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प्रोपेगेंडा ‘खतरे में मुसलमान’ का, पर भारत में हिंदुओं की हिस्सेदारी 8% घटी: इस्लामी आबादी का शेयर 5 फीसदी बढ़ा, ईसाई भी फले-फूले

भारत में खतरे में मुसलमान नैरेटिव उतना ही पुराना है, जितनी पुरानी तुष्टिकरण की राजनीति है। केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार बनने के बाद इस नैरेटिव को और हवा दी गई है। शायद ही कोई दिन बीतता है जब मुस्लिम पीड़ित का प्रोपेगेंडा न चलाया जाता हो। लेकिन जमीनी हकीकत इसके ठीक उलट है। भारत की जनसंख्या में मुस्लिमों की हिस्सेदारी बढ़ी है। वहीं हिंदुओं का हिस्सा घटा है।

यह वास्तविकता एक अध्ययन से सामने आई है। इससे जुड़े आँकड़े प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद की साइट पर उपलब्ध हैं। इसमें 1950 से लेकर 2015 के बीच भारत में जनसांख्यिकी में आए बदलाव के बारे में जानकारी दी गई है।

ये अध्य्यन समझाता है कि पिछले 65 साल में हिंदू किसी के लिए खतरा नहीं बने, उलटा देश की जनसंख्या बढ़ने के बावजूद उनका प्रतिशत पहले के मुकाबले कम हुआ है। इस रिपोर्ट से वो सारे दावे भी धराशायी होते है जो ये कहते रहे कि हिंदुओं के तादाद में ज्यादा होने से मुस्लिमों पर खतरा हो सकता है।

रिपोर्ट के अनुसार, 1950 से लेकर 2015 के बीच, भारत में बहुसंख्यक आबादी में 7.82% की उलेखनीय गिरावट आई है। पहले हिंदू 84.68 फीसदी थे और अब सिर्फ 78.06 रह गए हैं। जबकि इसी अवधि के दौरान अल्पसंख्यकों की हिस्सेदारी में वृद्धि दर्ज की गई है। रिपोर्ट बताती है कि 1950 में मुस्लिम आबादी का हिस्सा 9.84 प्रतिशत था और 2015 में बढ़कर 14.09 प्रतिशत हो गया।

इसी तरह ईसाई समुदाय भी 2.24% से 2.36% (5.38%) तक पहुँचा है। सिखों की जनसंख्या में हिस्सेदारी भी 1.24% से बढ़कर 1.85% (6.58) हुई है। बौद्ध समुदाय भी 0.05% से 0.81% तक पहुँचा है। वहीं पारसी और जैनों में हिंदुओं की तरह आँकड़े में गिरते देखे गए हैं। जैनों की पहले जो संख्या 0.45% थी वो अब 0.36 हो गई है और पारसियों की 0.03% से गिरकर 0.004 तक आ गई।

रिपोर्ट में प्रकाशित अंश

अब इन आँकड़ों से यह तो स्पष्ट हो गया है कि भारत में रहने वाले हिंदू किसी के लिए खतरा नहीं रहे। अगर ऐसा होता तो अल्पसंख्यकों की संख्या में ऐसी बढ़त नहीं देखने को मिलती। इसके अलावा इस बात से ये भी साबित होता है कि हिंदू हर धर्म के प्रति सहिष्णु हैं क्योंकि भारत में कभी ऐसी साजिशों का खुलासा नहीं हुआ कि वो दूसरे मजहब के लोगों को लालच देकर अपने धर्म में परिवर्तित करवा रहे हैं… उलटा इस बात के प्रमाण जरूर हैं कि दूसरे मजहब के लोग हिंदुओं का धर्म परिवर्तन कराने के लिए बकायदा प्लान के तहत काम करते हैं औ उन्हें धर्म पथ से भ्रमित करने की कोशिश करते रहे हैं या उन्हें जबरन अपना मजहब कबूल करवाते हैं।

ऐसे प्रयासों का ही एक नतीजा रिपोर्टों के आँकड़ों में हिंदुओं की जनसंख्या में हिस्सेदारी कम होती मिलती है और दूसरे समुदाय की बढ़ी हुई। पिछले दिनों ऐसे कई मामले सामने आए जब खुलेआम इस्लामी कट्टरपंथी ने सरेआम भारत को इस्लामी मुल्क बनाने की मंशा को जगजाहिर किया, सीमाओं पर ‘मुस्लिम पट्टी’ बनाने की साजिश रची गई। भारत को शरिया के हिसाब से चलने की नसीहत दी और हिंदुओं को काफिर कहकर उनके प्रति नफरत भरी। भारत में ये स्थिति अभी के समय में भले ही चिंताजनक नहीं लग रही हो, लेकिन भविष्य में इसके नतीजे हिंदुओं के लिए बुरे हो सकते हैं।

कुछ लोग शायद सोचें समुदाय की हिस्सेदारी 7-8 फीसद कम-ज्यादा होने का बवाल नहीं मचाया जाना चाहिए। लेकिन, इस बात को गौर से समझिए कि जिस रिपोर्ट के आधार पर आपको ये पता चलता है कि भारत में बहुसंख्यक हिंदुओं की संख्या पिछले 65 सालों में कम हुई है और अल्पसंख्यक मुस्लिमों की गिनती बढ़ी है। वही रिपोर्ट के अगर कुछ और हिस्सों को पढ़ें तो देश के पड़ोसी मुल्कों में हुए जनसंख्या बदलाव की जानकारी भी आपको मिलेगी।

आपके देश में हिंदू बहुसंख्यक होने के बावजूद लगातार कम हो रहे हैं और दूसरी और अल्पसंख्यकों की संख्या बढ़ रही है। अगर ये सामान्य होता तो ऐसे आँकड़े हर देश में देखने को मिलते। मगर नहीं, आप अगर इस्लामी मुल्कों से तुलना करेंगे तो आपको पता चलेगा कि ये सामान्य बदलाव नहीं है।

बांग्लादेश की बहुसंख्यक आबादी 1950 में 76 फीसद थी, आज भी उतनी की उतनी है। लेकिन हिंदुओं के साथ ऐसा नहीं है। 1950 में उस क्षेत्र में 23% हिंदू थे और अब केवल 8% बचे हैं। इसी प्रकार से पाकिस्तान में 1950 में कुल मुस्लिमों की आबादी 84% थी और अब 93% हो गई है वो भी तब जब पाकिस्तान से 1971 में बांग्लादेश अलग हो गया है। जबकि हिंदुओं की जनसंख्या में हिस्सेदारी पाकिस्तान में 65 साल पहले 13% थी और अब सिर्फ 2% रह गई है। अफगानिस्तान में भी मुस्लिम बहुल हैं और उनमें भी 0.3 का ही लेकिन बढ़त देखने को मिली है। वो 1950 में 99.4 थे और अब 99.7 हो गए हैं।

तो ऐसा नहीं है कि जिस देश में जो समुदाय बहुसंख्यक होता है उनके आँकड़े बढ़ना-घटना सामान्य चीज है। अगर ये सामान्य होता तो भारत में भी इसकी झलक देखने को मिलती ही… या फिर उस नेपाल में जहाँ भारत की तरह हिंदुओं की आबादी घटी है। 1950 में नेपाल में हिंदुओं की संख्या 84% थी जो 2015 में 81% ही रह गई। इसके अलावा सबसे बड़ी बात जिस पर हमें विचार करने की जरूरत है वो ये है कि एक तरफ पड़ोसी मुल्कों और हमारे देश में मुस्लिमों की पॉपुलेशन लगातार बढ़ रही है और दूसरी तरफ भारत और नेपाल में हिंदुओं की तादाद तब भी घटी हुई है जब इस्लामी मुल्कों से सताए जाने के बाद वहाँ के हिंदू भी यहाँ आश्रय लेने यहाँ आ रहे हैं।

पुंछ में वायुसेना जवानों पर हमला करने वाले आतंकियों की पहचान आई सामने, पाक फौज का पूर्व कमांडो भी शामिल

4 मई, 2024 को जम्मू कश्मीर के पुंछ में वायुसेना की एक गाड़ी पर हमला करने वाले आतंकियों की पहचान हो गई है। उनकी कुछ फोटो भी सामने आई हैं। पता चला है कि हमला करने वालों में से एक आतंकी पाक फौज का पूर्व जवान है। सुरक्षाबल इनकी तलाश में लगे हुए हैं।

सामने आई जानकारी के अनुसार, पुंछ में वायुसेना के काफिले पर हमला करने वाले तीनों आतंकियों के नाम इलियास फौजी, अबू हमजा और हदून हैं। इनमें से इलियास फौजी पहले पाकिस्तान की फौज में कमांडो था और बाद में वह भारत में आतंक फैलाने आ गया। इसके अलावा अबू हमजा लश्कर-ए-तैयबा का कमांडर है।

यह तीनों आतंकी PAFF नाम के आतंकी संगठन से जुड़े हुए हैं। यह आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मुहम्मद और हिजबुल मुजाहिद्द्दीन पर शिकंजा कसने के बाद बनाया गया था। इन तीनों की तस्वीरें भी सामने आई हैं, जिनमें यह हथियार लिए हुए दिखते हैं। इनकी तलाश में सुरक्षाबल पुंछ और राजौरी के इलाके में बड़ा सर्च अभियान चला रहे हैं।

गौरतलब है कि 4 मई को पुंछ में वायुसेना जवानों की एक गाड़ी पर आतंकी हमला हुआ था। वायुसेना के जवान सीमाई इलाके से एक ट्रक में लौट रहे थे। हमले में आतंकियों ने ट्रक को अचानक घेर कर गोलियाँ बरसाईं थी। इस हमले में पाँच जवान घायल हुए थे। बाद में एक जवान विकी पहाड़े की मौत हो गई थी।

इस हमले के विषय में और भी जानकारी सामने आई है। स्थानीय लोगों ने बताया कि हमले के दिन फायरिंग लगभग 20 मिनट तक जारी रही। इस कारण से बच्चे डर गए। स्थानीयों ने बताया कि इस इलाके में वायुसेना के लोग अकसर आते थे और बच्चों को टॉफ़ी बाँटा करते थे। स्थानीयो ने बताया कि वह आतंकियों को देख नहीं पाए क्योंकि हमला घने जंगल के बीच हुआ।

इन आतंकियों की जानकारी सामने आने से एक दिन पहले मंगलवार (7 मई, 2024) को सुरक्षाबलों को कश्मीर में बड़ी सफलता मिली है। कश्मीर के कुलगाम में दो आतंकियों को सुरक्षाबलों ने मार गिराया। मारे जाने वाले आंतकियों में कमांडर बासित डार भी शामिल था। वह कश्मीरी पंडितों और सिख शिक्षक समेत पुलिस अफसर की हत्या के मामले फरार था।

गोवा के जिस 7 स्टार होटल में ठहरे थे CM केजरीवाल, उसका खर्चा दिल्ली शराब घोटाले में गिरफ्तार चनप्रीत ने उठाया: ED ने सुप्रीम कोर्ट में कहा- हमारे पास पर्याप्त सबूत

प्रवर्तन निदेशालय (ED) की गिरफ्तारी के खिलाफ दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की याचिका पर मंगलवार (7 मई 2024) को सु्प्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। सीएम केजरीवाल की गिरफ्तारी का बचाव करते हुए भारत सरकार के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) एसवी राजू ने कोर्ट में कहा कि एजेंसी के पास केजरीवाल के खिलाफ सबूत हैं। इसका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है।

न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और दीपांकर दत्ता की पीठ ने ASG राजू से पूछा कि सीएम केजरीवाल चुनाव से ठीक पहले गिरफ्तारी की कार्रवाई की आलोचना करने के हकदार हैं। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ये भी पूछ सकते हैं कि ईडी ने गवाहों से उनके बारे में सटीक सवाल क्यों नहीं पूछे और कथित तौर पर काफी पहले उनकी संलिप्तता उजागर होने के बावजूद उनकी गिरफ्तारी में देरी क्यों नहीं हुई।

इस पर राजू ने बताया कि अगर केंद्रीय एजेंसी ने प्रारंभिक जाँच के दौरान गवाहों के सामने केजरीवाल का नाम रखा होता तो यह स्पष्ट रूप से दुर्भावनापूर्ण होता। ASG राजू ने यह तर्क दिया कि अपने तरीके से जाँच करना जाँच अधिकारी का विशेषाधिकार है। इसमें समय लगता है, क्योंकि गवाह जो कहते हैं उसकी पुष्टि करनी होती है और अवैध लाभ आदि का खुलासा करना होता है।

एएसजी ने आगे कहा, “हमारे पास सबूत है कि गोवा चुनाव के दौरान अरविंद केजरीवाल के ठहरने का पूरा खर्च इसी चनप्रीत सिंह ने चुकाया था। हमने पाया है कि गोवा चुनाव के दौरान अरविंद केजरीवाल गोवा में ग्रैंड हयात नामक 7-सितारा भव्य होटल में रुके थे। उस समय उनके बिलों का कुछ हिस्सा दिल्ली सरकार के सामान्य प्रशासनिक विभाग द्वारा भुगतान किया गया था।”

ASG राजू ने आगे कहा, “इसका कुछ हिस्सा चनप्रीत सिंह द्वारा भुगतान किया गया था। चनप्रीत सिंह वही व्यक्ति हैं, जिसने नकदी प्राप्त की। यह उसके बैंक खातों से स्पष्ट है। उस नकदी का भुगतान आंशिक रूप से गोवा चुनाव के दौरान गोवा के एक 7-सितारा होटल में अरविंद केजरीवाल के बिलों का भुगतान करने के लिए किया गया था। हमें इसके दस्तावेजी सबूत मिले हैं।”

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, ASG राजू ने कहा कि चनप्रीत सिंह को भी गिरफ्तार कर लिया गया है। उन्होंने कहा, “ऐसा नहीं है कि यह राजनीति से प्रेरित मामला है। जहाँ तक ​​ईडी का सवाल है, इसका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है। हमारा सबूतों से मतलब है और हमारे पास प्रमाण हैं।”

इस सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि वह चुनाव को ध्यान में रखते हुए आम आदमी पार्टी (AAP) के प्रमुख अरविंद केजरीवाल को अंतरिम जमानत देने पर विचार कर सकता है, लेकिन शर्त यह होगी कि वह आधिकारिक कार्य नहीं करेंगे। यह मामला गुरुवार या अगले सप्ताह सूचीबद्ध होने की संभावना है।

फर्जी आधार कार्ड बनवाकर केरल में रह रहे हैं 50000 घुसपैठिए, पश्चिम बंगाल-असम में बनवाई नकली पहचान: मिलिट्री इंटेलिजेंस के हवाले से रिपोर्ट में बताया

फर्जी आधार कार्ड के सहारे 50,000 से अधिक विदेशी घुसपैठिये केरल में रह रहे हैं। यह घुसपैठिये बांग्लादेश, म्यांमार और श्रीलंका से आए हैं। बड़ी संख्या में भारतीय अपराधी भी देश छोड़ने के लिए फर्जी आधार कार्ड का सहारा ले रहे हैं। यह खुलासा मिलिट्री इंटेलिजेंस ने किया है।

ऑनमनोरमा के अनुसार, यह फर्जी आधार कार्ड असम के नगांव और मधुपुर, पश्चिम बंगाल में दिनाजपुर और नादिया तथा केरल के पेरम्बवूर में आधार कार्ड सेंटरों पर बनाए गए हैं। इन आधार कार्ड सेंटरों में सुरक्षा में सेंधमारी की गई है। यहीं से बड़ी मात्रा में घुसपैठियों ने फर्जी आधार कार्ड जारी करवा लिए हैं और केरल में रह रहे हैं।

इससे पहले केन्द्रीय सुरक्षा एजेंसियाँ भी इस बात का अंदेशा जता चुकी हैं कि घुसपैठिये फर्जी आधार कार्ड के सहारे केरल में घुस रहे हैं। यह जानकारी सामने आने के बाद सीमा सुरक्षा बल (BSF) ने सीमाई इलाकों में अपनी सतर्कता बढ़ा दी है। कोस्ट गार्ड ने भी अपनी गश्त को बढ़ाया है।

रिपोर्ट में सामने आया है कि आधार कार्ड बनाने के सिस्टम को अपने हिसाब से चला कर फर्जी दस्तावेज जारी किए जा रहे हैं। केरल में मौजूद आधार कार्ड सेंटर को झारखंड और पश्चिम बंगाल में बैठे लोग चला रहे हैं। ऐसा ही एक मामला केरल के मलप्पुरम में सामने आया जहाँ एक आधार कार्ड सेंटर को पश्चिम बंगाल से चलाया जा रहा था।

रिपोर्ट में बताया गया है कि केरल में ऐसे इलाकों में नकली आधार कार्ड काफी मात्रा में बन रहे हैं जहाँ बाहर से आने वाले कामगार काम करते हैं। यहाँ गलत सूचनाओं के सहारे आधार कार्ड बन रहे हैं। इनमें फोटो बदल कर कई आधार कार्ड बनाए जाने की बात सामने आई है।

इससे पहले भी रिपोर्ट में सामने आ चुका है जिसमें अवैध रोहिंग्या घुसपैठिये बांग्लादेश सीमा से घुस कर भारत में मृतकों की पहचान का इस्तेमाल कर रहे थे। वह मृतकों के नाम से पहचान पत्र बनवा रहे थे। इस मामले में NIA ने भी जाँच की थी। तमिलनाडु में कुछ लोगों को इस मामले में गिरफ्तार किया गया था।

मुस्लिम वोट बैंक के कारण चुना वायनाड, दोनों सीटों से जीते तो रायबरेली छोड़ेंगे राहुल गाँधी: कॉन्ग्रेस के वफादार पत्रकार ने खोल दी ‘शर्त’

लोकसभा चुनाव 2024 में राहुल गाँधी 2 सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं। वो केरल के वायनाड से दोबारा चुनावी मैदान में हैं, जहाँ से वो मौजूदा लोकसभा सांसद हैं, तो दूसरी सीट है रायबरेली। रायबरेली सीट पर अब तक सोनिया गाँधी चुनाव लड़ती रही हैं। इस बार राहुल गाँधी रायबरेली से चुनाव मैदान में हैं और अब जो जानकारी सामने आ रही है, वो ये है कि रायबरेली की जनता ने ‘अगर’ राहुल गाँधी को चुन भी लिया, तो वो रायबरेली की जनता के नहीं होंगे, क्योंकि ‘मुस्लिम वोटों’ की मजबूरी में वो वायनाड के ही सांसद बने रहना पसंद करेंगे।।

बता दें कि वायनाड में वोटिंग के बाद यूपी में बीजेपी को ‘टक्कर’ देने की ‘मजबूरी’ में उन्हें यूपी से चुनाव लड़ना पड़ रहा है। हालाँकि अपनी परंपरागत सीट अमेठी से पिछला चुनाव हार चुके राहुल गाँधी दोबारा वहाँ से चुनाव लड़ने की हिम्मत नहीं जुटा सके, ऐसे में उन्होंने रायबरेली लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने की घोषणा की। ऐसे में सभी लोगों का एक ही सवाल था कि ‘अगर’ राहुल गाँधी वायनाड और रायबरेली दोनों ही जगह से चुनाव जीतते हैं, तो फिर वो किस सीट से इस्तीफा देंगे। शायद इस सवाल का जवाब आ चुका है। कॉन्ग्रेस के ‘वफादारों’ में गिने जाने वाले ‘पत्रकार’ आदेश रावल ने जाने-अनजाने इसका खुलासा कर दिया है।

लल्लनटॉप से बातचीत में देश रावत ने ‘अंदर की बात‘ बताई और कहा, “राहुल गाँधी ने रायबरेली में चुनाव लड़ने के लिए शर्त रखी थी। क्योंकि खड़गे साहब ने कहा कि अगर हमने उत्तर प्रदेश की सीटें छोड़ दी तो खराब मैसेज जाएगा, क्योंकि पाँच चरणों के मतदान अभी बाकी है। इसके जवाब में राहुल गाँधी ने कहा कि अगर मैं दोनों सीट जीत जाता हूँ, तो मैं वायनाड नहीं छोड़ूँगा। चुनाव के दौरान अगर मीडिया ने मुझसे पूछा कि मैं किस सीट से बना रहूँगा, तो मैं झूठ नहीं बोल पाऊँगा, तो मैं कह दूँगा कि मैं रायबरेली छोड़ दूँगा।” इस बात पर सहमति बनने के बाद ही उन्होंने रायबरेली से चुनाव लड़ने के लिए हामी भरी।

बता दें कि लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान कॉन्ग्रेस के आंतरिक सर्वे में बताया गया था कि राहुल गाँधी अमेठी में स्मृति ईरानी से हार जाएँगे, इसके बाद कॉन्ग्रेस एक सुरक्षित सीट की तलाश कर रही थी। तब कॉन्ग्रेस पार्टी की ओर से राहुल गाँधी के लिए मुस्लिम बहुल वायनाड सीट को चुना गया था। टाइम्स नाउ की रिपोर्ट में एक स्टिंग ऑपरेशन दिखाया गया था, जिसमें कॉन्ग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता कहा कि अमेठी में उस समय कॉन्ग्रेस के सबसे बड़े नेता रहे राहुल गाँधी को अमेठी में प्रेशर झेलना पड़ रहा है। ऐसे में कॉन्ग्रेस को सुरक्षित सीट ढूँढने की जरूरत है। इसका मतलब ये था कि राहुल गाँधी को वायनाड से चुनाव लड़ना चाहिए, क्योंकि इस सीट पर हिंदू अल्पसंख्यक और मुस्लिम बहुसंख्यक हैं, जिससे राहुल गाँधी के लिए जीतना आसान हो जाएगा।

इस बार राहुल गाँधी उत्तर भारत से चुनाव नहीं लड़ रहे थे, वहीं, सोनिया गाँधी ने राज्यसभा जाने का फैसला कर लिया था, जबकि प्रियंका गाँधी के चुनाव लड़ने पर सस्पेंस बना हुआ था। ऐसे में अमेठी-रायबरेली से गाँधी परिवार से किसी का न होना पार्टी को नुकसान पहुँचा रहा था। यही वजह है कि कॉन्ग्रेस की टॉप लीडरशिप ने तय किया कि राहुल गाँधी को रायबरेली से चुनाव लड़ना ही पड़ेगा, क्योंकि वही सुरक्षित सीट है।

ऐसे में राहुल गाँधी को नामांकन दाखिल करने के आखिरी दिन से एक दिन पहले कॉन्ग्रेस की ओर से तैयार किया गया और तीन 3 मई को उन्होंने नामिनेशन दाखिल किया। 3 मई को नामांकन दाखिल कराया गया। इस सीट से बीजेपी ने उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री दिनेश प्रताप सिंह को मैदान में पहले ही उतार दिया था। हालाँकि आदेश रावल के खुलासे के बाद साफ हो गया है कि रायबरेली की जनता ने अगर ‘गलती’ से राहुल गाँधी को चुन लिया, तो उसे तुरंत ही फिर से लोकसभा चुनाव झेलना पड़ेगा, साथ ही कॉन्ग्रेस के किसी दूसरे प्रत्याशी को भी, क्योंकि राहुल गाँधी अल्पसंख्यक बहुल सीट वायनाड की जगह रायबरेली सीट से इस्तीफा दे देंगे।

शहजादे के ‘फिलॉसफर अंकल’ को काली चमड़ी से नफरत, इसलिए राष्ट्रपति चुनाव में द्रौपदी जी का कॉन्ग्रेस ने विरोध किया: पीएम मोदी बोले- ये देश को गाली दी गई

लोकसभा चुनाव 2024 में तीन चरण के मतदान पूरे हो चुके हैं। सात चरणों में होने वाले मतदान के अगले चरणों के लिए सभी दलों ने चुनाव प्रचार तेज कर दिए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार (8 मई 2024) को तेलंगाना में करीमनगर के बाद वारंगल में जनसभा को संबोधित किया। इस दौरान भी उन्होंने कॉन्ग्रेस और राहुल गाँधी पर जमकर निशाना साधा।

पीएम मोदी ने कहा, “मैं सोच रहा था कि (राष्ट्रपति) द्रौपदी जी, जिनकी बहुत अच्छी प्रतिष्ठा है, आदिवासी समाज की बहुत प्रतिष्ठित बेटी हैं। उनको हम राष्ट्रपति बना रहे हैं तो कॉन्ग्रेस उनको हराने के लिए इतनी मेहनत क्यों कर रही है? कॉन्ग्रेस आदिवासियों को नाराज क्यों कर रही है? मैं सोचता रहता था, लेकिन मुझे समझ में नहीं आ रहा था।”

राहुल गाँधी पर हमला बोलते हुए उन्होंने कहा, “मुझे लगता था कि ठीक है कि ये शहजादे का दिमाग ऐसा है तो शायद द्रौपदी जी का विरोध कर रहा है। उनको चुनाव में हराने के लिए निकल पड़ा है, लेकिन मुझे आज पता कि ये कॉन्ग्रेस पार्टी, जो एक आदिवासी बेटी है, उसको हराने के लिए क्यों मैदान में उतरी थी। आज मुझे पता कि अमेरिका में ये शहजादे के अंकल रहते हैं।”

प्रधानमंत्री ने कहा, “ये शहजादे के अंकल उनके फिलॉसफर एंड गाइड है। जैसे आजकल क्रिकेट में थर्ड अंपायर होता है ना कि कोई कंफ्यूजन हो तो थर्ड अंपायर को पूछते हैं। वैसे ही ये शहजादे कोई कंफ्यूजन होता है तो उनसे सलाह लेते हैं। ये शहजादे के फिलॉसफर एंड गाइड अंकल ने बड़ा रहस्य खोला है। उसने कहा है कि जिनकी चमड़ी का रंग काला होता है, ये सब अफ्रीका के हैं।”

कॉन्ग्रेस नेता सैम पित्रोदा के बयान को लेकर राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस पर हमला बोलते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने आगे कहा, “मतलब आप सबको… मेरे देश के अनेक लोगों को… चमड़ी के आधार पर इतनी बड़ी गाली दे दी। अब जाकर मुझे समझ में आया कि ये चमड़ी का रंग देखकर उन्होंने मान लिया कि द्रौपदी मुर्मू भी अफ्रीकन है। इसलिए उनकी चमड़ी का रंग काला है तो उनको हराना चाहिए।”

सभी भारतीयों को भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण का वंशज बताते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आगे कहा, “ये सोच आज पहली बार मुझे पता चला कि ये दिमाग कहाँ काम कर रहा है इनका। ये देश को कहाँ ले जाएँगे? अरे चमड़ी का रंग कोई भी हो, हम तो श्रीकृष्ण की पूजा करने वाले लोग हैं, जिनकी चमड़ी का रंग यहाँ के सब लोगों जैसा था।”

बता दें कि सैम पित्रोदा ने कहा है कि देश में एक गुट है जो भारत में संस्कृति, सभ्यता, भगवान राम, हनुमान सबकी बातें करता है और दूसरा गुट वो है जो कहता है कि उनके पूर्वजों ने इस देश की आजादी के लिए काम किया है। पाकिस्तान ने मजहब के आधार पर मुल्क बनाया आज उनकी हालत देख लीजिए क्या है…।”

उन्होंने आगे कहा था, “हम भारत जैसे विविधतापूर्ण देश को एक साथ रख सकते हैं, जहाँ पूर्व के लोग चीनी जैसे दिखते हैं, पश्चिम के लोग अरब जैसे दिखते हैं, उत्तर के लोग शायद गोरे जैसे दिखते हैं और दक्षिण के लोग अफ्रीकी जैसे दिखते हैं।” सैम पित्रोदा की यह टिप्पणी अब सोशल मीडिया पर हो रही वायरल है। वहीं, पीएम मोदी ने भी पित्रोदा के इसी बयान को लेकर हमला बोला है। 

बलात्कारियों को चुन-चुन कर मारने वाले ‘हरक्युलिस’, हत्या के बाद गले में लटका देता था तख्ती: ‘सीरियल किलर’ की पहचान के लिए देशभर में चला अभियान

बांग्लादेश में हरक्युलिस नाम के एक हत्यारे ने कई बलात्कारियों को खोज-खोज कर मारा। उसने बलात्कार के आरोपितों को मार कर उनके गले में एक तख्ती टांगनी चालू कर दी थी। उसने तीन बलात्कार के संदिग्धों की हत्या कर दी थी। लोगों को आश्चर्य में डालने वाला मामला 2019 में सामने आया था।

इस आदमी की पहचान अब तक सामने नहीं आई है। उसका किरदार लोगों को एक फिल्म ‘डार्क नाईट’ की याद दिला रहा है। उसने हत्या करके लाशों पर सन्देश भी छोड़े, और खुद को ग्रीक हीरो ‘हरक्युलिस’ बताया। इससे मामला और गहरा हो गया।

यह पूरी कहानी 7 जनवरी, 2019 को एक घटना से शुरू हुई। इस दिन आशुलिया जिले की रहने वाली एक फैक्ट्री कर्मचारी ने पुलिस को अपने बलात्कार की शिकायत की, इसके कुछ ही घंटों के बाद उसकी लाश उसके घर में मिली। इस मामले में रिपन नाम का कपड़ा मिल कर्मचारी और उसके तीन साथियों को संदिग्ध माना गया।

हरक्युलिस ने 17 जनवरी को रिपन को मार दिया और बदला ले लिया। रिपन की लाश पर एक नोट भी छोड़ा गया। इस पर लिखा, “मैं बलात्कार के मामले में मुख्य आरोपित हूँ। मैं एक बलात्कारी हूँ। बलात्कार के लिए यह मेरी सजा है। सावधान रहें। सावधान रहें – हरक्युलिस।” इसके बाद इसी तरह की हत्याओं की जाँच चालू हुई।

यह तख्ती मारे गए लोगों के गले में टंगी मिली।

इसके बाद पुलिस को 1 फरवरी को जलकाठी जिले के राजापुर में कूड़ेदान में एक शव मिलने की सूचना मिली। मृतक के सिर पर गोली लगने के निशान थे, उसके सर पर गोली के निशान थे। पुलिस को मृतक के गले में एक संदेश लटका हुआ मिला, इसमें लिखा था, “मैं रकीब हूँ। मैं भंडारिया की एक मदरसा में पढ़ने वाली लड़की (अनाम) का बलात्कारी हूँ। बलात्कार की यही सजा है। बलात्कारियों सावधान रहो – हरक्युलिस।” यह बलात्कार के एक आरोपित रकीब मोल्लाह का शव था।

गौरतलब है कि एक महीने पहले ही बांग्लादेश की पुलिस ने एक 13 वर्षीय बालिका की पहचान करके उसके साथ हुई भयानक घटना के बारे में पता लगाया था, जब वह 14 जनवरी को जब वह अपनी दादी से मिलने जा रही थी, तो दो पुरुषों ने उसका यौन शोषण किया था।

यह अपराध पिरोजपुर जिले के भंडारिया क्षेत्र में हुआ। बालिका के पिता ने 17 जनवरी को इस मामले में स्थानीय पुलिस को सूचना दी थी, बालिका के पिता ने बाद में रकीब हुसैन मोल्ला और सजल जमादार को इस मामले में आरोपित बनाया था।

इसके बाद रकीब का शव भी सामने आया। इस चौंकाने वाली घटना के साथ, ‘हरक्युलिस’ की चर्चा पूरे देश में फ़ैल गई। यह मामला सामने आने पर मीडिया से इसकी पड़ताल की और पाया कि एक और हरक्युलिस के नाम से ही जाने जाने वाले एक सीरियल किलर ने इससे पहले भी हत्याएँ की थीं।

जाँच के पूरे ना होने तक अधिकारियों का मानना ​​था कि हरक्युलिस ने दो बार हत्याएँ की थी और रकीब की हत्या रिपन के बाद की गई थी। उन्हें जल्द पता चला कि रकीब असल में तीसरा मामला था। रकीब से एक सप्ताह पहले, हरक्युलिस ने रकीब के दोस्त सजल को भी सजा दी थी।

पुलिस ने इसे एक अलग मामला माना था। पुलिस ने बताया कि सजल के सर में गोलियाँ मारी गई थीं और सर पर धारदार हथियार से वार किए गए थे। सजल के शव पर भी एक तख्ती मिली थी जिसमें लिखा था- मैं सजल हूँ। मैं एक बलात्कारी हूँ। यह मेरे अपराध की सज़ा है। सावधान, बलात्कारियों। सावधान – हरक्युलिस।

हरक्युलिस कौन था?

हरक्युलिस के बारे में पता लगाने के लिए देश भर की पुलिस ने अभियान चलाया लेकिन हत्या के मामले बढ़ते रहे। ‘हरक्युलिस’ मामले के प्रभारी अधिकारी एम. जाहिदुल इस्लाम ने यह बात मानी कि वह इस हरक्युलिस को पहचान नहीं पाए हैं। इन हत्याओं को पाँच साल होने के बाद भी हरक्युलिस की पहचान, उसने हत्याएँ क्यों की, ठिकाने के बारे में कोई जानकारी नहीं है।

हरक्युलिस की बड़े स्तर पर सराहना हुई है। हालाँकि, कुछ लोगों ने कानून को हाथ में लेकर काम करने को लेकर उसकी निंदा भी की। मानवाधिकार संगठन ऐन-ओ-सलिश की कार्यकारी प्रमुख शीपा हाफ़िज़ ने प्रेस को दिए एक बयान में उसे चेतावनी दी थी। शीपा हाफ़िज़ ने ऐसे मामलों में लोगों और न्यायपालिका को सावधानी से काम करने की चेतावनी दी। “हमें इस बात पर बहुत ध्यान से विचार करना होगा कि ऐसी घटनाएँ क्यों हो रही हैं।”

पुलिस महानिरीक्षक शोहेल राणा ने इस मामले में कहा, “पुलिस को यह मालूम नहीं है कि इस तरह की गुप्त हत्याओं के पीछे कौन है। हम उसकी पहचान करने की कोशिश कर रहे हैं।” हालाँकि, जिनके घर के लोग मारे गए थे, उन्होंने दावा किया कि मृतकों को पुलिस उठा कर ले गई थी। पुलिस ने इन आरोपों का खंडन किया। हालाँकि कुछ समय के बाद यह हत्याएँ रुक गईं और यह मामला हमेशा के लिए दब गया।

कौन हैं रायता किंग सैम पित्रोदा, पोछते-पोछते कॉन्ग्रेस ही हो रही साफ: इंदिरा-राजीव से लेकर सोनिया-राहुल तक बने रहे खास

भारतीयों के रंग रूप की तुलना चीनियों और अफ्रीकियों से करने वाले सैम पित्रोदा अक्सर कॉन्ग्रेस का महिमामंडन करने में कुछ न कुछ अनाप-शनाप बोल ही जाते हैं। लोग उन्हें कभी बड़बोला बोलते हैं तो कभी कॉन्ग्रेस पार्टी का सबसे बड़ा चमचा कहते हैं। इसके अलावा आधिकारिक तौर पर उनकी पहचान आज के समय में इंडियन ओवरसीज कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष के तौर पर होती है। लेकिन असल में सैम पित्रोदा हैं कौन और कैसे वो कॉन्ग्रेस पार्टी में आए… आइए इसे बताते हैं।

खुद को सैम पित्रोदा बताने वाले कॉन्ग्रेस नेता का असली नाम सत्यनारायण गंगाराम पित्रोदा है जिन्होंने अमेरिका में पैसे कमाने के लिए अपने भारतीय नाम को त्यागा था और इसका जिक्र वो एक इंटरव्यू में भी कर चुके हैं। उन्होंने गुजरात से फिजिक्स और इलेक्ट्रॉनिक्स में ग्रेजुएशन करने के बाद और अमेरिका में मास्टर्स की थी और फिर 1965 से टेलिकॉम इंडस्ट्री में हाथ आजमाया। इसके बाद 1975 में उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक डायरी का आविष्कार किया था।

कॉन्ग्रेस से कैसे जुड़े सैम पित्रोदा

अपना काम भारत में भी एक्सपैंड करने की चाह में सैम पित्रोदा ने अपने दोस्त से कहकर इंदिरा गाँधी के साथ अपनी मीटिंग फिक्स करवाई थी। इस मीटिंग के लिए उन्होंने अपनी प्रेजेंटेशन भी तैयार रखी थी लेकिन किसी कारणवश जब इंदिरा गाँधी उनसे मिलने में लेट हो गईं तो उनकी मुलाकात राजीव गाँधी से हुई।

इस दौरान पित्रोदा ने राजीव गाँधी को ग्रामीण दूरसंचार, डिजिटल स्विचिंग के बारे में थोड़ा बताया और तब राजीव गाँधी को यह विचार आया कि टेलीफोन की तादाद बढ़ाने के बजाय उसकी पहुँच पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए। उन्होंने तब इंदिरा गाँधी से कहा कि हमें प्रौद्योगिकी को डिजिटल बनाने की जरूरत है और इसके लिए कुछ दूसरे देशों से नहीं खरीदना होगा। हमारे देश में खुद इतना टैलेंट है।

इंदिरा गाँधी ने पित्रोदा के इस आइडिया को सुन उनकी तारीफ की और यहीं से उनकी कॉन्ग्रेसियों से करीबियाँ बढ़ गईं। अमेरिकी नागरिकता मिलने के बावजूद उन्होंने इंदिरा गाँधी के कहने पर भारत का रुख किया और यहाँ की नागरिकता तक ले ली। लेकिन इसके बाद जब 31 अक्तूबर 1984 को इंदिरा गाँधी की हत्या हुई तो राजीव गाँधी की सरकार सत्ता में आई और सैम पित्रोदा को पूरा समर्थन दिया।

राजीव गाँधी ने अपनी सरकार में पित्रोदा को अपना सलाहकार बनाया गया। भारत में इंफोर्मेशन इंडस्ट्री में बदलाव के लिए दोनों मिलकर काम किया। राजीव ने उन्हें टेलीकॉम, वाटर, शिक्षा जैसे छह टेक्नोलॉजी मिशन का हेड बनाया था। बाद में राजीव गाँधी की हत्या हुई तो सैम पित्रोदा फिर अमेरिका लौट गए। उन्होंने एक बार फिर से शिकागो से अपने काम की शुरुआत की और कई कंपनियों को लॉन्च किया। 1995 में सैम पित्रोदा को इंटरनेशनल टेलीकम्युनिकेशन यूनियन WorldTel इनिशिएटिव का पहना चेयरमैन बनाया गया।

भारत में उनकी वापसी तब हुई जब 2004 में कॉन्ग्रेस की सरकार बनी। तत्कालीन पीएम मनमोहन ने सैम पित्रोदा को फिर से भारत आने का न्योता दिया। इसके बाद मनमोहन सरकार ने उन्हें नेशनल नॉलेज कमीशन का अध्यक्ष बनाया। 2009 में जब यूपीए सरकार आई तो सैम पित्रौदा को तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का सलाहकार बनाया गया।

इसके बाद मोदी सरकार 2014 में आई और सैम पित्रोदा कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी की छवि बनाने में लग गए। उन्हें कई बार राहुल गाँधी के साथ विदेशों में भी देखा गया और उन्हें सलाह देते हुए भी। कई मौके ऐसे भी आए जब उनकी चर्चा विवादित बयानों के कारण से हुई।

सैम पित्रोदा के विवादित बयान

उनका सबसे विवादित बयान 2019 में सामने आया था। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना करते हुए सिख दंगों के लिए कहा था- “अब क्या है 84 का? भाजपा ने 5 साल में क्या किया, उसकी बात करे। 84 हुआ तो हुआ, आपने क्या किया?” पित्रोदा ने इस बयान पर बाद में माफी जरूर माँगी थी लेकिन उनकी भाषा के कारण लोग अब भी उनपर सवाल उठाते हैं।

इसी तरह पित्रोदा ने पाकिस्तान के बालाकोट में भारतीय सेना द्वारा की गई एयरस्ट्राइक का भी विरोध किया था। पित्रोदा ने कहा था कि मुंबई में भी हमला हुआ था और हमारी सरकार भी तब प्रतिक्रिया दे सकती थी और अपने विमान भेज सकती थी, लेकिन यह सही दृष्टिकोण सही नहीं है। उन्होंने कहा कि यह गलत है कि कुछ लोगों की गलती के चलते हम पाक के प्रत्येक नागरिक को दोषी ठहराएँ।

इसके बाद कुछ दिन पहले पित्रोदा ने अमेरिका में लागू विरासत टैक्स तो भारत में शुरू करने की बात कहकर कॉन्ग्रेस के लिए मुसीबत खड़ी कर दी थी और अब उन्होंने भारत की विविधता पर बात करते हुए भारत के लोगों की तुलना दूसरे देशों के लोगों से करके विवाद खड़ा कर दिया है। उन्होंने साफ तौर पर पूर्वोत्तर के लोगों को चीनी जैसा कहा और साउथ के लोगों को अफ्रीकनों के समान।

स्कूल टाइम में नमाज पढ़ने नहीं जा सकेंगे राजस्थान के शिक्षक, मोबाइल ले जाने पर बैन: शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने फोन को बताया बीमारी

राजस्थान के स्कूलों में मोबाइल फोन ले जाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। विद्यालय में मोबाइल रखने की इजाजत सिर्फ प्रधानाध्यापक को होगी। इसकी घोषणा शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने की है। उन्होंने कहा कि स्कूलों में बच्चों को बेहतर शिक्षा देने के लिए टीचरों को हिदायत भी दी है। इसके साथ ही अब शिक्षक स्कूल छोड़कर नमाज पढ़ने भी नहीं जा सकते।

शिक्षा मंत्री मदन दिलावर का कहना है कि सरकारी स्कूलों में मोबाइल पर पूरी तरह से बैन रहेगा। उन्होंने कहा कि स्कूलों में शिक्षक मोबाइल पर पूरे दिन शेयर मार्केट और न जाने क्या-क्या देखते रहते हैं। शिक्षक उसी में उलझे रहते हैं और बच्चों पर उनका ध्यान ही नहीं रहता है। इससे बच्चों की पढ़ाई का भारी नुकसान होता है।

मदन दिलावर ने कहा कि अगर कोई सरकारी शिक्षक अपने साथ मोबाइल लेकर आता है तो उसे अपना फोन प्रधानाध्यापक के पास जमा करना होगा। वहीं, सिर्फ प्रिंसिपल को अपने साथ मोबाइल रखने की इजाजत होगी। शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने मोबाइल फोन को एक बीमारी जैसा बताया है।

इतना ही नहीं, नमाज के नाम पर स्कूल से गायब होने वाले शिक्षकों पर भी लगाम कस दिया है। मदन दिलावर ने कहा कि नमाज और पूजा-पाठ के नाम पर स्कूल छोड़कर जाने वाले शिक्षकों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने कहा है कि अगर कोई शिक्षक धार्मिक कार्यक्रम में शामिल होना चाहता है तो वह छुट्टी लेकर जा सकता है।

दिलावर ने कहा कि शिक्षकों के गायब होने से बच्चों की पढ़ाई में बाधा उत्पन्न होती है। शिक्षा मंत्री ने कहा कि सरकारी स्कूलों में शिक्षक भैरूजी, बालाजी की पूजा और नमाज पढ़ने के नाम पर स्कूल नहीं छोड़ेंगे। यदि उनको जाना है तो छुट्टी लेकर जाएँ। उन्होंने यह भी कहा है कि बच्चों को पढ़ाने से पहले शिक्षक खुद पढ़कर जाएँ।

शिक्षा मंत्री ने कहा कि जो भी इन बातों का ध्यान नहीं रखेगा, उनके खिलाफ निलंबन या बर्खास्तगी की कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने कहा कि स्कूल शिक्षा में जो पहले से आदेश, निर्देश और नियम बने हुए हैं उन सब की पालना करने का प्रयास कर रहे हैं। शिक्षा मंत्री ने कहा कि सरकारी स्कूलों में खेल के मैदानों पर हो रखे अतिक्रमणों को हटाया जाएगा।

फोटो ओसामा बिन लादेन की, वीडियो ISIS कत्लेआम की… हाई कोर्ट ने अब्दुल रहमान को दी जमानत, कहा- मोबाइल में जेहादी कंटेंट रखने से कोई आतंकी नहीं होता

दिल्ली हाई कोर्ट ने आतंकवाद से जुड़े UAPA के एक मामले में सोमवार (6 मई 2024) को सुनवाई करते हुए मुस्लिम युवक अम्मार अब्दुल रहमान को जमानत दे दी। उसे खूंखार आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट (ISIS) से जुड़े होने के जुर्म में गिरफ्तार किया गया था। हाई कोर्ट ने कहा कि मोबाइल में आतंकी ओसामा बिन लादेन की तस्वीरें, जिहाद प्रचार और ISIS के झंडे रखने से कोई आतंकी नहीं हो जाता।

न्यायमूर्ति सुरेश कुमार कैत और न्यायमूर्ति मनोज जैन की खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि आरोपित के मोबाइल में आतंकवादी ओसामा बिन लादेन की तस्वीरें, जिहाद प्रचार सामग्री और ISIS झंडे जैसी आपत्तिजनक सामग्री मिलने और कट्टरपंथी या मुस्लिम उपदेशक के लेक्चर को सुनना आरोपित को एक प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन के सदस्य के रूप में ब्रांड करने के लिए पर्याप्त नहीं होगा।

कोर्ट ने आगे कहा, “आज के इलेक्ट्रॉनिक युग में इस प्रकार की आपत्तिजनक सामग्री वर्ल्ड वाइड वेब (www) पर स्वतंत्र रूप से उपलब्ध है और केवल इसे एक्सेस करना और यहाँ तक कि इसे डाउनलोड करना भी यह मानने के लिए पर्याप्त नहीं होगा कि उसने खुद को ISIS के साथ जोड़ा था। कोई भी जिज्ञासु मन ऐसी सामग्री तक पहुँच सकता है और यहाँ तक कि उसे डाउनलोड भी कर सकता है। हमारे लिए वह कृत्य अपने आप में कोई अपराध नहीं प्रतीत होता है।”

हाई कोर्ट की खंडपीठ ने कहा कि इस तरह का कृत्य व्यक्ति की मानसिकता के बारे में ‘अंतर्दृष्टि’ दे सकता है, लेकिन जब कोई दंडात्मक प्रावधान के तहत, जिसमें किसी की स्वतंत्रता छीन ली जाती है, ऐसे में जमानत देना भी एक प्रकार का अपवाद बन जाता है। अभियोजन पक्ष को समझने योग्य और ठोस सामग्री के रूप में कुछ अतिरिक्त सबूत की आवश्यकता है।

इसमें आगे कहा गया है कि केवल इसलिए कि वह व्यक्ति ‘मध्य-पूर्व और इज़रायल-फिलिस्तीन संघर्ष से संबंधित समाचारों’ फॉलो कर रहा था या ‘कट्टरपंथी मुस्लिम उपदेशकों के नफरत भरे भाषणों को देख-सुन रहा था’ यह मानने के लिए पर्याप्त नहीं होगा कि वह एक प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन की विचारधारा को आगे बढ़ाने में सक्रिय भूमिका अदा कर रहा था।

पीठ ने कहा कि इस मामले में UAPA की धारा 38 और 39 का प्रयोग गलत प्रतीत होता है। UAPA की धारा 38 एक आतंकवादी संगठन की सदस्यता से संबंधित अपराध है और धारा 39 एक आतंकवादी संगठन को दिए गए समर्थन से संबंधित अपराध है। इसके बाद कोर्ट ने अम्मार अब्दुल रहमान को जमानत दे दी। हालाँकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि उसकी टिप्पणियाँ अस्थायी स्वभाव की हैं।

अम्मार अब्दुल रहमान को NIA ने UAPA की विभिन्न धाराओं के तहत अगस्त 2021 में गिरफ्तार किया था। उस पर ISIS से जुड़े होने और आतंकी संगठन की कट्टरपंथी विचराधारा को आगे बढ़ाने का आरोप लगाया था। हालाँकि, निचली अदालत ने दिसंबर 2023 में आरोपित को जमानत देने से इनकार कर दिया था। इसके बाद निचली अदालत के इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी।