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ईरान-गाजा पर बिलखने वालों को पाकिस्तान की हरकत पर सूँघा साँप: स्वरा से लेकर आरफा अफगनिस्तान पर खामोश, तरुण की हत्या पर भी नहीं फूटा था एक बोल

हमेशा सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होता कि किस घटना पर आवाज उठी बल्कि यह भी होता है कि कब-कब खामोशी चुनी गई और यह खामोशी कहीं मूक समर्थन तो नहीं थी। आज के दौर का सबसे बड़ा पाखंड ये ‘चुनी हुई चुप्पियाँ’ ही हैं। आज खामोशी की बात इसलिए क्योंकि कुछ दिनों पहले ईरान में अस्पताल में हमले पर छाती पीट रहा लेफ्ट-लिबरल गिरोह अफगानिस्तान में अस्पताल पर हमले पर खामोश है। वो हमला पाकिस्तान ने किया है, शायद खामोशी की वजह भी यही है। गाजा में भी यह गिरोह छाती बिलखता नजर आता है।

यह चुप्पी केवल किसी एक घटना तक सीमित नहीं है। कुछ दिनों पहले दिल्ली में होली पर हिंदू युवक तरुण की हत्या कर दी गई थी, तब इस गिरोह ने सुविधाजनक चुप्पी को चुना। क्यों? क्योंकि हत्या मुस्लिम कट्टरपंथियों ने की थी। अब जब लोग इस पर सवाल उठा रहे हैं, कई लोग उग्र बयानबाजी कर रहे हैं तो यह गिरोह एक्टिव हो गया है। यह गिरोह अब उस बयानबाजी की आड़ में हिंदुओं पर ही सवाल उठाने लगा है।

अगर मुस्लिम समुदाय के खिलाफ घटना हो तो यह गिरोह तुरंत एक्टिव हो जाता है। बयान आने लगते हैं, हैशटेग चलने लगते हैं और उसे ट्रेंडिंग टॉपिक बना दिया जाता है लेकिन जब हिंदुओं के खिलाफ हिंसा होती है तो वही चेहरे या तो चुप रहते हैं या फिर मुद्दे को किनारे कर देते हैं। असल में सवाल ये नहीं है कि किसके लिए आवाज उठी बल्कि सवाल ये है कि इस गिरोह की आवाज हर किसी के लिए बराबर क्यों नहीं उठती?

यह गिरोह कई चेहरे, कई रूपों में नजर आता है। खुद को पत्रकार बताने वाली आरफा खानम शेरवानी हों, RJ सायमा हों या स्वरा भास्कर और राजदीप सरदेसाई जैसे लोग हैं। इनका विलाप, इनकी चुप्पी एक तरफा है और यह ‘राजनीतिक लाभ’ और ‘एजेंडे’ से तय होते हैं।

इनके लिए इंसाफ का मतलब सबके लिए एक जैसा नहीं है। ये न्याय को धर्म और राजनीति के चश्मे से देखते हैं। जब भी इस्लामी कट्टरपंथ का कोई मामला आता है, तो ये एकदम चुप हो जाते हैं लेकिन जैसे ही इन्हें ‘हिंदू विरोध’ का मौका मिलता है, ये तुरंत शोर मचाना शुरू कर देते हैं।

पाकिस्तान-अफगानिस्तान संघर्ष: एजेंडे के कारण चुप्पी

इन कथित पत्रकारों और एक्टिविस्टों की एक बड़ी खासियत यह है कि जब संघर्ष ‘मुस्लिम बनाम मुस्लिम’ होता है तो इनका ‘मानवाधिकार’ सो जाता है। पिछले काफी समय से पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सीमाओं पर युद्ध जैसे हालात हैं, तालिबान और पाकिस्तानी फौज के बीच झड़पें हो रही हैं, मासूम मारे जा रहे हैं। लेकिन आरफा, सायमा, स्वरा या राजदीप ने इस पर कोई बड़ा कैंपेन नहीं चलाया।

इसका कारण साफ है- यहाँ कोई ‘हिंदू’ एंगल नहीं है, यहाँ ‘मोदी विरोध’ की गुंजाइश नहीं है। पाकिस्तान और अफगानिस्तान दोनों ही इस्लामिक मुल्क हैं, इसलिए वे समझ नहीं पाते कि किसका पक्ष लेने से उन्हें पब्लिसिटी मिलेगी या उनके एजेंडे को ‘प्रॉफिट’ होगा। जहाँ कट्टरपंथ को ‘विक्टिम कार्ड’ बनाकर पेश नहीं किया जा सकता, वहाँ ये लोग चुप्पी साधे रहते हैं।

ईरान के लिए ‘दिल’ और इजरायल के लिए ‘पत्थर’

पिछले कुछ समय से मिडिल ईस्ट (ईरान, अमेरिका और इजरायल) के बीच जंग जैसे हालात बने हुए हैं। इन ‘एजेंडा’ चलाने वाले पत्रकारों का सोशल मीडिया पेज देखें तो ऐसा लगता है जैसे ये पूरी तरह ईरान के साथ खड़े हैं और इजरायल-अमेरिका को कोसने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे। राजदीप सरदेसाई और आरफा खानम जैसे लोगों के लिए ईरान एक ‘बेचारा’ देश बन गया है।

राजदीप सरदेसाई अपने सोशल मीडिया पोस्ट में इस जंग को पूरी तरह ‘गलत’ और ‘अन्याय’ बताते हैं। उन्होंने तो यहाँ तक पूछ लिया कि ‘क्या इजरायल और अमेरिका मिलकर यह गलत लड़ाई नहीं लड़ रहे?’

लेकिन ताज्जुब की बात यह है कि जब ईरान परमाणु बम बनाने की कोशिश करता है या हमास जैसे उग्रवादी संगठनों को बढ़ावा देता है, तब राजदीप को कुछ भी ‘गलत’ नजर नहीं आता। उनकी चिंता और उनके ट्वीट केवल तब जागते हैं, जब उन्हें मिडिल ईस्ट के बहाने भारत सरकार पर निशाना साधने का मौका मिलता है।

आरफा खानम तो खुलेआम ईरान को ‘पूरी मुस्लिम दुनिया का सबसे बड़ा नेता’ बताने में जुट गई हैं। उन्होंने लिखा कि ‘यह समय ईरान का है और आज उसे जो सपोर्ट मिल रहा है, उसने उसे निर्विवाद लीडर बना दिया है।’ हैरानी की बात यह है कि आरफा ईरान की गुंडागर्दी और वहाँ की महिलाओं पर हो रहे जुल्मों को तो छिपा जाती हैं, लेकिन जैसे ही इजरायल कोई कदम उठाता है, वह उसे ‘बच्चों का कातिल’ बताने लगती हैं।

वहीं, एक वीडियो में जब उत्तम नगर के एक दुकानदार से तरुण मामले पर सवाल हुआ, तो उसने इसे ‘स्मॉल केस’ बताया। आरफा ने तरुण की मौत पर दुख जताने के बजाय हिंदुओं को ही कटघरे में खड़ा कर दिया।

सबसे बड़ी विडंबना तो देखिए, जब पाकिस्तान और अफगानिस्तान आपस में लड़ते हैं, तब ये सारे पत्रकार एकदम चुप हो जाते हैं। वजह साफ है, वहाँ दोनों तरफ मुस्लिम मुल्क हैं, इसलिए इसलिए वहाँ ‘विक्टिम कार्ड’ खेलने या ‘हिंदू-मुस्लिम’ विवाद पैदा करने का कोई मौका नहीं मिलता। ये समझ नहीं पाते कि किसका पक्ष लें जिससे उन्हें फायदा या पब्लिसिटी मिले। जहाँ राजनीति करने का मौका नहीं मिलता, वहाँ इनका दर्द भी गायब हो जाता है।

तरुण की हत्या पर सन्नाटा, लेकिन ईद पर ‘होली’ के नाम पर बवाल

दिल्ली के उत्तम नगर में हिंदू युवक तरुण की सरेआम और बहुत बेरहमी से हत्या कर दी गई। कैमरे की फुटेज में साफ दिख रहा था कि उसे कितनी क्रूरता से मारा गया, लेकिन खुद को ‘इंसानियत का रखवाला’ कहने वाले इन पत्रकारों ने तरुण के लिए एक ट्वीट तक नहीं किया। हैरानी की बात तो यह है कि जब प्रशासन ने कानून के तहत हत्यारों के घरों पर बुलडोजर चलाया, तब इन लोगों को अचानक ‘कानून और दर्द’ की याद आने लगी और वे उसके खिलाफ बोलने लगे।

आरजे सायमा ने तो तरुण की मौत पर दुख जताना भी जरूरी नहीं समझा। इसके बजाय उन्होंने सोशल मीडिया से वो वीडियो ढूँढ निकाले जिनमें कुछ लोग गुस्से में ‘ईद’ को लेकर बयानबाजी कर रहे थे। उन्होंने फौरन दिल्ली पुलिस और गृह मंत्रालय को टैग करना शुरू कर दिया और लिखा कि ‘ईद पर कुछ भी गलत हुआ तो यह सिस्टम की हार होगी।’ सायमा का पूरा ध्यान इस बात पर था कि ‘रिजवान’ नाम का लड़का कहाँ गायब है, उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ा कि तरुण के हत्यारों को सजा मिले या नहीं। उन्होंने तो उन पोस्ट्स को भी सपोर्ट किया जो हत्यारों का बचाव कर रहे थे।

वहीं आरफा खानम ने तरुण की मौत के बाद लोगों के गुस्से वाले एक वीडियो को शेयर करते हुए ताना मारा कि ‘मुबारक हो! भारत के हिंदू अब पूरी तरह कट्टरपंथी बन चुके हैं।’ आरफा को उस वीडियो में बोल रहे बच्चे के भविष्य की तो बहुत चिंता हुई, लेकिन उन्हें उस तरुण की कोई फिक्र नहीं थी जिसका भविष्य कट्टरपंथियों ने हमेशा के लिए खत्म कर दिया। ऐसा लगता है कि इनके लिए ‘आजाद ख्याल’ होने का मतलब सिर्फ हिंदू समाज को बुरा-भला कहना और दूसरी तरफ की कट्टरपंथियों की गलतियों पर पर्दा डालना ही रह गया है।

स्वरा भास्कर: चुनिंदा सहानुभूति की ‘क्वीन’

एक्ट्रेस से समाज सेवा (एक्टिविस्ट) की ओर मुड़ीं स्वरा भास्कर का सोशल मीडिया पेज किसी ‘एजेंडा मशीन’ की तरह काम करता है। दिल्ली के उत्तम नगर मामले में उन्होंने तरुण की मौत को नाम मात्र के लिए ‘दुखद’ तो कहा, लेकिन तुरंत सारा दोष हिंदुओं पर मढ़ दिया और उन पर ‘नफरत फैलाने’ का आरोप लगा दिया। उन्होंने पुराने मामलों का नाम लेकर डराना शुरू कर दिया कि अब दंगे हो सकते हैं, जबकि उन्हें उस हिंदू लड़के (तरुण) की हत्या करने वालों के खिलाफ सख्त लहजे में कुछ भी कहते नहीं देखा गया।

स्वरा ने इजरायल की सेना पर लगे आरोपों की लंबी-चौड़ी रिपोर्ट शेयर की और गंदे शब्दों का इस्तेमाल करके नफरत फैलाने की कोशिश की। लेकिन हैरानी की बात यह है कि जब ईरान में सरेआम महिलाओं को फाँसी दी जाती है या हिजाब न पहनने पर उन्हें बेरहमी से पीटा जाता है, तब स्वरा की ‘महिला सुरक्षा’ वाली बातें कहीं गायब हो जाती हैं। वहाँ हो रहे जुल्म पर उन्हें ‘सांप सूंघ जाता है’ और वह पूरी तरह खामोश रहती हैं।

स्वरा का दोहरापन तब और भी साफ दिखा जब आगरा के आदर्श कुमार की गिरफ्तारी हुई। उन्होंने तुरंत उसे उसके ‘हिंदू धर्म’ से जोड़ दिया और तंज कसा कि ‘कोई उसके धर्म को बुरा नहीं कहेगा क्योंकि वह मुस्लिम नहीं है।’ लेकिन जब भी किसी मुस्लिम अपराधी का नाम सामने आता है, तो वह उसे ‘गरीबी’ या ‘पैसों का आपसी विवाद’ बताकर बचाने की कोशिश करने लगती हैं। चाहे वह नूँह की घटना हो या कोई और मामला, उनके ट्वीट सिर्फ यह साबित करने के लिए होते हैं कि भारत में एक खास धर्म के लोगों के साथ अन्याय हो रहा है, जबकि वह दूसरे पक्ष के पीड़ितों को पूरी तरह नजरअंदाज कर देती हैं।

लॉरा लुमर का जवाब और आरफा की तिलमिलाहट

अभी हाल ही में जब विदेशी पत्रकार लॉरा लुमर ने राजदीप सरदेसाई को टोकते हुए साफ कह दिया कि ‘इस्लाम से डरना कोई बीमारी नहीं है, बल्कि यह एक हकीकत है और इसे गलत कहना बेवकूफी है,’ तो यह सुनकर आरफा खानम आगबबूला हो गईं। आरफा ने फौरन उनके खिलाफ पोस्ट किया और लिखा कि ‘भारत कभी हिंदू राष्ट्र नहीं था और न ही कभी बनेगा।’ उन्होंने तो उस न्यूज चैनल (इंडिया टुडे) की भी जमकर बुराई की जिसने लॉरा को बोलने का मौका दिया था।

यह बात साफ तौर पर दिखाती है कि ये लोग अपने से अलग राय रखने वालों को बिल्कुल भी झेल नहीं पाते। इनके लिए ‘लोकतंत्र’ और ‘अपनी बात कहने की आजादी’ का मतलब सिर्फ तब तक है, जब तक सब इनके हिसाब से बोलें। जैसे ही कोई इनके एजेंडे के खिलाफ सच बोल देता है, ये उसे दबाने और चुप कराने की कोशिश में जुट जाते हैं।

सुनील शेट्टी बनाम बॉलीवुड का सन्नाटा

जहाँ स्वरा और आरफा, सायमा, जैसे लोग गाजा और ईरान के लिए रोते हैं, वहीं बॉलीवुड अभिनेता सुनील शेट्टी ने एक अलग स्टैंड लिया। उन्होंने काबुल में हमले पर लिखा, “जो काबुल में हुआ वह विनाशकारी है। सभी युद्ध रुकने चाहिए। हम मानवता के साथ खड़े हैं। भारत शांति के साथ खड़ा है”

सुनील शेट्टी का यह पोस्ट इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जहाँ स्वरा भास्कर और उनका गिरोह केवल एकतरफा पोस्ट करता है, वहीं सुनील शेट्टी ने उस अफगानिस्तान के लिए आवाज उठाई है। यह दिखाता है कि बॉलीवुड में भी कुछ लोग सचमुच ‘शांति’ चाहते हैं, जबकि स्वरा जैसे ‘इडियट्स’ केवल सिलेक्टिव आउटरेज (चुनिंदा नाराजगी) के भूखे हैं।

पत्रकारिता के नाम पर समाज के साथ विश्वासघात

इन ‘एजेंडा’ चलाने वाले पत्रकारों का पूरा काम ‘चुनिंदा हमदर्दी’ पर टिका है। ये असल में पत्रकार नहीं हैं, बल्कि एक खास सोच को बेचने वाले सेल्समैन की तरह काम करते हैं। राजदीप सरदेसाई के लिए पत्रकारिता का मतलब सिर्फ सरकार का विरोध करना रह गया है, चाहे इसके लिए उन्हें देश की अर्थव्यवस्था को लेकर लोगों को डराना ही क्यों न पड़े।

आरफा खानम और आरजे सायमा के लिए मानवाधिकारों का मतलब सिर्फ एक खास समुदाय के हितों तक सीमित है। उनके लिए तरुण जैसे हिंदू युवक की जान की कोई कीमत नहीं है, लेकिन अगर मामला ‘रिजवान’ का हो, तो वे पूरा आसमान सिर पर उठा लेते हैं।

वहीं स्वरा भास्कर जैसी हस्तियाँ केवल आग में घी डालने का काम करती हैं। वे हर अपराध को धर्म के चश्मे से देखती हैं और समाज को आपस में बाँटने की कोशिश करती हैं।

इनकी असलियत यह है कि ये एक पूरे सिस्टम (इको-सिस्टम) के इशारे पर चलते हैं। इन्हें ईरान में हो रहे अत्याचारों में ‘बहादुरी’ दिखती है, लेकिन दिल्ली की सड़कों पर हिंदू युवाओं की बेरहमी से हत्या होने पर इन्हें कोई दुख नहीं होता। यह पत्रकारिता नहीं, बल्कि समाज के खिलाफ एक छिपी हुई जंग है, जिसका मकसद सिर्फ पब्लिसिटी पाना और विदेशी एजेंडे को बढ़ावा देना है।

उठना-बैठना-बोलना-मिलना… सबकी मिलती है प्रॉपर ट्रेनिंग: मिस्टर फैजू ने ‘The 50’ में खोला जो राज, उससे बीवी को धर्मान्तरित करने वाला अदनान कर पाया हिन्दू लड़की से बात

मैं कभी-कभी ‘द 50’ नाम का एक रियलिटी शो देखता हूँ, जिसमें इन्फ्लुएंसर्स और सेलिब्रिटी अलग-अलग टास्क करते हैं। वे यह सब अपने लिए नहीं, बल्कि अपने फैंस के लिए पैसे जीतने के उद्देश्य से करते हैं। यह ऐसा कार्यक्रम नहीं है जिसे बौद्धिक रूप से समृद्ध होने के लिए देखा जाए। ज्यादातर समय यह सिर्फ हल्का-फुल्का, बिना दिमाग लगाए देखने वाला मनोरंजन होता है, जिसे लोग दिनभर की थकान के बाद आराम करने के लिए देखते हैं।

यह वही तरह का शो है जिसे आप तब लगाते हैं जब आप थोड़ी देर के लिए अपने दिमाग को आराम देना चाहते हैं। हालाँकि, कई बार ऐसा साधारण मनोरंजन भी अनजाने में कुछ कहीं ज्यादा असहज और चिंताजनक बातें सामने ला देता है।

बातचीत के दौरान फैजल शेख, जिन्हें लाखों लोग ‘मिस्टर फैजू’ (Mr Faisu) के नाम से जानते हैं, उसने अन्य प्रतिभागियों के साथ अपनी लोकप्रियता और एक इन्फ्लुएंसर के रूप में अपनी यात्रा पर चर्चा करते हुए अपने करियर के शुरुआती दिनों को याद किया और बताया कि शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म्स के लोकप्रिय होने के बाद चीजें कैसे बदलीं।

उसी बातचीत में उन्होंने एक ऐसी बात कही जो मेरे मन में रह गई। उन्होंने बताया कि जिस कंपनी के साथ उन्होंने समझौता किया था, उसने उनके ग्रूमिंग पर काफी खर्च किया था। उनके अनुसार, वे ऐसी कक्षाओं में शामिल हुए जहाँ उन्हें सही तरीके से खाना, बैठना, सार्वजनिक जगहों पर व्यवहार करना और खुद को एक सज्जन के रूप में प्रस्तुत करना सिखाया गया।

पहली नजर में यह सिर्फ सोशल मीडिया की हस्तियों के लिए ट्रेनिंग जैसा लगता है। यहाँ तक कि सेलिब्रिटीज और कुछ अमीर परिवारों के बच्चे भी ऐसी ट्रेनिंग लेते हैं। ये लोग अक्सर एक प्रतियोगी माहौल में काम करते हैं, जहाँ प्रस्तुति का महत्व कंटेंट जितना ही होता है। इस नजरिए से देखें तो ग्रूमिंग, खुद को एक ब्रांड के रूप में स्थापित करने की प्रक्रिया का एक सामान्य हिस्सा भर है।

हालाँकि, जितना अधिक मैंने उस बात के बारे में सोचा, उतना ही यह विचार असहज लगने लगा। क्योंकि ग्रूमिंग सिर्फ खाने-पीने के तौर-तरीकों तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह एक व्यक्तित्व गढ़ने की प्रक्रिया होती है।

इन्फ्लुएंसर की ग्रूमिंग और एक आदर्श पब्लिक इमेज का निर्माण

फैजल के बयान में एक छोटी-सी बात खास ध्यान देने लायक है। जब उसने ग्रूमिंग क्लासेस का जिक्र किया, तो उसने खुद के लिए मैं नहीं, बल्कि बार-बार ‘हम’ शब्द का इस्तेमाल किया। यानी यह ट्रेनिंग सिर्फ उनकी ही नहीं हुई थी, बल्कि एक पूरे समूह के साथ हुई थी और वह समूह था प्रसिद्ध सोशल मीडिया कलेक्टिव ‘टीम 07’, जो टिकटॉक, इंस्टाग्राम और अन्य प्लेटफॉर्म्स के जरिए साथ-साथ लोकप्रिय हुआ।

अगर उनके समूह को इस तरह ग्रूम किया गया था, तो यह मानना गलत नहीं होगा कि और भी निवेशक दूसरे इन्फ्लुएंसर्स या उनके समूहों को इसी तरह तैयार कर रहे होंगे। समय के साथ हमने यह भी देखा है कि ये इन्फ्लुएंसर्स कुछ साल पहले जैसे होते हैं, कुछ समय बाद ये उससे काफी अलग हो जाते हैं। उन्हें कैसे बैठना है, खाना है और सज्जन की तरह व्यवहार करना है सिखाने वाली ये क्लासेस दरअसल पूरे इन्फ्लुएंसर इकोसिस्टम को एक खास तरीके से ढालने की सुनियोजित कोशिश का हिस्सा होती हैं।

सिर्फ एक इन्फ्लुएंसर होने के नजरिए से देखें, तो अच्छे व्यवहार सीखने में कोई बुराई नहीं है। बल्कि ऐसे समय में, जब कई ऑनलाइन हस्तियाँ सस्ती लोकप्रियता और अश्लीलता के सहारे आगे बढ़ती हैं, अनुशासन और शालीनता का विकास सकारात्मक भी लग सकता है।

लेकिन ग्रूमिंग का एक दूसरा पहलू भी है यह एक सोच-समझकर बनाई गई सार्वजनिक छवि तैयार करती है। एक ऐसा इन्फ्लुएंसर जो विनम्र, सम्मानजनक और अनुशासित दिखाई देता है, वह स्वाभाविक रूप से लोगों की प्रशंसा हासिल करता है।

इसमें शारीरिक फिटनेस, करिश्मा और सोशल मीडिया की बड़ी पहुँच जुड़ जाए, तो इसका असर और भी गहरा हो जाता है। ऐसे लोग प्रेरणादायक बन जाते हैं, लोग उन्हें पसंद करते हैं, उनकी नकल करते हैं और उन पर भरोसा भी करने लगते हैं।

‘द 50’ देखते हुए यह साफ नजर आता है कि यह व्यक्तित्व कैसे सामने आता है। अन्य प्रतिभागी फैजल के व्यवहार और अनुशासन की तारीफ करते हैं। वह टास्क अच्छे से करते हैं, आत्मविश्वास से भरे नजर आते हैं और उनका व्यक्तित्व संतुलित व नियंत्रित लगता है। यह समझना आसान है कि खासकर युवाओं के बीच उनकी इतनी बड़ी फैन फॉलोइंग क्यों है।

फिर भी, इस तरह की सुनियोजित ग्रूमिंग एक अहम सवाल खड़ा करती है, जब किसी व्यक्तित्व को जानबूझकर इतना प्रभावशाली और भरोसेमंद बनाया जाता है, तो उसका अपने फॉलोअर्स पर असल में कितना और कैसा प्रभाव पड़ता है? और अगर, जैसा कि हम शब्द से संकेत मिलता है, यह प्रक्रिया पूरे समूह पर लागू होती है, तो इसका असर सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उससे कहीं ज्यादा व्यापक हो जाता है।

अदनान शेख और रिद्धि जाधव की कहानी

‘टीम 07’ और ‘द 50’ शो से जुड़ा एक और नाम अदनान शेख है। फैजल (फैजू) की तरह ही वह भी सोशल मीडिया के जरिए प्रसिद्ध हुआ और दोनों ने लगभग साथ ही लोकप्रियता हासिल की। अदनान की भी सोशल मीडिया पर अच्छी-खासी फॉलोइंग है। शो में उन्होंने अपने निकाह के बारे में कोई चर्चा नहीं की, लेकिन फैजू के साथ उनकी नजदीकियों ने मुझे उनके बारे में थोड़ा और खोजने के लिए मजबूर किया।

दिलचस्प बात यह है कि अदनान की कहानी सिर्फ सोशल मीडिया तक सीमित नहीं है। उनकी बीवी पहले रिद्धि जाधव के नाम से जानी जाती थीं, जो एक हिंदू महिला और एक इन्फ्लुएंसर थीं। बाद में उन्होंने इस्लाम कबूल लिया और अदनान से निकाह के बाद अपना नाम आयशा शेख रख लिया।

हाल ही में यह अदान और उसकी बीवी को ईद से पहले खरीदारी करते हुए सार्वजनिक रूप से देखा गया। सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीरों और वीडियो में रिद्धि उर्फ आयशा बुर्का पहने हुए दिखीं। जिसके बाद एक बार फिर उनके धर्म परिवर्तन और निकाह को लेकर चर्चाएँ तेज हो गईं।

रिपोर्ट्स में पहले यह भी सामने आया था कि रिद्धि का परिवार अदनान से निकाह को लेकर कभी राजी नहीं था और इसीलिए दोनों के निकाह में रिद्धी के परिवार से कोई भी शामिल नहीं हुआ। यह मामला 2024 में उनके निकाह के दौरान भी विवाद का कारण बना था, जब अदनान की बहन के आरोपों के बाद सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई थी।

इंटरव्यू में अदनान ने इस विवाद पर अपनी सफाई देते हुए कहा कि धर्म परिवर्तन आयशा का व्यक्तिगत निर्णय था। उन्होंने यह भी कहा कि भारत में धर्म की स्वतंत्रता है और किसी को जबरन धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

पहली नजर में तो यह स्पष्टीकरण सीधा और स्पष्ट लगता है। लेकिन इस कहानी में एक और दिलचस्प पहलू है, जिसका जिक्र खुद अदनान ने पहले किया था। एक पुराने इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि उन्होंने रिद्धि को पहली बार कई साल पहले देखा था, जब वह खालसा कॉलेज में पढ़ाई कर रही थीं। उनके अनुसार, शुरुआत में रिद्धि ने उन पर ध्यान नहीं दिया। अदनान ने कहा कि उन दिनों वह उनका ध्यान आकर्षित करने के लिए उनके आसपास बाइक से स्टंट किया करते थे।

कई सालों बाद दोनों ने निकाह कर लिया। निकाह से पहले रिद्धि ने इस्लाम धर्म अपनाया और एक नई मजहबी पहचान स्वीकार की। अदनान का एक और बयान भी ध्यान देने योग्य है, उन्होंने खुलकर कहा है कि उनके जीवन में धर्म सबसे पहले आता है।

जब हम सभी परिस्थितियों और तथ्यों को एक साथ रखते हैं, तो यह मामला उतना सरल नहीं दिखता, जितना सार्वजनिक चर्चाओं में व्यक्तिगत पसंद के रूप में पेश किया जाता है। इसके बजाय यह एक कहीं अधिक जटिल तस्वीर सामने लाता है।

दिलचस्प बात यह है कि विवाद के बाद अदनान ने टेली रिपोर्टर को बताया कि उनकी बीवी का चेहरा सोशल मीडिया पर नहीं दिखाया जाता, क्योंकि यह उनके मजहबी विश्वासों से जुड़ा हुआ है। उन्होंने इसे अपनी इस्लामी रसूल से प्रेरित एक व्यक्तिगत निर्णय बताया।

जब प्रशंसा बन जाती है प्रभाव

आधुनिक इन्फ्लुएंसर अर्थव्यवस्था भावनात्मक जुड़ाव पर टिकी होती है। फॉलोअर्स को ऐसा महसूस होता है जैसे वे जिन लोगों को ऑनलाइन देखते हैं, उन्हें वास्तव में जानते हैं। वे उनके लाइफस्टाइल, व्यक्तित्व और उनके व्यवहार करने के तरीके की सराहना करते हैं।

समय के साथ यह सराहना अक्सर भरोसे में बदल जाती है। और एक बार भरोसा बन जाए, तो प्रभाव डालना लगभग तय हो जाता है। यहीं से यह चर्चा एक बड़े सांस्कृतिक विमर्श से जुड़ने लगती है, जो हाल के वर्षों में बार-बार सामने आया है।

भावनात्मक रिश्तों के जरिए धर्म परिवर्तन की कथाएँ अलग-अलग संदर्भों में उभरी हैं, जिनमें लोकप्रिय संस्कृति भी शामिल है। ‘द केरल स्टोरी’ जैसी फिल्मों ने एक ऐसे पैटर्न को दिखाने की कोशिश की, जिसमें युवा महिलाओं को रिश्तों के जरिए धीरे-धीरे वैचारिक प्रभाव में लाया जाता है और अंततः धर्म परिवर्तन तक बात पहुँचती है। कोई इस फिल्म के चित्रण से सहमत हो या नहीं, लेकिन इसका मूल विचार सरल था भावनात्मक संबंध कभी-कभी प्रभाव और मनाने का माध्यम बन सकते हैं।

फिल्म में यह दिखाया गया कि हिंदू महिलाओं को बार-बार हिंदू धर्म के खिलाफ बातें कहकर प्रभावित किया गया और अंततः उन्हें धर्म परिवर्तन और निकाह के लिए मजबूर किया गया। पहले जो ब्रेनवॉशिंग छोटे तौर से होती थी, आज के समय में वह कहीं अधिक खुलकर सामने आने लगी है और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने इसे और आसान बना दिया है।

दोस्ती और प्रेम संबंध किसी व्यक्ति के विचारों और पहचान को इस तरह प्रभावित कर सकते हैं, जिसे वह उस समय पूरी तरह समझ भी नहीं पाता। सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स के दौर में, जहाँ व्यक्तित्व को जानबूझकर आकर्षक, अनुशासित और प्रभावशाली बनाने के लिए तैयार किया जाता है, इस तरह के प्रभाव का दायरा और भी बढ़ जाता है।

सराहना से भावनात्मक जुड़ाव बनता है, भावनात्मक जुड़ाव से भरोसा पैदा होता है और भरोसा अक्सर गहरे प्रभाव में बदल जाता है। हालाँकि, यह कहना कि यह प्रभाव अधिकतर मामलों में किसी खास धर्म में धर्म परिवर्तन की ओर ही ले जाता है, एक सामान्यीकरण है ऐसे मामलों को हर परिस्थिति पर लागू करना सही नहीं माना जा सकता।

हिंदू समाज के भीतर असहज अंतर

शायद इस पूरी चर्चा का सबसे असहज पहलू व्यक्तियों के एक्शन में नहीं, बल्कि उस समाज की स्थिति में छिपा है जो इन्हें देख रहा है। कई आधुनिक हिंदू परिवार धीरे-धीरे धर्म पर सार्थक चर्चा से दूर होते गए हैं। आस्था अक्सर त्योहारों, रस्मों और कभी-कभार मंदिर जाने तक सीमित रह गई है।

बच्चे परंपराएँ तो मनाते हुए बड़े होते हैं, लेकिन उन्हें उनके पीछे की दार्शनिक और सांस्कृतिक आधार की गहरी समझ शायद ही दी जाती है। धर्म एक गहराई से समझी जाने वाली चीज के बजाय सिर्फ एक प्रतीक बनकर रह जाता है।

इसी दौरान, युवा एक ऐसे माहौल में रहते हैं जहाँ अन्य समुदायों में धार्मिक पहचान अक्सर ज्यादा स्पष्ट और साफतौर पर दिखाई देती है। यह अंतर एक सूक्ष्म असंतुलन पैदा कर सकता है। जिस युवा को अपने ही विश्वास और पहचान की स्पष्ट समझ नहीं होती, वह भावनात्मक रिश्तों के प्रभाव में आकर किसी अन्य विचार या विश्वास को आसानी से अपना सकता है।

ऐसे वातावरण में करिश्माई व्यक्तित्व और प्रभावशाली लोग बहुत बड़ा सांस्कृतिक प्रभाव डाल सकते हैं। जब किसी व्यक्ति को अपनी पहचान के बारे में स्पष्टता नहीं होती, तो उसकी प्रशंसा आसानी से वैचारिक प्रभाव में बदल सकती है।

इसलिए मुद्दा केवल अंतरधार्मिक रिश्तों का नहीं है। भारत हमेशा से एक ऐसी सभ्यता रहा है जहाँ अनेक धर्मों ने साथ-साथ संवाद और सह-अस्तित्व का रास्ता अपनाया है। असल सवाल यह है कि क्या लोग इन रिश्तों में अपनी पहचान की स्पष्ट समझ के साथ प्रवेश करते हैं या नहीं।

एक रियलिटी शो से असहज सबक

ये सभी विचार मुझे फिर से याद आए, जब मैं ‘द 50’ का वह सामान्य सा एपिसोड देखता रहा। ऑफिस में टीम के साथ हुई एक चर्चा के दौरान यह बात सामने आई और मुझे लगा कि कभी-कभी छोटी-छोटी बातें भी मायने रखती हैं।

इन्फ्लुएंसर ग्रूमिंग पर एक साधारण बातचीत अचानक एक बहुत बड़े तंत्र की झलक जैसी लगने लगी। फैजू की ग्रूमिंग को लेकर कही गई बातों ने यह दिखाया कि किस तरह इन्फ्लुएंसर्स की पर्सनैलिटी को बेहद सावधानी से गढ़ा जा सकता है। शिष्टाचार, अनुशासन और प्रस्तुति पर जोर देकर ऐसे व्यक्तित्व तैयार किए जाते हैं, जो लाखों दर्शकों को प्रभावशाली और भरोसेमंद लगते हैं।

वहीं, अदनान की कहानी यह दिखाती है कि एक आकर्षक व्यक्तित्व और व्यक्तिगत रिश्ते किस तरह पहचान, विश्वास और धार्मिक प्रतिबद्धता जैसे मुद्दों से जुड़कर गहरी बहस को जन्म दे सकते हैं।

ये सिर्फ दो इन्फ्लुएंसर हैं एक ने बताया कि वह आज जो है, वह कैसे बना और दूसरे की कहानी में यह दिखा कि उनकी बीवी रिद्धि से आयशा कैसे बनी। हालाँकि, ऐसे व्यक्तिगत मामलों को व्यापक निष्कर्षों से जोड़ते समय सावधानी जरूरी होती है, क्योंकि हर व्यक्ति और परिस्थिति अलग होती है।

शायद असली सवाल फैजू या अदनान जैसे व्यक्तियों के बारे में नहीं है, बल्कि उस समाज के बारे में है जो उन्हें देख रहा है। कभी-कभी एक साधारण सा शो भी हमारे आसपास हो रही जटिल सच्चाइयों की झलक दिखा देता है। लेकिन यह समझना भी उतना ही जरूरी है कि किसी एक उदाहरण के आधार पर पूरे समाज या किसी विशेष समुदाय के बारे में सामान्य निष्कर्ष निकालना सही नहीं होता।

(मूलरूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

गंगा में हड्डी ही तो फेंकी है, हिंदू तो अस्थियाँ बहाते हैं… पढ़िए कैसे लेफ्ट-लिबरल गैंग कर रहा मुस्लिम युवकों की घृणा का बचाव, कॉन्ग्रेसी बता रहे ‘इफ्तार’

उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले से गंगा नदी में नॉनवेज बिरयानी खाकर इफ्तार पार्टी करते नाव पर सवार कुछ मुस्लिम युवकों का वीडियो सामने आया। वीडियो पर संज्ञान लेते हुए बीजेपी के महानगर युवा अध्यक्ष रजत जायसवाल ने FIR दर्ज करवाई। पुलिस ने कार्रवाई करते हुए 14 लोगों को गिरफ्तार किया। अब इस घटना पर कॉन्ग्रेस और लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम इन मुस्लिम लोगों का बचाव करने पर उतर गया है।

कॉन्ग्रेसियों को सनातन धर्म में पवित्र माने जाने वाली गंगा नदी में नॉनवेज बिरयानी का सेवन करना गलत नहीं लगा। उल्टा सनातनियों की आस्था पर सवाल करना शुरू कर दिया। कॉन्ग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत का सवाल है कि आखिर इन मुस्लिम लोगों ने कौन-सा कानून तोड़ा है? वह पूछती हैं कि इनका पाप क्या है? और यह पूछते हुए वह समाज पर सवाल खड़े करती हैं कि आज के समय में समाज किस ओर जा रहा है?

क्योंकि वे आरोपित मुस्लिमों के असली पाप को अपने पोस्ट में खुद ही छिपा लेती हैं। उनकी जानकारी में यह सिर्फ एक इफ्तार पार्टी थी, जिसे रमजान के महीने में हर मुस्लिम को करने का मजहबी हक है। लेकिन वह इस तथ्य को छिपाती हैं कि वह पवित्र गंगा नदी में नॉनवेज खा रहे थे और यह भी कि उन्होंने चबाई हुई हड्डियाँ तक माँ गंगा के पवित्र जल में फेंकीं। और यह कृत्य बिंदू माधव के धरहरा मंदिर के ठीक सामने किया गया।

इफ्तार पार्टी बताकर इसे सही ठहराने वाली कॉन्ग्रेस किस मदरसे की दीन दे रही है, क्योंकि मौलवी तो खुद इसे गलत ठहरा रहे हैं। वाराणसी के ही अंजुमन इन्तेजामिया मसाजिद के संयुक्त सचिव एसएम यासीन ने इसकी निंदा की है। उन्होंने कहा कि इफ्तार एक शुद्ध धार्मिक कार्य है, कोई पिकनिक नहीं है। उन्होंने यह भी साफ कहा कि इफ्तार के बाद तुरंत मगरिब की नमाज जरूरी है।

कॉन्ग्रेस तथ्यों को आसानी से छिपाना जानती है, क्योंकि इससे उन मुस्लिम लोगों की सच्चाई सामने आती है कि उन्होंने ऐसा जानबूझ कर किया था। शायद यह कॉन्ग्रेस के लिए सेकुलरिज्म दिखाने का तरीका हो सकता है। लेकिन यही कॉन्ग्रेस दिल्ली के उत्तम नगर में हिंदू युवक तरुन की हत्या पर सवाल नहीं करती, तब नहीं पूछती कि उसका पाप क्या था? तब पूछा नहीं जाता कि होली पर सिर्फ एक गुब्बारा फेंकने पर क्यों मुस्लिमों की भावनाएँ आहत हो जाती हैं? इन मामलों में देश को कट्टर मजहबी मानसिकता की ओर बढ़ते देखे जाने पर सवाल नहीं किए जाते हैं।

गंगा में हड्डियाँ फेंकना अपराध नहीं, और अस्थियाँ विसर्जित करने पर सवाल

लेकिन वाराणसी के इस मामले को लेकर सनातन लोगों की आस्था क्यों आहत हुई? इस पर कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम धड़ल्ले से सवाल कर रहा है। बिना यह जाने कि सनातन में गंगा नदी और बनारस के घाटों की क्या मान्यताएँ हैं। ऐसे ही इस्लामी कट्टरपंथी विचारधारा के वसीम अकरम त्यागी की भी परेशानी सुप्रिया श्रीनेत जैसी ही है। वही भी पूछ रहे हैं कि गिरफ्तार किए गए मुस्लिम लोगों का अपराध क्या है? इतना ही नहीं वे गंगा नदी की पवित्रता पर भी सवाल उठा रहे हैं।

वसीम अकरम का कहना है, “अपराध क्या है? नाव में चिकन बिरयानी खाना या गंगा में हड्डी फेंकना? अब सवाल यह है कि यह अपराध कैसे है? अगर यह अपराध है तो फिर इसी गंगा में अस्थियाँ विसर्जित की जाती हैं! तब तो वो भी अपराध है? इसी गंगा के तट पर जगह-जगह शमशान घाट हैं, जली अधजली लाशें उसमें बहा दी जाती हैं, तब तो वह भी अपराध है? इसी गंगा में जाने कितने ऐसे जीव हैं जो मांसाहारी हैं, तब उनका गंगा में रहना ही अपराध है? सरकार गंगा से उन तमाम जीवों को बाहर निकालेगी?”

यह व्यक्ति गंगा नदी में हड्डी फेंकने पर पूछता है कि अपराध क्या है? और इसी हवाले से गंगा में अस्थियाँ विसर्जित करना इसे अपराध लगने लगता है। इतना ही नहीं गंगा के पास शमशान घाट से लेकर नदी में जीवों से भी इसे परेशानी होने लगती है। सिर्फ इसीलिए क्योंकि इसके मुस्लिम भाइयों के कृत्य पर पुलिस ने संज्ञान लिया, जो कि जानबूझ कर धार्मिक भावनाओं को उकसाने के लिए किया गया था। शायद इसे अस्थियाँ बहाने और हड्डियाँ फेंकने में कोई अंतर नजर नहीं आता।

क्या है गंगा नदी से जुड़ी हिंदुओं की आस्था? अस्थियों और हड्डियों में फर्क

वाराणसी के इस मामले में मुस्लिमों के इफ्तार पार्टी की करने से कोई दिक्कत नहीं है, समस्या यहाँ गंगा नदी में मांस खाने से है। जिसे वह इफ्तार पार्टी के नाम पर खा रहे हैं। गंगा नदी को हिंदू धर्म में सबसे पवित्र नदी मानी जाती है, जिसे देवी के रूप में पूजा जाता है। यह पापों का नाश करने वाली, मोक्ष प्रदान करने वाली और जीवन का आधार है।

वेद, पुराण, रामायण और महाभारत में गंगा को देवनदी कहा गया है। राजा भागीरथ की तपस्या से भगवान शिव ने गंगा को स्वर्ग से धरती पर उतारा, ताकि सगर के 60,000 पुत्रों को मोक्ष मिले। गंगा स्नान से पाप धुलते हैं और पुण्य प्राप्ति होती है। सनातन धर्म में गंगा नदी का जल पूजा-अर्चना, अभिषेक और शुद्धिकरण में जरूरी है। कुंभ मेला जैसा उत्सव गंगा तट पर होते हैं। इसे जीवनदायिनी माँ गंगा कहा जाता है।

बात है गंगा नदी में अस्थियाँ विसर्जित करने की तो, गरुण पुराण के अनुसार, दाह संस्कार के बाद अस्थियाँ गंगा में विसर्जित करने से मृत आत्मा को मोक्ष, स्वर्ग या ब्रह्मलोक मिलता है। गंगा स्वर्ग से आई होने से पितरों की आत्मा मुक्त हो जाती है, पुनर्जन्म चक्र टूटता है।

गंगा नदी को लेकर हिंदू धर्म में ये सिर्फ कुछ मान्यताएँ हैं, ऐसी कई कथाएँ हैं जो गंगा नदी को लेकर प्रचलित हैं। जिन पर हिंदू धर्म टिका हुआ है। इन्हीं मान्यताओं के कारण हिंदू धर्म की भावनाओं का आहत होना संभव है। यहाँ हड्डियाँ फेंकने और अस्थियाँ बहाने का फर्क भी साफ हो जाता है। यही वजह है कि वाराणसी के मामले में मुस्लिमों द्वारा जानबूझ कर की गई नॉनवेज इफ्तार पार्टी से धार्मिक भावनाएँ होती हैं।

हिंदू सहिष्णु हो सकता है, लेकिन मुस्लिमों की तरह हिंसा के बजाए कानूनी कार्रवाई करना जानता है

गंगा नदी के प्रति हिंदुओं की आस्था को लेकर भारत का हर नागरिक वाखिफ है। शायद मुस्लिम इसे ज्यादा ठीक ढंग से समझते हैं। तभी जानबूझ कर इफ्तार पार्टी करने के लिए गंगा नदी पहुँच जाते हैं। यह सांप्रदायिक हिंसा भड़काने जैसा कृत्य नहीं तो और क्या है? क्या कभी किसी हिंदू को मस्जिद में हनुमान चालीसा पढ़ते देखा गया, नहीं। लेकिन आए दिन मंदिर के पास मांस के टुकड़े फेंक दिए जाते हैं।

यह जानबूझ कर नहीं, तो और किसलिए किया गया हो सकता है। जो कॉन्ग्रेसी और लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम सवाल पूछ रहा है कि वाराणसी के मामले में मुस्लिमों का क्या अपराध था? उनकी सेकुलर चादर सिर्फ हिंदुओं पर आकर ढक जाती है, जबकि मुस्लिमों को सेकुलरिज्म सिखाने के लिए उनकी चादर फट जाती है। क्योंकि सब जानते हैं कि हिंदू धर्म सहिष्णु है, वह मुस्लिमों की तरह अल्लाह के अपमान पर किसी का सर तन से जुदा नहीं करता।

वह कानूनी कार्रवाई करना जानता है, जैसा कि वाराणसी के मामले में हुआ भी। संविधान के तहत पहले पुलिस से शिकायत हुई और कानूनी प्रक्रिया के तहत गिरफ्तारी की गई। वह धर्म के नाम पर हिंसा फैलाना नहीं जानते हैं। बावजूद इन कॉन्ग्रेसी औऱ लेफ्ट लिबरल इकोसिस्म को देश की हालत सिर्फ इन मामलों में याद आती है, वही मुस्लिमों की कट्टरपंथ के नाम पर हिंसा पर चुप्पी साध लेते हैं। और मामूली इफ्तार पार्टी करने के लिए धार्मिक स्वतंत्रता की बात करते हैं।

ड्रोन उड़ाने की ली ट्रेनिंग, ‘नियो-नाजी अरट्टा’ से कनेक्शन भी एक्सपोज: जानिए NIA ने जिस यूक्रेनी नागरिक Marian Stefankiv को दबोचा, उसके बारे अब तक क्या पता चला

पटियाला हाउस कोर्ट की विशेष NIA कोर्ट ने 7 विदेशियों को एनआईए की हिरासत में भेज दिया गया है। एक अमेरिकी और 6 यूक्रेनियों को 11 दिनों तक राष्ट्रीय जाँच एजेंसी पूछताछ करेगी।

इनमें अमेरिका के मैथ्यू एरॉन वैन डाइक और यूक्रेन के हर्बा पेट्रो, स्लीव्याक तारास, इवान सुकमानोव्स्की, मारियन स्टेफानकिव, होनचारुक मैक्सिम और कामिंस्की विक्टर के रूप में हुई है। यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि NIA भारत विरोधी ग्रुपों को ड्रोन की आपूर्ति और मिजोरम के प्रतिबंधित क्षेत्रों से होकर म्यांमार जाने और भारत में अवैध प्रवेश से जुड़े आरोपों की जाँच कर रही है।

इसी बीच यूक्रेनी नागरिक मारियन स्टेफानकिव ( यूक्रेनी सोर्स में ‘मार्यान’ कहा गया है) के पिछले बयान से पता चलता है कि यूक्रेन में चल रहे संघर्ष के दौरान उन्हें ड्रोन संचालन का पहले से अनुभव था। ऐसे भी संकेत मिले हैं कि उसका संबंध ‘अरट्टा’ बटालियन से है। इस संगठन में नव-नाज़ी (neo-Nazi) विचारधारा के लोग भी शामिल हैं।

यूक्रेन के पत्रकार अनातोली शरीज ने सोशल मीडिया एक्स पर एक पोस्ट में कहा है कि स्टेफानकिव अरट्टा बटालियन से संबंधित हैं और मूल रूप से लविव क्षेत्र के रहने वाले हैं।


उनके बारे में आगे की जाँच करने पर OpIndia ने पाया कि 2020 में, स्टेफानकिव एक यूट्यूह वीडियो में दिखाई दिए थे। इसका शीर्षक था ‘एक नायक की कहानी: Marian Stefankiv, ‘Aratta’ बटालियन के स्वयंसेवक’।

वीडियो में स्टेफानकिव ने ड्रोन के बारे में बात की, उन्होंने कैसे ड्रोन बनाना सीखा, ये जानकारी दी। हालाँकि उस वक्त उनके परिवार को लगा कि वह पढ़ाई कर रहे हैं। उन्होंने कहा, “Батьки думали, що я здаю сесію в політехніці. Та насправді я вже вчився літати на безпілотниках” (00:02:01–00:02:06) (मेरे माता-पिता को लगा कि मैं पॉलिटेक्निक में अपने एग्जाम दे रहा हूँ। असल में मैं पहले से ही ड्रोन उड़ाना सीख रहा था।)

उन्होंने युद्ध के मैदान में ड्रोन के इस्तेमाल के बारे में भी बात की और कहा, “Але безпілотники це щось щось таке два в одному, скажемо так. Це і медик, і розвідник” (00:10:41–00:10:48) [“लेकिन ड्रोन कुछ इस तरह हैं जैसे एक में दो, ऐसा कह सकते हैं। वे एक मेडिक और एक स्काउट दोनों हैं”]। ड्रोन की ऑपरेशनल वैल्यू को और समझाते हुए उन्होंने कहा, “Та тому, що він спас чиєсь життя. хтось не пішов туди відночи зібрав інформацію” (00:10:48–00:10:56) [‘ वे किसी की जान बचाते हैं, क्योंकि खुद वहाँ जाने की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा कि जानकारी अभी भी इकट्ठा की जा रही होती है’]

वीडियो के दूसरे हिस्से में, स्टेफानकिव ने कहा कि उसने ड्रोन का इस्तेमाल करके जासूसी की, “…або через Маріуполь в Широкіно тоді робити аеророзвідку чи там воювати” (00:11:17–00:11:24) [“…उस समय मारियुपोल से शायरोकिने तक, हवाई जासूसी करने या वहाँ लड़ने के लिए”]।

स्टेफानकिव असल में यूक्रेन के एक शहर लविव का रहने वाला है। वह 2019 में बनाए गए एक NGO कोलो चेस्ती, या ‘सर्कल ऑफ ऑनर’ के फाउंडर्स में से एक है। 2022 में जब रूस ने यूक्रेन पर मिलिट्री स्ट्राइक की, तो वह अपने चार दोस्तों के साथ, मॉस्को के खिलाफ लड़ने के लिए यूक्रेनी आर्म्ड फोर्स में शामिल हो गए। द आयरिश टाइम्स की 2022 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 5 दोस्तों में से 2 की मौत हो गई।

(स्टेफानकिव की तस्वीर, साभार-आयरिस टाइम्स)

उसी 2020 के वीडियो में, उसने कहा, “Росія напала. Треба захищати” [“रूस ने हमला किया। हमें अपना बचाव करना चाहिए”] और “Війна не Ѐомантика” [“युद्ध रोमांचक नहीं है”]।

जैसे-जैसे NIA की जाँच चल रही है, यूक्रेनियों और अमेरिकन के ड्रोन की जानकारी और इसके इस्तेमाल का पता चल रहा है।

(डिस्क्लेमर: इस रिपोर्ट में जरूरत के हिसाब से AI ट्रांसक्रिप्शन और ट्रांसलेशन टूल्स का इस्तेमाल किया गया है।)

7 देशों पर हमला और 34 ट्रिलियन का कर्ज, Petro-Dollar का अंत: आखिर ट्रंप की बौखलाहट का कारण क्या है?

अमेरिका के हाल के दिनों के रुख को देखकर यह साफ संकेत मिल रहा है कि डोनाल्ड ट्रंप का प्रशासन अपनी ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति को लागू करने के लिए किसी भी स्तर तक जाने को तैयार है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह रणनीति अब और अधिक आक्रामक रूप में दिखाई दे रही है। फरवरी 2026 में एक महत्वपूर्ण घटना हुई जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ट्रंप ने एक ‘अंतरिम व्यापार ढाँचे’ की घोषणा की थी।

इस समझौते में भारतीय निर्यातकों को बड़ी राहत मिली थी और टैरिफ को 50% से घटाकर 18% कर दिया गया। हालाँकि, अमेरिकी विदेश नीति का यह संतुलन ज्यादा दिन नहीं टिक सका। ईरान-इजरायल-अमेरिका तनाव और ट्रंप प्रशासन की आक्रामक नीतियों ने इस कूटनीतिक मिठास को जल्दी ही खत्म कर दिया।

इसी बीच, अमेरिका ने अब एक बार फिर अपनी सख्त व्यापारिक रणनीति का संकेत देते हुए Section 301 (US Trade Act 1974) का सहारा लिया है। यह प्रावधान अमेरिका को यह अधिकार देता है कि वह किसी भी देश की व्यापार नीतियों की गहराई से जाँच कर सके। इस प्रक्रिया को अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) के माध्यम से संचालित किया जाता है।

यदि इस जाँच में किसी भी प्रकार की ‘अनुचित व्यापारिक प्रथाएँ’ (Unfair Trade Practices) सामने आती हैं तो अमेरिका को यह अधिकार मिल जाता है कि वह संबंधित देश पर अतिरिक्त टैरिफ लगा सके या मौजूदा व्यापारिक समझौतों को निलंबित कर दे। यह वही रणनीति है, जिसका इस्तेमाल ट्रंप प्रशासन ने अपने पिछले कार्यकाल में चीन के खिलाफ किया था।

ट्रंप की मजबूरी या सोची-समझी चाल?

अमेरिका की नीति में अचानक आए इस बदलाव के पीछे एक अहम वजह अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का हालिया फैसला माना जा रहा है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप प्रशासन के कुछ ग्लोबल टैरिफ टूल्स को स्ट्राइक डाउन यानी रद्द कर दिया था। इसके बाद से ही प्रशासन पर यह दबाव बढ़ गया कि वह अपने आर्थिक हितों की रक्षा के लिए नए रास्ते तलाशे।

ऐसे में अब ट्रंप प्रशासन वैकल्पिक उपायों के जरिए दबाव बनाने की कोशिश करता नजर आ रहा है। Section 301 जैसी कानूनी शक्तियों का सहारा लेना इसी रणनीति का हिस्सा है। अमेरिका का आरोप है कि भारत समेत दुनिया की 16 बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में ‘Structural Excess Capacity’ यानी जरूरत से कहीं अधिक उत्पादन क्षमता की समस्या है। अमेरिका का कहना है कि इन देशों में सरकारी सब्सिडी और नीतियों के कारण उद्योगों में उत्पादन क्षमता इतनी बढ़ गई है कि वे अपनी घरेलू जरूरत से ज्यादा सामान बना रहे हैं।

इसका सीधा असर वैश्विक बाजार पर पड़ रहा है। अमेरिका का दावा है कि इस ओवरप्रोडक्शन के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में वस्तुओं की भरमार हो रही है, जिससे कीमतें प्रभावित होती हैं और कई देशों को ट्रेड सरप्लस का फायदा मिलता है। वहीं, इसका नुकसान अमेरिकी उद्योगों और वहाँ के रोजगार पर पड़ता है।

ट्रंप प्रशासन इसे अमेरिकी नौकरियों के लिए खतरे के रूप में पेश कर रहा है। इसी आधार पर अब वह सख्त कदम उठाने की तैयारी में है ताकि घरेलू उद्योगों को सुरक्षा दी जा सके और वैश्विक व्यापार में अमेरिका की स्थिति को मजबूत किया जा सके।

भारत पर निशाना क्यों?

अमेरिका की नई व्यापारिक सख्ती में भारत भी सीधे निशाने पर आ गया है। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह ‘ट्रेड सरप्लस’ है यानी भारत, अमेरिका को उसकी खरीद से करीब $58 बिलियन अधिक का निर्यात करता है।

इसके अलावा ‘Excess Capacity’ (अधिक क्षमता) भी एक बड़ा कारण है। सोलर मॉड्यूल्स के मामले में भारत की उत्पादन क्षमता अपनी घरेलू माँग से लगभग तीन गुना अधिक है। यही स्थिति स्टील, टेक्सटाइल, पेट्रोकेमिकल्स और ऑटोमोटिव सेक्टर्स में भी है जिससे अमेरिका को ग्लोबल मार्केट में असंतुलन का खतरा नजर आता है।

हालाँकि इस जाँच के दायरे में सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि चीन, यूरोपियन यूनियन, जापान और वियतनाम समेत कुल 16 देश शामिल हैं। यदि यह जाँच आगे चलकर टैरिफ में बदलती है तो भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स, इंजीनियरिंग गुड्स और सोलर उपकरणों का निर्यात महँगा हो जाएगा। ऐसे में वैश्विक बाजार में एक नया ट्रेड वॉर शुरू हो जाएगा।

शांति से शक्ति पर लौटे ट्रंप?

जनवरी 2025 में ट्रंप ने खुद को शांति स्थापित करने वाले नेता के रूप में पेश करते हुए सत्ता संभाली थी। लेकिन सिर्फ एक साल के भीतर ही अमेरिका का रुख पूरी तरह बदलता नजर आया और उसने 7 देशों पर सीधे सैन्य हमले कर दिए।

हालात इतने गंभीर हो गए कि वेनेजुएला के राष्ट्रपति के अपहरण और ईरान के सुप्रीम लीडर की हत्या जैसी घटनाओं की चर्चा होने लगी। इन घटनाओं ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।

अब अमेरिका की नजर ग्रीनलैंड पर भी है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यह सब केवल तेल और संसाधनों के लिए हो रहा है या इसके पीछे डॉलर के उस वैश्विक दबदबे को बचाने की कोशिश है जिसे कुछ लोग कमजोर होता हुआ मान रहे हैं।

अमेरिका की बौखलाहट के पीछे क्या वजह है?

अमेरिका के आक्रामक रुख को समझने के लिए सबसे जरूरी है- नंबर्स को देखना। GDP की दौड़ में अब तस्वीर बदल रही है। 2026 के आँकड़ों के मुताबिक, BRICS+ देशों की संयुक्त GDP (PPP के आधार पर) वैश्विक GDP का करीब 37% से 40% तक पहुँच चुकी है। वहीं, G7 देशों (अमेरिका और उसके साथी) की हिस्सेदारी घटकर लगभग 29% रह गई है। यह बदलाव सीधे-सीधे वैश्विक ताकत के संतुलन को प्रभावित कर रहा है।

दूसरा बड़ा झटका ‘पेट्रो-डॉलर’ सिस्टम को लग रहा है। 1970 के दशक में हेनरी किसिंजर की पहल पर अमेरिका और सऊदी अरब के बीच एक अहम समझौता हुआ था, जिसके तहत तेल का व्यापार सिर्फ डॉलर में होता था। इससे डॉलर पूरी दुनिया की जरूरत बन गया। अब हालात बदल रहे हैं चीन और सऊदी अरब के बीच तेल का व्यापार युआन में होने लगा है, जिससे इस व्यवस्था की पकड़ कमजोर हो रही है।

डॉलर की स्थिति भी धीरे-धीरे कमजोर होती दिख रही है। IMF के अनुसार, वैश्विक रिजर्व करेंसी में डॉलर की हिस्सेदारी 2001 में 71% थी जो 2026 तक घटकर 58% से नीचे आ गई है। ऐसे में जब आर्थिक ताकत पर दबाव बढ़ता है और वैश्विक प्रभाव को चुनौती मिलने लगती है। सवाल यही है कि क्या अमेरिका अपनी ताकत दिखाने के लिए आक्रामक कदम उठा रहा है?

परफॉर्मेटिव रियलिज्म: ट्रंप की इंटरनल पॉलिटिक्स

क्या यह सिर्फ अमेरिका की विदेश नीति है? तस्वीर इससे कहीं बड़ी है। यह अंदरूनी राजनीति का दबाव भी है जो अब बाहरी फैसलों में झलक रहा है। सबसे पहले आर्थिक स्थिति को देखें। अमेरिका का राष्ट्रीय कर 34 ट्रिलियन डॉलर के पार पहुँच चुका है। ऐसे में डोनाल्ड ट्रंप के लिए डॉलर की वैश्विक माँग बनाए रखना बेहद जरूरी हो जाता है क्योंकि इसमें गिरावट अमेरिकी अर्थव्यवस्था को गंभीर संकट में डाल सकती है।

दूसरी तरफ घरेलू मोर्चे पर भी चुनौती बढ़ रही है। 2026 में ट्रंप की लोकप्रियता में गिरावट देखी जा रही है। महँगाई और टैरिफ वॉर से परेशान अमेरिकी जनता में असंतोष बढ़ा है और बड़ी संख्या में लोग इन नीतियों के खिलाफ खड़े नजर आ रहे हैं।

इसी संदर्भ में एक्सपर्ट्स ‘परफॉर्मेटिव रियलिज्म’ की बात करते हैं यानी ऐसी नीतियाँ और कार्रवाइयाँ जिनका उद्देश्य वास्तविक समाधान से ज्यादा अपनी ताकत का प्रदर्शन करना होता है। ईरान जैसे मामलों में की गई सैन्य कार्रवाई को कुछ विश्लेषक इसी नजरिए से देखते हैं, जहाँ कदम रणनीति से ज्यादा संदेश देने के लिए उठाए जाते हैं।

ट्रंप पर अंतरराष्ट्रीय दबाव भी कम नहीं है। NATO के पारंपरिक सहयोगी अब पहले जैसे साथ खड़े नहीं दिख रहे। कई यूरोपीय देशों के साथ मतभेद सामने आए हैं, जिससे अमेरिका की वैश्विक पकड़ पर असर पड़ा है। आर्थिक मोर्चे पर लिए गए फैसलों खासकर भारी टैरिफ और व्यापार युद्ध ने सप्लाई चेन को भी प्रभावित किया है। वहीं सुप्रीम द्वारा कुछ टैरिफ फैसलों पर रोक लगने से प्रशासन को झटका भी लगा है।

अमेरिका के सामने असली चुनौती उसकी आर्थिक स्थिति है यानी बढ़ता कर्ज, बजट घाटा और डॉलर पर निर्भरता। अगर दुनिया डॉलर से दूरी बनाती है तो ट्रेजरी बॉन्ड बेचना मुश्किल हो जाएगा, ब्याज दरें बढ़ेंगी और सरकार को या तो टैक्स बढ़ाने होंगे या सैन्य खर्च घटाना पड़ेगा। इसका सीधा मतलब होगा अमेरिका की ‘एकमात्र सुपरपावर’ वाली स्थिति पर असर पड़ेगा।

इसी दबाव का असर वैश्विक स्तर पर भी दिख रहा है। ग्लोबल साउथ के देश धीरे-धीरे अमेरिकी वित्तीय सिस्टम से दूरी बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जिसे ‘Decoupling’ कहा जा रहा है। उधर चीन इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपनी ताकत तेजी से बढ़ा रहा है। ऐसे में अमेरिका की नई रक्षा रणनीति भी संकेत देती है कि वह वैश्विक सुरक्षा का बोझ सहयोगी देशों पर डालते हुए अपने क्षेत्रीय प्रभुत्व को मजबूत करना चाहता है।

इस पूरे परिदृश्य में चाहे ट्रंप हों या कोई और राष्ट्रपति, अमेरिका की प्राथमिकताएँ लगभग एक जैसी ही रहतीं चीन के प्रभाव को सीमित करना, ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकना और BRICS देशों की डी-डॉलराइजेशन की कोशिशों को कमजोर करना। भू-राजनीतिक लक्ष्य वही हैं बस उन्हें हासिल करने के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं।

तेल पर अमेरिकी नियंत्रण की कोशिश

अमेरिका की हालिया कार्रवाइयों का पैटर्न देखने पर एक बात साफ उभरती है निशाने पर वही देश हैं जिनके पास बड़े ऊर्जा संसाधन हैं। जिन 7 देशों पर कार्रवाई की बात हो रही है, उनमें ईरान, इराक, नाइजीरिया, वेनेजुएला और सीरिया जैसे प्रमुख तेल उत्पादक शामिल बताए जाते हैं। वेनेजुएला में की गई कार्रवाई का लक्ष्य उसके विशाल तेल भंडार पर नियंत्रण बताया जा रहा है, जबकि ईरान के संदर्भ में इसे उभरते ऊर्जा गठबंधनों को कमजोर करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

नाइजीरिया में दिसंबर 2025 की एयर स्ट्राइक को कुछ विश्लेषक अफ्रीका में बढ़ते चीन के प्रभाव को सीमित करने और खनिज संसाधनों पर पकड़ मजबूत करने की रणनीति मानते हैं। नाइजीरिया के मामले में अमेरिका ने ‘Country of Particular Concern (CPC)’ का हवाला दिया यह टैग आमतौर पर धार्मिक स्वतंत्रता या मानवाधिकार के मुद्दों से जोड़ा जाता है। ऐसे लेबल कई बार कूटनीतिक दबाव बनाने के औजार बन जाते हैं।

ईरान ने निकाल दिया अमेरिका का ‘तेल’

इराक के युद्ध की तरह ही ट्रंप प्रशासन पर आरोप है कि उसने ईरान में ‘तत्काल परमाणु खतरे’ का दावा किया, जबकि अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) या अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के पास इसके स्पष्ट सबूत सामने नहीं आए।

यह संदेश सिर्फ ईरान के लिए नहीं बल्कि भारत और चीन जैसे देशों के लिए भी माना जा रहा है कि डॉलर से दूरी की कीमत भारी हो सकती है। लेकिन इसी रणनीति में एक बड़ी चुनौती भी छिपी है। ईरान जैसे देश पर हमला वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को सीधे प्रभावित करता है क्योंकि दुनिया की बड़ी तेल सप्लाई इस क्षेत्र से गुजरती है।

ऐसे में तेल की कीमतें 150 डॉलर तक पहुँचने का जोखिम बढ़ सकता है जिसका असर पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। किसी देश में घुसकर वहाँ के राष्ट्रपति को पकड़ लाना आसान है लेकिन युद्ध के बीच दुनिया की 20% तेल सप्लाई को बचाए रखना नामुमकिन है। तख्तापलट करना तो अमेरिका को आता है लेकिन $150 तक पहुँचने वाले तेल के दाम और टूटी हुई इकोनॉमी को संभालने का उसके पास कोई प्लान नहीं है।

अगला शिकार: ग्रीनलैंड और संसाधन युद्ध

अब नजर ग्रीनलैंड पर है, जो डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है जहाँ सिर्फ 56000 लोग रहते हैं। ट्रंप ने तो यहाँ तक कह दिया है कि ‘या तो ग्रीनलैंड हमें दे दो, वरना हम छीन लेंगे।’ कम आबादी वाला यह इलाका रणनीतिक और आर्थिक दोनों दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है।

पहला कारण इसकी लोकेशन है- यह ऐसा स्थान है जहाँ से अमेरिका, रूस और चीन की सैन्य गतिविधियों पर नजर रख सकता है। दूसरा कारण यहाँ मौजूद रेयर अर्थ मिनरल्स हैं, जो आधुनिक टेक्नोलॉजी स्मार्टफोन, इलेक्ट्रिक वाहन और AI के लिए जरूरी हैं। तीसरा कारण वैश्विक दबदबा है- अमेरिका नहीं चाहता कि उसके प्रतिद्वंद्वी यहाँ पैर जमाएँ।

अस्त होता अमेरिकी साम्राज्य का सूर्य

अमेरिका आज पहले जैसा संतुलित वैश्विक नेता नहीं रह गया है बल्कि एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहाँ उसकी साख और प्रभाव दोनों चुनौती के घेरे में हैं। इराक में बोले गए झूठ और अफगानिस्तान में मिली हार ने उसकी अजेय होने की छवि को खत्म कर दिया है, इसलिए अब वह अपनी गिरती हुई ‘सॉफ्ट पावर’ को सैन्य ताकत के जोर पर छिपाने की कोशिश कर रहा है।

आर्थिक मोर्चे पर भी स्थिति बदलती दिख रही है। लंबे समय तक वैश्विक वित्तीय व्यवस्था की रीढ़ रहा पेट्रो-डॉलर सिस्टम अब दबाव में है। BRICS जैसे समूहों का बढ़ता प्रभाव और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों पर काम इस बदलाव को साफ दिखाता है।

ब्रिक्स देश अब ‘BRICS Pay’ और डिजिटल मुद्राओं के जरिए डॉलर के बिना व्यापार करना सीख चुके हैं। भारत जैसी शक्तियाँ अब अमेरिका की धमकियों के आगे झुकने को तैयार नहीं हैं। इस तरह से अमेरिका की यह आक्रामकता उसकी मजबूती नहीं उसकी कमजोरी का सबसे बड़ा सबूत है। ऐसी ‘महाशक्ति’ जब संवाद छोड़ दे और सिर्फ डंडे का इस्तेमाल करे तो समझ लीजिए कि उस साम्राज्य का सूर्यास्त करीब है।

दक्षिण एशिया में ‘ईसाई राष्ट्र’ बनाने की कोशिश? यूक्रेनी-अमेरिकी ‘एजेंट्स’ की गिरफ्तारी से तेज हुई चर्चा: जानें- कैसे भारत-बांग्लादेश-म्यांमार में विदेशी मिशनरियाँ कर रही साजिश

अगस्त 2024 में तत्कालीन बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने अमेरिका की एक कथित साजिश को लेकर चेतावनी दी थी। उसके कुछ दिनों बाद ही उन्हें प्रधानमंत्री पद छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। शेख हसीना ने कहा था कि भारत के पूर्वोत्तर, बांग्लादेश और म्यांमार के कुछ हिस्सों को मिलाकर एक ईसाई राष्ट्र बनाने की साजिश रची जा रही है। तब से अब तक बहुत कुछ हुआ है, जिससे यह संकेत मिलता है कि उनकी बातों में दम था।

नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी यानी एनआईए ने 6 यूक्रेनी और एक अमेरिकी नागरिक को गिरफ्तार किया है। इनकी कड़ियों को अगर जोड़ा जाए, तो ये पता चलता है कि भारत-म्यांमार-बांग्लादेश सीमा क्षेत्र में अमेरिका की साजिश चल रही है।

सभी यूक्रेनी मिजोरम के रास्ते म्यांमार जाकर ‘चिन नेशनल आर्मी’ से जुड़े उग्रवादियों को हथियार और ट्रेनिंग दे रहे थे। एक अमेरिकी नागरिक कोलकाता एयरपोर्ट से गिरफ्तार किया गया।

इन विदेशी नागरिकों पर अवैध या आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए आपराधिक साजिश रचने के आरोप में ‘गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम’ (UAPA) की धारा 18 के तहत मामला दर्ज किया गया।

NIA द्वारा गिरफ्तार किए गए अमेरिकी नागरिक की पहचान मैथ्यू एरॉन वैन डाइक के रूप में हुई। वह ‘सन्स ऑफ लिबर्टी इंटरनेशनल’ (SOLI) के संस्थापक हैं, जो एक गैर-लाभकारी सुरक्षा अनुबंध फर्म है।

गिरफ्तार किए गए छह यूक्रेनियों की पहचान हुरबा पेट्रो, स्लीवियाक तारास, इवान सुकमानोव्स्की, स्टेफानकिव मारियन, होनचारुक मैक्सिम और कामिंस्की विक्टर के रूप में हुई है।

NIA ने गिरफ्तार किए गए विदेशी नागरिकों की कस्टडी माँगते हुए कोर्ट को बताया कि आरोपी वैध वीजा पर भारत आए थे, लेकिन फिर उन्होंने मिजोरम के प्रतिबंधित क्षेत्र में अवैध तरीके से एंट्री की। वहाँ से सीमा पार कर म्यांमार में घुस गए और भारत विरोधी जातीय संघर्ष में शामिल ग्रुपों से संपर्क साधा। उन्हें कथित तौर पर प्रशिक्षण और उपकरण उपलब्ध कराए।

पकड़े गए सभी 6 यूक्रेनी नागरिक ड्रोन तकनीक में माहिर बताए जा रहे हैं। खुफिया सूत्र बताते हैं कि ये लोग म्यांमार के आतंकी ग्रुप को ड्रोन वॉरफेयर सिखाने आए थे। अगर म्यांमार के आतंकी समूह आधुनिक ड्रोन से लैस हो गए, तो इसका सीधा असर भारत के मिजोरम, मणिपुर और नगालैंड की सुरक्षा पर पड़ेगा।

NIA के मुताबिक, गिरफ्तार किए गए विदेशी नागरिक यूरोप से भारत के रास्ते ड्रोन की एक बड़ी खेप लाए थे। जाँच में पता चला कि सभी आरोपी वैध वीज़ा पर भारत में दाखिल हुए थे, लेकिन अनिवार्य ‘प्रतिबंधित क्षेत्र परमिट’ के बिना मिजोरम पहुँच गए।

NIA द्वारा विदेशी नागरिकों की गिरफ़्तारी ने उन दबी हुई अटकलों को फिर से हवा दे दी है कि अमेरिका और कई अन्य विदेशी ताकतें म्यांमार में सत्ता-विरोधी ताकतों को ‘सॉफ्ट’ और ‘हार्ड’ दोनों तरह का समर्थन दे रही हैं।

तब डैनियल कोर्टनी, अब मैथ्यू वैनडाइक: क्या अमेरिकी मिशनरी और पूर्व सैनिक दक्षिण एशिया में ‘ईसाई राष्ट्र’ के एजेंडे को बढ़ावा दे रहे हैं?

पूर्वोत्तर भारत के रास्ते म्यांमार में एंट्री करने के ईसाई मिशनरियों से जुड़े विदेशी नागरिकों के पहले भी कई मामले सामने आए हैं।

डैनियल स्टीफन कोर्टनी का मामला काफी सुर्खियों में रहा। वह साल 2009 में टूरिस्ट वीजा पर भारत आया था, यहाँ एक दशक से भी ज्यादा समय तक रुका और लोगों का धर्मांतरण कराया। तत्कालीन आंध्र प्रदेश में इस दौरान ईसाइयत काफी फैला।

कोर्टनी को भारत से 2017 में भेजा गया था और उसे ब्लैकलिस्ट कर दिया गया। साल 2023 में हालाँकि उसने टूरिस्ट वीजा पर भारत में दोबारा एंट्री की। वह मणिपुर में समाज सेवा करने और ईसाइयत का प्रचार करने के बहाने धर्मांतरण में शामिल था। उसने इलाके में बाइबिल बांटी थी और हिंदुओं के साथ- साथ मोदी सरकार के खिलाफ लोगों में नफरत फैलाने की कोशिश की। भारत में टूरिस्ट वीजा पर रहते हुए किसी भी धर्म का प्रचार करना या धर्मांतरण में शामिल होना गैर-कानूनी है।

5 अगस्त 2023 को, डैनियल स्टीफन कोर्टनी ने मणिपुर से एक वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट किया। उन्होंने दावा किया कि ईसाइयों पर ज़ुल्म हो रहे हैं और इस समुदाय को जान-बूझकर निशाना बनाया जा रहा है। OpIndia ने पहले बताया था कि कैसे अमेरिका का यह ईसाई मिशनरी, लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई मोदी सरकार के खिलाफ नफ़रत और गलत जानकारी फैला रहा था। केन्द्र सरकार को वह ‘कट्टर हिंदू सरकार’ कह रहा था। उसने मणिपुर में ईसाइयों के खिलाफ हिंसा भड़काने का आरोप सरकार पर लगाया और कहा कि पूर्वोत्तर ईसाइयों के लिए एक पवित्र भूमि है।

खास बात यह है कि कोर्टनी अमेरिकी सेना का एक रिटायर्ड सैनिक है, जिस पर मणिपुर और पूर्वोत्तर के दूसरे राज्यों में जातिवादी हिंसक गुटों को हथियार, विस्फोटक, आधुनिक संचार उपकरण, ड्रोन और ‘लॉजिस्टिक्स’ पहुँचाने में मदर करने के आरोप लगे। दिसंबर 2024 में उसका एक पुराना वीडियो (संभवतः अगस्त 2023 का) सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसमें कोर्टनी को एक हिंसा-ग्रस्त इलाके में कुकी उग्रवादियों को बुलेटप्रूफ जैकेट और ड्रोन बाँटते हुए देखा गया। ये मैतेई हिन्दुओं से मुकाबला करने के लिए दिए गये थे।

ब्रिटेन के एक नागरिक डैनियल न्यूई को एक ज़िंदा कारतूस के साथ जून 2024 में गिरफ्तार किया गया था। न्यूई को लेंगपुई हवाई अड्डे पर पकड़ा गया और उस पर हथियार अधिनियम, 1959 के तहत मामला दर्ज किया गया। हालाँकि बाद में उसे बरी कर दिया गया, लेकिन ऐसे मामलों में बरी होना कोई हैरानी की बात नहीं है।

अमेरिका के एक प्रचारक फ्रैंकलिन ग्राहम को नवंबर 2025 में वीजा देने से मना कर दिया गया। वह 30 नवंबर को नागालैंड के कोहिमा में एक ईसाई कार्यक्रम में शामिल होने के लिए जाना चाहता था। दरअसल ग्राहम का संगठन ‘समैरिटन्स पर्स’ देश में धर्म-परिवर्तन से जुड़ी गतिविधियों में शामिल रहा है। यह संगठन धर्म-प्रचार के साथ-साथ लोगों के बीच भोजन वितरण और दूसरी मदद करता है।

अब आइए हाल ही में गिरफ्तार किए गए अमेरिकी नागरिक मैथ्यू वैनडाइक की बात करते हैं। 1981 में बाल्टीमोर मैरीलैंड में पैदा हुए वैनडाइक लीबिया में युद्धबंदी रह चुका है। उसने कर्नल मोहम्मद गद्दाफी के खिलाफ विद्रोह में हिस्सा लिया था।

मैथ्यू वैनडाइक ने 2014 में, ‘सन्स ऑफ लिबर्टी इंटरनेशनल’ की स्थापना की थी। ISIS ने उनके दोस्त अमेरिकी पत्रकार जेम्स फोली और स्टीवन सॉटलॉफ की हत्या कर दी थी, उसके बाद उन्होंने संगठन बनाया था। एक लाइसेंस्ड 501(c)(3) गैर-लाभकारी संस्था के तौर पर काम करने वाली एक निजी सुरक्षा ठेका कंपनी है।

यह संगठन दावा करता है कि वह आतंकवादी समूहों और तानाशाही शासनों का सामना कर रही ‘कमजोर’ लोगों को निशुल्क जरूरी सामान, सैन्य प्रशिक्षण और परामर्श सेवाएँ उपलब्ध कराता है। इराक में अपनी पहली तैनाती के दौरान SOLI ने ‘निनवेह प्लेन प्रोटेक्शन यूनिट्स’ (NPU) को प्रशिक्षित किया था। यह एक सीरियन ईसाई समूह है, जो ISIS के खिलाफ लड़ रहा है।

वैनडाइक और SOLI ने रूस-यूक्रेन युद्द के दौरान लगातार यूक्रेन का समर्थन किया है। जब से युद्ध शुरू हुआ है, SOLI यूक्रेन के सशस्त्र बलों को प्रशिक्षण, परामर्श और जरूरी सामान मुहैया करा रहा है। वैनडाइक का यूक्रेन के साथ गहरा सैन्य और वैचारिक जुड़ाव रहा है। वेनेज़ुएला में सत्ता परिवर्तन में अमेरिका के अभियान में वह खुले तौर पर शामिल रहा है। ऐसे में उसका 6 यूक्रेनी नागरिकों के साथ पूर्वोत्तर में गिरफ्तारी काफी मायने रखता है।

वैनडाइक की सोशल मीडिया प्रोफाइल से भी काफी कुछ पता चलता है। यह अलग-अलग देशों में उसकी गतिविधियों की एक डिजिटल डायरी जैसी है। म्यांमार में सक्रिय ‘जातीय सशस्त्र संगठनों’ (EAOs) के प्रति उसका समर्थन इससे साफ दिखता है।

मैथ्यू वैनडाइक के सोशल मीडिया पोस्ट से पता चलता है कि उनका ईसाई धर्म में गहरा विश्वास है। वह दुनिया में किसी को भी, चाहे वह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हों या रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, बेझिझक ‘बुरा ईसाई’ होने का सर्टिफिकेट दे देता है।

हालाँकि, म्यांमार में वैनडाइक जैसे और भी कई लोग सक्रिय हैं। इनमें से एक हैं- अमेरिका के पूर्व स्पेशल फोर्सेज अधिकारी और ईसाई पादरी डेव यूबैंक। इनकी संस्था ‘फ्री बर्मा रेंजर्स’ (FBR) म्यांमार में जातीय संघर्ष में शामिल संगठनों को ‘मानवीय सहायता’ उपलब्ध करना का दावा करते हैं, असल में ये सालों से धर्मांतरण में जुटे हुए हैं।

अब भारत के रास्ते म्यांमार के आंतरिक मामलों में विदेशी ताकतों के दखल की बात करें, तो मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने मार्च 2025 में ही भारत और म्यांमार की खुली सीमाओं पर विदेशियों की मौजूदगी पर चिंता जताई थी। इनमें से ज्यादातर ऐसे यूक्रेनी हैं, जिन्हें युद्ध का अनुभव है और सेना में रह चुके हैं। मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि विदेशी नागरिक, विशेष रूप से अमेरिका और ब्रिटेन के लोग, खुली सीमाओं के रास्ते मिजोरम होते हुए म्यांमार में प्रवेश कर रहे हैं। ये विदेशी नागरिक म्यांमार में विद्रोहियों को प्रशिक्षण देने के मकसद से घुस रहे हैं।

मिजोरम विधानसभा को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने खुलासा किया कि जून से दिसंबर 2024 के बीच 2000 से भी ज्यादा विदेशी नागरिक आइजोल आए थे। हालाँकि उन्हें कभी भी सड़कों पर घूमते हुए नहीं देखा गया। इससे संदेह और भी गहरा हो गया कि वे मिजोरम में केवल इसलिए आए थे ताकि यहाँ से म्यांमार में प्रवेश कर सकें और पड़ोसी देश के आंतरिक मामलों में दखल दे सकें।

CM लालदुहोमा ने यह भी कहा था कि जो लोग मिजोरम के रास्ते म्यांमार में घुसे थे, उनमें से कुछ पहले रूस-यूक्रेन युद्ध में भी हिस्सा ले चुके थे। लालदुहोमा के इस खुलासे से अब तक लगाए जा रहे उन कयासों को और बल मिला कि म्यांमार-मिजोरम सीमा पश्चिमी भाड़े के सैनिकों के लिए एक प्रवेश द्वार बन गई है।

CM लालदुहोमा ने कहा, “हमारे पास पक्की जानकारी है कि यूक्रेन युद्ध के अनुभवी सैनिक मिजोरम के रास्ते म्यांमार के चिन प्रांत में गए, ताकि वे सैन्य शासन (मिलिट्री जुंटा) से लड़ रहे विद्रोही गुटों को ट्रेनिंग दे सकें।”

उस समय, CM लालदुहोमा ने तत्कालीन अमेरिकी राजदूत एरिक गार्सेटी के मिजोरम दौरे पर हैरानी भी जताई थी। उन्होंने इस बात का भी संकेत दिया था कि भारत के पूर्वोत्तर और म्यांमार में हो रहे घटनाक्रमों में अमेरिकी सरकार की काफी दिलचस्पी है।

कॉन्ग्रेस सरकार की ‘पर्यटन को बढ़ावा देने’ की नीति का फायदा उठाकर मिजोरम-म्यांमार सीमा को पश्चिमी भाड़े के सैनिकों और ईसाई मिशनरियाँ एक्टिव हुईँ

यह ध्यान रखना जरूरी है कि मिजोरम के रास्ते म्यांमार में घुसने वाले विदेशी भाड़े के सैनिकों और ईसाई मिशनरियों का जो खतरा आज बना हुआ है, उसकी जड़ें कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली UPA सरकार के वक्त फैली। 2011 में यूपीए सरकार ने पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए मणिपुर, नागालैंड और मिज़ोरम में ‘संरक्षित क्षेत्र परमिट’ (PAP) की शर्तों में ढील दी थी। इसका फायदा उठाकर ये लोग ‘पर्यटक’ वीज़ा पर भारत आए और खुली सीमाओं के रास्ते म्यांमार में घुस गए।

म्यांमार में अमेरिका-यूक्रेन बनाम रूस-चीन की सत्ता की खींचतान: कौन किसका साथ दे रहा है और क्यों?

चूंकि म्यांमार को हमेशा से ही सत्ता पर कब्जे के लिए एक रणभूमि माना जाता रहा है, खासकर हिंद महासागर में चीन और अमेरिका के बीच उसकी रणनीतिक स्थिति को देखते हुए, तो ऐसे में रूस-यूक्रेन का कनेक्शन आखिर कहाँ से सामने आया?

इस सवाल का जवाब उन पक्षों में छिपा है, जिनका इन देशों ने ऐतिहासिक रूप से साथ दिया है। रूस और चीन हमेशा से ही मिन आंग ह्लाइंग के नेतृत्व वाले म्यांमार के सैन्य शासन (मिलिट्री जुंटा) के समर्थक रहे हैं। इस सैन्य ‘तात्माडॉ’ शासन भी ने भी रूस और चीन के समर्थन का पूरा मान रखा। तात्माडॉ ने यूक्रेन पर रूस के हमले का समर्थन किया, जबकि मॉस्को ने नेपीताव को लड़ाकू विमान, ड्रोन और निगरानी उपकरण मुहैया कराए, जिनका इस्तेमाल तात्माडॉ विद्रोही गुटों के खिलाफ करता है।

रूस म्यांमार को तेल की आपूर्ति करने वाला एक भरोसेमंद देश भी रहा है। मार्च 2025 में, म्यांमार के सैन्य शासन ने रूस को संघर्ष वाले इलाकों से रत्न और खनिज निकालने, और तटीय शहर दावी में एक तेल रिफाइनरी और एक बंदरगाह बनाने के लिए आमंत्रित किया।

और यहीं पर अमेरिका और अमेरिकी भाड़े के सैनिक तस्वीर में आते हैं। अमेरिका, रूस के खिलाफ यूक्रेन को सैन्य, आर्थिक और कूटनीतिक रूप से समर्थन देता है। अमेरिका, रूस और चीन समर्थित म्यांमार के सैन्य शासन के खिलाफ म्यांमार के जातीय सशस्त्र संगठनों (EAOs) का भी समर्थन करता है।

दरअसल चीन और अमेरिका दोनों ही दशकों से म्यांमार के राजनीतिक मामलों में दखल देते रहे हैं। 1950, 1970 और 1980 के दशकों में CIA ने उत्तरी म्यांमार में राष्ट्रवादी चीनी (KMT) के बचे हुए गुटों का समर्थन किया था, जबकि चीन ने बर्मी कम्युनिस्ट पार्टी के छापामारों को गुप्त समर्थन दिया था।

हाल में, अमेरिकी कॉन्ग्रेस ने ‘बर्मा यूनिफाइड थ्रू रिगरस मिलिट्री अकाउंटेबिलिटी एक्ट’ यानी ‘बर्मा एक्ट’ (BURMA Act) पारित किया। इस एक्ट का उद्देश्य ‘लोकतंत्र समर्थक संगठनों’ को तकनीकी और मानवीय सहायता पहुँचाना है।

इनमें ‘पीपल्स डिफेंस फोर्स’ (PDF) और EAOs जैसे संगठन शामिल हैं। सिर्फ ‘तकनीकी और गैर-घातक’ शब्द का यह अर्थ नहीं है कि अमेरिका ने म्यांमार में सैन्य शासन विरोधी ताकतों को सैन्य सहायता न देने का वादा किया था। इस एक्ट में हथियारों और गोला-बारूद को छोड़कर, सैन्य सहायता की दूसरी चीजें शामिल की गई थी। इनमें बॉडी आर्मर, वर्दी, रडार, और चिकित्सा उपकरण शामिल हैं।

हालाँकि इस एक्ट को अभी अमेरिकी सीनेट द्वारा अनुमोदित किया जाना बाकी है, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अमेरिका में शक्तिशाली राजनीतिक ताकतें म्यांमार के मामलों में दखल देने के लिए सक्रिय हैं।

कई रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका की योजना बांग्लादेश में एक ‘विशाल सप्लाई डंप’ स्थापित करने की है। इसका मकसद म्यांमार में जुंटा-विरोधी सैन्य अभियानों को समर्थन देना है। इसके तहत अराकान आर्मी और चिन नेशनल फ्रंट जैसे विद्रोही समूहों को हथियार और लॉजिस्टिक सहायता प्रदान की जाएगी।

दरअसल म्यांमार में एक अमेरिका-समर्थक शासन स्थापित होने से हिंद महासागर क्षेत्र में अमेरिका की उपस्थिति का विस्तार होगा। इससे अमेरिका को इस क्षेत्र में रूस, चीन और यहाँ तक कि भारत के मुकाबले बढ़त हासिल करने का अवसर मिलेगा। साथ ही, इससे इस क्षेत्र में रूस और चीन के आर्थिक और रणनीतिक हितों को भी नुकसान पहुँचेगा।

इससे भारत की उत्तर-पूर्वी सीमा पर भी हमेशा खतरा बना रहेगा। म्यांमार के जुंटा सैन्य शासन का समर्थन चीन भी करता है, खासकर उन EAOs (जातीय सशस्त्र संगठनों) के खिलाफ जो मुख्य रूप से ईसाई हैं। ताकि उसे हथियारों की आपूर्ति और ‘बेल्ट एंड रोड’ परियोजना तक पहुँच मिल सके। हालाँकि मैथ्यू वैनडाइक और 6 यूक्रेनी नागरिकों की गिरफ्तारी के साथ, भारत ने एक कड़ा संदेश दिया है कि नई दिल्ली की तटस्थता को राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति उसकी कमजोरी समझने की भूल नहीं की जानी चाहिए।

चूँकि अब हम म्यांमार के संदर्भ में रूस, यूक्रेन, चीन और अमेरिका के ‘सॉफ्ट पावर’ से लेकर ‘हार्ड पावर’ तक के समीकरण को समझ चुके हैं, तो आइए अब शेख हसीना के उस आरोप पर फिर से विचार करें जिसमें उन्होंने कहा था कि अमेरिका दक्षिण एशिया में एक ईसाई राष्ट्र बनाने की साज़श रच रहा है।

शेख हसीना की 2024 की ‘ईसाई राष्ट्र’ वाली चेतावनी, जो पहले केवल एक हताशापूर्ण राजनीतिक बयान लग रही थी, अब एक हकीकत नजर आ रही है

जून 2024 में, बांग्लादेश की तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना ने एक सनसनीखेज दावा किया था। उन्होंने कहा था कि बांग्लादेश पूर्वोत्तर और म्यांमार के कुछ हिस्सों को मिलाकर ‘पूर्वी तिमोर जैसा एक ईसाई राष्ट्र’ बनाने की साजिश रची जा रही है।

दिलचस्प बात यह है कि अमेरिका ने बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) और इस्लामी राजनीतिक संगठन ‘जमात-ए-इस्लामी’ को खुला समर्थन दिया था। इन दोनों ही संगठनों ने अंततः हसीना-विरोधी प्रदर्शनों का समर्थन किया और हसीना को प्रधानमंत्री पद से अवैध रूप से हटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अब ये संगठन बांग्लादेश की सत्ता पर काबिज हैं। अमेरिका पर बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन की साजिश रचने के आरोप भी लगते रहे हैं।

अवामी लीग के नेताओं ने इस बात की पुष्टि की थी कि शेख हसीना एक ऐसी साजिश के बारे में बात कर रही थीं, जिसका मकसद ‘जो’ लोगों के लिए एक ईसाई राष्ट्र ‘जोगम’ बनाना था। इन लोगों को ‘जोमी’, ‘चिन-कूकी-मिजो’ के नाम से भी जाना जाता है।

कहा जाता है कि यह प्रस्ताव ‘जालेंगम’ [आज़ादी की धरती] पर प्रस्तावित कूकी राज्य है। इस अलग राष्ट्र में म्यांमार के सागाइंग डिवीज़न और चिन राज्य के बड़े हिस्से, भारत के मिजोरम, मणिपुर के कूकी-बहुल इलाके और बांग्लादेश के चटगांव डिवीजन के बंदरबान जिले और आस-पास के इलाके शामिल होंगे।

इन लोगों की ऐतिहासिक जड़ें म्यांमार की चिन पहाड़ियों और भारत के मणिपुर, मिजोरम और नागालैंड के आस-पास के इलाकों में मिलती हैं। ब्रिटिश औपनिवेशिक काल के दौरान, ‘ज़ो’ लोगों का ईसाई मिशनरियों से काफी मेल-जोल बढ़ा। 20वीं सदी की शुरुआत में बड़े पैमाने पर लोगों ने ईसाई धर्म अपना लिया, जिसके परिणामस्वरूप उनके सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने में गहरे बदलाव आए।

आजादी के बाद यह समुदाय राष्ट्रीय सीमाओं में बँट गया। भारत ने इन्हें ‘अनुसूचित जनजाति’ के रूप में मान्यता दी, जिससे इन्हें कुछ संवैधानिक सुरक्षाएँ मिलीं। म्यांमार में ये कई उग्रवादी समूह के रूप में जाने जाते हैं। इनमें ‘चिन नेशनल फ्रंट’ की सशस्त्र शाखा ‘चिन नेशनल आर्मी’, ‘चिनलैंड डिफेंस फोर्स’ और ‘चिन नेशनल डिफेंस फोर्स’ शामिल हैं।

ये लोग म्यांमार की सैनिक सरकार (जंटा) के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष में लगे हुए हैं। बांग्लादेश में, ‘कूकी-चिन नेशनल फ्रंट’ चटगांव हिल ट्रैक्ट्स में हत्याएँ और लूटपाट की घटनाएँ अंजाम देते रहे हैं।

मिजोरम में सत्ताधारी ‘जोरम पीपुल्स मूवमेंट’, विपक्षी ‘मिज़ो नेशनल फ्रंट’ और कांग्रेस मिजोरम स्थित संगठन ‘ज़ो रीयूनिफिकेशन ऑर्गनाइज़ेशन’ (ZRO) की एकीकरण की माँग के समर्थक बताए जाते हैं। इस संगठन का मुख्य उद्देश्य तीनों देशों में फैले सभी ‘ज़ो-बहुल’ इलाकों को एक साथ लाना है। ऐसी खबरें हैं कि चर्च से जुड़े संगठन, विशेष रूप से अमेरिका स्थित ‘बैपटिस्ट चर्च’, इस ‘जो-एकीकरण’ की माँग को हवा दे रहे हैं।

OpIndia ने पहले भी इस बात को उजागर किया है कि कैसे इन चर्च संगठनों के तार अमेरिका की खुफिया एजेंसी ‘सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी’ (CIA) से जुड़े हुए बताए जाते हैं।

OpIndia लगातार अमेरिका स्थित संगठन ‘वर्ल्ड विजन इंटरनेशनल’ की गतिविधियों को लेकर आगाह करता रहा है। इस ईसाई NGO को USAID (अब बंद हो चुकी) से फंडिंग मिली थी। इसका भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी संगठनों और लोगों की फंडिंग का इतिहास रहा है। World Vision की गतिविधियाँ सिर्फ पूर्वोत्तर भारत तक ही सीमित नहीं हैं। यह एक मानवीय संगठन होने का दिखावा करता है, लेकिन असल में यह एक कट्टरपंथी ईसाई संगठन है। यह अन्य कट्टरपंथी ईसाई संगठनों के साथ मिलकर पिछले सात दशकों से भोले-भाले हिंदुओं, खासकर बच्चों और महिलाओं का धर्मांतरण करवा रहा है। नेहरू सरकार ने इस कट्टरपंथी ईसाई संगठन को पूरी छूट दे रखी थी।

1972 में, इंदिरा गाँधी सरकार ने World Vision के बिली ग्राहम को नागालैंड जाने की अनुमति भी दे दी थी। ग्राहम खुद इस बात से हैरान थे, क्योंकि उस समय वहाँ की अस्थिर स्थिति के चलते विदेशियों को इस भारतीय राज्य में जाने की अनुमति नहीं मिलती थी। इंदिरा गाँधी के शासनकाल में World Vision ने खुलेआम धर्मांतरण की गतिविधियाँ चलाईं। इस दौरान हजारों हिंदुओं का धर्मांतरण करवाया गया।

साल 2024 में मोदी सरकार ने इसका FCRA लाइसेंस रद्द कर दिया। इससे भारत में इसकी धर्मांतरण की गतिविधियों को बड़ा झटका लगा। OpIndia ने पहले भी अपनी रिपोर्ट में बताया था कि वर्ल्ड काउंसिल ऑफ चर्चेज (World Council of Churches), वर्ल्ड इवेंजेलिकल एलायंस ( World Evangelical Alliance) और वर्ल्ड विजन ( World Vision) जैसे अमेरिकी ईसाई संगठनों ने धर्मांतरण-विरोधी कानूनों के खिलाफ किस तरह से विरोध जताया।

सितंबर 2024 में मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने अमेरिका की अपनी आधिकारिक यात्रा के दौरान ‘चिन समुदाय’ के सदस्यों से मुलाकात की। भारत के एक सीमावर्ती राज्य के मुख्यमंत्री होने के बावजूद, उन्होंने म्यांमार और बांग्लादेश में फैले ‘ज़ो समुदाय’ (जिसमें चिन, कूकी और मिज़ो लोग शामिल हैं) के बीच जातीय और धार्मिक आधार पर एकता बनाए रखने का आह्वान किया।

उनके भाषण के लिखित अंश में कहा गया था, “मैं इस अवसर का लाभ उठाते हुए एक बेहद गंभीर और ज्वलंत मुद्दे पर बात करना चाहता हूँ। मुझे इस बात की आशंका है कि हमारा धर्म एकता और भाईचारे का स्रोत बनने के बजाय, कहीं आपसी फूट और विभाजन का कारण न बन जाए। ईसाइयत का काम तो अपने अनुयायियों का सही मार्गदर्शन करना और चर्च को एक मजबूत, एकजुट और अभेद्य किले में तब्दील करना होना चाहिए।”

लालदुहोमा ने आगे कहा, “मैं यहाँ मौजूद सभी लोगों को यह बताना चाहता हूँ कि मैंने संयुक्त राज्य अमेरिका आने का निमंत्रण इसलिए स्वीकार किया है, ताकि हम सभी के लिए एकता का मार्ग खोज सकें। हम एक ही लोग हैं, भाई-बहन हैं और हम आपस में बँटकर या एक-दूसरे से अलग होकर नहीं रह सकते… भले ही किसी देश की सीमाएँ हों, लेकिन एक सच्चा राष्ट्र इन सीमाओं से परे होता है। हमें अन्यायपूर्ण तरीके से बाँटा गया है, हमें तीन अलग-अलग देशों में तीन अलग-अलग सरकारों के अधीन रहने के लिए मजबूर किया गया है और यह ऐसी बात है जिसे हम कभी स्वीकार नहीं कर सकते।”

भारत में हुई तीखी प्रतिक्रिया के जवाब में, मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने अपने बयान का बचाव करते हुए कहा कि उन्होंने ‘सांस्कृतिक एकता’ की वकालत की थी, न कि भारत की क्षेत्रीय अखंडता को चुनौती दी थी।

प्रस्तावित ‘जो’ राज्य ‘जालेंगम’ का मानचित्र जिसमें बांग्लादेश, म्यांमार और मिज़ोरम शामिल हैं। (साभार-स्वराज्य )

जून 2023 में, वर्ल्ड कूकी-ज़ो इंटेलेक्चुअल काउंसिल (WKZIC) ने संयुक्त राष्ट्र और इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को एक ज्ञापन सौंपा, जिसमें उन्होंने संघर्ष-ग्रस्त मणिपुर के पहाड़ी क्षेत्रों से एक अलग कूकी राज्य बनाने के लिए उनके हस्तक्षेप की माँग की थी।

दुनिया में कहीं भी कोई जातीय संघर्ष होता है, अमेरिका की दखलंदाजी होने लगती है

भारत-म्यांमार-बांग्लादेश सीमा क्षेत्र में धर्म-आधारित संघर्ष भड़काने की कोशिशें की जा रही हैं, वहीं, कुछ उग्रवादी कुकी-चिन समूहों ने अफीम और नशीले पदार्थों की तस्करी के नेटवर्क पहले ही स्थापित कर लिए हैं और ‘जमातुल अंसार’ जैसे इस्लामी आतंकी संगठनों के साथ हाथ मिला लिया है। मणिपुर में यह पहले ही देखा जा चुका है कि कैसे ईसाई कुकी-चिन उग्रवादी समूहों ने मैतेई हिंदुओं के साथ संघर्ष शुरू कर दिया था।

मणिपुर और मिजोरम के स्थानीय लोग चिंतित है कि कई इलाकों में म्यांमार से आए घुसपैठियों की संख्या उनसे ज्यादा हो गई है। भारतीय अधिकारी लगातार मणिपुर में अवैध प्रवासियों को नकली आधार कार्ड और वोटर आईडी जारी करने वाले एक रैकेट का भंडाफोड़ करते रहे हैं। कई बार म्यांमार के नागरिकों के पास से नकली आधार कार्ड मिले, जिसके सहारे ये लोग मिजोरम और मणिपुर में रह रहे थे।

मोदी सरकार भारत-म्यांमार सीमा क्षेत्रों पर बाड़बंदी का विस्तार करने के प्रयास कर रही है। 2024 में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 1,643 किलोमीटर लंबी भारत-म्यांमार सीमा पर बाड़ लगाने के निर्णय की घोषणा की। 8 फरवरी 2025 को, शाह ने आंतरिक सुरक्षा और पूर्वोत्तर राज्यों की डेमोग्राफी को बदलने से बचाने के लिए म्यांमार में आसानी से आवाजाही को रोकने की घोषणा की।

हालाँकि कई नागा और कुकी ईसाई संगठन इसके विरोधी हैं। जनवरी 2025 में ‘यूनाइटेड नागा काउंसिल’ (UNC) मिजोरम की ‘मिजो जिरलाई पॉल’ (MZP), और कुछ संगठनों ने केंद्र सरकार से भारत-म्यांमार सीमा बाड़बंदी परियोजना को रोकने की माँग की।

उन्होंने इसे भारत सरकार की एक ‘नापाक साजिश’ बताया, जिसका उद्देश्य ‘कृत्रिम सीमाएँ’ थोपकर नागा लोगों को उनकी पुश्तैनी जमीनों से बेदखल करना है। जबकि मैतेई हिंदुओं ने इस बाड़बंदी परियोजना का स्वागत किया। उनका कहना था कि इससे मणिपुर में जारी संकट पर अंकुश लगेगा।

यह स्पष्ट है कि मणिपुर संकट से लेकर म्यांमार संघर्ष तक में विदेशी नागरिक और ईसाई मिशनरी का हाथ रहा है। ये लोग पूर्वोत्तर भारत, म्यांमार और बांग्लादेश के सीमावर्ती क्षेत्रों में सक्रिय हैं। वे अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ‘छद्म युद्ध’ छेड़ रहे हैं, जिसका मकसद ईसाई राष्ट्र की स्थापना करना है।

इसे ऐसा भी कहा जा सकता है कि वे एक ऐसा संघर्ष-क्षेत्र तैयार करना चाहते हैं जिसे ईसाई कठपुतली आसानी से नियंत्रित कर सके। लेकिन भारत ऐसे नापाक हरकत को कभी सफल नहीं होने देगा। अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय अखंडता के हित में कई कदम उठाए गए हैं। अमेरिकी और यूक्रेनी ईसाई विद्रोहियों के समर्थकों की हालिया गिरफ्तारियाँ इसी बात की पुष्टि करती हैं।

(मूल रूप से यह लेख अंग्रेजी में लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

AI समिट में देश को नंगा करना चाहते थे राहुल गाँधी, खुद के विधायकों ने कर दिया नंगा: राज्यसभा चुनाव का सबक यह भी- कॉन्ग्रेसी माँगे फुल टाइम-सीरियस नेतृत्व

कॉन्ग्रेस के प्रति जनता के साथ-साथ नेताओं और विधायकों, सांसदों का भी धीरे-धीरे मोहभंग हो रहा है। अब हालत यह है कि एक साथ तीन राज्यों के विधायकों ने पार्टी समर्थित राज्य सभा उम्मीदवारों को वोट नहीं किया, जिसकी वजह से वे हार गए।

नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी की ‘पार्ट टाइम पॉलिटिक्स’ का खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ रहा है। पार्टी अध्यक्ष खरगे काफी बुजुर्ग हो चुके हैं। युवाओं को पार्टी से जोड़ने में वे असमर्थ हैं। राहुल गाँधी के मुद्दों ने जनता को जोड़ने के बजाए भ्रमित करने की कोशिश की है। नतीजा है कि पार्टी धीरे-धीरे सिकुड़ती जा रही है और जनता में अपना विश्वास खोती जा रही है।

बिहार में एक भी सीट नहीं जीत पाई विपक्ष

बिहार विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद अब महागठबंधन का एक भी उम्मीदवार राज्यसभा चुनाव नहीं जीत पाया। सभी 5 सीटें एनडीए की झोली में गई। महागठबंधन के 4 विधायकों ने वोट ही नहीं डाला।

इन विधायकों की नाराजगी उम्मीदवार को लेकर थी। उनका कहना है कि पार्टी ने अगर मुस्लिम, दलित को प्रत्याशी बनाया होता तो वह वोट डालते, लेकिन एक बिजनेसमैन को टिकट देकर पार्टी के कार्यकर्ताओं और नेताओं का अपमान किया। दरअसल राज्यसभा चुनाव को लेकर उम्मीदवारों के चुनाव के वक्त पार्टी ने पुराने नेताओं को दरकिनार किया। उसकी जगह बिजनेसमैन एडी सिंह को उम्मीदवार बनाया।

यहाँ तक कि जिस बैठक में नाम तय किए गए, उसमें कॉन्ग्रेस प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम भी नहीं बुलाए गए थे। इससे पता चलता है कि पार्टी को न तो प्रदेश नेताओं से मतलब है और न ही कार्यकर्ताओं की भावनाओं से। इसका नतीजा रहा कि महागठबंधन के उम्मीदवार हार गए।

हरियाणा में कॉन्ग्रेस की साँसे फूली

हरियाणा की दो राज्यसभा सीटों में से एक सीट जीतने में भी कॉन्ग्रेस की साँसे फूलने लगी। ये तब हुआ जब उसके पास 37 विधायक थे और उसे 28 से 30 वोट की जरूरत थी। दरअसल कॉन्ग्रेस के 5 विधायकों ने क्रॉस वोटिंग कर दी और 4 वोट को अवैध घोषित कर दिया। हालाँकि बीजेपी का भी एक वोट अवैध घोषित हुआ।

इनेलो के 2 विधायकों ने वोट नहीं डाले। भले ही कॉन्ग्रेस ने जैसे तैसे अपनी सीट बचा ली, लेकिन विधायकों के बागी तेवर कॉन्ग्रेस के लिए चिंता का विषय हैं। ऐसा तब हुआ जब विधायकों को चुनाव से पहले हिमाचल प्रदेश भेज दिया गया था। पार्टी के अंदर चल रहे खींचतान से परेशान होकर हरियाणा प्रदेश कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राम किशन गुज्जर ने कॉन्ग्रेस से इस्तीफा दे दिया।

ओडिशा में भी क्रॉस वोटिंग

ओडिशा की 4 राज्य सभा सीटों में से दो बीजेपी , एक बीजेडी और एक बीजेपी समर्थक निर्दलीय उम्मीदवार जीत गए। निर्दलीय उम्मीदवार पूर्व केन्द्रीय मंत्री दिलीप रे के जीतने पर बवाल मचा हुआ है, क्योंकि उन्हें बीजेडी और कॉन्ग्रेस विधायकों के वोट जरूर मिले होंगे। इस मामले में कॉन्ग्रेस ने अपने तीन विधायकों रमेश जेना, दशरथी गमांग और सोफिया फिरदौस को सस्पेंड कर दिया है।

सोफिया फिरदौस राज्य की पहली मुस्लिम विधायक हैं। वह कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मोहम्मद मोकीम की बेटी हैं। पार्टी ने 2024 के ओडिशा विधानसभा चुनावों में मोहम्मद मोकीम की जगह फिरदौस को उम्मीदवार बनाया, जो विजयी रहीं। वह ओडिशा की बाराबती-कटक सीट से विधायक बनी। ऐसे में सवाल उठता है कि सोफिया फिरदौस हो या बाकी के विधायक, इनलोगों ने क्रॉस वोटिंग क्यों की। पार्टी की विचारधारा से वह प्रभावित थी और कॉन्ग्रेस की पुरानी परंपरा से आती हैं, तो फिर क्यों छोड़ा ‘हाथ’?

3 साल में राहुल गाँधी ने मिलने का वक्त नहीं दिया

याद कीजिए सोफिया मोहम्मद के पिता मोहम्मद मोकिम ने ओडिशा में पार्टी की हालत पर चिंता जताई थी और सोनिया गाँधी को पत्र लिख कर कॉन्ग्रेस की ‘ओपन हार्ट सर्जरी’ की माँग की थी। उन्होंने कहा था कि 3 साल की कोशिशों के बावजूद वह राहुल गाँधी ने नहीं मिल पाए।

उन्होंने पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए कहा था कि पार्टी युवाओं से जुड़ नहीं पा रही है। उन्होंने पार्टी के संगठनात्मक पतन, नेतृत्व की नाकामियों और तत्काल सुधारों की आवश्यकता पर बल दिया था।

पूर्व विधायक मोहम्मद मोकिम ने चेतावनी दी थी कि पार्टी बाहरी विरोधियों की वजह से नहीं, बल्कि पार्टी के अंदर लिए गए फैसलों की वजह से अपनी विरासत खो रही है। पार्टी के फैसले इसे अंदर से खोखला कर रही है।

कॉन्ग्रेस पार्टी में वैचारिक शून्यता के साथ साथ पार्टी नेतृत्व का कार्यकर्ताओं से ‘दूरी’ इसके विघटन की अहम वजह है। जब कॉन्ग्रेस के पूर्व विधायक को राहुल गाँधी से मिलने के लिए सालों इंतजार करना पड़ता है और फिर भी वह नहीं मिल पाते हैं, तो आम कार्यकर्ता कहाँ मिल पाएँगे। इससे नेतृत्व और पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच की खाई साफ नजर आती है।

संसद सत्र चालू, राहुल गए विदेश

राहुल गाँधी जो मुद्दे संसद में उठाते हैं उससे भी कार्यकर्ता खुद को जुड़ा हुआ महसूस नहीं करता है। एपस्टीन फाइल्स के मुद्दे पर पूरा बजट सत्र हंगामा की भेंट चढ़ गया। यहाँ तक कि देश में एलपीजी की कालाबाजारी और केन्द्रीय पेट्रोलियम मंत्री के आश्वासन पर कि देश में तेल और एलपीजी की कोई समस्या नहीं है, राहुल गाँधी को बोलने का मौका मिला।

उन्होंने एलपीजी और तेल की किल्लत पर सरकार को घेरने के बजाए एपस्टीन फाइल्स का मुद्दा उठाने की कोशिश की। जनता को एलपीजी की कालाबाजारी से दिक्कत है, ब्लैक मार्केट में हजारों रुपए में गैस सिलेंडर लेने के लिए जनता मजबूर है, लेकिन राहुल गाँधी को ये बात समझ में नहीं आई और एलपीजी पर बात न कर उन्होंने जनता से मुँह फेरा।

यूँ भी जब संसद में राहुल गाँधी की उपस्थिति पर सत्ता पक्ष सवाल उठाते रहे हैं। केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कहा संसद सत्र के दौरान उनके विदेश यात्राओं को लेकर कहा था कि राहुल गाँधी विदेश में रहते हैं और उनकी उपस्थिति 51-52 फीसदी है, जबकि औसत सांसदों की उपस्थिति 80 फीसदी है।

संसद सत्र के दौरान राहुल गाँधी जर्मनी, इंग्लैंड, सिंगापुर और वियतनाम जैसे देशों की यात्रा पर थे। ऐसे में ‘पार्ट टाइम पॉलिटिक्स’ कर वह कैसे पार्टी को एकजुट रख पाएँगे। बीजेपी ने भी इस पर राहुल गाँधी पर तंज कसा और कहा कि राहुल गाँधी संसद में बोलने की शिकायत करते हैं, तो वे मौजूद भी तो रहें। असल में वे विदेश यात्राओं पर होते हैं।

देश में अहम चुनाव और राहुल गए विदेश

राहुल गाँधी अक्सर अहम चुनाव के वक्त विदेश चले जाते हैं। इसको लेकर भी कार्यकर्ताओं और जनता में छवि ‘नॉन सीरियस’ नेता की बनी है। बिहार विधानसभा चुनाव से पहले राहुल गाँधी बिहार में वोटर अधिकार यात्रा निकाल रहे थे। उसके समाप्त होते ही दक्षिण अमेरिका के 4 देशों की यात्रा पर चले गए। उनकी यह यात्रा कितने दिनों की होगी, ये बात उनके नेताओं को भी पता नहीं थी।

राहुल की यात्रा की वजह से महागठबंधन की सीट शेयरिंग फॉर्मूला भी फँस गया। बिहार की चुनाव रणनीति और प्रचार पर जब उन्हें ध्यान देना चाहिए था, वह विदेश भाग गए।

यहाँ तक कि लोकसभा चुनाव 2024 से पहले जब वह भारत जोड़ो यात्रा कर जनता को जोड़ने की कवायद कर रहे थे, 10 दिनों के लिए गायब हो गए, हालाँकि भारत जोड़ो यात्रा नहीं रुकी।

दिसंबर 2023 में हुए तीन बड़े राज्यों राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में चुनावों से कॉन्ग्रेस बुरी तरह हार गई। पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं में मायूसी थी, लेकिन राहुल गाँधी के विदेश जाने की खबर आई। हालाँकि इंडिया गठबंधन के अंदर इस पर चर्चा होने लगी और राहुल गाँधी को विदेश यात्रा रोकनी पड़ी।

दिसंबर 2021 में जब उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा, मणिपुर में विधानसभा चुनाव होने वाले थे। हर पार्टी पूरे जी जान से चुनाव में लगी हुई थी। ऐसे में राहुल गाँधी विदेश में थे। कॉन्ग्रेस को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा। ऐसा ही कर्नाटक चुनाव 2018 में भी हुआ। पार्टी नेतृत्व को राहुल गाँधी के अचानक विदेश दौरे की वजह से सरकार गठन और विभागों के वितरण के लिए इंतजार करना पड़ा।

एआई समिट का विरोध

दिल्ली के भारत मंडपम में जब फरवरी 2026 में एआई समिट हुआ, उसमें दुनियाभर के टेक लीडर्स और बिजनेसमैन पहुँचे। पूरी दुनिया की नजर उस वक्त भारत पर थी। ऐसे में यूथ कॉन्ग्रेस के नेताओं ने विरोध प्रदर्शन कर देश की इज्जत डूबोने की कोशिश की। उस दौरान कॉन्ग्रेस का एक बड़ा वर्ग यूथ कॉन्ग्रेस के विरोध प्रदर्शन को देश के खिलाफ एक्शन माना।

यही वजह थी कि कॉन्ग्रेस के प्रवक्ताओं ने तुरंत इस मुद्दे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। करीब 7 घंटे बाद कॉन्ग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने इस पर ट्वीट कर यूथ कॉन्ग्रेस की कार्रवाई को सपोर्ट करने की कोशिश की। इस मुद्दे पर कई दिनों बाद राहुल गाँधी की मुँह खुली। यूथ कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं ने शर्ट पहनी थी, जिस पर लिखा था- मोदी इन कॉन्प्रोमाइज्ड।

दरअसल ये भारत-यूएस ट्रेड डील के विरोध में प्रदर्शन था। यूथ कॉन्ग्रेस ने विश्वभर के प्रतिनिधियों के सामने देश का अपमान किया। कॉन्ग्रेस समर्थकों ने भी इसका विरोध किया, लेकिन राहुल गाँधी के यूथ कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं को ‘बब्बर शेर’ कहते हुए कहा कि इन्होंने एआई समिट में ‘अपना काम’ कर दिया।

राहुल ने कहा था इंडियन स्टेट से लड़ाई है

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का बयान देश में सुर्खियों में रहा। इसमें उन्होंने इंडियन स्टेट से लड़ने की बात कही थी। इस पर केस भी दर्ज किया गया था। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर देश से लड़ने की बात कहना दरअसल जनता को जानबूझकर विद्रोह करने के लिए भड़काना और अराजकता पैदा करने की कोशिश है।

राहुल गाँधी ने कहा था, “यह मत सोचो कि हम निष्पक्ष लड़ाई लड़ रहे हैं। इसमें कोई निष्पक्षता नहीं है। यदि आप मानते हैं कि हम बीजेपी या आरएसएस नाम के राजनीतिक संगठन से लड़ रहे हैं तो आप समझ नहीं पाएँगे कि क्या हो रहा है। बीजेपी और आरएसएस ने हमारे देश की हर एक संस्था पर कब्जा कर लिया है। अब हम बीजेपी, आरएसएस और भारतीय स्टेट से ही लड़ रहे हैं।”

राहुल गाँधी बगैर कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष न हों, लेकिन लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष होने के साथ-साथ कॉन्ग्रेस के कर्ता-धर्ता भी वही हैं। कॉन्ग्रेस के मुद्दे जनता को जोड़ नहीं पाती हैं। इसके अलावा राहुल गाँधी की विदेश यात्रा से पार्टी की कार्यप्रणाली बुरी तरह प्रभावित होती है।

कॉन्ग्रेस में खरगे भले पार्टी अध्यक्ष हों, लेकिन चलती गाँधी परिवार की ही है, खास कर राहुल गाँधी की। सोनिया गाँधी बीमार रहती हैं। प्रियंका गाँधी भी राहुल के पीछे-पीछे चलने में विश्वास रखती हैं। ऐसे में राहुल गाँधी का पार्ट टाइम पॉलिटिक्स ने पार्टी का बेडा गर्क कर रखा है। पार्टी धीरे- धीरे सिकुड़ती जा रही है। भारत की सबसे पुरानी पार्टी जनता पर बेअसर होती जा रही है, इसके पीछे राहुल गाँधी की पॉलिटिक्स ही जिम्मेदार है।

ईरान vs इजरायल-अमेरिका युद्ध के असली ‘विजेता’ बनते व्लादिमीर पुतिन: जानें- कैसे रूस के लिए ‘वरदान’ बन गया मिडिल ईस्ट का संकट

आज पूरी दुनिया की नजरें ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच छिड़ी जंग पर टिकी हैं। हर कोई डरा हुआ है कि कहीं यह तीसरा विश्व युद्ध न बन जाए। लेकिन इस बारूद के ढेर से हजारों किलोमीटर दूर बैठा एक शख्स शायद मन ही मन मुस्कुरा रहा है, वह हैं रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन।

देखा जाए तो यह युद्ध पुतिन के लिए किसी ‘वरदान’ से कम नहीं है। जब से रूस ने यूक्रेन पर हमला किया था, दुनिया भर ने पुतिन को अलग-थलग कर दिया था। लेकिन अब मिडिल ईस्ट के इस संकट ने उन्हें एक नई ‘लाइफलाइन’ दे दी है।

इसके पीछे की सीधी सी बात यह है कि जब दुनिया में तनाव बढ़ता है, तो तेल की कीमतें आसमान छूने लगती हैं। रूस के पास तेल और गैस का भंडार है, तो जितना महँगा तेल बिकेगा, पुतिन की तिजोरी उतनी ही भरेगी। दूसरा बड़ा फायदा यह है कि अब अमेरिका और यूरोप का पूरा ध्यान यूक्रेन से हटकर मिडिल ईस्ट पर टिक गया है।

सीधे शब्दों में कहें तो, पश्चिम के देश अब ईरान और इजरायल की आग बुझाने में उलझ गए हैं और पुतिन को यूक्रेन के मोर्चे पर बड़ी राहत मिल गई है। यह पुतिन के लिए सिर्फ एक संकट नहीं, बल्कि अपनी ताकत और अर्थव्यवस्था को दोबारा खड़ा करने का एक सुनहरा मौका साबित हो रहा है।

ईरान-इजरायल युद्ध: पुतिन की जीत के 5 सबसे बड़े कारण

तेल की आसमान छूती कीमतें: रूस की तिजोरी में ‘डॉलर की बरसात’- मिडिल ईस्ट में मचे बवाल का सबसे बड़ा फायदा रूस की जेब को हुआ है। असल में दुनिया का 20% तेल जिस रास्ते (होर्मुज जलडमरूमध्य) से होकर गुजरता है, वहाँ जंग के कारण खतरा बढ़ गया है। इस डर से कच्चे तेल की कीमतें $100 के पार निकल गई हैं।

चूंकि रूस की पूरी कमाई तेल और गैस बेचने से होती है, इसलिए तेल जितना महँगा हो रहा है, रूस को हर दिन बैठे-बिठाए करोड़ों डॉलर का एक्स्ट्रा मुनाफा हो रहा है। यही मोटी कमाई पुतिन को यूक्रेन के साथ युद्ध जारी रखने की ताकत दे रही है और उन पर लगे विदेशी प्रतिबंधों के असर को भी बेअसर कर रही है।

यूक्रेन से दुनिया का ध्यान भटकना- पिछले दो सालों से पूरी दुनिया और मीडिया सिर्फ रूस-यूक्रेन युद्ध की बातें कर रहे थे। लेकिन जैसे ही ईरान और इजरायल के बीच मिसाइलें चलनी शुरू हुईं, सबका ध्यान उस तरफ चला गया। अब अमेरिका और यूरोप के देशों की पहली कोशिश मिडिल ईस्ट की इस आग को शांत करने की है।

पुतिन के लिए यह किसी लॉटरी से कम नहीं है, क्योंकि अब उन पर दुनिया का दबाव कम हो गया है। इस ‘सुनहरे मौके’ का फायदा उठाकर वे अब यूक्रेन के खिलाफ अपनी सैन्य रणनीति को और भी ज्यादा आक्रामक तरीके से आगे बढ़ा रहे हैं।

अमेरिकी हथियारों और संसाधनों का बँटवारा- पहले अमेरिका अपने ढेर सारे हथियार और सैन्य मदद यूक्रेन को भेज रहा था, लेकिन अब उसे अपने सबसे पुराने दोस्त इजरायल की मदद के लिए अपने खजाने खोलने पड़े हैं। अब अमेरिका की मिसाइलें और आधुनिक हथियार यूक्रेन के बजाय मिडिल ईस्ट (इजरायल) भेजे जा रहे हैं।

अगर अमेरिका के पास हथियारों का स्टॉक कम हो जाता है, तो जाहिर है कि यूक्रेन को मदद मिलनी कम हो जाएगी और उसकी सुरक्षा कमजोर पड़ जाएगी। इसका सीधा-सीधा फायदा रूस की सेना को होगा, जिसे रोकने वाला कोई नहीं बचेगा।

प्रतिबंधों के दबाव में आई ढील- सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात तो यह है कि अमेरिका ने तेल के दामों को बढ़ने से रोकने के लिए अपने नियमों में थोड़ी ढील दे दी है। कुछ खबरों की मानें तो ईरान से होने वाली तेल की सप्लाई रुकने की वजह से अमेरिका ने दबी जुबान में रूसी तेल को बाजार में आने की मंजूरी दे दी है। पुतिन के लिए तो यह किसी लॉटरी जैसा है, क्योंकि 2022 से रूस की कमाई रोकने के लिए अमेरिका ने जो कड़े प्रतिबंध लगाए थे, उनकी पकड़ अब ढीली पड़ती नजर आ रही है।

बढ़ता हुआ कूटनीतिक प्रभाव- पुतिन इस पूरे झगड़े का फायदा खुद को दुनिया का एक बड़ा और समझदार नेता दिखाने के लिए कर रहे हैं। रूस के ईरान के साथ तो अच्छे रिश्ते हैं ही, साथ ही वह इस इलाके के बाकी देशों से भी बातचीत कर रहा है।

वहीं दूसरी तरफ, अमेरिका और उसके साथी देशों (नाटो) के बीच इस बात को लेकर अनबन शुरू हो गई है कि ईरान और रूस से कैसे निपटा जाए। पुतिन इसी आपसी फूट का फायदा उठा रहे हैं और उनकी एकता को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं।

रूस किस साइड है?

दिखावे के लिए तो रूस ऐसा जताता है जैसे वह किसी की तरफ नहीं है और बीच-बचाव कर रहा है, लेकिन असल में वह ईरान के साथ मजबूती से खड़ा है। रूस और ईरान की दोस्ती और हथियारों का लेनदेन बहुत पुराना है। जब यूक्रेन के साथ युद्ध में रूस फँसा था, तब ईरान ने उसे ड्रोन और तकनीक देकर बड़ी मदद की थी, और अब पुतिन वही पुराना अहसान चुका रहे हैं।

यहाँ तक कि कुछ खबरों में तो यह भी कहा जा रहा है कि ईरान के नए सबसे बड़े नेता मोजतबा खामेनेई को इलाज के लिए खास रूसी विमान से मॉस्को (रूस) ले जाया गया है। यह बात साफ दिखाती है कि दोनों देश अब एक-दूसरे के कितने करीब आ चुके हैं।

युद्ध शुरू होने से पहले रूस का रुख

जंग शुरू होने से पहले ही रूस ने अमेरिका और उसके साथी देशों को खरी-खोटी सुनाई थी। रूस के राष्ट्रपति कार्यालय (क्रेमलिन) ने बार-बार चेतावनी दी थी कि मिडिल ईस्ट में अमेरिका अपनी मनमानी कर रहा है और उसकी यही नीतियाँ पूरे इलाके को तबाही की ओर ले जाएँगी।

पुतिन का कहना था कि जब तक इजरायल और फिलिस्तीन का पुराना झगड़ा नहीं सुलझता, तब तक वहां शांति नहीं हो सकती। रूस ने अमेरिका को ‘आग से न खेलने’ की सलाह दी थी, लेकिन अंदर ही अंदर रूस को पता था कि अगर वहां तनाव बढ़ता है, तो अंत में फायदा उसी का होने वाला है।

पुतिन को मिल रहे अन्य फायदे और जमीनी हकीकत

जैसे-जैसे जंग बढ़ रही है, पुतिन के हाथ कुछ और बड़े जैकपॉट लग रहे हैं। सबसे पहली बात तो ये कि ईरान अब पूरी तरह रूस की मुट्ठी में आ गया है। जंग की वजह से उसे हथियारों और मदद के लिए रूस की जरूरत है, जिसका फायदा उठाकर रूस अब ईरान की मिलिट्री तकनीक और ठिकानों का इस्तेमाल अपने काम के लिए कर सकता है।

दूसरी तरफ, पुतिन पूरी दुनिया को ये ढोल पीटकर बता रहे हैं कि अमेरिका सबको सुरक्षा देने में फेल हो गया है। ट्रंप का नाटो देशों को धमकाना और चीन के साथ उनका बिगड़ता रिश्ता पुतिन के लिए किसी सुनहरे मौके जैसा है। इसके अलावा, अब रूस, चीन और ईरान ने मिलकर अपना एक अलग गुट बना लिया है, जो तेल के बाजार और डॉलर की बादशाहत को खत्म करने की तैयारी में है।

ईरान और इजरायल के बीच जलता हुआ मिडिल ईस्ट पुतिन के लिए एक ऐसी बिसात बन गया है जहाँ उनके दुश्मन (अमेरिका और पश्चिम) उलझे हुए हैं और उनकी खुद की आर्थिक और सैन्य स्थिति मजबूत हो रही है। यदि यह युद्ध लंबा खिंचता है, तो पुतिन न केवल यूक्रेन में अपनी स्थिति मजबूत कर लेंगे, बल्कि वह दुनिया के नए शक्ति केंद्र के रूप में भी उभर सकते हैं।

बुंदेलखंड एक्सप्रेस वे पर चादर बिछाकर इफ्तार: जानिए हाईवे पर यूट्यूबर सबा इब्राहिम जैसी हरकत करने वालों के लिए है कौन सा कानून, क्या मिल सकती है सजा

नमाज के लिए सड़कों को ब्लॉक करना अब मजहबी तत्वों के लिए सामान्य बात हो गई है, लेकिन इफ्तार के लिए हाईवे पर ही चादर बिछाकर बैठ जाना ये सोशल मीडिया पर नया कारनामा है। इसे करने वाली कोई और नहीं बल्कि मशहूर यूट्यूबर और टीवी एक्टर शोएब इब्राहिम की बहन सबा इब्राहिम हैं।

13 मार्च 2026 को अपलोड किए गए सबा के व्लॉग में उन्होंने रमजान में अपने ससुराल जाने की जर्नी को दिखाया है। इसकी शुरुआत में ही देख सकते हैं कि सबा इब्राहिम और उनके शौहर बुंदेलखंड एक्सप्रेस वे पर उतरते हैं और उसके बाद फोटोशूट होता है, फिर वहीं वह एक चादर बिछाकर अपने पूरे परिवार के साथ हाईवे पर बैठकर इफ्तार करते हैं।

इस दौरान उनके साथ उनकी खाला, एक कृष्णा नाम का लड़का और उनका एक साल का बेटा भी था। लेकिन सबा और शौहर को किसी की कोई परवाह नहीं हुई।

इफ्तार के बाद सबा ये कहते हुए भी दिखती हैं कि उन्हें बहुत मजा आया और ये उनका पहला अनुभव था। उनकी इस वीडियो को अब तक 11 लाख से ज्यादा लोग देख चुके हैं और लगातार इसपर चर्चा जारी है।

वीडियो का प्रभाव

सबा इब्राहिम लॉकडाउन के बाद सोशल मीडिया पर काफी लोकप्रिय हुई हैं और वर्तमान में उनके 30 लाख से अधिक फॉलोअर्स हैं। ऐसे में उनकी गतिविधियों का असर बड़ी संख्या में लोगों, खासकर युवाओं पर पड़ सकता है। कई लोग उन्हें फॉलो करते हैं और उनके जीवनशैली से प्रेरित होते हैं। इसलिए यह जरूरी हो जाता है कि सार्वजनिक मंचों पर जिम्मेदार व्यवहार दिखाया जाए।

यह भी स्पष्ट करना आवश्यक है कि हाईवे पर इस तरह इफ्तार करना किसी मजहबी परंपरा का हिस्सा नहीं है। इसके विपरीत, यह कानून के अनुसार गलत है और सार्वजनिक सुरक्षा के लिए खतरा पैदा कर सकता है। इसके लिए राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम, 1956 की धारा 8-ख जोड़ी जाती है। अब ये धारा क्या है, आइए जानते हैं

क्या है हाईवे अवरोध करने पर कानून

राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम, 1956 की धारा 8-ख के अंतर्गत राष्ट्रीय राजमार्गों (नेशनल हाईवे) को क्षति पहुँचाने या उनमें व्यवधान उत्पन्न करने को एक गंभीर दंडनीय अपराध माना गया है।

इस प्रावधान के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर ऐसा कोई कार्य करता है जिससे राजमार्ग में अवरोध हो जाए या उस पर यात्रा करना और संपत्ति का परिवहन असुरक्षित हो जाए, तो उसे पाँच वर्ष तक के कारावास, जुर्माने, या दोनों से दंडित किया जा सकता है।

यह धारा विशेष रूप से राजमार्गों की सुरक्षा के लिए वर्ष 1995 में जोड़ी गई थी जिन्हें केंद्र सरकार द्वारा विशेष समझौतों के तहत विकसित या अनुरक्षित किया जाता है, ताकि सार्वजनिक बुनियादी ढांचे को शरारती तत्वों और जानबूझकर किए जाने वाले नुकसान से बचाया जा सके। इसके अलावा आईपीसी की धारा 341 भी गलत तरीके से लोगों/वाहनों के रास्ता रोकने पर लगाई जाती है।

उदाहरण से समझाएँ तो नेशनल हाईवे पर प्रदर्शन करना या धरना देना, जिससे और लोगों के लिए रास्ता जाम हो जाए व एम्बुलेंस, बसें या ट्रक न निकल पाएँ, तो यह धारा 8-ख और IPC 341 दोनों के तहत अपराध बन सकता है।

इसी प्रकार हाईवे के बीच लाकर कोई निर्माण सामग्री या फिर अपनी गाड़ी खड़ी करना भी इन धाराओं के तहत दंडनीय है। यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर ट्रक, ट्रैक्टर या अपनी गाड़ी बीच में छोड़ता है तो कानून उस पर एक्शन ले सकता है।

सबा इब्राहिम से जुड़े मामले में भले ही यातायात बाधित नहीं हुआ, लेकिन वीडियो में साफ दिख रहा है कि उस हाईवे पर गाड़ियाँ आ जा रही थीं। यूट्यूबर ने कुछ व्यूज के लिए न कानून की परवाह की और न ही परिवार की सुरक्षा की। अब लोग इसी कारण से उनपर सवाल उठा रहे हैं।

अखिलेश यादव ने कांशीराम को दिया धोखा: UP में ‘बहुजन दिवस’ के नाम पर सपा ने की खानापूर्ति, खुद मुंबई में सितारों संग सजाई ‘महफिल’

समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कांशीराम जयंती को ‘PDA दिवस’ (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) के रूप में मनाने का भव्य ऐलान किया था। पार्टी ने पूरे उत्तर प्रदेश में जिला स्तर पर कार्यक्रमों का निर्देश जारी किया। लेकिन रविवार (15 मार्च 2026) को जब दलित-बहुजन समाज कांशीराम की जयंती मना रहा था, अखिलेश यादव मुंबई पहुँच गए। वहाँ उन्होंने ‘Vision India: Creative Economy Summit’ में भाग लिया और बॉलीवुड सुपरस्टार सलमान खान से मुलाकात की। सपा की PDA रट लगाने वाले अखिलेश का यह व्यवहार न सिर्फ पाखंड का उदाहरण है, बल्कि उनकी राजनीति की खोखलापन को भी उजागर करता है।

क्या है पूरा मामला, पहले ये समझ लें

दरअसल, समाजवादी पार्टी की ओर से खुद अखिलेश यादव ने ऐलान किया था कि सपा ने 15 मार्च 2026 को कांशीराम जयंती को ‘बहुजन समाज दिवस अर्थात PDA दिवस’ मनाएगी। प्रदेश अध्यक्ष श्यामलाल पाल ने सर्कुलर जारी कर सभी जिलों में कार्यक्रम करने के निर्देश दिए। लेकिन अखिलेश खुद उत्तर प्रदेश में कहीं नजर नहीं आए।

इसके बजाय उन्होंने मुंबई का रुख किया। वहाँ ‘Vision India: Creative Economy Summit’ में शामिल होकर उन्होंने एक्स पर लिखा, “जो इंसान, इंसानियत और दुनिया को बेहतर बनाए वही क्रिएटिविटी है।” ट्वीट में उन्होंने क्रिएटिव इकॉनमी पर लंबा भाषण दिया और तस्वीरें शेयर कीं।

इसी दिन अखिलेश ने सलमान खान के बांद्रा स्थित घर पहुँचकर मुलाकात की। उन्होंने ट्वीट किया, “मुंबई मिलन! @BeingSalmanKhan” और फोटो शेयर की।

जब पत्रकारों ने पूछा कि PDA दिवस के दिन आप मुंबई में सलमान खान से मिल रहे हैं, तो अखिलेश ने जवाब दिया कि सलमान के पिता सलीम खान की तबीयत खराब है, इसलिए आए हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि सलीम खान की तबीयत कई दिनों से खराब बताई जा रही थी। मुलाकात एक दिन पहले या बाद में भी हो सकती थी। लेकिन अखिलेश ने PDA दिवस की ‘खानापूर्ति’ के लिए मुंबई की राह पकड़ ली। सलमान से मिलने के बाद उन्होंने कांशीराम को भारत रत्न देने की माँग भी की, लेकिन यह सब उत्तर प्रदेश से दूर…मुंबई से।

इसके विपरीत, बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सुप्रीमो मायावती ने अखिलेश के PDA ऐलान पर पहले ही तीखा हमला बोला था। उन्होंने कहा कि सपा का PDA असल में ‘परिवार दल अलायंस’ है। मायावती ने सपा पर नौटंकीबाजी का आरोप लगाया और कहा कि सपा का चाल-चरित्र-चेहरा हमेशा दलित-पिछड़ा विरोधी रहा है। बसपा ने अपने स्तर पर कांशीराम जयंती के कार्यक्रम किए, जबकि सपा ने सिर्फ खानापूर्ति की। अखिलेश यादव सपा के मुखिया हैं, लेकिन PDA दिवस पर उन्होंने उत्तर प्रदेश के दलित-बहुजन कार्यकर्ताओं को संबोधित करने की बजाय बॉलीवुड की चकाचौंध चुनी।

दलितों पर अत्याचार की खबर आते ही अखिलेश यादव ने मूँद ली आँखें

यह पहला मौका नहीं है जब अखिलेश यादव की PDA राजनीति की असली सूरत सामने आई हो। सपा की यह PDA सिर्फ वोट बैंक की रणनीति है। जब दलितों पर अत्याचार होता है और अपराधी यादव समुदाय से जुड़ा होता है, तो अखिलेश और सपा पूरी तरह चुप हो जाते हैं। ताजा उदाहरण भदोही (संत रविदास नगर) की घटना है। जहाँ दलित चौकीदार जैसलाल सरोज को पेट्रोल डालकर जिंदा जला दिया गया। आरोपित का नाम कमलेश यादव है, जिसे गिरफ्तार कर लिया गया।

लेकिन अखिलेश यादव ने इस घटना पर एक शब्द भी नहीं कहा। न ट्वीट, न प्रेस कॉन्फ्रेंस, न परिवार से मुलाकात। जब पीड़ित दलित होता है और अपराधी यादव, तो सपा की ‘PDA’ की ‘डी’ (दलित) गायब हो जाती है। जब अपराधी यादव होता है तो चुप्पी, वरना ‘संविधान बचाओ’ का राग अलापती है। यह PDA राजनीति का सबसे बड़ा पाखंड है। अखिलेश यादव दलितों के नाम पर वोट माँगते हैं, लेकिन जब उनके अपने समुदाय का कोई व्यक्ति दलित पर अत्याचार करता है, तो आँखें बंद कर लेते हैं।

अखिलेश यादव की प्राथमिकता परिवारवाद, सेलिब्रिटी कल्चर और सैफई महोत्सव

राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो अखिलेश यादव की यह हरकत 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारी को भी उजागर करती है। PDA का नारा पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों को एकजुट करने का दावा करता है, लेकिन अखिलेश का मुंबई भ्रमण साबित करता है कि उनकी प्राथमिकता परिवारवाद, सेलिब्रिटी कल्चर और सैफई महोत्सव जैसी चकाचौंध है।

सपा उत्तर प्रदेश की पार्टी है, लेकिन मुखिया मुंबई में क्रिएटिव इकॉनमी समिट में व्यस्त हैं। क्या यह सामाजिक न्याय है? क्या PDA दिवस मनाने के लिए सिर्फ ट्वीट और सर्कुलर काफी है, जबकि नेता खुद मौजूद नहीं?

अखिलेश यादव ने कांशीराम जयंती पर PDA दिवस का ऐलान किया, लेकिन खुद मुंबई चले गए। सलमान खान से हाथ मिलाया, सलीम खान की तबीयत का बहाना बनाया, लेकिन दलितों की पीड़ा पर चुप रहे। भदोही जैसी घटनाओं में चुप्पी साध लेना उनकी सोच को दर्शाता है। सपा यादव-केंद्रित पार्टी है। PDA का ‘डी’ सिर्फ चुनावी जुमला है। असली दलित उत्थान तो बसपा जैसे दलों के पास है, जो कांशीराम की विरासत को सच्चे अर्थों में निभाती है।

अखिलेश यादव PDA दिवस मनाने के लिए जोर-शोर से डंका बजा रहे थे, लेकिन कल इनको बुलावा मिला तो मुंबई चले गए, सलमान खान-रितेश देशमुख और बाकी सब से मिले, X पर इसकी स्टोरी भी डाली लेकिन कांशीराम जयंती को सिर्फ एक पोस्ट में निपटा दिया। हालाँकि उन्होंने पीडीए दिवस तो मनाया, लेकिन उससे एक दिन पहले यानी 14 मार्च 2026 को सपा की महारैली कर के। जिसमें पीडीए के नाम पर सिर्फ इफ्तार पार्टी में हिस्सा लिया।

यह पूरा घटनाक्रम सपा की क्रेडिबिलिटी पर सवाल खड़ी करती है। अखिलेश यादव की यह दोहरी नीति न सिर्फ दलित समाज को ठगा रही है, बल्कि पूरे PDA गठबंधन को कमजोर कर रही है। उत्तर प्रदेश की जनता अब ऐसे पाखंड को पहचान चुकी है। फिलहाल अखिलेश यादव का मुंबई वाला ‘मिलन’ PDA दिवस की सच्चाई को बेनकाब कर चुका है।