Home Blog Page 862

कॉन्ग्रेस छोड़ किरण और श्रुति ने थामा कमल: कभी तीन लाल में बँटी थी हरियाणा की राजनीति, अब BJP सबका परिवार

हरियाणा की राजनीति के केंद्र में तीन लाल- बंसीलाल, भजन लाल और देवी लाल ही रहे। साल 2014 से हरियाणा की राजनीति पर छाया चौथा लाल यानी मनोहर लाल… और अब मनोहर लाल की अगुवाई में तीनों ही दिग्गज लाल के परिवार बीजेपी में आ चुके हैं। भजन लाल और देवी लाल के परिवार को कॉन्ग्रेस से बीजेपी में लाने के बाद मनोहर लाल अब बंसी लाल के परिवार को बीजेपी में लाए हैं। 5 बार की विधायक और कॉन्ग्रेस में कई अहम पदों को संभाल चुकी किरण चौधरी और उनकी पूर्व सांसद बेटी श्रुति चौधरी ने कॉन्ग्रेस छोड़ कर मनोहर लाल की मौजूदगी में बीजेपी की सदस्यता ले ली।

दिल्ली में कॉन्ग्रेस की नेता और मौजूदा विधायक किरण चौधरी बेटी श्रुति के साथ हरियाणा के मुख्यमंत्री नायाब सिंह सैनी, केंद्रीय मंत्री और हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर, बीजेपी के राष्ट्र महासचिव तरुण चुघ की मौजूदगी में बीजेपी में शामिल हुईं।

बीजेपी में शामिल होने के बाद किरण चौधरी और उनकी बेटी श्रुति चौधरी दिल्ली पहुँचे और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा से मुलाकात की। किरण चौधरी ने एक्स पर जेपी नड्डा से मुलाकात की जानकारी देते हुए लिखा, “भाजपा की सदस्यता ग्रहण करने के उपरांत पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा से मुलाकात की। इस दौरान क्षेत्र व हरियाणा के हित के मुद्दों पर सार्थक चर्चा की।”

कौन हैं किरण चौधरी?

किरण चौधरी कॉन्ग्रेस की कद्दावर नेता रही हैं। वो दिल्ली में भी विधायक और डिप्टी स्पीकर पद पर रह चुकी हैं। चौधरी बंसीलाल की बहू किरण चौधरी 5 बार विधायक रही हैं। मौजूदा समय में वो तोशाम सीट से विधायक हैं। वहीं, उनकी बेटी श्रुति चौधरी साल 2009 में भिवानी लोकसभा सीट से सांसद रह चुकी हैं, हालाँकि 2014 और 2029 में उन्हें हार का मुँह देखना पड़ा था। इसके बाद 2024 में उन्हें कॉन्ग्रेस ने टिकट नहीं दिया था। माना जाता है कि वो हरियाणा में भूपेंद्र सिंह हुड्डा कैंप की विरोधी हैं।

हरियाणा के 3 लाल, तीनों परिवारों का रहा है जलवा

हरियाणा की राजनीति में कभी बंसीलाल, भजनलाल या देवीलाल के बिना एक भी पत्ता नहीं हिलता था। फिर साल 2014 में हरियाणा में बीजेपी की सरकार बनी और चौथे लाल यानी मनोहर लाल हरियाणा के मुख्यमंत्री बने। तब से लेकर मनोहर लाल ने बीजेपी को हरियाणा में मजबूत ही किया है। पूर्व उपप्रधानमंत्री देवीलाल के पुत्र रणजीत सिंह को भाजपा ने 2024 में हिसार से लोकसभा का चुनाव लड़वाया। चुनाव से पहले ही रणजीत ने बीजेपी ज्वाइन की थी। पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल के बेटे कुलदीप बिश्नोई, पुत्रवधू रेणुका बिश्नोई व पौत्र भव्य बिश्नोई और अब पूर्व मुख्यमंत्री बंसीलाल की पुत्रवधू किरण चौधरी व पौत्री श्रुति चौधरी भी बीजेपी में शामिल हो गई हैं।

अब से महज कुछ ही माह के अंदर हरियाणा में विधानसभा चुनाव होना है। ऐसे में देखना ये है कि बीजेपी और हरियाणा के तीनों लाल और एक पूर्व मुख्यमंत्री राव बीरेंद्र सिंह के बेटे राव इंद्रजीत सिंह का परिवार मनोहर लाल और नायाब सैनी के नेतृत्व में कैसा प्रदर्शन कर पाता है।

आतंकियों के खिलाफ अभियान से जिस IPS की बनी पहचान, वे कैंसर से पत्नी की मौत से टूटे: ICU में खुद को मारी गोली, मिला था गैलेंट्री अवॉर्ड

असम के गृह सचिव सेक्रेट्री शिलादित्य चेतिया को अपनी पत्नी की मौत का ऐसा सदमा लगा कि उन्होंने पत्नी के शव के सामने ही खुद को गोली मार ली। शिलादित्य की उम्र मात्र 44 साल थी। मंगलवार (18 जून 2024) शाम जैसे ही उन्हें खबर मिली कि कैंसर से जूझ रही उनकी पत्नी अब इस दुनिया में नहीं रहीं, वह वैसे ही मेडिकल स्टाफ से मिन्नतें करके आईसीयू कैबिन में गए कि उन्हें अपनी पत्नी के लिए प्रार्थना करनी है। इसके बाद उन्होंने वहीं अपनी सरकारी बंदूक से खुद को गोली मार ली। आवाज सुनते ही वहाँ हड़कंप मच गया।

नेमकेयर अस्पताल के मैनेजिंग डायरेक्टर हितेश बरुआ ने बताया, “गोली की आवाज सुनते ही हम लोग दौड़े और उन्हें अपनी पत्नी के शव के पास लेटे हुए पाया। हमने उन्हें बचाने की कोशिश की, लेकिन बचा नहीं सके। उन्होंने खुद को गोली मार ली थी। उनकी पत्नी का करीब दो महीने से अस्पताल में इलाज चल रहा था। तीन दिन पहले उनकी हालत बिगड़ गई। हमने चेतिया को उनकी हालत के बारे में बताया और उन्होंने हमारी बात समझ ली थी।”

बता दें कि शिलादित्य चेतिया 2009 बैच के IPS अधिकारी थे। वे असम के तिनसुकिया और सोनितपुर जिलों के पुलिस अधीक्षक (SP) भी रह चुके थे। होम सेक्रेटरी के पद पर तैनात होने से पहले उन्होंने असम पुलिस की चौथी बटालियन के कमांडेंट के रूप में भी काम किया था। उन्हें 2015 में स्वतंत्रता दिवस पर वीरता के लिए राष्ट्रपति पुलिस पदक मिला था।

उल्लेखनीय है कि शिलादित्य चेतिया को जो अवार्ड मिला वो कोई सामान्य पुरस्कार नहीं था। ये अवार्ड शास्त्रीय रूप से सैन्य कर्मियों, कानून प्रवर्तन अधिकारियों और नागरिकों को दिए जाते हैं जिन्होंने अपने कर्तव्यों या दूसरों की रक्षा में असाधारण वीरता और निस्वार्थता स्थापित की है। शिलादित्य चेतिया को भी ये अवार्ड उनकी बहादुरी देख ही दिया गया था। उन्होंने ड्यूटी में रहते हुए तमाम अपराधियों और आतंकी संगठनों के खिलाफ ऑपरेशन चलाने के लिए दिया गया था।

ऐसे में लोग इस खबर को सुनने के बाद हैरान हैं। कहा जा रहा है कि इतना बहादुर इंसान जिसने आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन चलाते वक्त अपनी जान की परवाह नहीं की, वो पत्नी की मौत का गम नहीं झेल पाए… ये देखना बहुत पीड़ादायक है। जानकारी के मुताबिक, शिलादित्य चेतिया की पत्नी अगमोनी बोरबरुआ की की शादी 12 मई, 2013 को उनकी शादी हुई थी और इस जोड़े का कोई बच्चा नहीं था। पिछले कुछ समय से उनपर एक के बाद एक दुख आ रहे थे। पहले उनकी माँ का निधन हुआ, फिर उनकी सास और अब उनकी पत्नी का।

जावेद ने स्टेटस पर लगाया कुर्बानी का फोटो, हिन्दू संगठनों का आरोप- गाय काटी: सहारनपुर से जाकर नाहन में करता था दुकान, शुरुआती जाँच के बाद पुलिस बोली- यह गोवंश नहीं

नोट: पुलिस की शुरुआती जाँच आने के बाद इस खबर को अपडेट किया गया है।

हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले में बकरीद पर कुर्बानी का आरोप लगाकर बड़ा हंगामा हुआ है। हिन्दू संगठनों का आरोप है कि सिरमौर के नाहन में दुकान करने वाले एक बाहरी मुस्लिम युवक ने गोकशी की। इसको लेकर हिन्दू संगठनों में आक्रोश है, उन्होंने जावेद की दुकान पर प्रदर्शन किया है। जावेद अभी फरार है। हालाँकि, पुलिस ने शुरुआती जाँच में पाया है कि जिसे कुर्बानी दी गई, वह गोवंश नहीं है।

जानकारी के अनुसार, उत्तर प्रदेश के सहारनपुर का रहने वाला एक युवक जावेद हिमाचल प्रदेश के नाहन में पिछले लगभग डेढ़ दो वर्षों से रेडीमेड कपड़ों की दुकान करता है। उसने बकरीद (17 जून, 2024) के दौरान अपने व्हाट्सएप स्टेटस पर एक पशु की कुर्बानी के फोटो लगाए थे। जावेद ने जो स्टेटस अपने व्हाट्सएप पर लगाए थे, उनमें वह एक कटे गए पशु के पास चाकू लेकर खड़ा है और हँस रहा है। उसके आसपास में और भी लोग मौजूद हैं।

हिन्दू संगठनों का आरोप है कि जावेद ने गोवंश की हत्या की है और इसी का फोटो अपने व्हाट्सएप पर लगाया है। इसको लेकर उन्होंने प्रशासन से कार्रवाई की माँग की है। हिन्दू संगठनों ने नाहन में जावेद की दुकान पर पहुँच कर प्रदर्शन किया और कार्रवाई की माँग की। उन्होंने जावेद को नाहन में आगे काम ना करने देने की बात भी कही। बताया गया है कि कुछ लोग इस प्रदर्शन के दौरान उग्र भी हो गए। हिन्दू संगठनों ने नाहन में एक रैली का भी आयोजन किया है।

घटना के बाद से जावेद नाहन से फरार है। उसकी तलाश की जा रही है। हिन्दू संगठनों ने पुलिस को भी इस मामले में शिकायत दी है। दूसरी तरफ पुलिस अभी मामले की जाँच कर रही है। नाहन थाने के SHO ने इस मामले में ऑपइंडिया को बताया है कि संभवतः जावेद ने यह कुर्बानी नाहन में नहीं दी है।

उन्होंने बताया कि जावेद के संबंध में अभी जाँच की जा रही है और उसकी लोकेशन पता की जा रही है। उन्होंने बताया कि किस पशु की कुर्बानी दी गई है, यह अभी स्पष्ट नहीं है। उन्होंने बताया है कि जावेद के इस कृत्य के चलते नाहन में आक्रोश है।

हालाँकि, शामली (UP) पुलिस की जाँच में वह गोमांस नहीं निकला। SP ने शुक्रवार (22 जून) को कहा, “वैध पशु की कुर्बानी दी गई। सोशल मीडिया पर तस्वीर थोड़ी वीभत्स थी, इसलिए साम्प्रदायिक भावनाओं को भड़काने के संबंध में FIR दर्ज की गई है।”

हिन्दू संगठनों के प्रदर्शन का एक वीडियो भी वायरल हुआ है। इसमें बड़ी भीड़ जावेद की दुकान के बाहर मौजूद है। हिन्दू संगठनों ने माँग की है कि नाहन में बाहर से आकर दुकान करने वाले अन्य समुदाय के लोगों का दुबारा सत्यापन किया जाए और उन्हें ऐसे ही दुकान ना दी जाए।

विश्व हिन्दू परिषद के एक कार्यकर्ता ने आरोप लगाया कि नाहन समेत पूरे हिमाचल प्रदेश में बाहर से आकर मुस्लिम व्यापारी ऊँचे किराए पर दुकानें ले रहे हैं। यह लोग यहाँ सामाजिक सद्भाव बिगाड़ने का प्रयास कर रहे हैं, यह ऐसे किराए पर दुकानें ले रहे हैं, जो सामान्य आदमी नहीं दे सकता। उन्होंने जावेद के विरुद्ध सहारनपुर में भी कार्रवाई करने की भी बात कही है।

डीपफेक वीडियो और ऑनलाइन फेक न्यूज़ पर लगेगी लगाम, ‘मोदी 3.0’ लेकर आ रहा ‘डिजिटल इंडिया बिल’: डेटा प्रोटेक्शन के बाद अब YouTube और AI पर नज़र

आजकल हैकिंग जैसी समस्याएँ बढ़ गई हैं, AI का इस्तेमाल कर के डिफेक वीडियो बना दिए जाते हैं, ऑनलाइन फ्रॉड की कई घटनाएँ होती हैं और YouTube जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के जरिए फर्जी खबरें फ़ैलाने वालों की बाढ़ आ गई है। अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार डिजिटल सुरक्षा के लिए बिल लाने जा रही है, ताकि इन नई समस्याओं से नए तौर-तरीके से निपटा जाए। ये ‘मोदी 3.0’ के बड़े निर्णयों में से एक होगा। इसका नाम ‘डिजिटल इंडिया बिल’ हो सकता है।

AI का कैसे हम बेहतर तरीके से सकारात्मक इस्तेमाल कर सकें, इसमें इस पर भी चर्चा की जाएगी। इसे संसद में पेश किए जाने से पहले सभी दलों से विचार-विमर्श कर आम सहमति बनाने का प्रयास किया जाएगा। आगामी संसद सत्र में ही इसे पेश किया जा सकता है। 18वीं लोकसभा का पहला सत्र सोमवार (24 जून, 2024) से शुरू होगा और 3 जुलाई तक चलेगा। हालाँकि, इसके बाद 22 जुलाई को मॉनसून सेशन भी शुरू होने वाला है जो 9 अगस्त तक चलेगा।

पिछली सरकार में केंद्रीय इलेक्टॉनिक्स एवं IT राज्यमंत्री रहे राजीव चंद्रशेखर ने भी इस ओर इशारा किया था। उन्होंने कहा था कि सभी चीजें लगभग तैयार हैं, लेकिन चुनाव तक इस पर बहस नहीं हो पाएगी इसीलिए अगली सरकार में इसे लाया जाएगा। बता दें कि डीपफेक वीडियो के जरिए कई हस्तियों को निशाना बनाया गया है। अमिताभ बच्चन, सचिन तेंदुलकर, रश्मिका मंदाना, आलिया भट्ट और आमिर खान तक इसका शिकार बन चुके हैं। किसी को भी बदनाम करने के लिए इसका इस्तेमाल किया जा सकता है।

AI का इस्तेमाल कर के डिफेक वीडियो बना कर किसी से कुछ भी कहलवा देना, किसी भ्रामक सामग्री का विज्ञापन करा देना, किसी के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल करा देना या फिर अश्लील रूप में दिखा देना संभव है। इसी तरह लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का वीडियो वायरल कर दिया गया और दावा किया गया कि वो आरक्षण खत्म करने की बात कर रहे हैं। असम से लेकर महाराष्ट्र और तेलंगाना तक, कॉन्ग्रेस से संबंधित कई हैंडलों ने ये कुचक्र चलाया, जिसका भाजपा को नुकसान भी हुआ।

नए डिजिटल बिल के जरिए AI ने जेनेरेट किए जाने वाले फर्जी कंटेंट्स पर लगाम लगेगी। YouTube के माध्यम से ध्रुव राठी, पुण्य प्रसून वाजपेयी और अजित अंजुम जैसे कई लोग फर्जी खबरें फैलाते हैं, जिस पर अलग-अलग लोग कई भ्रामक और फेक दावों के साथ वीडियो बनाते हैं। ‘X’ (पूर्व में ट्विटर) पर मोहम्मद ज़ुबैर जैसे लोग यही काम करते हैं। विपक्षी नेता कई बार फर्जी खबरें फैला चुके हैं। नए बिल में सोशल मीडिया पर को भी रेगुलेट किए जाने की व्यवस्था होगी।

हालाँकि, इससे पहले भी सरकार इस दिशा में कदम उठाते हुए ‘डेटा प्रोटेक्शन बिल’ पेश कर चुकी है। कई कंपनियाँ यूजर्स के डेटा का इस्तेमाल उनसे अनुमति के बिना करती रही हैं, डेटा बेच तक देती हैं। अब इसके लिए कंपनियों पर 500 करोड़ रुपए तक के प्रावधान किए गए हैं। पीएम मोदी खुद भी डीपफेक वीडियो और AI संबंधित समस्याओं पर बात कर चुके हैं। डीपफेक और फर्जी खबरों पर लगाम लगाने के लिए सरकार द्वारा लाए जा रहे इस बिल में अब क्या होता है, ये कुछ ही दिनों में पता चल जाएगा।

कश्मीर को अलग बताने वाली अरुंधति रॉय ने गुजरात दंगों को लेकर भी बोले थे झूठ: एहसान जाफरी की बेटियों से रेप और जिंदा जलाने का गढ़ा था किस्सा

दिल्ली के उपराज्यपाल वीके सक्सेना द्वारा कश्मीर को भारत से अलग बताने वाली अरुंधति रॉय पर गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत मुकदमा चलाने की अनुमति दे दी है। हालाँकि, दुख की बात है ये कि इसमें 14 साल लग गए। अरुंधति और उनके साथी न केवल भारत को एक राष्ट्र के रूप में नकारते हैं, बल्कि झूठे नैरेटिव गढ़कर कलह और असंतोष को भी बढ़ावा देते हैं।

हमें साल 2002 के गुजरात दंगों के दौरान वामपंथी-फासीवादी गिरोह की शरारती भूमिका को याद रखना चाहिए। भारतीय पत्रिका ‘आउटलुक’ में 6 मई 2002 को गुजरात में हुई हिंसा पर ‘Democracy: Who’s she when she’s at home?’ शीर्षक से अरुंधति रॉय ने 7 पेज (लगभग 6,000 शब्द) का एक लेख लिखा था।

इस लेख में अरुंधति रॉय ने लिखा था, “कल रात बड़ौदा से एक दोस्त ने रोते हुए फोन किया। उसे यह बताने में पंद्रह मिनट लग गए कि मामला क्या था। यह बहुत जटिल नहीं था। केवल इतना था कि उसकी दोस्त सईदा को भीड़ ने पकड़ लिया था। उसके पेट को चीरकर उसे जलते हुए अंगारों से भर दिया गया था। उसके मरने के बाद किसी ने उसके माथे पर ‘ऊँ’ बना दिया था।”

इस घृणित ‘घटना’ से स्तब्ध होकर भाजपा के तत्कालीन राज्यसभा सांसद बलबीर पुंज ने गुजरात सरकार से संपर्क किया। पुलिस जाँच में पता चला कि सईदा नामक किसी व्यक्ति से जुड़ा ऐसा कोई मामला शहरी या ग्रामीण बड़ौदा में दर्ज नहीं किया गया था। इसके बाद पुलिस ने पीड़िता की पहचान करने और उन गवाहों तक पहुँचने के लिए अरुंधति रॉय की मदद माँगी।

अरुंधति रॉय का सहयोग इस अपराध के दोषियों तक पुलिस कोे पहुँचा सकती थी, लेकिन पुलिस को कोई सहयोग नहीं मिला। इसके बजाय, रॉय ने अपने वकील प्रशांत भूषण के माध्यम से जवाब दिया कि पुलिस के पास समन जारी करने का कोई अधिकार नहीं है। बलबीर पुंज ने 8 जुलाई 2002 को आउटलुक में ‘डिसिमुलेशन इन वर्ड एंड इमेजेस’ के रूप में प्रकाशित अपने जवाब में इस घटना को उठाया।

इतना ही नहीं, अरुंधति रॉय अपनी उसी लेख में आगे लिखा, “…कॉन्ग्रेस के पूर्व सांसद इकबाल एहसान जाफ़री के घर को भीड़ ने घेर लिया। पुलिस महानिदेशक, पुलिस आयुक्त, मुख्य सचिव और अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) को किए गए उनके फ़ोन कॉल को अनदेखा कर दिया गया। उनके घर के आसपास मौजूद मोबाइल पुलिस वैन ने कोई हस्तक्षेप नहीं किया। भीड़ घर में घुस गई।”

अरुंधति रॉय ने लिखा, “उन्होंने (हिंदू भीड़ ने) उनकी (जाफरी की) बेटियों को नंगा कर दिया और उन्हें ज़िंदा जला दिया। फिर उन्होंने एहसान जाफ़री का सिर काट दिया और उनके शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। बेशक, यह महज़ एक संयोग है कि जाफ़री फ़रवरी में राजकोट विधानसभा उपचुनाव के लिए अपने अभियान के दौरान गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के कटु आलोचक थे।”

यहाँ बताना जरूरी है कि दंगों में एहसान जाफ़री की हत्या की गई थी, लेकिन उनकी बेटियों को न तो ‘नंगा किया गया’ और न ही ‘ज़िंदा जलाया गया’। उनके बेटे टीए जाफ़री ने एशियन एज को एक इंटरव्यू दिया था। इस इंटरव्यू को न्यूजपेपर ने 2 मई 2002 को ‘Nobody Knew My Father’s House was the Target’ शीर्षक से दिल्ली संस्करण के मुख्य पृष्ठ पर छापा था।

इस में टीए जाफरी ने कहा था, “अपने भाइयों और बहनों में मैं भारत में रहने वाला अकेला व्यक्ति हूँ और मैं परिवार में सबसे बड़ा हूँ। मेरी बहन और भाई अमेरिका में रहते हैं। मैं 40 साल का हूँ और मेरा जन्म और पालन-पोषण अहमदाबाद में हुआ है।” बलबीर पुंज ने 27 मई 2002 को अपने लेख ‘Fiddling With Facts As Gujarat Burns’ में अरुंधति के मनगढ़ंत दावों को खारिज़ किया था, जिसमें पुष्टि की गई थी कि जाफ़री की बेटी अमेरिका में सुरक्षित थी।

अपने लेख में बलबीर पुंज द्वारा तथ्यों का खुलासा करने के बाद अरुंधति रॉय को आउटलुक में माफीनामा देने के लिए मजबूर होना पड़ा। ‘जाफरी परिवार से माफी’ शीर्षक से लिखे गए उनके फर्जी माफीनामे में कहा गया, “…मेरे लेख ‘Democracy: Who’s she when she’s at home?’ (6 मई) में एक तथ्यात्मक त्रुटि है। एहसान जाफरी की क्रूर हत्या का वर्णन करते हुए मैंने कहा कि उनकी बेटियों को उनके पिता के साथ मार दिया गया था।”

रॉय ने आगे कहा, “बाद में मुझे बताया गया कि यह सही नहीं है। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार एहसान जाफरी को उनके तीन भाइयों और दो भतीजों के साथ मार दिया गया था। उनकी बेटियाँ उन 10 महिलाओं में शामिल नहीं थीं, जिनका उस दिन चमनपुरा में बलात्कार किया गया और उनकी हत्या कर दी गई। मैं जाफरी परिवार से उनकी पीड़ा को और बढ़ाने के लिए माफी माँगता हूँ। मुझे सच में खेद है।”

अरुंधति ने आगे लिखा, मेरी जानकारी (जो कि बाद में गलत निकली) की दो स्रोतों से जाँच की गई। टाइम पत्रिका (11 मार्च) में मीनाक्षी गांगुली और एंथनी स्पैथ द्वारा लिखे गए लेख में और एक स्वतंत्र तथ्य-खोज मिशन द्वारा ‘Gujarat Carnage 2002: A Report to the Nation‘ में, जिसमें पूर्व आईजीपी त्रिपुरा केएस सुब्रह्मण्यम और पूर्व वित्त सचिव एसपी शुक्ला शामिल थे।”

तर्क देते हुए अरुंधति रॉय ने आगे कहा, “मैंने श्री सुब्रह्मण्यम से इस त्रुटि के बारे में बात की। उन्होंने कहा कि उस समय उनकी जानकारी एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी से मिली थी। (उस अधिकारी का नाम क्या था? न तो सुब्रह्मण्यम और न ही अरुंधति रॉय ने यह बताया!)…।”

यह माफ़ीनामा भी झूठा है, क्योंकि अरुंधति रॉय ने अपने झूठे माफ़ीनामे में भी दावा किया कि उस दिन 10 महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ और उन्हें मार दिया गया। असल में मार्च 2002 के पहले हफ़्ते में तत्कालीन अंग्रेज़ी अख़बारों को पढ़ने पर बलात्कार का कोई ज़िक्र ही नहीं मिलता। बलात्कार की ये कहानियाँ मार्च 2002 के मध्य में ही सामने आनी शुरू गईं, जब टाइम मैगज़ीन ने 11 मार्च 2002 के अपने अंक में झूठ गढ़ा।

इसी टाइम मैगजीन के झूठ को अरुंधति रॉय ने कॉपी की थी। न तो अरुंधति और न ही टाइम मैगजीन के संवाददाता ने इस मामले में किसी बलात्कार को साबित किया। अरुंधति ने सिर्फ़ जाफ़री परिवार से माफ़ी माँगी, न कि भाजपा या नरेंद्र मोदी से, क्योंकि उन्होंने अपने ग़लत दावे से उन्हें बदनाम किया। अरुंधति को देश से भी माफ़ी माँगनी चाहिए थी। उस लेख में अरुंधति रॉय ने और भी कई झूठ बोले थे।

उस झूठ के लिए उन पर धारा 153A, 499-500 (मानहानि), फर्जी खबरे फैलाने से संबंधित धाराओं के तहत मुकदमा चलाया जाना चाहिए था। अरुंधति ने लिखा था, “पुलिस महानिदेशक, पुलिस आयुक्त (यानी पीसी पांडे), मुख्य सचिव, अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) ने जाफरी के फोन कॉल को नजरअंदाज कर दिया। जाफरी के घर के आसपास मौजूद मोबाइल पुलिस वैन ने भी हस्तक्षेप नहीं किया।”

पुलिस आयुक्त और मुख्य सचिव को कॉल किए जाने के सभी दावे झूठे हैं। एसआईटी ने पुलिस आयुक्त पांडे के कॉल रिकॉर्ड की जाँच की और पाया कि जाफरी द्वारा कोई कॉल नहीं किया गया था। इसका जिक्र इसकी अंतिम रिपोर्ट के पृष्ठ संख्या 203-04 पर है। हालाँकि, पांडे ने उस दिन यानी 28 फरवरी 2002 को 302 कॉल किए और प्राप्त किए। उस दिन मुख्य सचिव जी सुब्बाराव विदेश में थे।

एसआईटी की रिपोर्ट में पृष्ठ संख्या 312 पर किया गया था। अब जब सुब्बाराव भारत से बाहर छुट्टी पर थे तो जाफरी ने उन्हें कैसे कॉल किया होगा? एसआईटी के अनुसार, पूरे आवासीय परिसर में जाफरी का लैंडलाइन एकमात्र चालू फोन था। अरुंधति रॉय ने दावा किया था कि पुलिस ने एहसान जाफरी के घर में भीड़ को रोकने के लिए कुछ नहीं किया।

वास्तव में कॉन्ग्रेस सांसद एहसान जाफरी के घर के बाहर पुलिस ने हस्तक्षेप किया था। इसका जिक्र भी एसआईटी की अंतिम रिपोर्ट की पृष्ठ संख्या 1 पर किया गया है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि पुलिस ने जाफरी के घर के बाहर चार हिंदुओं को गोली मार दी थी, 11 को घायल कर दिया। भीड़ पर लाठीचार्ज किया, 124 राउंड फायर किए और घटनास्थल पर 134 आँसू गैस के गोले दागे गए थे।

टाइम्स ऑफ इंडिया ने भी 28 फरवरी 2002 को ऑनलाइन रिपोर्ट की थी कि पुलिस और फायर ब्रिगेड ने दंगाइयों को तितर-बितर करने की पूरी कोशिश की और कहीं भी पुलिस की ओर से किसी तरह की निष्क्रियता नहीं दिखाई गई। पुलिस के लिए करीब 20,000 से ज़्यादा लोगों की भीड़ को नियंत्रित करना असंभव था।

दरअसल, जाफ़री द्वारा भीड़ पर रिवॉल्वर से गोली चलाने के बाद भीड़ पागल हो गई थी। इसमें 15 हिंदू घायल हो गए थे और 1 की मौत हो गई थी। एसआईटी की पेज नंबर 1 पर इसका भी जिक्र है। इन सबके बावजूद, पुलिस ने इस घटना में 180 मुस्लिमों को अपनी जान जोखिम में डालकर बचाया। टाइम्स ऑफ इंडिया ने पुलिस पर कुछ न करने का कहीं आरोप नहीं लगाया।

इंडिया टुडे के 18 मार्च 2002 के अंक में साफ तौर पर कहा गया कि जाफरी के घर के बाहर पुलिस ने कम-से-कम 5 दंगाइयों को गोली मार दी थी। पुलिस ने करीब 180 मुस्लिमों की जान भी बचाई, जबकि घर के अंदर मौजूद 250 लोगों में से 68 की मौत हो गई, क्योंकि सभी लापता लोगों को मृत घोषित कर दिया गया था।

एसआईटी की अंतिम रिपोर्ट के पेज 16 पर कहा गया है, “स्थानीय पुलिस के सामने अपने बयान में (6 मार्च 2002 को धारा 161 सीआरपीसी के तहत) उसने (एहसान जाफरी की विधवा जाकिया जाफरी) कहा था कि जब उन्हें जेल वैन में गुलबर्ग सोसाइटी से शिफ्ट किया जा रहा था तो वहाँ जमा भीड़ ने उन सभी को मौत के घाट उतार दिया होता, अगर पुलिस ने समय रहते कार्रवाई नहीं की होती।”

भाजपा और अरुंधति रॉय के अन्य विरोधियों की गलती थी कि उन्होंने ऐसे झूठ के खिलाफ केस दर्ज नहीं किया। आउटलुक पर भी इस तरह की बकवास प्रकाशित करने के लिए मुकदमा दर्ज होना चाहिए था। उन्हें दिवंगत अरुण जेटली से सीख लेनी चाहिए, जिन्होंने दिसंबर 2015 में उन पर झूठे आरोप लगाने वाले AAP नेताओं पर मुकदमा दायर किया था और उन्हें बिना शर्त माफ़ी मांगने के लिए मजबूर किया था।

(लेखक एमडी देशपांडे ने ‘Gujarat Riots: The True Story’ नामक पुस्तक लिखी है, जिसमें 2002 के दंगों – गोधरा और उसके बाद के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई है। वे www.gujaratriots.com के और ट्विटर हैंडल @gujaratriotscom के एडमिन में से एक हैं। उन्होंने ‘Why the Vajpayee Government lost the 2004 Lok Sabha polls- An analysis’ नामक पुस्तक भी लिखी है, जिसमें मीडिया के बहुत अधिक दुष्प्रचार को उजागर किया गया है, खासकर 2004 के लोकसभा चुनावों से पहले और 2002 के गुजरात राज्य विधानसभा चुनावों से पहले।)

‘लग रहा था कयामत का दिन आ गया’: 577 हज यात्री भीषण गर्मी से मरे, कई लापता, मक्का की ग्रैंड मस्जिद में 51.8 डिग्री तक पहुँचा पारा

दुनिया के सबसे बड़े मजहबी यात्रा यानी हज यात्रा पर सऊदी अरब पहुँचे 577 जायरीनों की अब तक मौत हो चुकी है। इस साल मरने वालों की संख्या सबसे बड़ी है। सबसे ज्यादा मौतें मिस्र से पहुँचे जायरीनों की हुई, जिनकी संख्या 323 तक पहुँच गई है। यही नहीं, अब तक कई जायरीनों के लापता होने की भी खबरें आ रही हैं, जिन्हें ढूँढने के लिए विदेशी सरकारें सऊदी प्रशासन के साथ मिलकर काम कर रही हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, हज के लिए मक्का पहुँचे 550 से अधिक तीर्थयात्रियों की मौत की खबर सामने आ रही है। मरने वालों में कम से कम 323 मिस्र के थे। इनमें से अधिकांश की मौत गर्मी से होने वाली बीमारियों के कारण हुई है। सऊदी अरब के दो राजनयिकों ने न्यूज एजेंसी एएफपी को इसकी जानकारी दी है। इनमें से एक ने कहा कि मिस्र के जितने भी तीर्थयात्रियों की मौत हुई है, उनमें से अधिकांश ने भीषण गर्मी के कारण दम तोड़ा। हालाँकि, एक की मौत भगदड़ के दौरान घायल होने के कारण हुई है। राजनयिकों ने कहा कि मरने वालों में कम से कम 60 जॉर्डन के नागरिक भी शामिल हैं। इसके साथ ही मरने वालों की कुल संख्या 577 हो गई है। बता दें, पिछले साल मक्का में 240 लोगों की मौत हुई थी।

सऊदी रायनयिक ने बताया कि मिस्र के अलावा अन्य देशों के मरने वाले लोगों की मौत का कारण गर्मी है, जबकि कुछ अन्य लोग भगदड़ के कारण मरे हैं। उन्होंने बताया कि मक्का के सबसे बड़े शवगृह में से एक अल-मुआइसिम शवगृह पूरी तरह भर गया है। यहाँ 550 शव रखे हैं। मिस्र के विदेश मंत्रालय ने कहा कि हज के दौरान कुछ मिस्रवासी लापता हो गए हैं, जिनकी खोज के लिए काहिरा सऊदी अधिकारियों के साथ सहयोग कर रहा है।

सऊदी अरब में इस साल पहुँचे 1.8 मिलियन लोग, हर तरफ बदइंतजामी

इस साल, हज यात्रा पर 1.8 मिलियन लोग यानी 18 लाख लोग पहुँचे हैं। इसमें से 16 लाख लोग विदेशी हैं। इस बीच, सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है, जो सऊदी अरब का बताया जा रहा है। इस वीडियो को शेयर किया है पत्रकार मोहम्मद ताहा ने। इस वीडियो को बनाने वाला व्यक्ति सड़क पर पड़े हुए शवों को दिखाता है और दावा करता है कि घंटों तक कोई एंबुलेंस नहीं आई। इस वीडियो में कई शव सड़कों के किनारे डिवाइडर और फुटपाथ पर रखे देखे जा सकते हैं। यही नहीं, व्यक्ति वीडियो बनाते समय कई शवों को पास से भी दिखाता है और बताता है कि बस, ट्रेन, टैक्सी जैसी कोई भी सुविधा नहीं है और लोग मर रहे हैं, लेकिन सरकार को इससे कोई फर्क नहीं पड़ रहा।

मोहम्मद ताहा ने वीडियो को पोस्ट करते हुए एक्स पर लिखा, “इस वीडियो में कई हज यात्रियों के कई शव देखे जा सकते हैं। क्या सऊदी शासन को जवाब देह ठहराया जाएगा? वे इस इस्लामी पर्यटन को बढ़ावा देते हैं और इससे अरबों कमाते हैं। लेकिन अभी तक, मैंने इस पर मीडिया में ज़्यादा कवरेज नहीं देखी है!”

मिस्र की 61 वर्षीय तीर्थयात्री अजा हामिद ब्राहिम ने समचार एजेंसी एएफपी को बताया कि उन्होंने सड़क के किनारे पड़ी हुई लाशें देखीं। ऐसा लग रहा था कि जैसे कयामत का दिन आ गया है। बड़ी संख्या में मौतों और उसके बाद शवों को लेकर हो रही बदइंतजामी को लेकर सोशल मीडिया पर लोग सऊदी अरब की आलोचना कर रहे हैं।

काबा में 51 डिग्री सेल्सियस तपामान

सऊदी मौसम सेवा के अनुसार, सोमवार (17 जून 2024) को मक्का की ग्रैंड मस्जिद में तापमान 51.8 डिग्री सेल्सियस पहुँच गया। इस जगह पर तीर्थयात्री काबा की परिक्रमा करते हैं। ग्रैंड मस्जिद के पास स्थित मीना में तापमान 46 डिग्री सेल्सियस था। इस जगह पर हज यात्रियों ने तीन कंक्रीट की दीवारों पर शैतान को पत्थर मारने की रस्म अदा की। यहाँ गर्मी और भीड़ ने स्थिति को विकट बना दिया था।

25 एकड़ अतिक्रमण मुक्त, मंदिर-मस्जिद समेत 1800 अवैध निर्माण ध्वस्त… जो हल्द्वानी-जहाँगीरपुरी में न हो पाया, CM योगी ने अकबरनगर में कर दिखाया: बनेगा रिवरफ्रंट

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के अकबर नगर में मंगलवार (18 जून, 2024) की देर रात अवैध रूप से बनी मस्जिद, मदरसे और मंदिर के खिलाफ ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की गई। रात 12.30 से 3.30 बजे तक 8 बुलडोजर को कार्रवाई के लिए लगाया गया था। बता दें कि अदालत के आदेश के बाद ये सब किया जा रहा है, क्योंकि यहाँ रिवर फ्रंट का निर्माण होना है। लखनऊ में कई जगह पोस्टर लगा कर इसकी सूचना दे दी गई थी, और उधर का आवागमन भी रोक दिया था।

कुकरैल नदी की जमीन के एक बड़े हिस्से को कब्ज़ा कर उस पर अवैध निर्माण बना दिए गए थे। अब तक 1169 आवास और 101 कमर्शियल निर्माणों को ध्वस्त किए जाने की कार्रवाई की जा चुकी है। ध्वस्तीकरण का कार्य पूरा हो गया है, अब सिर्फ मलबा हटाने का काम बचा हुआ है। 24.5 एकड़ में बने 1800 से अधिक अवैध निर्माण नेस्तनाबूत किए जा चुके हैं। दिसंबर 2023 से ही अतिक्रमण हटाने का काम चल रहा है। अब ये इलाका पर्यटन का हब बनेगा।

लखनऊ के चिड़ियाघर को भी इसी जगह पर पुनर्स्थापित किए जाने की योजन है। कुकरैल नदी को पुनर्जीवन देने के लिए हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक में सुनवाई हुई। अदालत ने भी कार्रवाई की अनुमति दी। बादशाह नगर से लेकर लेकर अकबरनगर तक के रास्ते को इस दौरान बंद रखा गया था, PAC मुख्यालय से शुरू होने वाले फ्लाईओवर पर भी पुलिस तैनात रही, अकबरनगर से पॉलिटेक्निक कॉलेज जाने वाले रास्ते पर भी सुरक्षा व्यवस्था कड़ी थी, कुल 7 जगह बैरिकेडिंग लगा कर पुलिस ने पहरा दिया।

ड्रोन कैमरों से निगरानी की जा रही थी, मीडिया को भी तस्वीरें लेने की अनुमति नहीं थी क्योंकि मामला संवेदनशील था। कुकरैल नदी का सौंदर्यीकरण और रिवर फ्रंट का निर्माण CM योगी आदित्यनाथ का ड्रीम प्रोजेक्ट है। अकबरनगर के विस्थापितों को 10 किलोमीटर दूर बसंतकुंज में योगी सरकार ने घर दिया है। जल स्तर बनाए रखने के लिए शारदा नहर का पानी भी इसमें छोड़ा जाएगा। नदी की 6 किलोमीटर लंबाई के साथ एक झील को भी विकसित किया जाएगा। बारिश की पानी को इकट्ठा कर के भी कुकरैल नदी में भरे जाने की योजना है।

ये उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सरकार के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। आपको याद होगा कि जब जहाँगीरपुरी में अवैध निर्माण के खिलाफ बुलडोजर कार्रवाई हो रही थी तब वामपंथियों ने उसे कुछ ही मिनटों में रुकवा दिया था। CPI(M) की नेता वृंदा करात सुप्रीम कोर्ट के आदेश की प्रति लेकर जहाँगीरपुरी पहुँचीं और तुरंत स्पेशल कमिश्नर दीपेंद्र पाठक को दिखाया। फिर कार्रवाई रोकनी पड़ी। 20 अप्रैल, 2022 को सुबह 10 बजे बुलडोजर पहुँचा था, 11 बजे सुप्रीम कोर्ट ने स्टे ऑर्डर दे दिया।

इसी तरह हल्द्वानी का भी उदाहरण हमारे सामने है, जहाँ रेलवे की जमीन पर एक पूरी की पूरी बस्ती ही बसा दी गई। हल्द्वानी में ‘मलिक का बगीचा’ से अतिक्रमण हटाने के क्रम में वहाँ दंगे ही भड़क गए। कॉन्ग्रेस नेता व अधिवक्ता सलमान खुर्शीद अतिक्रमणकारियों की तरफ से न्यायालय में पैरवी करने पहुँच गए। बनभूलपुरा में 8 फरवरी, 2024 को हिंसा भड़क उठी। पुलिस-प्रशासन पर जम कर पत्थरबाजी हुई, आगजनी की गई और कार्रवाई रोकनी पड़ी।

इसी तरह दिल्ली में तो पुलिस की मौजूदगी में पृथ्वीराज चौहान के किले के परिसर में मजार उगा दी गई। आरोप लगा था कि दिल्ली स्थित किला राय पिथौरा के पास मजार का निर्माण हुआ, वो भी पुलिस के संरक्षण में। इसका वीडियो भी सामने आया। कुछ पत्थरों को हरे रंग से रंग दिया गया, वक्फ बोर्ड की भी इस पर नज़र थी। मेहरौली स्थित संजय वन के बीचोंबीच इस तरह की हरकत से स्थानीय लोग भी उग्र हो गए थे और पूछने लगे थे कि वहाँ उन्हें क्यों नहीं जाने दिया जा रहा है?

ऐसे समय में जब पुलिस खुद ही कई प्रदेशों में इस तरह के अवैध मजारों की निगरानी कर के ये सुनिश्चित करती है कि वहाँ नमाज अदा की जाए, उत्तर प्रदेश की राजधानी में इको-टूरिज्म हब विकसित करने के लिए एक पूरी की पूरी अवैध बस्ती को ध्वस्त कर सरकारी जमीन को खाली कराना और विस्थापितों को कहीं और बसाना किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं है। बिना किसी हो-हल्ले के अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई सफलतापूर्वक पूरा करने के लिए योगी सरकार बधाई की पात्र है।

ज्ञान से इतना खौफ खाता है इस्लाम कि 3 महीने तक जलती रहीं किताबें, नालंदा विश्व​विद्यालय से बची थी बख्तियार खिलजी की जान फिर भी मजहब के लिए मचाया कत्लेआम

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा आज (19 जून 2024) नालंदा यूनिवर्सिटी के नए कैंपस का उद्घाटन किए जाने के बाद विश्व की सबसे प्राचीन विश्वविद्यालय की चर्चा चारों ओर है। हर कोई इस यूनिवर्सिटी के इतिहास और इससे जुड़ी कहानियाँ जानना चाहता है। तो चलिए एक संक्षिप्त विवरण इस विश्वविद्यालय का दें जिसे सदियों पहले मुगल आक्रांता बख्तियार खिलजी ने आग लगाकर मिटाने का प्रयास किया था, लेकिन ज्ञान का मंदिर कहे जाने वाले इस विश्वविद्यालय की नींव इतनी मजबूत थी कि लोग आज भी इसकी महत्वता को जानते-समझते हैं। साल 2016 में यूनेस्को ने नालंदा के प्राचीन अवशेषों को विश्व धरोहर की सूची में शामिल किया था। आज प्रधानमंत्री मोदी ने भी नालंदा को एक विश्वविद्यालय नहीं बल्कि एक गौरव गाथा कहा है।

कब हुई थी नालंदा की स्थापना

नालंदा विश्वविद्यालय की शुरुआत सन् 450 ईस्वी में गुप्त वंश के शासक कुमारगुप्त प्रथम ने की थी। इसे शुरू करने का मकसद यही था कि ध्यान और अध्यात्म के लिए बनाए गए स्थान पर लोगों को ज्ञान भी मिले। स्वयं गौतम बुद्ध ने कई बार इस विश्वविद्यालय की यात्रा की थी और यहाँ पर ध्यान भी लगाया था। धीरे-धीरे ये विश्वविद्यालय भारत में उच्च शिक्षा का सबसे महत्तवपूर्ण केंद्र तो बना ही, साथ में पूरी दुनिया में भी इसे प्रसिद्ध होने में समय नहीं लगा।

नालंदा विश्वविद्यालय का विशाल पुस्तकालय

सबसे खास बात इस विश्वविद्यालय की यह थी कि इसमें 9 मंजिला पुस्तकालय था। इस पुस्तकालय का नाम धर्म गूंज था जिसे तीन हिस्सों में बाँटा गया था- रत्नरंजक, रत्नोदधि, रत्नासागर। इस पुस्तकालय में एक समय में 90 लाख से ज्यादा किताबें थीं। ये इतना विशाल था कि जब मुगल आक्रांता बख्तियार खिलजी ने इसमें आग लगवाई तो किताबें करीबन 3 महीने तक जलती रहीं थीं।

नालंदा यूनिवर्सिटी

चिढ़ में लगाई खिलजी ने नालंदा में आग

बख्तियार खिलजी को बिहार का पहला मुस्लिम शासक माना जाता है जिसके हाथ अनेक धर्माचार्य और बौद्ध भिक्षुओं के खून के सने थे। उसने ही नालंदा में भी तबाही मचाई थी वो भी तब जब इस विश्वविद्यालय के एक वैद्य ने उसे मरते-मरते बचाया था।

बताया जाता है कि एक ख्तियार खिलजी बहुत ज्यादा बीमार पड़ गया था। उस समय उसके हकीमों ने उसका काफी उपचार किया लेकिन कहीं से कोई फायदा नहीं हुआ। तब उसे नालंदा विश्वविद्यालय के आयुर्वेद विभाग के प्रमुख आचार्य राहुल श्रीभद्रजी से उपचार कराने की सलाह दी गई। कट्टर इस्लामी बख्तियार खिलजी किसी कीमत पर हिंदुस्तानी दवा नहीं खाना चाहता था इसलिए उसने जान बचाने के लिए आचार्य राहुल को बुलवाया तो मगर उनकी कोई भी दवा खाने से मना कर दी। इसके साथ उसने ये धमकी भी दी कि अगर वह ठीक नहीं हुआ तो आचार्य की हत्या करवा देगा।

वैद्य ने खिलजी की बात सुनी और अगले दिन सके पास कुरान लेकर गए। उन्होंने खिलजी से कहा- “कुरान की पृष्ठ संख्या इतने से इतने तक पढिए ठीक हो जाएँगे।” बताया जाता है कि वैद्य ने कुरान के कुछ पन्नों पर एक अदृश्य दवा लगा दी थी जिससे जब खिलजी ने उन पन्नों को पढ़ना शुरू किया तो वो दवा उसके शरीर में जाती गई और पृष्ठ खत्म होते होते वो ठीक हो गया।

वैद्य राहुल ने बख्तियार खिलजी की जान तो बचा दी, पर इसके बाद खिलजी एहसान मानने की जगह भीतर ही भीतर भारतीय वैद्यों से चिढ़ने लगा। उसे अपनी जान बचने की खुशी नहीं हुई बल्कि गुस्सा आया कि उसके हकीमों से ज्यादा ज्ञान भारतीय वैद्यों के पास क्यों है। इसी चिढ़ में कहा जाता है कि खिलजी ने 1193 में नालंदा विश्वविद्यालय में आग लगवा दी। वहाँ इतनी पुस्तकेंं थीं कि आग लगी भी तो तीन माह तक पुस्तकें जलती रहीं। इसी दौरान उसने हजारों धर्माचार्य और बौद्ध भिक्षु मार डाले।

नालंदा यूनिवर्सिटी लगा इस्लाम के लिए खतरा

कुछ इतिहासकार कहते हैं कि खिलजी के नालंदा विश्वविद्यालय तबाह करने के पीछे कारण ये था कि वो इसे इस्लाम के प्रसार के बीच चुनौती मानता था। उसे लगता ता नालंदा विश्वविद्यालय में जिस तरीके से बौद्ध और हिंदू धर्म फल-फूल रहा है, उससे इस्लाम को खतरा हो सकता है। इसके बारे में फारसी इतिहासकार मिनहाजुद्दीन सिराज अपनी किताब ‘तबाकत-ए-नासिरी’ में भी जिक्र किया है। उन्होंने लिखा था कि खिलजी किसी कीमत पर बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार नहीं चाहता था, पहले उसने नालंदा विश्वविद्यालय में इस्लाम की शिक्षा का दबाव डाला, फिर हमला कर दिया। उस बर्बर कार्रवाई में पूरा विश्वविद्यालय तबाह हो गयाष

तक्षिला के बाद दूसरी प्राचीन यूनिवर्सिटी

आज लोगों को लगता है कि लंदन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी और यूरोप की बोलोग्ना यूनिवर्सिटियाँ देश की सबसे पुरानी यूनिवर्सिटियाँ हैं, लेकिन हकीकत यह है कि नालंदा का इतिहास इन यूनिवर्सिटियों से भी 500 साल पहले का है। तक्षिला के बाद इसी विश्वविद्यालय को दुनिया के सबसे पुराना विश्वविद्यालय कहा जाता है इस संबंध में सातवीं शताब्दी में चीन के यात्री ह्नेनसांग और इत्सिंग अपनी किताबों में लिख चुके हैं। वो दोनों भारत के दौरे पर आए थे जब उन्होंने इस यूनिवर्सिटी को देखा और बिन इसके बारे में लिखे रह नहीं पाए। विश्वविद्यालय की खासियत थी कि यहाँ शिक्षक और छात्रों के साथ सन्यासियों के विचारों को भी महत्व दिया जाता था। खास बात ये भी थी इस यूनिवर्सिटी में सामान्य विषयों के अलावा धर्म, दर्शन, तर्कशास्त्र, चित्रकला, वास्तु, अंतरिक्ष विज्ञान, धातु विज्ञान, अर्थशास्त्र की जानकारियाँ दी जाती थीं। इसमें न केवल भारत के छात्र पढ़ते थे बल्कि कोरिया, जापान, तिब्बत, चीन, ईरान, इंडोनेशिया, ग्रीस, मंगोलिया समेत कई अन्य जगहों पर भी लोग यहाँ आते थे। इसके अलावा आवासीय परिसर के तौर पर यह पहला विश्वविद्यालय है, जो 800 साल तक अस्तित्व में रहा। खिलजी द्वारा इसे तबाह किए जाने के बाद जब इसकी खुदाई हुई तो वहीं, आवासीय परिसर के तौर पर यह पहला विश्वविद्यालय है, यह 800 साल तक अस्तित्व में रहा।

पेट्रोल-डीजल के बाद पानी-बस किराए की बारी, कर्नाटक में जनता पर बोझ खटाखट: कॉन्ग्रेस की ‘रेवड़ी’ से खजाना खाली, अब कमाई के लिए विदेशी कंपनी को काम पर लगाया

कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार राज्य के आम आदमी पर और भी बोझ डालने की तैयारी कर रही है। कई रेवड़ी का वादा करके सत्ता में आई कॉन्ग्रेस के लिए राज्य का खजाना चिंता का सबब बन रहा है। खजाने की भरपाई के लिए कॉन्ग्रेस सरकार ने डीजल पेट्रोल की कीमतें बढ़ाने के बाद अब पानी के दाम और बस के किराए पर अपनी नजरें गड़ा दी हैं। इन्हें भी बढ़ाए जाने की बात हो रही है। इसके अलावा, कॉन्ग्रेस सरकार ने एक अमेरिकी कम्पनी को कमाई बढ़ाने पर सुझाव देने को लेकर काम पर लगाया है।

राज्य में जीत को कॉन्ग्रेस ने किए थे ‘रेवड़ी’ वादे

2023 में विधानसभा चुनाव जीतने के लिए कॉन्ग्रेस ने पाँच गारंटी दी थी। इन्हें ‘रेवड़ी’ कहा गया था। कॉन्ग्रेस ने 2023 विधानसभा चुनाव में वादा किया था कि सत्ता में आने पर वह हर घर को 200 यूनिट मुफ्त बिजली देगी। इसे गृह ज्योति योजना का नाम दिया गया था। इसके अलावा गृह लक्ष्मी नाम की योजना का भी एक वादा किया गया था। इसके अंतर्गत कॉन्ग्रेस ने वादा किया था कि वह राज्य की महिलाओं को ₹2000 प्रतिमाह देगी।

कॉन्ग्रेस ने कर्नाटक की आर्थिक स्थिति और मुफ्त सुविधाओं के वादों से अर्थव्यस्था पर पड़ने वाले बोझ को दरकिनार करते हुए हर परिवार को 10 किलो अनाज देने का भी वादा किया था, इसे अन्न भाग्य योजना का नाम दिया गया था। कॉन्ग्रेस ने राज्य में महिलाओं को मुफ्त बस यात्रा का भी वादा किया था। इसके अलावा राज्य के बेरोजगार युवाओं को भी ₹1500 देने की बात कही गई थी। इनमें से कुछ योजनाएँ पूरी तरह से लागू कर दी गई हैं तो कुछ को आंशिक रूप से लागू किया गया है।

कॉन्ग्रेस के इन ‘रेवड़ी’ वादों का असर अब राज्य के खजाने पर दिख रहा है और वह राजस्व बढ़ाने के लिए नई-नई जुगत भिड़ा रही है। वह राज्य की आम जनता को अब नए कर और बढ़े करों से लादना चाह रही है। साथ ही वह कमाई के नए जुगाड़ भी लगा रही है।

मुफ्त वाली गारंटी ले गईं बजट का बड़ा हिस्सा

कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार की यह गारंटियाँ बजट का एक बड़ा हिस्सा ले जा रही हैं। इससे बाकी के विकास कामों के लिए पैसा नहीं बच रहा है। वित्त वर्ष 2023-24 में इन पाँच चुनावी गारंटियों पर ₹39,825 करोड़ का खर्चा किया गया था। यह कर्नाटक के 2023-24 के बजट का लगभग 17% था। वित्त वर्ष 2024-25 में गारंटियों का यह खर्चा और बढ़ गया है। 2023-24 के मुकाबले इसमें लगभग एक तिहाई की वृद्धि हुई है।

वित्त वर्ष 2024-25 के लिए पेश किए गए बजट में कर्नाटक ने इन पाँच चुनावी गारंटियों पर ₹52,000 करोड़ खर्च करने की योजना बनाई है। राज्य की कई अन्य योजनाओं का असर इस खर्च के कारण पड़ रहा है। कॉन्ग्रेस सरकार ने जुलाई 2023 में राज्य के SC-ST समुदाय के कल्याण के लिए खर्च किए जाने वाले ₹11,000 करोड़ को भी इन गारंटियों के लिए उपयोग करने का फैसला लिया था, जिसके कारण इसकी काफी आलोचना हुई थी।

जुलाई 2023 में ही कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने भी अपने विधायकों से स्पष्ट कर दिया था कि उन्हें कोई भी फंड नहीं दिए जाएँगे और पूरा फोकस गारंटियों को पूरा करने पर लगाया जाएगा। भाजपा ने कॉन्ग्रेस सरकार पर आरोप लगाया है कि वह राज्य के विकास का सारा पैसा अपने चुनावी वादे पूरे करने में फूँक रही है जिससे राज्य पिछड़ रहा है।

डीजल-पेट्रोल के बाद पानी और बसों के किराए बढ़ाने की तैयारी

कॉन्ग्रेस सरकार अब अपना खजाना भरने के लिए लगातार जनता पर नए बोझ लाद रही है। राज्य सरकार ने हाल ही में पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाए थे। कॉन्ग्रेस सरकार ने राज्य में पेट्रोल और डीजल पर सेल्स टैक्स बढ़ाया था। इसके अंतर्गत पेट्रोल और डीजल के दाम राज्य क्रमशः ₹3 और ₹3.50 बढ़ गए थे। इसको लेकर कॉन्ग्रेस सरकार की खूब आलोचना हुई थी। यह निर्णय लोकसभा चुनाव के आने के तुरंत बाद लिया गया था।

पेट्रोल डीजल के दाम बढ़ाने से भी कॉन्ग्रेस सरकार का खजाना पूरा नहीं पड़ रहा है। अब कॉन्ग्रेस सरकार में उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने स्पष्ट किया है कि बेंगलुरु में पानी आपूर्ति के दाम बढ़ाए जाएँगे। उन्होंने कहा है कि पानी की कीमतें बढ़ाना जरूरी है। उपमुख्यमंत्री शिवकुमार का दावा है कि बेंगलुरु का जल आपूर्ति विभाग अपना बिजली का बिल और कर्मचारियों की तन्ख्वाह तक नहीं दे पा रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है कि कावेरी नदी से पानी लेने वाले बाशिंदों के लिए पानी की कीमतें 40% बढ़ाए जाने की तैयारी है।

पानी के अलावा कर्नाटक में बसों का किराया बढ़ाए जाने पर विचार कॉन्ग्रेस सरकार विचार कर रही है। मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है कि सोमवार (17 जून, 2024) को हुई एक बैठक में मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने राज्य में बसों का किराया बढ़ाने पर चर्चा की। बसों का किराया बढ़ाने के समर्थन में तर्क दिया गया कि यह लम्बे समय से अटका हुआ है और इसे 2015 में बढ़ाया गया था। सिद्दारमैया ने इसके अलावा पेट्रोल डीजल के दाम बढ़ाए जाने के निर्णय का भी बचाव किया।

अमेरिकी कम्पनी बताएगी, कैसे कमाए कॉन्ग्रेस सरकार

अब कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार ने अपनी कमाई बढ़ाने के लिए नई जुगत भिड़ाई है। कॉन्ग्रेस सरकार ने राज्य की आर्थिक स्थिति सुधारने और राजस्व बढ़ाने पर सुझाव देने के लिए एक अमेरिकी कम्पनी बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप (BCG) को काम पर लगाया है। यह कंसल्टिंग कम्पनी अब राज्य सरकार को बताएगी कि वह अपना खजाना कैसे बढ़ा सकती है। यह निर्णय चुनावी गारंटियों के बढ़ते खर्चे के बीच लिया गया है। मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है कि BCG ने सरकार को कुछ सुझाव भी इस संबंध में दिए हैं।

गौरलतब है कि भाजपा सरकारी खजाने पर विपरीत असर डालने वाली ऐसी योजनाओं का विरोध करती आई है। हालाँकि, आम आदमी पार्टी और कॉन्ग्रेस ने इन योजनाओं को चुनावी हथियार की तरह इस्तेमाल किया है। हालिया लोकसभा चुनावों में भी कॉन्ग्रेस ने हर महिला को प्रतिमाह ₹8500 देने की बात कही थी।

पूरी हुई 832 साल की प्रतीक्षा, राष्ट्र को PM मोदी ने समर्पित की नालंदा की विरासत: कहा- आग की लपटें ज्ञान को नहीं मिटा सकती

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिहार के राजगीर में नालंदा विश्वविद्यालय के नए परिसर का उद्धघाटन किया। नया परिसर नालंदा विश्वविद्यालय के प्राचीन खंडहरों के पास है, जिसे नालंदा विश्वविद्यालय अधिनियम, 2010 के माध्यम से स्थापित किया गया था। यह अधिनियम 2007 में फिलीपींस में दूसरे पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन में लिए गए निर्णय का पालन करता है। प्रधानमंत्री मोदी ने नालंदा विश्वविद्यालय के नए परिसर का उद्घाटन करने के बाद कहा, “नालंदा इस सत्य का उद्घोष है कि आग की लपटों में पुस्तकें भले जल जाएं लेकिन आग की लपटें ज्ञान को नहीं मिटा सकतीं।”

नालंदा विश्वविद्यालय में अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, “मुझे तीसरे कार्यकाल के लिए शपथ ग्रहण करने के बाद पहले 10 दिनों में ही नालंदा आने का अवसर मिला है। यह मेरा सौभाग्य तो है ही, मैं इसे भारत की विकास यात्रा के एक शुभ संकेत के रूप में देखता हूँ। नालंदा केवल एक नाम नहीं है। नालंदा एक पहचान है, एक सम्मान है। नालंदा एक मूल्य है, मंत्र है, गौरव है, गाथा है। नालंदा इस सत्य का उद्घोष है कि आग की लपटों में पुस्तकें भले जल जाएँ, लेकिन आग की लपटें ज्ञान को नहीं मिटा सकतीं।”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि मैं बिहार के लोगों को भी बधाई देता हूँ। बिहार अपने गौरव को वापस लाने के लिए जिस तरह विकास की राह पर आगे बढ़ रहा है, नालंदा का ये परिसर उसी की एक प्रेरणा है।

पीएम मोदी ने कहा, “नालंदा एक पहचान है, एक सम्मान है। नालंदा केवल भारत के ही अतीत का पुनर्जागरण नहीं है। इसमें विश्व के, एशिया के कितने ही देशों की विरासत जुड़ी हुई है। नालंदा यूनिवर्सिटी के पुनर्निर्माण में हमारे साथी देशों की भागीदारी भी रही है। मैं इस अवसर पर भारत के सभी मित्र देशों का अभिनंदन करता हूँ। अपने प्राचीन अवशेषों के समीप नालंदा का नवजागरण। ये नया कैंपस, विश्व को भारत के सामर्थ्य का परिचय देगा। जो राष्ट्र, मजबूत मानवीय मूल्यों पर खड़े होते हैं… वो राष्ट्र इतिहास को पुनर्जीवित करके बेहतर भविष्य की नींव रखना जानते हैं।”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, “हम सभी जानते हैं कि नालंदा कभी भारत की परंपरा और पहचान का जीवंत केंद्र हुआ करता था… शिक्षा को लेकर यही भारत की सोच रही है… शिक्षा ही हमें गढ़ती है, विचार देती है और उसे आकार देती है। प्राचीन नालंदा में बच्चों का प्रवेश उनकी पहचान, उनकी राष्ट्रीयता को देख कर नहीं होता था। हर देश हर वर्ग के युवा हैं यहाँ पर। नालंदा विश्वविद्यालय के इस नए परिसर में हमें उसी प्राचीन व्यवस्था को फिर से आधुनिक रूप में मजबूती देनी है और मुझे ये देख कर खुशी है कि दुनिया के कई देशों से आज यहाँ कई विद्यार्थी आने लगे हैं।

डॉ कलाम ने नालंदा विश्वविद्यालय को फिर से स्थापित करने की जताई थी इच्छा: नीतीश कुमार

सीएम नीतीश कुमार ने कहा कि खुशी की बात है कि नालंदा विश्वविद्यालय के परिसर का उद्घाटन आज प्रधानमंत्री मोदी के करकमलों से किया जा रहा है। पुराने नालंदा विश्वविद्यालय में देश के ही नहीं दुनिया की अनेक जगह के लोग आकर पढ़ते थे लेकिन दुर्भाग्य से ये विश्वविद्यालय 1200 ईस्वी में नष्ट हो गया था। 2005 से हम लोगों को काम करने का मौका मिला तब से हमने बिहार के विकास का काम शुरू किया। 2006 में तत्कालीन राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम बिहार आए थे और उन्होंने अपने संबोधन में नालंदा विश्वविद्यालय को फिर से स्थापित करने की बात की थी।

साल 2014 से अस्थाई कैंपस में संचालित हो रहा था नालंदा विश्वविद्यालय

मूल रूप से पाँचवीं शताब्दी में स्थापित नालंदा विश्वविद्यालय, दुनिया भर के छात्रों को आकर्षित करने वाला एक प्रसिद्ध संस्थान था। यह 12वीं शताब्दी में नष्ट होने तक 800 वर्षों तक फलता-फूलता रहा। आधुनिक विश्वविद्यालय ने 2014 में 14 छात्रों के साथ एक अस्थायी स्थान से परिचालन शुरू किया। नए परिसर का निर्माण 2017 में शुरू हुआ। नालंदा विश्वविद्यालय को ऑस्ट्रेलिया, बांग्लादेश, भूटान, चीन, इंडोनेशिया और थाईलैंड सहित 17 अन्य देशों का समर्थन प्राप्त है, जिन्होंने समझौता ज्ञापन (MOU) पर हस्ताक्षर किए हैं। विश्वविद्यालय अंतर्राष्ट्रीय छात्रों को 137 छात्रवृत्तियाँ प्रदान करता है। 2022-24 और 2023-25 ​​के लिए स्नातकोत्तर कार्यक्रमों और 2023-27 के पीएचडी कार्यक्रम में नामांकित अंतर्राष्ट्रीय छात्रों में अर्जेंटीना, बांग्लादेश, कंबोडिया, घाना, केन्या, नेपाल, नाइजीरिया, श्रीलंका, अमेरिका और जिम्बाब्वे के छात्र शामिल हैं।

नालंदा विश्‍वविद्यालय कैम्पस में 40 कक्षाओं वाले दो शैक्षणिक ब्लॉक हैं, जिनकी कुल बैठने की क्षमता लगभग 1900 है। इसमें 300 सीटों की क्षमता वाले दो सभागार हैं। इसमें लगभग 550 छात्रों की क्षमता वाला एक छात्र छात्रावास है। इसमें अंतरराष्ट्रीय केंद्र, 2000 व्यक्तियों तक की क्षमता वाला एम्फीथिएटर, फैकल्टी क्लब और खेल परिसर सहित कई अन्य सुविधाएँ भी हैं। यह परिसर एक ‘नेट जीरो’ ग्रीन कैंपस है।

यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल

साल 1193 में दिल्ली सल्तनत के शासक कुतुबुद्दीन ऐबक के सेनापति मोहम्मद बिन बख्तियार खिलजी ने आग लगाकर इस विश्‍वविद्यालय को जला दिया था। इस यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी में इतनी किताबें थीं कि 3 दिनों तक आग धधकती रही। आज ये नालंदा खंडहर के रूप में जाना जाता है और यूनेस्‍को की विश्‍व धरोहर सूची में शामिल है।

इसकी नींव गुप्त राजवंश के कुमार गुप्त प्रथम ने रखी थी। पाँचवीं सदी में बने प्राचीन विश्वविद्यालय में करीब 10 हजार छात्र पढ़ते थे, जिनके लिए 1500 अध्यापक हुआ करते थे. छात्रों में अधिकांश एशियाई देशों चीन, कोरिया और जापान से आने वाले बौद्ध भिक्षु होते थे। इतिहासकारों के मुताबिक, चीनी भिक्षु ह्वेनसांग ने भी सातवीं सदी में नालंदा में शिक्षा ग्रहण की थी। उन्होंने अपनी किताबों में नालंदा विश्वविद्यालय की भव्यता का जिक्र किया है। यह ज्ञान और बुद्धिमत्ता के प्रसार की दिशा में प्राचीन भारत के योगदान का गवाह है।

नालंदा विश्‍वविद्यालय के नए परिसर के उद्घाटन के मौके पर प्रधानमंत्री के साथ भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर, बिहार के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, नालंदा विश्वविद्यालय के कुलाधिपति अरविंद पनगढ़िया भी मौजूद रहे। इसके साथ ही नालंदा विश्वविद्यालय के स्थापना में अहम योगदान देने वाले कुल 17 देशों के राजदूत भी शामिल हुए, तो नालंदा विश्वविद्यालय में अध्ययन कर रहे कई देशों के छात्र-छात्राएं भी इस अवसर पर उपस्थित रहे।