिया था। उन्होंने इस इलाके में शरिया शासन की घोषणा कर दी थी। इस्लामी आतंकियों ने चर्चों, अन्य ईसाई संपत्तियों, स्कूलों और स्वास्थ्य केन्द्रों को भी तबाह कर दिया था।

एक अंतरराष्ट्रीय संगठन के अनुसार, माली में 71 लाख से अधिक लोग वर्तमान में सहायता चाहते हैं। इनमें से 40 लाख ऐसे हैं जिन्हें अपना घर बार छोड़ कर भागना पड़ा है। इस्लामी आतंकी समूह सरकारी कर्मचारियों और संयुक्त की शांति सेना के लोगों को भी मार रहे हैं। माली की सेना अब तक इन इस्लामी आतंकियों से अपना इलाका नहीं वापस छुड़वा सकी है।

2023 में, अमेरिकी विदेश विभाग ने माली पर हमला करने वाले आतंकी संगठनों के बारे में जानकारी दी थी। अमेरिका ने बताया था कि यहाँ मगरेब इलाके में में अल-कायदा और उसके साथअंसार अल-दीन, मैकिना लिबरेशन फ्रंट और अल-मौराबितौने शामिल थे। यह सभी JNIM के बैनर तले इकट्ठा हैं।

इस संगठन में अफ्रीका के सहेल क्षेत्र में ISIS भी शामिल था। यह आतंकी संगठन ऐसे लोगों को निशाना बनाते हैं जिन्हें वह अपनी परिभाषा के अनुसार इस्लाम ना मानने वाला समझते है। इनके पास अफ्रीका का उत्तरी और मध्य क्षेत्र के बड़े हिस्से का नियंत्रण है।

ओपन डोर्स की रिपोर्ट कहती है कि इस्लामी जिहादी अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों में ईसाईयों का अस्तित्व लगातार खत्म कर रहे हैं। ईसाइयों की मिशनरी और खास तौर पर महिलाएँ इस्लामी आतंकियों के निशाने पर हैं। ऐसी ही एक घटना में टिम्बकटू में स्विस ईसाई मिशनरी बीट्राइस स्टॉकली का 2016 में आतंकवादियों ने अपहरण करके मार दिया था।

माली के इस्लामी नियंत्रण वाले इलाके में क्षेत्र में गैर-मुस्लिम समुदाय अगर ईसाइयत अपनाता है तो उस पर अत्याचार किए जाते हैं। इसका शक भी होने पर हत्या कर दी जाती है। ईसाइयों को यहाँ उनके खेत और पानी से भी वंचित कर दिया जाता है। यहाँ मुस्लिमों ने जब स्कूल की माँग की तो आतंकियों ने इसमें कुरान और अरबी शिक्षा अनिवार्य कर दी।

इसके अलावा, इस्लाम को फैलाने के लिए इस्लामी आतंकी लड़कियों और कभी-कभी विवाहित महिलाओं का तक अपहरण करते हैं और फिर उनका अपने सदस्यों से निकाह करवा देते हैं। इन महिलाओं को इन आतंकियों का सेक्स स्लेव बन कर रहना पड़ता है।

ईसाई पुरुषों और लड़कों को तक उत्पीड़न का शिकार होना पड़ता है। उन्हें इस्लाम कबूल करने और हथियार उठाने के लिए मजबूर किया जाता है। माली के ईसाइयों को मजहबी कारणों सेयात्रा करने में भी कई प्रतिबंधों का सामना करना पड़ता है, उन्हें राजधानी के शहर बमाको के बाहर तक निकलने में दिक्कतें आती हैं।

कॉन्ग्रेस MLA की फोन टैप रिकॉर्डिंग सुनते थे अशोक गहलोत: राजस्थान के पूर्व CM की पोल उनके ही OSD रहे लोकेश शर्मा ने खोली, बताया- क्लिप लीक करने के दिए थे ऑर्डर

फोन टैपिंग के मुद्दे पर लोकेश शर्मा ने दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच की पूछताछ में राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री एवं कॉन्ग्रेस नेता अशोक गहलोत पर आरोप लगाए हैं। अपने लिखित बयान में शर्मा ने फोन टैपिंग में अपनी भूमिका से इनकार किया और गहलोत से पूछताछ करने की माँग की। अशोक गहलोत के मुख्यमंत्री रहने के दौरान शर्मा उनके OSD थे। उन्होंने तत्कालीन DGP, गृह विभाग के प्रिंसिपल सेक्रेटरी और सीएम के प्रमुख सचिव पर भी गंभीर आरोप लगाए।

अशोक गहलोत के मीडिया संबंधों को सँभालने वाले शर्मा ने सात पन्नों के अपने बयान में कहा कि 16 जुलाई 2020 को अशोक गहलोत ने उन्हें एक पेन ड्राइव दी और इसे मीडिया में लीक करने के लिए कहा था। अशोक गहलोत ने ये सब उस समय किया था, जब सचिन पायलट के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस विधायकों का एक समूह उनकी सरकार के खिलाफ बगावत कर दी थी।

शर्मा ने कहा कि उन्होंने पेन ड्राइव ले ली और उसे घर ले जाकर उसके कंटेंट को अपने लैपटॉप पर डाउनलोड किया। इसके बाद उसे अपने फोन में ट्रांसफर कर लिया। इसके बाद सीएम अशोक गहलोत के निर्देशानुसार सारी क्लिप मीडिया को भेज दी। उन्होंने कहा कि जब रिकॉर्डिंग वायरल हुई तो उन्हें पता चला कि वे बागी विधायकों और कुछ भाजपा नेताओं के बीच टैप की गई बातचीत की क्लिप थीं।

अपने बयान में शर्मा ने कहा, “अशोक गहलोत ने मुझे एक क्लिप मीडिया को भेजने को कहा था। मुझे नहीं था कि इस पेन ड्राइव में क्या है? गहलोत के निर्देश थे कि क्राइम ब्रांच में जाकर यह कहना है कि यह ऑडियो क्लिप सोशल मीडिया से मिली। गहलोत कॉन्ग्रेस विधायकों की फोन टैप की रिकॉर्डिंग सुनते थे। ये ऑडियो क्लिप कहाँ से आई, इसके लिए अशोक गहलोत से पूछताछ की जानी चाहिए।”

उन्होंने आरोप लगाया कि साल 2020 में राजस्थान सरकार पर छाए संकट के दौरान उनके समर्थक और बागी, दोनों पक्ष के विधायकों के फोन टैप किए गए थे। शर्मा ने अपनी जान को भी खतरा बताया है और अपने तथा अपने परिवार के लिए सुरक्षा की माँग की है। बता दें कि दिल्ली पुलिस ने लोकेश शर्मा पर गैरकानूनी तरीके से टेलीफोन पर बातचीत को रोकने का आरोप लगाया है।

लोकेश शर्मा ने कहा, “कहा जाता है कि मैंने फोन टैपिंग की। मुझ पर जो एफआईआर केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने करवाई है, उसमें लिखा हुआ है कि उनके फोन को गैरकानूनी तरीके से इंटरसेप्ट करके उसकी रिकॉर्डिंग को वायरल किया गया। हालाँकि, मैंने हमेशा यही कहा है कि फोन टैपिंग से मेरा कोई लेना-देना नहीं है।” शर्मा ने कहा कि उन्होंने वही किया, जो उनके बॉस अशोक गहलोत आदेश दे रहे थे।

दरअसल, राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच साल 2020 के राजनीतिक संकट के दौरान कुछ ऑडियो रिकॉर्डिंग वायरल हुई थीं। इन क्लिप में ऐसा लग रहा था कि भाजपा नेता अशोक गहलोत की सरकार को गिराने के लिए सचिन पायलट के खेमे के कॉन्ग्रेस विधायकों से बात कर रहे थे। ऑडियो वायरल होने के बाद राजनीतिक बवाल हो गया।

मामले की जाँच के लिए अशोक गहलोत ने राजस्थान पुलिस के विशेष अभियान समूह को सौंप दिया। इसमें भाजपा नेता और केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत से आवाज का नमूना देने के लिए कहा गया। ऑडियो में सुनाई दे रही एक आवाज को उनकी आवाज बताई गई थी। इसके बाद गजेंद्र सिंह शेखावत ने साल 2021 में दिल्ली पुलिस के क्राइम ब्रांच में लोकेश शर्मा के खिलाफ FIR दर्ज कराई।

क्या भारतीय नहीं हैं राहुल गाँधी? जानिए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गृह मंत्रालय से क्यों माँगा जवाब, कॉन्ग्रेस नेता की नागरिकता पर विवाद क्यों

राहुल गाँधी की नागरिकता का मामला बढ़ता चला जा रहा है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस मामले दायर की गई याचिका केंद्र सरकार से जवाब तलब किया है। हाई कोर्ट ने गृह मंत्रालय से राहुल गाँधी की नागरिकता पर उठे सवालों का जवाब देने को कहा है। राहुल गाँधी की नागरिकता पर पहले भी विवाद हो चुका है। इस मामले में अन्य लोगों ने भी देश की अलग-अलग कोर्ट में याचिकाएँ दायर की हुई हैं। सुप्रीम कोर्ट भी इस मामले में याचिका पर सुनवाई कर चुकी है।

इलाहबाद हाई कोर्ट ने क्या कहा?

इलाहाबाद हाई कोर्ट की जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस ओम प्रकाश शुक्ला की बेंच ने बुधवार (25 सितम्बर, 2024) को एस विग्नेश शिशिर की याचिका पर सुनवाई की। शिशिर ने हाई कोर्ट के सामने दावा किया है कि राहुल गाँधी के पास ब्रिटेन की नागरिकता है। शिशिर ने इस मामले में CBI जाँच की माँग की है।

याचिकाकर्ता शिशिर ने हाई कोर्ट को बताया कि उन्होंने केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय के सामने राहुल गाँधी की याचिका को लेकर दो आवेदन दिए हैं। यह आवेदन नागरिकता कानूनों के तहत दिए गए हैं। याचिकाकर्ता शिशिर ने गृह मंत्रालय में दिए गए आवेदनों पर कार्रवाई के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट का रास्ता लिया है।

हाई कोर्ट ने इस पर सुनवाई करते हुए गृह मंत्रालय से पूछा है कि उसने इन आवेदनों पर क्या एक्शन लिया है। हाई कोर्ट ने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल सूर्यभान पाण्डेय को आदेश दिया है कि वह गृह मंत्रालय की कार्रवाई का ब्यौरा कोर्ट के सामने रखें।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि वह अभी राहुल गाँधी की नागरिकता का परीक्षण नहीं कर रहा बल्कि वह यह जानना चाहता है कि आखिर गृह मंत्रालय इस मामले पर क्या कार्रवाई कर रहा है। हाई कोर्ट ने इससे पहले इसी मामले में डाली गई याचिका वापस लेने की अनुमति दी थी। यह याचिका भी शिशिर ने ही लगाई थी।

केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय के पास नागरिकता कानून के तहत यह शक्ति है कि वह किसी भारतीय नागरिक की विदेशी नागरिकता अपनाने के कारण और समय की जानकारी जुटा सके। शिशिर का आवेदन गृह मंत्रालय से राहुल की नागरिकता रद्द करने की माँग करता है।

याचिकाकर्ता शिशिर का दावा है कि राहुल गाँधी ब्रिटिश नागरिक हैं और ब्रिटिश सरकार ने 2022 में भेजे गए इमेल में इस बात के संकेत दिए हैं। यह भी बताया गया है कि ब्रिटिश सरकार राहुल गाँधी की नागरिकता पर तब तक जानकारी सार्वजनिक रूप से नहीं देगी जब तक गाँधी स्वयं इस बात के लिए आवेदन पर हस्ताक्षर ना कर दें।

सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका पर भी सुनवाई

सुब्रमण्यम स्वामी ने राहुल गाँधी की नागरिकता को इससे पहले दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका डाली थी। 20 अगस्त, 2024 को दिल्ली हाई कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई की थी। दिल्ली हाई कोर्ट ने इस याचिका को जनहित याचिका (PIL) बेंच को स्थानांतरित कर दिया था।

सुब्रमण्यम स्वामी ने अपनी याचिका में दावा किया था कि राहुल गाँधी एक ब्रिटिश नागरिक हैं और इस संबंध में अपनी जानकारी छुपाई है। स्वामी का कहना है कि राहुल गाँधी ने इस संबंध में जानकारी छुपाई है। स्वामी ने इस संबंध में कहा था कि उन्होंने गृह मंत्रालय में आवेदन दिया है लेकिन इस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है। वह इस याचिका पर कार्रवाई की माँग कर रहे थे। इस याचिका पर गुरुवार (26 सितम्बर, 2024) को होनी है।

राहुल गाँधी की नागरिकता पर लगातार विवाद

राहुल गाँधी की नागरिकता को लेकर विवाद पहली बार नहीं हो रहा है। राहुल गाँधी की नागरिकता का विवाद सुप्रीम कोर्ट तक जा चुका है। इससे पहले दिल्ली के दो लोगों ने राहुल गाँधी की नागरिकता पर प्रश्न उठाए थे। उन्होंने दावा किया था कि एक कम्पनी के 2005-06 के रिकॉर्ड में राहुल गाँधी को ब्रिटिश नागरिक बताया गया था। याचिका में दावा किया गया था कि राहुल गाँधी ने स्वेच्छा से ब्रिटिश नागरिकता ली है और इसकी जानकारी नहीं दी है। उन्होंने कहा था कि यह जनप्रतिनिधित्व अधिनियम का उल्लंघन है।

सुप्रीम कोर्ट में भी हो चुकी सुनवाई

राहुल गाँधी का मामला जब सुप्रीम कोर्ट पहुँचा था तो उसने इस याचिका को रद्द कर दिया था। 2019 में सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच सुनवाई करते हुए कहा था कि यदि कोई कम्पनी अपने कागजों में किसी को ब्रिटिश नागरिक बता देती है तो इससे वह वहाँ का नागरिक नहीं हो जाता। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि याचिकाकर्ता समाजसेवा करने की राजनीति कर रहे हैं।

कोर्ट ने सवाल उठाए थे कि आखिर याचिकाकर्ताओं ने 2019 का इन्तजार राहुल गाँधी की नागरिकता पर याचिका डालने के लिए क्यों किया। इस दौरान गृह मंत्रालय ने भी राहुल गाँधी से उनकी नागरिकता पर स्थिति साफ़ करने को कहा था। गृह मंत्रालय ने राहुल गाँधी को नोटिस जारी करके तथ्य देने को कहा था। इसको लेकर काफी बवाल हुआ था।

सिर्फ 2019 में ही नहीं बल्कि 2015 में भी सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी ही याचिका को ‘अजीब‘ करार दिया था। कोर्ट ने इस दौरान राहुल गाँधी को ब्रिटिश बताने के दावे के आधार वाले दस्तावेज पर भी प्रश्न उठाए थे। तब भी सुप्रीम कोर्ट के सामने यही दावे किए गए थे कि राहुल गाँधी ब्रिटिश नागरिक हैं और यह बात कम्पनी रिकॉर्ड से सामने आई है।

राहुल गाँधी की नागरिकता को लेकर लड़ाई मात्र कोर्ट में ही नहीं बल्कि संसद तक पहुँच चुकी है। भाजपा सांसद महेश गिरी ने ऐसे ही आरोप राहुल गाँधी के खिलाफ संसद की एथिक्स कमिटी के सामने लगाए थे। एथिक्स कमिटी ने भी राहुल गाँधी से जवाब माँगा था।

कॉन्ग्रेस का क्या है जवाब

राहुल गाँधी ने इस मामले में संसद कि एथिक्स कमिटी के नोटिस पर जवाब दिया था। राहुल ने एथिक्स कमिटी की नोटिस के सवाल पर बताया था कि उन्होंने कभी भी ब्रिटिश नागरिकता के लिए आवेदन ही नहीं दिया। उन्होंने कहा था कि नागरिकता को लेकर प्रश्न उनकी छवि धूमिल करने के उद्देश्य सेउठाए जा रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि वह एथिक्स कमिटी को अपने तरीके से निपट लेंगे। राहुल गाँधी की बहन और कॉन्ग्रेस नेता प्रियंका गाँधी ने इन दावों को हास्यास्पद करार दिया था।

प्रियंका गाँधी ने कहा था कि राहुल गाँधी इस देश में पैदा हुए और यहीं के लोगों के सामने पले बढ़े हैं। प्रियंका गाँधी ने कहा था कि उनके भाई की नागरिकता पर उठाए गए सवालों को आधारहीन करार दिया था। प्रियंका गाँधी ने कहा था कि नागरिकता के विषय में पूरा देश जानता है।

क्या शिव मंदिर को तोड़कर बनाई गई है मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह? कोर्ट में याचिका, जानिए अजमेर में हिंदुओं के पवित्र स्थलों में गोमांस खाने वाले थे कौन

राजस्थान के अजमेर जिला न्यायालय में मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के खिलाफ एक दीवानी वाद दायर किया गया है। इसमें कहा गया है कि अजमेर दरगाह एक शिव मंदिर है और इस पर कब्जा करके दरगाह बनाई गई है। कोर्ट में कहा गया है कि इस जगह को भगवान श्री संकटमोचन महादेव विराजमान मंदिर घोषित की जाए और मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए केंद्र को निर्देश दी जाए।

याचिका में कोर्ट से दरगाह समिति को परिसर पर किए गए अनधिकृत और अवैध कब्जे को हटाने का निर्देश देने की माँग की गई है। याचिका में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को दरगाह का सर्वेक्षण करने के निर्देश देने का आग्रह किया गया है। इसमें दावा किया गया है कि मुख्य प्रवेश द्वार की छत का डिज़ाइन हिंदू संरचना जैसी है, जो दर्शाता है कि यह स्थल मूल रूप से एक मंदिर था।

इस याचिका में आगे कहा गया है, “इन छतरियों की सामग्री और शैली स्पष्ट रूप से उनके हिंदू मूल को उजागर करती है। दुर्भाग्यवश, उनकी उत्कृष्ट नक्काशी रंगाई-पुताई और सफेदी के कारण छिपी हुई है। इसको हटाने के बाद उनकी असली पहचान और वास्तविकता को प्रदर्शित किया जा सकता है।” इसमें यह भी कहा गया है कि यहाँ के तहखाने में गर्भगृह होने के प्रमाण मौजूद हैं। 

हिंदू सेना के अध्यक्ष विष्णु गुप्ता ने अपनी याचिका में तर्क दिया है कि ऐसा कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है, जो यह दर्शाता हो कि अजमेर दरगाह खाली ज़मीन पर बनाई गई है। इसके बजाय, ऐतिहासिक विवरण बताते हैं कि उस जगह पर महादेव मंदिर और जैन मंदिर थे, जहाँ हिंदू एवं जैन भक्त अपने देवताओं की पूजा करते थे। यहाँ पर हिंदू भगवान शिव का जलाभिषेक करते थे।

वाद में अजमेर निवासी हरविलास शारदा की साल 1911 में लिखी पुस्तक ‘हिस्टोरिकल एंड डिस्क्राप्टिव’ का हवाला दिया है और कहा है कि मौजूदा 75 फीट ऊँचे बुलंद दरवाजे के निर्माण में मंदिर के मलबे का इस्तेमाल किया गया है। हरविलास शारदा ‘रॉयल एशियाटिक ब्रिटेन एंड आयरलैंड’ के सदस्य थे। इसके साथ ही वे अजमेर में एडिशनल एक्स्ट्रा कमिश्नर भी रहे।

विष्णु गुप्ता ने अधिवक्ता शशि रंजन कुमार सिंह के माध्यम से यह वाद दायर किया है। इसकी सुनवाई 10 अक्टूबर को होने की संभावना है। दरअसल, मुस्लिमों का दावा है कि अजमेर दरगाह उनके सूफी संप्रदाय के संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की मजार है। यहाँ स्थित मोइनुद्दीन चिश्ती की कब्र पर हर साल बड़ी संख्या में मुस्लिम चादर चढ़ाने आते हैं।

अजमेर दरगाह के खादिमों ने जताई आपत्ति

हिंदू सेना की याचिका पर अजमेर दरगाह की ओर से आपत्ति जताई गई है। अखिल भारतीय सूफी सज्जापदानशीं परिषद के अध्यक्ष एवं दरगाह के दीवान सैयद जैनुल आबेदीन के उत्तराधिकारी नसीरूद्दीन चिश्ती और दरगाह के खादिमों की संस्था अंजुमन सैयद जागदान के सचिव सरवर चिश्ती ने इसे बेबुनियाद बताया है।

इन लोगों ने कहा कि अगर धार्मिक स्थलों पर झूठी और बेबुनियाद साजिश रची गई तो बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इसमें आगे कहा कि इतिहास पर नजर डालें तो दरगाह ख्वाजा साहब को लेकर कभी आपत्ति नहीं जताई गई। मुगलों से लेकर खिलजी और तुगलक, हिंदू राजाओं और यहाँ तक कि मराठों ने भी दरगाह को बड़े सम्मान के साथ देखा और अपनी आस्था व्यक्त की।

मुख्यमंत्री भजन लाल को भी लिखी जा चुकी है चिट्ठी

इससे पहले इस साल जनवरी में ‘महाराणा प्रताप सेना’ के अध्यक्ष राष्ट्रीय अध्यक्ष राजवर्धन सिंह परमार ने इसके लिए पत्र लिखा है। राजवर्धन सिंह ने कहा था कि ये दरगाह हिंदू मंदिर को तोड़कर बनाया गया है, जिसकी ASI सर्वे बहुत जरूरी है। इस सर्वे से सारा स्पष्ट हो जाएगा। उन्होंने राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से भी जाँच की माँग की थी और यही माँग भजनलाल शर्मा से भी की।

राजवर्धन सिंह परमार ने सोशल मीडिया पर एक पत्र और वीडियो शेयर करके कहा था, “अजमेर दरगाह कोई दरगाह नहीं बल्कि एक हिंदू मंदिर है।” उन्होंने दावा किया था कि ‘महाराणा प्रताप सेना’ ने पहले इसे राजस्थान में अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार के संज्ञान में लाया था। ये अलग बात है कि कॉन्ग्रेसी सरकार ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की।

राजवर्धन सिंह परमार ने कहा था कि इसके लिए उन्होंने राजस्थान के कई जिलों में ‘जन जागरण यात्रा’ निकाली थी और इस दौरान लोगों ने उनकी इस माँग का समर्थन किया था। उन्होंने सीएम भजनलाल से अनुरोध किया था कि वे आवश्यक निर्देश जारी करें और अयोध्या में बाबरी ढाँचे और वाराणसी में ज्ञानवापी ढाँचे की जाँच की तरह अजमेर के दरगाह की भी जाँच करवाएँ।

अजमेर दरगाह को लेकर क्या कहता है इतिहास

मोइनुद्दीन चिश्ती को लेकर इतिहासकार एमए खान ने अपनी पुस्तक ‘इस्लामिक जिहाद: एक जबरन धर्मांतरण, साम्राज्यवाद और दासता की विरासत’ (Islamic Jihad: A Legacy of Forced Conversion, Imperialism, and Slavery) में विस्तार से लिखा है। उन्होंने लिखा है कि मोइनुद्दीन चिश्ती, निज़ामुद्दीन औलिया, नसीरुद्दीन चिराग और शाह जलाल जैसे सूफी संत जब इस्लाम के मुख्य सिद्धांतों की बात करते थे तो वे वास्तव में रूढ़िवादी और असहिष्णु विचार रखते थे।

उदाहरण के लिए, सूफी संत मोईनुद्दीन चिश्ती और औलिया इस्लाम के कुछ पहलुओं जैसे- नाच (रक़) और संगीत (सामा) को लेकर उदार थे, जो कि उन्होंने रूढ़िवादी उलेमा के धर्मगुरु से अपनाया, लेकिन एक बार भी उन्होंने कभी हिंदुओं के उत्पीड़न के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया। औलिया ने अपने शिष्य शाह जलाल को बंगाल के हिंदू राजा के खिलाफ जिहाद छेड़ने के लिए 360 अन्य शागिर्दों के साथ बंगाल भेजा था।

इस पुस्तक में इस बात का भी जिक्र किया है गया है कि वास्तव में, हिंदुओं के उत्पीड़न का विरोध करने की बात तो दूर, इन सूफी संतों ने बलपूर्वक हिंदुओं के इस्लाम में धर्म परिवर्तन में भी बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी। यही नहीं, ‘सूफी संत’ मोइनुद्दीन चिश्ती के शागिर्दों ने हिंदू रानियों का अपहरण किया और उन्हें मोईनुद्दीन चिश्ती को उपहार के रूप में प्रस्तुत किया।

यह भी एक ऐतिहासिक तथ्य है कि चिश्ती, शाह जलाल और औलिया जैसे सूफी ‘काफिरों’ के खिलाफ जिहाद छेड़ने के लिए भारत आए थे। उदाहरण के लिए- मोइनुद्दीन चिश्ती, मुइज़-दीन मुहम्मद ग़ोरी की सेना के साथ भारत आए और गोरी द्वारा अजमेर को जीतने से पहले वहाँ गोरी की तरफ से अजमेर के राजा पृथ्वीराज चौहान की जासूसी करने के लिए अजमेर में बस गए थे। यहाँ उन्होंने पुष्कर झील के पास अपने ठिकाने स्थापित किए।

मध्ययुगीन लेख ‘जवाहर-ए-फरीदी’ में इस बात का उल्लेख किया गया है कि किस तरह चिश्ती ने अजमेर की आना सागर झील, जो कि हिन्दुओं का एक पवित्र तीर्थ स्थल है, पर बड़ी संख्या में गायों का क़त्ल किया, और इस क्षेत्र में गायों के खून से मंदिरों को अपवित्र करने का काम किया था। मोइनुद्दीन चिश्ती के शागिर्द प्रतिदिन एक गाय का वध करते थे और मंदिर परिसर में बैठकर गोमांस खाते थे।

इस अना सागर झील का निर्माण ‘राजा अरणो रा आनाजी’ ने 1135 से 1150 के बीच करवाया था। ‘राजा अरणो रा आनाजी’ सम्राट पृथ्वीराज चौहान के पिता थे। आज इतिहास की किताबों में अजमेर को हिन्दू-मुस्लिम’ समन्वय के पाठ के रूप में तो पढ़ाया जाता है, लेकिन यह जिक्र नहीं किया जाता है कि यह सूफी संत भारत में जिहाद को बढ़ावा देने और इस्लाम के प्रचार के लिए आए थे।

इसके लिए उन्होंने हिन्दुओं के साथ हर प्रकार का उत्पीड़न स्वीकार किया। यहाँ तक कि आज भी इन सूफी संतों की वास्तविकता से उलट यह बताया जाता है कि ये क़व्वाली, समाख्वानी, और उपन्यासों द्वारा लोगों को ईश्वर के बारे में बताकर उन्हें मुक्ति मार्ग दर्शन करवाते थे। लेकिन तत्कालीन हिन्दू राजाओं के साथ इनकी झड़प और उनके कारणों का जिक्र शायद ही किसी इतिहास की किताब में मिलता हो।

खुद मोइनुद्दीन चिश्ती ने तराइन की लड़ाई में पृथ्वीराज चौहान को पकड़ लिया था और उन्हें ‘इस्लाम की सेना’ को सौंप दिया। लेख में इस बात का प्रमाण है कि चिश्ती ने चेतावनी भी जारी की थी, जिसमें उन्होंने दावा किया था – “हमने पिथौरा (पृथ्वीराज) को जिंदा पकड़ लिया है और उसे इस्लाम की सेना को सौंप दिया है।”

अमेरिका में फिर से मंदिर पर हमला, लिखा- हिंदू वापस जाओ, मोदी-जयशंकर आतंकी… अमेरिकी सांसद बोले- इस घृणा अपराध के जिम्मेदारों पर हो कार्रवाई

अमेरिका में फिर से हिंदू मंदिर पर हमला करने का मामला सामने आया है। ताजा घटना कैलिफोर्निया के सैक्रामेंटो काउंटी में बुधवार (25 सितंबर 2024) की है। पुलिस अपनी जाँच कर रही है। बताया जा रहा है कि अराजक तत्वों ने मंदिर के बाहर हिंदू विरोधी बातें बोर्ड पर लिखीं। साथ ही साथ पीएम मोदी को गाली भी लिखी। अनुमान है कि इसके पीछे खालिस्तानी तत्वों का हाथ हो सकता है।

इस हमले की जानकारी बीएपीएस पब्लिक अफेयर नाम के अकॉउंट से साझा की गई है। उन्होंने बताया- न्यूयॉर्क में मंदिर को अपवित्र करने की घटना के 10 दिन के भीतर कैलिफोर्निया के सैक्रामेंटो में मंदिर को अपवित्र करने का काम किया गया। साथ ही घृणित नारे भी लिखे गए जिसमें ‘हिंदू वापस जाओ’ जैसी हिंदू घृणा फैलाने वाली बातें थीं।

बता दें कि ये घटना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी दौरे के बाद सामने आई है। वीडियो में देख सकते हैं कि बोर्ड पर लिखा है- ‘मोदी और जयशंकर आतंकी हैं’ वहीं नीचे जमीन पर ‘फ$ मोदी’ लिखा हुआ है।

इस घटना के बाद सैक्रामेंटो काउंटी शेरिफ के अधिकारी ने चेतावनी देते हुए– जो किया गया है वो ऐसी चीज नहीं है जो दब जाएगी या उसे भुला दिया जाएगा। जिसने भी यह किया है उसे न्याय के कटघरे में लाया जाएगा। अगर आपने किया है तो खुद सामने आ जाएँ।

इस मामले को अमेरिकी सांसद रो खन्ना ने भी उठाया। उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा- “हिंदू अमेरिकियों के प्रति इस प्रकार की नफरत और बर्बरता भयावह और नैतिक रूप से गलत है। न्याय विभाग को इन घृणा अपराधों की जाँच करनी चाहिए और जिम्मेदार लोगों को कानून के तहत पूरी तरह जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए।”

न्यूयॉर्क में भी हुआ था हिंदू मंदिर पर हमला

बता दें कि इससे पहले 16 सितंबर को न्यूयॉर्क से हिंदू मंदिर पर हमले की खबर आई थी। बताया गया था कि न्यूयॉर्क के मेलविले क्षेत्र में स्थित बीएपीएस स्वामीनारायण मंदिर को असामाजिक तत्वों द्वारा नुकसान पहुँचाया गया था। सोशल मीडिया पर सामने आई फुटेज के अनुसार, मेलविले में हिंदू मंदिर के बाहर सड़क और प्रतीक चिह्नों पर स्प्रे पेंट से आपत्तिजनक शब्द लिखे गए थे।

बंगाल पुलिस ने थाने में बदले रिकॉर्ड, फैक्ट के साथ की छेड़छाड़: डॉक्टर की रेप-हत्या केस में CBI का खुलासा, RG Kar के पूर्व प्रिंसिपल-SHO की हिरासत बढ़ी

कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज (RG Kar Medical college and hospital) में डॉक्टर से हुई रेप-हत्या के मामले में नया खुलासा हुआ है। ये खुलासा सीबीआई ने कोर्ट में किया। सीबीआई ने बताया कि ताला पुलिस थाने में रिकॉर्ड्स के साथ न केवल छेड़छाड़ हुई थी बल्कि कुछ झूठे रिकॉर्ड भी तैयार किए गए थे।

केंद्रीय जाँच एजेंसी ने इस बाबत कोलकाता की स्पेशल कोर्ट को बताया कि उन्हें जाँच के दौरान थाने के कुछ सीसीटीवी फुटेज हाथ लगे थे जो उन्होंने जब्त करके सेंट्रल फॉरेंसिक साइंस लैब के पास भेजे हैं।

वहीं अभिजीत मंडल और संदीप घोष से पूछताछ में सामने आया कि उन लोगों ने मामले को नया मोड़ देने के लिए कुछ फर्जी बातें रिकॉर्ड में डाली थीं और जो हकीकत थी उससे छेड़छाड़ की थी।

सीबीआई ने कोर्ट को बताया कि उन्होंने दोनों आरोपितों के मोबाइल फोन को भी डेटा निकालने के लिए सीएफएसएल भेज दिया है। इन दोनों डेटा के आधार पर अहम सबूत मिलने की संभावना है।

बता दें कि सीबीआई ने दोनों आरोपितों की रिमांड पूरी होने पर इन्हें स्पेशल कोर्ट के सामने पेश किया था, जहाँ कोर्ट ने दोबारा से इन्हें 30 सितंबर के लिए न्यायिक हिरासत में भेज दिया।

इस मामले में अब तक संजय रॉय, संदीप घोष और अभिजीत मंडल की गिरफ्तारी हो चुकी है। पुलिस छानबीन कर रही है कि कहीं अपराध की साजिश में तीनों मिले हुए तो नहीं थे।

डॉक्टर रेप हत्या

गौरतलब है कि आरजी कर अस्पताल में डॉक्टर की रेप-हत्या का मामला 9 अगस्त 2024 का है। ताला थाने में उसी दिन इस घटना की सूचना सुबह 10 बजे दी गई थी लेकिन पुलिस अधिकारी ने एफआईआर रात के 11:30 बजे जाकर लिखी थी। तमाम डॉक्टर इस घटना के बाद सड़कों पर विरोध प्रदर्शन करने उतर आए थे। उन्होंने न्याय की गुहार लगाई थी और सबूतों से छेड़छाड़ की बात का उल्लेख किया था। वहीं मृतिका के परिजनों ने भी बताया था कि उन्हें उनकी बेटी से बहुत देर बाद जाकर मिलने दिया गया था।

विवाद बढ़ने पर पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज में नजर आए संजय रॉय को घटना के कुछ समय बाद ही गिरफ्तार कर लिया था। वहीं थाना प्रभारी अभिजीत मंडल की गिरफ्तारी 14 सितंबर को हुई थी और घोष की गिरफ्तारी 15 सितंबर को। पुलिस ने दोनों से पूछताछ के बाद सीबीआई में ये खुलासे किए हैं।

नाम ‘मुंबई चलो रैली’, नारे ‘सर तन से जुदा’ के: AIMIM नेता ने जुटाए जो हुड़दंगी उनसे सड़क खाली कराने के लिए पुलिस ने किया लाठीचार्ज, FIR भी दर्ज

AIMIM के नेता सैयद मोइन और इम्तियाज जलील की अगुवाई में निकाली गई रैली के कारण शहर में अराजकता की स्थिति पैदा हो गई। इसके बाद मुंबई पुलिस ने मंगलवार (24 सितंबर) को सड़क जाम करके अराजकता फैला रहे लोगों पर लाठीचार्ज कर दिया। पुलिस ने शहर के कोपरी हाईवे पर ‘रास्ता रोको’ प्रदर्शन करने के लिए AIMIM कार्यकर्ताओं के खिलाफ FIR भी दर्ज की है।

रिपोर्ट के अनुसार, घटना सोमवार (23 सितंबर) की रात करीब 11:30 बजे हुई। यह घटना तब हुई, जब पार्टी कार्यकर्ताओं ने दावा किया कि उनके नेता इम्तियाज जलील मौके पर नहीं हैं और उनसे संपर्क नहीं हो पा रहा है। इसके बाद इस्लामी कार्यकर्ताओं ने हाईवे पर घंटों इंतजार करते हुए अराजकता फैलाई। इसके बाद मुंबई पुलिस ने लाठीचार्ज किया। इसके कई वीडियो सामने आए हैं।

यह भी कहा जा रहा है कि रैली को मुलुंड चेक नाका पर रोक दिया गया और 12,000 से ज़्यादा इस्लामी प्रदर्शनकारियों को छत्रपति संभाजीनगर में अपने घरों को वापस जाने को कहा गया। मुलुंड चेक नाका पर कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए सोमवार की रात को बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया था। अतिरिक्त पुलिस आयुक्त, एसीपी और वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक भी मौके पर मौजूद थे।

स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार, मुंबई पुलिस ने ने जलील और उनके नेतृत्व वाली रैली को शहर में घुसने से रोकने के लिए पर्याप्त व्यवस्था की थी। पुलिस ने शहर की सभी सीमाओं पर चेक पोस्ट स्थापित किए और कहा कि AIMIM के नेता और किसी भी मुस्लिम संगठन को मुलुंड चेक पोस्ट से गुजरने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

मुंबई पुलिस और ठाणे पुलिस ने कल मिलकर यह सुनिश्चित किया कि शहर की शांति को भंग करने वाले किसी भी मुस्लिम संगठन या AIMIM समूह को शहर में नहीं आने दिया जाए। हालाँकि, हैदराबाद से लोकसभा सांसद असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के कार्यकर्ताओं ने कोपरी हाईवे पर सड़कें जाम कर दीं। इसके बाद पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा।

गौरतलब है कि महाराष्ट्र में AIMIM ने हिंदू संत रामगिरी महाराज और भाजपा के नितेश राणे द्वारा कथित तौर पर इस्लाम विरोधी टिप्पणियों के विरोध में राज्य विधानसभा चुनाव से पहले ‘चलो मुंबई तिरंगा रैली’ का आयोजन किया था। 22 सितंबर को एक रैली AIMIM के महाराष्ट्र उपाध्यक्ष सैयद मोइन ने आयोजित की थी।

इसके अगले दिन यानी 23 सितंबर को AIMIM नेता इम्तियाज जलील ने एक और रैली आयोजित की। दोनों रैलियाँ छत्रपति संभाजीनगर से महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई तक निकाली गईं। जलील ने कल सभा के दौरान कहा कि कथित तौर पर बढ़ते जातिगत और धार्मिक विभाजन का सामना करने की तत्काल आवश्यकता है।

जलील ने कहा, “महाराष्ट्र में जाति और धर्म की दीवारें खड़ी की जा रही हैं। दंगे भड़काने की कोशिश की जा रही है। मंच पर मुसलमानों को धमकाया जा रहा है। क्या ये गैरकानूनी काम नहीं हैं? क्या कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए? मैं राणे के खिलाफ उनके भड़काऊ बयानों के लिए कई एफआईआर दर्ज होने के बावजूद पुलिस कार्रवाई नहीं होने से चिंतित हूँ।”

जलील ने आगे कहा कि उनका इरादा सीएम को यह याद दिलाना था कि यह देश संविधान के अनुसार… कानून के अनुसार काम करेगा। उन्होंने कहा, “हम ऐसा कानून चाहते हैं जो जाति या धर्म के आधार पर बयानबाजी या धार्मिक हस्तियों के बारे में अपमानजनक टिप्पणी पर रोक लगाए। अगर ऐसे बयान दिए जाते हैं तो उनके खिलाफ सख्त कानून होने चाहिए।”

उन्होंने कहा कि रैली शांतिपूर्ण होगी, लेकिन पहली रैली में भाग लेने वाले इस्लामवादियों ने भड़काऊ नारे लगाए और पैगंबर मोहम्मद के खिलाफ कथित अपमानजनक टिप्पणी करने वाले व्यक्ति की मौत की माँग की। दूसरी रैली में मुंबई में सड़कों को अवरुद्ध करने का प्रयास किया गया। ‘रास्ता रोको’ रैली का आयोजन करने वाले AIMIM कार्यकर्ताओं के खिलाफ FIR दर्ज की गई है।

पहले अवॉर्ड दिया, फिर साथ किया डिनर… क्या जॉर्जिया मेलोनी को डेट कर रहे एलन मस्क? जानिए क्यों कहा- ये जितनी बाहर से सुंदर, उससे कहीं अधिक भीतर से…

इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी की हाल ही में अमेरिकी कारोबारी एलन मस्क ने काफी प्रशंसा की। इटली की प्रधानमंत्री की प्रशंसा एलन मस्क ने न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र के एक कार्यक्रम में की। इसका एक वीडियो भी जॉर्जिया मेलोनी ने अपने एक्स (पहले ट्विटर) पर पोस्ट किया।

इस वीडियो में एलन मस्क मस्क, मेलोनी के इटली में किए गए कामों और उससे आए परिणामों को बताते हैं। इसके बाद मस्क ने यह भी कहा कि मेलोनी जितनी बाहर से सुंदर हैं, उससे ज्यादा अंदर से सुंदर हैं। दोनों की एक तस्वीर भी सोशल मीडिया पर वायरल हुई।

इस तस्वीर में दोनों एक डिनर में एक साथ बैठे हैं और एक दूसरे की तरफ देख रहे हैं। यह फोटो सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गई। इस तस्वीर के बाद लोगों ने इस बात को लेकर चर्चा की क्या एलन मस्क और जॉर्जिया मेलोनी एक-दूसरे को डेट कर रहे हैं।

एलन मस्क ने डेटिंग के इस सवाल का खुद ही जवाब दे दिया है। उन्होंने डेटिंग के कयास को लेकर एक्स पर की गई एक पोस्ट के जवाब में साफ किया कि वह डेट नहीं कर रहे। उन्होंने लिखा, “हम डेट नहीं कर रहे हैं।” उनका यह जवाब भी अब वायरल है। यह ऐसा पहला मौका नहीं है जब जॉर्जिया मेलोनी चर्चाओं में बनी हुई हैं, इससे पहले भी वह कई बार कई मामलों को लेकर इंटरनेट पर छाई रही है।

कौन हैं जॉर्जिया मेलोनी

जॉर्जिया मेलोनी का जन्म 15 जनवरी 1977 को हुआ। प्रधानमंत्री बनने से पहले वह एक इतालवी पत्रकार और पॉलिटिशियन थीं। सेकंड वर्ल्ड वॉर के बाद तानाशाह बेनिटो मुसोलिनी के समर्थकों ने एक आंदोलन शुरू किया था। इसे इटालियन सोशल मूवमेंट नाम दिया गया था। 15 साल की उम्र में मेलोनी ने इसके यूथ विंग में काम किया। मेलोनी के पिता अकाउंटेंट थे। रोम में जन्मीं मेलोनी अंग्रेजी, स्पेनिश और फ्रेंच बोलती हैं। उनकी एक बेटी है, जिसका जन्म 2006 में हुआ।

इटली की पहली दक्षिणपंथी प्रधानमंत्री 

बता दें कि जॉर्जिया मेलोनी साल 2008 में 31 साल की उम्र में इटली की सबसे युवा मंत्री बनी थीं। वहीं साल 2012 में उन्होंने ब्रदर्स ऑफ इटली पार्टी की स्थापना की। इसके बाद 2021 में मेलोनी की किताब आई ‘आइ एम जॉर्जिया’, जिसमें उनके विजन और विचारों पर खूब बात हुई है 

जॉर्जिया मेलोनी के बारें में एक तथ्य ये भी है कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद इटली में ये पहली बार हुआ है जब राइट विंग कि कोई नेता प्रधानमंत्री की गद्दी पर बैठी हों। ब्रदर्स ऑफ इटली पार्टी की नेता मेलोनी ने प्रधानमंत्री बनने से पहले ही मुस्लिम अप्रवासियों को शरण देने का खुलकर विरोध किया था और इसके साथ ही समलैंगिकों (LGBT) का भी उन्होंने जमकर विरोध किया था।

कट्टरपंथी इस्लाम, आतंकवाद और समलैंगिकता की मुखर विरोधी 

25 सितंबर, 2022 को अपनी जीत के बाद से ही मेलोनी समर्थक जहाँ खुश हैं वहीं उनके आलोचक उनकी दक्षिणपंथी ब्रदर्स ऑफ़ इटली पार्टी के उदय के बाद से ही लगातार हमले कर रहे हैं। मेलोनी जिन मुद्दों पर चुनाव जीतकर आईं थीं, उन्होंने प्रधानमंत्री बनते ही स्पष्ट कर दिया है कि वह एलजीबीटी लॉबी, जेंडर आइडियोलॉजी और कट्टरपंथी इस्लाम का विरोध करती हैं, इसके साथ अपने ऊपर लगाए जा रहे आरोप की वह नव-फासीवादी हैं, उन्होंने साफ़ मना कर दिया था।

डब्बे जैसी मशीन में अमेरिकी महिला ने खुद को बंद कर मार डाला: जानिए क्या होता है ‘सुसाइड पॉड’, कैसे करता है काम, पहली डेथ के बाद क्यों हो रही गिरफ्तारी

स्विट्जरलैंड में एक महिला ने आत्महत्या करने वाली मशीन ‘सुसाइड पॉड’ में खुद को बंद करके जीवनलीला समाप्त कर ली। अब स्विटज़रलैंड की पुलिस ने इस मामले में कई लोगों को गिरफ्तार किया है। इस बीच इच्छामृत्यु को लेकर बहस चालू हो गई है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, स्विटज़रलैंड में हाल ही में एक 64 वर्षीय अमेरिकी महिला ने ‘लास्ट रिजॉर्ट’ नाम की एक कंपनी द्वारा बनाई गई एक मशीन का इस्तेमाल किया। इसे कम्पनी ने ‘सुसाइड पॉड’ का नाम दिया है। इसके बाद उसकी मौत हो गई। उसकी मौत के कुछ दिनों बाद पुलिस ने कथित तौर 4 लोगों को गिरफ्तार किया है।

गिरफ्तार किए जाने वालों में इस कम्पनी की एक महिला अधिकारी और 2 पत्रकार शामिल हैं। बताया गया कि महिला ने मशीन में यह आत्महत्या स्विटज़रलैंड के दूरदराज के एक कस्बे के पास के जंगल में की। यहाँ पर गिरफ्तार की गई महिला ही केवल मौजूद थी।

जिस कम्पनी की मशीन में यह आत्महत्या की गई, उसने दावा किया है कि महिला ऐसी बीमारियों से पीड़ित थी जो सही नहीं की सकती थीं। ऐसे में उसने उसने अपना जीवन खत्म करने का रास्ता चुना और उसने इस मशीन का उपयोग किया। मशीन के उपयोग से आत्महत्या का यह पहला मामला है।

इससे पहले भी लोगों की वैध तरीके से आत्महत्या के लिए दवाइयों का उपयोग होता रहा है। इसके लिए उन्हें ऐसी दवाइयाँ दी जाती हैं जो मृत्यु देती हैं। मशीन का इस्तेमाल होने के बाद इसकी वैधता और तौर तरीके पर बहस चालू हो गई है।

क्या है यह मशीन?

अमेरिकी महिला ने जिस मशीन में बंद करके आत्महत्या की है, उसे कम्पनी ने ‘सारको’ का नाम दिया है। कम्पनी का कहना है कि यह मशीन उन लोगों के काम आएगी जो बिना पीड़ा के अपना जीवन खत्म करना चाहते हैं। इस मशीन को एक ऑस्ट्रेलियन वैज्ञानिक ने बनाया है।

कम्पनी का कहना है कि इस मशीन को वही व्यक्ति चला सकता है, जिसे आत्महत्या करनी है। किसी कैप्सूल सी दिखनी वाली इस मशीन के अंदर उस व्यक्ति को लेटना होगा और फिर बटन दबाने के बाद आत्महत्या की प्रक्रिया चालू हो जाएगी।

इस मशीन के भीतर लेटने वाले व्यक्ति जैसे ही बटन दबाता है वैसे ही इसके अंदर नाइट्रोजन गैस का तेज प्रवाह होता है। इस कारण अंदर ऑक्सीजन का स्तर लगातार घटता जाता है जिस भीतर लेटे व्यक्ति का दम घुट जाता है और उसकी मौत हो जाती है।

अभी इस मशीन को स्विटज़रलैंड में कानूनी मान्यता नहीं मिली है, ऐसा वहाँ की सरकार ने बताया है। मशीन की वकालत भी कई समूह कर रहे हैं। उनका तर्क है कि इससे लोगों को पीड़ादायक जीवन से मुक्ति मिल सकेगी और किसी भी व्यक्ति को दूसरे की हत्या का भागी भी नहीं बनना होगा।

इच्छामृत्यु पर हो रही बहस

इस मशीन के भीतर महिला की मौत और उसके बाद लोगों की गिरफ्तारी के बीच इच्छामृत्यु को लेकर बहस हो रही है। विश्व के अधिकांश देशों में इच्छामृत्यु अवैध है। भारत में भी किसी को आत्महत्या करने का अधिकार नहीं है। हालाँकि, कई समूह इस बात की वकालत करते आए हैं कि लोगों को अपना जीवन समाप्त करने का अधिकार होना चाहिए। इनका तर्क है कि यदि कोई ऐसी समस्या में है जहाँ कोई रास्ता नहीं बचा तो उसे इच्छामृत्यु की आजादी दी जानी चाहिए।