Wednesday, October 21, 2020
Home विविध विषय भारत की बात 'मैं एक महान दिवंगत आत्मा की माँ हूँ': जब अब्दुल्ला के मित्र नेहरू ने...

‘मैं एक महान दिवंगत आत्मा की माँ हूँ’: जब अब्दुल्ला के मित्र नेहरू ने बलिदानी मुखर्जी की माँ की माँग ठुकराई

"जंगल में शेर को आज तक किसी ने राजमुकुट पहनाया है? वह तो स्वयं राजा है। डॉक्टर मुखर्जी जहाँ होंगे, वो वहीं अपनी आभा बिखेरेंगे। वो जहाँ होंगे, वहाँ विद्वता की बात करते हुए राष्ट्रप्रेम पर बल देंगे।"

जब किसी की मौत होती है तो पुलिस जाँच करती है। किसी की मौत के साथ जब जनभावनाएँ जुड़ी हों या जाँच से कोई संतोषजनक निष्कर्ष न निकला हो तो स्वतंत्र एजेंसियों से जाँच की भी व्यवस्था है। लेकिन, जनसंघ के संस्थापक डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत की जाँच नहीं हो सकी।

मंगलवार (जून 23, 2020) को जब उनकी मौत को 67 साल होने आए हैं, देश सवाल तो पूछेगा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मौत की स्वंतंत्र जाँच क्यों नहीं कराई?

जून 2019 में भाजपा अध्यक्ष (तब कार्यकारी) जेपी नड्डा ने कहा था कि वो जवाहरलाल नेहरू ही थे, जिन्होंने डॉ मुखर्जी की मृत्यु की जाँच कराने से इनकार कर दिया था। बकौल नड्डा, इतिहास साक्षी है कि नेहरू ने पूरे देश की माँग को ठुकरा दिया था। बता दें कि हिन्दू राष्ट्रवाद के पुरोधाओं में से एक डॉ मुखर्जी ने ही 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना की थी, जो बाद में भाजपा रूप में परिवर्तित हुआ।

श्यामा प्रसाद मुखर्जी की माता श्रीमती जोगमाया ने भी पंडित नेहरू को एक भावपूर्ण पत्र लिखकर अपने पुत्र की मृत्यु की निष्पक्ष जाँच की माँग की थी। लेकिन, एक माँ की माँग को भी नहीं माना गया। उनकी माँ जोगमाया ने नेहरू को भेजे पत्र में लिखा था कि वो एक महान दिवंगत आत्मा की माता हैं और ये माँग करती हैं कि स्वतंत्र व सक्षम व्यक्तियों द्वारा अविलम्ब एक पूर्णरूपेण निष्पक्ष और खुली जाँच होनी चाहिए।

उन्होंने आगे नेहरू को चेताते हुए कहा था कि यह एक महान दुःखान्त घटना है, जो स्वतंत्र भारत में घटी है और भारत की जनता ज़रूर निर्णय करेगी कि इसका कारण क्या था और इस बारे में आपकी सरकार ने क्या भूमिका निभाई? उन्होंने लिखा था कि किसी भी बड़े से बड़े व्यक्ति ने ही ये कृत्य क्यों न किया हो, क़ानून उसे सज़ा दे। साथ ही जनता सावधान हो जाए ताकि किसी और माँ को स्वतंत्र भारत में इस तरह से आँसू न बहाना पड़े।

डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 50 के दशक की शुरुआत में ‘एक विधान, एक प्रधान, एक निशान’ आंदोलन शुरू किया था। जम्मू कश्मीर में तब ‘प्रधानमंत्री’ का पद होता था। संविधान, झंडा और दूसरे राज्यों के लोगों के वहाँ न बसने का नियम तो हालिया अनुच्छेद 370 के प्रावधान निरस्त होने तक मौजूद थे। डॉ मुखर्जी इसी भेदभाव को ख़त्म करने के पक्ष्धर थे, जो तब असंभव सा लगता था। मई 11, 1953 को जम्मू कश्मीर में घुसने पर उन्हें गिरफ़्तार किया गया था।

श्रीनगर के जेल में ही उनकी मृत्यु हुई, जिसकी वजह हार्ट अटैक को बताया गया। तब शेख अब्दुल्ला कश्मीर के प्रधानमंत्री थे, जो उनके शव पर माल्यार्पण करने भी आए थे। अब जब पश्चिम बंगाल में भाजपा मजबूत बन कर उभर रही है और वहाँ अगले साल विधानसभा चुनाव में वामपंथी दलों के प्रभाव के बावजूद पहली बार कड़ी टक्कर होने जा रही है, डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी आज एक बार फिर से भारतीय राजनीति में प्रासंगिक हो उठे हैं।

तृणमूल कॉन्ग्रेस और वामपंथी कैडरों में इसकी छटपटाहट देखी जा सकती है क्योंकि मार्च 2018 में जिस तरह से कोलकाता में जाधवपुर यूनिवर्सिटी के माओवादी समर्थक छात्रों ने डॉ मुखर्जी की प्रतिमा को तोड़ डाला, उससे वामपंथी दलों की बेचैनी प्रदर्शित होती है। उससे कुछ दिनों पहले ही त्रिपुरा में भाजपा की सरकार बनने के बाद जनता द्वारा लेनिन की प्रतिमा गिराई गई थी। लेकिन, बंगाल में बंगाल के ही सपूत की प्रतिमा को भी वामपंथियों ने नहीं बख़्शा।

डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी को जवाहरलाल नेहरू ने पहले अंतरिम केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किया था क्योंकि कॉन्ग्रेस और हिन्दू महासभा के अधिवेशन साथ-साथ होते थे और महात्मा गाँधी की भी यही सलाह थी। उनके बारे में एक बार दिवंगत प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने बड़ी अच्छी बात कही थी। उनकी पार्टी छोटी थी लेकिन वो बिना बनाए ही विरोधी दल के नेता बन गए थे। किसी ने डॉक्टर मुखर्जी से कहा कि आपको तो नेता बनाया नहीं गया है, चुना नहीं गया है फिर भी आप विरोधी दल के मान्य नेता कैसे?

उस समय युवा अटल बिहारी वाजपेयी ने इस प्रश्न का जवाब देते हुए कहा- “जंगल में शेर को आज तक किसी ने राजमुकुट पहनाया है? वह तो स्वयं राजा है। डॉक्टर मुखर्जी जहाँ होंगे, वो वहीं अपनी आभा बिखेरेंगे। वो जहाँ होंगे, वहाँ विद्वता की बात करते हुए राष्ट्रप्रेम पर बल देंगे।” जब डॉ मुखर्जी गिरफ़्तार हुए थे तब वाजपेयी उनके साथ ही थे। उन्होंने वाजपेयी को वापस भेज दिया था।

उन्होंने कहा था कि अटल जाओ और दुनिया को बताओ कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने परमिट सिस्टम को तोड़ दिया है। तभी तो उनके बलिदान के कुछ ही दिनों बाद नेहरू को कश्मीर में परमिट सिस्टम हटाने के लिए मजबूर होना पड़ा। तब क्षुब्ध अटल बिहारी वाजपेयी ने एक कविता लिख कर अपना दर्द प्रकट किया था। ‘जम्मू की पुकार‘ शीर्षक की इस कविता की कुछ पंक्तियाँ आज भी झकझोड़ती है:

अत्याचारी ने आज पुन: ललकारा, अन्यायी का चलता है दमन दुधारा।
आँखों के आगे सत्य मिटा जाता है, भारत माता का शीश कटा जाता है।
क्या पुन: देश टुकड़ों में बँट जाएगा? क्या सबका शोणित पानी बन जाएगा?
कब तक जम्मू को यों ही जलने देंगे? कब तक जुल्मों की मदिरा ढलने देंगे?
चुपचाप सहेंगे कब तक लाठी गोली? कब तक खेलेंगे दुश्मन खून से होली?
प्रह्लाद-परीक्षा की बेला अब आई, होलिका बनी देखो अब्दुल्लाशाही।
माँ-बहनों का अपमान सहेंगे कब तक? भोले पाण्डव चुपचाप रहेंगे कब तक?
आओ खण्डित भारत के वासी आओ, कश्मीर बुलाता, त्याग उदासी आओ?

जब डॉक्टर मुखर्जी ने अपना बलिदान दिया, तब अटल बिहारी वाजपेयी उनके राजनीतिक सचिव थे। वो तब तक सांसद भी नहीं बने थे और पत्रकारिता में अनवरत व्यस्त रहा करते थे। डॉक्टर मुखर्जी के बलिदान के बाद वीर सावरकर ने कहा था कि एक महान देशभक्त और महान सांसद शिष्ट नष्ट हो गया है। कहते हैं, उनके बलिदान के 8-9 महीनों बाद शेख अब्दुल्ला की गिरफ़्तारी से देश चकित हो गया था।

नेहरू और अब्दुल्ला अनन्य मित्र थे, ऐसे में लोग ये सवाल ज़रूर पूछ रहे थे कि क्या अगर डॉक्टर मुखर्जी का बलिदान नहीं हुआ होता तो शेख अब्दुल्ला की गिरफ़्तारी संभव होती? डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी की पाँच सूत्री माँगों में एक ये भी था कि पाकिस्तान से प्रताड़ित होकर आए हिन्दुओं और सिखों के रहन-सहन की व्यवस्था की जाए। आज दशकों बाद सीएए के रूप में उनका ये स्वप्न पूरा हुआ।

सरदार पटेल ने भी इस बात की भविष्यवाणी की थी कि जवाहरलाल नेहरू अब शेख अब्दुल्ला की मैत्री के मोहजाल में फँसे हुए हैं लेकिन समय आते ही उन्हें अब्दुल्ला का असली रंग दिख जाएगा। महाराजा हरि सिंह भी अब्दुल्ला के इस चाल-चरित्र से वाकिफ थे, तभी उन्होंने उसे जेल में बंद किया था। लेकिन, नेहरू भारत में सत्ता हस्तांतरण के दौर के बीच भी महाराजा का विरोध करने कश्मीर दौड़ पड़े – अपने मित्र अब्दुल्ला के लिए!

आज समय ने सिद्ध कर दिया है कि नेहरू गलत थे और श्यामा प्रसाद मुखर्जी व सरदार पटेल जैसे लोग दूरद्रष्टा थे। जब ‘स्टेचू ऑफ यूनिटी’ सरदार सरोवर बाँध के पास भारत का गर्व बन कर खड़ा है, अनुच्छेद 370 के प्रावधानों के निरस्त होने और सीएए के अस्तित्व में आने से पता चलता है कि डॉक्टर मुखर्जी की नीतियाँ भविष्य के भले के लिए थीं। अफ़सोस ये कि उनकी मृत्यु की निष्पक्ष जाँच नहीं हो सकी।

  सहयोग करें  

एनडीटीवी हो या 'द वायर', इन्हें कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

अनुपम कुमार सिंहhttp://anupamkrsin.wordpress.com
चम्पारण से. हमेशा राइट. भारतीय इतिहास, राजनीति और संस्कृति की समझ. बीआईटी मेसरा से कंप्यूटर साइंस में स्नातक.

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

राहुल गाँधी ने किया जातीय हिंसा भड़काने के आरोपित PFI सदस्य सिद्दीक कप्पन की मदद का वादा, परिवार से की मुलाकात

PFI सदस्य और कथित पत्रकार सिद्दीक कप्पन के परिवार ने इस मुलाकात में राहुल गाँधी से पूरे मामले में हस्तक्षेप की माँग कर कप्पन की जल्द रिहाई की गुहार लगाई।

पेरिस: ‘घटिया अरब’ कहकर 2 बुर्के वाली मुस्लिम महिलाओं पर चाकू से हमला, कुत्ते को लेकर हुआ था विवाद

पेरिस में एफिल टॉवर के नीचे दो मुस्लिम महिलाओं को कई बार चाकू मारकर घायल कर दिया गया। इस दौरान 'घटिया अरब' कहकर उन्‍हें गाली भी दी गई।

शीना बोरा की गुमशुदगी के बारे में जानते थे परमबीर सिंह, फिर भी नहीं हुई थी FIR

शीना बोरा जब गायब हुई तो राहुल मुखर्जी और इंद्राणी, परमबीर सिंह के पास गए। वह उस समय कोंकण रेंज के आईजी हुआ करते थे।

रवीश की TRP पर बकैती, कश्मीरी नेताओं का पक्ष लेना: अजीत भारती का वीडियो| Ajeet Bharti on Ravish’s TRP, Kashmir leaders

TRP पर ज्ञान देते हुए रवीश ने बहुत ही गूढ़ बातें कहीं। उन्होंने दर्शकों को सख्त बनने के लिए कहा। TRP पर रवीश ने पूछा कि मीटर दलित-मुस्लिम के घर हैं कि नहीं?

‘लालू के रेल’ की तरह ही था बिहार का ‘चरवाहा विद्यालय’: जिस काम में लगे 6 विभाग, वो बना शराब, जुआ और ताश का...

चरवाहा स्कूल को चलाने की जिम्मेदारी कृषि, सिंचाई, उद्योग, पशु पालन, ग्रामीण विकास और शिक्षा विभाग को दी गई थी। लालू ने एक तरह से बच्चों पर ज़िंदगी भर के लिए 'चरवाहा' का टैग लगा दिया।

जनसंघ: ‘राष्ट्रवाद’ को आवाज देने वाला पहला राजनीतिक दल, जिसके कार्यकर्त्ता सीमा से सियासत तक डटे रहे

1962 में चीन और 1965 में पाकिस्तान के साथ युद्ध में जनसंघ और आरएसएस के कार्यकर्ताओं ने सिविक और पुलिस ड्यूटी का किरदार निभाया था।

प्रचलित ख़बरें

मैथिली ठाकुर के गाने से समस्या तो होनी ही थी.. बिहार का नाम हो, ये हमसे कैसे बर्दाश्त होगा?

मैथिली ठाकुर के गाने पर विवाद तो होना ही था। लेकिन यही विवाद तब नहीं छिड़ा जब जनकवियों के लिखे गीतों को यूट्यूब पर रिलीज करने पर लोग उसके खिलाफ बोल पड़े थे।

37 वर्षीय रेहान बेग ने मुर्गियों को बनाया हवस का शिकार: पत्नी हलीमा रिकॉर्ड करती थी वीडियो, 3 साल की जेल

इन वीडियोज में वह अपनी पत्नी और मुर्गियों के साथ सेक्स करता दिखाई दे रहा था। ब्रिटेन की ब्रैडफोर्ड क्राउन कोर्ट ने सबूतों को देखने के बाद आरोपित को दोषी मानते हुए तीन साल की सजा सुनाई है।

हिन्दुओं की हत्या पर मौन रहने वाले हिन्दू ‘फ़्रांस की जनता’ होना कब सीखेंगे?

हमें वे तस्वीरें देखनी चाहिए जो फ्रांस की घटना के पश्चात विभिन्न शहरों में दिखती हैं। सैकड़ों की सँख्या में फ्रांसीसी नागरिक सड़कों पर उतरे यह कहते हुए - "हम भयभीत नहीं हैं।"

सूरजभान सिंह: वो बाहुबली, जिसके जुर्म की तपिश से सिहर उठा था बिहार, परिवार हो गया खाक, शर्म से पिता और भाई ने की...

कामदेव सिंह का परिवार को जब पता चला कि सूरजभान ने उनके किसी रिश्तेदार को जान से मारने की धमकी दी है तो सूरजभान को उसी के अंदाज में संदेश भिजवाया गया- “हमने हथियार चलाना बंद किया है, हथियार रखना नहीं। हमारी बंदूकों से अब भी लोहा ही निकलेगा।”

ऐसे मुस्लिमों के लिए किसी भी सेकुलर देश में जगह नहीं होनी चाहिए, वहीं जाओ जहाँ ऐसी बर्बरता सामान्य है

जिनके लिए शिया भी काफिर हो चुका हो, अहमदिया भी, उनके लिए ईसाई तो सबसे पहला दुश्मन सदियों से रहा है। ये तो वो युद्ध है जो ये बीच में हार गए थे, लेकिन कहा तो यही जाता है कि वो तब तक लड़ते रहेंगे जब तक जीतेंगे नहीं, चाहे सौ साल लगे या हजार।

‘कश्मीर टाइम्स’ अख़बार का श्रीनगर ऑफिस सील, सरकारी सम्पत्तियों पर कर रखा था कब्ज़ा

2 महीने पहले कश्मीर टाइम्स की एडिटर अनुराधा भसीन को भी उनका आधिकारिक निवास खाली करने को कहा गया था।
- विज्ञापन -

राहुल गाँधी ने किया जातीय हिंसा भड़काने के आरोपित PFI सदस्य सिद्दीक कप्पन की मदद का वादा, परिवार से की मुलाकात

PFI सदस्य और कथित पत्रकार सिद्दीक कप्पन के परिवार ने इस मुलाकात में राहुल गाँधी से पूरे मामले में हस्तक्षेप की माँग कर कप्पन की जल्द रिहाई की गुहार लगाई।

पेरिस: ‘घटिया अरब’ कहकर 2 बुर्के वाली मुस्लिम महिलाओं पर चाकू से हमला, कुत्ते को लेकर हुआ था विवाद

पेरिस में एफिल टॉवर के नीचे दो मुस्लिम महिलाओं को कई बार चाकू मारकर घायल कर दिया गया। इस दौरान 'घटिया अरब' कहकर उन्‍हें गाली भी दी गई।

शीना बोरा की गुमशुदगी के बारे में जानते थे परमबीर सिंह, फिर भी नहीं हुई थी FIR

शीना बोरा जब गायब हुई तो राहुल मुखर्जी और इंद्राणी, परमबीर सिंह के पास गए। वह उस समय कोंकण रेंज के आईजी हुआ करते थे।

बिहार चुनाव ग्राउंड रिपोर्ट: गया के केनार चट्टी गाँव के कारीगर, जो अब बन चुके हैं मजदूर। Bihar Elections Ground Report: Wazirganj, Gaya

मैं आज गया जिले के केनार चट्टी गाँव गया। जो पहले बर्तन उद्योग के लिए जाना जाता था, अब वो मजदूरों का गाँव बन चुका है।

रवीश की TRP पर बकैती, कश्मीरी नेताओं का पक्ष लेना: अजीत भारती का वीडियो| Ajeet Bharti on Ravish’s TRP, Kashmir leaders

TRP पर ज्ञान देते हुए रवीश ने बहुत ही गूढ़ बातें कहीं। उन्होंने दर्शकों को सख्त बनने के लिए कहा। TRP पर रवीश ने पूछा कि मीटर दलित-मुस्लिम के घर हैं कि नहीं?

TRP मामले की जाँच अब CBI के पास, UP में दर्ज हुई अज्ञात आरोपितों के खिलाफ शिकायत

TRP में गड़बड़ी का मामला अब CBI के हाथ में आ गया है। उत्तर प्रदेश सरकार की सिरफारिश के बाद लखनऊ पुलिस से जाँच का सारा जिम्मा CBI ने ले लिया है।

क्या आप राहुल गाँधी और ओवैसी से देश के हितों की कल्पना करते हैं: योगी आदित्यनाथ

योगी आदित्यनाथ ने कहा, "राहुल और ओवैसी पाकिस्तान की तारीफ कर रहे हैं। क्या आप इन दोनों से देश की हितों की कल्पना करते हैं?"

बंद किया गया पेरिस का मस्जिद, हमास समर्थित समूह भी भंग: शिक्षक सैमुअल की श्रद्धांजलि सभा में उपस्थित रहेंगे राष्ट्रपति मैक्रों

फ्रांस के गृह मंत्री गेराल्ड ने कहा कि देश 'अंदर के दुश्मनों' से लड़ रहा है। फ्रांस में सक्रिय हमास का समर्थन करने वाले समूह को भंग कर दिया गया है।

बिहार चुनाव ग्राउंड रिपोर्ट: जमुई से BJP प्रत्याशी श्रेयसी सिंह से चुनावी मुद्दों पर बातचीत। BJP’s Shreyasi Singh interview

हमने श्रेयसी से यह जानने की कोशिश की कि उन्होंने बीजेपी को ही क्यों चुना, जबकि उनके पास कई विकल्प थे

‘लालू के रेल’ की तरह ही था बिहार का ‘चरवाहा विद्यालय’: जिस काम में लगे 6 विभाग, वो बना शराब, जुआ और ताश का...

चरवाहा स्कूल को चलाने की जिम्मेदारी कृषि, सिंचाई, उद्योग, पशु पालन, ग्रामीण विकास और शिक्षा विभाग को दी गई थी। लालू ने एक तरह से बच्चों पर ज़िंदगी भर के लिए 'चरवाहा' का टैग लगा दिया।

हमसे जुड़ें

272,571FansLike
78,927FollowersFollow
335,000SubscribersSubscribe