डीएस बिंद्रा AIMIM के दिल्ली महासचिव हैं। इन्होंने अपना फ्लैट बेचकर शाहीन बाग में खाने-पीने का इंतजाम कराया, जिसे मीडिया गिरोह ने 'मुस्लिम-सिख एकता' की चासनी में डूबो कर बेचा। आम आदमी पार्टी, कॉन्ग्रेस और PFI के समर्थन के बाद अब...
यही शाहीन बाग़ की भीड़ हिन्दुओं की आस्था के प्रतीक चिन्हों को गाली देती देखी गई। क्या हिन्दुओं की आस्था को ठेस लगाने के लिए गाय पर चुटकुले बनाने से लेकर हिन्दुओं की कब्र खोदने की धमकी देने वाला यह शाहीन बाग़, एक शव यात्रा के लिए बैरिकेड खोलकर इंसानियत का उदाहरण बन सकता है?
"राज्य सरकार आरक्षण देने के लिए बाध्य नहीं है। कोई भी मूलभूत अधिकार ऐसा नहीं है, जो प्रमोशन में आरक्षण के किसी व्यक्तिगत दावे को मान्यता प्रदान करता हो। कोर्ट राज्य सरकारों को प्रमोशन में आरक्षण देने के लिए आदेश जारी नहीं कर सकता।"
“हमारी विधानसभा बाबरपुर में वोटिंग खत्म होने पर सभी EVM मशीन स्ट्रांग रूम भेज दी गई उसके बाद सरस्वती विद्या निकेतन पोलिंग स्टेशन पर एक अधिकारी EVM के साथ पकड़ा गया है। मैं इलेक्शन कमिशन से अपील करता हूँ कि इस पर तुरंत करवाई किया जाए।”
जैसा कि आज के दौर में हम देखते हैं, टीवी न्यूज़ चैनलों के बीच किसी भी ख़बर को पहले दिखाने के लिए बड़ी प्रतिस्पर्द्धा चलती है और इसके लिए वो हर तरह के हथकंडे अपनाते हैं। लाजिमी है, पहले एग्जिट पोल्स के डेटा दिखाने के लिए भी उनमें होड़ मची होगी। ऐसे में जल्दबाजी में गड़बड़ी हुई होगी।
शाहीन बाग सहित पूरी दिल्ली में लोगों ने पहचान पत्र दिखाते हुए अपने मताधिकार का प्रयोग किया। सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में यूजर्स ने चुटकी ली कि जो लोग कागज दिखाने से इनकार करते हैं आज वह पहचान पत्र लेकर लाइन में लगे हैं।
राजनैतिक पंडितों के दावे तब भी आज की तरह ही AAP के हक में थे। आप ऐसे ही अति आत्मविश्वास में थी। तब भी वोटों की गिनती 11 तारीख को ही हुई थी। जब नतीजे आए तो सारे दावे, सारा यकीन रेत की महल की तरह ढह गया था।
पिछली बार की तुलना में भाजपा की सीटों में काफी इजाफा होता दिख रहा है। लेकिन एग्जिट पोल की माने तो वह सरकार बनाने में कामयाब नहीं रहेगी। आप को आसानी से बहुमत मिलता दिख रहा है।
यहाँ पर सवाल उठता है कि केजरीवाल ने ऐसा क्यों कहा कि वोट देने से पहले पुरुषों से अवश्य चर्चा करें? क्या उनको आज की नारी पर भरोसा नहीं है? क्या वो पढ़ी-लिखी-समझदार नहीं है? क्या वो भला-बुरा देखकर समझ नहीं सकती? क्या महिलाओं में इतनी समझदारी नहीं है कि वो अपनी समझ से वोट दे सकें?
चोपड़ा ही बताएँगे कि कश्मीर के गुनाहों और गुनहगारों से ऐसा परदा क्यों किया? न तो कश्मीरी हिन्दुओं की पीड़ा कहीं भी है, न ही नरसंहार का ख़ौफ़नाक मंजर... लगता है ‘कश्मीर की कली’ पार्ट 2 बनाना चाह रहे थे।