Friday, November 27, 2020
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हिन्दुओं! उपकार मानो कि शाहीन बाग़ ने एक शव यात्रा के लिए रास्ता दिया है, वो चाहते तो…

बैरिकेडिंग खोलकर हिन्दुओं को शव यात्रा के लिए रास्ता देने अगर इंसानियत की मिसाल पेश कर रहे हैं तो फिर लोहरदगा में CAA समर्थन रैली में नीरज प्रजापति क्यों मार डाले गए? पटना में हनुमान मंदिर क्यों तोड़ा गया? काँवड़ियों पर हर साल हमले क्यों होते हैं?

दिल्ली में विधानसभा चुनाव भी लगभग समाप्त हो चुके हैं, अब सिर्फ इसके नतीजे आने बाकी हैं। इस बीच, करीब दो महीने बाद भी शाहीन बाग़ उसी जज्बे के साथ खड़ा नजर आ रहा है। कम से कम सोशल मीडिया पर तो यही चर्चा है। आज ही शाहीन बाग़ की एक वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर की जा रही है। इस वीडियो में कुछ हिन्दुओं द्वारा शाहीन बाग़ से एक शव यात्रा ले जाया जा रहा है और कुछ लोग वहाँ पर सड़क बंद करने के लिए लगाई हुई बैरिकेडिंग को खोलकर शवयात्रा को जाने के लिए कहते हुए देखे जा रहे हैं।

सोशल मीडिया पर यह वीडियो फ़ौरन एक विशेष समूह द्वारा दिखाया जाने लगा। दिलचस्प बात यह है कि इस वीडियो को शेयर करने वाले वही लोग हैं, जिन्हें शायद ही अभी तक यह पता हो कि कुछ CAA विरोधियों ने झारखंड में कुछ ही दिन पहले नीरज प्रजापति की सिर्फ इस कारण से हत्या कर दी थी, क्योंकि वो CAA का समर्थन करते थे।

शव यात्रा के लिए रास्ता देने वाला यह वीडियो शेयर करते हुए बताया जा रहा है कि शाहीन बाग़ में CAA विरोध प्रदर्शनकारियों ने हिन्दुओं की शव यात्रा के लिए बैरकेडिंग खोली। उनका कहना है कि यह वीडियो उन देश द्रोहियों को दिखाया जाना चाहिए, जो ‘शाहीन बागियों’ को देश द्रोही बताते हैं।

शव यात्रा को रास्ता देने का यह संदेश वही लोग दे रहे हैं, जो यदा-कदा आज भी नेहरुवादी सभ्यता से चली आ रही ‘गंगा-जमुनी’ तहजीब और किसी कथित ‘सेक्युलर राष्ट्र’ की भावनाओं को जीवित होने के प्रमाण देते रहते हैं। यहाँ पर यह बात याद रखने लायक है कि यही ‘यदा-कदा’ तब आता है, जब एक हजार में से कोई एक ऐसी घटना में देश के ‘सेक्यूलरों’ का योगदान दिखाने वाली कोई घटना सामने आती है। वरना जो सिर्फ कट्टरपंथी सोच और किसी ‘किताब’ के प्रभाव में आज भी हलाला और तीन तलाक जैसे बुनियादी विषयों से बाहर नहीं निकलना चाहते, उनका सेक्युलर राष्ट्र के प्रति क्या नजरिया होगा, यह सिर्फ आत्म चिंतन की ही बात है।

लेकिन मुझे शव यात्रा के लिए बैरकेडिंग खोलकर इंसानियत का संदेश देने वाली बात में गंगा-जमुनी जैसी दोमुही बात भी नजर नहीं आती। यह तो स्पष्ट तौर पर एक स्वामी अपने गुलामों को संदेश देते हुए कह रहा है- ‘देखो, वह इंसानियत का मसीहा हिन्दुओं की शव यात्रा के लिए आज बैरिकेडिंग खोल रहा है, और इसके लिए हिन्दुओं को शाहीन बाग़ की इस उदार भीड़ का कृतज्ञ होना चाहिए।’

उपनिवेशवाद के समय में इस तरह की ही इंसानियत ब्रिटिशर्स भारतीयों पर ‘यदा-कदा’ कर दिया करते थे। उत्तरखंड के इतिहास में नजर दौडाएँ तो अंग्रेज ‘कुली-बेगार’ जैसी प्रथाओं को कुछ इसी तरह से सृजन कर लेते थे। लोगों को समझाया जाता था कि उन्हें ‘लॉर्ड फलाना’ की बग्गी को अपने कन्धों पर ढोने का स्वर्णिम अवसर मिल रहा है। इसलिए उसे इस उपकार के बदले लगान देना चाहिए। ग्रामीण लोगों को इसके लिए लालच दिया जाता था कि इसी बहाने उन्हें उस सड़क पर चलने का सौभाग्य भी प्राप्त होगा, जहाँ लार्ड फलाना शाम को टहला करते हैं।

बेशक, शव यात्रा को रास्ता देने वाली यह भीड़ एक उदार भीड़ की तरह नजर आ रही है, जबकि वास्तव में यह उदार है नहीं। क्योंकि यह भीड़ तो एक दक्षिणपंथी एक्टिविस्ट गुंजा कपूर को सिर्फ इसलिए इस्लाम अपनाने की सलाह देते देखी गई क्योंकि वह शाहीन बाग़ नाम के एक स्वतंत्र पृथक राष्ट्र में उन्हीं के जैसे लिबास पहनकर चली गई थी।

यही शाहीन बाग़ की भीड़ हिन्दुओं की आस्था के प्रतीक चिन्हों को गाली देती देखी गई। क्या हिन्दुओं की आस्था को ठेस लगाने के लिए गाय पर चुटकुले बनाने से लेकर हिन्दुओं की कब्र खोदने की धमकी देने वाला यह शाहीन बाग़, एक शव यात्रा के लिए बैरिकेड खोलकर इंसानियत का उदाहरण बन सकता है?

सवाल यह है कि बैरिकेडिंग खोलकर हिन्दुओं को एक शव यात्रा के लिए रास्ता देने का एहसान करने वाले ये लोग अगर ऐसा कर के इंसानियत की मिसाल पेश कर रहे हैं तो फिर झारखंड में इसी नागरिकता संशोधन कानून के समर्थन में रैली कर रहे नीरज प्रजापति को लोहे की रॉड से मार देने वाली मुस्लिम भीड़ किस बात का सन्देश देती है? आज तक किसी सेक्युलर विचारक को यह कहते नहीं सुना गया है कि हिन्दुओं के मंदिरों को तोड़ने वाले और उन्हें अपवित्र करने वाले मुस्लिमों की भीड़ ने इस्लामिक जिहाद और मजहबी कट्टरता का संदेश दिया है।

जब हिन्दुओं के काफिलों पर पत्थरबाजी की जाती है, जब काँवड़ों पर हमले किए जाते हैं, जब किसी इंसान को सिर्फ इस कारण नौकरी से निकलवा दिया जाता है, क्योंकि वो उस नागरिकता संशोधन कानून (CAA) का समर्थक था, जिसका कि यही शाहीन बाग़ विरोधी!

लेकिन नीरज प्रजापति की मृत आत्मा आज भी यह समझ पाने में अक्षम ही होगी कि इस्लामी नारे लगाते हुए उन्हें जान से मार देने वाले लोगों की इंसानियत और एक शव यात्रा के लिए रास्ता देने वालों के बीच शाहीन बाग़ की इस इंसानियत को किस तरह से पृथक करे।

शाहीन बाग़ की नाकामयाबी का यह कितना बड़ा सन्देश है कि करीब दो महीने से, हर आम नागरिक की रोजाना दिनचर्या में खलबली मचाकर, देश की राजधानी के एक बड़े भू-भाग पर कब्जा जमाकर, देश को एक इस्लामिक राज्य बनाने का स्वप्न देख रहे ये उपद्रवी लोग, रोजाना हिन्दुओं से आजादी, जिन्ना वाली आजादी, फ़क़ हिन्दू और इस्लामिक नारे लगाने के बाद आज यह कहते देखे जा रहे हैं कि शव यात्रा को रास्ता देने से देशवासियों को कुछ सीखना चाहिए।

यदि हिन्दुओं की शव यात्रा के लिए रास्ता देने से हिन्दुओं को शाहीन बाग का उपकार मानना चाहिए तो फिर ऐसे संदेशों से हमें शायद शुक्र मनाना चाहिए कि CAA विरोधियों ने अभी तक यह नहीं कहा कि विरोध प्रदर्शन के लिए एक बड़े एरिया का स्वामित्व लेकर चंद आजादी के चितेरों ने कट्टर हिन्दुओं को अपनी कट्टर धार्मिक प्रणाली की खातिर, हिंसा भड़काने के उद्देश्य से शाहीन बाग़ के ही रास्ते को चुना, फिर भी आज़ादी के नारे गुनगुनाते हुए इन शांतिप्रिय लोगों ने बैरिकेड नहीं, बल्कि देश के हर CAA-विरोधी के दिल का दरवाजा खोलकर यह दिखा दिया है कि इस शाहीन बाग़ का दिल आखिर कितना बड़ा है।

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आशीष नौटियाल
पहाड़ी By Birth, PUN-डित By choice

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