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ब्रिटेन की सड़कों पर इस्लामी कट्टरपंथियों का कब्जा, लग रहे ‘अल्लाहू अकबर’ के नारे: 6,7 और 9 साल की ब्रिटिश बच्चियों की प्रवासी ने की हत्या, भड़के दंगे

ब्रिटेन के साउथपोर्ट शहर में एक 17 वर्ष लड़के ने तीन ब्रिटिश बच्चियों की हत्या कर दी। हत्यारा प्रवासी बताया जा रहा है। बच्चियों की उम्र केवल 6,7 और 9 साल थी। बच्चियों की हत्या के बाद ब्रिटेन में दंगे भड़क गए हैं। दंगों में ब्रिटेन में रहने वाले मुस्लिम और ब्रिटिश लोग आमने सामने आ गए।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ब्रिटेन के साउथपोर्ट शहर में गायिका टेलर स्विफ्ट के एक योगा एवं म्यूजिक कार्यक्रम में सोमवार (29 जुलाई, 2024) को इस प्रवासी ने चाकू से हमला बोल दिया। इस हमले में तीनों बच्चों की मौत हो गई। कई जगह दावा किया गया कि हमला करने वाला प्रवासी इस्लामी कट्टरपंथी है।

हमलावर को ब्रिटिश पुलिस ने पकड़ लिया है। पुलिस ने उसका नाम बताने से इनकार किया है। हालाँकि मीडिया रिपोर्ट्स में उसका नाम एक्सेल रबुदाकाना बताया गया है, वह एक अश्वेत है। उसकी एक फोटो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है। पुलिस का दावा है कि यह हमलावर ब्रिटेन में ही जन्मा है।

इस हमले के बाद ब्रिटेन में लोग आक्रोशित हो गए और अवैध प्रवासियों और इस्लामी कट्टरपंथ से देश को बचाने की माँग को लेकर सड़कों पर उतर आए। ब्रिटेन के कई शहरों में इसके जवाब में मुस्लिम समूह भी सड़कों पर उत्पात मचाते देखे गए हैं। एक्स (पहले ट्विटर) पर वायरल कई वीडियो में दावा किया गया है कि मुस्लिमों ने कई जगह पर चाकू और कुल्हाड़ी के साथ शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को धमकाया। मुस्लिम डिफेन्स लीग पर उत्पात मचाने का आरोप है।

ऐसे ही एक वायरल वीडियो में दावा किया गया कि एक ब्रिटिश व्यक्ति को घेरकर मुस्लिमों ने मारा। दूसरे वीडियो में मुस्लिमों को पुलिस पर हमला करते हुए दिखाया गया है। कई मुस्लिम प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने गिरफ्तार किया है।

एक वीडियो में दावा किया गया है कि मुस्लिम भीड़ ब्रिटेन के शहरों में सड़कों पर अल्लाहू अकबर के नारे लगा रही है। ब्रिटेन के लोग इन प्रवासियों को देश से भगाने की माँग कर रहे हैं। ब्रिटेन की पुलिस मुस्लिम प्रदर्शनकारियों के सामने लाचार नजर आ रही है।

ब्रिटेन की पुलिस पर आरोप है कि वह उन लोगों को पकड़ रही है जो बच्चों को मारने वालों का विरोध कर रहे हैं जबकि हमला करने वालों पर वह नरमी बरत रही है। ब्रिटिश पुलिस ने 100 से अधिक प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया है।

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री किएर स्टारमर ने कहा है कि जिन लोगों ने भी इन प्रदर्शनों में हिस्सा लिया है उनको छोड़ा नहीं जाएगा। उन्होंने कहा है कि प्रदर्शन करने वाले पछताएँगे। उन्होंने इस पूरे प्रदर्शन का ठीकरा दक्षिणपंथी समूहों पर फोड़ दिया है। उनका कहना है कि पुलिस जल्द ही प्रदर्शन में हिस्सा लेने वालों को झेलना पड़ेगा।

विरोध शेख हसीना की सरकार का, लेकिन हिंदुओं को निशाना बना रहे इस्लामी कट्टरपंथी: बांग्लादेश में इस्कॉन-काली मंदिर पर हमला, 1 ही थाने में 13 पुलिसकर्मियों की हत्या

बांग्लादेश में इस समय शेख हसीना सरकार के इस्तीफे की माँग को लेकर प्रदर्शन चल रहा है। इस बीच 100 लोगों की मौत हो गई है। वहीं सैंकड़ों घायल हैं। इनमें कई पुलिसकर्मी भी हैं। बताया जा रहा है कि इस प्रदर्शन के बीच 19 पुलिस थानों समेत 26 पुलिस संबंधित जगहों को निशाना बनाया गया। इसके अलावा इस प्रदर्शन में हिंदुओं के घरों, उनके मंदिरों को भी चुन-चुन कर अटैक किया जा रहा है।

स्थानीय मीडिया की मानें तो पुलिस की जिन जगहों पर हमला हुआ है उसमें चार जिलों के पुलिस अधीक्षक के कार्यालय, मैमनसिंह में रेंज डीआईजी का कार्यालय और दो पुलिस चौकियाँ भी हैं। इन जगहों पर हुए हमले की जानकारी बांग्लादेश पुलिस ने रविवार को दी।

सबसे भीषण हमला सिराजगंज के इनायतपुर पुलिस थाने पर हुआ है। यहाँ 13 पुलिसकर्मियों की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। एडिशनल डीआईजी ने इस संबंध में बताया कि प्रदर्शनकारी इनायतपुर थाने पर मार्च करते हुए आए और यहाँ हमला किया। इसके बाद इन्होंने स्टेशन पर आग लगा दी और पुलिसकर्मियों को मौत के घाट उतार दिया।

इनायतपुर के अलावा बताया जा रहा कोमिला में रविवार (4 अगस्त 2024) को हुए हमले में 14 पुलिसकर्मियों को मारा गया है। इसमें एक पुलिसकर्मी हाईवे पुलिस का भी था। कुल मिलाकर बांग्लादेश में हिंसक प्रदर्शन के बीच एक ही दिन में करीबन 300 पुलिसकर्मी घायल हुए।

वहीं सामने आई रिपोर्टों से ये भी पता चलता है कि इस्कॉन और काली मंदिर सहित हिंदुओं के घरों को भी निशाना बनाया गया जिसके बाद स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को कर्फ्यू लगाना पड़ा। इसके अलावा सरकारी प्रतिष्ठानों को भी तीन दिन के लिए बंद करना पड़ा। सेना आश्वासन दे रही है कि वो स्थिति को नियंत्रित कर लेंगे। हालाँकि उनके एक्शन से ऐसा लग नहीं था। रविवार को जब हर जगह प्रदर्शनकारी हिंसक थे तब जाकर उन्होंने हवा में गोलियाँ चलाईं ताकि भीड़ तितर-बितर हो। इससे पहले भीड़ प्रधानमंत्री शेख हसीना के चचेरे भाई के घर को आग के हवाले कर चुकी थी। इसके अलावा वो शेख मुजीबुर रहमान की मूर्ति को भी तोड़ चुकी थी।

पहले महिला अधिकारी को डंडे से पीटने की धमकी, अब कहा – माफ़ी माँगने का सवाल ही नहीं: ममता बनर्जी के मंत्री बोले – इस्तीफा भेज दूँगा

पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी के नेता अखिल गिरि बतौर मंत्री वन अधिकारी को धमकाते दिखे और वीडियो वायरल हो गया। महिला अधिकारी को उन्होंने डंडे से मारने की बात कही थी, जिसके बाद वो पार्टी के निशाने पर आ गए थे। अब अखिल गिरि ने मंत्री पद से भी इस्तीफा दे दिया है, लेकिन माफी माँगने से इनकार कर दिया है। अखिल गिरि ने कहा कि मुझसे पार्टी ने इस्तीफा माँगा, मैंने दे दिया। इस मामले में माफी माँगने का कोई सवाल ही नहीं उठता।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, टीएमसी ने अखिल गिरि को इस्तीफा देने और राज्य के वन विभाग की एक महिला अधिकारी से माफी माँगने के लिए कहा, लेकिन गिरि ने कहा कि वह इस्तीफा दे देंगे, लेकिन माफी नहीं माँगेंगे। अखिल गिरि रामनगर से विधायक हैं। उन्होंने अपना इस्तीफा ई-मेल के माध्यम से भेज दिया है। हार्ड कॉपी वो विधानसभा में ममता बनर्जी को सौंपेंगे।

बता दें कि एक वायरल वीडियो में वन रेंजर मनीषा साहू को धमकाते हुए देखा जा सकता है। उन्होंने साहू को धमकाते हुए कहा था कि ताजपुर समुद्र तट के पास वन विभाग की भूमि पर अतिक्रमण हटाये जाने के बाद उनका कार्यकाल घटा दिया जाएगा। घटना का वीडियो सामने आने के बाद तृणमूल कॉन्ग्रेस प्रवक्ता शांतनु सेन ने कहा, “पार्टी के निर्देश के बाद, प्रदेश अध्यक्ष सुब्रत बख्शी ने रविवार दोपहर अखिल गिरि को फोन किया और उन्हें महिला अधिकारी से माफी माँगने और तुरंत अपना इस्तीफा देने का निर्देश दिया।”

अखिल गिरि ने कहा कि “किसी अधिकारी से माफी माँगने का सवाल ही नहीं उठता।” हालाँकि उन्होंने अपनी टिप्पणी के लिए खेद जताया। उन्होंने कहा, “मैं आज रात अपना इस्तीफा ईमेल कर दूँगा और कल विधानसभा में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को व्यक्तिगत रूप से सौंप दूँगा।”

बता दें कि अखिल गिरि ने जिस महिला अधिकारी मनीषा शॉ को निशाना बनाया, उन्होंने बाद में कहा कि हम वन भूमि को मुक्त कराने गए थे, जिस पर हमारी बार-बार चेतावनी के बाद भी जबरन अतिक्रमण किया गया था। ऑपरेशन के दौरान गिरि मौके पर पहुँचे और वन विभाग की टीम से बहस करने लगे। उन्हें महिला वन अधिकारी से यह कहते हुए देखा गया कि आप एक सरकारी कर्मचारी हैं। बोलते समय अपना सिर (मेरे सामने) झुकाएँ। देखें कि एक हफ्ते में आपके साथ क्या होता है? ये गुंडे… सुनिश्चित करेंगे कि आप रात को घर न जा पाएँ। अपना व्यवहार सुधारें, वरना मैं तुम्हें डंडे से पीटूँगा।

ये राजनीति ख़ून माँगती है… जाति पूछ-पूछ कर जाति मिटाने की बातें, ध्रुवीकरण के जरिए आँकड़ों को नेता बनाएँगे हथियार: जाति जनगणना पर क्यों गलत हैं योगेंद्र ‘सलीम’ यादव

कॉन्ग्रेस पार्टी आजकल हर आलोचना का जवाब एक ही वाक्य से दे रही है – जाति जनगणना करा के रहेंगे। पार्टी न इसके फायदे गिना पा रही है, न ही ये कि इसके बिना नुकसान क्या है। लेकिन हाँ, जाति जनगणना के नाम पर राजनीति खूब हो रही है। 3000 से भी अधिक जातियों और 25,000 से भी अधिक उपजातियों वाले देश में जातिगत पहचान को और आगे किया जा रहा है, जातिगत भेदभाव को और गहरा किया जा रहा है, जाति आधारित राजनीति को फिर ज़िंदा किया जा रहा है।

चलिए, बिना समय गँवाए सीधे मुद्दे पर चलते हैं। योगेंद्र ‘सलीम’ यादव – कॉन्ग्रेस पार्टी ने अपने पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के रणनीतिकारों में से एक रहे इस शख्स को आगे किया है अपने एजेंडे का बचाव करने के लिए। कारण – योगेंद्र यादव शब्दों को चबा-चबा कर बोलते हैं, अंग्रेजी में लिखते हैं और खुद को ‘सेफोलॉजिस्ट’ जैसी भारी-भरकम उपाधि से नवाज़ते हैं। उन्होंने ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में लेख लिख कर समझाया है कि जाति जनगणना क्यों ज़रूरी है।

योगेंद्र यादव जी, X-Ray मशीन जाति नहीं पूछती

आइए, सीधे देखते हैं कि योगेंद्र यादव ने क्या लिखा है और क्यों उनका प्रपंच इस बार नहीं चलेगा। वो अपनी बात शुरू करते हैं एक ‘X-Ray सवाल’ से, कि किसी भी चीज के पक्ष या विपक्ष में होने की शर्त होती है कि अगर वो ज़रूरी और संभव है तो उत्तर ‘हाँ’ होता है और वो जोखिम भरा या फिर पहुँच से बाहर हो तो उत्तर ‘ना’ होता है। ठीक है, बहुत बढ़िया। अब योगेंद्र यादव ‘हाँ’ या ‘ना’ के निर्णय के लिए 5 बिंदु गिनाते हैं, और उनके ही बिंदुओं के हिसाब से पता चल जाता है कि जाति जनगणना ज़रूरी नहीं है।

चूँकि योगेंद्र यादव ने अपनी बात X-Ray से शुरू की है, इसीलिए पहले तो उन्हें ये बताना ज़रूरी है कि आज तक किसी भी X-Ray मशीन ने किसी व्यक्ति की जाति नहीं बताई उसके शरीर को स्कैन कर के। कहाँ फ्रैक्चर है ये तो बताया, शरीर के अंदर क्या समस्याएँ हैं ये भी दिखाया, लेकिन किसी की जाति नहीं बताई। दूसरी बात, एक्स-रे मशीन किसी के शरीर को स्कैन करने से पहले जाति नहीं पूछती। लैब/अस्पताल वाला पैसे लेता है, बिना जाति पूछे मशीन उसकी तस्वीर निकाल देती है।

खैर, पॉइंट्स पर भी आ ही जाते हैं। सबसे पहले योगेंद्र यादव कहते हैं कि कोई समस्या अथवा रोग है या नहीं, इस पर निर्भर करता है कि उसका समाधान किया जाए या नहीं। इसमें कोई शक नहीं कि भारत में जातिगत भेदभाव रहा है, लेकिन जिन जातियों को OBC या SC/ST में डाला गया है, उनमें भी आपस में भेदभाव है। ये हम नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के होने वाले मुख्य न्यायाधीश BR गवई ने SC/ST में आरक्षण के आधार पर उपवर्गीकरण का आदेश देते हुए कहा।

उदाहरण के तौर पर, अक्सर ये कहा जाता है कि कोई ब्राह्मण किसी डोम समाज के व्यक्ति के घर में पानी नहीं पीता, लेकिन उदाहरण के लिए ये पूछा जा सकता है कि क्या OBC में शामिल यादव, निषाद, कुर्मी अथवा SC/ST में ही शामिल जाटव, मीणा या फिर पासी समाज के लोग क्या किसी मुसहर या फिर डोम समाज के घर में पानी पीते हैं? एक-दूसरे की जाति में शादी-विवाह करना तो दूर की बात है, क्या इसे भेदभाव की श्रेणी में गिना जा सकता है या नहीं?

तो हाँ, भेदभाव है और इतिहास में भी रहा है। लेकिन, क्या दमा के रोग में गठिया की दवा चलाई जा सकती है? अगर योगेंद्र यादव कहते हैं कि किस जाति के कितने लोग हैं ये गिनती कर लेने से रोग खत्म हो जाएगा या समस्या का समाधान हो जाएगा, तो या तो उनके अंदर का ‘सलीम’ कुछ ज़्यादा ही जाग उठा है या फिर ‘बुद्धिजीवी’ होने की आड़ में वो प्रपंच चला रहे। दूसरी बात, वो कहते हैं कि जाति जनगणना का मतलब सिर्फ जाति गिनने से नहीं है, बल्कि ये एक बड़ी इमारत का स्टोरहाउस है।

बहुत अच्छे! लेकिन, क्या वो भूल जाते हैं कि आज तक ऐसे जितने भी आँकड़े आए हैं उनका इस्तेमाल ग़रीबों के उत्थान के लिए कम और राजनीति के लिए अधिक हुआ है। उदाहरण के रूप में आप ‘मंडल आयोग’ को ही ले लीजिए। इसने OBC को 52% आरक्षण देने की सिफारिश की, लेकिन सुप्रीम कोर्ट आरक्षण की सीमा को 50 प्रतिशत से अधिक किए जाने को असंवैधानिक करार चुका है। VP सिंह जब प्रधानमंत्री थे तब उन्होंने OBC समाज के लिए 27% आरक्षण की व्यवस्था की।

उस दौरान पूरे देश में विरोध प्रदर्शन हुए, सैकड़ों छात्रों ने आत्मदाह कर लिया, लालू यादव और मुलायम सिंह यादव जैसे नेताओं ने इसे अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया और खुद VP सिंह नेपथ्य में चले गए। अगर ये फैसला उतना ही क्रांतिकारी होता, तो OBC समाज विश्वनाथ प्रताप सिंह को वैसे ही पूज रहा होता, जैसे दलित भीमराव आंबेडकर को पूजते हैं। बाद में ओबीसी में भी सुप्रीम कोर्ट को क्रीमीलेयर की व्यवस्था करनी पड़ी, अर्थात, जो अमीर हो गए उन्हें आरक्षण छोड़ने का नियम बनाना पड़ा।

OBC के नाम पे राजनीति ही हुई, समाज को क्या मिला?

OBC समाज के नेता होने के नाम पर करोड़ों रुपयों के घोटालों में लालू यादव के नाम आए, मुलायम सिंह यादव पर सैकड़ों करोड़ रुपए की संपत्ति अर्जित करने का आरोप लगा, और यहाँ तक कि बिहार में कुछ खास सामान्य वर्ग की जातियों को निशाना बनाते हुए ‘भूरा बाल साफ़ करो’ का नारा दिया जाने लगा। OBC आरक्षण का हुआ क्या? रोहिणी आयोग ने पाया कि OBC के लिए आरक्षित नौकरियों/एडमिशन में 97% सीटें सिर्फ एक चौथाई जातियों को गई।

और तो और, आयोग ने अध्ययन के बाद ये भी पाया कि 24.95% सीटें तो OBC की सिर्फ 10 जातियों में बँट गईं। समस्या ये है कि एक बार इस तरह के फैसले ले लिए जाते हैं तो पीछे मुड़ कर देखने, पुनः समीक्षा या परिस्थितियों के हिसाब से बदलाव का कोई मौका नहीं रहता 100 साल बाद भी। सिफारिशों के बावजूद OBC वर्ग में उपवर्गीकरण की सलाह ठंडे बस्ते में पड़ी हुई है। जब ऐसा कुछ फैसला होगा, फिर योगेंद्र यादव जैसे लोग आग लगवाने के लिए बाहर निकलेँगे और लेख लिखेंगे।

इसी तरह उत्तर प्रदेश में रिटायर्ड जज राघवेंद्र कुमार के नेतृत्व वाले पैनल ने भी OBC के उपवर्गीकरण की सिफारिश की। योगेंद्र यादव कहते हैं कि जाति के अलावा अन्य चीजें भी नोट की जाएँगी, जैसे खाना गैस चूल्हे पर बनता है या मिट्टी के चूल्हे पर, बिजली-पानी की व्यवस्था है, घर की स्थिति कैसी है, इत्यादि। अगर समाजिक-आर्थिक सर्वे ही कराना है और उद्देश्य अंतिम पायदान पर खड़े लोगों का उत्थान तो फिर जाति पूछने की ज़रूरत ही नहीं। बिना जाति पूछे ही सर्वे करा कर उन तक सरकारी योजनाओं के लाभ पहुँचाए जा सकते हैं।

बिहार में जाति जनगणना से क्या पटना अब न्यूयॉर्क बन गया?

अब योगेंद्र यादव के तीसरे पॉइंट पर आते हैं, योगेंद्र यादव का कहना है कि ये इस पर निर्भर करता है कि वास्तविक जीवन की परिस्थितियों और उपलब्ध समय के हिसाब से व्यावहारिक होना चाहिए। बिहार में जाति जनगणना के मॉडल की वो बात करते हैं। 500 करोड़ रुपए लगा कर क्या हुआ? कुछ जातियों ने अपनी जनसंख्या छिपाने का आरोप लगाया, आपस में सोशल मीडिया में सिर-फुटव्वल हुई, हर जाति के ठेकेदारों ने इस हिसाब से खुद को तौला और शुरू हो गई नेतागिरी।

ऐसा कुछ तो नहीं है न कि जाति जनगणना करा लिए जाने के बाद से पटना में न्यूयॉर्क जैसे विकास हो गया है? उलटे सत्ता बदल गई, नीतीश कुमार ने एक बार फिर से राजद के साथ गठबंधन तोड़ कर भाजपा का दामन थाम लिया। जाति जनगणना अगर इतना ही सुंदर और व्यावहारिक फैसला होता तो फिर गठबंधन में दरार क्यों आ गई? इसका उद्देश्य था कि हर नेता अपनी-अपनी जाति की जनसंख्या जान ले, बस हो गया। जाति के नाम पर घृणा फैलाने वाले कुछ अन्य जातियों को गाली दे दें, हो गया।

चौथे पॉइंट में योगेंद्र यादव कहते हैं कि जातिगत जनगणना का खर्च असंभव नहीं होना चाहिए। भारत में ऐसे कार्यों के लिए किन्हें लगाया जाता है? शिक्षकों को, सरकारी कर्मचारियों को। इससे पठन–पाठन का नुकसान होता है। सभी जातियों को, क्योंकि 14 साल तक के बच्चों के लिए या 8वीं कक्षा तक के लिए सरकारी स्कूलों में शिक्षा बिल्कुल मुफ्त है। यहाँ आरक्षण नहीं है। शिक्षक हमेशा जनगणना से लेकर चुनावी ड्यूटी तक पर लगे रहें, और योगेंद्र यादव जैसे लोग जाति जनगणना की बातें कर-कर के अपना उल्लू सीधा करते रहें, यही उद्देश्य है।

योगेंद्र यादव पाँचवें पॉइंट में कहते हैं कि प्रक्रिया जोखिम भरी नहीं होनी चाहिए और इसका नुकसान इसके लाभ से कम होने चाहिए, फिर उत्तर ‘हाँ’ होता है। ये जोखिम भरा तो है। जिस भारत में जातिवाद मिटाने की बात की जाती है, जहाँ जाति को लेकर कई भीषण संघर्ष हो चुके, वहाँ आप जातिगत पहचान को ही सबकी प्राथमिक पहचान बना दे रहे हैं, क्या ये उचित है? भारतीयता और सामाजिक पहचान गई तेल लेने, सब अपनी-अपनी जाति के आधार पर ही जाने जाएँ, है न?

इसके तहत पहले कथित सवर्णों और पिछड़ों को लड़ाया जाएगा, फिर OBC आरक्षण की सच्चाई सामने आएगी कि कुछ ही समूह सारा लाभ खा रहे हैं और फिर SC/ST को लेकर ये बात सामने आएगी कि कुछ समूह तमाम आरक्षण के बावजूद हाशिए पर पड़े ही हुए हैं, इससे आंतरिक संघर्ष और बढ़ेगा, जाति के आधार पर पहचान ऊपर आ जाएगी और बाकी चीजें नीचे चली जाएँगी तो देश गृहयुद्ध की तरफ बढ़ेगा। तो हाँ, ये खतरनाक है। नेता लोग भी चुनाव जीतने के लिए इस संघर्ष का इस्तेमाल करेंगे, खून बहने से राजनीति को आज तक अफ़सोस नहीं हुआ है।

जाति पूछने पर क्यों भड़कते हैं राहुल गाँधी?

योगेंद्र यादव तर्क देते हैं कि गाँवों-बस्तियों में सबको एक-दूसरे की जाति पता है, इसीलिए जाति पूछना बड़ी बात नहीं है। फिर संसद में राहुल गाँधी की जाति जब पूछ दी गई थी तो वो क्यों उखड़ गए थे? अखिलेश यादव क्यों उखड़ गए थे? यानी, एक नेता को विशेषाधिकार है कि वो अपनी जाति न बताए, लेकिन वही नेता चाहता है कि देश के लोग अपना नाम पीछे लें और अपनी जाति आगे करें। वाह! यही वो राजनीति है तो आपसी संघर्ष माँगती है, ख़ून माँगती है, गृहयुद्ध माँगती है।

‘Caste Identity’ को और मजबूत कर ध्रुवीकरण को बढ़ावा देने के पीछे और क्या उद्देश्य हो सकता है। असली मंशा तो राम मंदिर को लेकर एक हुए हिन्दुओं को बाँटना है। ‘फूट डालो और राज करो’ – शायद अंग्रेजों के ज़माने में ही कॉन्ग्रेस ने ये सीख लिया होगा। हमारी नीतियाँ शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक उत्थान की होनी चाहिए, क्योंकि इनके बिना प्रतिनिधित्व संभव नहीं है। प्रतिनिधित्व जबरन नहीं दिया जा सकता, क्योंकि इसके लिए पहला सक्षम बनाना आवश्यक है। ऐसा नहीं होगा तो घाटा सरकारी कामकाज का है।

वोट बैंक की राजनीति से बचना है तो बिना जाति पूछे हर परिवार का सामाजिक-आर्थिक सर्वे करवाइए। भेदभाव का मूल कारण दुनिया भर में अमीरी और गरीबी के बीच की खाई है। योगेंद्र यादव जाति जनगणना के बाद इस पर आधारित फैसलों के ‘Quiet implementation’ की बात करते हैं, क्या ये लोकतंत्र के विरुद्ध नहीं है? 150 करोड़ लोगों के देश में ‘चुपचाप’ सब कुछ कैसे किया जा सकता है? उस देश में, जहाँ मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहते हैं।

और हाँ, चोरी का काम तो शैतान का होता है। चोरी-छिपे कुछ करने की सलाह दी जा रही है, तो समझ लीजिए कि कोई झोल है। योगेंद्र यादव कहते हैं कि बिना X-Ray के निर्णय नहीं लिया जा सकता कि ऑपरेशन होगा या नहीं। यहाँ तो वो बिना X-Ray के सीधे अंगदान की बात कर रहे हैं, जबकि मरीज को सिर्फ बुखार ही हुआ है। जातिगत भेदभाव मिटाने के लिए जागरूकता अभियान चलाइए, पिछड़े समाज को सरकारी योजनाओं के लाभ दिलाइए और उनके क्षेत्रों में विकास कार्य की गति को तेज़ कीजिए – उद्देश्य ये होना चाहिए, जाति गिन कर राजनीति करना नहीं।

एक तरफ योगेंद्र यादव ‘बाबासाहब के सपनों’ की बात करते हुए जाति मिटाने की भी बात करते हैं, दूसरी तरफ ये भी चाहते हैं कि हर कोई अपनी जातिगत पहचान आगे करे। दोनों चीजें एक साथ कैसे हो सकती हैं? योगेंद्र यादव राहुल गाँधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के रणनीतिकार रहे हैं। राहुल गाँधी जाति पूछने पर भड़क जाते हैं, बाकी पूरे देश की जाति जानना चाहते हैं। दोनों चीजें एक साथ कैसे हो सकती हैं? और हाँ, योगेंद्र यादव का इतिहास भी तो दागदार रहा है।

उन्होंने CAA को लेकर कैसे झूठ फैलाया था, हमें याद करना चाहिए। योगेंद्र यादव ‘इच्छाधारी’ हैं, ‘किसान आंदोलन’ के समय वो ‘किसान नेता’ बने हुए थे। NPR को लेकर उन्होंने झूठ बोला था कि इसके तहत माता-पिता के जन्मस्थान के बारे में पूछा जाएगा, जबकि ऐसा कुछ था ही नहीं। उन्होंने झूठ फैलाया था कि मुस्लिमों को भारत का नागरिक नहीं माना जाएगा। इस कारण NPR के आँकड़े इकट्ठे कर रही कर्मचारियों पर हमले भी हुए थे, वो कर्मचारी मुस्लिम महिलाएँ ही निकली थीं।

चीन पर सबसे बड़े डिजिटल स्ट्राइक की तैयारी, 400 कंपनियों पर गिर सकती है गाज: मनी लॉन्ड्रिंग का शक, लोन वाले एप रडार पर

भारत से पैसों की उगाही कर चीन भेजने के मामले में सरकार सख्त कदम उठा रही है। भारत सरकार अगले 3 माह में सिस्टमेटिक तरीके से 400 चीनी कंपनियों पर ताला लगाने वाली है। इन कंपनियों पर भारत में अवैध तरीके से काम करने, मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप हैं। ऐसी कंपनियाँ देश के 17 राज्यों में हैं, जो ऑनलाइन लोन, जॉब पोर्टल की शक्ल में काम कर रही हैं और भारतीय पैसों को अवैध तरीके से चीन भेज रही हैं।

इन कंपनियों में डायरेक्टर तो भारतीय हैं, लेकिन पैसे चीनी कंपनियों के लगे हुए हैं। कुछ कंपनियों में पैसों का डायवर्जन किया गया है, इसका मतलब है कि फंडिंग उन्होंने किसी और काम को दिखाकर लिया है, लेकिन मार्केट में काम कुछ और कर रही हैं।

मनी कंट्रोल की रिपोर्ट के मुताबिक, कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय ने मोबाइल स्क्रीन और बैटरी बनाने वाले लगभग 40 चीनी कंपनियों के खिलाफ भी जाँच शुरू की है। सूत्रों ने दावा किया है कि लगभग 600 चीनी कंपनियाँ जाँच के दायरे में आई थी। इनमें से 300 से लेकर 400 कंपनियों का कामकाज संदिग्ध पाया गया है। इन पर कार्रवाई होना लगभग निश्चित हो चुका है। इनमें लोन एप और ऑनलाइन जॉब ऑफर करने वाली कंपनियां भी शामिल हैं।

कुछ कंपनियों में एक भारतीय डायरेक्टर होता है, लेकिन उनका बैंक अकाउंट चीन में होता है और कोई लेनदेन दर्ज नहीं होता है। कुछ मामलों में, कंपनियां अपने पंजीकृत कार्यालयों पर उपलब्ध नहीं होती हैं। कुछ अन्य मामलों में, निवेश तो है, लेकिन वे अन्य व्यवसायों में लगे हुए हैं, जिससे वित्तीय धोखाधड़ी का संकेत मिलता है।

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि डिजिटल लोन देने वाली कंपनियां पिछले कुछ सालों में तेजी से बढ़ी हैं। ये आरबीआई की गाइडलाइन्स का पालन नहीं कर रही हैं। इसके चलते कई कस्टमर धोखाधड़ी के शिकार हुए हैं, साथ ही इस तरह के लोन देने वाली कंपनियाँ लोगों का मानसिक शोषण भी करने लगती हैं। ये काफी भारी रेट पर ब्याज वसूल रही हैं। इन पर रोक लगाने के लिए सरकार की तरफ से यह जाँच शुरू की गई थी। इसी तरह फर्जी जॉब ऑफर देकर भी लोगों को फंसाया जा रहा है।

प्रक्रिया को पूरा करने में लगता है तीन माह तक का समय

कंपनियों को बंद करने की प्रक्रिया कंपनी अधिनियम की धारा 248 के तहत 3 महीनों में होती है, जिसमें पहले एक नोटिस भेजा जाता है, उन्हें जवाब देने का समय दिया जाता है। एक महीने के बाद, दूसरा नोटिस भेजा जाता है। यदि तब भी कोई प्रतिक्रिया नहीं मिलती, तो कंपनी को बंद कर दिया जाता है।

बता दें कि इससे पहले भी भारतीय सरकार ने ऐसे कड़े कदम उठाए हैं। 2020 में, टिकटॉक और वीचैट सहित 59 चीनी ऐप्स पर प्रतिबंध लगाया गया था। ये ऐप्स डेटा सुरक्षा और गोपनीयता से संबंधित चिंताओं के कारण प्रतिबंधित किए गए थे। इसी तरह 2021 में 43 और चीनी ऐप्स पर प्रतिबंध लगाया गया था।

महिला पुलिस इंस्पेक्टर पर तलवार से हमला, जवानों को दाँत से काटा, धारदार हथियारों का प्रयोग… पंजाब में कानून-व्यवस्था का बुरा हाल, नशे में धुत थे हमलावर

पंजाब के अमृतसर में पुलिस पर हमले की खबर है। यहाँ विवाद सुलझाने गई एक महिला इंस्पेक्टर पर तलवार मारी गई है। तलवार के हमले में महिला थानेदार बुरी तरह से घायल हो गईं हैं। महिला SHO को बचाने के चक्कर में उनके सहयोगी पुलिसकर्मी भी हमले का शिकार हुआ है। दोनों घायलों का अस्पताल में इलाज चल रहा है। हमले के बाद हमलावर फरार हो गए थे जिसमें से सुखजीत सिंह नाम के एक आरोपित को गिरफ्तार कर लिया गया है। फरार चल रहे अन्य आरोपितों की तलाश में दबिश दी जा रही है। घटना शुक्रवार (2 जुलाई, 2024) रात की है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, घटना अमृतसर जिले के थाना क्षेत्र वेरका की है। यहाँ SHO के तौर पर महिला इंस्पेक्टर अमनजोत कौर तैनात हैं। शुक्रवार को पुलिस को सूचना मिली कि मुढाल गाँव में 2 पक्ष आपस में भिड़ गए हैं। इस सूचना पर SHO अमनजोत कौर अपने सहयोगी पुलिसकर्मियों के साथ घटनास्थल पर पहुँचीं। बताया जा रहा है कि विवाद कर रहे दोनों ही पक्ष नशे में धुत थे। पुलिस ने उन्हें जैसे-तैसे काबू किया। इस बीच इंस्पेक्टर अमनजोत कौर उन्हें दोबारा झगड़ा न करने की हिदायत दे रहीं थीं।

आरोप है कि इसी बीच दोनों पक्षों ने पुलिस पर ही हमला बोल दिया। हमले में तलवारों के साथ अन्य धारदार हथियारों का प्रयोग किया गया। कुछ पुलिसकर्मियों को दाँतों से भी काटा गया। हमलावरों ने SHO अमनजोत कौर को खासतौर पर निशाना बनाया। पुलिस ने हमलावरों को संभालने की काफी कोशिश की। हमले में इंस्पेक्टर अमनजोत कौर बुरी तरह से घायल हो गईं। उनके साथ एक अन्य पुलिसकर्मी भी घायल हुआ है। मामले की सूचना मिलने पर अतिरिक्त पुलिस बल घटनास्थल पर पहुँचा। पुलिस फ़ोर्स को आता देख कर हमलावर मौके से भाग निकले।

पुलिस कमिश्नर रणजीत सिंह ढिल्लो ने बताया है कि महिला इंस्पेक्टर पर हमले के बाद केस दर्ज कर लिया गया है। एक आरोपित को गिरफ्तार कर लिया गया है। गिरफ्तार हमलावर की पहचान सुखजीत सिंह उर्फ़ फौजी के तौर पर हुई है। हमलावर सुखजीत सिंह फिलहाल सेना में नौकरी कर रहा है। अन्य आरोपित फरार हैं जिनकी धरपकड़ के लिए दबिश दी जा रही है। घायल महिला इंस्पेक्टर और उनके सहयोगी की हालत खतरे से बाहर है। आरोपितों पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 109, 131, 132 और 221 के तहत कार्रवाई की गई है। मामले में जाँच व अन्य जरूरी कानूनी कार्रवाई की जा रही है।

‘बार-बार ट्रांसफर, माँग रहे थे ₹30 लाख’: डालर सब-इंस्पेक्टर की आत्महत्या में कॉन्ग्रेस MLA का नाम, गर्भवती पत्नी बोलीं – पुलिस वाले भी दे रहे रसूखदारों का साथ

कर्नाटक के यादगिर जिले में कॉन्ग्रेस विधायक और उनके बेटे को जिम्मेदार बता कर एक पुलिसकर्मी ने आत्महत्या कर ली है। मृतक सब-इंस्पेक्टर का नाम परशुराम है जो दलित समुदाय से थे। आरोप है कि राज्य में सत्ताधारी पार्टी कॉन्ग्रेस के विधायक चन्नारेड्डी तन्नूर और उनके बेटे पंपनागौड़ा ने ट्रांसफर से बचने के लिए दारोगा से 30 लाख रुपयों की डिमांड की थी। परशुराम की पत्नी की शिकायत पर पुलिस ने कॉन्ग्रेस MLA और उनके बेटे के खिलाफ विभिन्न धाराओं में FIR दर्ज कर ली है।

मृतक की पत्नी ने पुलिस अधिकारियों पर आरोपित विधायक का साथ देने का आरोप लगाया है। शनिवार (3 अगस्त, 2024) को भाजपा और दलित हित चिंतक संगठनों ने इस मामले सड़क पर उतर कर प्रदर्शन किया।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मामला यादगिर जिले के शहर पुलिस थाने का है। यहाँ तैनात रहे सब इंस्पेक्टर परशुराम का यादगिर टाउन थाने से संसदीय चुनावों के दौरान ट्रांसफर कर दिया गया था। चुनाव के बाद परशुराम फिर शहर में वापस लौटे। बाद में उनकी पोस्टिंग साइबर क्राइम थाने में कर दी गई। कुछ दिनों बाद उन्हें वहाँ से भी रिलीव कर दिया गया। बताया जा रहा है कि 7 महीनों के अंदर बार-बार ट्रांसफर किए जाने से दरोगा परशुराम मानसिक तौर पर काफी परेशान हो गए थे।

मृतक सब-इंस्पेक्टर की पत्नी श्वेता फ़िलहाल गर्भवती हैं। उनका का आरोप है कि उनके पति के बार-बार हो रहे इस तबादले के पीछे कॉन्ग्रेस विधायक चन्नारेड्डी तन्नूर और उनके बेटे पंपनागौड़ा का हाथ था। उन्होंने कहा कि आरोपित बाप बेटे ने उनके पति से ट्रांसफर रुकवाने के नाम पर 30 लाख रुपयों की माँग की थी। श्वेता के मुताबिक ट्रांसफर के बाद से उनके पति लगातार अवसाद में थे और अक्सर रोया करते थे। इस दौरान उन्होंने अपनी पत्नी से कहा था कि उनके मन में आत्महत्या का भी विचार आता है।

इस बीच बच्चे को जन्म देने श्वेता रायचूर स्थित अपने मायके चली गईं। यहाँ उन्हें अपने पति के यादगिर जिले के अस्पताल में भर्ती होने की जानकारी मिली। श्वेता को बताया गया कि परशुराम के नाक और मुँह से खून निकल रहा था। उन्होंने आरोप लगाया कि उनके पति ने मानसिक तनाव में आ कर मौत को गले लगा लिया। श्वेता ने कॉन्ग्रेस MLA चन्नारेड्डी तन्नूर और उनके बेटे पंपनागौड़ा के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई। शिकायत के आधार पर दोनों आरोपितों पर आत्महत्या के लिए उकसाने सहित कई अन्य धाराओं में FIR दर्ज कर ली गई है।

इस बीच दोनों आरोपितों पर कोई कार्रवाई न होने का आरोप लगा कर कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी और अन्य दलित हित चिंतक संगठनों ने कॉन्ग्रेस सरकार के खिलाफ यादगिर में प्रदर्शन किया है। इन प्रदर्शनों में दिवंगत दारोगा परशुराम की पत्नी श्वेता भी शामिल हुईं। श्वेता ने आरोप लगाया कि जिस विभाग में उनके पति नौकरी किए वही पुलिस वाले न्याय करने के बजाय कॉन्ग्रेस विधायक का साथ दे रहे हैं। श्वेता ने पुलिस वालों से सवाल भी किया कि क्या वो एक विधायक के लिए अपने परिवार को भी दाँव पर लगाने को तैयार हैं ?

भारतीय जनता पार्टी ने मृतक सब इंस्पेक्टर परशुराम के समर्थन में सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन किया है। बीजेपी का आरोप है कि पैसे न पाने पर कॉन्ग्रेस विधायक ने एक पुलिसकर्मी को मरने पर मजबूर कर दिया। इस मौके पर चित्तपुर रोड को जाम कर के कर्नाटक सरकार के खिलाफ नारेबाजी हुई। प्रदर्शनकारियों ने तत्काल आरोपित पिता-पुत्र की गिरफ्तारी की माँग की है। कर्नाटक सरकार के गृह मंत्री जी परमेश्वर ने मीडिया से बताया कि मामले की निष्पक्षता से जाँच के आदेश दिए गए हैं।

उन्होंने यह भी बताया कि सब इंस्पेक्टर परशुराम के पास से कोई सुसाइड नोट नहीं मिला और उनकी पत्नी की शिकायत के आधार पर जाँच करवाई जा रही है।

बांग्लादेश में फिर से भड़की हिंसा, 55 की मौत: शेख हसीना की पार्टी के कार्यकर्ताओं और पुलिसकर्मियों की हत्या, पूरे मुल्क में कर्फ्यू

बांग्लादेश में आरक्षण विरोधी प्रदर्शनों के हिंसा में तब्दील हो जाने के बाद रविवार (04 अगस्त 2024) को असहयोग आंदोलन शुरु हो गया है। छात्रों की आड़ में विपक्षी पार्टियों और इस्लामिक कट्टरपंथियों ने पूरे देश में हिंसा फैला दी है। कम से कम 55 लोगों की मौत की खबरें हैं, जिसमें अधिकतर लोग आवामी लीग के कार्यकर्ता हैं। पूरे देश में कर्फ्यू लगा दिया गया है।

कथित आरक्षण विरोधी प्रदर्शन के संयोजक द्वारा घोषित, असहयोग आंदोलन के पहले दिन ढाका और बांग्लादेश के अन्य हिस्सों में विभिन्न इलाकों में भीषण झड़पों में 13 पुलिसकर्मियों सहित कम से कम 55 लोग मारे गए और सैकड़ों लोग घायल हो गए। देश भर में चल रहे हिंसक विरोध प्रदर्शनों के बीच सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने सोमवार, मंगलवार और बुधवार को तीन दिवसीय सामान्य अवकाश की घोषणा की है। मोबाइल इंटरनेट पर बैन लगा दिया गया है। फेसबुक-वॉट्सऐप के बंद होने की सूचना आ रही है। इस बीच, सियालहट से राजधानी ढाका तक लंबे मार्च की घोषणा प्रदर्शनकारियों ने की है, जो मंगलवार (6 अगस्त 2024) तक ढाका पहुँचने वाली है। इस बीच पूरे देश में दुकानें, बैंक सबकुछ बंद रहे हैं, तो रविवार शाम 6 बजे से कर्फ्यू का ऐलान किया गया है।

बांग्लादेश के अलग-अलग हिस्सों में सिराजगंज में 18 की मौत, नरसिंगडी में 6, फेनी में 5, रंगपुर में 4, ढाका, मगुरा, पबना, किशोरगंज और बोगुरा में 3-3, मुंशीगंज और सिलहट में 2-2, बरिशाल, सावर और कुमिला में एक-एक लोगों की मौत हो गई है। इस बीच, सिराजगंज के इनायतपुर पुलिस स्टेशन पर अपराधियों ने हमला कर दिया, जिसमें कम से कम 13 पुलिसकर्मी मारे गए।

जानकारी के मुताबिक, नरसिंगडी में अवामी लीग और भेदभाव विरोधी कोटा आंदोलन के प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प में कम से कम छह अवामी लीग नेताओं की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई और कई अन्य घायल हो गए। डेली स्टार ने सिराजगंज के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (सदर सर्किल) के.एम. शाहिदुल इस्लाम शोहाग के हवाले से बताया कि यह घटना दोपहर करीब एक बजे नरसिंगडी में माधवाधि नगर भवन के बगल में बोरो मस्जिद के सामने घटी।

रविवार (4 जुलाई 2024) की दोपहर किशोरगंज में प्रदर्शनकारियों और अवामी लीग कार्यकर्ताओं के बीच झड़प में एक महिला सहित तीन लोग मारे गए और 100 से अधिक घायल हो गए। प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि संघर्ष के दौरान आवामी लीग कार्यालय में तोड़फोड़ की गई और आग लगा दी गई। इसके बाद प्रदर्शनकारियों ने विरोध जुलूस निकालकर तीन घंटे तक सड़क जाम कर दी।

विपक्षी पार्टी का एक-सूत्रीय एजेंडा

इस बीच, विपक्षी पार्टी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने विरोध प्रदर्शनों के समर्थन के एक-सूत्रीय एजेंडे का ऐलान किया है। प्रदर्शनकारियों ने प्रधानमंत्री शेख हसीना और कैबिनेट के इस्तीफे की माँग की है। विपक्ष ने भी अपने मंसूबे साफ कर दिए हैं, कि उसे येन-केन-प्रकारेण सत्ता चाहिए। बीएनपी के कार्यकर्ता प्रदर्शनों में शामिल होते देखे गए हैं।

भारतीय उप-उच्चायुक्त ने की अपील

ताजा हिंसा के बाद भारत ने बांग्लादेश में रहने वाले अपने नागरिकों से संपर्क में रहने और सतर्क रहने को कहा है। सहायक उच्चायोग ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, “भारत के सहायक उच्चायोग, सिलहट के अधिकार क्षेत्र में रहने वाले छात्रों सहित सभी भारतीय नागरिकों से इस कार्यालय के संपर्क में रहने का अनुरोध किया जाता है और उन्हें सतर्क रहने की सलाह दी जाती है। आपात स्थिति के मामले में, कृपया +88-01313076402 पर संपर्क करें।”

काशी विश्वनाथ पर आ रही है फिल्म… प्रोजेक्ट से जुड़े नामों को देख कर चौंक जाएँगे आप: दिखेगी औरंगजेब की क्रूरता और हिन्दुओं की न्यायिक लड़ाई

काशी विश्वनाथ पर फिल्म आ रही है। जी हाँ, आपने बिलकुल ठीक पढ़ा है। अभी तक इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन अब इसमें कोई शक नहीं बचा है कि वाराणसी में भगवान विश्वनाथ मंदिर पर इस्लामी आक्रांताओं के हमले, हिन्दुओं के संघर्ष और आज भी न्यायालय में चल रही लड़ाई को बड़े पर्दे पर उतारा जाने वाला है। ये एक बड़ा प्रोजेक्ट होगा, जिसमें उत्तर एवं दक्षिण भारत के कई कलाकार काम करेंगे। फिल्म को लेकर काम शुरू हो गया है। हालाँकि, अभी शूटिंग शुरू नहीं हुई है।

ऑपइंडिया को आंतरिक सूत्रों से पता चला है कि काशी विश्वनाथ के इतिहास पर फिल्म बनाने की तैयारी चालू कर दी गई है। इस फिल्म का निर्माण अभिषेक अग्रवाल करेंगे, जो ‘अभिषेक अग्रवाल आर्ट्स’ नामक फिल्म प्रोडक्शन कंपनी चलाते हैं। अभिषेक अग्रवाल इससे पहले 2022 में आई 2 सफल फिल्मों ‘द कश्मीर फाइल्स’ और ‘कार्तिकेय 2’ का निर्माण कर चुके हैं। एक में जहाँ कश्मीरी पंडितों के घाटी से पलायन और इस्लामी क्रूरता को दिखाया गया, वहीं दूसरी एक एडवेंचर फिल्म थी जिसे भगवान श्रीकृष्ण के इतिहास से जोड़ा गया था।

हैदराबाद स्थित फिल्म निर्माता अभिषेक अग्रवाल हाल ही में वाराणसी पहुँचे और वहाँ प्रोफेसर राणा PB सिंह से मुलाकात कर के वाराणसी के इतीहास और वहाँ की संस्कृतिक को समझा। राणा PB सिंह सांस्कृतिक परिदृश्य एवं विरासतों के अध्ययन में दक्षता रखते हैं। ‘वाराणसी हिन्दू विश्वविद्यालय’ (BHU) के ‘इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस’ स्थित ‘डिपार्टमेंट ऑफ जियोग्राफी’ में उन्होंने लंबे समय तक कार्य किया है। ऐसे में वो इस फिल्म से जुड़ते हैं तो उनके अध्ययन एवं शोध का लाभ इसे मिलेगा।

उनके बारे में ये भी बता दें कि वो सांस्कृतिक मानवशास्त्र, पौराणिक कथाओं, लोक-कथाओं, धार्मिक-सांस्कृतिक-विरासत परिदृश्य और योजना, भारत (उत्तर), दक्षिण कोरिया, जापान में इन क्षेत्र अध्ययनों के साथ शोध-पत्र प्रकाशित कर चुके हैं। वो अपने प्रोजेक्ट ‘Understanding Place & Envisioning the Cosmos’ के माध्यम से ब्रह्मादिया जटिलताओं का अध्ययन भी कर रहे हैं। अभिषेक अग्रवाल के साथ चर्चा के दौरान उन्होंने फिल्म को लेकर मार्गदर्शन दिया।

जल्द ही राणा PB सिंह को काशी विश्वनाथ फिल्म प्रोजेक्ट के लिए ऑनबोर्ड लिया जाएगा। असल में इस प्रोजेक्ट को लेकर शुरुआत अभिषेक अग्रवाल और विष्णु शंकर जैन के बीच फोन कॉल के दौरान हुई थी। दोनों ने एक घंटा से भी अधिक वीडियो कॉल कर बात की, जिसमें विष्णु जैन एवं उनके पिता हरिशंकर जैन ने काशी विश्वनाथ को लेकर चल रही न्यायिक लड़ाई के बारे में उन्हें समझाया। तभी इस पर फिल्म बनाने का विचार किया गया और इस पर आगे बढ़ा गया।

विष्णु जैन और हरिशंकर जैन काशी विश्वनाथ को अतिक्रमण मुक्त कराने की न्यायिक लड़ाई के सिपाही हैं। काशी विश्वनाथ मंदिर तोड़ कर मुग़ल बादशाह औरंगजेब ने वहाँ ‘ज्ञानवापी मस्जिद’ खड़ी कर दी थी। ज्ञानवापी ढाँचे के तहखाने में हिन्दुओं को पूजा-अर्चना की अनुमति मिल चुकी है। इलाहाबाद हाईकोर्ट से ज्ञानवापी परिसर को सील करने की अनुमति माँगते हुए एक PIL दायर हुई थी, जिसे स्वीकार नहीं किया गया। हालाँकि, जैन पिता-पुत्र की प्रयासों से ज्ञानवापी ढाँचे का सर्वे हुए और वहाँ शिवलिंग होने की बात पता चली, कई हिन्दू प्रतीक भी मिले।

सुप्रीम कोर्ट आदेश दे चुका है कि ज्ञानवापी ढाँचे में जहाँ शिवलिंग मिला उस क्षेत्र को संरक्षित किया जाए, क्योंकि मुस्लिम पहले वहाँ ‘वजू’ के नाम पर अपने पाँव धोते थे। जहाँ तक मीनाक्षी जैन की बात है, उनसे भी अभिषेक अग्रवाल मुलाकात कर चुके हैं। मीनाक्षी जैन एक ऐसी इतिहासकार हैं, जिन्होंने वामपंथी इतिहासकारों से इतर नाम कमाया है और उनके प्रपंचों को ध्वस्त किया है। अयोध्या सहित अन्य मंदिरों को लेकर लड़ाई पर वो पुस्तकें लिख चुकी हैं, कई कार्यक्रमों में वो अपने वक्तव्य रखती रही हैं।

‘द ताशकंद फाइल्स’ (2029), ‘द कश्मीर फाइल्स’ (2022) और ‘द वैक्सीन वॉर’ (2023) के निर्देशक विवेक अग्निहोत्री भी इस फिल्म से जुड़े हुए हैं, लेकिन उन्होंने ये साफ़ नहीं किया है कि वो इसका निर्देशन करेंगे या नहीं। वो फ़िलहाल ‘द दिल्ली फाइल्स’ पर काम कर रहे हैं, जिसमें भारत विभाजन के दौरान पश्चिम बंगाल में हुए हिन्दुओं के नरसंहार की कहानी दिखाई जाएगी। इस फिल्म से भी ‘अभिषेक अग्रवाल आर्ट्स’ जुड़ा हुआ है। अभिषेक अग्रवाल के पिता तेजनारायण अग्रवाल की मौजूदगी में विवेक अग्निहोत्री के साथ कई फिल्मों को लेकर इनकी डील हुई थी।

मीनाक्षी जैन, राणा PB सिंह, विष्णु शंकर जैन, हरिशंकर जैन, विवेक अग्निहोत्री और अभिषेक अग्रवाल – ये ऐसे 6 किरदार हैं जो काशी विश्वनाथ पर बन रही फिल्म का आधार होंगे। आगे अब कौन से अभिनेता-अभिनेत्री इससे जुड़ते हैं, कहानी क्या स्वरूप लेती है और कौन इसका निर्देशन करता है – ये सब समय के साथ पता चलता जाएगा। अभी इसकी पुष्टि समझिए कि फिल्म बन रही है। औरंगजेब के अत्याचार से लेकर संघर्षशील हिन्दुओं की ये कहानी पर्दे पर ज़रूर आ रही है।

बरेली की दलित बस्ती में ‘चंगाई सभा’, गरीबों के धर्मांतरण का प्रयास: हिन्दू संगठनों ने मौके पर पहुँच कर किया विरोध, बाँटे जा रहे थे बाइबिल जैसे साहित्य

उत्तर प्रदेश के बरेली जिले से ईसाई धर्मान्तरण के प्रयास का मामला सामने आया है। यहाँ हिन्दू संगठनों ने एक पादरी पर दलित (SC वर्ग) के लोगों को ईसाई बनाने की कोशिश का आरोप लगाया है। आरोप है कि अनुसूचित जाति के 40-50 लोगों को प्रार्थना सभा के नाम पर जमा कर के उनके धर्मांतरण की साजिश रची गई थी। घटना रविवार (4 अगस्त, 2024) की है। पुलिस मौके पर पहुँच कर जाँच व अन्य जरूरी कार्रवाई में जुट गई है। कुछ लोगों से पूछताछ चल रही है।

यह घटना बरेली के थाना क्षेत्र बहेड़ी की है। यहाँ की गौटिया बस्ती में अधिकतर दलित समुदाय के लोग रहते हैं। ‘बजरंग दल’ का आरोप है कि रविवार की दोपहर लगभग 11:30 पर बाहर से कुछ लोग इस बस्ती में आए और यहाँ के निवासियों के घरों में जा कर प्रार्थना सभा के नाम पर लोगों को जुटाने लगे। मामले की सूचना मिलने पर विहिप और ‘बजरंग दल’ के कार्यकर्ता मौके पर पहुँचे। उन्होंने पाया कि एक जगह लगभग 40-50 लोगों को जुटा कर रखा गया था। ऑपइंडिया के पास शिकायत कॉपी मौजूद है।

शिकायत में बताया गया है कि इन सभी के धर्मांतरण की तैयारी की जा रही थी। इस पूरे कार्यक्रम का कर्ताधर्ता एक पादरी बताया जा रहा है। ‘बजरंग दल’ के सदस्यों ने अपने सीनियरों को इसकी सूचना दी। संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारी मौके पर पहुँचे और उन्होंने कार्यक्रम का विरोध किया। आरोप है कि इस जमावड़े में बाइबिल सहित अन्य तमाम ईसाई साहित्य भी लाए गए थे। मौके पर एक दान पात्र भी रखा हुआ था। प्रार्थना सभा में एक ब्लैकबोर्ड लगाया गया था। उस ब्लैकबोर्ड में संडे का टाइम टेबल लिखा हुआ है। इस टाइम टेबल में चॉक से ‘प्रभु का धन्यवाद’, ‘तेरा प्यार है’, ‘प्रार्थना’ और ‘गवाही’ जैसे काम लिखे हुए थे।

प्रार्थना सभा में पुरुषों के साथ महिलाएँ और बच्चे भी मौजूद थे। ऑपइंडिया को मिले वीडियो में एक लड़की पुलिस से पहले खुद को हिन्दू बताती है लेकिन बाद में कहती है कि उसने चंगाई किया है और वो परमेश्वर को मानती है। लड़की के हाथ में एक किताब है जिसे ले कर वो कहती है कि परमेश्वर ने उसे जीवन दिया है। अंत में बड़े-बड़े शब्दों में ‘Praise The Lord’ लिखा हुआ था जिसका हिंदी में अर्थ ‘परमेश्वर की स्तुति करो’ होता है। घटनास्थल पर मौजूद लोगों ने पहले खुद को हिन्दू बताया लेकिन जब उनसे ईसाइयों के कार्यक्रम में आने की वजह पूछी गई तो वो कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे पाए।

‘बजरंग दल’ के सदस्य जब कथित प्रार्थना सभा में पहुँचे तो उनकी आरोपितों से नोंकझोंक भी हुई। मामले की जानकारी मिलते ही पुलिस मौके पर पहुँची और हालात को काबू किया। ‘बजरंग दल’ और ‘विश्व हिन्दू परिषद’ के लगभग आधे दर्जन पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने पुलिस को शिकायत दे कर दलितों के सामूहिक धर्मांतरण की साजिश का आरोप लगाया। उन्होंने आरोपितों पर कड़ी कार्रवाई की माँग की है। पुलिस ने मामले की जाँच शुरू कर दी है। कुछ लोगों से पूछताछ की जा रही है।