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जिस अवधेश को लेकर नाचे राहुल-अखिलेश, ‘अयोध्या की बेटी’ को नोंचता था उसका खास मोईद खान: अपने रेपिस्ट नेता पर सपा मौन, पीड़िता की माँ से मिले CM योगी

लोकसभा चुनाव के बाद अयोध्या के जो नतीजे सामने आए उसके बाद से अयोध्या की सीट बहुत चर्चा में रही। यहाँ से सांसदी जीते समाजवादी पार्टी के नेता अवधेश प्रसाद को सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने जहाँ अयोध्या का राजा बताया तो वहीं कॉन्ग्रेसी भी इसे अपनी जीत समझते दिखाई दिए। अब उसी अयोध्या में एक मामला ओबीसी लड़की से रेप का मामला चर्चा में है, जिसके आरोपित मोईद खान के तार सपा पार्टी से जुड़े हैं और मीडिया में उसे सांसदग अवधेश प्रसाद से जोड़कर बताया जा रहा है। सोशल मीडिया में दोनों की एक साथ तस्वीर वायरल हो रही है, लेकिन न अखिलेश यादव अब इस मामले में कुछ बोल रहे हैं और न ही राहुल गाँधी… वहीं अवधेश प्रसाद भी लगातार पत्रकारों को ये कहकर किनारे कर रहे हैं कि उन्हें घटना का कुछ पता ही नहीं।

रिपब्लिक भारत पर इस संबंध में एक रिपोर्ट भी आई है। इस रिपोर्ट में दिखाया गया कि कैसे अवधेश प्रसाद पत्रकारों के सवालों को टालते दिखे। जब रिपब्लिक पत्रकार ने उनसे घटना की बाबत पूछा तो वह बोले कि उन्हें इस बारे में कुछ नहीं पता, रूम में जाकर जब इस पर कोई बात होगी तब वो कुछ बोल पाएँगे। पत्रकार ने उनसे पूछा कि क्या वो उसके बाद कोई एक्शन लेंगे। इस पर भी अवधेश प्रसाद ये कहने की बजाए कि आरोप सही पाए गए तो कार्रवाई होगी कि जगह सवाल को घुमाते दिखे। उन्होंने कहा कि वो सदन में शामिल हो रहे हैं अभी इस मामले में वो कुछ नहीं कह पाएँगे। जानकारी होने पर ही वो एक भी शब्द बोलेंगे।

हैरानी की बात है कि अवधेश प्रसाद जिस रेप आरोपित से जुड़े सवाल होने पर खुद को मीडिया के आगे मामले अनभिज्ञ दिखा रहे हैं वो व्यक्ति उनका करीबी लगता है, जिसके साथ उनकी तस्वीरें शेयर हो रही हैं। इन फोटोज में वह अवधेश प्रसाद के साथ एकदम बगल में बैठा है। बावजूद इसके अवधेश प्रसाद या कोई सपा नेता इस पर कुछ नहीं बोल रहा।

इस मुद्दे को सीएम योगी आदित्यनाथ ने संसद में भी उठाया और निजी तौर पर पीड़िता के परिजनों से मुलाकात भी की। कल सदन में उन्होंने ओबीसी लड़की से गैंगरेप के आरोप सामने आने के बाद कहा था कि अयोध्या गैंगरेप का आरोपित तो फैजाबाद सांसद अवधेश प्रसाद की टीम का सदस्य है। वह उनके साथ उठता, बैठता और खाता-पीता है। बावजूद इसके समाजवादी पार्टी की तरफ से कुछ भी नहीं कहा गया। इतना ही नहीं न कोई एक्शन लिया गया है, जबकि मामला एक अति ओबीसी लड़की से जुड़ा हुआ है। वहीं आज उन्होंने पीड़िता की माँ से सीएम आवास में मुलाकात की, बच्ची की हालत के बारे में जाना और आरोपितों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई का भरोसा दिया।

बता दें कि जिस मामले के संज्ञान में आने के बाद सीएम योगी ने ओबीसी बच्ची के परिजनों को आश्वासन दिया है कि वो आरोपितों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई करेंगे। उस ओबीसी बच्ची की शिकायत भी कुछ दिन पहले दर्ज नहीं हो रही थी। कारण था कि पुलिस चौकी ही मोईद खान की प्रॉपर्टी के भीतर पिछले 12 साल से संचालित हो रहा थी। गुहार लगाने पर भी उसकी नहीं सुनी जा रही थी। घटना की बाबत शिकायत देने के करीब 30 घंटे बाद इसपर एक्शन हुआ और मामला सबसे संज्ञान में आया। इसके बाद 30 जुलाई को मोईद खान और उसका नौकर राजू जाकर गिरफ्तारी हुए। अब पुलिस मोईद खान के विरुद्ध जाँच करने में जुटी है।

ओबीसी लड़की के साथ मोईद खान और नौकर राजू खाँ ने किया रेप

उल्लेखनीय है कि ओबीसी लड़की से रेप का मामला अयोध्या के थाना क्षेत्र पूराकलंदर की है। यहाँ के चौकी क्षेत्र भदरसा में समाजवादी पार्टी के नेता मोईद खान की बेकरी की दुकान है। यहीं पर एक OBC समुदाय की एक मजदूर महिला और उनकी 12 वर्षीया नाबालिग बेटी रहती है। लगभग 75 दिन पहले पीड़िता अपनी माँ के साथ मजदूरी कर के लौट रही थी। तभी रास्ते में मोईद की दुकान में काम करने वाले नौकर राजू खाँ ने पीड़िता को टोस्ट लेने के लिए अपनी दुकान पर बुलाया। लड़की पहले भी मोईद की दुकान पर आती जाती रही थी इसीलिए वो विश्वास कर के वहाँ चली गई।

बताया जा रहा है कि दुकान में राजू और उसके मालिक मोईद ने पीड़िता से बारी-बारी सामूहिक दुष्कर्म किया। इसी दौरान आरोपितों द्वारा रेप का वीडियो भी बना लिया गया। किसी को बताने पर वीडियो वायरल करने की धमकी भी दी गई। बाद में इसी वीडियो से डरा-धमका कर पीड़िता से 2 महीने तक दोनों आरोपितों ने गैंगरेप किया। इस वजह से पीड़िता गर्भवती हो गई। लड़की के पेट में दर्द होने पर माँ को शक हुआ। जब यह बात लड़की की माँ को पता चली तो उसने पूरी वजह पूछी। पीड़िता ने सारी बात अपनी माँ को बता दी। आखिरकार मामले की शिकायत पुलिस में दर्ज करवाई गई।

मामले की जानकारी मिलते ही मौके पर हिन्दू संगठनों का जमावड़ा शुरू हो गया। भाजपा और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं के साथ निषाद पार्टी के सदस्य भी थाने पर जमा हो गए और नारेबाजी करने लगे। मौके पर पुलिस फोर्स पहुँची और नाराज लोगों को समझा कर शाँत करवाया। जाँच के दौरान यह भी पता चला कि जिस भदरसा पुलिस चौकी क्षेत्र की यह घटना है वह आरोपित मोईद खान की ही प्रॉपर्टी में चल रही थी। रात भर में ही पुलिस चौकी को मोईद खान की प्रॉपर्टी से अलग जगह शिफ्ट किया गया।।

बाइक टच होने पर माजिद चौधरी ने पति-बच्चों के सामने गोली मार सिमरनजीत की हत्या की, दिल्ली पुलिस ने एनकाउंटर के बाद दबोचा: पहले से भी दर्ज हैं 3 मुकदमे

दिल्ली के गोकुलपुरी में सिमरनजीत नाम की महिला की हत्या करने वाले 28 साल के माजिद चौधरी को एनकाउंटर के बाद गिरफ्तार कर लिया गया है। आरोपित माजिद इलाके में अपने एक रिश्तेदार से मिलने के लिए गया था। उसके बाद पुलिस ने उसे घेर लिया। एनकाउंटर के दौरान आरोपित के दोनों पैरों में गोली लगी है। पुलिस ने उसे घायलावस्था में गिरफ्तार कर लिया है।

दिल्ली पुलिस ने बताया कि आरोपित माजिद के पास से एक 7.65 एमएम की पिस्तौल बरामद की है, जिसकी मैगजीन में 2 राउंड और चैम्बर में 3 राउंड हैं। इसके अलावा, गाँधी नगर के पुराने सीलमपुर इलाके से चोरी की गई एक मोटरसाइकिल भी बरामद की गई है। माजिद चौधरी बुधवार (31 जुलाई 2024) की घटना के दिन से ही फरार चल रहा था।

दरअसल, उत्तर-पूर्वी दिल्ली के गोकुलपुरी इलाके में बाइक टच हो जाने के बाद मामूली कहासुनी के बीच माजिद चौधरी ने सिमरनजीत कौर नाम की महिला की गोली मारकर हत्या कर दी थी। इसके बाद से वह फरार हो गया था। पुलिस उसकी तलाश में लगातार दबिश दे रही थी, लेकिन वह हत्थे नहीं चढ़ रहा था। पुलिस को जानकारी मिली की माजिद गोकलपुरी में अपने किसी जानकार से मिलने आया है।

इसके बाद गोकुलपुरी इलाके के गंदे नाले के पास पुलिस ने जाल बिछा दिया। रात को लगभग 3 बजे जैसे ही माजिद अपनी बाइक से गुजरने लगा तो पुलिस ने उसे रुकने के लिए कहा। इस पर रुकने के बजाय उसने पुलिस टीम पर एक के बाद एक करके तीन राउंड गोली चला दी। पुलिस ने भी जवाबी कार्रवाई की और इसमें माजिद के दोनों पैरों में गोली लग गई। इसके बाद वह घायल होकर वहीं गिर पड़ा।

पुलिस का कहना है कि गाजियाबाद के साहिबाबाद इलाके के रहने वाले माजिद का लंबा आपराधिक रिकॉर्ड है। वह 2015 में साहिबाबाद में एक हत्या में शामिल था। इस मामले में वह 6 साल बाद बेल पर ?आया। साल 2022 में एक शख्स की हत्या की कोशिश में फिर से 6 महीने जेल में रहा। जेल से बाहर निकलने के उसने फिर से एक और हत्या की कोशिश की। इस मामले में वह 5 महीने जेल में रहा।

अब उसने मामूली-सी बात के बाद बच्चों और पति के सामने एक महिला की गोली मारकर हत्या कर दी। माजिद ने पूछताछ में पुलिस को बताया कि 31 जुलाई 2024 को वह अपनी बाइक से गोकुलपुरी फ्लाईओवर से जा रहा था। इस दौरान उसकी बाइक हीरा सिंह की बाइक से टच हो गई। हीरा सिंह अपनी 30 साल की पत्नी सिमरनजीत कौर और 12 एवं 4 साल के 2 बेटों के साथ मौजपुर जा रहे थे।

इस बीच हीरा सिंह और माजिद चौधरी के बीच कहासुनी हो गई। इसके बाद हीरा सिंह और उनका परिवार फ्लाईओवर की ओर बाई तरफ सड़क पर चलता रहा। वहीं, माजिद फ्लाईओवर पर चढ़ गया। माजिद ने फ्लाईओवर पर अपनी बाइक रोकी और 30-35 फीट की दूरी से नीचे एक गोली चला दी। गोली सिमरनजीत कौर के सीने और गर्दन के बीच जा लगी। अस्पताल ले जाने के दौरान उनकी मौत हो गई।

लोहे के पाइप से पीटा, तलवार से गर्दन काटी, आँखें फोड़ी… सुनील-पुनीत-सुधीर की हत्या में 16 साल बाद 10 दोषी: शीबा के इश्क में इजलाल कुरैशी ने दिया था अंजाम

उत्तर प्रदेश के मेरठ में 2008 में तीन हिन्दू युवकों की हत्या के मामले में आरोपित इजलाल को कोर्ट ने दोषी करार दिया है। उसके साथ ही उसकी गर्लफ्रेंड शीबा सिरोही समेत 10 लोगों को दोषी माना गया है। इस हाई प्रोफाइल मामले में लगातार 16 वर्षों से मामला चल रहा है।

कोर्ट ने सुनवाई पूरी करके गुरुवार (1 अगस्त, 2024) को 10 आरोपितों को दोषी करार दिया है। इस मामले में सजा 5 अगस्त को सुनाई जाएगी। अब तक इजलाल इस मामले में जमानत पर घूम रहा था। उसे अब जेल जाना होगा। अदालत ने इजलाल की गर्लफ्रेंड शीबा सिरोही को भी दोषी करार दिया है, उसके ही चक्कर में यह तिहरा हत्याकांड हुआ था।

क्या था पूरा मामला

मुख्य आरोपित इजलाल का मेरठ की एक लड़की शीबा सिरोही से प्रेम प्रसंग था। शीबा सिरोही सामान्य परिवार से थी जबकि इजलाल काफी प्रभावशाली परिवार से था। इजलाल के पास मीट की फैक्ट्री, कोल्ड स्टोरेज और अन्य कई धंधे थे। इजलाल का चचेरा भाई शाहिद अखलाक 2008 में बसपा का मेरठ से सांसद भी था।

शीबा और इजलाल का लम्बे समय से प्रेम प्रसंग चल रहा था। शीबा की घरवालों ने सेना के एक अफसर के साथ शादी करवाई थी लेकिन वह वहाँ रह ना पाई और मेरठ वापस चली आई थी। इजलाल उस पर काफी पैसे लुटाता था। लेकिन इस बीच शीबा पर इजलाल को शक हो गया।

दरअसल, शीबा सुधीर नाम उज्ज्वल नाम के एक लड़के से बात करती थी। यह बात इजलाल को पसंद नहीं आई। सुधीर, इजलाल का पहले से पहचान वाला था। इजलाल ने इसीलिए सुधीर को मारने का प्लान बनाया और इसके लिए 23 मई, 2008 की रात मेरठ के गुदड़ी बाजार में स्थित एक घर में उसे बुलाया।

सुधीर के साथ पुनीत गिरी और सुनील ढाका नाम के दो और युवक भी आए। इस घर में इजलाल ने पहले इन युवकों को शराब पिलाई और फिर इन पर हमला बोल दिया। इजलाल ने इन तीनों को पीट-पीट कर मार दिया। इसके बाद इनकी आँखे निकाल लीं। इनके शव को क्षत-विक्षत कर दिया गया। मीट काटने वाले छुरे से इनके शव काटे भी गए।

इसके बाद शवों को घर में ही फेंक दिया गया। इजलाल ने मोटर चला कर घर को धोया भी। लेकिन तीनों के शरीर से बहा खून बाहर सड़क पर आ गया और मुहल्ले के लोगों को पता चल गया। इजलाल ने इसके बाद शव ठिकाने लगाने की सोची।

लाश सड़क किनारे छोड़ी

इजलाल ने मामला बिगड़ता देख फोन कर गाड़ियों का काफिला मंगवा लिया। इसके बाद तीनों शवों को निकाल कर एक एस्टीम गाड़ी में रखा गया और उन्हें लेकर वह ठिकाने लगा चला गया। इजलाल के मँगवाए काफिले में एक लाल बत्ती की गाड़ी भी थी। इज्लाला मेरठ से यह लाशें लेकर निकला और तीनों लाशों को बागपत में हिंडन नदी के किनारे लेकर पहुँचा।

इजलाल की गाड़ी का यहाँ तेल खत्म हो गया। इसके बाद उसने गाड़ी यहीं छोड़ दी। जब तीनों के घरवालों ने तलाश चालू की तो मामले का खुलासा हुआ। इस मामले से धार्मिक तनाव भी बन गया क्योंकि हत्यारा मुस्लिम और मारे जाने वाले तीनों हिन्दू थे। मामले में पुलिस ने इजलाल को बागपत से गिरफ्तार किया था।

उसे कुछ समय के बाद जमानत मिल गई थी। इजलाल अब तक जेल से बाहर ही रह रहा था। अब उसे दोषी ठहराया गया है, उसको सजा 5 अगस्त को सुनाई जाएगी। कोर्ट ने इजलाल के अलावा शीबा सिरोही, अफजाल, वसीम, रिजवान, बदरुद्दीन, महराज, इजहार और अब्दुल रहमान को दोषी ठहराया है। इस मामले में एक गवाह पर भी हमला हो चुका है।

नहीं बदलेंगे संभाजीनगर और धाराशिव का नाम: सुप्रीम कोर्ट ने शेख मसूद सहित कई लोगों की याचिका खारिज की, कहा- इसका अधिकार सरकार के पास

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (2 अगस्त 2024) को महाराष्ट्र सरकार के उस फैसले को हरी झंडी दे दी, जिसमें औरंगाबाद और उस्मानाबाद शहरों का नाम बदला गया था। राज्य सरकार ने औरंगाबाद का नाम बदलकर छत्रपति संभाजीनगर और उस्मानाबाद का नाम बदलकर धाराशिव किया था। शेख मसूद इस्माइल शेख एवं अन्य ने सरकार के इस फैसले को चुनौती दी थी, जिसे शीर्ष न्यायालय ने खारिज कर दिया।

जस्टिस ऋषिकेश रॉय और जस्टिस एसवीएन भट्टी की खंडपीठ ने बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा और कहा कि उच्च न्यायालय का निर्णय पूरी तरह से तर्कसंगत था। दरअसल, याचिकाकर्ताओं ने महाराष्ट्र सरकार के फैसले के विरुद्ध बॉम्बे हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। हाई कोर्ट ने सरकार के फैसले को बरकरार रखा। इसके बाद इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा, “देखिए, किसी क्षेत्र में रहने वाले लोगों के लिए स्थान के नाम को लेकर हमेशा सहमति और असहमति होती है। क्या न्यायालयों को इसे न्यायिक समीक्षा के माध्यम से हल करना चाहिए? यदि उनके पास (सरकार के पास) नाम रखने का अधिकार है तो वे नाम बदल भी सकते हैं। यह (बॉम्बे उच्च न्यायालय का) एक तर्कसंगत आदेश है। इसमें गलती क्यों होनी चाहिए।”

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि राज्य सरकार ने दोनों शहरों के नाम बदलने से पहले कानून के तहत निर्धारित प्रक्रिया का व्यापक रूप से पालन किया था। बता दें कि इस साल मई में बॉम्बे उच्च न्यायालय ने महाराष्ट्र के इन दोनों शहरों के नाम बदलने को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया था और सरकार के फैसले को सही ठहराया था।

मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली पिछली महाविकास अघाड़ी (एमवीए) सरकार ने 29 जून 2021 की कैबिनेट बैठक में औरंगाबाद और उस्मानाबाद का नाम बदलने का फैसला किया था। जब मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली नई सरकार ने महाराष्ट्र में पद भार ग्रहण किया, उसके बाद 16 जुलाई 2022 को एमवीए सरकार के निर्णय को फिर से लागू किया।

इसके बाद संबंधित जिलों के निवासियों सहित कई व्यक्तियों ने इसके खिलाफ बॉम्बे हाई कोर्ट में कई याचिकाएँ दायर कीं। सुनवाई के दौरान महाराष्ट्र सरकार ने तर्क दिया कि ‘उस्मानाबाद’ का नाम बदलकर ‘धाराशिव’ करने से न तो कोई धार्मिक या सांप्रदायिक द्वेष पैदा हुआ और न ही इससे धार्मिक समूहों के बीच कोई दरार पैदा हुई। इसके बाद हाई कोर्ट ने संबंधित याचिकाएँ खारिज कर दीं।

ट्रेन के जनरल बोगी जैसे हो गया आरक्षण: सुप्रीम कोर्ट के दलित जज ने समझाई SC/ST कोटा की हकीकत, कहा- जो भीतर आ जाता है वह दूसरे को घुसने नहीं देता

SC-ST वर्ग के लोगों के लिए आरक्षण के मामले पर 1 अगस्त 2024 को सुप्रीम कोर्ट की 7 न्यायधीशों की संविधान पीठ ने 6-1 के बहुत से ऐतिहासिक फैसला दिया। पीठ ने इस दौरान आरक्षण के भीतर आरक्षण तय करने पर मुहर लगाई। कोर्ट ने कहा कि कोर्ट ने एससी, एसटी वर्ग के आरक्षण में से क्रीमीलेयर को चिन्हित कर बाहर किए जाने की जरूरत है ताकि समानता आ सके। इस फैसले के दौरान 7 जजों में से एक मात्र दलित जस्टिस बीआर गवई ने पूरे मामले पर बहुत महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ की।

जस्टिस बीआर गवई ने कहा आरक्षण का सही उद्देश्य है कि देश में समानता को समझा जाए। असमानता वाले समूह में आखिर कैसे सबको एकसमान माना जाता है। इस दलील के आधार पर बेंच ने कहा कि एससी और एसटी में भी क्रीमी लेयर को लागू करना चाहिए। जस्टिस गवई ने कहा, “सरकार को क्रीमी लेयर की पहचान करने के लिए कोई नीति बनानी चाहिए और लाभ पा चुके लोगों को उससे बाहर करना चाहिए। समानता को पाने का यही एकमात्र तरीका है।”

जस्टिस गवई ने इस मामले में टिप्पणी करते हुए कहा कि क्या एक आईएएस और आईपीएस के बच्चे या किसी सिविल सर्विस अधिकारी के बच्चे की तुलना एक ऐसे शख्स से करना उचित है जिसे आरक्षण का लाभ न मिला हो या वो ग्राम पंचायत या जिला परिषद के स्कूल में पढ़ता हो। उन्होंने कहा कि किसी अधिकारी बन चुके व्यक्ति के बच्चे को जाहिर है कि अच्छी शिक्षा मिलेगी। शायद उन्हें अतिरिक्त कोचिंग आदि भी मिले और घर का माहौल भी अच्छा मिले। वहीं दूसरे बच्चे को हर चीज उसके मुकाबले कम मिलेगा या उसके पास अच्छी शिक्षा उपलब्ध के स्रोत ही उपलब्ध नहीं होंगे। वह ऐसे माता-पिता के साथ रहेगा जो खुद इतने पढ़े-लिखे नहीं है कि बच्चे को पढ़ा सकें।

उन्होंने यह गौर भी कराया कि असमानताएँ और सामाजिक भेदभाव आज के समय में ग्रामीण क्षेत्रों में अत्यधिक प्रचलित हैं। शहर और महानगरों में इनका असर कम होने लगता है। उन्होंने अपनी टिप्पणी के दौरान स्पष्ट कहा, “मुझे यह कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं है कि सेंट पॉल हाई स्कूल और सेंट स्टीफन कॉलेज में पढ़ने वाले बच्चे और देश के पिछड़े और दूरदराज के क्षेत्र के एक छोटे से गाँव में पढ़ने वाले बच्चे को एक ही श्रेणी में रखना संविधान में निहित समानता के सिद्धांत को नकार देगा।”

उन्होंने यह कहा कि अगर आज ये कहा जाए कि एससी-एसटी समुदाय से आने वाले दोनों श्रेणी के बच्चे एक समान हैं तो गलत होगा। वो बच्चा जिसके माता-पिता में से कोई आरक्षण के लाभ से उच्च पद पर पहुँच गया है और सामाजिक आर्थिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा नहीं है उसे गाँव में मजदूरी करने वाले के बेटे से तुलना करना संवैधानिक आदेश को पराजित करेगा।

आगे उन्होंने इस बात को भी ध्यान में रखा कि संविधान स्वयं अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को समाज का सबसे पिछड़ा वर्ग मानता है इसलिए इस श्रेणी में आने वाले व्यक्ति को आरक्षण से अलग करने के मापदंड एक जैसे नहीं हो सकते। ऐसे में यदि इस श्रेणी का कोई व्यक्ति आरक्षण का लाभ पाकर चपरासी या शायद सफाई कर्मचारी का पद प्राप्त कर लेता है, तो वह सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग से संबंधित रहेगा। साथ ही, इस श्रेणी के लोग, जो आरक्षण का लाभ उठाकर जीवन में उच्च पदों पर पहुँच गए हैं, उन्हें सकारात्मक कार्रवाई का लाभ उठाने के लिए सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा नहीं माना जा सकता। वे पहले ही उस स्थिति में पहुँच चुके हैं जहाँ उन्हें अपनी मर्जी से विशेष प्रावधानों से बाहर निकल जाना चाहिए और योग्य और जरूरतमंद लोगों को रास्ता देना चाहिए।

आदेश में जस्टिस गवई की टिप्पणी

इस दौरान जस्टिस गवई ने एक उदाहरण देकर कहा कि आज के समय में एससी-एसटी कोटे में वर्गीकरण का विरोध करना ऐसा ही है जैसे ट्रेन के जनरल कोच में संघर्ष होता है कि जो पहले बाहर रहता है वह भीतर आने के लिए संघर्ष करता है और अंदर आने के बाद फिर हर संभव प्रयास करता है कि बाहर वाला अंदर न आ पाए।

जस्टिस बीआर गवई के इन तर्कों को सुन जस्टिस पंकज मिथल ने कहा आरक्षण सच में केवल एक पीढ़ी तक ही सीमित होना चाहिए। अगर पहली पीढ़ी में कोई सदस्य आरक्षण पाकर ऊँचे पद पर पहुँच गया है तो दूसरी पीढ़ी को आरक्षण नहीं मिलना चाहिए। वहीं जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने भी जस्टिस गवई की बातों पर सहमति दी। उन्होंने कहा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के रूप में क्रीमी लेयर की पहचान का मुद्दा राज्य के लिए संवैधानिक अनिवार्यता बनता जा रहा है। वहीं न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने भी कहा कि वो जस्टिस बीआर गवई के मत से सहमत हैं। क्रीमी लेयर’ सिद्धांत अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों पर भी लागू होता है, तथा सकारात्मक कार्रवाई के उद्देश्य से क्रीमी लेयर को बाहर करने के मानदंड अन्य पिछड़ा वर्गों पर लागू मानदंडों से भिन्न हो सकते हैं।

मरने से पहले पायजामा में ही हगने-मूतने लगा था माफिया अतीक अहमद, न्यायिक आयोग की रिपोर्ट से खुलासा: पुलिस को क्लीनचिट, मीडिया की भूमिका पर उठाए सवाल

माफिया अतीक अहमद और उसके भाई अशरफ की 15 अप्रैल, 2023 को उत्तर प्रदेश प्रयागराज के एक अस्पताल के बाहर तीन हमलावरों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। यह घटना मीडिया के कैमरों के सामने हुई थी। इस घटना को लेकर कई प्रश्न उठे थे।

उत्तर प्रदेश सरकार ने इस मामले की जाँच एक पाँच सदस्यीय न्यायिक आयोग को सौंपी थी। इस न्यायिक आयोग की अध्यक्षता इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायमूर्ति दिलीप बी भोंसले को सौंपी गई थी। इस आयोग ने अपनी रिपोर्ट गुरुवार (1 अगस्त, 2024) को उत्तर प्रदेश विधानसभा में पेश की।

न्यायिक आयोग ने इस मामले में पुलिस की लापरवाही नहीं पाई है। आयोग ने पुलिस को क्लीनचिट दी है। इसके अलावा न्यायिक आयोग की रिपोर्ट में अतीक अहमद के स्वास्थ्य के विषय में भी बताया गया है। रिपोर्ट में बताया गया है कि अतीक अहमद कई बार अपनी पैंट (पायजामा) गंदी कर रहा था। इसके अलावा रिपोर्ट में मीडिया के रोल पर भी प्रश्न उठाए गए हैं। यह पूरी रिपोर्ट ऑपइंडिया के पास मौजूद है।

न्यायिक आयोग में कहा गया है कि इस घटना में पुलिस की कोई संलिप्तता नहीं है और ना ही यह पुलिस के इशारे पर की गई थी। न्यायिक आयोग ने बताया है कि यह घटना पूर्व नियोजित भी नहीं थी। आयोग ने कहा है कि यह घटना रोकी नहीं जा सकती थी।

आयोग ने यह भी बताया है कि पुलिस ने अतीक और अशरफ और को अस्पताल लाने में भी सावधानी बरती थी। अतीक और अशरफ की हत्या के दौरान पुलिस ने जिस तरह प्रतिक्रिया दी और जो कार्रवाई की, उसे गलत नहीं माना है। आयोग ने कहा कि घटना 9 सेकंड में पूरी हो गई और ऐसे में पुलिस ने तीनों हमलावरों पर गोली नहीं चलाई और यह सही था।

अपनी जाँच में आयोग ने कुल मिलाकर पुलिस को सही पाया है। इसके अलावा हत्या के पहले अतीक के स्वास्थ्य के बारे में भी आयोग की रिपोर्ट में खुलासे हुए हैं। आयोग को पुलिस ने बताया है कि अतीक लगातार घटना से पहले साँस और पेट की बीमारी से ग्रसित था।

अतीक ने घटना से एक दिन पहले 14 अप्रैल, 2024 को अपनी पैंट में ही शौच कर दी थी। इसके बाद डॉक्टर को बुला कर भी अतीक और अशरफ की जाँच करवाई गई थी। 14 अप्रैल, 2024 को अतीक को अस्पताल भी ले जाया गया था और यहाँ से रास्ते में लौटते वक्त अतीक ने अपनी पैंट में ही दोबारा शौच कर दी थी।

न्यायिक आयोग की जाँच रिपोर्ट का वह हिस्सा, जिसमें अतीक अहमद के बार-बार पैंट गन्दी करने की बात कही गई है।
न्यायिक आयोग की जाँच रिपोर्ट का वह हिस्सा, जिसमें अतीक अहमद के बार-बार पैंट गन्दी करने की बात कही गई है।

अतीक को डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर थी। वह लगातार कई बार अपनी पैंट गंदी कर रहा था। इस बात की सूचना उसके साथ रहने वाले पुलिस कर्मियों ने अपने उच्चाधिकारियों को दी थी। आयोग ने इस हमले के दौरान मीडिया की भूमिका पर प्रश्न उठाए हैं।

आयोग ने कहा है कि आतीक और अशरफ की बाईट लेने के लिए चक्कर में मीडिया द्वारा आत्मसंयम का परिचय नहीं दिया गया। इसके अलावा मीडिया की फ़्लैशलाईट के कारण अतीक और अशरफ की सुरक्षा में मौजूद पुलिस वाले कुछ भी देख नहीं पा रहे थे। इसी दौरान हमला हुआ। आयोग ने कहा कि इस मामले में मीडिया की भूमिका संतोषजनक नहीं रही है।

नेपाल से भारत में घुस रहे थे चीनी, कर्नाटक-हिमाचल के पते पर बना था आधार कार्ड: गूंगा बन दे रहे थे चकमा, पकड़े जाने पर बोले- जड़ी-बूटी खोजने आए हैं

भारत-नेपाल की सोनौली सीमा पर बुधवार (31 जुलाई 2024) की रात दो चीनी नागरिक पकड़े गए। उनके साथ एक तिब्बती मूल का शरणार्थी भी मिला। छानबीन में पुलिस को इनके पास पहचान पत्र के तौर पर भारतीय आधार कार्ड मिले। यह कार्ड इन्होंने हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक के दो अलग-अलग पते पर बनवा रखे थे। इसमें इनकी मदद दिल्ली में रहने वाले तिब्बती मूल के भारतीय नागरिक ने की थी।

खबरों के अनुसार, सुरक्षाबल के हत्थे चढ़ने के बाद ये लोग खुद को मूक दिखाने का प्रयास कर रहे थे। हालाँकि एसएसबी जवानों ने सख्ती से पूछताछ की तो इन्हें बोलना पड़ा। शुरू में इन्होंने बताया कि दवाई बनाने का कारोबार करते हैं और जड़ी-बूटियों की तलाश में भारत आए हैं। हालाँकि सुरक्षाबल को इनपर यकीन नहीं हुआ। पासपोर्ट चेक करने पर इनकी पहचान चीनी नागरिक के तौर पर पता चली।

इसमें एक का नाम जू वाकयांग निकला जबकि दूसरे की पहचान यंग मेंगमेंग के रूप में हुई। इन्होंने भारतीय आधार कार्ड पर अपने नाम विज्ञेन डोर्जी, जू वाकयांग लिखवाया हुआ था। भारत में इनके रहने की व्यवस्था तिब्बती मूल के लवसंग सेरिंग ने की थी।

इसके अलावा भारत में लाने और इन्हें नेपाल के काठमांडू से गोरखपुर पहुँचाने का जिम्मा भी उसी ने उठाया था। तिब्बती मूल के भारतीय नागरिक ने चीनी नागरिकों से इस काम के लिए 40 हजार रुपए लिए थे। पूछताछ में बताया गया कि चूँकि चीनी नागरिकों को हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी इलाकों में जड़ी-बूटी की तलाश करनी थी, इसलिए उनका आधार कार्ड हिमाचल प्रदेश के पते से बनवाया गया था।

रिपोर्ट के अनुसार, चीनी नागरिकों के साथ पकड़े गए तिब्बती मूल के युवक से भी पुलिस ने लंबी पूछताछ की। उसने हिंदी में बात करते हुए अपना नाम लवसंग सेरिंग बताया। उसने कहा कि वह तिब्बती मूल का भारतीय नागरिक है और दिल्ली के कृ्ष्णा नगर में रहता है। उसने चीनी नागरिकों का आधारकार्ड काठमांडू से ही बनवाया था।

इसके बाद वह दोनों चीनी नागरिकों को लेकर कार से काठमांडो से सोनौली सीमा से सटे बेलहिया पहुँचा। यहाँ से पैदल सीमा पार कराने के बाद गोरखपुर रेलवे स्टेशन छोड़ना था। वहाँ से ट्रेन से दिल्ली भेजने की तैयारी थी।

दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, अब इस मामले में महराजगंज अपर पुलिस अधीक्षक आतिश कुमार सिंह ने कहा कि पकड़े गए दोनों चीनी और भारतीय नागरिक के विरुद्ध सोनौली थाने में धोखाधड़ी, कूटरचना और विदेशी अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है। इसके साथ ही जिन पते से दोनों चीनी नागरिकों के आधार कार्ड बने हैं, उन पतों का भी पुलिस टीम सत्यापन करेगी। पुलिस ने इन्हें कोर्ट में पेश करके जेल भेज दिया है।

इसे दोगलापन कहें या कुछ और? कॉन्ग्रेस नेता उदित राज कह रहे- SC/ST आरक्षण में क्रीमी लेयर कबूल नहीं, CM रेवंत रेड्डी बोल रहे- कोटा के भीतर कोटा लागू करेगा तेलंगाना

सुप्रीम कोर्ट के SC-ST आरक्षण के भीतर आरक्षण लागू करने को वैध ठहराने के निर्णय का तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने स्वागत किया है। CM रेड्डी ने ऐलान किया है कि उनकी सरकार सबसे पहले राज्य में आरक्षण में भी कोटा सिस्टम लागू करेगी। उन्होंने कहा कि इसके लिए जल्द ही काम चालू होगा।

गुरुवार (1 अगस्त, 20224) को सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद तेलंगाना विधानसभा में CM रेवंत रेड्डी ने यह ऐलान किया। उन्होंने कहा, “मैं सुप्रीम कोर्ट की संविधान बेंच का ह्रदय से आभार व्यक्त करता हूँ। 7 में से 6 जजों ने कहा कि राज्य सरकारें आरक्षण का वर्गीकरण अपना सकती हैं। राज्य सरकार की ओर से मैं यह घोषणा कर रहा हूँ कि तेलंगाना आरक्षण के भीतर आरक्षण को लागू करने वाला पहला राज्य होगा।”

उन्होंने आगे कहा, “राज्य सरकार नौकरियों की अधिसूचना के में मडिगा और अन्य उप-जातियों के लिए आरक्षण लागू करने के लिए उचित कदम उठाएगी। इस संबंध में एक अध्यादेश जारी किया जाएगा।” CM रेवंत रेड्डी ने कहा कि जल्द ही सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार वर्गीकरण को लेकर काम चालू किया जाएगा।

CM रेवंत रेड्डी ने ऐलान किया है कि उनकी सरकार SC-ST आरक्षण को A,B,C और D वर्षों में बाँटेगी। कॉन्ग्रेस सरकार के इस फैसले को राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी भारत राष्ट्र समिति (BRS) ने भी समर्थन देने का ऐलान किया है। तेलंगाना में SC आरक्षण के वर्गीकरण की लम्बे समय से माँग चल रही थी।

जहाँ तेलंगाना की कॉन्ग्रेस सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का समर्थन किया है, वहीं उनकी ही पार्टी के नेता उदित राज इसके खिलाफ हैं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर आपत्ति जताते हुए कहा है कि इसमें बदलाव की अनुमति केवल विधायिका को है। उन्होंने कहा कि उन्हें क्रीमी लेयर का निर्णय मंजूर नहीं है।

उदित राज कॉन्ग्रेस के असंगठित कामगारों की विंग के मुखिया हैं। उन्हें 2024 लोकसभा चुनाव में उत्तर-पश्चिमी दिल्ली से कॉन्ग्रेस ने अपना उम्मीदवार भी बनाया था लेकिन वह भाजपा के योगेन्द्र चंदोलिया से हार गए थे। वह 2014 में केवल एक बार भाजपा से सांसद बन पाए थे।

गौरतलब है कि गुरुवार (1 अगस्त, 2024) को CJI डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली 7 सदस्यीय संविधान बेंच ने यह निर्णय दिया है। इस निर्णय में 6 जज एकमत थे जबकि जस्टिस बेला त्रिवेदी ने इस पर अपनी असहमति जताई। कोर्ट ने कहा कि राज्य SC-ST को दिए जाने वाले आरक्षण के भीतर ऐसी जातियों को ज्यादा तरजीह दे सकते हैं, जो आर्थिक-सामाजिक रूप से अधिक पिछड़ गई हैं।

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि SC-ST कोई एक एक सजातीय समूह नहीं है और इस बात के सबूत भी हैं। उन्होंने कहा कि आरक्षण के भीतर आरक्षण देने से संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन नहीं होता। उन्होंने कहा कि इस मामले में 6 निर्णय पहले भी आ चुके हैं और सभी में इस बात को माना गया है कि आरक्षण के भीतर आरक्षण देना सही है।

मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस BR गवई ने कहा कि यह राज्य सरकार का कर्तव्य है कि वह अधिक पिछड़ी जातियों को तरजीह दे। उन्होंने कहा कि SC-ST समुदाय में भी केवल कुछ ही लोग आरक्षण का लाभ उठा रहे हैं। उन्होंने कहा कि SC-ST आरक्षण में भी क्रीमी लेयर पहचानी जाए और जिन जातियों को लाभ मिल चुका है, उन्हें इससे बाहर कर दिया जाए।

कोर्ट का यह निर्णय पंजाब राज्य के बनाए गए एक कानून के मामले में आया है। पंजाब ने 2006 में यह कानून बनाया था कि वह राज्य में SC-ST को दिए जाने वाले आरक्षण में भी वर्गीकरण करेगा। इस कानून को पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया था। इसके बाद पंजाब सरकार सुप्रीम कोर्ट के पास पहुँची थी।

यह मामला 2020 में संविधान बेंच के पास पहुँचा था। इस मामले में केंद्र सरकार भी पंजाब के पक्ष में थी। इस निर्णय से पंजाब और तमिलनाडु जैसे राज्यों को फायदा होगा। इन राज्यों में आरक्षण के भीतर कोटा दिए जाने का प्रावधान किया गया है।

भूस्खलन ने वायनाड को बनाया ‘मुर्दाघर’ तो वैज्ञानिकों को ‘जिंदा लाश’ बनाने लगी केरल की वामपंथी सरकार, कहा- मीडिया में साझा न करें विचार: फजीहत के बाद वापस लिया निर्देश

केरल के वायनाड में हुए भूस्खलन हादसे में प्रशासन की लापरवाही सामने आने के बाद अब वामपंथी सरकार दमन में जुट गई है। वामपंथी सरकार ने अपनी गलतियाँ छुपाने के लिए राज्य के वैज्ञानिक समुदाय की जुबान पर ताला लगाने वाला एक आदेश जारी किया। जब इस पर केरल सरकार घिर गई, तो उसने यह वापस ले लिया।

केरल सरकार ने वायनाड हादसे के बाद गुरुवार (1 अगस्त, 2024) को एक आदेश निकाला है। इस आदेश में कहा गया है कि केरल का कोई भी वैज्ञानिक या भूस्खलन मामलों का जानकार वायनाड ना जाए और ना ही इस मामले को लेकर अपने विचार कहीं रखे।

इस आदेश में लिखा गया है, “केरल राज्य के सभी विज्ञान संस्थानों को निर्देश दिया जाए कि वे मेप्पडी पंचायत, वायनाड, का कोई दौरा न करें। वैज्ञानिक समुदाय को यह भी निर्देश दिया जाए कि वह अपनी राय और अध्ययन रिपोर्ट मीडिया में साझा ना करें।”

वायनाड भूस्खलन

केरल की वामपंथी सरकार ने यह आदेश तब जारी किया जब राज्य के ही कई वैज्ञानिक संस्थाओं ने खुलासा कर दिया कि वायनाड जिला प्रशासन को भूस्खलन सम्बन्धी चेतावनी भेजी गई थी। इसके बाद भी वायनाड जिला प्रशासन ने कोई एक्शन नहीं लिया और लगभग 300 लोग काल के गाल में समा गए।

वायनाड में 200 से अधिक मौसम निगरानी यूनिट चलाने वाले ह्यूम सेंटर फॉर इकोलॉजी एंड वाइल्डलाइफ बायोलॉजी ने भूस्खलन से दो दिन पहले ही चेतावनी दी थी। इसने उन इलाकों में विशेष रूप से खतरा बताया था जहाँ बाद में यह आपदा आई।

इस सेंटर के मुखिया CK विष्णुदास ने खुलासा किया था किजिला प्रशासन को सोमवार को ही भूस्खलन की चेतावनी दे दी गई थी। उन्होंने यह भी बताया कि इन गाँवों से लोगों को निकालने की सलाह भी दी गई थी। हालाँकि, इस पर कोई एक्शन नहीं लिया गया आपदा आ गई।

यह जानकारी सामने आने के बाद केरल सरकार और वायनाड प्रशासन पर प्रश्न उठना चालू हुए तो उसने वैज्ञानिकों का ही मुंह बंद करने वाला आदेश निकाल दिया। इससे वह अपनी किरकिरी से बचना चाहती है। केरल सरकार के इस आदेश का बड़े पैमाने पर विरोध हो रहा है।

भाजपा नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री राजीव चंद्रशेखर ने इस अमले में पर कहा, “सबकुछ, हर एक बात जो INDI गठबंधन कहता है या करता है, जैसे कि वैज्ञानिक समुदाय को चुप कराने वाला CPM सरकार का यह आदेश, पाखंड, दोहरे मापदंडों और झूठ पर आधारित होता है।”

राजीव चंद्रशेखर के अलावा भाजपा प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने इसे केरल सरकार का तालिबानी फतवा बताया है। उन्होंने कहा है कि केरल सरकार अपनी विफलता छुपाना चाहती है, इसलिए वह ऐसे आदेश निकाल रही है।

भारी विरोध और लानत मलानत के बाद केरल की वामपंथी सरकार ने यह आदेश वापस ले लिया है। केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने इस पर सफाई भी दी है। CM विजयन ने कहा कि ऐसी कोई नीति नहीं है जो वैज्ञानिकों को बोलने से रोके।

गौरतलब है कि 30 जुलाई, 2024 की रात को वायनाड के कई गाँवों में भारी बारिश के कारण भूस्खलन हुआ था। इस भूस्खलन के कारण 3-4 गाँव पूरी तरह बह गए थे। इनमें रहने वाले हजारों लोग यहाँ मलबे के बीच फंस गए। इस हादसे में अब तक लगभग 300 लोग मारे जा चुके हैं। सैकड़ों लोग घायल हैं, जिनका इलाज चल रहा है। सेना-वायुसेना और NDRF ने यहाँ हजारों लोगों को बचाया है। अब इन लोगों को फिर से बसाने को लेकर कवायद चल रही है।

जिस ‘पुरुष’ का मुक्का खाते ही रो पड़ी महिला बॉक्सर, उसे ‘पुरुष’ मानने को तैयार नहीं ओलंपिक कमेटी: 46 सेकेंड में खत्म हो गया था बॉक्सिंग का मैच, पूरी दुनिया में छिड़ी बहस

पेरिस ओलंपिक में कल (1 अगस्त 2024) अल्जीरिया की ट्रांस महिला ईमान खलीफ और इटली की महिला बॉक्सर एंजेला कैरिनी के बीच हुआ मैच लगातार चर्चा में है। 46 सेकेंड में खत्म हुए इस मैच में लोगों ने देखा था कि मैच शुरू होने के कुछ देर बाद ही कैरिनी के नाक पर तगड़ा पंच पड़ा था जिसके बाद उन्होंने हाथ उठाकर मुकाबले से हटने का इशारा किया।

ओलंपिक जैसे मंच पर चूँकि मैच इतनी जल्दी खत्म होते नहीं देखे जाते इसलिए सबको अजीब लगा। बाद में कैरिनी की नाक से हल्का खून निकलता देखा गया जिससे लगा कि तेज पंच के कारण उन्होंने निर्णय लिया। उनके हाथ उठाने के बाद ईमान खलीफ को इस मैच का विजेता बताया गया तब एंजेला घुटनों के बल बैठ गई और खलीफ से हाथ मिलाने से भी मना कर दिया।

उनकी हार की तस्वीर सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद लोग मामले को समझ गए और तभी एंजेला कैरिनी का बयान भी सामने आया जिसमें उन्होंने कहा था, “मुझे कभी इतना तगड़ा पंच नहीं लगा। बहुत दर्द हो रहा है, डर है कि कहीं नाक की हड्डी न टूट गई हो। हालाँकि मैंने अभी जांच नहीं कराई है। मैं कुछ कहने वाली नहीं हूँ लेकिन ये सब अवैध है।”

उनके इसी बयान के बाद सोशल मीडिया पर ये मुद्दा चर्चा का विषय बन गया। लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि इसे महिलाओं के खेल का अंत कहा जाता है जहाँ पुरूष अपने नाम मेडल करने के लिए महिला बन जाते हैं। इसी तरह कुछ लोगों का कहना है कि ये सरासर बेईबानी है कि कोई पुरुष बॉक्सिंग में महिला बनकर लड़े और इतनी तेज मुक्के मारे।

आम यूजर्स के अलावा इस मुद्दे को जाने-माने लोगों ने भी उठाया इटली की पीएम मेलोनी ने इस पर कहा कि भेदभाव से बचने के प्रयास में भेदभाव न करने के प्रति सावधान रहना चाहिए। वहीं डोनाल्ड ट्रंप ने अपने ट्रूथ सोशल पर इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा वो महिलाओं के खेलों से पुरुषों को दूर करेंगे। एलन मस्क ने भी इस पर प्रतिक्रिया दी। एक यूजर ने कहा था कि महिलाओं के खेल में पुरुष को अनुमति नहीं होनी चाहिए। इस पर मस्क ने कहा बिलकुल।

सोशल मीडिया पर मामले की आलोचना होने के बाद अब इंटरनेशनल ओलंपिक कमेटी ने बयान जारी किया है। इसमें उन्होंने नियम आदि की सफाई देते हुए कहा कि इंटरनेशनल ओलंपिक कमिटी ने अपने बयान में आगे कहा कि हमने कुछ रिपोर्ट्स में दो महिला एथलीटों के ओलंपिक खेल पेरिस 2024 में प्रतिस्पर्धा करने के बारे में भ्रामक जानकारी देखी है। दोनों एथलीट कई सालों से महिला वर्ग में इंटरनेशनल मुक्केबाजी टूर्नामेंट्स में खेल रही हैं, जिनमें ओलंपिक खेल टोक्यो 2020, अंतर्राष्ट्रीय मुक्केबाजी संघ (आईबीए) वर्ल्ड चैंपियनशिप और आईबीए की ओर से अनुमोदित टूर्नामेंट शामिल हैं।

ये दोनों एथलीट IBA के अचानक और मनमाने फैसले के शिकार हुई थीं। 2023 में IBA वर्ल्ड चैंपियनशिप के अंत में उन्हें बिना किसी उचित प्रक्रिया के अचानक अयोग्य घोषित कर दिया गया था। यह निर्णय शुरू में केवल IBA महासचिव और CEO द्वारा लिया गया था। इसके अलावा उन्होंने कहा कि आईओसी वर्तमान में दो एथलीटों के साथ हो रहे दुर्व्यवहार से दुखी है।

बता दें कि कुछ रिपोर्ट्स बताती हैं कि एक साल पहले खलीफ की महिला के तौर पर खेल में भागीदारी की जाँच भी हुई थी जिसमें वह असफल हो गई थीं। वह पिछले साल नई दिल्ली में महिला विश्व मुक्केबाजी चैंपियनशिप में लिंग पात्रता परीक्षण को पूरा करने में विफल रहीं थीं। उनके शरीर में पुरुषों के समान गुण पाए गए थे।