Tuesday, March 31, 2026
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भदोही में दलित चौकीदार को पेट्रोल डालकर यादव दबंगों ने जिंदा जलाया, SC-ST एक्ट में जेल: अखिलेश यादव की चुप्पी पर सवाल, PDA के D के साथ कब होंगे खड़े?

सपा पीडीए (पिछड़े-दलित-अल्पसंख्यक) का नारा लगाती है लेकिन जब आरोपित यादव समुदाय से जुड़ा होता है तो दलित पीड़ित पर आवाज क्यों गायब हो जाती है? अखिलेश ने न बयान दिया, न प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई।

उत्तर प्रदेश के भदोही जिले (संत रविदास नगर) के ज्ञानपुर थाना क्षेत्र के पिपरगाँव गाँव में 9 मार्च 2026 की सुबह एक दलित को दबंगों ने पेट्रोल डालकर जिंदा जला दिया। जानकारी के मुताबिक, दलित चौकीदार जैसलाल सरोज को पेट्रोल डालकर जिंदा जलाने का आरोप ग्राम प्रधान रामनाथ यादव के पुत्र कमलेश यादव (30) पर है। ये विवाद एक हैंडपंप की मरम्मत को लेकर शुरू हुआ, जो पुरानी रंजिश में बदल गया। हालाँकि पुलिस ने आरोपित को गिरफ्तार कर लिया। इस मामले में हत्या की धाराओं के साथ SC-ST एक्ट भी लगा है।

ये मामला सोशल मीडिया पर लगातार वायरल हो रहा है, लेकिन पीडीए का राज अलापने वाले सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और उनकी पार्टी की ओर से अब तक कोई बयान या संवेदना तक नहीं आई है। यही चुप्पी सपा की पीडीए (पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक) राजनीति पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है।

क्या है पूरी वारदात, जिसमें चली गई गरीब चौकीदार की जान

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ज्ञानपुर पुलिस स्टेशन से जुड़े चौकीदार जैसलाल सरोज गाँव के प्रधान के घर हैंडपंप पाइप की मरम्मत की माँग लेकर गए। वहाँ विवाद बढ़ा। पुलिस के अनुसार कमलेश यादव ने पेट्रोल की गैलन लाकर पीड़ित पर डाला और आग लगा दी। प्रधान की पत्नी चिंता देवी ने दावा किया कि पीड़ित खुद आग लगाकर भागे, लेकिन पीड़ित परिवार और गाँववासियों का आरोप साफ है।

एसपी अभिमन्यु मांगलिक और डीएम शैलेश कुमार ने मौके पर पहुँचकर परिवार को न्याय का आश्वासन दिया। आरोपित कमलेश को गिरफ्तार कर लिया गया। मेडिकल रिपोर्ट और पोस्टमॉर्टम के बाद मामले में हत्या की धाराएँ जोड़ी गईं। पुलिस जाँच जारी है और पुरानी रंजिश (पिछले साल दलित बस्ती-यादव बस्ती के झगड़े) को भी अहम मान रही है।

अखिलेश यादव और सपा की चुप्पी पर उठ रहे सवाल

हालाँकि पीडीए का नारा लगाने वाली सपा पूरी तरह चुप है। अखिलेश यादव ने न तो ट्वीट किया, न प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई, न ही किसी सपा नेता ने परिवार से मुलाकात की। जब दलित पीड़ित होता है और आरोपित यादव या मुस्लिम समुदाय से जुड़ा होता है तो सपा की आवाज क्यों गायब हो जाती है? यही सवाल पूरे उत्तर प्रदेश में उठ रहे हैं।

सपा की राजनीति पर नजर डालें तो पैटर्न साफ दिखता है। जब कोई दलित युवक ऊँची जाति या भाजपा कार्यकर्ता द्वारा पीटा जाता है, अखिलेश तुरंत ‘संविधान पर हमला’ और ‘पीडीए पर अत्याचार’ का राग अलापते हैं। अयोध्या में दलित महिला की मौत पर, आगरा हिंसा पर या सपा सांसद के घर पर हमले पर उन्होंने तुरंत बयान दिए। लेकिन भदोही जैसे मामलों में चुप्पी साथ ली जाती है। चूँकि यादव समुदाय सपा का वोट बैंक है। क्या यही वजह है कि दलित पीड़ित ‘दिखता’ ही नहीं?

पीडीए का डी क्या सिर्फ वोटबैंक है?

क्या पीडीए सिर्फ चुनावी नारा है या वाकई दलित उत्थान का एजेंडा? यह चुप्पी न सिर्फ दलित समाज को ठगा महसूस कराती है, बल्कि पूरे सामाजिक न्याय के दावे पर सवाल उठाती है।

सपा की यह दोहरी नीति समाज को बाँट रही है। उत्तर प्रदेश में दलित-यादव एकता का सपना दिखाकर वोट माँगने वाली पार्टी, जब अपनी जाति का आरोपित सामने आता है तो दलित पीड़ित को भूल जाती है। क्या यह सपा की तुष्टिकरण राजनीति का हिस्सा है? क्या अखिलेश यादव को याद नहीं कि वे खुद ‘समाजवादी’ कहलाते हैं? समाज को जगाने की जरूरत है। दलित अत्याचार पर चुप्पी किसी भी पार्टी की हो, उसे बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए।

यह घटना सिर्फ भदोही की नहीं, पूरे देश की है। अगर सपा सच में पीडीए की बात करती है तो अखिलेश यादव को तुरंत बयान देना चाहिए, परिवार से मिलना चाहिए और न्याय की माँग करनी चाहिए। चुप्पी से सवाल और बढ़ेंगे। क्या यादव-दलित एकता सिर्फ कागजों तक सीमित है? क्या सपा अब दलितों को सिर्फ वोट बैंक मानती है? समय आ गया है कि समाज इस दोहरे मापदंड पर बहस करे। खून किसी भी जाति का हो, अपराधी को सजा मिलनी चाहिए और राजनीतिक चुप्पी टूटनी चाहिए। अन्यथा सामाजिक न्याय का नारा सिर्फ चुनावी जुमला साबित होगा।

इस मामले में उत्तर प्रदेश सरकार ने त्वरित कार्रवाई की है, लेकिन राजनीतिक दलों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। दलितों की आवाज दबाने वाली चुप्पी समाज को कमजोर करती है। अब बहस शुरू होनी चाहिए कि क्या पीडीए में से डी वाला हिस्सा सपा के सिर्फ दलितों को ठगने के लिए हैं?

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श्रवण शुक्ल
श्रवण शुक्ल
I am Shravan Kumar Shukla, known as ePatrakaar, a multimedia journalist deeply passionate about digital media. I’ve been actively engaged in journalism, working across diverse platforms including agencies, news channels, and print publications. My understanding of social media strengthens my ability to thrive in the digital space. Above all, ground reporting is closest to my heart and remains my preferred way of working. explore ground reporting digital journalism trends more personal tone.

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