ये कहानी है एक ऐसे नेता को अप्रासंगिक बना देने की, जिसके पीछे अमित शाह की रणनीति और योगी के कड़े तेवर थे। इस कहानी के तीन किरदार हैं, तीनों एक से बढ़ कर एक। जानिए कैसे भाजपा ने योजना बना कर, धीमे-धीमे अमल कर ओपी राजभर को निकाल बाहर किया।
उनके लिए भारत का हर वो मतदाता अशिक्षित है, जिसने भाजपा को वोट दिया है। फिर भाजपा में 5 वर्ष रहकर मलाई चाँपने वाले वह क्या हैं? अगर केरल में साक्षरता दर सबसे ज्यादा है तो आईएस में शामिल होकर आतंकी बनने वाले भी सबसे ज्यादा इसी राज्य से हैं।
जो लोग रवीश की पिछले पाँच साल की पत्रकारिता टीवी और सोशल मीडिया पर देख रहे हैं, वो भी यह बात आसानी से मान लेंगे कि रवीश जी को पत्रकारिता के कॉलेजों को सिलेबस में केस स्टडी के तौर पर पढ़ाया जाना चाहिए।
शहर के एलीट से लेकर गाँव का वंचित वर्ग भी मौक़ा मिलने पर मोदी सरकार के गुणगान करने से नहीं चूक रहा है। लेकिन, विपक्ष इन कोशिशों में जुटा हुआ है कि जनता के बीच भाजपा की कमियों और चूक को गिनवा कर उन्हें सत्ता से हटाया जाए ताकि देश में दोबारा से भ्रष्टाचार, घोटालों की राजनीति कायम हो सके।
इंटेलेक्चुल लेजिटिमेसी और फेसबुक पर प्रासंगिक बने रहने, ज्ञानी कहलाने और एक खास गिरोह के लोगो में स्वीकार्यता पाने के लिए आप भले ही मोदी की हर बात पर लेख लिखिए, लेकिन ध्यान रहे कुतर्कों, ठिठोलियों और मीम्स की उम्र छोटी होती है।
फारसी साम्राज्य के राजा डैरियस-प्रथम के अभिलेखों में हिन्दू शब्द का ज़िक्र ईसा से 6 शताब्दी पूर्व का है, जबकि इस्लाम ईसा से 600 साल बाद का। और मुगलों का हिंदुस्तान में आगमन तो 16वीं शताब्दी में हुआ। यानि विशुद्ध तकनीकी रूप से भी कमल हासन 22 शताब्दियों की ‘मामूली’ सी चूक कर गए हैं।
राघव बहल लाख राहुल को पूर्ण राजनेता मान लें, लेकिन राहुल गाँधी का दुर्भाग्य यह है कि वो भरी बारिश में काली माता के मंदिर में दिया जलाने जाते नहीं, और सिर्फ चुनावों के समय ही जनऊ पहनते हैं, राम भक्त और शिव भक्त बनते हैं। साथ ही, उनको एक्सिडेंटली भी, सर पर चोट लगने से ही सही, ज्ञान मिलने की संभावना दिखती नहीं क्योंकि उसके लिए भी पूर्व में अर्जित ज्ञान के लोप होने की बात ज़रूरी है।
हत्या करने के बाद आरोपित आलम सीधा मस्जिद भागता है। उसे यह आत्मविश्वास कहाँ से आया कि मस्जिद में छिपने से वह सज़ा से बच जाएगा? मीडिया से एक सवाल। अगर मारने वाले का कोई मज़हब नहीं तो बीच-बचाव करने वाले का मज़हब हाइलाइट करना ज़रूरी क्यों?
अगर राज्य स्वयं ही गुंडों को पाले, उनसे पूरा का पूरा बूथ मैनेज करवाए, उनके नेता यह आदेश देते पाए जाएँ कि सुरक्षाबलों को घेर कर मारो, उनके गुंडे इतने बदनाम हों कि वहाँ आनेवाला अधिकारी ईवीएम ही उन्हें सौंप दे, तो फिर इसमें चुनाव सही तरीके से कैसे हो पाएगा?
ये लड़ाई हवसी मानसिकता को सुधारने की है, लड़कियों को समाज में भोग की वस्तु के बजाय सशक्त बनाने की है... शरिया के लागू होने का सुझाव सिर्फ़ आक्रोश में उचित लग सकता है, लेकिन एक सभ्य समाज में हर अपराध पर ऐसे कानून की बात करना अनुचित है।