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न 4 साल की बच्ची बची, न 63 साल की वृद्धा… योनि में ही नहीं सिमटी है एक महिला का अस्तित्व: केवल कानून से नहीं होगी नारी सुरक्षा, समाज को भी बदलना होगा

बीते दिनों बंगाल में महिला डॉक्टर के साथ हुए रेप-मर्डर मामले के कारण पूरे देश भर में आक्रोश है। लोग महिलाओं के अधिकारों से लेकर उनकी आजादी की बात कर रहे हैं, उस पर चिंता जता रहे हैं। कहीं कानून सख्त करने की माँग हो रही है तो कही दोषियों पर त्वरित कार्रवाई को कहा जा रहा है। बंगाल से लेकर दिल्ली तक में लोग सड़कों पर है। ऐसा लग रहा है मानो हर कोई लड़कियों को आजाद देखना चाहता है, उनके खिलाफ कुछ भी गलत होते देखना उन्हें बर्दाश्त नहीं है…। जाहिर है हर लड़की समाज को इसी तरह अपने साथ खड़े हुए देखना चाहती है लेकिन अजीब बात ये जो अभी रेप की घटनाओं के विरुद्ध रोष दिखा रहा है उस समाज में बलात्कार की घटनाएँ होना अब भी बंद नहीं हैं।

9 अगस्त 2024 को बंगाल से लेडी डॉक्टर से रेप और मर्डर का मामला उठा था और उसके बाद सोशल मीडिया पर हर जगह उनके लिए इंसाफ की गुहार लगी। घटना ने इंसानियत को ऐसे झकझोरा कि हर किसी को 2012 में निर्भया के साथ हुई वीभत्सता की याद आ गई। तुलना करते हुए कहा जाने लगा कि इतने साल बीत गए लेकिन समाज के हालात बिलकुल नहीं बदले हैं। आज भी जब बलात्कार का मुद्दा हर जगह गरमाया हुआ है उस समय भी किसी किसी जगह कहीं महिला को कोई हैवान अपना निशाना रहा है। न छोटी बच्ची को छोड़ा जा रहा है न ही बुजुर्ग महिला को। मौका मिलते ही लड़कियों को दबोचा जा रहा है और फिर वहशियत की हर हद पार हो रही है।

बहुत पीछे न जाएँ और ये सोचें कि 9 अगस्त की घटना के बाद तो जैसे विरोध हो रहा है उससे इन घटनाओं में कमी आई होगी तो ऐसा बिलकुल भी नहीं है। हर रोज दरिंदगी की नई सीमा तय होती है। बदलापुर से आज एक शर्मसार करने वाला मामला सामने आया है। चार साल की दो बच्चियों का यौन शोषण उनके ही स्कूल के सफाईकर्मी ने किया। बच्चियाँ उस सफाईकर्मी को ‘दादा’ कहती थीं, उन्हें अपना परिचित समझती थीं, लेकिन उस जानने वाले ने उनके साथ क्या किया। मौका मिलते ही कपड़े उतारकर उनके निजी अंगों को छूने का काम किया, उनका शोषण किया। इस घटना से कुछ दिन पहले 16 अगस्त 2024 राजस्थान के सिरोही जिले के आबूरोड रीको थाना क्षेत्र में एक 63 वर्षीय महिला का घर में घुसकर सामूहिक रेप किया गया था। रिपोर्ट्स में बताया गया था कि आरोपित घर में घुसे तो लूटपाट के लिहाज से थे लेकिन महिला को देख उन्होंने उसके साथ बारी-बारी रेप कर लिया।

एक बार इन घटनाओं को सोचकर देखिए… एक मामले में छोटी बच्चियाँ पीड़िता हैं और दूसरे में बुजुर्ग महिला। आम इंसान के मन में इन दोनों ही वर्ग के लिए अलग-अलग भाव होते हैं। बच्चियों को देख दुलार आता है और बुजुर्ग को देख सम्मान का… लेकिन वहीं एक बलात्कारी को इनमें न छोटी बच्ची दिखती है न बुजुर्ग अवस्था, उन्हें सिर्फ योनि दिखाई देती है। वो लड़कियों को निशाना चलती सड़क पर भी बना सकता है और बंद कमरे में भी रेप के बाद उन्हें मार भी सकता है। ऐसे में हमारे द्वारा सिर्फ ये अपेक्षा किया जाना कि कानून सख्त होने से चीजें बेहतर होंगी सरासर हमारी भूल है।

आपको याद होगा 2012 में निर्भया के साथ हुई वीभत्सता को देख कानून सख्त करने का काम हुआ था, लेकिन नतीजा क्या हुआ… घटनाएँ खत्म हो गई? बलात्कारी इंसान बन गए? महिलाएँ सुरक्षित हो गईं? नहीं… इनमें से कुछ नहीं हुआ। आज भी कोई भी अखबार उठाकर पढ़ना शुरू करिए बलात्कार की खबरें फ्रंट पेज से मिलना शुरू हो जाएँगी….। न ये सब 2012 के बाद बंद हुआ है और न ही आने वाले समय में होगा। स्थिति में सुधार तब तक नहीं हो सकता जब तक दूषित मानसिकता पर प्रहार नहीं किया जाएगा और सक्रियता से ऐसे मामलों में पकड़े गए अपराधियों को सजा नहीं मिलेगी।

अभी के हाल ऐसे हैं कि अपराधी अपराध करने के बाद ही निश्चिंत हो जाता है कि वो या तो केस को गुमराह कर देगा और नहीं कर पाया तो उसपर 10-20 साल का समय तो रहेगा ही…सबसे ताजा मामला अजमेर सेक्स स्कैंडल का लेते हैं। 90 के दशक में इस स्कैंडल के कारण कितनी लड़कियों की जिंदगी बर्बाद हुई ये किसी से छिपा नहीं है। बावजूद इसके इस मामले में निर्णय आने में 32 साल से ज्यादा लग गए...। इसी तरह निर्भया मामला। दोषियों को 8 साल बाद फाँसी हुई थी

दुखद बात ये है कि वो मामले हैं जिन्हें मीडिया ने खूब तूल देकर गौर करवाया गया तब जाकर पीड़िताओं को इंसाफ मिलने में इतना समय लग गया, तो सोचकर देखिए उन पीड़िताओं को क्या इंसाफ मिलता होगा जिनके केस को गुमराह कर दिया जाता है, जिनके चरित्र पर सवाल खड़े कर दिए जाते हैं, जिनकी शिकायत कार्रवाई की जगह उनपर ही लांछन लगा दिया जाता है और मुँह बंद करने की बात कहकर उन्हें वापस उसी अंधकार भरे समाज में रहने को छोड़ दिया जाता है।

आज सोशल मीडिया पर उठती आधी आवाजें सिर्फ ट्रेंड के दबाव में हैं। उन्हें न अपराध से मतलब है, न अपराध का असर समाज पर क्या होता है इससे, न पीड़िता के दर्द से… चूँकि अगर ऐसा होता तो बीते सालों में घटनाओं का ग्राफ बढ़ने की बजाय नीचे जरूर आता है। इनके लिए बंगाल रेप जैसी घटनाएँ सिर्फ ट्रेंड का मसला है जो आज चल रहा है इसलिए बोल रहे हैं कल को कोई और मामला होगा तो इसे भूलकर उसपर बोलने लगेंगे।

शर्म की बात है कि हम उस समाज का हिस्सा हैं जहाँ न छोटी बच्ची सुरक्षित है, न स्कूल-कॉलेज जाती लड़किाँ और न घर में अकेले रहने वाली बुजुर्ग… महिलाओं पर यौन दुराचार के मामले पहले भी बढ़ रहे थे और आगे भी बढ़ेंगे… कारण हमारी ऐसे मामलों को हैंडल करने की अप्रोच है, ढीला रवैया है और घृणित मानिकता है।

रात भर रेप करता रहा डॉक्टर शाहनवाज, भागती तो जहर का इंजेक्शन लगा कर देता हत्या: मुरादाबाद की दलित नर्स ने सुनाई आपबीती, हॉस्पिटल सील

उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में 17 अगस्त 2024 को रेप की शिकार दलित समाज की नर्स ने कहा है कि डॉक्टर शाहनवाज ने धमकी देकर उसके साथ रात भर रेप किया था। उसने कहा कि अगर वह भागने की कोशिश करती तो उसकी हत्या कर दी जाती। इसलिए उसने सुबह होने का इंतजार किया था। पीड़िता का कहना है कि आरोपितों के परिजन केस वापस लेने के लिए उस पर दबाव डाल रहे हैं।

बता दें कि इस मामले में रेप के आरोपित डॉक्टर शाहनवाज और उसका देने वाले अस्पताल के स्टाफ जुनैद एवं महिला स्टाफ मेहनाज को गिरफ्तार करके जेल भेजा जा चुका है। वहीं, मुरादाबाद के CMO ने अस्पताल का पंजीकरण रद्द कर दिया है। साथ ही प्रशासन ने अस्पताल को सील कर दिया है। विश्व हिन्दू परिषद (VHP) ने अस्पताल पर बुलडोजर चलाने और डॉक्टरी के लाइसेंस निरस्त करने की माँग की है।

अमर उजाला के मुताबिक, पीड़िता ने रोते हुए बताया कि अगर वो घटना की रात विरोध करती तो आरोपित उसकी हत्या कर देते। लड़की ने यह भी बताया कि उसे यह डर था कि आरोपित कहीं उसे जहर का इंजेक्शन ना दे दें। इसी वजह से वह सुबह होने का इंतज़ार किया और अपने घर जाकर सारी बात बताई। पीड़िता के परिजनों का आरोप है कि उन पर केस वापस लेने का दबाव बनाया जा रहा है।

जाटव समाज की पीड़िता के परिजनों का आरोप है कि यह दबाव जेल भेजे गए आरोपितों के परिवार वालों और रिश्तेदारों की तरफ से डाला जा रहा है। बताया जा रहा है कि आरोपितों के रिश्तेदार और परिजन पीड़िता के घर पहुँच गए थे। हालाँकि, लड़की के परिजनों ने किसी भी तरह के समझौते से साफ इनकार कर दिया। इस बात की सूचना जिले के सीनियर अधिकारियों को तुरंत दी गई।

विहिप द्वारा जारी पत्र

शिकायत मिलते ही पीड़िता के घर पर पुलिस की तैनाती कर दी गई है। पीड़िता का मकान मुरादाबाद के थाना क्षेत्र डिलारी में पड़ता है, जबकि घटनास्थल ठाकुरद्वारा इलाके में है। जिस ABM अस्पताल की ये घटना है, वह एक किराए के मकान में चल रहा था। जाँच में अस्पताल मानकों पर खरा नहीं पाया गया। आखिरकार प्रशासन ने अस्पताल को सील कर दिया है।

ऑपइंडिया को मिली जानकारी के मुताबिक, शाहनवाज खुद को ABM हॉस्पिटल नाम के इस अस्पताल का डायरेक्टर बताता है। आरोपित डॉक्टर शाहनवाज शादीशुदा और 2 बच्चों का अब्बा है। वारदात के समय उसकी बीवी मायके गई हुई थी। घटना के बाद मेडिकल टीम स्थानीय पुलिस के साथ अस्पताल में पहुँची और अस्पताल के कागजात चेक किए।

अब इस मामले में विश्व हिन्दू परिषद भी आगे आया है। VHP ने मंगलवार (20 अगस्त 2024) को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नाम से इस संबंध में अपनी माँगों को लेकर एक पत्र जारी किया है। पत्र में मुख्य आरोपित शाहनवाज के घर की कुर्की करने और फिर उस पर बुलडोजर चलवाने की माँग की गई है।

इतना ही नहीं, विश्व हिंदू परिषद ने जिस ABM हॉस्पिटल में 20 साल की नर्स से रेप किया गया, उसके सभी डॉक्टरों के लाइसेंस निरस्त करने, उन्हें कहीं भी प्रैक्टिस से आजीवन प्रतिबंधित करने और रेपिस्ट को फाँसी की सजा देने की माँग की गई है। पत्र में ऐसी घटनाओं को हिन्दू लड़कियों को चिन्हित करके अंजाम देने के आरोप लगाए गए हैं।

CM ऑफिस में रोज खाते थे 993 अंडा पफ, जगन मोहन के राज में ₹3.6 करोड़ इसी एक चीज पर हुए खर्च: वाईएसआर कॉन्ग्रेस ने दावों को बताया झूठा, TDP बता रही स्कैंडल

आंध्र प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के बाद से लगातार TDP पूर्ववर्ती जगन मोहन रेड्डी की सरकार के खर्चे खंगाल रही है। TDP जगन सरकार पर वित्तीय अनियमितताओं का आरोप लगाती आई है। अब CM जगन के कार्यकाल में मुख्यमंत्री कार्यालय के ₹3.6 करोड़ का खर्चा अंडा पफ पर करने का मामला सामने आया है। YSRCP ने इन खबरों को नकारा है जबकि TDP लगातार अपने हमले बढ़ाती जा रही है।

एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, TDP ने आरोप लगाया है कि मुख्यमंत्री कार्यालय ने 2019-24 के बीच हर साल औसतन 72 लाख के अंडा पफ खा डाले। यह खर्चा पाँच साल में ₹3.6 करोड़ पहुँच गया। आरोप है कि CM कार्यालय में पाँच साल में 18 लाख अंडा पफ खाए गए। यानी प्रतिदिन CM कार्यालय में 993 अंडा पफ खाए जा रहे थे। जगन मोहन सरकार पर लगाए जा रहे आरोपों को ‘एग पफ स्कैंडल’ का नाम दिया गया है।

इस कथित अंडा पफ घोटाले के सामने आने के बाद सत्तारूढ़ TDP और YSRCP के बीच जंग भी चालू हो गई है। YSRCP ने अंडा पफ सम्बन्धित इन खबरों को झूठ बताया है। YSRCP ने इन खबरों का खंडन करते हुए एक ट्वीट किया है। YSRCP ने लिखा कि TDP जानबूझ कर जगन मोहन रेड्डी पर कीचड़ उछाल रही है।

YSRCP ने यह भी कहा है कि घोटाले की बात पूरी तरह झूठ है और अगर इसको सिद्ध नहीं किया गया तो कानूनी कार्रवाई की जाएगी। YSRCP ने आरोप लगाया कि 2014-19 के बीच चन्द्रबाबू नायडू और उनके बेटे नारा लोकेश के चाय नाश्ते पर ही ₹8.5 करोड़ खर्च हुए।

वहीं TDP लगातार जगन मोहन रेड्डी पर हमले बोल रही है। TDP का आरोप है कि ना सिर्फ अंडा पफ पर बल्कि अन्य कार्यों में भी जगन मोहन रेड्डी सरकार में पैसा पानी की तरह बहाया गया। TDP ने YSRCP से पूछा है कि ₹500 करोड़ का महल किसने बनवाया था और किसने ₹700 करोड़ की मूर्तियाँ लगवाई थी। TDP ने अन्य कई खर्चे के आरोप YSRCP पर जड़े हैं।

हालाँकि, अभी इस घोटाले को लेकर कोई आधिकारिक रिपोर्ट सामने नहीं आई है। हालाँकि, फिर भी आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है। गौरतलब है कि हाल ही में आंध्र प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव में NDA गठबंधन ने बड़ी जीत हासिल की थी और पाँच वर्षों से सत्ता में काबिज YSRCP को बाहर कर दिया था। सत्ता में आने के बाद से लगातार TDP सरकार जगन मोहन रेड्डी की सरकार के दौरान हुई कथित अनियमितताओं को लेकर जाँच कर रही है।

रेप के बाद जन्म दिया मरा हुआ बच्चा, न्याय के लिए पीड़िता ने नहीं की शादी: अजमेर सेक्स स्कैंडल में ऐसे आया 32 साल बाद फैसला, बदबू मारते कंडोम भी बने सबूत

राजस्थान के अजमेर में 100 से अधिक लड़कियों के साथ सामूहिक बलात्कार करने वालों में से 6 दोषियों को पॉक्सो अदालत ने उम्रकैद और 5-5 लाख रुपए की सज़ा सुनाई है। 32 वर्षों तक मामले की सुनवाई होना पुलिस के लिए ख़ासा मुश्किल था, क्योंकि सबूत और गवाह सहेज कर रखने होते हैं। कई पीड़िताओं ने तो अपना घर और गाँव तक छोड़ दिया था। वहीं सबूत के रूप में रखे गए बिस्तर और कंडोम बदबू मारने लगे थे। नाते-रिश्तेदारों की मदद से पीड़ितों को खोजा गया।

फिर उन्हें गवाही देने के लिए मनाना भी बड़ा कार्य था। कई फिर से इन घटनाओं को याद नहीं करना चाहती थीं और इससे दूर ही रहना चाहती थीं। फ़िलहाल विजय सिंह राठौड़ 2020 से इस मामले के अभियोजक हैं, उनसे पहले 12 अभियोजक बदल चुके हैं। अभियोजन पक्ष सिर्फ 16 पीड़िताओं को ही गवाही के लिए मना सका। इनमें से भी 13 ने रसूखदार आरोपितों के डर से अपने बयान बदल दिए। पुलिस ने कंडोम, कैमरे, डायरी, बिस्तर कैसेट्स, कपड़े और अन्य वस्तुएँ भी सबूत के रूप में सहेज कर रखा था।

इस मामले में 4 बार सुनवाई चली, ऐसे में हर बार सबूतों को अदालत में पेश करना पड़ा। नफीस चिश्ती, नसीम उर्फ ​​टार्जन, सलीम चिश्ती, इकबाल भाटी, सोहेल गनी और सईद जमीर हुसैन को इस मामले में सज़ा सुनाया गया है। अधिकतर लड़कियों की उम्र 11 से 20 वर्ष के बीच थी जो स्कूल-कॉलेज जाती थीं। एक फार्महाउस में बुला कर उनके साथ दरिंदगी की जाती थी। उनकी तस्वीरें क्लिक कर ली जाती थीं, जो शहर भर में फ़ैल गई थीं। इन्हीं तस्वीरों के सहारे लड़की को सहेलियों को लाने के लिए कहा जाता था।

इस मामले में कुल 18 आरोपित थे जिनमें से पहली चार्जशीट में 12 का नाम था। नसीम उर्फ़ टार्जन 1994 में फरार हो गया था। ज़हूर चिश्ती एक लड़के के साथ अप्राकृतिक यौनाचार का दोषी पाया गया था। उसका मामला दूसरी अदालत में ट्रांसफर कर दिया गया था। 2007 में उसे आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई थी। एक आरोपित ने आत्महत्या कर ली थी। 8 आरोपितों को 1998 में आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई थी। फारूख चिश्ती को सिजोफ्रेनिया होने की वजह से अलग अदालत में उसका मुकदमा चलाया गया था।

अलमास नाम का आरोपित अब तक फरार है। इन 6 के खिलाफ अलग से मुकदमा चलाया गया, क्योंकि जब 12 के खिलाफ चार्जशीट दायर की गई थी तब इनके खिलाफ जाँच लंबित रखी गई थी। पीड़िताओं में से एक की उम्र उस समय 17 साल थी। वो डिबेट्स में अच्छी थी, राजनीति में आना चाहती थी। अनवर चिश्ती ने उसे कॉन्ग्रेस में शामिल कराने का लालच दिया और फार्महाउस बुलाया। फिर ब्लैकमेल और गैंगरेप का खेल शुरू हुआ। मात्र 3 पीड़िताएँ ही ऐसी थीं, जो न्याय के लिए लड़ीं।

इनमें से एक पीड़िता को तो उनके पिता साथ लेकर कोर्ट आते-जाते थे। कोरोना महामारी के दौरान पुलिस ने इन पीड़िताओं को ट्रैक कर उनके बयान दर्ज कराने शुरू किए। एक पीड़िता ने न्याय की लड़ाई को अंजाम तक पहुँचाने के लिए अब तक शादी नहीं की, न ही शहर छोड़ा। आरोपितों को लेकर उसके बयान महत्वपूर्ण साबित हुए। पीड़िता ने कोर्ट में आरोपितों की शिनाख्त की, बताया कि कैसे उसकी बहन का रेप करने की धमकी दी गई, एक बार वो गर्भवती भी हो गई। गर्भपात के बावजूद डिलीवरी हुई लेकिन बच्चा मृत निकला।

एक कहानी दरगाह बाजार के पास रह रहने वाले पिता-पुत्र की भी है। पहले तो वो अजमेर छोड़ चुके थे और गवाही देने के लिए तैयार नहीं थे। पुलिस ने नाम उजागर न होने का भरोसा दिलाया तो वो तैयार हुए। उन्हें छिपा कर कोर्ट लाया जाता था। एक पीड़िता की पंजाब में शादी हुई, भाई न गवाही दिलाने से मना कर दिया। कुछ परिजन पुलिसकर्मियों से कह देते थे कि पीड़िता मर चुकी है। पुलिस ने काउंसिलिंग का भी सहारा लिया। पीड़िताओं को टेलीफोन-गैस सिलिंडर देने का लालच देकर भी फँसाया जाता था।

‘भारत को प्यार चाहिए तो बांग्लादेश को सौंप दे शेख हसीना’: खालिदा जिया का शागिर्द दे रहा गीदड़भभकी, पूर्व मंत्री दीपू मोनी पर इस्लामी कट्टरपंथियों ने किया हमला

बांग्लादेश में हिंदू और शेख हसीना सरकार की पार्टी के लोग और सरकार में शामिल रहे बड़े चेहरों को इस्लामिक कट्टरपंथी किस तरह से निशाना बना रहे हैं कि वहाँ पुलिस हिरासत में होने के बावजूद हिंदू महिला मंत्री दीपू मोनी को लोगों ने जमकर पीटा। यही नहीं, उनके साथ ही हिरासत में लिए गए एक अन्य पूर्व मंत्री आरिफ खान जॉय को भी जमकर पीटा गया। ये सब पुलिस की मौजूदगी में हुआ, बावजूद उन्हें इस्लामिक कट्टरपंथियों से कोई बचा नहीं पाया। वहीं, दूसरी तरफ शेख हसीना की कट्टर प्रतिद्वंदी खालिदा जिया के एक करीबी ने भारत सरकार को धमकाने की कोशिश की है, साथ ही कहा है कि शेख हसीना को बांग्लादेश के हवाले कर दिया जाए।

द डेली स्टार की रिपोर्ट के मुताबिक, 19 जुलाई 2024 को ढाका के मोहम्मदपुर में किराना दुकान चलाने वाले अबू सईद की प्रदर्शन के दौरान पुलिस वालों की गोली से मौत हो गई थी। इस मामले में शेख हसीना सरकार में समाज कल्याण मंत्री रही दीपू मोनी और पूर्व उप-खेल मंत्री आरिफ खान जॉय को भी गिरफ्तार कर लिया गया था, जबकि शुरुआती एफआईआर में दोनों का नाम ही नहीं था। इसके बावजूद दीपू मोनी को न सिर्फ गिरफ्तार किया गया, बल्कि कोर्ट में भी पेश किया गया। उसकी पेशी के दौरान इस्लामिक कट्टरपंथियों ने हमला बोल दिया, जिसमें वो घायल भी हो गईं।

इस मामले की सुनवाई के बाद ढाका के अतिरिक्त मुख्य मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट सुल्तान सोहाग उद्दीन ने दीपू मोनी को चार दिन और जॉय को पाँच दिन की रिमांड पर भी भेज दिया। इस दौरान कोर्ट रूम में इस्लामिक कट्टरपंथी इनके लिए फाँसी की माँग करते हुए नारे लगाते दिखे। इस दौरान सेना, बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश के सदस्य और अतिरिक्त पुलिस कर्मियों को कोर्ट में तैनात किया गया था, लेकिन हमलावरों से वो बचा नहीं पाए।

इस केस में 13 अगस्त को मोहम्मदपुर क्षेत्र के निवासी आमिर हमजा शातिल ने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना और छह अन्य के खिलाफ ढाका में हत्या का मामला दर्ज कराया था। इस मामले में दीपू मोनी और आरिफ खान जॉय का नाम प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) में शामिल नहीं किया गया था, लेकिन बाद में उन्हें गिरफ्तार दिखाया गया। यह पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के खिलाफ दर्ज किया गया पहला मामला भी है, जब उन्होंने 5 अगस्त को बड़े पैमाने पर विद्रोह के बीच इस्तीफा देकर भारत चली गयी थीं।

अन्य आरोपितों में अवामी लीग के महासचिव और सड़क राजमार्ग एवं पुल मंत्री ओबैदुल कादर, पूर्व गृह मंत्री असदुज्जमाँ खान, पूर्व पुलिस महानिरीक्षक चौधरी अब्दुल्ला अल मामून, पूर्व डीबी (ढाका मेट्रोपॉलिटन पुलिस) प्रमुख हारुन ओर रशीद, पूर्व डीएमपी आयुक्त हबीबुर रहमान और पूर्व डीएमपी संयुक्त आयुक्त बिप्लब कुमार सरकार शामिल हैं। इसके अलावा, इस मामले में कई शीर्ष पुलिस अधिकारियों और अन्य सरकारी अधिकारियों को भी आरोपित बनाया गया।

भारत को धमकाने की कोशिश कर रहा जिया का करीबी

जिस मामले में शेख हसीना के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है, उस मामले में मुकदमा चलाने के लिए खालिदा जिया के करीबी और बीएनपी नेता फखरुल इस्लाम आलमगीर ने भारत को धमकाने की कोशिश की है। बीएनपी के महासचिव मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर ने कहा, “हमारी भारत से अपील है कि वह शेख हसीना को कानूनी तरीके से बांग्लादेश सरकार को सौंप दे। बांग्लादेश की जनता ने उनके मुकदमे का फैसला सुना दिया है। उन्हें उस मुकदमे का सामना करने दें।”

टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक, आलमगीर ने कहा कि शेख हसीना को शरण देकर भारत ने ठीक नहीं किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि शेख हसीना भारत में रहकर बांग्लादेश में हुई क्रांति को विफल करने के लिए साजिशें रच रही हैं। शेख हसीना को लेकर उन्होंने कहा, “मैं यह बात दृढ़ता से कह रहा हूँ और हम यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि मुझे नहीं लगता कि भारत को बांग्लादेश के लोगों के दुश्मन (शेख हसीना) को पनाह देकर ज्यादा प्यार मिल सकता है, जिसे देश से भागना पड़ा था।”

बता दें कि शेख हसीना सरकार के पतन के बाद शेख हसीना ने भारत में शरण ली है। उनके खिलाफ बांग्लादेश में कई मुकदमे दर्ज किए गए हैं। यही नहीं, उनके समर्थकों और पार्टी कार्यकर्ताओं की बड़े पैमाने पर हत्या भी हुई है। इन सबके बीच, उन्होंने 5 अगस्त को बांग्लादेश का प्रधानमंत्री पद छोड़ कर भारत में शरण लिया था। माना जा रहा है कि वो किसी तीसरे देश जा सकती हैं।

हिन्दुओं पर हमला किया इस्लामी भीड़ ने, दोष भारत को दे रहा जर्मन मीडिया DW: हिन्दू विरोधी हिंसा को फर्जी साबित करने में जुटा, कह रहा – ये राजनीतिक

बांग्लादेश में प्रधानमंत्री शेख हसीना की सत्ता तख्तापलट में छिनने के बाद से लगातार इस्लामी कट्टरपंथी हिन्दू समुदाय को निशाना बना रहे हैं। बड़ी संख्या में उनके घरों पर हमले किए गए हैं। उनके मंदिरों को नष्ट किया गया है और साथ ही कुछ के साथ बर्बरता भी हुई है। इन सब के बावजूद विदेशी वामपंथी मीडिया डायचे वेले (DW) इस्लामी कट्टरपंथियों के पापों को धुलने में लगा है। वह हिन्दुओं पर अत्याचारों के दावों को फर्जी साबित करने में जुट गया है। उसने भी बाकी विदेशी मीडिया संस्थाओं की राह पर चलते हुए इन हमलों को राजनीतिक बताने का प्रयास किया है।

सोमवार (19 अगस्त, 2024) को DW ने एक वीडियो प्रकाशित किया। वीडियो में बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हमलों को दबाने का प्रयास किया गया और भारतीय मीडिया पर फर्जी जानकारी फ़ैलाने का आरोप लगाया। यह वीडियो 2 मिनट 29 सेकंड का है।

DW ने अपनी रिपोर्ट में बांग्लादेश के जेशोर में हजरत गरीब शाह मजार शरीफ पर आगजनी के हमले का हवाला दिया, जिसे कथित तौर पर सोशल मीडिया पर एक हिंदू मंदिर पर हमले के रूप में साझा किया गया था। DW ने बताया, “इस वीडियो में, बांग्लादेश में एक हिंदू मंदिर कथित तौर पर जल रहा है। इस वीडियो को 280,000 से अधिक बार देखा जा चुका है, लेकिन यह फर्जी है। बांग्लादेश में विरोध प्रदर्शन के दौरान कथित तौर पर जलाए गए हिंदू मंदिरों या घरों के वीडियो हजारों बार साझा किए गए और देखे गए। यहाँ ऐसे हमले हो रहे हैं, लेकिन सारे सच नहीं हैं।”

हिन्दुओं पर हो रहे हमलों को आगे और झुठलाने के लिए DW ने एक कथित विशेषज्ञ की राय भी ले ली। थॉमस कीन नाम के इस विशेषज्ञ ने दावा किया कि यह हमले धार्मिक आधार पर हुए, यह स्पष्ट नहीं है। कीन ने कहा कि यह हमले भारत में धार्मिक रूप से प्रेरित बताए गए हैं, लेकिन ऐसा साफ़ तौर पर है नहीं।

DW ने इसके बाद हमलों पर लीपापोती को लेकर एक और लतीफा छोड़ा। DW ने भी अन्य विदेशी मीडिया संस्थानों की तरह हिन्दुओं पर हमले का कारण धार्मिक ना बता कर उन्हें राजनीति के कारण पीड़ित बताने का प्रयास किया है। DW का दावा है कि हिन्दू इसलिए बांग्लादेश में निशाने पर लिए जा रहे हैं क्योंकि शेख हसीना को हिन्दुओं के संरक्षक के तौर पर देखा जाता था।

DW ने लिखा, “विशेषज्ञों के अनुसार, कई घटनाएँ पहले सता में रही अवामी लीग के खिलाफ राजनीति से प्रेरित थीं इसके अलावा कानून व्यवस्था ना होने के कारण हमले हुए। वहीं दूसरी ओर, बांग्लादेश में लगभग 8% हिंदू हैं, जो मुस्लिम देश में अल्पसंख्यक हैं। पूर्व प्रधानमंत्री की अवामी लीग को हिंदुओं जैसे अल्पसंख्यक समुदायों के मुख्य संरक्षक के रूप में देखा गया है।”

दिलचस्प बात यह है कि डीडब्ल्यू न्यूज़ ने इस तथ्य को नज़रअंदाज़ कर दिया कि बांग्लादेश की 91% आबादी मुसलमानों की है (जिनमें से ज़्यादातर सुन्नी हैं)। बांग्लादेश में इस्लामी मौलाना अक्सर मज़ारों पर आने वाले लोगों का मज़ाक उड़ाते हुए देखे जाते हैं, जो उन्हें ‘काफ़िर’ हिंदुओं के समान बताते हैं। ऐसे में यह कोई अजीब बात नहीं कि यहाँ इस्लामी कट्टरपंथी भीड़ ने हज़रत गरीब शाह मज़ार शरीफ़ में आग लगा दी। कट्टरपंथी भारतीय उपमहाद्वीप में शिया, सूफ़ी, हज़ारा और अहमदिया से धार्मिक स्थलों पर हमला करने के लिए जाने जाते हैं।

हिन्दुओं पर हमलों पर पर्दा डालने के बाद DW भारत पर दोष मढ़ने लगता है। DW का दावा है कि भारत में बांग्लादेश के मुद्दे पर इसलिए ज्यादा बात हुई क्योंकि मोदी सरकार और शेख हसीना के रिश्ते अच्छे थे। DW ने कहा कि बांग्लादेश में सत्ता बदलने को भारत ने खतरे के तौर पर देखा इसलिए उसने इन खबरों को चलने दिया। DW पूरी रिपोर्ट में इस्लामी कट्टरपंथियों का नाम लेने में शर्माता रहा। हालाँकि, उसने हिन्दुओं और उनकी आवाज उठाने वालों को कठघरे में खड़ा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

पहले भी विदेशी मीडिया करता रहा है प्रपंच

DW हिन्दुओं के खिलाफ हो रही हिंसा को नकारने वाला कोई पहला विदेशी मीडिया संस्थान नहीं है। इससे पहले अल जजीरा, BBC, न्यूयॉर्क टाइम्स, द न्यूयॉर्कर और ABC भी ऐसे प्रयास कर चुके हैं। इन सभी की लाइन यही है कि बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हमले राजनीतिक कारणों से हो रहे हैं और इन हमलों में बढ़ोतरी इसलिए हुई है क्योंकि भारत में हिन्दुओं की प्रताड़ना की खबरें दिखाई जा रही हैं। इससे पहले BBC, अल जजीरा, ABC यही दावा कर चुका है कि हिन्दू राजनीतिक कारण से निशाने पर हैं।

हाल ही में अमेरिकी पत्रिका द न्यूयॉर्कर ने अपनी हिन्दू घृणा का नया कीर्तिमान बनाते हुए एक और नया शिगूफा भी छोड़ा था। द न्यूयॉर्कर का दावा था कि बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हमले इसलिए हो रहे हैं क्योंकि भारत एक हिन्दू बहुल राष्ट्र है। इसके अलावा द न्यूयॉर्कर के लिए हमले की जिम्मेदार भारत में एक कथित हिन्दू राष्ट्रवादी सरकार होना भी था। हालाँकि, इन सब के बीच हिन्दुओं पर हमले को मानते हुए द न्यूयॉर्कर ने यह मानने से इनकार कर दिया कि BNP और इस्लामी कट्टरपंथी हिन्दुओं पर हमले के लिए जिम्मेदार हैं।

द न्यूयॉर्कर मात्र यहीं नहीं रुका बल्कि उसने यह भी कहा कि बांग्लादेश में हिंसा की खबरों को भाजपा भारत के भीतर हवा दे रही है। उसने इसके पीछे तर्क दिया कि भाजपा इसलिए यह कर रही हैं क्योंकि कथित तौर पर भारत में उसका समर्थन कम हो रहा है। न्यूयॉर्कर भारत, दक्षिणपंथ, भाजपा और भारतीय मीडिया सभी को इस हिंसा के पीछे दोषी बताता रहा लेकिन उसकी हिम्मत यह नहीं हुई कि वह इस्लामी कट्टरपंथियों की हिंसा को उजागर करे।

यह विदेशी मीडिया ही कर सकता है कि भारत में किसी सड़क हादसे में मारे जाने वाले मुस्लिम की मौत को भी वह मुस्लिमों पर अत्याचार के रूप में पेश कर दे, लेकिन बांग्लादेश में हिन्दुओं का मारा जाना और उनके मंदिरों पर हमला होना उसे बड़ी बात नहीं लगता। इस पर वह लीपापोती करने का प्रयास करता है।

जिस नाबालिग से नवाब यादव ने किया रेप, उसकी बुआ भी गिरफ्तार: बयान से पलटने पर सपा नेता के भाई ने पैसे का दिया था लालच, दोनों में थे शारीरिक संबंध

उत्तर प्रदेश के कन्नौज में नाबालिग लड़की से रेप के आरोपित समाजवादी पार्टी के दबंग नेता नवाब सिंह यादव से जुड़ी महिला को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। महिला पीड़िता की बुआ है और जिस वक्त नवाब यादव ने उसके साथ रेप किया, उस वक्त महिला वहाँ मौजूद थी। इसके बावजूद उसने अपने भतीजी की मदद नहीं की। बकौल पुलिस, पीड़िता की बुआ और नवाब के बीच पहले से ही शारीरिक संबंध थे।

पुलिस के अनुसार, घटना के दिन नवाब यादव ने महिला को फोन किया तो उसने बताया कि वह अपनी भतीजी के साथ लखनऊ में है। इसके बाद नवाब ने नाबालिग को भी अपने साथ लेकर उसके कॉलेज परिसर में आने को कहा था। कॉलेज परिसर में नवाब ने नाबालिग से रेप किया। पीड़िता के मेडिकल में इसकी पुष्टि हुई है। मेडिकल के आधार पर पुलिस ने इस केस में और धाराएँ जोड़ दी हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, 11 अगस्त 2024 की रात को हुए इस घटनाक्रम में अब कन्नौज पुलिस ने पीड़िता की बुआ को भी आरोपित बनाया है। आरोप है कि पीड़िता के साथ जब नवाब रेप कर रहा था, उस समय नाबालिग ने शोर मचाया था। हालाँकि, उसकी बुआ ने मदद नहीं की। बता दें कि पिछले कुछ समय से पीड़िता की बुआ फरार चल रही थी। 21 अगस्त की सुबह 5 बजे उसे गिरफ्तार किया गया है।

पूछताछ में पीड़िता की बुआ ने बताया कि उसने नवाब यादव को अपनी भतीजी के साथ लखनऊ में होने की जानकारी दी थी। इसके बाद नवाब ने पीड़िता को अपने कॉलेज में लाने के लिए कहा था। पीड़िता की बुआ ने यह भी बताया कि वो और नवाब यादव पिछले 5-6 साल से एक-दूसरे के सम्पर्क में थे। इस दौरान दोनों में शारीरिक संबंध भी थे।

पुलिस की पूछताछ में लड़की की बुआ ने यह भी बताया कि लड़की के मेडिकल के दौरान नवाब यादव के भाई ने लालच दिया था कि यदि वह अपने बयान से पलट जाए और मेडिकल ना हो तो वह पैसे देगा।पीड़िता और उसकी बुआ से कहा गया कि वो इस मामले में किसी का नाम ना बताएँ, जिससे जाँच को भटकाया जा सके। नवाब के भाई ने कुछ अन्य लोगों का नाम लेने का भी दबाव बनाया था।

पुलिस का मानना है कि शुरू में नाबालिग की बुआ ने जाँच में सहयोग किया, लेकिन बाद में वो गुमराह करने लगी थी। पीड़िता के माता-पिता भी उसकी हरकतों को संदिग्ध बता रहे थे। इस बीच पीड़िता के माता-पिता ने बेटी के मेडिकल टेस्ट की अनुमति दे दी। मेडिकल में पीड़िता के साथ रेप की पुष्टि हुई है। अब इस केस में पुलिस ने रेप की धारा भी जोड़ दी है।

पुलिस अधीक्षक कन्नौज के मुताबिक, हर पहलू की गहराई से जाँच की जा रही है। बता दें कि 11-12 अगस्त की रात में पीड़िता ने कॉल करके पुलिस से मदद माँगी थी। मौके पर पहुँचकर पुलिस ने नवाब यादव को उसके कॉलेज से गिरफ्तार कर लिया था। स्थानीय लोगों द्वारा नवाब को समाजवादी पार्टी का नेेता बताया जा रहा है। हालाँकि, सपा ने पत्र जारी करके उसके सपा से जुड़े होने का खंडन किया है।

कोलकाता-बदलापुर पर उबाल के बीच ‘चौरंग’ की चर्चा, छत्रपति शिवाजी महाराज के राज में महिलाओं का था सुरक्षा कवच: जानिए इसके बारे में सब कुछ

पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता स्थित RG Kar मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में एक महिला डॉक्टर के साथ बलात्कार और क्रूर तरीके से हत्या की घटना के बाद पूरे देश में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। खासकर मेडिकल फिल्ड के लोग पूरे भारत में सड़क पर उतरे हुए हैं। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट आने के बाद इसकी वारदात की जघन्यता का पता चला, जिसके बाद बलात्कारियों और हत्यारों को कड़ी सज़ा देने की माँग हो रही है। इसी बीच महाराष्ट्र के बदलापुर में भी यौन शोषण की एक घटना सामने आई।

पश्चिम बंगाल में कोलकाता पुलिस पीड़ित परिवार के लिए न्याय माँगने वालों को ही नोटिस भेजने लगी, गुंडों ने अस्पताल में घुस कर प्रदर्शनकारी डॉक्टरों की पिटाई की, CM ममता बनर्जी जो कि राज्य की गृह एवं स्वास्थ्य मंत्री भी हैं उन्होंने एक रैली निकाली, TMC नेताओं ने मुख्यमंत्री की आलोचना करने वालों को धमकाया और अब राकेश टिकट व श्याम मीरा सिंह जैसे लोग कह रहे हैं कि घटना को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया जा रहा है। महाराष्ट्र वाली घटना में उधर आरोपित को गिरफ्तार कर लिया गया है।

चौरंग सज़ा को लेकर रितेश देशमुख का ‘X’ पोस्ट

इसी बीच अभिनेता रितेश देशमुख ने ‘X’ पर कुछ ऐसा पोस्ट किया है जो चर्चा का विषय बन रहा है। उन्होंने लिखा कि एक अभिभावक के रूप में वो पूरी तरह निराश हैं, दुःखी हैं और गुस्से से भरे हुए हैं। स्कूल के पुरुष सफाई कर्मचारी द्वारा 4 वर्ष की दो लड़कियों के साथ यौन उत्पीड़न की घटना का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि विद्यालय को घर की तरह ही सुरक्षित स्थान माना जाता है, ऐसे में इस राक्षस को कड़ी सज़ा मिलनी चाहिए। हालाँकि, इसके बाद उन्होंने जो लिखा वो गौर करने लायक़ है।

दिवंगत पूर्व CM विलासराव के बेटे रितेश देशमुख का कहना है कि छत्रपति शिवाजी महाराज ऐसे अपराधों में दोषियों को वो सज़ा देते थे जिनके वो हक़दार होते थे – चौरंग। अभिनेता ने माँग की कि अब इस सज़ा को वापस अमल में लाए आने की ज़रूरत है। कमेंट्स में भी लोगों ने उनका समर्थन किया। छत्रपति शिवाजी महाराज अपनी न्यायप्रियता और जन-भावनाओं के अनुरूप कार्य करने के लिए जाने जाते थे। आइए, ऐसे में जानते हैं कि ये ‘चौरंग’ सज़ा आखिर होता क्या है।

कृष्णाजी अनंत द्वारा लिखे गए ‘सभासद बखर’ में भी इस सज़ा की चर्चा है। इसे सन् 1697 में लिखा गया था। चूँकि वो छत्रपति शिवाजी महाराज के समकालीन थे, इसीलिए उनके द्वारा लिखे को हम मूल स्रोत के रूप में ले सकते हैं। उन्होंने बताया है कि कैसे शिवाजी एक आदर्श राजा थे, जो न्याय करने के लिए लोकप्रिय थे और अपने शासन में कानून का राज स्थापित करने के लिए प्रयासरत थे। इसमें सबसे कड़ी सज़ाओं में ‘चौरंग’ का जिक्र है। विश्वासघात, धोखाधड़ी या फिर विरोधी राज्य के लिए जासूसी में ये सज़ा दी जाती थी।

क्या थी ‘चौरंग’ सज़ा, उस समय क्यों थी ज़रूरी

खासकर के मराठा साम्राज्य के विरुद्ध जो लोग विश्वासघात या जासूसी करते थे उन्हें ये सज़ा दी जाती थी। आइए, अब जानते हैं कि इस सज़ा की प्रक्रिया क्या थी। इसमें अपराधी के हाथ और पाँव को अलग-अलग दिशा में 4 घोड़ों के साथ बाँध दिया जाता था। फिर उन घोड़ों को अलग-अलग दिशा में दौड़ने का आदेश दिया जाता था। स्पष्ट है, दो हाथ और दो पाँव अलग-अलग दिशा में बँधे होंगे और खींचे जाएँगे तो किसी का भी शरीर कई टुकड़ों में फट जाएगा। यही थी ‘चौरंग’ सज़ा।

चूँकि वो समय निरंतर युद्ध और राजनीतिक अस्थिरता का था, कई राज्य सिर्फ इसीलिए तबाह हो गए क्योंकि किसी गद्दार ने सारे भेद जाकर दुश्मन को बता दिए। ऐसे में खासकर राज्य के साथ विश्वासघात को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता था। इसका सीधा अर्थ है कि हिंदवी साम्राज्य के पहले छत्रपति एक ऐसे राजा थे जो दयावान भी थे लेकिन ज़रूरत पड़ने पर कड़ी सज़ा देने से भी नहीं हिचकते थे। अधिकारियों, जनता और दरबार में अनुशासन बनाए रखने के लिए उस समय इस तरह की सज़ा की ज़रूरत भी होती थी।

औरंगज़ेब के शासन वाला विशाल मुग़ल साम्राज्य और बगल में बीजापुर सल्तनत – शिवाजी महाराज के लिए सैन्य क्षमता के प्रदर्शन के साथ-साथ आंतरिक दुश्मनों को नेस्तनाबूत करना भी आवश्यक था। और शिवाजी का साम्राज्य तो नया-नया था, बड़ी मुश्किल से वो राजा बने थे और राज्याभिषेक के बाद सरदारों से मान्यता प्राप्त की थी। उनके समय जॉन फ्रायर नाम का एक ब्रिटिश शख्स भी भारत घूमने आया था, उसने भी मराठा साम्राज्य में दी जाने वाली कड़ी सज़ाओं का जिक्र किया है।

अक्सर उनके लोग अलग महिलाओं को बंदी बना कर लाते थे तो शिवाजी उन्हें रिहा करने का आदेश देते थे, साथ ही जो बहादुर बंदी उनकी सत्ता को स्वीकार करते थे उन्हें वो उपहार वगैरह भी देते थे। महिलाओं-बच्चों के अलावा जो आम लोग होते थे, उन्हें भी वो जाने देते थे। छत्रपति शिवाजी महाराज का अपनी सेना को स्पष्ट आदेश था कि महिलाओं-बच्चों और आम लोगों को गिरफ्तार न किया जाए, ब्राह्मणों को परेशान न किया जाए। लालमहल में जब शिवाजी ने मुग़ल सूबेदार शाइस्ता खान पर हमला किया था, तब भी उन्होंने महिलाओं पर हाथ नहीं उठाया।

न्यायप्रिय राजा थे छत्रपति शिवाजी महाराज

छत्रपति शिवाजी महाराज माँ भवानी के भक्त थे, एक बार स्वप्न के बाद उन्होंने संगमरमर से माँ भवानी का मंदिर बनवाया। प्रतापगढ़ की पहाड़ी पर ये मंदिर आज भी है। माँ भवानी की प्रतिमा के लिए उन्होंने खजाने खोल दिए और कीमती आभूषण बनवाए। प्राचीन हिन्दू साहित्य और परंपरा के हिसाब से ही शिवाजी के शासनकाल की न्याय पद्धति चलती थी। राजा के दरबार को ‘हज़ार मजलिस’ कहा जाता था। उन्हें नौसेना के गठन का भी श्रेय दिया जाता है, उस समय पुर्तगाल, फ्रांस और ब्रिटेन समुद्र में ख़ासे सक्रिय थे।

छत्रपति शिवाजी महाराज गुरु समर्थ रामदास के अनुयायी थे, जो हनुमान जी के भक्त थे। छत्रपति शिवाजी महाराज का सार्वजनिक जीवन मात्र 19 वर्ष की उम्र में सन् 1646 में तोराना के किले पर नियंत्रण के साथ शुरू हुआ था, और अगले 34 वर्षों तक ये अनवरत चलता रहा। छत्रपति शिवाजी महाराज बिना हिंसा के सबको एक करना चाहते थे, लेकिन बीजापुर सल्तनत ने उनके पिता को धोखे से बंदी बना लिया था, उन पर कई हमले किए। शिवाजी के पास जब कल्याण के नवाब की बहू को बंदी बना कर पेश किया गया था तो उन्होंने उन्हें ससम्मान वापस भेजा।

एक बार पुणे के राँझे गाँव के एक पाटिल ने एक स्त्री का बलात्कार किया। शिवाजी ने दोनों पक्षों को दरबार में सुनवाई के लिए बुलाया तो आरोप सही पाए। उन्होंने तत्काल अपराधी के हाथ-पाँव तोड़ डाले जाने की सज़ा सुनाई। छत्रपति शिवाजी महाराज ने जब अपना अभियान शुरू किया था तो न उनके पास राज्य था और न थी सेना। वहाँ से उन्होंने सन् 1674 में राज्याभिषेक तक की यात्रा तय की। आज फिर उनके उनके शासनकाल को याद किया जा रहा है, जहाँ अत्याचारियों के लिए कोई जगह नहीं थी।

जज का काम फैसला देना, उपदेश देना नहीं: जानिए क्यों ‘दो मिनट का मजा’ पर घिरी कलकत्ता हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट ने क्यों बदला फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाई कोर्ट के उस फैसले को खारिज कर दिया है, जिसमें लड़कियों को अपनी यौन इच्छाओं पर काबू रखने की सलाह दी गई थी। मामले का स्वत: संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्यायाधीश का काम निर्णय लेना है, उपदेश देना नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कलकत्ता हाई कोर्ट की टिप्पणी आपत्तिजनक, अप्रासंगिक, उपदेशात्मक और अनुचित थी। शीर्ष न्यायालय ने कहा कि इस निर्णय से गलत संकेत गया है।

दरअसल, कलकत्ता हाई कोर्ट के जस्टिस चित्तरंजन दास और पार्थ सारथी सेन की पीठ ने 18 अक्टूबर 2023 को एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि किशोर लड़कियों को यौन इच्छाओं पर नियंत्रण रखना चाहिए। दो मिनट के सुख के लिए सेक्स से बचना चाहिए। इसके साथ ही नाबालिग से रेप के दोषी युवक को बरी कर दिया। बकौल कोर्टस युवक का पीड़िता के साथ ‘रोमांटिक सम्बन्ध’ थे।

कलकत्ता हाई कोर्ट की टिप्पणी का ‘किशोरों की निजता के अधिकार के संबंध में’ शीर्षक से सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति अभय एस. ओका और न्यायमूर्ति उज्जल भुयान की पीठ ने सुनवाई की। मंगलवार (20 अगस्त 2021) को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को खारिज कर दिया और उनकी टिप्पणियों पर असहमति जताई।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “न्यायालय के निर्णय में न्यायाधीश की विभिन्न विषयों पर व्यक्तिगत राय शामिल नहीं हो सकती। इसी तरह, न्यायालय द्वारा परामर्श क्षेत्राधिकार का प्रयोग पक्षों को सलाह देकर नहीं किया जा सकता। न्यायाधीश को किसी मामले का निर्णय करना होता है, उपदेश नहीं देना होता। निर्णय में अप्रासंगिक और अनावश्यक सामग्री शामिल नहीं हो सकती।”

सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा, “निर्णय सरल भाषा में होना चाहिए और बहुत अधिक नहीं होना चाहिए। संक्षिप्तता गुणवत्तापूर्ण निर्णय की पहचान है। हमें याद रखना चाहिए कि निर्णय न तो कोई थीसिस है और न ही साहित्य का कोई टुकड़ा। हालाँकि, हम पाते हैं कि विवादित निर्णय में न्यायाधीश की व्यक्तिगत राय, युवा पीढ़ी को सलाह और विधायिका को सलाह शामिल है।”

निर्णय लिखने में किस बात का ध्यान रखें कोर्ट: सुप्रीम कोर्ट

पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय द्वारा की गई टिप्पणी विवाद को तय करने के लिए ‘पूरी तरह अप्रासंगिक’ और ‘चौंकाने वाली’ है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अपील में दोषसिद्धि के आदेश पर विचार करते समय न्यायालयों के निर्णय में निम्नलिखित बातें शामिल होनी चाहिए:

(i) मामले के तथ्यों का संक्षिप्त विवरण, (ii) अभियोजन पक्ष और बचाव पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य की प्रकृति, यदि कोई हो, (iii) पक्षों द्वारा प्रस्तुत किए गए तर्क, (iv) साक्ष्य के पुनर्मूल्यांकन पर आधारित विश्लेषण और (v) अभियुक्त के अपराध की पुष्टि करने या अभियुक्त को बरी करने के कारण।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अपीलीय न्यायालय को मौखिक और दस्तावेजी, दोनों तरह के साक्ष्यों की जाँच करनी चाहिए और उनका पुनर्मूल्यांकन करना चाहिए। इसके बाद अपीलीय न्यायालय को अभियोजन पक्ष के साक्ष्य को स्वीकार करने या अभियोजन पक्ष के साक्ष्य पर अविश्वास करने के कारणों को दर्ज करना चाहिए। न्यायालय को यह तय करने के लिए कारण दर्ज करने चाहिए कि अभियुक्त के खिलाफ आरोप साबित हुए हैं या नहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा कि इस मामले में यदि दोषसिद्धि हो जाती है तो न्यायालय को सजा की वैधता और पर्याप्तता से निपटना होगा। ऐसे मामले में सजा की वैधता और पर्याप्तता पर कारणों के साथ एक निष्कर्ष दर्ज किया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि ऐसा करने के पीछे का ये उद्देश्य है कि जिसके पक्ष में या जिसके विपक्ष में निर्णय दिया या है, उन्हें पता चले कि ऐसा क्यों किया गया। इसलिए निर्णय साधारण भाषा में होनी चाहिए और ठोस तथ्यों पर आधारित होना चाहिए।

पिछली सुनवाई में भी सुप्रीम कोर्ट ने जताई थी चिंता

इस साल जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कलकत्ता हाई कोर्ट के इस फैसले को गलत और परेशान करने वाला बताया था। शीर्ष अदालत स्वत: संज्ञान लेकर इस मामले की सुनवाई कर रही है। 4 जनवरी 2024 को मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस अभय एस ओक और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने हाई कोर्ट के फैसले की वैधता पर सवाल उठाते हुए टिप्पणियों को ‘समस्याग्रस्त’ बताया।

पिछली सुनवाई के दौरान भी सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले के कुछ हिस्सों को बेहद आपत्तिजनक और अनुचित था। साथ ही कहा था कि न्यायाधीशों से यह उम्मीद नहीं की जाती कि वे अपने निजी विचार रखें या भाषण दें। यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत किशोरों के अधिकारों का पूरी तरह उल्लंघन है।

पिछली सुनवाई के दौरान ही शीर्ष अदालत ने इस मामले में राज्य सरकार को नोटिस जारी कर इसके खिलाफ अपील दायर करने को लेकर जवाब माँगा था। गुरुवार को हुई सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने इस फैसले के खिलाफ अपील दायर करने की जानकारी दी। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने इस अपील के साथ स्वत: संज्ञान की कार्यवाही को जोड़ने के लिए भी कहा है।

क्या है मामला?

हाई कोर्ट के जस्टिस चित्तरंजन दास और पार्थ सारथी सेन ने 18 अक्टूबर 2023 को नाबालिग लड़की से रेप के दोषी एक युवक को बरी कर दिया था। इस दौरान कोर्ट ने कहा था कि किशोर लड़कियों को यौन इच्छाओं पर नियंत्रण रखना चाहिए। दो मिनट के सुख के लिए सेक्स से बचना चाहिए। इसके साथ ही नाबालिग से रेप के दोषी युवक को बरी कर दिया। युवक का पीड़िता के साथ ‘रोमांटिक सम्बन्ध’ थे।

इतना ही नहीं, कलकत्ता हाई कोर्ट की पीठ ने इस तरह के मामलों में यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण अधिनियम (POCSO) के इस्तेमाल पर भी चिंता व्यक्त की थी। 16 साल से अधिक उम्र के किशोरों के बीच सहमति से सेक्स की स्थिति में इसे अपराध की श्रेणी से हटाने का सुझाव दिया था। हाई कोर्ट ने कम उम्र में यौन संबंधों को लेकर किशोरों को नसीहत भी दी थी। 

कलकत्ता हाई कोर्ट ने कहा था, “प्रमुख एंड्रोजेनिक स्टेरॉयड टेस्टोस्टेरोन हॉर्मोन है, जो मुख्य रूप से पुरुषों में वृषण (Testicle) और महिलाओं के अंडाशय (Ovaries) से और पुरुषों और महिलाओं दोनों में अधिवृक्क ग्रंथियों (Adrenal Glands) से थोड़ी मात्रा में स्रावित होता है। हाइपोथैलेमस और पिट्यूटरी ग्लैंड्स टेस्टोस्टेरोन की मात्रा को नियंत्रित करते हैं, जो मुख्य रूप से (पुरुषों में) सेक्स या कामेच्छा के लिए जिम्मेदार होता है।

हाई कोर्ट ने आगे कहा था, “इसका अस्तित्व शरीर में है। इसलिए जब संबंधित ग्रंथि उत्तेजना से सक्रिय हो जाती है, तो यौन इच्छा जागृत होती है। लेकिन संबंधित जिम्मेदार ग्रंथि का सक्रिय होना स्वचालित नहीं है। क्योंकि इसे हमारी दृष्टि, श्रवण, कामुक सामग्री पढ़ने और विपरीत लिंग के साथ बातचीत से उत्तेजना की आवश्यकता होती है। यौन इच्छा हमारी अपनी क्रियाओं से जागृत होता है।”

हाई कोर्ट ने कहा था, “किशोरों में सेक्स सामान्य है लेकिन यौन इच्छा या ऐसी इच्छा की उत्तेजना व्यक्ति, पुरुष या महिला के कुछ कार्यों पर निर्भर होती है। इसलिए यौन इच्छा बिल्कुल भी सामान्य और आदर्श नहीं है। अगर हम कुछ क्रियाएँ बंद कर देते हैं तो यौन इच्छा की उत्तेजना सामान्य नहीं रह जाती, जैसा कि हमारी चर्चा में कहा गया है।”

इस दौरान अदालत ने किशोरों को सेक्स की शिक्षा देने पर भी जोर दिया। कहा कि इसकी शुरुआत घर से होनी चाहिए। माता-पिता पहले शिक्षक होने चाहिए। बच्चों, खासकर लड़कियों को बैड टच, अश्लील इशारों के बारे में बताना आवश्यक है। कम उम्र में सेक्स से स्वास्थ्य और बच्चे पैदा करने की क्षमता पर पड़ने वाले दुष्परिणामों के बारे में बताया जाना चाहिए।

कलकत्ता हाई कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में यह भी कहा था, “हमें कभी यह नहीं सोचना चाहिए कि केवल एक लड़की ही दुर्व्यवहार का शिकार होती है, क्योंकि लड़के भी दुर्व्यवहार का शिकार होते हैं। माता-पिता के मार्गदर्शन के अलावा, इन पहलुओं और रिप्रोडक्टिव हेल्थ और हाइजीन पर जोर देने वाली यौन शिक्षा हर स्कूल के पाठ्यक्रम का हिस्सा होनी चाहिए।”

हाई कोर्ट ने कहा था यह प्रत्येक महिला का कर्तव्य/दायित्व है कि वे अपने शरीर की रक्षा करें। अपनी गरिमा और आत्म-सम्मान की रक्षा करें। लैंगिक बाधाओं को परे रख अपने सम्पूर्ण विकास के लिए प्रयास करें। यौन इच्छाओं पर नियंत्रण रखें, क्योंकि समाज की नजरों में वे तब हार जाती हैं, जब मुश्किल से दो मिनट के यौन सुख का आनंद लेने के लिए तैयार हो जाती हैं। अपने शरीर की सीमाओं और उसकी निजता के अधिकार की रक्षा करें।

वहीं किशोर पुरुषों के लिए हाई कोर्ट ने कहा था, ”किसी युवा लड़की या महिला के उपरोक्त कर्तव्यों का सम्मान करना एक किशोर पुरुष का कर्तव्य है और उसे अपने दिमाग को एक महिला, उसकी मूल्यों, उसकी गरिमा, गोपनीयता और उसकी शारीरिक सीमाओं का सम्मान करना चाहिए।”

बांग्लादेश के हिंदुओं के लिए एक साथ खड़े हुए चारों शंकराचार्य: कहा- जमीन और सुरक्षा दे भारत सरकार, भोजन की व्यवस्था हम करेंगे

शेख हसीना के सत्ता से बाहर होने के बाद से बांग्लादेश में हिंदुओं पर इस्लामिक कट्टरपंथियों द्वारा लगातार हमले किए जा रहे हैं। ऐसे में देश के चारों शंकराचार्यों ने हिंदू विरोधी हिंसा की निंदा की है। पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे हमले पर चिंता जताई और माँग की कि इसे तुरंत रोका जाए।

निश्चलानंद सरस्वती ने कहा, “शांति स्थापित करके ही सब कुछ सुलझाया जा सकता है। हिंदू शांतिप्रिय लोग हैं और जब हिंदू सुरक्षित होंगे, तो देश सुरक्षित होगा। बांग्लादेश में इस तरह की हिंसा चीन की साजिश है। चीन में मस्जिदों को नष्ट किया जा रहा है और मुसलमानों को देश से निकाला जा रहा है। अब चीन भारत को अस्थिर करने के लिए बांग्लादेश का इस्तेमाल कर रहा है। अगर बांग्लादेश यह बात नहीं समझ पाया, तो आने वाले दिनों में उसका अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा।”

इस बीच, द्वारका शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती ने कहा कि भारत और बांग्लादेश की सरकारों को हिंदुओं की दुर्दशा पर मिलकर चर्चा करनी चाहिए। उन्होंने कहा, “पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदुओं की स्थिति अच्छी नहीं है। पिछले 50 सालों से जो (हिंदुओं पर अत्याचार) हो रहा है वह ठीक नहीं है। उनका क्या दोष है? उन्हें चुन-चुनकर क्यों मारा जा रहा है? मंदिर क्यों तोड़े जा रहे हैं? इस समस्या का समाधान जल्द ही निकाला जाना चाहिए। अगर ऐसा नहीं हुआ तो एक दिन ऐसा भी आएगा, कि दुनिया के किसी भी हिस्से में हिंदुओं पर अत्याचार होगा और कोई उनकी मदद करने वाला नहीं होगा।”

सदानंद सरस्वती ने भारतीय मुसलमानों से यह भी कहा कि वे इस पर विचार करें कि बांग्लादेश में हिंदुओं की हत्या और उन पर टारगेटेड हमले कौन कर रहा है? द्वारका शंकराचार्य ने कहा, “बांग्लादेश में अभी भी करीब 1.25 करोड़ हिंदू हैं। इतनी बड़ी संख्या के बावजूद वो ऐसी विकट परिस्थिति का सामना कर रहे हैं। भारत में मुसलमानों को भी इस पर विचार करना चाहिए कि वहाँ हत्याएँ कौन कर रहा है।”

बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमलों के बाद, कांची शंकराचार्य शंकर विजयेंद्र सरस्वती ने अशांति से प्रभावित देश में शांति और सामान्य स्थिति की बहाली के लिए विशेष प्रार्थना की है । उन्होंने बांग्लादेश में शांति, सुरक्षा और स्थिरता का आह्वान किया। उन्होंने हिंदुओं और शक्तिपीठ ढाकेश्वरी मंदिर सहित विभिन्न ऐतिहासिक हिंदू मंदिरों के अस्तित्व पर जोर दिया।

इस बीच, ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने भारत सरकार से बांग्लादेश में इस्लामिक कट्टरपंथियों के हमले का शिकार हो रहे हिंदुओं को बचाने के लिए कदम उठाने का आग्रह किया। बांग्लादेशी हिंदुओं के साथ एकजुटता जताते हुए अविमुक्तेश्वरानंद ने जोर देकर कहा कि यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि किसी भी देश में उत्पीड़न का सामना कर रहे हिंदुओं का हिंदुओं की भूमि भारत में स्वागत हो।

अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने कहा, “बांग्लादेश में हिंदुओं की रक्षा की जानी चाहिए। बांग्लादेश सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत में हजारों बांग्लादेशी रहते हैं। हम सरकार से अनुरोध करते हैं कि वह उन्हें ज़मीन और सुरक्षा मुहैया कराए। हम उनके भोजन और अन्य ज़रूरतों का ध्यान रखेंगे और सरकार पर बोझ नहीं आने देंगे।”