Home Blog Page 960

जहाँजैब वानी और बीवी हिना शेख समेत 5 आतंकियों को 3 से 20 साल की सजा: भारत में तबाही मचाना चाहते थे ISKP आतंकी

दिल्ली में आईएसआईएस के 5 आतंकवादियों को एनआईए की विशेष कोर्ट ने 3 से 20 साल तक की सजा सुनाई है। ये सभी आतंकी इस्लामिक स्टेट-खुरासान प्रांत (आईएसकेपी) के सदस्य थे और भारत में तबाही मचाने की साजिश रच रहे थे। इसमें मुख्य आरोपित का नाम जहाँजैब समी वानी है, जो श्रीनगर का रहने वाला है। उसकी बीवी हिना बाशिर शेख भी उसके हर कुकर्म में उसके साथ थी।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, एनआईए ने अपनी जाँच में पाया कि कश्मीरी आतंकी कपल के नेतृत्व में भारत में 100 से ज्यादा जगहों पर आईईडी ब्लास्ट की योजना पर काम किया जा रहा था। इसके लिए बिटकॉइन जैसे हाईटेक ऑनलाइन मनी का इस्तेमाल किया जा रहा था। ये ग्रुप ISKP से जुड़ा है, जो ISIS के शाखा के तौर पर काम करता है। एनआईए कोर्ट ने जिन 5 आतंकवादियों को सजा सुनाई, उसमें जहाँजैब समी (36) श्रीनगर का रहने वाला है। वो दाऊद इब्राहीम, जैब, अबु मोहम्मद अल-हिंद और अबू अब्दुल्ला जैसे नामों से भी जाना जाता था। इसके अलावा उसकी कश्मीरी बीवी हिना बाशिर शेख, हैदराबाद का अब्दुल्ला बासित, पुणे की सादिया अनवर शेख और नबील सिद्दीक खत्री शामिल हैं।

एनआईए कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश चंदर जीत सिंह की कोर्ट ने ये फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि किसी भी संगठन को चलाने के लिए पैसों की जरूरत होती है, जो इस केस में बिटकॉइन जैसी हाईटेक मुद्राओं के जरिए पूरी की गई। ऐसे में सभी लोगों को पता था कि वो क्या कर रहे हैं और कितना गंभीर अपराध कर रहे हैं। ऐसे में किसी को भी ढील देने जैसी कोई गुंजाइश नहीं दिखती।

एनआईए ने बताया कि पाँच में एक आरोपित पर भारत में खिलाफत स्थापित करने की योजना बनाने का आरोप है, साथ ही उस पर एक ही दिन में 100 आईईडी विस्फोट करने की साजिश रचने का भी आरोप है। दिल्ली पुलिस ने आठ मार्च 2020 को दो आरोपी- जहाँजैब सामी वानी और उसकी पत्नी हिना बशीर बेग को आईएसकेपी से संबंध रखने के आरोप में दिल्ली के ओखला विहार, जामिया नगर से गिरफ्तार किया था। दोनों भारत में राष्ट्र विरोधी गतिविधियों को अंजाम देने की साजिश रच रहे थे। इसके अलावा 12 जुलाई 2020 को पुणे से NIA ने दो अन्य आरोपियों को भी गिरफ्तार किया था। जिनका नाम सादिया अनवर शेख और नबील एस खत्री था।

सीरिया जा चुका है अब्दुर रहमान

इस मामले में अगस्त, 2020 में अब्दुर रहमान उर्फ डॉ. ब्रेव को NIA द्वारा गिरफ्तार किया गया था। फिलहाल, अब्दुर रहमान के खिलाफ केस चल रहा है। जारी बयानों में जानकारी दी गई है कि अब्दुर रहमान बंगलुरु में MBBS की पढ़ाई करता था। जिसके बाद वह उन अन्य आरोपितों के संपर्क में आया और उन्होंने उसे कट्टरपंथी बनाया था। इतना ही नहीं अब्दुल साल 2013 में सीरिया भी गया था। जहाँ वो ISIS की अन्य आतंकवादी गतिविधियों में शामिल भी हुआ था। अब्दुल ने आतंकवादियों के स्वास्थ्य और उनके इलाज को लेकर एक मेडिकल एप्लिकेशन और ISIS के लिए एक लेजर गाइडेड एंटी-टैंक मिसाइल एप्लिकेशन भी बनाना सीखा था।

ये समाचार मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल लेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

पाकिस्तान के पंजाब और चीन से आए ‘बाहरी लोगों’ पर बढ़े हमले, 7 मजदूरों की फिर हत्या: इस्लामी मुल्क ने बलूचिस्तान को हिंसा की आग में कैसे झोका, जानिए

हाल के दिनों में पाकिस्तान के बलूचिस्तान में हिंसा में वृद्धि देखी गई है। वहाँ बलूच अलगाववादी समूह पाकिस्तान के पंजाब प्रांत और चीन के लोगों को विशेष तौर पर निशाना बना रहे हैं। ताजा मामले में 9 मई 2024 को बलूचिस्तान के ग्वादर के सुरबंदर में पंजाब के सात मजदूरों को उनके कमरे में सोते समय गोली मारकर हत्या कर दी गई। पिछले महीने पंजाब के 11 श्रमिकों की हत्या कर दी गई थी।

अभी तक किसी भी समूह ने इस हमले की जिम्मेदारी नहीं ली है। हालाँकि, ऐसा माना जाता है कि इसके पीछे बलूच राष्ट्रवादी समूह हो सकते हैं, क्योंकि वे इस क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं। ऐतिहासिक रूप से बलूचिस्तान अलगाववादी गतिविधियों का केंद्र रहा है। पिछले वर्ष की तुलना में साल 2024 में बलूचिस्तान क्षेत्र में हिंसक घटनाओं में 96% की वृद्धि दर्ज की गई है।

बलूचिस्तान के मुख्यमंत्री मीर सरफराज बुगती ने हमले की निंदा की है और इसे आतंकवादी कृत्य करार दिया है। एक बयान में उन्होंने हमले के पीछे के दोषियों को नहीं बख्शने की कसम खाई है। उन्होंने कहा, “आतंकवादियों और उनका समर्थन करने वालों से निपटने के लिए हम सभी आवश्यक बल का प्रयोग करेंगे। पाकिस्तानी खून-खराबे की एक-एक बूँद का हिसाब लिया जाएगा।”

जातीय तनाव की पृष्ठभूमि

यह पहली बार नहीं है जब इस क्षेत्र में ‘बाहरी लोगों’ पर हमला हुआ है। ऐसे कई उदाहरण हैं जब पंजाब और चीन के लोगों को निशाना बनाया गया। हमलों के पीछे यह धारणा है कि ‘बाहरी’ लोग स्थानीय संस्कृति और अधिकारों को कमजोर करते हैं। इस क्षेत्र के इतिहास पर नजर डालें तो साल 2006 में नवाब अकबर बुगती की हत्या ने स्थानीय विद्रोहियों के बीच ‘बाहरी विरोधी’ भावनाओं को और बढ़ाया।

साल 2019 में ऑपइंडिया ने ‘बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट’ (BLF) के संस्थापक एवं प्रमुख डॉक्टर अल्लाह नज़र बालोक का साक्षात्कार लिया था। उन्होंने कहा था कि बलूच लोगों का पाकिस्तान की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में शामिल होने का कोई इरादा नहीं है क्योंकि उनकी संस्कृति, भाषा, मानस, इतिहास और भूगोल अलग-अलग हैं। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने बलूचिस्तान पर बलपूर्वक कब्जा किया है।

उन्होंने कहा, “उन्हें (पाकिस्तान) बलूचिस्तान और बलूच राष्ट्र के कल्याण में कोई दिलचस्पी नहीं है। उन्हें केवल हमारे 750 मील लंबे तट और खनिजों में रुचि है। इसलिए हम बलूचों के पास दुनिया का ध्यान उत्पीड़ित बलूचों की ओर हटाने के लिए प्रतिरोध के अलावा कोई रास्ता नहीं है।” इस क्षेत्र में चीनी नागरिकों पर हमलों का एक मुख्य कारण खनिजों के उत्खनन में चीनी कंपनियों का शामिल होना भी है।

हिंसा की वर्तमान लहर

सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध आँकड़ों से पता चलता है कि साल 2022 में बलूचिस्तान में 406 मौतें हुई थीं। साल 2023 में यह बढ़कर 466 हो गई, जो साल 2016 के बाद से सबसे अधिक संख्या थी। इस क्षेत्र में अत्यधिक सक्रिय विद्रोही समूहों में बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट और बलूच लिबरेशन आर्मी (बीएलए) शामिल हैं।

ये अलगाववादी समूह अक्सर हिंसा को उचित ठहराते हुए कहते हैं कि यह चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) जैसी परियोजनाओं के लिए यहाँ बड़ी संख्या में गैर-स्थानीय श्रमिक आते हैं। इसके कारण बलूचिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों का शोषण होता है। उनका कहना है कि बलूचिस्तान की संस्कृति के क्षरण के खिलाफ प्रतिरोध दिखाने का एक तरीका है।

डॉक्टर अल्लाह नज़र बलूच ने ऑपइंडिया के साथ साक्षात्कार में कहा था, “बलूचिस्तान में कुछ भी निवेश नहीं किया जा रहा है। पंजाबी प्रतिष्ठान इसे दोनों हाथों से लूट रहे हैं और बलूच संसाधन पाकिस्तान के लिए माल-ए-गनीमत यानी युद्ध में लूटा गया माल भर है।”

बता दें कि CPEC अरबों डॉलर की एक सड़क परियोजना है, जो पाकिस्तान और चीन की सरकारों के बीच एक समझौते का परिणाम है। परियोजना के पीछे का विचार चीन को अपने उत्पादों को पाकिस्तान के बंदरगाहों के रास्ते दुनिया के बाकी हिस्सों से जोड़ने के लिए एक गलियारा बनाना है। सीपीईसी को अब वित्तीय समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

इतना ही नहीं, वित्तीय समस्या के साथ-साथ अब इसे स्थानीय लोगों के विरोध का भी सामना करना पड़ रहा है। दरअसल, पाकिस्तान सरकार स्थानीय लोगों को यह समझाने में विफल रही है कि यह परियोजना उनके लिए लाभकारी है। इसके अलावा, भारत ने भी इस परियोजना पर आपत्ति जताई है, क्योंकि यह परियोजना पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) से गुजरती है।

बलूचिस्तान में हमले और पाकिस्तान के समस्या

विद्रोही समूहों ने स्पष्ट रूप से उन लोगों को निशाना बनाया है, जिन पर पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के साथ सहयोग करने या सीपीईसी परियोजनाओं में शामिल होने का संदेह था। पंजाब के श्रमिकों की लक्षित हत्याएँ और चीनी नागरिकों पर हमलों ने खतरे की गंभीरता को रेखांकित किया है। उदाहरण के लिए, 13 अगस्त 2023 को ग्वादर में चीनी नागरिकों को ले जा रहे काफिले पर हमला हुआ था।

इस हमले में चीनी नागरिकों के साथ-साथ पाकिस्तानी कई सुरक्षाकर्मियों कई मौत हुई थी। इस हमले की जिम्मेदारी बीएलए ने ली थी। इस तरह बार-बार होने वाले हमलों ने पहले से ही संकटग्रस्त बलूचिस्तान को और अस्थिर कर दिया है और आर्थिक रूप से डूबी हुई पाकिस्तान की सरकार की आर्थिक महत्वाकांक्षाओं के लिए एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।

सीपीईसी को पाकिस्तान के आर्थिक भविष्य की आधारशिला माना जाता था, लेकिन बलूच विद्रोहियों के विरोध और हिंसक हमलों के कारण यह बड़े पैमाने पर प्रभावित हुआ है। इन हमलों को लेकर चीन भी पाकिस्तान के समक्ष कई नाराजगी जता चुका है। वहीं, बलूच लोगों का तर्क है कि सीपीईसी के जरिए स्थानीय लोगों की कीमत पर बाहरी लोगों को फायदा पहुँचाया जा रहा है।

पाकिस्तान की भूमिका

यह ध्यान रखना होगा कि पाकिस्तान में वर्षों से स्थिरता नहीं है, चाहे वह आर्थिक हो या राजनीतिक। ऐसी स्थिति के बीच पाकिस्तान ने बलूच प्रतिरोध का जवाब सैन्य अभियानों और बातचीत के प्रयासों के मिश्रण से दिया है। हालाँकि, केंद्र में अस्थिरता के कारण पाकिस्तानी सरकार के साथ-साथ सेना भी हिंसा को नियंत्रित करने में विफल रही है।

ऑपइंडिया को दिए इंटरव्यू में डॉक्टर नज़र ने राजनीतिक अस्थिरता की समस्या भी उठाई थी। उन्होंने कहा था, “पाकिस्तान में कोई लोकतंत्र नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण चीज़ जो बलूचों को विद्रोह के लिए मजबूर करती है वह है, ज़ुल्म और गुलामी। जब मैं देखता हूँ कि मेरा राष्ट्र जीवन के सभी पहलुओं से वंचित है और हर क्षेत्र में उपेक्षित है, यहाँ तक कि पानी की एक बूँद की भी कमी है, तो मुझे और क्या करना चाहिए?”

उन्होंने आगे कहा था, “कुछ संघीय दल जो इस्लामाबाद की कठपुतली हैं, उन्हें बलूच के प्रतिनिधि के रूप में दिखाते हैं लेकिन यह वास्तविकता नहीं है। दूसरी ओर, सभी जानते हैं कि पाकिस्तान में आईएसआई और पाकिस्तानी सेना की छाया सरकार है। आम बलूच लोग बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट और अन्य स्वतंत्रता चाहने वाले संगठनों का समर्थन कर रहे हैं।”

बलूचिस्तान में शांति स्थापित नहीं होने के पीछे विद्रोहियों पर सैन्य कार्रवाई को भी एक बड़ा कारण के रूप में देखा जाता है। सैन्य छापों और नाकेबंदी के परिणामस्वरूप और अधिक शिकायतें और मानवाधिकारों के उल्लंघन की रिपोर्टें सामने आई हैं। भारत ने भी कई मौकों पर बलूचिस्तान में मानवाधिकारों के उल्लंघन को लेकर चिंता व्यक्त की है। सितंबर 2016 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र में बलूचिस्तान में मानवाधिकार उल्लंघन का मुद्दा उठाया था।

भारत ने कहा था, “बलूचिस्तान के लोग दशकों से दुर्व्यवहार और यातना के खिलाफ बहादुरी भरा संघर्ष कर रहे हैं। हिंदू, ईसाई, शिया, अहमदिया, इस्माइली और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों को पाकिस्तान में भेदभाव, उत्पीड़न और लक्षित हमलों का सामना करना पड़ रहा है। अल्पसंख्यकों के पूजा स्थलों को नष्ट कर दिया गया है। ईशनिंदा कानून का इस्तेमाल धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ असंगत रूप से किया जाता है।”

बलूचिस्तान की स्थिति के लिए भारत सहित विश्व के नेताओं के समर्थन के साथ-साथ गहरी समझ और बहुमुखी दृष्टिकोण की आवश्यकता है। बलूचिस्तान के लोगों की वैध चिंताओं को दूर करना और यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि उन्हें संसाधनों का उचित स्वामित्व मिले। इसके अलावा, मूल आबादी के सांस्कृतिक और आर्थिक अधिकारों का सम्मान करना आवश्यक है।

(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है। आप इस लिंक को क्लिक करके पढ़ सकते हैं।)

आतंकवादियों को पनाह, खराब कानून-व्यवस्था और फर्जी ‘छात्र वीजा’ उद्योग: अपनी गलती छिपाने के लिए कनाडा की ट्रूडो सरकार भारत पर मढ़ रही आरोप

कनाडा में खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर हत्याकांड में तीन भारतीय लोग पकड़े गए हैं, उनमें से 2 लोग कमलप्रीत सिंह और करन बरार स्टूडेंट वीजा के दम पर कनाडा पहुँचे थे। दोनों साल 2019 में भारत के पंजाब से कनाडा पहुँचे थे। बरार ने कैलगरी के बो वैली कॉलेज में 30 अप्रैल 2020 को एडमिशन लिया और 4 मई 2020 को उस जगह को छोड़कर एडमोंटन चला गया। करन बरार तब से ही कनाडा में था और बिना किसी रोक-टोक के वो अपना काम कर रहा था।

साल 2019 के वीडियो में करन बरार ने कहा था कि वो पंजाब के बठिंडा से एथिनवर्क्स इमिग्रेशन सर्विसेस की मदद से कुछ दिनों में स्टूडेंट वीजा पा गया था। ये वीडियो एथिनवर्क्स इमिग्रेशन सर्विसेज ने अपनी फेसबुक प्रोफाइल पर अपलोड किया था, लेकिन अब उसे डिलीट कर दिया गया है। हालाँकि ये वीडियो ट्विटर पर अब भी मौजूद है। इस वीडियो को समीर कौशल नाम के एक्स यूजर ने शेयर किया है।

स्टूडेंट वीजा से कनाडा बटोर रहा डॉलर

दिसंबर 2023 के आँकड़ों के मुताबिक, कनाडा में 10 लाख से ज्यादा विदेशी छात्र मौजूद हैं। कनाडा सरकार के मुताबिक, अंतर्राष्ट्रीय छात्रों से उसकी अर्थव्यवस्था में 22 बिलियन डॉलर का योगदान होता है और इससे 2 लाख से ज्यादा नौकरियाँ बनती हैं। कुछ समय पहले कनाडा में भारत के उच्चायुक्त संजय वर्मा ने बताया था कि कनाडा में मौजूदा समय में 4.27 लाख भारतीय छात्र हैं, जिन्होंने कनाडा की अर्थव्यवस्था में 18 बिलियन डॉलर का योगदान दिया है।

मॉन्ट्रियल में एक कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कनाडा के सिस्टम की खामियों की तरफ भी इशारा किया था और बताया था कि कैसे कनाडा में खुले शिक्षा के ‘आउटलेट्स’ भारतीय छात्रों को ठग रहे हैं और इससे भारत में ‘कनाडा के शिक्षा ब्राण्ड’ का नाम खराब हो रहा है।

कनाडा में अच्छी शिक्षा के नाम पर मोटी फीस वसूली जा रही है, तो भारतीय छात्रों को ठगी का भी शिकार बनाया जा रहा है। ऐसा ही एक एजेंट पिछले साल जालंधर से गिरफ्तार हुआ था, जिसके 700 से अधिक छात्रों को ठगा था। उन छात्रों पर कनाडा से डिपोर्ट करने का खतरा मंडरा रहा था। ये हैरान करने वाली बात है कि कनाडा के अधिकारी ‘फर्जी कागजातों’ पर भी लोगों का स्वागत अपने देश में कर रहे हैं और सुरक्षा एजेंसियाँ इन्हें पकड़ा नहीं पा रही हैं।

निज्जर को नहीं मिली नागरिकता, फिर भी ढाई दशक कनाडा में जिया और वहीं मरा

करन बरार जैसे लोग कनाडा एक स्टूडेंट वीजा पर आते हैं और फिर सालों साल जमे रहते हैं। इसी तरह से खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर, जिसकी पिछले साल हत्या कर दी गई थी, वो भी कनाडा में फर्जी तरीके से ही आया था और दो बार उसका शरणार्थी आवेदन खारिज हुआ था, फिर वो करीब ढाई दशक कनाडा में बिताने में सफल हो गया, वो भी बड़े सम्मान के साथ और खालिस्तानी गुटों का नेतृत्व करते हुए।

हैरानी की बात है कि निज्जर कनाडा में साल 1997 में घुसने में सफल रहा था, जब वो ‘रवि शर्मा’ काम के फर्जी पहचान के साथ कनाडा आया। उसने जून 1998 में पहली बार एफिडेविट देकर शरण माँगा, और बताया कि भारत में उसकी जिंदगी खतरे में है, लेकिन उसका एफिडेविट ही फर्जी निकला। इसके बाद निज्जर ने ‘प्लान बी’ अपनाया और कनाडा की नागरिकता पाने के लिए सिर्फ 11 दिन बाद ही एक महिला से शादी कर ली। ब्रिटिश कोलंबिया की रहने वाली उस महिला ने अपने पति के तौर पर निज्जर को नागरिकता दिलाने की कोशिश की, लेकिन कनाडा के अधिकारियों ने उसे पकड़ लिया। पता चला कि वो साल 1997 में पहले ही एक व्यक्ति को अपना पति बोल कर वीजा दिलवा चुकी है। निज्जर ने इस झटके को कोर्ट में चैलेंज किया लेकिन साल 2001 में वो मुकदमा हार गया। अब इसमें सबसे बड़ी हैरानी इस बात की है कि दो बार नागरिकता/शरणार्थी की याचिका खारिज होने, कोर्ट केस हारने के बावजूद वो कनाडा में न सिर्फ टिका रहा, बल्कि खुद को कनाडाई नागरिक भी कहता रहा।

अपनी गलतियाँ छिपाने के लिए भारत पर आरोप मढ़ रही ट्रूडो सरकार

निज्जर की हत्या में अपने देश की खराब कानून व्यवस्था की बात को छिपाते हुए जस्टिन ट्रूडो ने इसका दोष भारत पर मढ़ने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि उन्हें फर्जी स्टूडेंट वीजा, कट्टरपंथी ताकतों और आतंकवादियों पर कार्रवाई करनी चाहिए थी। हकीकत ये है कि ट्रूडो सरकार अब खुलकर खालिस्तानी आतंकवादियों का समर्थन कर रही है, उन्हें बचा रही है और भारत विरोधी कार्यक्रमों को जारी रखने की छूट दे रही है। भले ही इसकी वजह से भारत-कनाडा के संबंध अब रसातल तक नीचे पहुँच गए हों।

कनाडा सरकार अब खालिस्तानी आतंकियों को भारतीय राजनयिकों को हत्या की धमकी देने और मारपीट तक में बर्दाश्त कर रही है। कनाडा में इस समय बहुत सारे खालिस्तानी आतंकी और भारत विरोधी अलगाववादी आराम से रह रहे हैं और ट्रूडो सरकार की मदद से गैर-कानूनी गतिविधियों को अंजाम दे रहे हैं। एक तरफ हरदीप निज्जर के पास कनाडा की वैध नागरिकता थी भी या नहीं, ये बात सही से सामने भी नहीं आ पाई है, तो दूसरी तरफ कनाडा की ट्रूडो सरकार उसे कनाडा का नागरिक बोलकर उसका समर्थन कर रही है। यही नहीं, इस मामले में तनाव इतना बढ़ा कि दोनों देशों ने एक-दूसरे के राजनयिकों को भी निकाल दिया था।

दरअसल, जस्टिन ट्रूडो की सरकार गठबंधन की सरकार है। उसका एक पहिया है जगमीत सिंह की न्यू डेमोक्रेटिक पार्टी (एनडीपी)। जगमीत सिंह खुद खालिस्तान समर्थक और भारत विरोधी रुख रखता है। जगमीत सिंह ने भी निज्जर की हत्या में भारत पर उंगली उठाई थी, जबकि आज तक कनाडा और उसकी सुरक्षा एजेंसियाँ भारत का हाथ साबित नहीं कर पाई हैं।

ये हो सकता है कि ट्रूडो और उनकी सरकार अपनी राजनीतिक मजबूरियों के चलते खालिस्तानियों के खिलाफ आँख मूँदे बैठी हो, लेकिन कनाडा में स्टूडेंट वीजा पर भारी संख्या में गए लोगों का गैर-कानूनी तरीके से रहना और फर्जी दस्तावेजों के सहारे कनाडा में निज्जर जैसे हत्याकाँड को अंजाम देना कनाडा की विफलता को ही दर्शाते हैं। ऐसे में ये कनाडा की समस्या है कि उसके घर में क्या हो रहा है, उसे वो खुद देखे, न कि अपनी विफलता के लिए भारत को दोष दे। भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भी कनाडा को यही सलाह दी है कि वो अपने सिस्टम को ठीक करे और बिना वजह किसी पर उंगली न उठाए।

(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल लेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

मेवाड़ का मैराथन: स्पार्टा के योद्धाओं वाली वीरता, महाराणा का शौर्य और युद्ध कुशलता… 36000 मुगल सैनिकों का आत्मसमर्पण, वो इतिहास जो छिपा लिया गया

यह नीति वाक्य वीरत्व के गुण को उजागर करते हुऐ भारत के गौरवशाली इतिहास के पृष्ठों पर स्वर्णाक्षरों में अंकित उन अनगिनत शूरवीरों की याद दिलाता है, जिन्होंने जीवनपर्यंत इस वाक्य में वर्णित श्रेष्ठ गुणों को धारण किया। वास्तव में शौर्य क्या है? अपने लिए लड़ना? अपने अधिकारों के लिए लड़ना? नहीं। अपने लिए तो हर कोई लड़ सकता है परन्तु अपनी मातृभूमि के लिए लड़ना ही शौर्य है। जब व्यक्ति स्व से ऊपर उठकर अपनी मिट्टी के लिए मर-मिटे, उसे ही वीरता कहते हैं। भारतवर्ष का इतिहास ऐसे असंख्य वीर-वीरांगनाओं से भरा पड़ा है, जिन्होंने आजीवन कष्ट झेले, मृत्यु का आलिंगन कर लिया परन्तु आक्रांताओं के समक्ष कभी घुटने नहीं टेके। इस राष्ट्र के इतिहास में राजस्थान का इतिहास अपना एक विशिष्ट स्थान रखता है। उसमें भी मेवाड़ का इतिहास सबसे भारी है।

महाराणा उदय सिंह और महारानी जयवंता बाई के ज्येष्ठ पुत्र वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप सिंह का जन्म 9 मई 1540 को कुंभलगढ़ दुर्ग में हुआ था। हिन्दू पञ्चांग के अनुसार, प्रतिवर्ष ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष तृतीया को प्रताप जयंती मनाई जाती है। वे सूर्यवंशी क्षत्रिय राजा थे और उनके कुल को मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम के वंशज कहलाने का गौरव प्राप्त है। महाराणा प्रताप सिंह का नाम सुनते ही धमनियों में शौर्य और पराक्रम का रक्त प्रवाहित होने लगता है, मस्तक गर्व और स्वाभिमान से ऊँचा हो उठता है। यह बात उस कालखण्ड की है, जब भारतवर्ष पर मलेच्छ वंशियों का निरंतर आक्रमण हो रहा था और वे अपना राज्य विस्तार करने में सफल भी हो रहे थे। आबू, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, मालवा आदि शक्तिशाली राजे-रजवाड़े अकबर का आधिपत्य स्वीकार कर चुके थे। ऐसे में, एकमात्र महाराणा प्रताप सिंह ही थे, जो अपने शौर्य पर अटल थे। उनके नाम मात्र से ही विधर्मी अकबर और उसकी सेना थर्रा उठती थी।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात कुछ तथाकथित दरबारी इतिहासकारों ने बड़े ही प्रायोजित ढंग से हमारे भीतर हीन भावना पैदा करने की घृणित चेष्टा की। हमारे मन-मस्तिष्क में यह भर दिया गया कि भारत का इतिहास तो पराजय का इतिहास है। हद तो तब गई जब मलेच्छों के सिरमौर अकबर को इन तथाकथित इतिहासकारों ने ‘द ग्रेट’ का स्थायी विशेषण जोड़कर माँ भारती के अमर सपूत महाराणा प्रताप सहित समूचे भारतवर्ष को भी अपमानित कर दिया। उनके विराट व्यक्तित्व को संकुचित और धूमिल करने हेतु हल्दीघाटी युद्ध में उनको पराजित घोषित कर अध्याय ही समाप्त कर दिया। सत्य तो यह है कि मुगल न तो महाराणा प्रताप को कभी पकड़कर बंदी ही बना सके और न ही मेवाड़ पर पूर्ण आधिपत्य जमा सके। हल्दीघाटी का भयावह युद्ध अकबर के गुरूर और प्रताप सिंह के स्वाभिमान की पहली लड़ाई मात्र थी। तत्पश्चात् अगले 10 वर्षों में मेवाड़ में महाराणा ने कैसे स्वतंत्रता की लड़ाई जारी रखी, इसकी जानकारी इतिहास के पुस्तकों से नदारद ही रही। यदि अकबर वास्तव में विजयी हो गया था तब कालांतर में भी युद्ध क्यों हुए?

कुछ तथाकथित विद्वान महाराणा प्रताप और अकबर को एक ही तराजू में तौलते हुए यह घोषणा करते हैं कि दोनों ही समान रूप से वीर थे, परन्तु मैं ऐसा कदापि नहीं मानती। दूसरे के घर पर अकारण आक्रमण करने वाला, लूटपाट मचाने वाला भला वीर कैसे हो सकता है? स्वयं योद्धा की तरह सामने से कभी कोई युद्ध ना लड़कर, राजपूताने (वर्तमान में राजस्थान) की मुठ्ठी भर क्षत्रिय सेना से अपने लाखों सैनिकों को लड़वाने वाला वीर कत्तई नहीं हो सकता। वीर तो वो थे, जिन्होंने अपनी मातृभूमि की स्वतंत्रता हेतु राजपाट, सुख, वैभव का एक क्षण में त्याग कर दिया, जंगलों-बीहड़ों के खाक छाने। जिनके पूरे परिवार ने दर्दनाक कष्ट उठाए, परन्तु किसी भी मूल्य पर अपनी पगड़ी नहीं उतारी। भारत माँ के उस वीर सपूत का दृढ़ संकल्प था, “कटे शीश पड़े, पर ये पाग नहीं, पराधीन कदे ना होवण दूँ।” उनके इसी आत्मबल का परिणाम था कि विधर्मी अकबर समस्त भारतवर्ष का सम्राट बनने के केवल स्वप्न ही देखता रह गया।

तथाकथित महान अकबर लंबे समय तक मोइनुद्दीन चिश्ती का मुरीद रहा, जो हिन्दू धर्म-समाज पर इस्लामी हमले का बड़ा प्रतीक था। सन् 1568 में चित्तौड़गढ़ पर कब्ज़ा जमाने के बाद अकबर ने चिश्ती अड्डे से ही ‘फतहनामा-ए-चित्तौड़’ जारी किया था, जिसके हर वाक्य से जिहादी जुनून टपकता है। उस युद्ध में 8 हजार वीरांगना क्षत्राणियों ने जौहर कर अपनी अस्मिता की रक्षा की थी। अकबर ने राजपूत सैनिकों के अलावा 30 हजार सामान्य नागरिकों का भी कत्ल किया था। मारे गए सभी पुरुषों के जनेऊ जमा कर तौला गया, जो साढ़े चौहत्तर मन था। यह केवल एक स्थान पर, एक बार में! इस भयावह नरसंहार के विवरण में अकबर लिखवाता है, “हम अपना क़ीमती वक्त, अपनी सलाहियत के मुताबिक़ जंग और जिहाद में गुजारते हैं। शैतान काफिरों के खिलाफ़ टोली बनाकर हमला हुआ और उस जगह कब्ज़ा हो गया, जहाँ क़िला खुलता है। हम अपनी ख़ून की प्यासी तलवारों से एक के बाद एक कत्ल करते गए और कत्ल हुए लोगों का अंबार हो गया। बाकी बचे हुए लोगों का पीछा हुआ, जैसे वो डरे हुए गधे हों, शेर से भागते हुए।”

समाज की स्त्रियों पर कुदृष्टि डालने वाला, अनगिनत निर्दोष, निहत्थे लोगों की हत्या करवाकर स्वयं को श्रेष्ठ समझने वाला वीर तो क्या साधारण मनुष्य कहलाने का भी अधिकारी हो सकता है भला?

इतिहास साक्षी है कि भारत के वीरों की तलवारें कभी म्यानों में सोई ही नहीं। इस पावन धरा पर निरंतर संघर्ष चलता रहा और हम सदा विजयश्री का वरण करते आए। अकबर तो क्या! किसी भी मुग़ल की हुक़ूमत कभी भी समूचे भारतवर्ष पर रही ही नहीं। वे अलग-अलग राजाओं के साथ मिलकर इस देश पर शासन करते रहे। इनके लिए साम्राज्य या सल्तनत शब्द प्रयुक्त करना किसी उपहास से कम नहीं। वास्तव में तो मगध, चोला, चेरा, पांड्यान आदि साम्राज्य हुआ करते थे। महरौली से यमुना तक शासन करने वाले चंद लुटेरों को हमने आवश्यकता से अधिक सम्मान दे दिया और अपने शूरवीर पूर्वजों को बिसराकर इन अपराधियों को नायक बना दिया। क्या यह सत्य नहीं कि जिन-जिन देशों पर विदेशी-विधर्मी आक्रांताओं ने आक्रमण किया, वहाँ की संस्कृति समूल नष्ट हो गई? जैसे पर्शिया गुलाम हुआ तो ईरान हो गया, मेसोपोटामिया इराक़ हो गया, इजिप्ट की हालत तो हमारे सामने है ही। परन्तु भारत अपनी संस्कृति को अक्षुण्ण रखने में सफल रहा है। अब इस तथ्य को कौन उजागर करेगा कि हमारा इतिहास पराजय का नहीं अपितु संघर्ष, साहस, शौर्य, पराक्रम, त्याग और बलिदान का इतिहास रहा है?

यह इस देश की विडंबना ही तो है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के इतने वर्षों पश्चात भी हमसे हमारे गौरवशाली इतिहास को छुपाया जाता है। वहीं दूसरी ओर, विदेशी आक्रांताओं की पीढ़ी को रटवाकर मस्तिष्क को कलुषित करने का प्रयास होता है। महाराणा प्रताप सिंह जिस महान कुल के उजियाले थे, उसमें अनेक वीर पैदा हुए, जिन्होंने अपने अदम्य साहस का न सिर्फ परिचय दिया अपितु विदेशी आक्रांताओं से सदैव इस पावन धरा की रक्षा भी की। हमारी पीढ़ियों को आखिर कब बतलाया जाएगा कि सातवीं सदी में बप्पा रावल ने मोहम्मद बिन क़ासिम को ईरान तक दौड़ा-दौड़ा कर मारा था। महाराणा हमीर सिंह ने मोहम्मद बिन तुगलक को 6 महीने कैद में रखा था, महाराणा कुम्भा ने मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी को महीनों बंदी बनाकर रखा। महाराणा सांगा ने दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी को खटोली के युद्ध में बुरी तरह परास्त किया था, यह सब अध्याय इतिहास पुस्तकों में कब सम्मिलित होंगे? यह कब पढ़ाया जाएगा कि जब हल्दीघाटी युद्ध में महाराणा प्रताप ने मानसिंह के हाथी पर चढ़ाई कर दी, तब अकबर की शाही फ़ौज भयातुर हो 5-6 कोस दूर भाग गई थी और अकबर के रणभूमि में स्वयं आने की झूठी अफवाह से पुनः युद्ध में सम्मिलित हुई।

दिवेर का निर्णायक महासंग्राम

इतिहास साक्षी है कि सन् 1576 में हुए हल्दीघाटी युद्ध के बाद भी अकबर ने महाराणा को बंदी बनाने और उनकी हत्या करने के लिए सन् 1577 से 1582 के बीच लगभग एक लाख सैन्यबल भेजे। अंग्रेजी इतिहासकारों ने लिखा है कि हल्दीघाटी युद्ध का दूसरा भाग जिसको उन्होंने ‘बैटल ऑफ दिवेर’ कहा है, मुगल बादशाह के लिए एक करारी हार सिद्ध हुआ था। कर्नल टॉड ने भी अपनी किताब में जहाँ हल्दीघाटी को ‘थर्मोपल्ली ऑफ मेवाड़’ की संज्ञा दी, वहीं दिवेर के युद्ध को ‘मेवाड़ का मैराथन’ बताया है (मैराथन का युद्ध 490 ई.पू. मैराथन नामक स्थान पर यूनान के मिल्टियाड्स एवं फारस के डेरियस के मध्य हुआ, जिसमें यूनान की विजय हुई थी, इस युद्ध में यूनान ने अद्वितीय वीरता दिखाई थी), कर्नल टॉड ने महाराणा और उनकी सेना के शौर्य, युद्ध कुशलता को स्पार्टा के योद्धाओं सा वीर बताते हुए लिखा है कि वे युद्धभूमि में अपने से 4 गुना बड़ी सेना से भी नहीं डरते थे।

हल्दीघाटी के पश्चात् अक्तूबर 1582 में दिवेर का निर्णायक युद्ध हुआ। इस युद्ध में मुगल सेना की अगुवाई करने वाला अकबर का चाचा सुल्तान खां था। विजयादशमी का दिन था और महाराणा ने अपनी नई संगठित सेना को दो हिस्सों में विभाजित करके युद्ध का बिगुल फूँक दिया। एक टुकड़ी की कमान स्वयं महाराणा के हाथों में थी, तो दूसरी टुकड़ी का नेतृत्व उनके पुत्र अमर सिंह कर रहे थे। अपने पिता की तरह ही कुँवर सा भी बड़े पराक्रमी योद्धा थे। उन्होंने मुगल सेनापति पर भाले का ऐसा वार किया कि भाला उसके शरीर और घोड़े को चीरता हुआ जमीन में जा धँसा और सेनापति मूर्ति की तरह एक जगह गड़ गया। इसी भीषण युद्ध में महाराणा ने बहलोल खान के सिर पर इतना तीव्र प्रहार किया कि वह घोड़े समेत दो टुकड़ों में कट गया। प्रताप का ऐसा रौद्र रूप देख मुग़ल सेना में हाहाकार मच गया। वीर राजपूती सैनिकों ने शत्रु की सेना को अजमेर तक खदेड़ा। बचे-खुचे 36,000 भयभीत मुग़ल सैनिकों ने महाराणा के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। दिवेर के युद्ध ने मुगलों के मनोबल को बुरी तरह तोड़ दिया। इस युद्ध के पश्चात् प्रताप ने गोगुंदा, कुम्भलगढ़, बस्सी, चावंड, जावर, मदारिया, मोही, माण्डलगढ़ जैसे महत्वपूर्ण ठिकानों को अपने अधीन कर लिया। केवल चितौड़गढ़ को छोड़ अन्य सभी दुर्गों पर पुनः केसरिया ध्वज फहरने लगा। यह भी वर्णित है कि इसके पश्चात भयातुर अकबर ने आगरा छोड़कर लाहौर को अपनी राजधानी बना ली थी।

वीर बलिदानी चेतक

जिस प्रकार प्रभु श्रीराम की कथा हनुमान जी महाराज के बिना अधूरी है, ठीक उसी प्रकार वीरों के सिरमौर महाराणा प्रताप की शौर्यगाथा भी उनके घोड़े चेतक के बिना पूर्ण नहीं हो सकती। चेतक भले ही पशु योनी में जन्मा एक अश्व मात्र था परन्तु उसकी बुद्धिमता और स्वामीभक्ति का कोई सानी नहीं। एक ओर जहाँ मनुष्य योनी में जन्म पाकर भी राजपूती कुल कलंक मान सिंह केवल अपनी झूठी शान में मश्गूल होकर विधर्मी शत्रुओं की सेना का प्रतिनिधित्व कर रहा था वहीं दूसरी ओर रणभूमि में पूज्य चेतक महाराणा के साथ कदम से कदम मिलाकर अपनी मातृभूमि का ऋण चुका रहा था। महाकवि श्याम नारायण पाण्डेय अपनी कृति ‘हल्दीघाटी’में लिखते हैं:

वीर चेतक अपने अदम्य साहस का परिचय देते हुए विशालकाय हाथी पर चढ़ बैठा जिस पर गद्दार मान सिंह सवार था। यह घटना विश्व के इतिहास में अत्यंत अनूठी, अकल्पनीय और अद्भुत घटना है। इस युद्ध में चेतक अपने राणा को सकुशल सुरक्षित स्थान पर पहुँचाकर स्वयं सदा के लिए सो गया। प्रताप अपने परम मित्र, भाई समान घोड़े को हृदय से लगाकर दहाड़ मारकर रोने लगे। इस दारुण दृश्य को देखकर शक्ति सिंह (महाराणा के छोटे भाई जो मुग़लों से जा मिले थे) का हृदय परिवर्तन हो गया और वे अपने भ्राता के चरणों में गिरकर क्षमा याचना करने लगे।

महाराणा की जयंती के अवसर पर हमें इस बात का मूल्यांकन करने की महती आवश्यकता है कि वर्तमान पीढ़ी को कौन सा इतिहास पढ़ाया जाए? वह कायरतापूर्ण इतिहास जिसमें साम्राज्य-विस्तार की लपलपाती-अंधी लिप्सा थी, अनैतिकता और अधर्म की दुर्गंध थी अथवा अपने पूर्वजों का वह गौरवशाली ओजपूर्ण इतिहास जिसमें संघर्ष, स्वाभिमान, साहस, त्याग, बलिदान और नैतिकता की पुण्यसलिला भावधारा समाहित है। आज यह विचार आवश्यक है कि क्या हमें गुलामी की उन ग्रंथियों को ही पोसने-सींचने-फैलाने का कार्य निर्बाध रूप से करते रहना है, अथवा उस शाश्वत सत्य को पुनः प्रतिष्ठित कर राष्ट्रीय स्वाभिमान की रक्षा करनी है। आज जब नवभारत अंगड़ाई ले रहा है तब क्या हमारा यह परम कर्त्तव्य नहीं बनता कि हम भावी पीढ़ी को अपने पूर्वजों द्वारा स्थापित मानबिन्दुओं और जीवन-मूल्यों की रक्षा हेतु तैयार करें? जिस क्षण हमें इन प्रश्नों के उत्तर ज्ञात हो जाएँगे, उसी क्षण महाराणा प्रताप व अन्य पूर्वजों तक हमारी सच्ची श्रद्धांजलि पहुँचेगी।

साहिम ने लड़कों से मिलने पर गर्लफ्रेंड की कर दी हत्या: हिंदू सिपाही के नाम लिखवा दी गई FIR, फोन में मिली तस्वीरें तो कब्र से निकलवाई गई लड़की लाश

पीलीभीत में 13 अप्रैल को एक 16 साल की लड़की शीरीं का शव मिला था। माता-पिता नेपाल में ईंट-भट्टे पर काम करते थे, दादा-दादी घर पर रहते थे। सुबह शव मिला, तो सामान्य मौत मान कर घर वालों और गाँव वालों ने दफना दिया। माँ-बाप के आने से पहले ही शीरीं के शव को दफना दिया गया था, वो उसका चेहरा भी आखिरी बार नहीं देख पाए थे। इस मामले में स्थानीय थाने की चौकी पर तैनात रहे एक हिंदू सिपाही पर उँगली उठी और शीरीं के ही गाँव की एक लड़की, जो सिपाही की गर्लफ्रेंड थी। लेकिन अब मामला बदल चुका है, क्योंकि असली हत्यारे का चेहरे सामने आ चुका है। इस केस में शीरीं का प्रेमी साहिम ही हत्यारा निकला है। हम बताते हैं सिलसिलेवार तरीके से, कि आखिर इस मामले में क्या कुछ हुआ…

मोबाइल में मिली तस्वीर से उलझा मौत का राज

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पीलीभीत के जहानाबाद थाना क्षेत्र का ये मामला बेहद चौंकाने वाला निकला है। यहाँ की शीरीं की हत्या के 23 दिन बीत जाने के बाद शीरीं की माँ ने उसके टूट चुके मोबाइल को रिपेयर कराया। चूँकि अब तक शीरीं की मौत को सभी सामान्य मान रहे थे, लेकिन माँ ने जब फोन ठीक कराया, तो गैलरी में मिली उसे एक सिपाही और गाँव की ही लड़की के आपत्तिजनक वीडियो और तस्वीर… इन वीडियो और तस्वीरों में यूपी पुलिस का सिपाही राजकुमार था, जो स्थानीय थाने में कभी तैनात रहता था। उस तस्वीर के आधार पर माँ-बाप पहुँचे एसपी के पास और फिर मामला दर्ज कराया।

पहले सिपाही पर गया सभी का शक

एसपी के आदेश के बाद शीरीं को दफनाने के 23 दिन बाद 7 अप्रैल शीरीं का शव कब्र से निकाला गया। पोस्टमार्टम हुआ, तो पता चला कि शीरीं की हत्या की गई थी। माता-पिता ने शीरीं के फोन में मिली तस्वीर के आधार पर सिपाही राजकुमार, अपने ही गाँव की सिपाही की प्रेमिका, एक लड़के साहिम और एक अन्य के खिलाफ एफआईआर लिखवा दी। खूब हो हल्ला-मचा और फिर पुलिस पर आरोप लगाए गए कि वो सिपाही को बचा रही है। लेकिन जाँच के बाद मामला खुल गया।

…फिर साहिम ने बताया, कैसे दिया हत्याकांड को अंजाम

शीरीं हत्याकांड में नामजद साहिम के साथ लड़की की खूब बातचीत होती थी। सिपाही राजकुमार के पास शीरीं की गाँव की दो लड़कियाँ शीरीं के फोन से ही बात करती थी। ऐसे में साहिम से पूछताछ हुआ, तो वो मामले को घुमाने लगा। लेकिन अंत में वो टूट गया। उसने जो खुलासा किया, वो हैरान करने वाला था।

दरअसल, साहिम और शीरीं की प्रेम कहानी 4 साल से चल रही थी। दोनों के बीच संबंध भी थे। उस रात शीरीं ने साहिम को अपने पास अपने घर में बुलाया था, लेकिन वो तय समय से पहले ही उसके घर पहुँच गया। इस दौरान साहिम ने देखा कि दो लड़के शीरीं के कमरे से निकल रहे हैं, जिसके बारे में उसने शीरीं से सवाल जवाब किए। अपने सवालों के संतोषजनक जवाब न पाकर वो गुस्से में पागल हो गया और शीरीं का गला दबा दिया। उसने एक हाथ से शीरीं का गला दबाया और दूसरे हाथ से उसका मुँह।

शीरीं की साँसे रुक गई, तो साहिम उसे बिस्तर पर ही लिटाकर भाग निकला। दूसरे दिन से वो बाकी गाँव वालों की तरह ही मामले से अंजान बना रहा। जब शीरीं के शव का पोस्टमार्टम हुआ, और हत्या की वजह गला दबाकर मारने की निकली, तब भी वो अंजान बनता रहा और खुद को बेकसूर बताता रहा। चूँकि शीरीं के फोन से राजकुमार नाम के सिपाही की तस्वीर निकली थी, इसलिए सारा ठीकरा उसके ही सर फोड़ता रहा, लेकिन पुलिस ने सख्ती की तो वो टूट गया और सच सामने आ गया। अब पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर सलाखों के पीछे भेज दिया है।

चुनाव प्रचार के लिए केजरीवाल को अंतरिम जमानत बन जाएगी मिसाल: सुप्रीम कोर्ट में ED ने किया विरोध, कहा- इलेक्शन कैंपेन मौलिक अधिकार नहीं

शराब घोटाले में जेल में बंद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को लोकसभा चुनाव को देखते हुए अंतरिम जमानत देने के सुप्रीम कोर्ट के सुझाव का प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने गुरुवार (9 मई 2024) को जोरदार विरोध किया। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में केंद्रीय एजेंसी ने कहा कि चुनाव प्रचार का अधिकार न तो मौलिक अधिकार है और ना ही कानूनी या संवैधानिक अधिकार है।

अपने हलफनामे में ED ने कहा, “अभिसाक्षी की जानकारी में अभी तक किसी भी राजनीतिक नेता को चुनाव प्रचार के लिए अंतरिम जमानत नहीं दी गई है। ये तो चुनाव लड़ने वाला उम्मीदवार भी नहीं हैं। यहाँ तक कि चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार को भी चुनाव प्रचार के लिए अंतरिम जमानत नहीं दी जाती है, अगर वह हिरासत में है।”

केंद्रीय एजेंसी ने कहा, “पिछले 5 वर्षों में लगभग 123 चुनाव हुए हैं। यदि चुनाव प्रचार के उद्देश्य से अंतरिम जमानत दी जानी है तो किसी भी राजनेता को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है और ना ही न्यायिक हिरासत में नहीं रखा जा सकता है, क्योंकि चुनाव पूरे वर्ष होते रहते हैं।” ED ने तर्क दिया कि संघीय ढाँचे में हर चुनाव महत्वपूर्ण है।

हलफनामे में आगे कहा गया है, “हर स्तर पर हर राजनेता यह तर्क देगा कि यदि उसे अंतरिम जमानत पर रिहा नहीं किया गया तो उसे अपरिवर्तनीय परिणाम भुगतने होंगे। अकेले धनशोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत वर्तमान में कई राजनेता हैं, जो न्यायिक हिरासत में हैं और उनके मामलों की जाँच सक्षम अधिकारियों द्वारा की जा रही है।”

केंद्रीय एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय ने आगे तर्क दिया, “अदालतें उनकी (नेताओं की) हिरासत को बरकरार रख रही हैं। गैर-पीएमएलए अपराधों में पूरे देश में कई राजनीतिक नेता न्यायिक हिरासत में होंगे। इसलिए ऐसा कोई कारण नहीं है कि याचिकाकर्ता द्वारा विशेष उपचार की विशेष प्रार्थना को स्वीकार किया जाए।”

एजेंसी ने कहा कि अगर चुनाव प्रचार के लिए अंतरिम जमानत दी जाती है तो यह एक मिसाल कायम करेगा, जो सभी बेईमान राजनेताओं को अपराध करने और फिर चुनाव की आड़ में जाँच से बचने की अनुमति देगा। ED ने कहा कि एक राजनेता एक सामान्य नागरिक से विशेष दर्जे का दावा नहीं कर सकता। समन से बचने के लिए केजरीवाल ने 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव का यही बहाना बनाया था।

बता दें कि इस मामले पर अगली सुनवाई शुक्रवार (10 मई 2024) को होगी। इस मामले में गिरफ्तारी के खिलाफ अरविंद केजरीवाल की याचिका पर सुनवाई करने वाली पीठ की अध्यक्षता करने वाले सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजीव खन्ना ने कहा था, “हम शुक्रवार को अंतरिम आदेश (अंतरिम जमानत पर) सुनाएँगे। गिरफ्तारी को चुनौती देने से जुड़े मुख्य मामले पर भी उसी दिन फैसला किया जाएगा।”

लोकसभा चुनाव में आतंकी की एंट्री! मुंबई ब्लास्ट केस में 10 साल की जेल काट चुका है इब्राहीम मूसा: अब उद्धव ठाकरे के कैंडिडेट के लिए माँग रहा वोट

लोकसभा चुनाव 2024 में अब आतंकवादी भी चुनाव प्रचार कर रहे हैं, वो भी बाला साहेब ठाकरे के सुपुत्र उद्धव ठाकरे की पार्टी शिवसेना के कैंडिडेट के लिए। आतंकवादी का नाम इब्राहीम मूसा चौहान है। वो मुंबई ब्लास्ट 1993 के दौरान आतंकवादियों को हथियार सप्लाई करता था। उसे 10 साल जेल की सजा भी हुई थी। अब वो मुंबई नॉर्थ-वेस्ट सीट से शिवसेना-यूबीटी के कैंडिडेट अमोल कीर्तिकर के लिए चुनाव प्रचार कर रहा है और आम जनता से वोट माँग रहा है।

अमोल कीर्तिकर वही व्यक्ति हैं, जिन्हें टिकट देने के विरोध में संजय निरूपम ने कॉन्ग्रेस पार्टी छोड़ दी थी और उन्हें ‘खिचड़ी चोर’ कहा था। अमोल पर कोरोना काल के दौरान खिचड़ी घोटाले का आरोप है, उनसे ईडी भी पूछताछ कर चुकी है। हालाँकि इस लोकसभा चुनाव में अमोल कीर्तिकर उद्धव ठाकरे के भरोसेमंद साथी हैं और उनके लिए उद्धव ठाकरे ने कॉन्ग्रेस से भी पंगा लेने में गुरेज नहीं किया। अब उन्हीं अमोल कीर्तिकर के चुनाव प्रचार में इब्राहीम मूसा जैसा दुर्दांत आतंकी उतरा है और उनके लिए वोट माँग रहा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इब्राहीम मूसा के चुनाव प्रचार का वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। इस वीडियो को शेयर करते हुए प्रीति गाँधी ने लिखा, “मुंबई ब्लास्ट 1993 का दोषी इब्राहीम मूसा उद्धव ठाकरे की शिवसेना के कैंडिडेट अमोल कीर्तिकर के लिए प्रचार करता दिखा है। उसने मुंबई ब्लास्ट से पहले संजय दत्त के घर पर हथियार पहुँचाए ते। ये बात (इब्राहीम मूसा का चुनाव प्रचार) माफी के काबिल नहीं है।”

बीजेपी विधायक बोले, ये वीडियो में दिख रहा-कौन पाकिस्तान के साथ

बीजेपी एमएलए अमित साटम ने कहा कि उद्धव की पार्टी आतंकी के साथ है। कल शाम मुंबई नॉर्थ वेस्ट में प्रचार के दौरान उद्धव गुट के नेता के साथ 1993 बॉम्ब ब्लास्ट आरोपी इब्राहीम मूसा प्रचार कर रहा था। इससे साफ है कि कौन पाकिस्तान के साथ है। अब यह लड़ाई भारत और पाकिस्तान की है।

इब्राहीम मूसा का क्या था रोल?

बता दें कि इब्राहीम मूसा वहीं आतंकवादी है, जिसने 1993 के मुंबई सीरियल ब्लास्ट के समय हथियार सप्लाई किए थे। इस केस में उसे 10 साल की सजा हुई थी। बता दें कि 12 मार्च, 1993 को दोपहर में मुंबई स्टॉक एक्सचेंज पर जोर धमाका हुआ। इस धमाके से पूरी मुंबई में अफरा-तफरी मच गई थी और फिर 2.10 घंटे के भीतर ही मुंबई में 12 जगहों पर धमाके पर धमाके होते रहे।

इब्राहीम मूसा चौहान उर्फ बाबा चौहान वही व्यक्ति है, जिसने एके-56 राइफलों, मैगजीन्स, विस्फोटकों और हैंड ग्रेनेड्स की सप्लाई की थी। उसी ने एक्टर संजय दत्त के घर में अनीस इब्राहीम के कहने पर हथियार पहुँचाए थे। इब्राहीम मूसा के पास से एक एके-56 राइफल, 635 राउंड गोलियाँ, 10 मैगजीन्स और 25 हैंड ग्रेनेड्स भी बरामद हुए थे।

इन धमाकों में 257 लोगों की मौत हो गई थी, तो 700 से अधिक लोग घायल हो गए थे। इन धमाकों की वजह से मुंबई में सांप्रदायिक तनाव भी फैल गया था। इस धमाके में पहली बार आरडीएक्स का भी इस्तेमाल किया गया था। इस केस की सुनवाई टाडा की स्पेशल कोर्ट में हुई थी और इसे देश के सबसे अहम मुकदमों में से एक माना जाता है। इन धमाकों के पीछे दाऊद इब्राहीम जैसे दुर्दांत मुस्लिम माफिया का नाम सामने आया और वो देश छोड़कर फरार हो गया था।

(नोट-कई मीडिया रिपोर्ट्स, बीजेपी नेताओं के ट्वीट्स में इब्राहीम मूसा को इकबाल मूसा भी बताया जा रहा है। ये समाचार मुंबई ब्लास्ट 1993 केस में हथियारों की सप्लाई करने वाले इब्राहीम मूसा चौहार उर्फ बाबा चौहान के बारे में है, जो शिवसेना-यूबीटी के उम्मीदवार के लिए चुनाव प्रचार करता देखा गया। उसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल भी हो रहा है।)

‘हिंदुआ सूरज’ के नाम से विख्यात महाराणा प्रताप सिंह से क्यों भय खाता था मुगल बादशाह अकबर? दिवेर के युद्ध में छिपी है कहानी

महाराणा प्रताप सिंह एक ऐसा नाम है, जिसे भारत ही नहीं बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप में बेहद सम्मान और श्रद्धा के साथ लिया जाता है। महाराणा प्रताप सिंह को ‘हिंदुआ सूरज’ और ‘हिंदू अधिपति’ के नाम से जाना जाता है। वहीं, उनके परम प्रतापी दादा महाराणा संग्राम सिंह उर्फ राणा सांगा को ‘हिंदूपति’ के नाम से जाना जाता है। दोनों ही दादा-पोते का नाम इतिहास में स्वर्णाक्षरों में दर्ज है, जो भारत के रहने तक कभी मिट नहीं सकता।

मेवाड़ के महाराणा प्रताप सिंह को मुगल बादशाह अकबर के साथ संघर्ष के लिए जाना जाता है। हल्दी घाटी युद्ध का नाम आज भी भारत के बच्चे-बच्चे के जुबान पर है। यह एक ऐसा युद्ध था, जिसमें महाराणा प्रताप सिंह ने 20,000 की सेना के साथ अकबर की 80,000 की सेना के साथ महायुद्ध किया था। इस युद्ध के परिणाम को लेकर अलग-अलग दावे किए जाते हैं, लेकिन इस युद्ध ने महाराणा प्रताप सिंह के पराक्रम को साबित कर दिया।

इस युद्ध से इतर महाराणा प्रताप का अकबर की सेना का एक और युद्ध का जिक्र इतिहास की किताबों में मिलता है, जिसमें उन्होंने मुगल बादशाह की भारी-भरकम सेना को उन्होंने बुरी तरह परास्त किया था। यह युद्ध इतिहास में दिवेर के युद्ध के नाम से जाना जाता है। देश के लोग इस युद्ध के बारे में कम जानते हैं और हमारे देश के पाठ्य-पुस्तकों में हल्दी घाटी के युद्ध के बारे में तो बताया जाता है, लेकिन दिवेर के युद्ध के बारे में कभी नहीं बताया गया।

सन 1576 में हल्दी घाटी के युद्ध के बाद मेवाड़ का अधिकांश हिस्सा मुगलों के अधिकार क्षेत्र में चला गया था। हालाँकि, महाराणा प्रताप ने इस युद्ध के बाद भी हार नहीं मानी। वे लगातार अपने खोये राज्य को पाने के लिए संघर्षरत रहे। इसमें महाराणा का साथ स्थानीय भील समुदाय, जैन समाज के संतों, व्यवसायियों और स्थानीय लोगों ने खुले दिल से साथ दिया। हल्दी घाटी युद्ध के सात साल बाद यानी 1583 में राजस्थान के दिवेर में वह युद्ध लड़ा गया।

हल्दी घाटी युद्ध के तुरंत बाद महाराणा प्रताप ने भामा शाह और तारा शाह को मालवा का सूबेदार नियुक्त कर दिया। ये दोनों भाई जैन समाज से आते थे। इन लोगों ने आगे की लड़ाई के लिए धन इकट्ठा करना शुरू कर दिया। ये मुगलों द्वारा हिंदुओं से लूटे गए माल को जब्त करते और उसे महाराणा के सामने आगे के अभियान के लिए प्रस्तुत करते थे। महाराणा अपनी छोटी सी सेना के साथ अकबर के खिलाफ छापामार युद्ध जारी रखे हुए थे।

ओमेंद्र रत्नू की पुस्तक ‘महाराणा: सहस्त्र वर्षों का धर्मयुद्ध’ का अंश

उदयपुर पर अधिकार करने के बाद अकबर ने उसका नाम मुहम्मदाबाद कर दिया था और वहाँ मुगलों के सिक्के चलवा दिए थे। लेकिन, मई 1577 में महाराणा प्रताप ने उदयपुर पर अधिकार कर लिया इसका नाम फिर से बदलकर उदयपुर कर दिया। इसके पहले वे गोगूंदा को जीत चुके थे और अब अगला निशाना मोही था। महाराणा प्रताप ने भाटी क्षत्रियों के साथ मिलकर आखिरकार इसे भी आजाद करा लिया।

डॉक्टर ओमेंद्र रत्नू अपनी शोधपरक पुस्तक ‘महाराणा: सहस्र वर्षों का धर्मयुद्ध’ में लिखते हैं कि मोही के युद्ध को लेकर ‘अकबरनामा’ में अबुल फजल लिखा है, “राणा के आदमियों ने मोही पर हमला करके फसलें बर्बाद करना शुरू कर दिया। उस समय कुँवर मान सिंह कच्छवाहा मेवाड़ के पहाड़ी इलाकों में चले गए। मोही के थानेदार मुजाहिद बेग को सूचना मिली तो वह हथियारों सहित आया और आखिर में शहीद हो गया।”

मान सिंह वही व्यक्ति हैं, जो अकबर के सेनापति थे। कहा जाता है कि हल्दीघाटी के युद्ध में भी मान सिंह ने महाराणा प्रताप को घायलावस्था में युद्ध भूमि से निकलने में परोक्ष मदद की थी। मोही में भी महाराणा के आक्रमण के दौरान मान सिंह पहाड़ी इलाकों में चले गए थे। यानी सब कुछ बहुत सुनियोजित तरीके से हो रहा था और इसमें मान सिंह परोक्ष रूप से महाराणा प्रताप सिंह की मदद कर रहे थे।

इसके बाद बाँसवाड़ा का युद्ध हुआ, जिसमें कई क्षत्रिय कुलों ने मदद की और महाराणा प्रताप ने जीत हासिल की। अब बारी दिवेर की थी। इसके लिए महाराणा प्रताप के छोटे भाई शक्ति सिंह, भामा शाह, तारा शाह, चूड़ावत, शक्तावत सहित कई सरदार भी अपनी सैन्य टुकड़ी के साथ महाराणा से कदम ताल मिला रहे थे। महाराणा ने भीलों की सैन्य टुकड़ी को पहाड़ी इलाकों में तैनात किया गया था।

इतिहासकारों के अनुसार, सितंबर 1583 में विजयदशमी का वह दिन आ गया जब महाराणा प्रताप सिंह ने अपने सात साल के छापामार युद्ध को पूर्ण युद्ध में बदल दिया और लगभग 20,000 सैनिकों की सेना लेकर मेवाड़ पर हमला कर दिया। दिवेर युद्ध में दोनों पक्ष की सेनाएँ आमने-सामने थीं। राजपूतों के मन में युद्ध जीतने की प्रबल लालसा थी।

इस युद्ध में महाराणा प्रताप सिंह का मुकाबला एक बार फिर मुगल सेनापति बहलोल खाँ उज्बेक से हुआ। हल्दी घाटी के युद्ध में वह बच गया था, लेकिन दिवेर युद्ध में वह बच नहीं सका। महाराणा प्रताप ने उस पर ऐसा वार किया कि बहलोल खाँ दो हिस्सों में कट गया। बहलोल का घोड़ा भी आधा कट गया। महाराणा के इस रूप को देखकर क्षत्रिय जोश से भर गए और मुगलों की सेना को गाजर-मूली की तरह काट डाला।

इस तरह मुगल सेना को परास्त करके महाराणा प्रताप सिंह की सेना ने अपने पुरखों की जमीन मेवाड़ की एक-एक इंच भूमि को स्वतंत्र करा लिया। मुगलों के कुल 36 थानों को महाराणा ने अपने अधिकार में ले लिया। महाराणा प्रताप सिंह के इस अभियान में अन्य क्षत्रिय सरदारों के साथ-साथ उनके बेटे एवं मेवाड़ के उत्तराधिकारी कुँवर अमर सिंह भी साथ थे। दिवेर युद्ध में विजय मिली, लेकिन महाराणा यहीं नहीं रूके।

उन्होंने अपनी सेना को दो भागों में विभाजित किया। एक का नेतृत्व अपने बेटे अमर सिंह को दिया और उन्हें भागते हुए मुगल सैनिकों का पीछा करने का आदेश दिया। इस तरह अमर सिंह ने आमेर तक मुगल सेना का पीछा किया और उन्हें मौत के घाट उतार दिया। दूसरी तरफ, आधी सेना लेकर महाराणा खुद कुंभलगढ़ को चल पड़े। वहाँ महाराणा ने मुगल सूबेदार शाहबाज खान का वध करके कुंभलगढ़ को अपने कब्जे में ले लिया।

दिवेर युद्ध और उसके बाद के अभियानों में महाराणा प्रताप सिंह और उनकी सेना ने मुगल सैनिकों का वो संहार किया कि भारत का सबसे शक्तिशाली मुगल शासक कहा जाने वाला अकबर अपनी जिंदगी में फिर कभी मेवाड़ की ओर नहीं देखा। इस तरह महाराणा प्रताप 1597 ईस्वी तक निष्कंटक राज किया।

कहा जाता है कि महाराणा प्रताप सिंह मुगल काल के इतिहास के अकेले ऐसे राजा थे, जिन्होंने मुगलों से अपनी इंच-इंच भूमि को वापस जीता था। महाराणा के स्वर्गारोहण के बाद उनके पुत्र महाराणा अमर सिंह ने भी मुगलों के खिलाफ अपना अभियान जारी रखा। कहा जाता है कि मोही अभियान के बाद अकबर को मान सिंह पर शक हो गया था कि वे महाराणा के खिलाफ परोक्ष मदद कर रहे हैं।

घर से निकली हिंदू नाबालिग छात्रा को रेप के बाद फरियाद ने चलती ट्रेन के आगे फेंका, जबरन कराया था धर्मांतरण-7 महीने से कर रहा था परेशान: FIR की डिटेल

उत्तर प्रदेश के बरेली में एक मुस्लिम युवक ने हिन्दू नाबालिग का इस्लाम में मतांतरण करवा कर उसका रेप किया और फिर ट्रेन के सामने फेंक हत्या कर दी। नाबालिग का शव ट्रेन से कटने के बाद दो टुकड़ों में बंट गया। मुस्लिम युवक के नाबालिग के परिजनों ने FIR दर्ज करवाई है। उसे गिरफ्तार कर लिया गया है।

परिजनों द्वारा दर्ज करवाई गई FIR के अनुसार, फरीदपुर की रहने वाली एक 15 वर्षीय हिन्दू बालिका को पास का ही रहने वाला मुस्लिम युवक फरियाद पिछले सात महीने से परेशान कर रहा था। इसके कारण हिन्दू नाबालिग डरी हुई थी। हिन्दू नाबालिग ने अपने घर में बताया था कि फरियाद ने उसका एक माह पूर्ण इस्लाम में धर्म परिवर्तन करवा दिया है।

इलाके में नाई की दुकान चलाने वाला फरियाद हिन्दू नाबालिग को मारने की धमकी दे रहा था। वह उसके भाई को मारने की धमकी देता था। परिजनों ने FIR में बताया है कि नाबालिग अपने घर से बुधवार (8 मई, 2024) को निकली थी। नाबालिग अपने कॉलेज पढ़ाई लिखाई के काम से जा रही थी।

फरियाद हिन्दू नाबालिग को रास्ते से ही अपनी बाइक पर जबरदस्ती उठा ले गया। इसके बाद फरियाद ने हिन्दू नाबालिग के साथ दुष्कर्म किया। हिन्दू नाबालिग को इसके बाद फरियाद पास की रेलवे लाइन के पास ले गया और उसे चलती ट्रेन के सामने फेंक दिया।

चलती ट्रेन की चपेट में आने के कारण हिन्दू नाबालिग की कट कर मौत हो गई। उसका शव दो हिस्सों में बंट गया। यह घटना एक नदी के पुल पर हुई इसलिए शव पानी में भी गिर गया। मामले की सूचना मिलने पर हिन्दू नाबालिग के परिजन घटनास्थल पर पहुँचे और पुलिस को सूचना दी।

पुलिस ने मामले की सूचना मिलने के बाद फरियाद को गिरफ्तार कर लिया। फरियाद के खिलाफ हत्या, बलात्कार, POCSO और जबरन धर्म परिवर्तन करवाने समेत अन्य धाराओं में मामला दर्ज कर लिया गया है। ऑपइंडिया के पास इस मामले की FIR कॉपी मौजूद है। बरेली पुलिस मामले की जाँच कर रही है। मृतका के परिजनों ने उसका अंतिम संस्कार कर दिया है।

विवाद मैदान का, खुद के मजे के लिए KL राहुल का ‘परिवार’ घसीट लाए मीमबाज: फैन नहीं कोढ़ है वह मानसिकता जो क्रिकेटरों की बेटियों तक को नहीं छोड़ती

IPL 2024 में लखनऊ सुपरजायंट्स के कप्तान के एल राहुल और टीम के मालिक संजीव गोयनका के बीच हुई नोक-झोंक की वीडियो वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर कुछ लोग ज्ञानी बने हुए हैं। अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं। एक तरफ कुछ लोग कह रहे हैं कि संजीव गोएनका ने के एल राहुल पर चिल्लाकर बहुत गलत किया, टीम खरीदने का मतलब ये नहीं होता खिलाड़ी की इज्जत करना भूल जाएँ। वहीं कुछ ऐसे मीमबाज हैं जो खुद के मजे के लिए केएल राहुल की पत्नी अथिया शेट्टी और ससुर सुनील शेट्टी को भी घसीट लाए हैं। जैसे

पंचायत सीरीज का सीन शेयर करके दिखाया जा रहा है कि सुनील शेट्टी और आथिया शेट्टी अब बदला लेने के लिए गोएनका के घर जाएँगे।

इसके अलावा वीडियो क्लिप शेयर दिखा रहे हैं कि अथिया शेट्टी अब अपने पिता से जाकर कहेंगी कि जो उनके पति के साथ गोएनका ने किया है उसकी सजा सिर्फ मौत है।

अब संजीव गोएनका ने जो के.एल राहुल के साथ किया है वो बतौर दर्शक देखना हमारे लिए थोड़ा पीड़ादायक जरूरत है क्योंकि हम भावनात्मक नजरिए से इसे देख रहे हैं। संजीव गोएनका तो फिर भी उस टीम के मालिक हैं जिसके अच्छे प्रदर्शन न करने के कारण ऐसी वीडियो आई। गोएनका ने 2022 में 7, 090 करोड़ रुपए की बोली लगाकर लखनऊ सुपर जायंट्स फ्रेंचाइजी खरीदी थी। इसके बाद के एल राहुल को भी 17 करोड़ देकर टीम में शामिल किया था। उन्होंने के एल राहुल पर विश्वास जताया था और जब हालिया मैच में उस मालिक के मुताबिक टीम का प्रदर्शन नहीं हुआ तब उनकी नाराजगी बीच मैदान देखने को मिली।

यहाँ सवाल ये है कि गोएनका मालिक हैं और नफा-नुकसान देखते हुए उनका पारा बढ़-चढ़ रहा है और खिलाड़ी उनकी बात सुन भी रहा है क्योंकि वो जानता है कि सामने वाले व्यक्ति ने उसपर करोड़ों लगाए हैं। लेकिन, सवाल यहाँ ये है कि गोएनका जैसे व्यापार की दृष्टि से अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं… वैसे हम कौन हैं? हम किस दृष्टि से क्रिकेटरों को भला-बुला बोलने लगते हैं और किस अधिकार से हम उनके परिजनों का मजाक बनाना, उनपर मीम्स बनाना शुरू कर देते हैं?

जो भी वीडियो गोएनका और के एल राहुल के बीच बातचीत होने की सामने आई है उस पर बतौर दर्शक हमारी चर्चा इस बात पर हो सकती थी कि गोएनका को अगर कुछ कहना भी था तो कमरे के भीतर कह सकते थे, उन्हें सबके सामने एक खिलाड़ी से इस ढंग में बात नहीं करनी चाहिए थी। लेकिन, इस चर्चा की जगह के एल राहुल को सोशल मीडिया पर घसीटना और कहना कि ये बेइज्जती तो शेट्टी परिवार की है, उन्हें इसका बदला लेना चाहिए… कितना उचित है?

आज केएल राहुल को चुप देख उनके लिए आवाज उठाने वाले और गोएनका को चिल्लाता देख उनकी आलोचना करने वाले वहीं लोग हैं जिनका जुड़ाव क्रिकेट से सिर्फ दर्शक दीर्घा तक का हैं। उन्होंने न तो टीम में कुछ इन्वेस्ट किया है और न ही खिलाड़ी में। उनके लिए खेल में हार-जीत पर दुख तभी उमड़ता है जब उनका फेवरेट प्लेयर अच्छा न खेले या पसंदीदा टीम मनमुताबिक प्रदर्शन न करे। नफा-नुकसान से उनका क्या लेना-देना… लेकिन फिर भी यही लोग समय-समय पर किसी न किसी खिलाड़ी को ट्रोल करते हुए मिलते हैं।

मसलन, अगर विराट कोहली पसंद है तो महेंद्र सिंह धोनी को भला-बुरा कहेंगे और अगर धोनी पसंद है तो रैना को… दुखद बात ये है कि ज्यादातर दफा ये ट्रोलिंग सिर्फ खिलाड़ी के प्रदर्शन पर नहीं होती। इसमें परिवार के लोगों को बुरी तरह घसीट लिया जाता है। आपको याद होगा कि विराट कोहली की परफॉर्मेंस जब टीम के मुताबिक नहीं होती थी तो उसमें किस तरीके से अनुष्का शर्मा को निशाना बनाया जाता था, उन्हें पनौती कहा जाता था, माँग उठती है कि अनुष्का का स्टेडियम में आना बैन किया जाए… इतना ही नहीं, 2021 का मामला याद करिए जब विराट कोहली और अनुष्का शर्मा की मासूम बेटी को रेप की धमकियाँ तक दे डाली गई थीं, वो भी सिर्फ इसलिए क्योंकि कोहली की टीम हार गए थे।

क्या किसी क्रिकेटर की जिंदगी निजी नहीं होती, उसे अपने बारे में हो रही गलत बातों से फर्क नहीं पड़ता….युजवेंद्र चहल का मामला देखें तो शादी के बाद से हर बात पर उनकी पत्नी धनश्री तस्वीरें और वीडियो साझा करके चहल का मजाक उड़ाया जाता है। उनपर निजी टिप्पणियाँ होती हैं। दूसरे क्रिकेटरों से उनके अफेयर की अफवाहें उड़ा दी जाती हैं। इसके बाद शुभमन गिल का उदाहरण अगर देखें तो पता चलता है कि सचिन तेंदुलकर की बेटी सारा तेंदुलकर के साथ उड़ी अफेयर की अफवाहों के बाद स्टेडियम में बैठे दर्शक उनके आने पर सारा-सारा चिल्लाने लगे थे। बिना इस बात को सोचे कि रिश्ते की बात हकीकत में ऐसा है भी या नहीं।

ऐसे तमाम उदाहरण हैं जब क्रिकेटरों की ट्रोलिंग के लिए सोशल मीडिया यूजर्स ने उनकी माँ-बहन और बेटी पर निजी हमले करने से भी गुरेज नहीं किया। धोनी को भी उनकी पत्नी और बेटी के नाम पर शुरू में बहुत गलत शब्द कहे जाते थे। बाद में जब उनका प्रदर्शन ठीक हुआ तो दोबारा उनकी तारीफों के पुल बँधने लगे, तब ये बात नहीं कही गई कि इसमें परिवार की तारीफ होनी चाहिए।

निजी हमले करने की आदत करने वाले लोग गोएनका और के एल राहुल की बातचीत में अथिया शेट्टी और सुनील शेट्टी को घेरने लगे हैं। दिखाया जा रहा है कि इस घटना से सुनील शेट्टी का सिर शर्म से झुक गया है। वहीं आथिया बदला लेना चाहती हैं… आप सोचिए कि परिवार को घसीटकर इस प्रकार की ट्रोलिंग करना एक क्रिकेटर के दिमाग पर कैसी छाप छोड़ता होगा। उसके मन में क्या हमेशा ये नहीं चलता होगा कि प्रदर्शन अगर उसका ठीक नहीं था, तो फिर उसके परिजनों को क्यों कोसा गया?

क्रिकेटरों के जीवन को भी सामान्य प्रोफेशन से जोड़कर देखिए। क्या किसी दफ्तर में कर्मचारी की गलती पर उसे बाहर से कोई आकर माँ-बहन की गाली देता है। वो भी वो शख्स जिसने न उसकी पढ़ाई में खर्च किया, न उसकी नौकरी लगने में मदद की, न उसे सैलरी देता है और न ही उसकी गलती से किसी का पर्सनल नुकसान नहीं हुआ… फिर क्रिकेटरों के साथ या अन्य खिलाड़ियों के साथ ऐसा क्यों होता है, सिर्फ इसलिए क्योंकि वो पब्लिक तक पहुँचने वाले प्रोफेशन का हिस्सा हैं।

बात केएल राहुल के समय में आथिया को घसीटने की हो, कोहली के समय में अनुष्का को उलटा बोलने की हो या फिर चहल की पत्नी के कैरेक्टर पर सवाल उठाने की हो… हर बार आप देखेंगें कि सोशल मीडिया पर नारीवाद का झंडा गाड़ने वाले लोग ही समय आने पर ऐसे मुद्दों पर मीम बनाकर हँसते दिखाई देते हैं। इनके लिए महिला की इज्जत सिर्फ नैतिकता के भाषणों में सीमित होती है वरना इनका असली चेहरा तब दिखाई देता है जब अपनी नाराजगी उतारने के लिए भी ये गाली भी वो देते हैं जिसमें किसी की माँ-बहन का नाम आए। आज ऐसे ही कुंठित लोग के एल राहुल जैसे खिलाड़ियों को ये समझा रहे हैं कि किस तरीके से उन्हें रिएक्ट करना चाहिए, जबकि हकीकत ये है कि ऐसे लोगों को ये सीखने की जरूरत है कि वो खुद को कैसे खेल से दूर रखें, ताकि खेल का भविष्य बना रहे।