भारत की बात

रेजांग ला का युद्ध: जब 123 भारतीय जवानों ने 3000 चीनी सैनिकों को दी मात, 1300 की लाशें बिछा दी

भारतीय सेना के पराक्रम की अप्रतिम मिसाल है, रेजांग ला दर्रा का युद्ध। जिसके बाद लता मंगेशकर ने गाया, 'एक-एक ने दस को मारा'।

हर दिन मंदिर में काटी गाय, गिराए दसियों मंदिर: मोइनुद्दीन चिश्ती और उसके शागिर्दों का सच

निजामुद्दीन चिश्ती जैसों के 'शांतिपूर्ण सूफीवाद' का मिथक खूब फैलाया गया है। लेकिन वास्तविकता यही है कि ये जिहाद को बढ़ावा देने, 'काफिरों' के धर्मांतरण के लिए ही भारत आए थे।

ओडिशा: महानदी में 11 साल बाद उभरा 500 वर्ष पुराना गोपीनाथ मंदिर, देखने को जुटी भीड़

ओडिशा में महानदी के जल में 500 साल पुराने गोपीनाथ मंदिर के अवशेष दिखाई दिए हैं। कहा जा रहा है इससे पहले यह मंदिर 11 साल पहले नजर आया था।

पुष्यमित्र शुंग: सनातन संस्कृति का ध्वजवाहक, जिसका स्वर्णकाल वामपंथी प्रोपेगेंडा की भेंट चढ़ गया

पुष्यमित्र शुंग ने भारतवर्ष में क्षीण हो रहे सनातन धर्म की पुनर्स्थापना का स्वप्न देखा था। इसकी वजह से वामपंथी इतिहासकारों ने उसे नरसंहारक और कट्टर के तौर पर पेश किया।

ऑपरेशन ब्लू स्टार: जब सेना को स्वर्ण मंदिर पर चढ़ाने पड़े टैंक, जिसके कारण मारी गईं इंदिरा गाँधी

लेफ्टिनेंट जनरल केएस बरार को जाना मनीला था, लेकिन कमान मिली ऑपरेशन ब्लू स्टार की जो 6 जून 1984 को खत्म हुआ।

ब्राह्मणों को बदनाम करने से लेकर इस्लामी आक्रांताओं के महिमामंडन तक: NCERT पुस्तकों में गड़बड़ी पर नीरज अत्री से बातचीत

ब्राह्मणों को बदनाम करने से लेकर इस्लामी आक्रांताओं के महिमांडन तक, NCERT की पुस्तकों में गड़बड़ी पर अजीत भारती की नीरज अत्री से बातचीत।

गोवा का हाथ काटरो खम्भ: मौत का वह स्तम्भ जहाँ जेवियर के अनुयायी हिन्दुओं को काट दिया करते थे

भारत के अधिकांश शहरों में “संत” ज़ेवियर के नाम पर स्कूल-कॉलेज हैं। लेकिन गोवा में एक स्तंभ ऐसा भी है जिसे उसके अनुयायियों ने हिंदुओं के रक्त से सींचा था।

…जब सावरकर ने लेनिन को लंदन में 3 दिन के लिए दी थी शरण

वीर सावरकर ने एक बार लंदन में लेनिन को 3 दिन तक शरण दी थी। कम्युनिस्ट यह स्वीकार नहीं कर पाते कि सावरकर को कई प्रमुख वामपंथियों ने वीर कहने का साहस किया था।

जब अंग्रेज सावरकर को कोल्हू में बैल की जगह जोतते थे, जब गाँधी अफ्रीका से भारत लौटे भी नहीं थे: कहानी कालापानी की

उनसे छिलके कूटवाए जाते। कोल्हू का बैल बना कर दिन भर जोता जाता। उन्हें रस्सी बाँटने का काम दिया जाता। प्रताड़ना ऐसी कि आत्महत्या के ख्याल आते।

मई 19, 1961 की त्रासदी: जब 11 बंगालियों ने मातृभाषा के लिए अपनी जान गँवा दी थी

असम के सिलचर में राज्य की सरकारी भाषा के रूप में असमिया के अलावा बांग्ला को भी शामिल करने की माँग को लेकर आज ही के दिन वर्ष 1961 में आंदोलन हुआ था। सिलचर रेलवे स्टेशन पर मई 19, 1961 को आंदोलनकारियों पर पुलिस ने गोली चलाई थी, जिसमें 11 लोग मारे गए थे।

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