आज पूरी दुनिया की नजरें ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच छिड़ी जंग पर टिकी हैं। हर कोई डरा हुआ है कि कहीं यह तीसरा विश्व युद्ध न बन जाए। लेकिन इस बारूद के ढेर से हजारों किलोमीटर दूर बैठा एक शख्स शायद मन ही मन मुस्कुरा रहा है, वह हैं रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन।
देखा जाए तो यह युद्ध पुतिन के लिए किसी ‘वरदान’ से कम नहीं है। जब से रूस ने यूक्रेन पर हमला किया था, दुनिया भर ने पुतिन को अलग-थलग कर दिया था। लेकिन अब मिडिल ईस्ट के इस संकट ने उन्हें एक नई ‘लाइफलाइन’ दे दी है।
इसके पीछे की सीधी सी बात यह है कि जब दुनिया में तनाव बढ़ता है, तो तेल की कीमतें आसमान छूने लगती हैं। रूस के पास तेल और गैस का भंडार है, तो जितना महँगा तेल बिकेगा, पुतिन की तिजोरी उतनी ही भरेगी। दूसरा बड़ा फायदा यह है कि अब अमेरिका और यूरोप का पूरा ध्यान यूक्रेन से हटकर मिडिल ईस्ट पर टिक गया है।
सीधे शब्दों में कहें तो, पश्चिम के देश अब ईरान और इजरायल की आग बुझाने में उलझ गए हैं और पुतिन को यूक्रेन के मोर्चे पर बड़ी राहत मिल गई है। यह पुतिन के लिए सिर्फ एक संकट नहीं, बल्कि अपनी ताकत और अर्थव्यवस्था को दोबारा खड़ा करने का एक सुनहरा मौका साबित हो रहा है।
ईरान-इजरायल युद्ध: पुतिन की जीत के 5 सबसे बड़े कारण
तेल की आसमान छूती कीमतें: रूस की तिजोरी में ‘डॉलर की बरसात’- मिडिल ईस्ट में मचे बवाल का सबसे बड़ा फायदा रूस की जेब को हुआ है। असल में दुनिया का 20% तेल जिस रास्ते (होर्मुज जलडमरूमध्य) से होकर गुजरता है, वहाँ जंग के कारण खतरा बढ़ गया है। इस डर से कच्चे तेल की कीमतें $100 के पार निकल गई हैं।
चूंकि रूस की पूरी कमाई तेल और गैस बेचने से होती है, इसलिए तेल जितना महँगा हो रहा है, रूस को हर दिन बैठे-बिठाए करोड़ों डॉलर का एक्स्ट्रा मुनाफा हो रहा है। यही मोटी कमाई पुतिन को यूक्रेन के साथ युद्ध जारी रखने की ताकत दे रही है और उन पर लगे विदेशी प्रतिबंधों के असर को भी बेअसर कर रही है।
यूक्रेन से दुनिया का ध्यान भटकना- पिछले दो सालों से पूरी दुनिया और मीडिया सिर्फ रूस-यूक्रेन युद्ध की बातें कर रहे थे। लेकिन जैसे ही ईरान और इजरायल के बीच मिसाइलें चलनी शुरू हुईं, सबका ध्यान उस तरफ चला गया। अब अमेरिका और यूरोप के देशों की पहली कोशिश मिडिल ईस्ट की इस आग को शांत करने की है।
पुतिन के लिए यह किसी लॉटरी से कम नहीं है, क्योंकि अब उन पर दुनिया का दबाव कम हो गया है। इस ‘सुनहरे मौके’ का फायदा उठाकर वे अब यूक्रेन के खिलाफ अपनी सैन्य रणनीति को और भी ज्यादा आक्रामक तरीके से आगे बढ़ा रहे हैं।
अमेरिकी हथियारों और संसाधनों का बँटवारा- पहले अमेरिका अपने ढेर सारे हथियार और सैन्य मदद यूक्रेन को भेज रहा था, लेकिन अब उसे अपने सबसे पुराने दोस्त इजरायल की मदद के लिए अपने खजाने खोलने पड़े हैं। अब अमेरिका की मिसाइलें और आधुनिक हथियार यूक्रेन के बजाय मिडिल ईस्ट (इजरायल) भेजे जा रहे हैं।
अगर अमेरिका के पास हथियारों का स्टॉक कम हो जाता है, तो जाहिर है कि यूक्रेन को मदद मिलनी कम हो जाएगी और उसकी सुरक्षा कमजोर पड़ जाएगी। इसका सीधा-सीधा फायदा रूस की सेना को होगा, जिसे रोकने वाला कोई नहीं बचेगा।
प्रतिबंधों के दबाव में आई ढील- सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात तो यह है कि अमेरिका ने तेल के दामों को बढ़ने से रोकने के लिए अपने नियमों में थोड़ी ढील दे दी है। कुछ खबरों की मानें तो ईरान से होने वाली तेल की सप्लाई रुकने की वजह से अमेरिका ने दबी जुबान में रूसी तेल को बाजार में आने की मंजूरी दे दी है। पुतिन के लिए तो यह किसी लॉटरी जैसा है, क्योंकि 2022 से रूस की कमाई रोकने के लिए अमेरिका ने जो कड़े प्रतिबंध लगाए थे, उनकी पकड़ अब ढीली पड़ती नजर आ रही है।
बढ़ता हुआ कूटनीतिक प्रभाव- पुतिन इस पूरे झगड़े का फायदा खुद को दुनिया का एक बड़ा और समझदार नेता दिखाने के लिए कर रहे हैं। रूस के ईरान के साथ तो अच्छे रिश्ते हैं ही, साथ ही वह इस इलाके के बाकी देशों से भी बातचीत कर रहा है।
वहीं दूसरी तरफ, अमेरिका और उसके साथी देशों (नाटो) के बीच इस बात को लेकर अनबन शुरू हो गई है कि ईरान और रूस से कैसे निपटा जाए। पुतिन इसी आपसी फूट का फायदा उठा रहे हैं और उनकी एकता को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं।
रूस किस साइड है?
दिखावे के लिए तो रूस ऐसा जताता है जैसे वह किसी की तरफ नहीं है और बीच-बचाव कर रहा है, लेकिन असल में वह ईरान के साथ मजबूती से खड़ा है। रूस और ईरान की दोस्ती और हथियारों का लेनदेन बहुत पुराना है। जब यूक्रेन के साथ युद्ध में रूस फँसा था, तब ईरान ने उसे ड्रोन और तकनीक देकर बड़ी मदद की थी, और अब पुतिन वही पुराना अहसान चुका रहे हैं।
यहाँ तक कि कुछ खबरों में तो यह भी कहा जा रहा है कि ईरान के नए सबसे बड़े नेता मोजतबा खामेनेई को इलाज के लिए खास रूसी विमान से मॉस्को (रूस) ले जाया गया है। यह बात साफ दिखाती है कि दोनों देश अब एक-दूसरे के कितने करीब आ चुके हैं।
युद्ध शुरू होने से पहले रूस का रुख
जंग शुरू होने से पहले ही रूस ने अमेरिका और उसके साथी देशों को खरी-खोटी सुनाई थी। रूस के राष्ट्रपति कार्यालय (क्रेमलिन) ने बार-बार चेतावनी दी थी कि मिडिल ईस्ट में अमेरिका अपनी मनमानी कर रहा है और उसकी यही नीतियाँ पूरे इलाके को तबाही की ओर ले जाएँगी।
पुतिन का कहना था कि जब तक इजरायल और फिलिस्तीन का पुराना झगड़ा नहीं सुलझता, तब तक वहां शांति नहीं हो सकती। रूस ने अमेरिका को ‘आग से न खेलने’ की सलाह दी थी, लेकिन अंदर ही अंदर रूस को पता था कि अगर वहां तनाव बढ़ता है, तो अंत में फायदा उसी का होने वाला है।
पुतिन को मिल रहे अन्य फायदे और जमीनी हकीकत
जैसे-जैसे जंग बढ़ रही है, पुतिन के हाथ कुछ और बड़े जैकपॉट लग रहे हैं। सबसे पहली बात तो ये कि ईरान अब पूरी तरह रूस की मुट्ठी में आ गया है। जंग की वजह से उसे हथियारों और मदद के लिए रूस की जरूरत है, जिसका फायदा उठाकर रूस अब ईरान की मिलिट्री तकनीक और ठिकानों का इस्तेमाल अपने काम के लिए कर सकता है।
दूसरी तरफ, पुतिन पूरी दुनिया को ये ढोल पीटकर बता रहे हैं कि अमेरिका सबको सुरक्षा देने में फेल हो गया है। ट्रंप का नाटो देशों को धमकाना और चीन के साथ उनका बिगड़ता रिश्ता पुतिन के लिए किसी सुनहरे मौके जैसा है। इसके अलावा, अब रूस, चीन और ईरान ने मिलकर अपना एक अलग गुट बना लिया है, जो तेल के बाजार और डॉलर की बादशाहत को खत्म करने की तैयारी में है।
ईरान और इजरायल के बीच जलता हुआ मिडिल ईस्ट पुतिन के लिए एक ऐसी बिसात बन गया है जहाँ उनके दुश्मन (अमेरिका और पश्चिम) उलझे हुए हैं और उनकी खुद की आर्थिक और सैन्य स्थिति मजबूत हो रही है। यदि यह युद्ध लंबा खिंचता है, तो पुतिन न केवल यूक्रेन में अपनी स्थिति मजबूत कर लेंगे, बल्कि वह दुनिया के नए शक्ति केंद्र के रूप में भी उभर सकते हैं।


