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कॉन्ग्रेस का ‘(ना) पाक इश्क’ जागा, बोले मणिशंकर अय्यर- पाकिस्तान की इज्जत करो… उनके पास एटम बम है

लोकसभा चुनावों के बीच कॉन्ग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर का विवादित बयान सामने आया है। अपने बयान में उन्होंने पाकिस्तान की जमकर पैरवी की है। उसे समृद्ध मुल्क बताया है और कहा है कि भारत को पाकिस्तान से अच्छे से बात करनी चाहिए न कि उन्हें बंदूक दिखानी चाहिए। उन्होंने यूट्यूब चैनल The Ewer (Chill-pill) पर अपनी किताबों समेत अन्य मुद्दों पर चर्चा करते हुए टिप्पणी की। उनके इस बयान के वायरल होने के बाद अब भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने करारा जवाब दिया है।

मणिशंकर अय्यर की वायरल वीडियो में देख सकते हैं कि उन्होंने बोला, “पाकिस्तान एक संप्रभु मुल्क है, उनकी भी इज्जत है, उनकी इज्जत को कायम रखते हुए उनसे जितनी कड़ी बात करनी है करो… लेकिन बात तो करो। बंदूक को लेकर आप घूम रहे हो। उससे क्या हल मिला… कुछ नहीं। तनाव बढ़ता जाता है। कोई भी पागल वहाँ आ जाए तो क्या होगा देश का। उनके पास एटम बम है। हमारे पास भी है, लेकिन किसी पागल ने बम को लाहौर स्टेशन में छोड़ा तो आठ सेकेंड के अंदर उसकी रेडियो एक्टिविटी अमृतसर पहुँचेगी। आप उसको इस्तेमाल करने को रोको, उससे बात करो, उसको इज्जत दो तो तभी जाकर वह अपने बम के बारे में नहीं सोचेंगे, मगर आपने उसको ठुकरा दिया तो फिर क्या होगा।”

अय्यर ने आगे कहा, “दुनिया का विश्व गुरु बनना हो तो यह जरूरी है दिखाने के लिए कि जितना भी खराब हो हमारा समस्या पाकिस्तान के साथ, उसका हल निकालने के लिए हम मेहनत कर रहे हैं। पिछले दस साल से सारी मेहनत बंद है। मस्कुलर पॉलिसी दिखाने वाले भारत को यह नहीं भूलना चाहिए कि पाकिस्तान के पास भी कहुटा (रावलपिंडी) में मसल (परमाणु बम) है।”

उनके इसी ट्वीट में बाद भाजपा प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने क्लास लगाई। पूनावाला ने कहा कॉन्ग्रेस का पाकिस्तान प्रेम थमने का नाम नहीं ले रहा है। अब कॉन्ग्रेस भारत में आतंकवादी भेजने वाले पाकिस्तान को इज्जत देने की बात कर रही है। कॉन्ग्रेस का हाथ आतंकवादियों एवं पाकिस्तान के साथ दिख रहा है और अब इसका एक और प्रमाण सामने आ गया।

पूनावाला ने मणिशंकर अय्यर के बयान पर कहा, “कॉन्ग्रेस परिवार के करीबी मणिशंकर अय्यर जो कि पीएम मोदी को हटाने के लिए एक बार पाकिस्तान से मदद माँगने भी गए थे, अब वह पाकिस्तान की ताकत और उसके परमाणु बम को दिखा रहे हैं।”

मणिशंकर अय्यर, भारत में आतंकवादी भेजने वाले पाकिस्तान को इज्जत देने की बात कर रहे हैं, जबकि इसी कॉन्ग्रेस के नेता हमारी सेना के लिए अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करते हैं। मणिशंकर अय्यर हमारी सेना के बंदूक लेकर घूमने, मोदी सरकार द्वारा सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक कर पाकिस्तान को सबक सिखाने जैसे कदमों की बजाय यह चाहते हैं कि भारत अपनी सुरक्षा के लिए कदम न उठाए।

उन्होंने आगे कहा कि कॉन्ग्रेस सरकार के समय मुंबई में 26/11 के भयानक आतंकी हमले के बाद भी मनमोहन सिंह की सरकार ने पाकिस्तान को सबक सिखाने के बजाय उसे मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा दे दिया था। उनकी सरकार के समय लगातार आतंकी घटनाएँ होती थीं और भारत अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर मदद की गुहार लगाया करता था, लेकिन पीएम मोदी की सरकार में यह सबकुछ बदला। उसके बाद अब हालात यह हो गई है कि पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर गिड़गिड़ाना पड़ रहा है… वहीं ‘कॉन्ग्रेस का हाथ’ को ‘पाकिस्तान के साथ’ के साथ देखा जा रहा है। यह उसी का एक और उदाहरण है।

नंगा कर प्राइवेट पार्ट पर वार, बाल पकड़ खींचे… कैप्टन अभिनंदन के साथ जो करने की हिम्मत न जुटा सका पाकिस्तान, वह बर्बरता अपने ही देश में एक कर्नल के साथ कॉन्ग्रेस ने करवाई

सेना में जाकर देशसेवा करने वाले एक कर्नल को कॉन्ग्रेस सरकार ने आतंकवादी सिद्ध करने की कोशिश की। उसे धमाके के एक मामले में आरोपित बनाया गया। कर्नल के साथ पाकिस्तान में विमान दुर्घटना के बाद पहुँचे विंग कमांडर अभिनन्दन वर्धमान से भी बुरा बर्ताव किया गया। यहाँ तक कि कर्नल का पैर तोड़ा गया, उसके वरिष्ठ अधिकारी और पुलिस वालों ने उसे मारा। अवैध रूप से उसे बंद रखा। सालों तक जेल में रखा। उसकी सैन्य सेवा को भी प्रभावित किया गया।

यह कहानी किसी तानाशाही वाले देश की नहीं बल्कि भारत की है जहाँ कॉन्ग्रेस शासन में ‘भगवा आतंकवाद’ का नैरेटिव गढ़ने के लिए साधुओं, सैन्यकर्मियों और हिन्दू हितों के लिए काम करने वालों को निशाने पर लिया गया। 2008 में हुए मालेगाँव धमाका मामले में मुकदमे में आरोपी बनाए गए लेफ्टिनेंट श्रीकांत प्रसाद पुरोहित की कहानी पीड़ाजनक और गुस्से से भरने वाली है। कर्नल पुरोहित ने बुधवार (8 मई, 2024) को मुंबई के एक कोर्ट में अपनी पीड़ा बताई।

उन्होंने बताया, “मेरे साथ ऐसा व्यवहार किया गया जो किसी जानवर के साथ भी नहीं किया जाता। मेरे साथ युद्ध बंदी से भी बदतर व्यवहार किया गया। हेमंत करकरे, परमबीर सिंह और कर्नल श्रीवास्तव लगातार इस बात पर जोर देते रहे कि मैं मालेगाँव बम धमाके के लिए खुद को जिम्मेदार बता दूँ। उन्होंने मुझसे कहा कि मैं RSS, VHP के वरिष्ठ नेताओं और उत्तर प्रदेश के तत्कालीन सांसद योगी आदित्यनाथ का नाम लूँ। उन्होंने मुझे 3 नवम्बर, 2008 तक यातनाएँ दी।”

उन्होंने कोर्ट को बताया कि मालेगाँव में धमाके के बाद उन्हें पंचमढ़ी से गिरफ्तार किए जाने के बाद जबरदस्ती एक जगह अवैध रूप से रखा गया। कर्नल पुरोहित ने बताया कि उन्हें खंडाला के बंगले में रखा गया जहाँ उन्हें प्रताड़ित किया गया। उनको 29 अक्टूबर, 2008 को गिरफ्तार किया गया था और उन्हें 3 नवम्बर तक प्रताड़ित किया गया था। इस दौरान ATS अधिकारी परमबीर सिंह, हेमंत करकरे और अन्य अधिकारियों ने मारा और उनका घुटना तोड़ दिया। इसकी वजह से उन्हें चलने में परेशानी होती है।

कर्नल पुरोहित को जब पकड़ा गया तब वह इंटेलिजेंस के लिए काम कर चुके थे और SIMI, ISI समेत तमाम देश विरोधी गतिविधि को रोकने में काफी हद तक सफल रहे थे। मालेगाँव मामले की जाँच के नाम पर उनसे इन आतंकी संगठनों पर की गई कार्रवाई और उनके मुखबिरों के बारे में बताने को कहा गया। कर्नल पुरोहित ने आरोप लगाया कि उनके साथ यह ज्यादती इसलिए हुई क्योंकि तब की केंद्र और महाराष्ट्र की कॉन्ग्रेस सरकार ऐसा चाहती थीं। यह सब उनकी शह पर हो रहा था।

कर्नल पुरोहित को मारने तक की योजना बनाई गई थी। उनका एनकाउंटर करने का प्लान था। 2018 में लिखे गए एक पत्र में कर्नल पुरोहित ने बताया था कि पूछताछ के दौरान उनके कपड़े उतारे गए, उनके प्राइवेट पार्ट पर वार किया गया और उनके बाल पकड़ कर खींचा गया। उन्हें शारीरिक यातनाएँ देकर दबाव डाला गया कि वह मालेगाँव धमाके में जिम्मेदारी स्वीकार कर लें। उन पर दबाव डाला गया कि वह RSS-VHP नेताओं का नाम लें और योगी आदित्यनाथ को भी आतंक के मामले में फँसाएँ।

कर्नल पुरोहित ने जिन हेमंत करकरे पर यातना देने का आरोप लगाया है, उनकी 26/11 हमले में आतंकियों ने हत्या कर दी थी। परमबीर सिंह बाद में मुंबई के पुलिस कमिश्नर बने थे लेकिन उनके ऊपर उगाही के गंभीर आरोप लगे थे। वह भगोड़े भी घोषित किए गए थे। कर्नल पुरोहित ने मुंबई के कोर्ट को बताया है कि उनको यह यातनाएँ हिन्दू आतंकवाद का नैरेटिव गढ़ने के लिए दी जा रहीं थी। इसके लिए पहले से ही प्लान बनाया गया था।

इसी समय पर एनसीपी नेता शरद पवार हिन्दू आतंकवाद की बातें कर रहे थे। कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम यह सिद्ध करने में लगा था कि देश में सिर्फ इस्लामी आतंकवाद नहीं है बल्कि हिन्दू आतंकवाद नाम का भी कुछ होता है। यहाँ तक कि 26/11 हमले को तक हिन्दू आंतकवाद से जोड़ने की साजिश हुई थी। यह सब वोटबैंक और कॉन्ग्रेस की हिन्दू घृणा के कारण फल फूल रहा था। वामपंथी पत्रकार इस बात को और हवा दे रहे थे।

कर्नल पुरोहित को दी प्रताड़नाओं की तुलना अगर 2019 बालाकोट एयरस्ट्राइक के बाद पाकिस्तान में विमान क्रैश होने के कारण गिरे विंग कमांडर अभिनन्दन वर्धमान से की जाए तो पाकिस्तान का बर्ताव कॉन्ग्रेस सरकार से अच्छा दिखेगा। अभिनन्दन वर्धमान को जहाँ कुछ घंटों के लिए ही पाकिस्तान रख पाया था, वहीं कर्नल पुरोहित को मात्र इसलिए सालों तक जेल में रखा गया ताकि हिन्दू आतंकवाद का फर्जी नैरेटिव गढ़ा जा सके और बहुसंख्यक आबादी को आतातायी घोषित किया जाए।

विंग कमांडर अभिनन्दन वर्धमान को मोदी सरकार 48 घंटों के भीतर पाकिस्तान से वापस ले आई थी। पाकिस्तान खुद ही विंग कमांडर वर्धमान को सौंपने को मजबूर हो गया था क्योंकि उसे पता था कि मोदी सरकार अपने सैनिक के लिए कोई भी बड़ा कदम उठा सकती है। दूसरी तरफ कॉन्ग्रेस का रवैया था कि देश की करोड़ों जनता का दशकों का सेना में विश्वास टूट जाए, इसलिए एक सैनिक को ही आतंकी घोषित करने का प्रयास करो। उसे हिन्दू आतंकवादी बताओ।

‘आडवाणी ने कहा- राहुल गाँधी भारतीय राजनीति के नायक’: रामरथी के नाम का सहारा लेकर झूठ फैला रहे ‘राम द्रोही’, जानिए क्या है सच

लोकसभा चुनावों के बीच कॉन्ग्रेस फर्जी सूचनाओं के जरिए अपना प्रचार करने में लगी है। इस बीच राहुल गाँधी की छवि निर्माण के लिए कुछ दिन पहले एक पोस्ट वायरल की गई। इस पोस्ट में कहा गया है कि भाजपा नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने कहा है कि राहुल गाँधी भारतीय राजनीति के नायक हैं। अब कॉन्ग्रेसी इसी पोस्ट को शेयर कर करके अपना एजेंडा चला रहे हैं, लेकिन सवाल है कि क्या वाकई भाजपा के दिग्गज नेता ने ऐसी कोई बात कही है या कॉन्ग्रेस की अन्य बातों की तरह ये भी निराधार दावा है।

वायरल होते पोस्ट में देख सकते हैं कि शीर्षक के तौर पर लिखा- “राहुल गाँधी भारतीय राजनीति का नायक है : लालकृष्ण आडवाणी।” इसके बाद पोस्ट में 7 मई, 2024 की तारीख डालकर लिखा गया है,

“देश के पूर्व गृहमंत्री भारतरत्न लाल कृष्ण आडवाणी ने राहुल गाँधी को लेकर एक बड़ा बयान दिया है। आडवाणी ने कहा है कि भले ही मैं भाजपा से हूँ, लेकिन मैं आज भारत देश के समाज सेवक के रूप में भारतीय जनता को ये कहना चाहता हूँ कि राहुल गाँधी ही एक ऐसे इंसान हैं जो भारत देश को एक अच्छा राष्ट्र बना सकते हैं, क्योंकि उनमें वह निर्णय लेने की क्षमता है जो भारत देश के देशवासियों को नई दिशा प्रदान कर सकते हैं। मैंने भी देश के लिए एक गृहमंत्री के रूप में सेवा की है, लेकिन मैंने कभी भी राजनीति में राहुल गाँधी जैसा प्रभावशाली नेता नहीं देखा।

लालकृष्ण आडवाणी का बयान ऐसे समय में सामने आया है जब आज तीसरे चरण का चुनाव चल रहा है। उनके बयान को महत्वपूर्ण इसलिए भी माना जा रहा है कि अभी हाल ही में उन्हें मोदी सरकार की ओर से भारत रत्न दिया गया है ऐसे में राहुल गाँधी की तारीफ करके लाल कृष्ण आडवाणी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।”

अब जैसा कि समझा जा सकता है चुनाव के समय में इतने बड़े बयान के महत्व क्या हो सकते हैं और इससे कितनी खलबली मच सकती है, लेकिन मीडिया में चेक करने पर पता चलता है कि किसी मेनस्ट्रीम मीडिया ने इसे कवर नहीं किया है। उलटा इस पोस्ट की प्रमाणिकता पर जगह-जगह सवाल उठे हैं।

इस पोस्ट को अवधभूमि न्यूज ने अपनी साइट पर बिन किसी सोर्स के पब्लिश किया था। साथ में डिस्क्लेमर में ये भी कहा था कि वो इस पोस्ट की प्रमाणिकता की पुष्टि नहीं करते। बाद में पोस्ट वायरल हुआ तो इस लेख को वहाँ से हटा दिया गया, लेकिन कॉन्ग्रेस के लोग इसे साझा करते रहे।

वहीं एबीपी न्यूज बताता है कि जब उन्होंने इस संबंध में भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता संजय मयूख से बात की तो पता चला कि पूर्व उप-प्रधानमंत्री आडवाणी ने ऐसा कोई बयान दिया ही नहीं है। अगर उन्हें कुछ कहना होगा तो उसे भाजपा खुद रिलीज करेगी या फिर उनके करीबी दीपक चोपड़ा उसे रिलीज करेंगे। कॉन्ग्रेस नहीं। कॉन्ग्रेस सिर्फ तरह-तरह के हथकंडे अपना रही है, जो विफल हो रहे हैं। उसका जवाब लोग मतदान के जरिए देंगे।

वहीं आडवाणी के करीबी और उनके पुराने सहयोगी दीपक चोपड़ा ने तो साफ कहा, “लालकृष्ण आडवाणी ने ऐसी कोई बात नहीं की है। न तो उन्होंने अभी ऐसा कोई बयान दिया है और न ही कभी पहले दिया है।”

गौरतलब है कि लाल कृष्ण आडवाणी लंबे समय से सार्वजनिक तौर पर नजर भी नहीं आए हैं। न ही लंबे अरसे से वे मीडिया से बात करते दिखे हैं। स्वास्थ्य और उम्र के कारण वे राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में भी शामिल नहीं हुए थे। यहाँ तक कि ‘भारत रत्न’ से उनको सम्मानित करने के लिए राष्ट्रपति भी खुद उनके घर तक गईं थी।

ऐसे में निष्कर्ष तो यही निकलता है कि भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने ऐसी कोई बात कही ही नहीं है। न उन्होंने राहुल गाँधी की तारीफ की है न ही उन्हें भारतीय राजनीति का नायक बताया है, न ही ये कहा है कि वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुनौती दे सकते हैं।

‘हिंदू आतंकवाद’ का नैरेटिव गढ़ने को साध्वी को बेल्ट से पीटा, दिखाए थे पोर्न… कर्नल पुरोहित के खुलासों से पहले भी कोर्ट में सामने आए थे कॉन्ग्रेसी राज के कुकर्म

मालेगाँव बम धमाका मामले में मुकदमे का सामना करने वाले लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत प्रसाद पुरोहित ने बताया है कि महाराष्ट्र ATS ने पूछताछ के दौरान उनका घुटना तोड़ दिया था। उन्होंने एक कोर्ट को बताया है कि ATS उन पर इस बात के लिए दबाव बनाती थी कि वह मालेगाँव धमाका मामले में RSS-VHP नेताओं और सांसद योगी आदित्यनाथ का नाम लें। इससे पहले इसी मामले में कॉन्ग्रेस शासनकाल से मुकदमा झेलीं सांसद साध्वी प्रज्ञा कोर्ट में रो पड़ीं थी।

इस मामले में अक्टूबर 2023 में NIA के विशेष कोर्ट को बयान दर्ज करवाते समय साध्वी प्रज्ञा भावुक हो गईं थी। उनके साथ मालेगाँव धमाके में आरोपित बनाए गए अन्य 7 व्यक्तियों का भी बयान दर्ज किया जा रहा था। साध्वी से जब धमाके के बाद मृत और घायल लोगों को आई चोटों के सम्बन्ध में प्रश्न पूछे गए तो वह भावुक हो गईं थीं। इसके पश्चात मामले की सुनवाई कर रहे न्यायाधीश एके लाहोटी ने कार्रवाई को 10 मिनट के लिए रोक दिया था।

रिपब्लिक टीवी को दिए हुए एक इंटरव्यू में साध्वी प्रज्ञा ने इस मामले में कई खुलासे भी किए थे। उन्होंने मुंबई के पूर्व पुलिस आयुक्त परमबीर सिंह पर गंभीर आरोप लगाए थे। उन्होंने बताया था कि 3-4 पुलिसकर्मियों की उपस्थिति में उनको व्यक्तिगत रूप से बहुत ज्यादा प्रताड़ित किया और हिरासत में लेकर उन्हें बेल्ट से इस तरह पीटा गया कि उन्हें वेंटीलेटर तक पर जाना पड़ा। उनकी रीढ़ की हड्डी भी टूट गई।

उन्होंने बताया था कि जब भी उनकी बेल की बात चली तो न्यायाधीशों तक को धमकी देने का काम हुआ। उन्होंने परमबीर सिंह पर आरोप लगाया था कि उन्हें हिरासत के दौरान पॉर्न वीडियो दिखाई गईं और उनसे भद्दे सवाल किए गए। अपनी प्रताड़ना के विषय में बताया था कि उन्हें 7-8 लोगों के घेरे के बीच में मारा गया।

उनके पैरों के तलों तक में बेल्ट से पिटाई हुई। साध्वी ने इस इंटरव्यू में कहा था कि वह परमबीर के षड्यंत्र के विरुद्ध कुछ करने वाली हैं, जिन जिन लोगों ने उन्हें प्रताड़ित किया, उन पर भी केस होगा और उन्हें दंड दिलवाया जाएगा।

उन्होंने इस इंटरव्यू में बताया था कि पहले उनको भगवा आतंकी कहा गया कहा गया और फिर भारत को आतंकवादी देश घोषित करवाने का प्रयास हुआ। उन्होंने आरोप लगाया था कि ये सारा षड्यंत्र कॉन्ग्रेस का था। साध्वी प्रज्ञा 2019 में भोपाल से सांसद बनी थीं। मालेगाँव धमाका मामले में  NIA द्वारा वर्ष 2016 में दाखिल अंतिम चार्जशीट में उनका नाम नहीं था और उन्हें जमानत मिल गई थी। उनको इस मामले में दोषी नहीं माना गया था।

जिनको 4 निकाह की इजाजत उनके लिए खजाना खोलेगी कॉन्ग्रेस? बोले मनमोहन की सरकार में मंत्री रहे भूरिया- 1 बीवी पर ₹1 लाख, 2 पर ₹2 लाख…

कॉन्ग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में हर महिला को जो 1 लाख रुपए देने का वादा किया है, उसके पीछे मंशा क्या है इसका खुलासा हाल में कॉन्ग्रेस प्रत्याशी कांतिलाल भूरिया के बयान से हुआ। मध्य प्रदेश के पूर्व केंद्रीय मंत्री और रतलाम के कॉन्ग्रेस अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया ने यहाँ जनसभा को संबोधित करते हुए ऐलान किया कि कॉन्ग्रेस बाकी महिलाओं को 1 लाख रुपए देगी और दो बीवी वाले लोगों को 2 लाख रुपए देगी।

उनकी यह वीडियो अब सोशल मीडिया पर वायरल है। इस वीडियो में वह कहते दिखाई पड़ रहे हैं कि कॉन्ग्रेस हर महिला को एक लाख रुपए देगी। सरकार आते ही एक लाख देगी। इसके बाद मुँह पर हँसते हुए बोले जिस व्यक्ति की दो पत्नियाँ हैं, उसे दो लाख रुपए सालाना दिए जाएँगे। इसके अलावा कॉन्ग्रेस ने चुनावी घोषणापत्र में सभी महिलाओं के खातों में एक-एक लाख रुपये देने की बात कही है।

बताया जा रहा है कि जिस रैली में कॉन्ग्रेस प्रत्याशी ने ऐसी बात कही है उस रैली में पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह और कॉन्ग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी भी मौजूद थे। मंच पर बैठकर इन लोगों ने भूरिया की बात पर न केवल उनका समर्थन किया था बल्कि ये तक कहा था कि जिसकी दो पत्नियाँ, उसको डबल।

गौरतलब है कि कांतिलाल भूरिया की बात सुनने के बाद जहाँ कॉन्ग्रेस के नेता उनको समर्थन करने से पीछे नहीं हट रहे। वहीं दूसरी ओर सोशल मीडिया यूजर्स इस बयान को सुनने के बाद कह रहे हैं कि क्या कॉन्ग्रेस अप्रत्यक्ष रूप से यह कहना चाह रही है कि वो मुस्लिमों को (जिन्हें इस्लाम में 4 निकाह करने की इजाजत है) उन्हें चार लाख रुपए तक देगी।

कुछ तो यह भी कह रहे हैं कि इस तरह की स्कीमें सिर्फ मुस्लिमों को ज्यादा निकाह करने में बढ़ावा देंगी, इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं। वहीं कुछ स्पष्ट पूछ रहे हैं कि आखिर हिंदू जब दो शादी कर नहीं सकते तो ये पार्टी इस स्कीम के जरिए किस समुदाय तक पहुँचने के लिए अपना प्रचार कर रही है।

मालेगाँव ब्लास्ट में योगी आदित्यनाथ को फँसाने की थी साजिश, कोर्ट में बोले कर्नल पुरोहित- UPA सरकार के इशारे पर ATS ने किया टॉर्चर, नाम लेने का डाला दबाव

महाराष्ट्र ATS आतंक के मामले में तत्कालीन सांसद योगी आदित्यनाथ, विश्व हिन्दू परिषद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोगों को फँसाना चाहती थी। इसके लिए उसने मालेगाँव बम धमाकों के मामले में मुकदमे का सामना करने वाले लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत प्रसाद पुरोहित को प्रताड़ित किया था। ATS ने उनको बम धमाके की जिम्मेदारी लेने के लिए लगातार यातनाएँ दी। कर्नल पुरोहित ने बताया है कि महाराष्ट्र ATS उनसे उनके ख़ुफ़िया मिशन के बारे में सारी जानकारी बताने को कह रही थी। कर्नल पुरोहित ने यह सभी खुलासे कोर्ट के सामने किए हैं।

कर्नल पुरोहित ने बुधवार (8 मई, 2024) को मुंबई के एक कोर्ट को बताया, “मेरे साथ ऐसा व्यवहार किया गया जो किसी जानवर के साथ भी नहीं किया जाता। मेरे साथ युद्ध बंदी से भी बदतर व्यवहार किया गया। हेमंत करकरे, परमबीर सिंह और कर्नल श्रीवास्तव लगातार इस बात पर जोर देते रहे कि मैं मालेगाँव बम धमाके के लिए खुद को जिम्मेदार बता दूँ। उन्होंने मुझसे कहा कि मैं RSS, VHP के वरिष्ठ नेताओं और उत्तर प्रदेश के तत्कालीन सांसद योगी आदित्यनाथ का नाम लूँ। उन्होंने मुझे 3 नवम्बर, 2008 तक यातनाएँ दी।”

कर्नल पुरोहित ने बताया कि यह सब कुछ तत्कालीन UPA सरकार और राज्य की कॉन्ग्रेस-NCP सरकार के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए उनकी शह पर किया गया था। उन्होंने अपनी गिरफ्तारी और मालेगाँव के मामले में में बताया है कि सब पूर्व नियोजित तरीके से हुआ था।

कर्नल पुरोहित ने कोर्ट से कहा, “करकरे और परमबीर सिंह बार-बार मुझ पर अपने खुफिया नेटवर्क की जानकारी देने के लिए दबाव डाल रहे थे। यह लोग मुझसे अपने उन मुखबिरों की सूची देने को कह रहे थे जिन्होंने आतंकी संगठन SIMI, ISI और डॉ. जाकिर नाइक की गतिविधियों का पता लगाने में मेरी सहायता की थी। मैंने अपने नेटवर्क का खुलासा करने से इनकार कर दिया क्योंकि यह मुझे स्वीकार्य नहीं था।”

उन्होंने तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व पर हिन्दू आतंकवाद का नैरेटिव गढ़ने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा, “अचानक अगस्त 2008 में , NCP अध्यक्ष (शरद पवार) ने अलीबाग में पार्टी कार्यकर्ताओं की एक रैली में बयान दिया कि सिर्फ़ आतंकवादी इस्लामी ही नहीं हैं, बल्कि हिंदू आतंकवादी भी हैं। यह पहली बार था जब ‘हिंदू आतंकवाद’ शब्द सामने आया था। इस बयान के बाद 29 सितंबर, 2008 की दुर्भाग्यपूर्ण घटना हुई और उसमे हिन्दुओं को आतंकवादी बताया गया।”

कर्नल पुरोहित ने आरोप लगाया कि ATS गवाहों से बन्दूक की नोक पर बयान दिलवाती थी। उन्हें प्रताड़ित करती थी। उन्होंने यह भी बताया कि उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था लेकिन इसे कागजों में नहीं दिखाया गया। उन्हें मारपीटा गया और उनका पैर तोड़ दिया गया। कर्नल पुरोहित ने अपने एक सीनियर कर्नल पीके श्रीवास्तव पर भी आरोप लगाए हैं।

हिन्दू नेताओं को फँसाने की यह बात नई नहीं है। इससे पहले भी मालेगाँव मामले में एक गवाह भी ऐसी ही बात बता चुका है। गवाह ने 2021 में मुंबई की विशेष एनआईए अदालत को बताया था कि ATS ने उसे उठाया और सात दिन तक बंद रखा। इस दौरान उसे प्रताड़ित किया गया और उसके परिवार को भी फँसाने की धमकी दी गई। गवाह ने बताया कि ATS ने उसे भाजपा के तत्कालीन सांसद योगी आदित्यनाथ के अलावा RSS के इंद्रेश कुमार, देवधर, काकाजी और स्वामी असीमानंद का नाम लेने के लिए मजबूर किया था।

गौरतलब है कि सितंबर 2008 में मालेगाँव की एक मस्जिद के पास हुए बम धमाकों में छह लोगों की मौत हो गई थी और 100 से अधिक लोग घायल हुए थे। मस्जिद के पास एक मोटरसाइकिल में बाँधे गए विस्फोटक से धमाके को अंजाम दिया गया था। एटीएस ने इस मामले में शुरुआती जाँच की थी। तीन साल बाद 2011 में इस केस को एनआईए के पास ट्रांसफर किया गया था। मालेगाँव धमाका मामले में अब एनआईए की स्पेशल कोर्ट सुनवाई कर रही है।

जहाँजैब वानी और बीवी हिना शेख समेत 5 आतंकियों को 3 से 20 साल की सजा: भारत में तबाही मचाना चाहते थे ISKP आतंकी

दिल्ली में आईएसआईएस के 5 आतंकवादियों को एनआईए की विशेष कोर्ट ने 3 से 20 साल तक की सजा सुनाई है। ये सभी आतंकी इस्लामिक स्टेट-खुरासान प्रांत (आईएसकेपी) के सदस्य थे और भारत में तबाही मचाने की साजिश रच रहे थे। इसमें मुख्य आरोपित का नाम जहाँजैब समी वानी है, जो श्रीनगर का रहने वाला है। उसकी बीवी हिना बाशिर शेख भी उसके हर कुकर्म में उसके साथ थी।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, एनआईए ने अपनी जाँच में पाया कि कश्मीरी आतंकी कपल के नेतृत्व में भारत में 100 से ज्यादा जगहों पर आईईडी ब्लास्ट की योजना पर काम किया जा रहा था। इसके लिए बिटकॉइन जैसे हाईटेक ऑनलाइन मनी का इस्तेमाल किया जा रहा था। ये ग्रुप ISKP से जुड़ा है, जो ISIS के शाखा के तौर पर काम करता है। एनआईए कोर्ट ने जिन 5 आतंकवादियों को सजा सुनाई, उसमें जहाँजैब समी (36) श्रीनगर का रहने वाला है। वो दाऊद इब्राहीम, जैब, अबु मोहम्मद अल-हिंद और अबू अब्दुल्ला जैसे नामों से भी जाना जाता था। इसके अलावा उसकी कश्मीरी बीवी हिना बाशिर शेख, हैदराबाद का अब्दुल्ला बासित, पुणे की सादिया अनवर शेख और नबील सिद्दीक खत्री शामिल हैं।

एनआईए कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश चंदर जीत सिंह की कोर्ट ने ये फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि किसी भी संगठन को चलाने के लिए पैसों की जरूरत होती है, जो इस केस में बिटकॉइन जैसी हाईटेक मुद्राओं के जरिए पूरी की गई। ऐसे में सभी लोगों को पता था कि वो क्या कर रहे हैं और कितना गंभीर अपराध कर रहे हैं। ऐसे में किसी को भी ढील देने जैसी कोई गुंजाइश नहीं दिखती।

एनआईए ने बताया कि पाँच में एक आरोपित पर भारत में खिलाफत स्थापित करने की योजना बनाने का आरोप है, साथ ही उस पर एक ही दिन में 100 आईईडी विस्फोट करने की साजिश रचने का भी आरोप है। दिल्ली पुलिस ने आठ मार्च 2020 को दो आरोपी- जहाँजैब सामी वानी और उसकी पत्नी हिना बशीर बेग को आईएसकेपी से संबंध रखने के आरोप में दिल्ली के ओखला विहार, जामिया नगर से गिरफ्तार किया था। दोनों भारत में राष्ट्र विरोधी गतिविधियों को अंजाम देने की साजिश रच रहे थे। इसके अलावा 12 जुलाई 2020 को पुणे से NIA ने दो अन्य आरोपियों को भी गिरफ्तार किया था। जिनका नाम सादिया अनवर शेख और नबील एस खत्री था।

सीरिया जा चुका है अब्दुर रहमान

इस मामले में अगस्त, 2020 में अब्दुर रहमान उर्फ डॉ. ब्रेव को NIA द्वारा गिरफ्तार किया गया था। फिलहाल, अब्दुर रहमान के खिलाफ केस चल रहा है। जारी बयानों में जानकारी दी गई है कि अब्दुर रहमान बंगलुरु में MBBS की पढ़ाई करता था। जिसके बाद वह उन अन्य आरोपितों के संपर्क में आया और उन्होंने उसे कट्टरपंथी बनाया था। इतना ही नहीं अब्दुल साल 2013 में सीरिया भी गया था। जहाँ वो ISIS की अन्य आतंकवादी गतिविधियों में शामिल भी हुआ था। अब्दुल ने आतंकवादियों के स्वास्थ्य और उनके इलाज को लेकर एक मेडिकल एप्लिकेशन और ISIS के लिए एक लेजर गाइडेड एंटी-टैंक मिसाइल एप्लिकेशन भी बनाना सीखा था।

ये समाचार मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल लेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

पाकिस्तान के पंजाब और चीन से आए ‘बाहरी लोगों’ पर बढ़े हमले, 7 मजदूरों की फिर हत्या: इस्लामी मुल्क ने बलूचिस्तान को हिंसा की आग में कैसे झोका, जानिए

हाल के दिनों में पाकिस्तान के बलूचिस्तान में हिंसा में वृद्धि देखी गई है। वहाँ बलूच अलगाववादी समूह पाकिस्तान के पंजाब प्रांत और चीन के लोगों को विशेष तौर पर निशाना बना रहे हैं। ताजा मामले में 9 मई 2024 को बलूचिस्तान के ग्वादर के सुरबंदर में पंजाब के सात मजदूरों को उनके कमरे में सोते समय गोली मारकर हत्या कर दी गई। पिछले महीने पंजाब के 11 श्रमिकों की हत्या कर दी गई थी।

अभी तक किसी भी समूह ने इस हमले की जिम्मेदारी नहीं ली है। हालाँकि, ऐसा माना जाता है कि इसके पीछे बलूच राष्ट्रवादी समूह हो सकते हैं, क्योंकि वे इस क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं। ऐतिहासिक रूप से बलूचिस्तान अलगाववादी गतिविधियों का केंद्र रहा है। पिछले वर्ष की तुलना में साल 2024 में बलूचिस्तान क्षेत्र में हिंसक घटनाओं में 96% की वृद्धि दर्ज की गई है।

बलूचिस्तान के मुख्यमंत्री मीर सरफराज बुगती ने हमले की निंदा की है और इसे आतंकवादी कृत्य करार दिया है। एक बयान में उन्होंने हमले के पीछे के दोषियों को नहीं बख्शने की कसम खाई है। उन्होंने कहा, “आतंकवादियों और उनका समर्थन करने वालों से निपटने के लिए हम सभी आवश्यक बल का प्रयोग करेंगे। पाकिस्तानी खून-खराबे की एक-एक बूँद का हिसाब लिया जाएगा।”

जातीय तनाव की पृष्ठभूमि

यह पहली बार नहीं है जब इस क्षेत्र में ‘बाहरी लोगों’ पर हमला हुआ है। ऐसे कई उदाहरण हैं जब पंजाब और चीन के लोगों को निशाना बनाया गया। हमलों के पीछे यह धारणा है कि ‘बाहरी’ लोग स्थानीय संस्कृति और अधिकारों को कमजोर करते हैं। इस क्षेत्र के इतिहास पर नजर डालें तो साल 2006 में नवाब अकबर बुगती की हत्या ने स्थानीय विद्रोहियों के बीच ‘बाहरी विरोधी’ भावनाओं को और बढ़ाया।

साल 2019 में ऑपइंडिया ने ‘बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट’ (BLF) के संस्थापक एवं प्रमुख डॉक्टर अल्लाह नज़र बालोक का साक्षात्कार लिया था। उन्होंने कहा था कि बलूच लोगों का पाकिस्तान की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में शामिल होने का कोई इरादा नहीं है क्योंकि उनकी संस्कृति, भाषा, मानस, इतिहास और भूगोल अलग-अलग हैं। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने बलूचिस्तान पर बलपूर्वक कब्जा किया है।

उन्होंने कहा, “उन्हें (पाकिस्तान) बलूचिस्तान और बलूच राष्ट्र के कल्याण में कोई दिलचस्पी नहीं है। उन्हें केवल हमारे 750 मील लंबे तट और खनिजों में रुचि है। इसलिए हम बलूचों के पास दुनिया का ध्यान उत्पीड़ित बलूचों की ओर हटाने के लिए प्रतिरोध के अलावा कोई रास्ता नहीं है।” इस क्षेत्र में चीनी नागरिकों पर हमलों का एक मुख्य कारण खनिजों के उत्खनन में चीनी कंपनियों का शामिल होना भी है।

हिंसा की वर्तमान लहर

सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध आँकड़ों से पता चलता है कि साल 2022 में बलूचिस्तान में 406 मौतें हुई थीं। साल 2023 में यह बढ़कर 466 हो गई, जो साल 2016 के बाद से सबसे अधिक संख्या थी। इस क्षेत्र में अत्यधिक सक्रिय विद्रोही समूहों में बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट और बलूच लिबरेशन आर्मी (बीएलए) शामिल हैं।

ये अलगाववादी समूह अक्सर हिंसा को उचित ठहराते हुए कहते हैं कि यह चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) जैसी परियोजनाओं के लिए यहाँ बड़ी संख्या में गैर-स्थानीय श्रमिक आते हैं। इसके कारण बलूचिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों का शोषण होता है। उनका कहना है कि बलूचिस्तान की संस्कृति के क्षरण के खिलाफ प्रतिरोध दिखाने का एक तरीका है।

डॉक्टर अल्लाह नज़र बलूच ने ऑपइंडिया के साथ साक्षात्कार में कहा था, “बलूचिस्तान में कुछ भी निवेश नहीं किया जा रहा है। पंजाबी प्रतिष्ठान इसे दोनों हाथों से लूट रहे हैं और बलूच संसाधन पाकिस्तान के लिए माल-ए-गनीमत यानी युद्ध में लूटा गया माल भर है।”

बता दें कि CPEC अरबों डॉलर की एक सड़क परियोजना है, जो पाकिस्तान और चीन की सरकारों के बीच एक समझौते का परिणाम है। परियोजना के पीछे का विचार चीन को अपने उत्पादों को पाकिस्तान के बंदरगाहों के रास्ते दुनिया के बाकी हिस्सों से जोड़ने के लिए एक गलियारा बनाना है। सीपीईसी को अब वित्तीय समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

इतना ही नहीं, वित्तीय समस्या के साथ-साथ अब इसे स्थानीय लोगों के विरोध का भी सामना करना पड़ रहा है। दरअसल, पाकिस्तान सरकार स्थानीय लोगों को यह समझाने में विफल रही है कि यह परियोजना उनके लिए लाभकारी है। इसके अलावा, भारत ने भी इस परियोजना पर आपत्ति जताई है, क्योंकि यह परियोजना पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) से गुजरती है।

बलूचिस्तान में हमले और पाकिस्तान के समस्या

विद्रोही समूहों ने स्पष्ट रूप से उन लोगों को निशाना बनाया है, जिन पर पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के साथ सहयोग करने या सीपीईसी परियोजनाओं में शामिल होने का संदेह था। पंजाब के श्रमिकों की लक्षित हत्याएँ और चीनी नागरिकों पर हमलों ने खतरे की गंभीरता को रेखांकित किया है। उदाहरण के लिए, 13 अगस्त 2023 को ग्वादर में चीनी नागरिकों को ले जा रहे काफिले पर हमला हुआ था।

इस हमले में चीनी नागरिकों के साथ-साथ पाकिस्तानी कई सुरक्षाकर्मियों कई मौत हुई थी। इस हमले की जिम्मेदारी बीएलए ने ली थी। इस तरह बार-बार होने वाले हमलों ने पहले से ही संकटग्रस्त बलूचिस्तान को और अस्थिर कर दिया है और आर्थिक रूप से डूबी हुई पाकिस्तान की सरकार की आर्थिक महत्वाकांक्षाओं के लिए एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।

सीपीईसी को पाकिस्तान के आर्थिक भविष्य की आधारशिला माना जाता था, लेकिन बलूच विद्रोहियों के विरोध और हिंसक हमलों के कारण यह बड़े पैमाने पर प्रभावित हुआ है। इन हमलों को लेकर चीन भी पाकिस्तान के समक्ष कई नाराजगी जता चुका है। वहीं, बलूच लोगों का तर्क है कि सीपीईसी के जरिए स्थानीय लोगों की कीमत पर बाहरी लोगों को फायदा पहुँचाया जा रहा है।

पाकिस्तान की भूमिका

यह ध्यान रखना होगा कि पाकिस्तान में वर्षों से स्थिरता नहीं है, चाहे वह आर्थिक हो या राजनीतिक। ऐसी स्थिति के बीच पाकिस्तान ने बलूच प्रतिरोध का जवाब सैन्य अभियानों और बातचीत के प्रयासों के मिश्रण से दिया है। हालाँकि, केंद्र में अस्थिरता के कारण पाकिस्तानी सरकार के साथ-साथ सेना भी हिंसा को नियंत्रित करने में विफल रही है।

ऑपइंडिया को दिए इंटरव्यू में डॉक्टर नज़र ने राजनीतिक अस्थिरता की समस्या भी उठाई थी। उन्होंने कहा था, “पाकिस्तान में कोई लोकतंत्र नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण चीज़ जो बलूचों को विद्रोह के लिए मजबूर करती है वह है, ज़ुल्म और गुलामी। जब मैं देखता हूँ कि मेरा राष्ट्र जीवन के सभी पहलुओं से वंचित है और हर क्षेत्र में उपेक्षित है, यहाँ तक कि पानी की एक बूँद की भी कमी है, तो मुझे और क्या करना चाहिए?”

उन्होंने आगे कहा था, “कुछ संघीय दल जो इस्लामाबाद की कठपुतली हैं, उन्हें बलूच के प्रतिनिधि के रूप में दिखाते हैं लेकिन यह वास्तविकता नहीं है। दूसरी ओर, सभी जानते हैं कि पाकिस्तान में आईएसआई और पाकिस्तानी सेना की छाया सरकार है। आम बलूच लोग बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट और अन्य स्वतंत्रता चाहने वाले संगठनों का समर्थन कर रहे हैं।”

बलूचिस्तान में शांति स्थापित नहीं होने के पीछे विद्रोहियों पर सैन्य कार्रवाई को भी एक बड़ा कारण के रूप में देखा जाता है। सैन्य छापों और नाकेबंदी के परिणामस्वरूप और अधिक शिकायतें और मानवाधिकारों के उल्लंघन की रिपोर्टें सामने आई हैं। भारत ने भी कई मौकों पर बलूचिस्तान में मानवाधिकारों के उल्लंघन को लेकर चिंता व्यक्त की है। सितंबर 2016 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र में बलूचिस्तान में मानवाधिकार उल्लंघन का मुद्दा उठाया था।

भारत ने कहा था, “बलूचिस्तान के लोग दशकों से दुर्व्यवहार और यातना के खिलाफ बहादुरी भरा संघर्ष कर रहे हैं। हिंदू, ईसाई, शिया, अहमदिया, इस्माइली और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों को पाकिस्तान में भेदभाव, उत्पीड़न और लक्षित हमलों का सामना करना पड़ रहा है। अल्पसंख्यकों के पूजा स्थलों को नष्ट कर दिया गया है। ईशनिंदा कानून का इस्तेमाल धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ असंगत रूप से किया जाता है।”

बलूचिस्तान की स्थिति के लिए भारत सहित विश्व के नेताओं के समर्थन के साथ-साथ गहरी समझ और बहुमुखी दृष्टिकोण की आवश्यकता है। बलूचिस्तान के लोगों की वैध चिंताओं को दूर करना और यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि उन्हें संसाधनों का उचित स्वामित्व मिले। इसके अलावा, मूल आबादी के सांस्कृतिक और आर्थिक अधिकारों का सम्मान करना आवश्यक है।

(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है। आप इस लिंक को क्लिक करके पढ़ सकते हैं।)

आतंकवादियों को पनाह, खराब कानून-व्यवस्था और फर्जी ‘छात्र वीजा’ उद्योग: अपनी गलती छिपाने के लिए कनाडा की ट्रूडो सरकार भारत पर मढ़ रही आरोप

कनाडा में खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर हत्याकांड में तीन भारतीय लोग पकड़े गए हैं, उनमें से 2 लोग कमलप्रीत सिंह और करन बरार स्टूडेंट वीजा के दम पर कनाडा पहुँचे थे। दोनों साल 2019 में भारत के पंजाब से कनाडा पहुँचे थे। बरार ने कैलगरी के बो वैली कॉलेज में 30 अप्रैल 2020 को एडमिशन लिया और 4 मई 2020 को उस जगह को छोड़कर एडमोंटन चला गया। करन बरार तब से ही कनाडा में था और बिना किसी रोक-टोक के वो अपना काम कर रहा था।

साल 2019 के वीडियो में करन बरार ने कहा था कि वो पंजाब के बठिंडा से एथिनवर्क्स इमिग्रेशन सर्विसेस की मदद से कुछ दिनों में स्टूडेंट वीजा पा गया था। ये वीडियो एथिनवर्क्स इमिग्रेशन सर्विसेज ने अपनी फेसबुक प्रोफाइल पर अपलोड किया था, लेकिन अब उसे डिलीट कर दिया गया है। हालाँकि ये वीडियो ट्विटर पर अब भी मौजूद है। इस वीडियो को समीर कौशल नाम के एक्स यूजर ने शेयर किया है।

स्टूडेंट वीजा से कनाडा बटोर रहा डॉलर

दिसंबर 2023 के आँकड़ों के मुताबिक, कनाडा में 10 लाख से ज्यादा विदेशी छात्र मौजूद हैं। कनाडा सरकार के मुताबिक, अंतर्राष्ट्रीय छात्रों से उसकी अर्थव्यवस्था में 22 बिलियन डॉलर का योगदान होता है और इससे 2 लाख से ज्यादा नौकरियाँ बनती हैं। कुछ समय पहले कनाडा में भारत के उच्चायुक्त संजय वर्मा ने बताया था कि कनाडा में मौजूदा समय में 4.27 लाख भारतीय छात्र हैं, जिन्होंने कनाडा की अर्थव्यवस्था में 18 बिलियन डॉलर का योगदान दिया है।

मॉन्ट्रियल में एक कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कनाडा के सिस्टम की खामियों की तरफ भी इशारा किया था और बताया था कि कैसे कनाडा में खुले शिक्षा के ‘आउटलेट्स’ भारतीय छात्रों को ठग रहे हैं और इससे भारत में ‘कनाडा के शिक्षा ब्राण्ड’ का नाम खराब हो रहा है।

कनाडा में अच्छी शिक्षा के नाम पर मोटी फीस वसूली जा रही है, तो भारतीय छात्रों को ठगी का भी शिकार बनाया जा रहा है। ऐसा ही एक एजेंट पिछले साल जालंधर से गिरफ्तार हुआ था, जिसके 700 से अधिक छात्रों को ठगा था। उन छात्रों पर कनाडा से डिपोर्ट करने का खतरा मंडरा रहा था। ये हैरान करने वाली बात है कि कनाडा के अधिकारी ‘फर्जी कागजातों’ पर भी लोगों का स्वागत अपने देश में कर रहे हैं और सुरक्षा एजेंसियाँ इन्हें पकड़ा नहीं पा रही हैं।

निज्जर को नहीं मिली नागरिकता, फिर भी ढाई दशक कनाडा में जिया और वहीं मरा

करन बरार जैसे लोग कनाडा एक स्टूडेंट वीजा पर आते हैं और फिर सालों साल जमे रहते हैं। इसी तरह से खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर, जिसकी पिछले साल हत्या कर दी गई थी, वो भी कनाडा में फर्जी तरीके से ही आया था और दो बार उसका शरणार्थी आवेदन खारिज हुआ था, फिर वो करीब ढाई दशक कनाडा में बिताने में सफल हो गया, वो भी बड़े सम्मान के साथ और खालिस्तानी गुटों का नेतृत्व करते हुए।

हैरानी की बात है कि निज्जर कनाडा में साल 1997 में घुसने में सफल रहा था, जब वो ‘रवि शर्मा’ काम के फर्जी पहचान के साथ कनाडा आया। उसने जून 1998 में पहली बार एफिडेविट देकर शरण माँगा, और बताया कि भारत में उसकी जिंदगी खतरे में है, लेकिन उसका एफिडेविट ही फर्जी निकला। इसके बाद निज्जर ने ‘प्लान बी’ अपनाया और कनाडा की नागरिकता पाने के लिए सिर्फ 11 दिन बाद ही एक महिला से शादी कर ली। ब्रिटिश कोलंबिया की रहने वाली उस महिला ने अपने पति के तौर पर निज्जर को नागरिकता दिलाने की कोशिश की, लेकिन कनाडा के अधिकारियों ने उसे पकड़ लिया। पता चला कि वो साल 1997 में पहले ही एक व्यक्ति को अपना पति बोल कर वीजा दिलवा चुकी है। निज्जर ने इस झटके को कोर्ट में चैलेंज किया लेकिन साल 2001 में वो मुकदमा हार गया। अब इसमें सबसे बड़ी हैरानी इस बात की है कि दो बार नागरिकता/शरणार्थी की याचिका खारिज होने, कोर्ट केस हारने के बावजूद वो कनाडा में न सिर्फ टिका रहा, बल्कि खुद को कनाडाई नागरिक भी कहता रहा।

अपनी गलतियाँ छिपाने के लिए भारत पर आरोप मढ़ रही ट्रूडो सरकार

निज्जर की हत्या में अपने देश की खराब कानून व्यवस्था की बात को छिपाते हुए जस्टिन ट्रूडो ने इसका दोष भारत पर मढ़ने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि उन्हें फर्जी स्टूडेंट वीजा, कट्टरपंथी ताकतों और आतंकवादियों पर कार्रवाई करनी चाहिए थी। हकीकत ये है कि ट्रूडो सरकार अब खुलकर खालिस्तानी आतंकवादियों का समर्थन कर रही है, उन्हें बचा रही है और भारत विरोधी कार्यक्रमों को जारी रखने की छूट दे रही है। भले ही इसकी वजह से भारत-कनाडा के संबंध अब रसातल तक नीचे पहुँच गए हों।

कनाडा सरकार अब खालिस्तानी आतंकियों को भारतीय राजनयिकों को हत्या की धमकी देने और मारपीट तक में बर्दाश्त कर रही है। कनाडा में इस समय बहुत सारे खालिस्तानी आतंकी और भारत विरोधी अलगाववादी आराम से रह रहे हैं और ट्रूडो सरकार की मदद से गैर-कानूनी गतिविधियों को अंजाम दे रहे हैं। एक तरफ हरदीप निज्जर के पास कनाडा की वैध नागरिकता थी भी या नहीं, ये बात सही से सामने भी नहीं आ पाई है, तो दूसरी तरफ कनाडा की ट्रूडो सरकार उसे कनाडा का नागरिक बोलकर उसका समर्थन कर रही है। यही नहीं, इस मामले में तनाव इतना बढ़ा कि दोनों देशों ने एक-दूसरे के राजनयिकों को भी निकाल दिया था।

दरअसल, जस्टिन ट्रूडो की सरकार गठबंधन की सरकार है। उसका एक पहिया है जगमीत सिंह की न्यू डेमोक्रेटिक पार्टी (एनडीपी)। जगमीत सिंह खुद खालिस्तान समर्थक और भारत विरोधी रुख रखता है। जगमीत सिंह ने भी निज्जर की हत्या में भारत पर उंगली उठाई थी, जबकि आज तक कनाडा और उसकी सुरक्षा एजेंसियाँ भारत का हाथ साबित नहीं कर पाई हैं।

ये हो सकता है कि ट्रूडो और उनकी सरकार अपनी राजनीतिक मजबूरियों के चलते खालिस्तानियों के खिलाफ आँख मूँदे बैठी हो, लेकिन कनाडा में स्टूडेंट वीजा पर भारी संख्या में गए लोगों का गैर-कानूनी तरीके से रहना और फर्जी दस्तावेजों के सहारे कनाडा में निज्जर जैसे हत्याकाँड को अंजाम देना कनाडा की विफलता को ही दर्शाते हैं। ऐसे में ये कनाडा की समस्या है कि उसके घर में क्या हो रहा है, उसे वो खुद देखे, न कि अपनी विफलता के लिए भारत को दोष दे। भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भी कनाडा को यही सलाह दी है कि वो अपने सिस्टम को ठीक करे और बिना वजह किसी पर उंगली न उठाए।

(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल लेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

मेवाड़ का मैराथन: स्पार्टा के योद्धाओं वाली वीरता, महाराणा का शौर्य और युद्ध कुशलता… 36000 मुगल सैनिकों का आत्मसमर्पण, वो इतिहास जो छिपा लिया गया

यह नीति वाक्य वीरत्व के गुण को उजागर करते हुऐ भारत के गौरवशाली इतिहास के पृष्ठों पर स्वर्णाक्षरों में अंकित उन अनगिनत शूरवीरों की याद दिलाता है, जिन्होंने जीवनपर्यंत इस वाक्य में वर्णित श्रेष्ठ गुणों को धारण किया। वास्तव में शौर्य क्या है? अपने लिए लड़ना? अपने अधिकारों के लिए लड़ना? नहीं। अपने लिए तो हर कोई लड़ सकता है परन्तु अपनी मातृभूमि के लिए लड़ना ही शौर्य है। जब व्यक्ति स्व से ऊपर उठकर अपनी मिट्टी के लिए मर-मिटे, उसे ही वीरता कहते हैं। भारतवर्ष का इतिहास ऐसे असंख्य वीर-वीरांगनाओं से भरा पड़ा है, जिन्होंने आजीवन कष्ट झेले, मृत्यु का आलिंगन कर लिया परन्तु आक्रांताओं के समक्ष कभी घुटने नहीं टेके। इस राष्ट्र के इतिहास में राजस्थान का इतिहास अपना एक विशिष्ट स्थान रखता है। उसमें भी मेवाड़ का इतिहास सबसे भारी है।

महाराणा उदय सिंह और महारानी जयवंता बाई के ज्येष्ठ पुत्र वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप सिंह का जन्म 9 मई 1540 को कुंभलगढ़ दुर्ग में हुआ था। हिन्दू पञ्चांग के अनुसार, प्रतिवर्ष ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष तृतीया को प्रताप जयंती मनाई जाती है। वे सूर्यवंशी क्षत्रिय राजा थे और उनके कुल को मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम के वंशज कहलाने का गौरव प्राप्त है। महाराणा प्रताप सिंह का नाम सुनते ही धमनियों में शौर्य और पराक्रम का रक्त प्रवाहित होने लगता है, मस्तक गर्व और स्वाभिमान से ऊँचा हो उठता है। यह बात उस कालखण्ड की है, जब भारतवर्ष पर मलेच्छ वंशियों का निरंतर आक्रमण हो रहा था और वे अपना राज्य विस्तार करने में सफल भी हो रहे थे। आबू, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, मालवा आदि शक्तिशाली राजे-रजवाड़े अकबर का आधिपत्य स्वीकार कर चुके थे। ऐसे में, एकमात्र महाराणा प्रताप सिंह ही थे, जो अपने शौर्य पर अटल थे। उनके नाम मात्र से ही विधर्मी अकबर और उसकी सेना थर्रा उठती थी।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात कुछ तथाकथित दरबारी इतिहासकारों ने बड़े ही प्रायोजित ढंग से हमारे भीतर हीन भावना पैदा करने की घृणित चेष्टा की। हमारे मन-मस्तिष्क में यह भर दिया गया कि भारत का इतिहास तो पराजय का इतिहास है। हद तो तब गई जब मलेच्छों के सिरमौर अकबर को इन तथाकथित इतिहासकारों ने ‘द ग्रेट’ का स्थायी विशेषण जोड़कर माँ भारती के अमर सपूत महाराणा प्रताप सहित समूचे भारतवर्ष को भी अपमानित कर दिया। उनके विराट व्यक्तित्व को संकुचित और धूमिल करने हेतु हल्दीघाटी युद्ध में उनको पराजित घोषित कर अध्याय ही समाप्त कर दिया। सत्य तो यह है कि मुगल न तो महाराणा प्रताप को कभी पकड़कर बंदी ही बना सके और न ही मेवाड़ पर पूर्ण आधिपत्य जमा सके। हल्दीघाटी का भयावह युद्ध अकबर के गुरूर और प्रताप सिंह के स्वाभिमान की पहली लड़ाई मात्र थी। तत्पश्चात् अगले 10 वर्षों में मेवाड़ में महाराणा ने कैसे स्वतंत्रता की लड़ाई जारी रखी, इसकी जानकारी इतिहास के पुस्तकों से नदारद ही रही। यदि अकबर वास्तव में विजयी हो गया था तब कालांतर में भी युद्ध क्यों हुए?

कुछ तथाकथित विद्वान महाराणा प्रताप और अकबर को एक ही तराजू में तौलते हुए यह घोषणा करते हैं कि दोनों ही समान रूप से वीर थे, परन्तु मैं ऐसा कदापि नहीं मानती। दूसरे के घर पर अकारण आक्रमण करने वाला, लूटपाट मचाने वाला भला वीर कैसे हो सकता है? स्वयं योद्धा की तरह सामने से कभी कोई युद्ध ना लड़कर, राजपूताने (वर्तमान में राजस्थान) की मुठ्ठी भर क्षत्रिय सेना से अपने लाखों सैनिकों को लड़वाने वाला वीर कत्तई नहीं हो सकता। वीर तो वो थे, जिन्होंने अपनी मातृभूमि की स्वतंत्रता हेतु राजपाट, सुख, वैभव का एक क्षण में त्याग कर दिया, जंगलों-बीहड़ों के खाक छाने। जिनके पूरे परिवार ने दर्दनाक कष्ट उठाए, परन्तु किसी भी मूल्य पर अपनी पगड़ी नहीं उतारी। भारत माँ के उस वीर सपूत का दृढ़ संकल्प था, “कटे शीश पड़े, पर ये पाग नहीं, पराधीन कदे ना होवण दूँ।” उनके इसी आत्मबल का परिणाम था कि विधर्मी अकबर समस्त भारतवर्ष का सम्राट बनने के केवल स्वप्न ही देखता रह गया।

तथाकथित महान अकबर लंबे समय तक मोइनुद्दीन चिश्ती का मुरीद रहा, जो हिन्दू धर्म-समाज पर इस्लामी हमले का बड़ा प्रतीक था। सन् 1568 में चित्तौड़गढ़ पर कब्ज़ा जमाने के बाद अकबर ने चिश्ती अड्डे से ही ‘फतहनामा-ए-चित्तौड़’ जारी किया था, जिसके हर वाक्य से जिहादी जुनून टपकता है। उस युद्ध में 8 हजार वीरांगना क्षत्राणियों ने जौहर कर अपनी अस्मिता की रक्षा की थी। अकबर ने राजपूत सैनिकों के अलावा 30 हजार सामान्य नागरिकों का भी कत्ल किया था। मारे गए सभी पुरुषों के जनेऊ जमा कर तौला गया, जो साढ़े चौहत्तर मन था। यह केवल एक स्थान पर, एक बार में! इस भयावह नरसंहार के विवरण में अकबर लिखवाता है, “हम अपना क़ीमती वक्त, अपनी सलाहियत के मुताबिक़ जंग और जिहाद में गुजारते हैं। शैतान काफिरों के खिलाफ़ टोली बनाकर हमला हुआ और उस जगह कब्ज़ा हो गया, जहाँ क़िला खुलता है। हम अपनी ख़ून की प्यासी तलवारों से एक के बाद एक कत्ल करते गए और कत्ल हुए लोगों का अंबार हो गया। बाकी बचे हुए लोगों का पीछा हुआ, जैसे वो डरे हुए गधे हों, शेर से भागते हुए।”

समाज की स्त्रियों पर कुदृष्टि डालने वाला, अनगिनत निर्दोष, निहत्थे लोगों की हत्या करवाकर स्वयं को श्रेष्ठ समझने वाला वीर तो क्या साधारण मनुष्य कहलाने का भी अधिकारी हो सकता है भला?

इतिहास साक्षी है कि भारत के वीरों की तलवारें कभी म्यानों में सोई ही नहीं। इस पावन धरा पर निरंतर संघर्ष चलता रहा और हम सदा विजयश्री का वरण करते आए। अकबर तो क्या! किसी भी मुग़ल की हुक़ूमत कभी भी समूचे भारतवर्ष पर रही ही नहीं। वे अलग-अलग राजाओं के साथ मिलकर इस देश पर शासन करते रहे। इनके लिए साम्राज्य या सल्तनत शब्द प्रयुक्त करना किसी उपहास से कम नहीं। वास्तव में तो मगध, चोला, चेरा, पांड्यान आदि साम्राज्य हुआ करते थे। महरौली से यमुना तक शासन करने वाले चंद लुटेरों को हमने आवश्यकता से अधिक सम्मान दे दिया और अपने शूरवीर पूर्वजों को बिसराकर इन अपराधियों को नायक बना दिया। क्या यह सत्य नहीं कि जिन-जिन देशों पर विदेशी-विधर्मी आक्रांताओं ने आक्रमण किया, वहाँ की संस्कृति समूल नष्ट हो गई? जैसे पर्शिया गुलाम हुआ तो ईरान हो गया, मेसोपोटामिया इराक़ हो गया, इजिप्ट की हालत तो हमारे सामने है ही। परन्तु भारत अपनी संस्कृति को अक्षुण्ण रखने में सफल रहा है। अब इस तथ्य को कौन उजागर करेगा कि हमारा इतिहास पराजय का नहीं अपितु संघर्ष, साहस, शौर्य, पराक्रम, त्याग और बलिदान का इतिहास रहा है?

यह इस देश की विडंबना ही तो है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के इतने वर्षों पश्चात भी हमसे हमारे गौरवशाली इतिहास को छुपाया जाता है। वहीं दूसरी ओर, विदेशी आक्रांताओं की पीढ़ी को रटवाकर मस्तिष्क को कलुषित करने का प्रयास होता है। महाराणा प्रताप सिंह जिस महान कुल के उजियाले थे, उसमें अनेक वीर पैदा हुए, जिन्होंने अपने अदम्य साहस का न सिर्फ परिचय दिया अपितु विदेशी आक्रांताओं से सदैव इस पावन धरा की रक्षा भी की। हमारी पीढ़ियों को आखिर कब बतलाया जाएगा कि सातवीं सदी में बप्पा रावल ने मोहम्मद बिन क़ासिम को ईरान तक दौड़ा-दौड़ा कर मारा था। महाराणा हमीर सिंह ने मोहम्मद बिन तुगलक को 6 महीने कैद में रखा था, महाराणा कुम्भा ने मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी को महीनों बंदी बनाकर रखा। महाराणा सांगा ने दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी को खटोली के युद्ध में बुरी तरह परास्त किया था, यह सब अध्याय इतिहास पुस्तकों में कब सम्मिलित होंगे? यह कब पढ़ाया जाएगा कि जब हल्दीघाटी युद्ध में महाराणा प्रताप ने मानसिंह के हाथी पर चढ़ाई कर दी, तब अकबर की शाही फ़ौज भयातुर हो 5-6 कोस दूर भाग गई थी और अकबर के रणभूमि में स्वयं आने की झूठी अफवाह से पुनः युद्ध में सम्मिलित हुई।

दिवेर का निर्णायक महासंग्राम

इतिहास साक्षी है कि सन् 1576 में हुए हल्दीघाटी युद्ध के बाद भी अकबर ने महाराणा को बंदी बनाने और उनकी हत्या करने के लिए सन् 1577 से 1582 के बीच लगभग एक लाख सैन्यबल भेजे। अंग्रेजी इतिहासकारों ने लिखा है कि हल्दीघाटी युद्ध का दूसरा भाग जिसको उन्होंने ‘बैटल ऑफ दिवेर’ कहा है, मुगल बादशाह के लिए एक करारी हार सिद्ध हुआ था। कर्नल टॉड ने भी अपनी किताब में जहाँ हल्दीघाटी को ‘थर्मोपल्ली ऑफ मेवाड़’ की संज्ञा दी, वहीं दिवेर के युद्ध को ‘मेवाड़ का मैराथन’ बताया है (मैराथन का युद्ध 490 ई.पू. मैराथन नामक स्थान पर यूनान के मिल्टियाड्स एवं फारस के डेरियस के मध्य हुआ, जिसमें यूनान की विजय हुई थी, इस युद्ध में यूनान ने अद्वितीय वीरता दिखाई थी), कर्नल टॉड ने महाराणा और उनकी सेना के शौर्य, युद्ध कुशलता को स्पार्टा के योद्धाओं सा वीर बताते हुए लिखा है कि वे युद्धभूमि में अपने से 4 गुना बड़ी सेना से भी नहीं डरते थे।

हल्दीघाटी के पश्चात् अक्तूबर 1582 में दिवेर का निर्णायक युद्ध हुआ। इस युद्ध में मुगल सेना की अगुवाई करने वाला अकबर का चाचा सुल्तान खां था। विजयादशमी का दिन था और महाराणा ने अपनी नई संगठित सेना को दो हिस्सों में विभाजित करके युद्ध का बिगुल फूँक दिया। एक टुकड़ी की कमान स्वयं महाराणा के हाथों में थी, तो दूसरी टुकड़ी का नेतृत्व उनके पुत्र अमर सिंह कर रहे थे। अपने पिता की तरह ही कुँवर सा भी बड़े पराक्रमी योद्धा थे। उन्होंने मुगल सेनापति पर भाले का ऐसा वार किया कि भाला उसके शरीर और घोड़े को चीरता हुआ जमीन में जा धँसा और सेनापति मूर्ति की तरह एक जगह गड़ गया। इसी भीषण युद्ध में महाराणा ने बहलोल खान के सिर पर इतना तीव्र प्रहार किया कि वह घोड़े समेत दो टुकड़ों में कट गया। प्रताप का ऐसा रौद्र रूप देख मुग़ल सेना में हाहाकार मच गया। वीर राजपूती सैनिकों ने शत्रु की सेना को अजमेर तक खदेड़ा। बचे-खुचे 36,000 भयभीत मुग़ल सैनिकों ने महाराणा के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। दिवेर के युद्ध ने मुगलों के मनोबल को बुरी तरह तोड़ दिया। इस युद्ध के पश्चात् प्रताप ने गोगुंदा, कुम्भलगढ़, बस्सी, चावंड, जावर, मदारिया, मोही, माण्डलगढ़ जैसे महत्वपूर्ण ठिकानों को अपने अधीन कर लिया। केवल चितौड़गढ़ को छोड़ अन्य सभी दुर्गों पर पुनः केसरिया ध्वज फहरने लगा। यह भी वर्णित है कि इसके पश्चात भयातुर अकबर ने आगरा छोड़कर लाहौर को अपनी राजधानी बना ली थी।

वीर बलिदानी चेतक

जिस प्रकार प्रभु श्रीराम की कथा हनुमान जी महाराज के बिना अधूरी है, ठीक उसी प्रकार वीरों के सिरमौर महाराणा प्रताप की शौर्यगाथा भी उनके घोड़े चेतक के बिना पूर्ण नहीं हो सकती। चेतक भले ही पशु योनी में जन्मा एक अश्व मात्र था परन्तु उसकी बुद्धिमता और स्वामीभक्ति का कोई सानी नहीं। एक ओर जहाँ मनुष्य योनी में जन्म पाकर भी राजपूती कुल कलंक मान सिंह केवल अपनी झूठी शान में मश्गूल होकर विधर्मी शत्रुओं की सेना का प्रतिनिधित्व कर रहा था वहीं दूसरी ओर रणभूमि में पूज्य चेतक महाराणा के साथ कदम से कदम मिलाकर अपनी मातृभूमि का ऋण चुका रहा था। महाकवि श्याम नारायण पाण्डेय अपनी कृति ‘हल्दीघाटी’में लिखते हैं:

वीर चेतक अपने अदम्य साहस का परिचय देते हुए विशालकाय हाथी पर चढ़ बैठा जिस पर गद्दार मान सिंह सवार था। यह घटना विश्व के इतिहास में अत्यंत अनूठी, अकल्पनीय और अद्भुत घटना है। इस युद्ध में चेतक अपने राणा को सकुशल सुरक्षित स्थान पर पहुँचाकर स्वयं सदा के लिए सो गया। प्रताप अपने परम मित्र, भाई समान घोड़े को हृदय से लगाकर दहाड़ मारकर रोने लगे। इस दारुण दृश्य को देखकर शक्ति सिंह (महाराणा के छोटे भाई जो मुग़लों से जा मिले थे) का हृदय परिवर्तन हो गया और वे अपने भ्राता के चरणों में गिरकर क्षमा याचना करने लगे।

महाराणा की जयंती के अवसर पर हमें इस बात का मूल्यांकन करने की महती आवश्यकता है कि वर्तमान पीढ़ी को कौन सा इतिहास पढ़ाया जाए? वह कायरतापूर्ण इतिहास जिसमें साम्राज्य-विस्तार की लपलपाती-अंधी लिप्सा थी, अनैतिकता और अधर्म की दुर्गंध थी अथवा अपने पूर्वजों का वह गौरवशाली ओजपूर्ण इतिहास जिसमें संघर्ष, स्वाभिमान, साहस, त्याग, बलिदान और नैतिकता की पुण्यसलिला भावधारा समाहित है। आज यह विचार आवश्यक है कि क्या हमें गुलामी की उन ग्रंथियों को ही पोसने-सींचने-फैलाने का कार्य निर्बाध रूप से करते रहना है, अथवा उस शाश्वत सत्य को पुनः प्रतिष्ठित कर राष्ट्रीय स्वाभिमान की रक्षा करनी है। आज जब नवभारत अंगड़ाई ले रहा है तब क्या हमारा यह परम कर्त्तव्य नहीं बनता कि हम भावी पीढ़ी को अपने पूर्वजों द्वारा स्थापित मानबिन्दुओं और जीवन-मूल्यों की रक्षा हेतु तैयार करें? जिस क्षण हमें इन प्रश्नों के उत्तर ज्ञात हो जाएँगे, उसी क्षण महाराणा प्रताप व अन्य पूर्वजों तक हमारी सच्ची श्रद्धांजलि पहुँचेगी।