इस दूसरे कार्यकाल में इन आतंकियों को हीरो बनाने से रोकना एक प्राथमिकता होनी चाहिए। जिसने निर्दोषों को क़त्ल के लिए बंदूक उठा ली, वो मानव नहीं है। जो मानव नहीं है, उसके न तो अधिकार हैं, न परिवार।
रोजाना 17 लाख बच्चों का पेट भरने वाली एक संस्था को सिर्फ़ इसीलिए निशाना बनाया जा रहा है क्योंकि बच्चों को लहसुन-प्याज नहीं दिया जाता। सरकार द्वारा निर्धारित सभी मानकों पर खड़ा उतरने के बावजूद 'मिड डे मील' में जाति घुसेड़ कर इसे बदनाम किया जा रहा है।
पढ़ाई पूरी करने के पहले ही आतंकी समूहों के संपर्क में आने के बाद आदिल MBA खत्म कर जॉर्डन से होता हुआ 2013 में तुर्की जा पहुँचा। वहाँ NGO में काम करने के बहाने पहुँचने के बाद उसने एक डच (हॉलैंड निवासी) महिला से निकाह भी कर लिया, और उसे भी जिहाद में शामिल कर लिया।
तर्क हों तो आप लेख की शुरुआत विदेशी लेखक का नाम लेकर करें या फिर 'लगा दिही न चोलिया के हूक राजा जी' से, मुद्दे पर फ़र्क़ नहीं पड़ता। कुतर्क हों तो आप अपने पोजिशन का इस्तेमाल दंगे करवाने के लिए भी कर सकते हैं, कुछ लोग वही चाह रहे हैं।
शहनाज के परिवार वाले दूसरे धर्म के लड़के गौरव से शादी करवाने के लिए तैयार नहीं थे और शहनाज की मर्जी के बगैर 10 फरवरी को उसकी शादी कहीं और करवा रहे थे। इसलिए उसने 6 फरवरी को घर छोड़ दिया और दिल्ली के जंगपुरा के शेल्टर हेम में शरण लिया।
गिरफ़्तार होने के बाद मौलाना ने बताया कि जब वो बच्चा था तब वो ख़ुद भी यौन शोषण का शिकार हुआ था। मौलाना ने कहा कि उसने एक व्यक्ति से बदला लेने के लिए उसकी बेटी का बलात्कार किया क्योंकि कभी उसने भी उसका (यूसुफ़) यौन उत्पीड़न किया था।
जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने मारे गए आतंकी बुरहान वानी को 'साहब' कह कर संबोधित किया है। आतंकी को इज्ज़त देने के लिए उमर अब्दुल्ला की ख़ासी आलोचना हो रही है। अब्दुल्ला ने एक ब्रिटिश मीडिया एजेंसी से बात करते हुए...
कुल 8 नए मंत्री बनाए गए, जिनमें लोजपा के पशुपति कुमार पारस के सांसद बन जाने के बाद खाली हुई जगह भी शामिल है, लेकिन भाजपा के अलावा लोजपा के भी किसी विधायक को मंत्री नहीं बनाया गया।
ओवैसी ने धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर भी कहा था, “भारत का क़ानून, संविधान हमें इजाज़त देता है कि हम अपने धर्म का पालन करें। जब भारत के प्रधानमंत्री मंदिर जा सकते हैं तो हम भी गर्व के साथ मस्जिद जा सकते हैं।”
पिछले साल घाटी में आतंकरोधी अभियानों की शुरुआत न होने के कारण, रमज़ान महीने के दौरान केवल 11 आतंकवादी मारे गए थे और वह भी कुपवाड़ा और हंदवाड़ा ज़िलों में।