उनके पास 60,000 रुपए कैश में है और 2.4 करोड़ रुपए शेयर्स में हैं। सोनिया गाँधी ने इस हलफनामे में यह भी बताया है कि उनके रिलायंस हाइब्रिड बॉन्ड्स में भी शेयर्स हैं। उन्होंने पोस्टल सेविंग्स में 72 लाख इन्वेस्ट कर रखा है।
रायबरेली में सोनिया क़ाफ़िला रोड शो के दौरान रास्ता ही भटक गया था, इससे जाम लग गया। ऐन वक्त पर अधिकारियों ने स्थिति को संभाला। सोनिया गाँधी 4 बार यहाँ से जीत दर्ज कर चुकी हैं। उनका मुक़ाबला भाजपा के दिनेश प्रताप सिंह से है।
टीवी चैनलों के एंकर जो कर रहे हैं, क्या वो प्रोपेगेंडा नहीं है। हर रात चालीस मिनट तक सरकार की हर योजना को बेकार बताना भी प्रोपेगेंडा ही है। आखिर चुनाव आयोग इसके लेवल प्लेइंग फ़ील्ड का निर्धारण करेगा कैसे? क्या मीडिया संस्थानों के लिए कोई तय क़ायदा है जहाँ चुनाव आयोग सुनिश्चित कर सके कि इतने मिनट इस पार्टी की रैली, और इतने मिनट इस पार्टी की रैली कवर की जाएगी?
अमेठी को डिजिटल बनाने और 'मेड इन अमेठी' का सपना साकार करने से लेकर यहाँ के लोगों को सुगम स्वास्थ्य सुविधाएँ मुहैया कराने तक, स्मृति ईरानी ने हार कर भी अमेठी के लिए वो किया, जो पिछले 70 वर्षों में जीते हुए जनप्रतिनिधि भी न कर सके।
जिस समय राहुल गाँधी अपना नामांकन भरने के बाद मीडिया से बात कर रहे थे उस दौरान उनके सिर पर 7 बार किसी ने हरी लेजर से निशाना साधा। कॉन्ग्रेस ने संभावना जताई कि यह लेजर लाइट किसी स्नाइपर की बंदूक से हो सकती है।
चंद्रशेखर का कॉन्ग्रेस को समर्थन देना दिखाता है कि वह केवल खुद को दलितों का हितैषी बताकर समाज में एक जाना-माना चेहरा बनकर उभरना चाहते थे। अब जबकि अस्पताल में भर्ती होने पर राज बब्बर और प्रियंका गाँधी जैसे बड़े लोग उनका हाल लेने पहुँच रहे हैं तो वो दलितों के मुद्दों को दरकिनार करके सिर्फ़ अपनी राजनीति साध रहे हैं।
2017-18 में कन्हैया कुमार की आय 6,30,360 रुपए जबकि 2018-19 में उनकी आय 2,28,290 रुपए की रही। पिछले दो साल में बेरोजगारी के बावजूद 8 लाख रुपए से ज्यादा कमाने वाले कन्हैया अपने घर में एक गैस सिलिंडर तक नहीं खरीद कर दे पाते हैं अफसोस! श्रवण कुमार की धरती पर शायद ऐसे ही बेटों को 'कपूत' की संज्ञा दी जाती होगी।
पहले विवेक ओबरॉय अभिनीत मोदी फिल्म पर रोक लगवाने के बाद विपक्षी दलों को यह तर्क सूझा कि अगर फिल्म पर रोक लगवाई जा सकती है, तो फिर आदमी पर क्यों नहीं। इसके तुरंत बाद ही गिरोह सक्रिय हो उठा।
60 सालों तक राज करने वाली पार्टी की मजबूरी है कि वो सत्ता से दूर है, और यह दूरी रात-दिन बढ़ती जा रही है। सत्ता पाने की यही लालसा उससे नए-नए हथकंडे आजमाने का दुष्चक्र चलवाती है। लेकिन जब बड़े और नामी चेहरे भी इस धूर्तता का हिस्सा बनने लगते हैं तो अफ़सोस होता है।