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मी लॉर्ड! ये ‘दरियादिली’ कहीं गले की हड्डी न बन जाए, अरविंद केजरीवाल को अंतरिम जमानत ने बताया न्यायिक सुधार अविलंब क्यों जरूरी

सुप्रीम कोर्ट ने आज शुक्रवार (10 मई 2024) को दिल्ली के मुख्यमंत्री एवं आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल को 1 जून तक अंतरिम जमानत दे दी। अरविंद केजरीवाल को यह जमानत लोकसभा चुनावों में उनकी पार्टी के प्रचार के लिए दिया गया है। प्रवर्तन निदेशालय ने केजरीवाल की अंतरिम जमानत का विरोध किया था कहा था कि इससे गलत परंपरा होगी।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजीव खन्ना और दीपांकर दत्ता की खंडपीठ ने अंतरिम बेल से संबंधित सुनवाई करते हुए कहा कि शराब नीति मामले में केस अगस्त 2022 में दर्ज किया गया था और अरविंद केजरीवाल को लगभग डेढ़ साल बाद मार्च 2024 में गिरफ्तार किया गया। शीर्ष अदालत ने पूछा कि आखिर डेढ़ साल तक ED कहाँ थी।

हालाँकि, ईडी के विरोध के बावजूद अरविंद केजरीवाल को न्यायालय से अंतरिम जमानत मिल गई है, लेकिन इसको लेकर सोशल मीडिया पर कई लोग सवाल उठा रहे हैं। वैसे भारत में न्यायपालिका पर सवाल उठाने के रिवाज नहीं है, लेकिन जमानत का विरोध करते हुए ईडी ने जो तर्क दिया था वो उचित था। ईडी का संदेह भी सच साबित होता दिख रहा है।

सुप्रीम कोर्ट में दर्ज अपने हलफनामे में प्रवर्तन निदेशालय ने तर्क दिया था कि अगर चुनाव प्रचार के लिए अंतरिम जमानत दी जाती है तो यह एक मिसाल कायम करेगा, जो सभी बेईमान राजनेताओं को अपराध करने और फिर चुनाव की आड़ में जाँच से बचने की अनुमति देगा। केंद्रीय एजेंसी ने कहा कि चुनाव प्रचार का अधिकार न तो मौलिक अधिकार है और ना ही कानूनी या संवैधानिक अधिकार है।

ED की आशंका आखिरकार सच साबित होती दिख रही है। अब राष्ट्रद्रोह में जेल में बंद खालिस्तान समर्थक अमृतपाल सिंह ने चुनाव में नामांकन दाखिल करने के लिए पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट से सात दिनों के लिए अंतरिम जमानत की माँग की है। वह खडूर साहिब लोकसभा सीट से चुनाव लड़ना चाहता है। हालाँकि, हाई कोर्ट ने असम के डिब्रूगढ़ जेल में बंद अमृतपाल की याचिका खारिज कर दी है।

NSA के तहत जेल में ‘बंद वारिस पंजाब दे’ नाम के खालिस्तान समर्थक अमृतपाल की याचिका भले खारिज हो गई हो, लेकिन इससे एक नया रिवाज पैदा होने का खतरा पैदा हो गया है। इस देश में ऐसे दर्जनों नेता हैं, जिन पर विभिन्न मामलों में केस दर्ज है और कुछ नेता पुलिस एवं न्यायिक हिरासत में हैं। ऐसे में वे भी अपने लिए छूट की माँग कर सकते हैं। इनमें से प्रमुख नाम झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और दिल्ली के पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया का नाम प्रमुख है।

अपने हलफनामे में ED ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कहा था, “अभिसाक्षी की जानकारी में अभी तक किसी भी राजनीतिक नेता को चुनाव प्रचार के लिए अंतरिम जमानत नहीं दी गई है। ये (अरविंद केजरीवाल) तो चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार भी नहीं हैं। यहाँ तक कि चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार को भी चुनाव प्रचार के लिए अंतरिम जमानत नहीं दी जाती है, अगर वह हिरासत में है।”

जाहिर सी बात है कि जब उम्मीदवार नहीं होने के बावजूद सिर्फ चुनाव प्रचार के लिए अरविंद केजरीवाल अंतरिम जमानत की माँग कर सकते हैं तो कई ऐसे नेता हैं तो खुद उम्मीदवार हैं। ऐसे में वे अरविंद केजरीवाल की जमानत को प्रमुखता से उदाहरण के रूप में पेश करके अपने लिए भी ऐसी माँग कर सकते हैं। ऐसी में न्यायालय के सामने एक अलग तरह का धर्मसंकट खड़ा हो सकता है।

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के खिलाफ भी जमीन घोटाले और मनी लॉन्ड्रिंग मामले की जाँच चल रही है। ईडी ने उन्हें मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में 31 जनवरी 2024 को ईडी ने गिरफ्तार किया था। उन्होंने 2 फरवरी को अपनी गिरफ्तारी को गलत बताते हुए याचिका दाखिल की थी। हालाँकि, यह याचिका हाई कोर्ट ने खारिज कर दी थी। लेकिन, अरविंद केजरीवाल का हवाला देखकर सोरेन भी सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं।

हेमंत सोरेन और दिल्ली शराब घोटाले में बंद आम आदमी पार्टी के नेता मनीष सिसोदिया भी न्याय में समानता के सिद्धांत का तर्क देकर अपने लिए अंतरिम जमानत की माँग कर सकते हैं। दरअसल, जमानत देना न्यायालय का विशेषाधिकार है और वह कई मामलों को ध्यान में रखते हुए किसी आरोपित को जमानत देता है। इनमें जिस धारा के आरोपित बंद है उसमें जमानत के लिए क्या प्रावधान हैं, जमानत पर निकलने के बाद वह लापता तो नहीं हो जाएगा, सबूतों के साथ छेड़छाड़ तो नहीं करेगा, गवाहों को धमकाएगा तो नहीं, गवाहों की हत्या तो नहीं करेगा, किसी अन्य आपराधिक मामले को अंजाम तो नहीं देगा… आदि कई ऐसे बिंदु होते हैं।

अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री हैं और शक्तिशाली भी हैं। ऐसे में इन बिंदुओं पर न्यायिक सिद्धांत के तहत नजर डालना महत्वपूर्ण है। इसके साथ ही यह भी महत्वपूर्ण है कि अगर चुनाव प्रचार के नाम पर जमानत मिलती है तो ऐसी याचिकाओं की लंबी लाइन लग जाएगी, क्योंकि भारत में लगभग हर साल कहीं ना कहीं चुनाव होते ही रहते हैं। इनमें पंचायत से लेकर लोकसभा के चुनाव तक शामिल हैं।

कोर्ट में ED ने भी तर्क दिया था, “पिछले 5 वर्षों में लगभग 123 चुनाव हुए हैं। यदि चुनावी प्रचार के उद्देश्य से अंतरिम वैधानिकता है तो किसी भी राजनेता को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है और ना ही किसी राजनेता को अनुमति नहीं दी जा सकती है, क्योंकि चुनाव पूरे साल होता है।” ED ने तर्क दिया था कि संघीय ढाँचे में हर चुनाव महत्वपूर्ण है। किसी को कम या अधिक महत्वपूर्ण नहीं कहा जा सकता।

एजेंसी ने यह भी तर्क दिया था कि अगर चुनाव प्रचार के लिए अंतरिम जमानत दी जाती है तो यह एक मिसाल कायम करेगा, जो सभी बेईमान राजनेताओं को अपराध करने और फिर चुनाव की आड़ में जाँच से बचने की अनुमति देगा। ED ने कहा कि एक राजनेता एक सामान्य नागरिक से विशेष दर्जे का दावा नहीं कर सकता। समन से बचने के लिए केजरीवाल ने 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव का यही बहाना बनाया था।

इन सब तमाम बिंदुओं को मिलाते हुए सोशल मीडिया पर लोग न्याय में समानता की बात लोग कर रहे हैं। लोग ये सवाल उठा रहे हैं कि चुनाव प्रचार के लिए किसी आरोपित को, जो जेल में बंद है, उसे जमानत किस आधार पर दी जा सकती है। क्या अरविंद केजरीवाल की जगह कोई आम आदमी होता तो उसे यह सुविधा मिलती?

अधिकांश लोग किसी ना किसी पार्टी अथवा नेता के फॉलोअर होते हैं। अगर जेल में बंद। ऐसा ही कोई व्यक्ति तर्क दे कि उसे पार्टी अथवा नेता का प्रचार करना है तो क्या उसे यही सुविधा मिलेगी? इसका जवाब हाँ भी हो सकता है और ना भी। इसलिए देश में दशकों से न्यायिक सुधार की माँग भी की जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस दिशा में थोड़ा कदम बढ़ाए भी था, लेकिन वो फलीभूत नहीं हो पाया।

जिसका नाम रखा ‘पीयूष’, वही जीवन के लिए बन गया ‘विष’: पंखे पर झूल गए सूरत के बुजुर्ग माँ-बाप, छोड़ गए वो सुसाइड नोट जिसे पढ़ आप कहेंगे भगवान ऐसा बेटा दुश्मन को भी न दें

एक बच्चे के जन्म का दिन माता-पिता के लिए सबसे खुशी वाला दिन होता है। दोनों जन उसी क्षण से अपने मन में उस नवजात को हर खुशी देने के सपने देखने लगते हैं। बाद में उसके किशोर होने पर उसे अच्छी शिक्षा देने के लिए खुद को झोंक देते हैं। फिर युवा होने पर उसके उज्जवल भविष्य की प्रार्थना करने लगते हैं… यही करते-करते एक दिन वो दोनों प्राणी बूढ़े हो जाते हैं और आस भरी नजरों से सिर्फ यही सोचते हैं कि अब उनके बच्चे उनका ख्याल रखेंगे। लेकिन क्या असल में ऐसा हो पाता है? क्या हर माता-पिता को उनके त्याग और समर्पण के बदले बुढ़ापे में बच्चों का सहारा मिलता है? नहीं… बच्चा अगर सूरत के चुन्नी भाई और मुक्ताबेन की बड़ी औलाद पीयूष जैसा हो तो बिलकुल भी नहीं।

सूरत के चुन्नी भाई और उनकी पत्नी मुक्ताबेन ने हाल में अपनी औलाद के कारण एक आखिरी खत लिखकर मौत को गले लगा लिया। अपने आखिरी खत में वो साफ-साफ कह गए कि उनके अंतिम संस्कार में उनके बच्चों को न शामिल किया जाए और उतना ही खर्च हो जितने की जरूरत हो, इसके अलावा कुछ भी नहीं।

फोटो साभार: देश गुजरात

आप सोचेंगे कितने निष्ठुर माता-पिता रहे होंगे जो अपने बच्चे से अंतिम संस्कार का अधिकार छीन लिया और दुनिया के सामने उसे बुरी संतान साबित कर गए…कुछ लोग शायद ऐसा भी सोचें कि बच्चे ने अगर कुछ गलत किया भी था तो इसमें आत्महत्या करने की क्या जरूरत थी, जैसे खत में बच्चे को दूर रहने को कहा है वैसे असल जिंदगी में भी कह देते… लेकिन हमारे लिए ये सारी चीजें सोचना आसान है क्योंकि हम उस मनोवस्था को समझ ही नहीं पा रहे जो आखिर समय में चुन्नी भाई और उनकी पत्नी की रही होगी। पीयूष उनकी बड़ी औलाद था। बचपन से उसे पढ़ाने लिखाने में चुन्नी भाई ने खुले हाथ से खर्च किया। जब बड़ा हुआ तो उसका काम सेट करवाने के लिए अपनी सारी संपत्ति लगा दी। पीयूष उसमें भी सफल नहीं हुआ तो अपने नाम पर चुन्नी भाई ने कर्जा लेकर उसे 35 लाख रुपए दिलवा दिए। उन्हें लगा बेटा कमाएगा तो सारा कर्जा चुकता हो जाएगा। मगर बेटे ने क्या किया…उन पैसों को भी व्यापार में डुबा दिया।

इतने पर भी चुन्नी भाई और मुक्ताबेन ने अपने बेटे का हाथ नहीं छोड़ा। वो उसे सेटल करवाने के प्रयास करते रहे। उन्होंने पीयूष की शादी करवाई उसका घर बसवाया। एक बच्चा हुआ। बाद में उन्होंने पीयूष को कनाडा भेजा। इन सबके बीच पीयूष को एक भी बार ख्याल नहीं आया कि जो 40 लाख रुपए उसके पिता ने उसके काम के लिए उधार लिए थे वो कैसे वापस दिए जाएँगे। देखते-देखते पीयूष कनाडा में रम गया। वहीं उसकी बीवी भी अपने बच्चे को लेकर अलग घर में रहने लगी। सब जानते हुए भी पीयूष को न माता-पिता की चिंता रही, न कर्जा लौटाने की बात। अपना कमाना अपना खाना वाली नीति पर पीयूष जिंदगी गुजारता था। इधर सूरत में माता-पिता इस शर्मींदगी में जीवन जीते रहे कि इतना कर्जा लौटाया कैसे जाएगा…।

कर्ज देने वाले चुन्नी भाई की खुद्दारी जानते थे इसलिए वो उनसे ज्यादा कुछ नहीं कहते थे, पर चुन्नी भाई को ये कर्ज अंदर ही अंदर खा रहा था। इसी बीच एक दिन उन्हें पता चला कि उनका बेटा पीयूष सालों बाद कनाडा से सूरत आया था लेकिन उनसे मिले बिना, हाल-चाल जाने बिना ही वापस लौट गया…। दोनों पति-पत्नी को ये बात सदमे की तरह लगी। उन्होंने किसी से कुछ कहा तो नहीं लेकिन मन में घुटते रहे। एक दिन दोनों ने निर्णय लिया कि जिस बच्चे के लिए उन्होंने अपना सब कुछ लुटा दिया, 40 लाख रुपए के कर्जे में आ गए, जब वही उन्हें नहीं पूछ रहा तो उन्हें अब आगे नहीं जीना।

बंद कमरे में दोनों 5 पन्नों का खत लिखा और फिर एक साथ मौत को गले लगा लिया। घटना के वक्त छोटा बेटा संजय बगल वाले कमरे में अपनी पत्नी के साथ सो रहा था, उसे इसके बारे में पता भी नहीं चला। बाद में जब नींद खुली तब तक माता-पिता जा चुके थे। उनके पास वो खत अब सुसाइड नोट बन चुका था जिसमें उन्होंने अपने दिन की सारी बात लिखी थी। उन्होंने अपनी बहू से भी सवाल किया था कि वो तो बहुत बड़े घर से शादी होकर उनके यहाँ आई थी, फिर उसकी परवरिश में ऐसी क्या कमी रह गई जो उसने भी उनके साथ ऐसा किया…।

उनका ये सुसाइड पत्र एक आईना है हर उस बच्चे के लिए जो अपने माता-पिता के प्रेम को भुलाकर अपनी दुनिया में खो गए हैं। वो भूल चुके हैं कि उनके माता-पिता ने उनके लिए अपनी जिंदगी खपा दी, तब जाकर वो इस काबिल बने कि समाज में अपनी पहचाने जा सकें, स्कूल-कॉलेज में उच्च शिक्षा ले सकें, विदेश जाकर पढ़ सकें और इस काबिल बन सकें कि अपना नया परिवार बनाकर उसका गुजर-बसर कर सकें… क्या इतने के बावजूद माता-पिता को भुलाया जाना उचित है, उनकी परवाह किए बिना अपनी दुनिया में रमना उचित है?

यौन प्रताड़ना मामले में बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ आरोप तय: कोर्ट ने दिया आदेश, 5 महिला पहलवानों से छेड़खानी का चलेगा केस

दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने कैसरगंज से भाजपा सांसद और WFI (भारतीय कुश्ती संघ) के पूर्व अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह पर यौन प्रताड़ना के मामले में आरोप तय कर दिया है। उन पर महिला पहलवानों की यौन प्रताड़ना का आरोप है। शुक्रवार (10 मई, 2024) को उनके खिलाफ एडिशनल चीफ मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट प्रियंका राजपूत की अदालत में आरोप तय किए गए। 6 महिला पहलवानों ने उनके खिलाफ आरोप लगाए थे, जिसके आधार पर दिल्ली पुलिस ने FIR दर्ज की थी।

कोर्ट ने कहा कि IPC (भारतीय दंड संहिता) की धारा-354 (किसी महिला की प्रतिष्ठा से छेड़छाड़ करना) और 354A (यौन प्रताड़ना) के तहत बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ आरोप तय करने के लिए पर्याप्त सबूत मौजूद हैं। बृजभूषण शरण सिंह कैसरगंज, गोंडा और बलरामपुर से सांसद रह चुके हैं। फ़िलहाल वो भाजपा में हैं। बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ धारा-506(1), अर्थात आपराधिक धमकी को लेकर भी आरोप तय किया गया है।

वहीं 6 में से एक पीड़िता के मामले में उन्हें राहत दी गई है। सभी आरोपितों के मामले में किसी आपराधिक साजिश में शामिल होने के मामले में भी उन्हें राहत दी गई। साथ ही WFI के एसिस्टेंट सेक्रेटरी रहे विनोद तोमर के खिलाफ भी आरोप तय किए गए हैं। 15 जून, 2023 को दिल्ली पुलिस ने इस मामले में चार्जशीट दायर की थी। उन पर पीछा करने और आपराधिक धमकी का मामला भी चलाया जा रहा था। FIR दर्ज कराने के लिए शिकायतकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट का रुख भी किया था।

बतौर पब्लिक प्रॉसिक्यूटर अतुल श्रीवास्तव इस मामले में कोर्ट में पेश हुए। हालाँकि, बृजभूषण शरण सिंह पर POCSO के तहत मामला नहीं चलेगा, क्योंकि नाबालिग लड़की से यौन शोषण वाला मामला हट गया है। इस बार भाजपा ने उनके टिकट काट कर उनके बेटे करण भूषण सिंह को लड़ाया है। बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ महिला पहलवानों ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर लंबा प्रदर्शन किया था, जिसमें कई विपक्षी दलों के नेता शामिल हुए थे।

CM ऑफिस नहीं जा सकेंगे अरविंद केजरीवाल, फाइल पर हस्ताक्षर की इजाजत भी नहीं: जानिए किन शर्तों पर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव के लिए दी है अंतरिम जमानत

दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविन्द केजरीवाल को शुक्रवार (10 मई, 2024) को सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम जमानत दे दी। उन्हें यह जमानत दिल्ली शराब घोटाला मामले में मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने केजरीवाल को यह जमानत लोकसभा चुनाव 2024 में प्रचार के लिए दी है। यह जमानत उन्हें 1 जून तक के लिए दी गई है। केजरीवाल को जमानत देने के के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कुछ शर्तें भी लगाई हैं, जिनका पालन उन्हें करना होगा।

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस दीपांकर दत्ता और संजीव खन्ना की सदस्यता वाली बेंच ने केजरीवाल को दी गई जमानत में स्पष्ट रूप से कहा है कि वह इस अवधि के दौरान दिल्ली के मुख्यमंत्री कार्यालय नहीं जा सकेंगे। वह इस दौरान किसी भी फाइल पर हस्ताक्षर भी करेंगे। उन्हें केवल उन मामलों में फाइलों पर हस्ताक्षर करने की अनुमति दी गई है, जिनमें दिल्ली के उपराज्यपाल से किसी बात की अनुमति ली जानी हो। इसके अलावा उन्हें दिल्ली सरकार के सचिवालय जाने से भी मना किया गया है।

इस जमानत अवधि के दौरान मुख्यमंत्री केजरीवाल दिल्ली शराब घोटाला मामले पर भी कोई टिप्पणी नहीं कर सकेंगे। वह शराब घोटाला मामले के किसी गवाह से भी नहीं मिल सकेंगे। उन्हें 2 जून को कोर्ट के सामने सरेंडर करना होगा। उन्हें यह जमानत ₹50,000 के मुचलके पर मिली है। इससे पहले दिल्ली उच्च न्यायालय ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी। बता दें कि अरविंद केजरीवाल को प्रवर्तन निदेशालय ने 21 मार्च को गिरफ्तार किया था और तब से वह हिरासत में हैं।

अरविन्द केजरीवाल ने इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका डाल कर चुनाव प्रचार के आधार पर जमानत माँगी थी। इसका विरोध करते हुए सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में केंद्रीय एजेंसी ने 9 मई को कहा था कि चुनाव प्रचार का अधिकार न तो मौलिक अधिकार है और ना ही कानूनी या संवैधानिक अधिकार है। अगर चुनाव प्रचार के लिए अंतरिम जमानत दी जाती है तो यह एक मिसाल कायम करेगा, जो सभी बेईमान राजनेताओं को अपराध करने और फिर चुनाव की आड़ में जाँच से बचने की अनुमति देगा। 

अपने हलफनामे में ED ने कहा, “अभिसाक्षी की जानकारी में अभी तक किसी भी राजनीतिक नेता को चुनाव प्रचार के लिए अंतरिम जमानत नहीं दी गई है। ये तो चुनाव लड़ने वाला उम्मीदवार भी नहीं हैं। यहाँ तक कि चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार को भी चुनाव प्रचार के लिए अंतरिम जमानत नहीं दी जाती है, अगर वह हिरासत में है।”

केंद्रीय एजेंसी ने कहा, “पिछले 5 वर्षों में लगभग 123 चुनाव हुए हैं। यदि चुनाव प्रचार के उद्देश्य से अंतरिम जमानत़ दी जानी है तो किसी भी राजनेता को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है और ना ही न्यायिक हिरासत में नहीं रखा जा सकता है, क्योंकि चुनाव पूरे वर्ष होते रहते हैं।” कयास लगाए जा रहे हैं कि जेल से बाहर आने के बाद केजरीवाल दिल्ली और पंजाब में चुनाव प्रचार करेंगे। दिल्ली में 25 मई, 2024 को 7 लोकसभा सीटों के लिए मतदान होना है।

मजहब के आधार पर आरक्षण से मिलेगा नाजायज धर्मांतरण को बढ़ावा, कॉन्ग्रेस ने तेलंगाना को बनाया ATM: पीएम मोदी

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तेलंगाना की राज्य सरकार पर हमला बोला है। तेलंगाना के महबूबनगर लोकसभा क्षेत्र में एक रैली के दौरान पीएम मोदी ने कहा है कि कॉन्ग्रेस ने राज्य के साथ धोखा किया है। उन्होंने कहा है कि कॉन्ग्रेस ने तेलंगाना को ATM बना लिया है। उन्होंने राज्य की पूर्ववर्ती BRS सरकार पर भी हमला बोला।

पीएम मोदी ने राज्य की रेवंत रेड्डी सरकार पर हमला बोलते हुए कहा, “हमने तेलंगाना के लिए लाखों करोड़ रूपए भेजे, लेकिन ये पैसा कहाँ गए, ये पैसा भ्रष्टाचार का ATM लगाकर पहले BRS ने अपनी जेब भरी और अब कॉन्ग्रेस लूट। कॉन्ग्रेस यहाँ ढेर सारे वादे करके आई थी लेकिन सत्ता में आने के बाद वह BRS की फोटोकॉपी बन गई।”

पीएम मोदी ने अमित शाह का फर्जी वीडियो फैलाने में तेलंगाना से गिरफ्तार कॉन्ग्रेस नेता के बारे में जिक्र करते हुए कहा, “कॉन्ग्रेस यहाँ उद्योग लगाने का वादा करके सत्ता में आई थी लेकिन बाद में फर्जी वीडियो बनाने लगे।” पीएम मोदी ने कहा कि कॉन्ग्रेस BRS के घोटालों पर कोई कार्रवाई नहीं कर रही।

रैली में पीएम मोदी ने RR टैक्स का भी जिक्र किया। पीएम मोदी ने कहा कि RR टैक्स पर वह तेलंगाना मुख्यमंत्री का नाम नहीं ले रहे लेकिन वह खुद जाकर मीडिया को सफाई दे रहे हैं। पीएम मोदी ने कहा कि तेलंगाना की तस्वीर बदलने के लिए भाजपा को अधिक प्रतिनिधित्व मिला जरूरी है।

महबूबनगर में रोजगार की समस्या को उठाते हुए पीएम मोदी ने कहा, “इस क्षेत्र को तुंगभद्रा और कृष्णा नदियों का आशीर्वाद है लेकिन फिर भी यहाँ के लोगो को मजदूरी के लिए पलायन करना पड़ रहा है। यहाँ की सिंचाई परियोजनाएँ आगे नहीं बढ़ रही है। कॉन्ग्रेस किसानों से कर्जमाफी का वादा पूरा नहीं कर रही। कॉन्ग्रेस ने राज्य धोखा किया है।”

यहाँ पीएम मोदी ने कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी और सैम पित्रोदा पर भी हमला बोला। उन्होंने कहा, “शहजादे के एक एडवाइजर अमेरिका में रहते हैं, उन्होंने कहा है कि दक्षिण भारत के लोग अफ्रीकन हैं। उन्हें तेलंगाना के लोग अफ्रीकन लगते हैं क्योंकि उन्हें आपकी चमड़ी का रंग पसंद नहीं है।”

पीएम मोदी ने आरोप लगाया कि कॉन्ग्रेस हिन्दुओं और हिन्दुओं के त्योहारों से नफरत करती है। पीएम मोदी ने कहा कि वह गर्व से मंदिर जाते हैं, इस पर भी कॉन्ग्रेस को समस्या है, वह इसे देश विरोधी मानती है। इसीलिए ही यह लोग वोट जिहाद की बात करते हैं। आप पीएम मोदी का यह भाषण यहाँ सुन सकते हैं।

उन्होंने कॉन्ग्रेस पर देश को धर्म और जाति के आधार पर बाँटने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि धर्म के आधार पर आरक्षण से नाजायज धर्मांतरण करवाने वालों को बढ़ावा मिलेगा, लेकिन फिर भी कॉन्ग्रेस इससे पीछे नहीं हट रही। उन्होंने कहा यही कॉन्ग्रेस का असली एजेंडा है।

खुद के हाथ-पैर नहीं, फिर भी बने दिव्यांगों की आवाज… मोदी सरकार ने पद्म पुरस्कारों को ‘कोठरी’ से किया मुक्त, हौसलों की कहानी से देश का हो रहा साक्षात्कार

नरेंद्र मोदी की सरकार केंद्र में आने के बाद हर साल लोगों को पद्म पुरस्कार विजेताओं के नामों का इंतजार रहता है। इस बार ये पुरस्कार 132 हस्तियों को दिए जाने का ऐलान हुआ था। इनमें 2 पद्म विभूषण, 9 पद्म भूषण और 56 पद्म श्री पुरस्कार दूसरे चरण में राष्ट्रपति भवन में महानुभावों को गुरुवार (9 मई 2024) को दिए गए। इसके बाद सभी हस्तियों और उनके उल्लेखनीय कार्यों की चर्चा सोशल मीडिया पर होने लगी। इस बीच सबसे ज्यादा जिन्हें देख लोग इंस्पायर हुए वो डॉ केएस राजन्ना हैं।

कल से डॉ केस एस राजन्ना की वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर की जा रही है और आज की पीढ़ी को उनसे जज्बा लेने की सलाह दी जा रही। इस वीडियो में दिखाई दे रहा है कि के एस राजन्ना हाथ-पाँव न होने के बावजूद इतने उत्साह से पद्म पुरस्कार लेने आते हैं कि उनके चेहरे की मुस्कान देख सब खुश हो जाते हैं। पहले वो पीएम मोदी के पास जाते हैं, जहाँ पीएम उन्हें हाथ जोड़ उनका अभिवादन करते हैं। फिर वो राष्ट्रपति मुर्मू के पास जाते हैं और पद्म पुरस्कार स्वीकारते हैं।

इस दौरान राष्ट्रपति भवन में मौजूद जवान उनकी मदद करने की कोशिश करते हैं, लेकिन वो बिन किसी की सहायता के खुद अपने आत्मनिर्भर होने का प्रमाण देते हैं। उनकी वीडियो देखने के बाद लोग आश्चर्यचकित हैं और जो उनके संबंध में नहीं जानते वो उनके बारे में सर्च कर रहे हैं।

पोलियों के कारण डॉ केएस राजन्ना ने गँवाए थे हाथ-पाँव

मात्र 11 माह की उम्र में पोलियों के कारण अपने हाथ-पाँव गँवाने वाले डॉ के केस राजन्ना ने कभी हार नहीं मानी। उन्होंने खुद को दिव्यांग समझने की बजाय अपने अपनी क्षमताओं का विस्तार करना शुरू किया और धीरे-धीरे वो अन्य दिव्यांगों के लिए प्रेरणा बनते गए। आज लोग उन्हें एक सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर जानते हैं लेकिन सच तो यह है कि वो सिर्फ सामाजिक कार्यकर्ता नहीं हैं बल्कि एक स्पोर्ट्स पर्सन भी रहे हैं जिन्होंने राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम ऊँचा किया।

1980 में मैकेनिकल इंजीनियर की डिग्री ले लेने वाले डॉ राजन्ना ने 2002 में हुए पैरालंपिक के डिस्कस थ्रो प्रतियोगिता में देश के लिए गोल्ड जीता था और तैराकी में चांदी जीतकर देश की शान बढ़ाई थी।

इसके बाद उन्होंने खिलाड़ी के तौर पर पहचान स्थापित करने के बाद खुद का बिजनेस शुरू किया। वहाँ भी उन्हें ऐसी सफलता मिली कि उन्होंने 500 दिव्यांगों को उसके जरिए रोजगार प्रदान किया। 2013 में राजन्ना को ‘कमिश्नर फॉर डिसेबल्ड’ का पद दिया गया। इस दौरान भी उन्होंने कई दिव्यांगों को आत्मनिर्भर बनाने का काम किया।

64 साल की उम्र में जाकर उन्हें उनके संघर्षों के लिए, उनकी मेहनत के लिए पहचान मिली। जब इस वर्ष इनका नाम पद्म पुरस्कार के लिए आया तो इन्होंने ये खबर सुन कहा, “यह पुरस्कार मेरे लिए चीनी खाने जितना मीठा है. लेकिन यह सिर्फ एक पुरस्कार बनकर नहीं रहना चाहिए बल्कि इससे मुझे अपने सामाजिक कार्यों में और मदद मिलेगी।”

मोदी सरकार में मिला आम जन को सम्मान

अब डॉ केएस राजन्ना को जब यह अवार्ड मिल गया है तो उनके चेहरे की मुस्कान से कई लोग उनकी तारीफ कर रहे हैं और साथ में पीएम मोदी का अभिवादन कर रहे हैं। चर्चा हो रही है कि मोदी सरकार ने जो प्रयास आम जन के कार्यों को पहचान दिलाने के लिए किया है, वो दशकों से इस देश में नहीं हुआ था। मोदी सरकार आई तो उन्होंने न केवल उन महानुभूतियों को पहचान दिलाई जो समाज में चुपचाप बिन किसी लालच के किसी भी क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान दे रहे थे बल्कि उनकी पहुँच तक पद्म पुरस्कारों को भी पहुँचवाया।

जानकारी के लिए बता दें कि देश की जनता तक के बीच पद्म पुरस्कार पहुँचानेलेके लिए मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद सबसे पहले पुरस्कार पाने की प्रक्रिया में बदलाव किया था। पहले जहाँ ये अवार्ड केवल उन लोगों को मिलते थे जो इसके लिए अप्लाई करते थे। उस प्रक्रिया में केवल उन लोगों का नाम आ पाता था था जिन्हें अवार्ड के बारे में पता होता था और जानकारी होती थी कि इसका कब नामांकन करना है, कहाँ उसे जमा कराना है, क्या सोर्स लगानी है आदि-आदि… ये सब बिंदु मिलकर निर्धारित करते थे कि किसका नाम यूपीए शासन में पद्म पुरस्कार के लिए घोषित होगा। इस प्रक्रिया में नतीजा ये दिखता था कि सर्वोच्च सम्मान के अधिकारी समाज का एक निश्चित वर्ग रह जाता था। तब, उन लोगों को अवार्ड ज्यादा मिलता था जो सरकार के करीबी होते थे, वहीं असली संघर्ष करने वाले गुमनाम ही रह जाते थे। मगर, अब स्थिति बदल गई है। आज के समय में ये पुरस्कार देने से पहले किसी का बैकग्राउंड या राजनैतिक पार्टी नहीं देखी जाती, उनके कार्यों को देखा जाता है।

‘अयोध्या राम मंदिर से हटेगी रामलला की मूर्ति’: कॉन्ग्रेस का विधिवत ऐलान- सरकार बनते ही ‘शुद्धिकरण’, PM मोदी ने ‘बाबरी ताला’ पर किया था आगाह

महाराष्ट्र में कॉन्ग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष नाना पटोले ने अयोध्या के राम मंदिर को लेकर विवादित बयान दिया है। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस के सत्ता में आने के बाद राम मंदिर का शुद्धिकरण किया जाएगा। लोकसभा चुनाव 2024 के 3 चरण बीत चुके हैं और 4 चरण बाकी हैं, ऐसे में उनका ये बयान पार्टी को नुकसान पहुँचा सकता है। नाना पटोले ने फिर से ये झूठ फैलाया कि चारों शंकराचार्यों ने राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह का बहिष्कार कर दिया था। सच्चाई ये है कि श्रृंगेरी और कांची मठ ने बयान जारी कर के इसका स्वागत किया था।

महाराष्ट्र विधानसभा के अध्यक्ष रहे नाना पटोले ने राम मंदिर में भगवान श्रीराम के बाल स्वरूप की प्रतिमा होने पर भी प्रश्नचिह्न लगाया, जबकि शुरू से ये मामला रामलला का ही रहा है और कोर्ट में केस के दौरान भी रामलला के लिए ही मुकदमा लड़ा गया। नाना पटोले ने इसकी जगह वहाँ राम दरबार बनवाने की घोषणा कर डाली। उन्होंने कहा कि I.N.D.I. गठबंधन की सरकार आने पर निश्चित ही राम मंदिर का शुद्धिकरण कराया जाएगा। उन्होंने इस दौरान शंकराचार्यों को सनातन धर्म का मुखिया बताया और कहा कि वो राम मंदिर के विरोध में हैं।

नाना पटोले ने दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी माँ के देहांत के बाद हिन्दू परंपरा को धता बताते हुए अपने बाल नहीं मुँड़वाए, ऐसे में उनके द्वारा प्राण प्रतिष्ठा समारोह में हिस्सा लेना गलत है। उन्होंने दावा किया कि देश की जनता ने भी मान लिया है कि गलत विधि से रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा हुई है। हालाँकि, सैम पित्रोदा द्वारा दक्षिण भारतीयों को अफ़्रीकी और उत्तर-पूर्वी भारतीयों को चीनी बताने पर उन्होंने कहा कि उनसे ‘इंडियन ओवरसीज कॉन्ग्रेस’ के अध्यक्ष पद से इस्तीफा ले लिया गया है।

बता दें कि हाल तक गाँधी परिवार के करीबी रहे प्रमोद कृष्णम ने भी खुलासा किया कि जब राम मंदिर का निर्णय आया तो राहुल गाँधी ने अपने नजदीकी लोगों की बैठक में अमेरिका के अपने एक सलाहकार के कहने पर कहा था कि सरकार बनने पर राम मंदिर का फैसला पलट दिया जाएगा, इसके लिए सुपरपॉवर कमीशन बनाया जाएगा। बकौल प्रमोद कृष्णम, राहुल गाँधी ने यह भी कहा था कि जिस तरह तीन तलाक के मुद्दे को लेकर शाहबानो निर्णय को राजीव गाँधी सरकार ने बदला था तो फिर राम मंदिर का निर्णय क्यों नहीं बदला जा सकता।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कॉन्ग्रेस के इस रुख को लेकर उस पर हमला बोल चुके हैं। उन्होंने कहा था कि NDA को 400 सीटें इसीलिए चाहिए, ताकि कॉन्ग्रेस राम मंदिर पर बाबरी वाला ताला न लगवा दे। इतिहास में ऐसा हो चुका है। AIMIM के असदुद्दीन ओवैसी खुले मंच से ‘बाबरी मस्जिद ज़िंदाबाद’ का नारा लगा चुके हैं। I.N.D.I. गठबंधन में लालू यादव की RJD भी शामिल है, जिन्होंने CM रहते रामरथ रुकवा कर लालकृष्ण अडवाणी को गिरफ्तार करवाया था।

चुनाव प्रचार करेंगे अरविंद केजरीवाल, सुप्रीम कोर्ट ने शराब घोटाले में 51 दिन बाद दिल्ली के CM को दी अंतरिम जमानत: 2 जून को सरेंडर करने को कहा

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (10 मई 2014) को शराब घोटाले में जेल में बंद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को 1 जून 2024 तक अंतरिम जमानत दे दी। इससे ठीक एक दिन पहले प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने सुप्रीम कोर्ट में अंतरिम जमानत का विरोध किया था और कहा था कि इससे एक गलत परंपरा की शुरुआत होगी।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजीव खन्ना और दीपांकर दत्ता की खंडपीठ ने यह आदेश पारित किया है। अंतरिम बेल से संबंधित सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि शराब नीति मामले में केस अगस्त 2022 में दर्ज किया गया था और केजरीवाल को लगभग डेढ़ साल बाद मार्च 2024 में गिरफ्तार किया गया।

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट दिल्ली उत्पाद शुल्क नीति मामले में ईडी द्वारा केजरीवाल की गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली उनकी याचिका पर सुनवाई कर रहा था। इससे पहले दिल्ली उच्च न्यायालय ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी। बता दें कि अरविंद केजरीवाल को प्रवर्तन निदेशालय ने 21 मार्च को गिरफ्तार किया था और तब से वह हिरासत में हैं।

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में केंद्रीय एजेंसी ने 9 मई को कहा था कि चुनाव प्रचार का अधिकार न तो मौलिक अधिकार है और ना ही कानूनी या संवैधानिक अधिकार है। अगर चुनाव प्रचार के लिए अंतरिम जमानत दी जाती है तो यह एक मिसाल कायम करेगा, जो सभी बेईमान राजनेताओं को अपराध करने और फिर चुनाव की आड़ में जाँच से बचने की अनुमति देगा। 

अपने हलफनामे में ED ने कहा, “अभिसाक्षी की जानकारी में अभी तक किसी भी राजनीतिक नेता को चुनाव प्रचार के लिए अंतरिम जमानत नहीं दी गई है। ये तो चुनाव लड़ने वाला उम्मीदवार भी नहीं हैं। यहाँ तक कि चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार को भी चुनाव प्रचार के लिए अंतरिम जमानत नहीं दी जाती है, अगर वह हिरासत में है।”

केंद्रीय एजेंसी ने कहा, “पिछले 5 वर्षों में लगभग 123 चुनाव हुए हैं। यदि चुनाव प्रचार के उद्देश्य से अंतरिम जमानत़ दी जानी है तो किसी भी राजनेता को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है और ना ही न्यायिक हिरासत में नहीं रखा जा सकता है, क्योंकि चुनाव पूरे वर्ष होते रहते हैं।” ED ने तर्क दिया कि संघीय ढाँचे में हर चुनाव महत्वपूर्ण है।

हलफनामे में आगे कहा गया है, “हर स्तर पर हर राजनेता यह तर्क देगा कि यदि उसे अंतरिम जमानत पर रिहा नहीं किया गया तो उसे अपरिवर्तनीय परिणाम भुगतने होंगे। अकेले धनशोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत वर्तमान में कई राजनेता हैं, जो न्यायिक हिरासत में हैं और उनके मामलों की जाँच सक्षम अधिकारियों द्वारा की जा रही है।”

केंद्रीय एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय ने आगे तर्क दिया, “अदालतें उनकी (नेताओं की) हिरासत में बरकरार रख रही हैं। गैर-पीएमएलए अपराधों में पूरे देश में कई राजनीतिक नेता न्यायिक हिरासत में होंगे। इसलिए ऐसा कोई कारण नहीं है कि याचिकाकर्ता द्वारा विशेष उपचार की विशेष प्रार्थना को स्वीकार किया जाए।”

सड़क से गुजर रही थी महिला, पीछे से गले में बेल्ट फँसा घसीटा, कारों के बीच ले जाकर किया रेप: CCTV से सामने आई दरिंदगी

अमेरिका के शहर न्यूयॉर्क में एक महिला का एक व्यक्ति ने बीच सड़क पर रेप किया। सड़क चलती महिला को उसने पहले पकड़ा और फिर बलपूर्वक उसके साथ दुष्कर्म किया। यह अपराध पास में लगे CCTV कैमरे में कैद हो गया। महिला के साथ हुई इस घटना की वीडियो अब वायरल है।

वायरल वीडियो में दिखता है कि एक महिला सड़क किनारे बने फुटपाथ पर जा रही है। इतने में ही एक व्यक्ति पीछे से आता है और महिला के गले में बेल्ट डाल उसे खींचता है, इससे महिला जमीन पर गिर जाती है। इसके बाद वह महिला को बेल्ट से ही फुटपाथ पर और खींचता है।

महिला इस दौरान बेसुध दिखती है। महिला को खींचते हुए यह अपराधी पास खड़ी दो गाड़ियों के बीच ले जाता है। इसके बाद वह महिला से लूटपाट भी करता है। वह महिला के पास का समान लूट लेता है। इसके बाद वह महिला से रेप भी करता है। अपराधी ने अपने चेहरे पर एक सफ़ेद कपड़ा पहना हुआ था। महिला से लूट और रेप करने के बाद वह घटनास्थल से भाग गया।

बताया गया है कि यह घटना 1 मई, 2024 की है जो कि न्यूयॉर्क के थर्ड अवेन्यु इलाके में हुई। पीड़िता की आयु 45 वर्ष बताई जा रही है। इस मामले में न्यूयॉर्क पुलिस जाँच कर रही है। हालाँकि, पीड़िता ने पुलिस के साथ सहयोग करना बंद कर दिया है। उसे एक स्थानीय अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती करवाया गया है।

अभी तक इस अपराधी की पुलिस पहचान और गिरफ्तारी नहीं कर पाई है। इस घटना के बाद अमेरिका के सबसे बड़े शहर न्यूयॉर्क की सुरक्षा व्यवस्था पर प्रश्न उठ रहे हैं। एक आँकड़े में बताया गया है कि न्यूयॉर्क में पिछले कुछ दिनों में रेप के मामलों में काफी बढ़ोतरी हुई है। मात्र 2024 में ही 500 से अधिक रेप के मामले में न्यूयॉर्क शहर में सामने आ चुके हैं।

घटते हिन्दू और बढ़ते मुस्लिम भारत के लिए खतरे की घंटी: गजवा-ए-हिन्द के इस मिशन में कॉन्ग्रेसी तुष्टिकरण का भी हाथ, कासिम से PFI तक 1500 साल बीते पर एजेंडा वही

हाल ही में एक रिसर्च सामने आया। 1950 से लेकर 2015 तक के आँकड़ों का अध्ययन किए जाने के बाद इसमें पता चला कि जहाँ देश में हिन्दुओं की जनसंख्या 7.82% घट गई है, वहीं मुस्लिमों की जनसंख्या में 43.15% का भारी इजाफा हुआ है। इस रिसर्च का मानना है कि भारत में विविधता के फलने-फूलने के लिए एक उचित माहौल है, जिस कारण ऐसा हुआ। प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) ने अपने सर्वे में ये जानकारी दी है। इसमें बताया गया है कि दुनिया भर में बहुसंख्यकों की आबादी घटने का ट्रेंड है।

न सिर्फ हिन्दू, बल्कि जैन समाज के लोगों की जनसंख्या भी कम हुई है। जैन 0.45% से 0.36% हो गए हैं। 1950 में जहाँ हिन्दू 84.68% हुआ करते थे, वहीं अब 78.06% हो गए हैं। सिर्फ मुस्लिम ही नहीं, बल्कि ईसाइयों की जनसंख्या में भी इजाफा हुआ है। वो 5.38% बढ़ कर 2.24% से 2.36% हो गए हैं। सिख 1.24% से 1.85% हो गए हैं। पारसियों की संख्या जबरदस्त तरीके से घटी है। वो 85% घट कर 1950 में 0.03% से सीधे 0.004% हो गए हैं।

इस रिसर्च पेपर में इस बात को भी इंगित किया गया है कि पड़ोसी मुल्कों में जहाँ बहुसंख्यक लगातार बढ़ रहे हैं, वहाँ के अल्पसंख्यकों ने संकट के समय भारत में शरण लिया। पाकिस्तान से भले ही बांग्लादेश कट कर अलग हो गया, लेकिन इसके बावजूद वहाँ इस अवधि में मुस्लिमों की जनसंख्या 10% बढ़ी। क्या मुस्लिमों की जनसंख्या बढ़ने को सचमुच विविधता का फलना-फूलना मान कर हमें जश्न मनाना चाहिए? नहीं, इतिहास तो ऐसा बिलकुल नहीं कहता है।

हिन्दुओं की जनसंख्या बढ़ना खतरे की घंटी है, वहीं इसके साथ-साथ तेज़ी से मुस्लिमों की जनसंख्या बढ़ना और भी अधिक चिंता का विषय है। हमारे सामने उदाहरण है कि कैसे जिस भी इलाके में मुस्लिम प्रभावशाली होते चले जाते हैं, वहाँ वो अपने हिसाब से नियम-कानून चलाने लगते हैं, दूसरी परंपराओं की आस्था का वो सम्मान नहीं करते जिस कारण उन्हें पलायन के लिए विवश होना पड़ता है। गुजरात के सूरत में जैन समाज तो भरूच में हिन्दू समाज इसका निशाना बना।

इसी को तो ‘लैंड जिहाद’ कहा जाता है – जहाँ भी बसो, अपने लोगों को बड़ी संख्या में बसाओ और शरिया चलाने लगो। सूरत के गोपीपुरा में कई जैन साध्वियाँ रहती थीं, लेकिन मुस्लिमों ने वहाँ फ़्लैट लेकर बकरियाँ काटनी शुरू कर दी। प्याज-लहसुन उनके घरों के बाहर छोड़ दिए जाते थे। भरूच के सोनी फलिया में मंदिर में आरती को ‘हराम’ बता कर रोक दिया गया। मुस्लिम अधिक दाम देकर संपत्ति खरीदते हैं, लालच में हिन्दू बेच कर निकल जाते हैं, फिर जो बचे-खुचे होते हैं वहाँ उनका रहना ही दूभर हो जाता है।

बिहार में ही देख लीजिए। सीमांचल के जिलों में मुस्लिम जनसंख्या बढ़ी तो वहाँ स्कूलों में रविवार की जगह जुमा को शुक्रवार के दिन साप्ताहिक अवकाश रहने लगा। यानी, शासन-प्रशासन के भी नियम ये अपने इलाकों में बदल देते हैं। मस्जिद के सामने से हिन्दू शोभा यात्रा नहीं गुजर सकती, ‘इनके इलाके’ में हिन्दू DJ नहीं बजा सकते। हाँ, इनके मस्जिद दिन भर में 5 बार माइक से अजान दें तो उसे हर हिन्दू को विवश होकर सुनना पड़ेगा। हर हिन्दू पर्व-त्योहार में पत्थर इकट्ठा करने की इनकी परंपरा है।

जम्मू कश्मीर में देखिए, कश्मीरी हिन्दुओं को वहाँ से भगा दिया गया, महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ और बड़ी संख्या में नरसंहार भी। इसके बाद पाकिस्तान समर्थित आतंकियों ने घाटी को बंधक बना लिया। भारत की आज़ादी के बाद से ही जवाहरलाल नेहरू ने अपने मित्र शेख अब्दुल्ला को खुली छूट दी, परिणाम ये हुआ कि वहाँ कट्टरपंथ बढ़ता गया, कई अलगाववादी पैदा हो गए। मोदी सरकार ने अनुच्छेद-370 और धारा-35A को निरस्त किया, जिसके बाद वहाँ स्थिति शांत हुई।

आखिर मुस्लिमों की जनसंख्या बढ़ने के पीछे कारण क्या है? इसमें कॉन्ग्रेस पार्टी के तुष्टिकरण की राजनीति का हाथ नकारा नहीं जा सकता, क्योंकि इसी कॉन्ग्रेस के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था कि देश की संपत्ति पर पहला हक़ मुस्लिमों का है। उन्होंने 10 वर्षों तक शासन किया, सोचिए उनकी नीतियों का हिन्दुओं को कितना नुकसान हुआ होगा। सांप्रदायिक हिंसा को लेकर कॉन्ग्रेस एक बिल लेकर भी आई थी, जो अगर कानून बन जाता तो कहीं भी सांप्रदायिक दंगे होने पर हिन्दू समाज अपने-आप अपराधी घोषित कर दिया जाता और हिन्दू युवक जेल भेज दिए जाते।

हिन्दुओं की जनसंख्या घटने को हम ‘बहुसंख्यकों की जनसंख्या घटना’ कह कर शुभ संकेत की तरह क्यों लें? ये देश हिन्दुओं का है। ये देश सनातन का है, यहाँ हिन्दू धर्म से ही बौद्ध, जैन और सिख जैसे संप्रदाय निकले और फिर वापस समाहित की छाया में ही समाहित हो गए। इस्लाम तो बाहर से आया, हिंसा और धोखेबाजी का सहारा लेकर यहाँ के लोगों को बड़े पैमाने पर धर्मांतरित किया गया। कभी किसी फकीर ने ‘चमत्कार’ दिखाया, कभी किसी बादशाह ने जजिया कर लगाया।

भारत में अगर इस्लाम का प्रसार शांति से हुआ होता तो कोई दिक्कत की बात नहीं थी। कोई विचारधारा, जो हमारे देश की भूमि की सोच से मेल खाती ही नहीं है, वो बाहर से आकर यहाँ के मूलनिवासियों पर अपना आधिपत्य जमाने लगे तो इसमें खुश होने वाली कौन सी बात है? भारत में पहला बड़ा हमला करने वाला इस्लामी मुहम्मद बिन कासिम था, जिसने यहाँ की महिलाओं को सेक्स स्लेव बना कर अरब के बाजारों में भिजवाया, ये सोच तो भारत भूमि की नहीं हो सकती।

दुर्रानी साम्राज्य ने सिखों का सिर काट कर लाने पर इनाम रखा। अयोध्या, मथुरा और काशी से लेकर अनंतनाग तक मंदिर तोड़े गए, जबरन उन अवशेषों से मस्जिदें बनाई गईं। हिन्दू राजाओं के किलों में जाने वाली नहरों में गोमांस फेंके गए। कभी कोई नादिर शाह दिल्ली को लूट ले गया, कभी कोई अहमदशाह अब्दाली आ धमका। आज भी जानबूझकर गोहत्या की जाती है, हिन्दुओं को भड़काने के लिए। सोच वही है, सिर्फ पीढ़ियाँ बदली हैं। आज भी तो खलीफा के शासन के लिए आतंकी हमले किए जाते हैं।

भारत में PFI के एक बड़ा नेटवर्क सक्रिय था, जिसे प्रतिबंधित किया गया। उससे पहले SIMI हुआ करता था। इनका एक ही लक्ष्य था – भारत में इस्लामी शासन की स्थापना। PFI की छात्र यूनिट SDPI ने कर्नाटक में कॉन्ग्रेस को समर्थन दिया। कॉन्ग्रेस इन ताकतों से मिली हुई है। केरल के वायनाड में राहुल गाँधी ने हरे झंडों वाले IUML (इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग) से हाथ मिलाया। कॉन्ग्रेस आज भी अपने घोषणा-पत्र के माध्यम से मुस्लिम तुष्टिकरण में लगी है।

बिहार के फुलवारीशरीफ में भी PFI वालों के नेटवर्क पकड़ा गया, जहाँ गजवा-ए-हिन्द, यानी भारत में इस्लामी शासन के लिए साजिश चल रही थी। कई ठिकानों पर रेड पड़ी। कई दस्तावेज भी मिले, जिनमें इसके लिए 2047 यानी आज़ादी से 100 वर्ष बाद तक का लक्ष्य रखा गया था। कहीं युवाओं को हथियारों की ट्रेनिंग दी जाती है, कहीं ऑनलाइन सीरिया-पाकिस्तान में बैठे आकाओं से संपर्क करा कर भड़काया जाता है। आखिर हिन्दुओं में कोई आतंकी संगठन क्यों नहीं है, ये सब क्यों नहीं होता? हिन्दू तो भारत को अपनी भूमि मानते हैं, यहाँ की धरती को नुकसान क्यों पहुँचाएँगे?

कॉन्ग्रेस पार्टी का एजेंडा है मुस्लिमों को आरक्षण देना, पिछड़ों का हक़ मार कर। कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में नौकरी-एडमिशन से लेकर पंचायत चुनावों तक में मुस्लिमों को आरक्षण दिया जा रहा है। ये सब कॉन्ग्रेस ने किया। कॉन्ग्रेस की साजिश है देश की संपत्ति के बँटवारे की, ताकि हिन्दुओं की मेहनत की कमाई कई बच्चे पैदा करने वाले मुस्लिमों को पहुँच जाए। पार्टी घुसपैठियों का समर्थन करती है, इसने CAA का विरोध किया। पश्चिम बंगाल से लेकर दिल्ली तक कॉन्ग्रेस पार्टी घुसपैठियों को प्रश्रय देती है।

एक तो भारत खुद ही इस्लामी ताकतों से परेशान है, ऊपर से बड़ी संख्या में म्यांमार-बांग्लादेश से रोहिंग्या घुसपैठियों के प्रति नरमी दिखा कर देश को तबाही की ओर धकेला जा रहा है। केंद्रीय मंत्री रहे कांतिलाल भूरिया कहते हैं कि पार्टी सत्ता में आने के बाद महिलाओं को एक-एक लाख रुपया देगी, 2 बीवी वालों को 2 लाख रुपए मिलेंगे। अब हिन्दू धर्म में तो बहुविवाह की इजाजत नहीं है। शरिया ही इसकी अनुमति देता है। और हाँ, मुस्लिमों को तो भारत में अपना अलग कानून चलाने की अनुमति भी है, उनके लिए ‘पर्नसल लॉ’ है।

यही तो कारण है कि भाजपा अपने घोषणा-पत्र में UCC (समान नागरिक संहिता) लाने की बात करती है, जबकि कॉन्ग्रेस 2 बीवियों और ज़्यादा बच्चों वालों को प्रोत्साहित करती है। देश में सबके लिए समान कानून होना चाहिए, इसमें भला क्यों किसी को आपत्ति हो? महिला-पुरुष को बराबर अधिकार मिलें, इसमें कोई किसी को दिक्कत हो? लेकिन इस्लाम में तो मातृभूमि से पहले कुरान को रखा जाता है, स्वयं बबासाहब भीमराव आंबेडकर कह गए हैं।

केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा है कि मुस्लिमों की हिस्सेदारी देश में 20% हो गई है। उनका कहना है कि ये सनातन को खत्म करने की साजिश है, घुसपैठियों को कॉन्ग्रेस ने अपना वोट बैंक बना रखा है। वास्तविक परिस्थितियाँ इससे भी भयावह हैं। भारत में कई छोटे-छोटे पाकिस्तान बन गए हैं जहाँ शरिया चलता है। जिस ‘सोने की चिड़िया’ को हजारों वर्षों से हिन्दुओं ने अपने खून-पसीने से सींच कर उपजाऊ बनाया, जिसे बहार से आक्रांता लूट-लूट कर ले गए, अब वो क्षेत्र भी हिन्दुओं के हाथों से चला जाए तो कैसा लगेगा?

बार-बार ये कह कर मजाक बनाया जाता है कि धर्म कभी खतरे में था ही नहीं। अगर धर्म खतरे में नहीं था, फिर पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान कट कर कैसे अलग हुए भारत से? इतना बड़ा क्षेत्र हिन्दुविहीन कैसे हो गया? बांग्लादेश में एक अफवाह पर देश भर में नवरात्री के पूजा-पंडालों पर हमले होते हैं, अफगानिस्तान से गुरुग्रंथसाहिब को वापस आना पड़ता है, पाकिस्तान वो तो आए दिन हिन्दू लड़कियों को उठा कर ले जाते हैं और जबरन धर्मांतरण-निकाह कर देते हैं, सरकार तक मंदिरों को गिराने में साथ देती है।

कॉन्ग्रेस पार्टी ने शुरुआत से ही जो माहौल पैदा किया, ये सब उसका परिणाम है। जवाहरलाल नेहरू कहते थे कि राम-कृष्ण जैसे देवताओं ने गरीबी के सिवा और कुछ नहीं दिया। जिस देश की आत्मा में राम और कृष्ण बसते हों, वहाँ इस तरह के बयान से हिन्दू विरोधी उत्साहित नहीं होंगे तो और क्या। कभी राजीव गाँधी मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए शाहबानो केस में सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलट देते हैं, कभी कॉन्ग्रेस सरकार ऐसा कानून लेकर आती है जिससे हिन्दू अपने ही तबाह धर्मस्थल को लेकर न्याय का दावा नहीं कर सकें।

और हाँ, ये आँकड़े तो सिर्फ 2015 तक के हैं। ‘लव जिहाद’ से लेकर कई अन्य तरह की आपराधिक घटनाएँ तो इसके बाद और भी तेज़ हो गईं, क्योंकि इसके लिए बाहर से फंडिंग तक आने लगा। अब तो सलमान खुर्शीद की भतीजी मारिया आलम ने ‘वोट जिहाद’ की अपील कर दी है। 2015 के बाद के 9 वर्षों में ही 2020 के फरवरी में दिल्ली में दंगे हुए, दिव्यांगों को मुस्लिम बनाने का नेटवर्क पकड़ा गया, औरंगजेब के महिमामंडन के लिए बुद्धिजीवियों को लगाया गया और ‘भारत से बाहर ‘भारत में मुस्लिम खतरे में हैं’ वाला माहौल दुनिया भर में बनाया गया।