विचार

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मॉब लिंचिंग

अगर आपने तबरेज का नाम सुना है और रंजीत का नहीं तो जान लीजिए ‘उनका’ एजेंडा कामयाब रहा

आपने इसीलिए रंजीत का नाम नहीं सुना क्योंकि उसकी मॉब लिंचिंग को लेकर किसी ने आवाज़ ही नहीं उठाई। क्यों नहीं उठाई? क्योंकि आरोपितों में मुस्लिम लोग शामिल हैं। गिरफ्तार आरोपितों में से 2 के नाम अनवर और मिंटू है, जो भाई हैं। लोगों को यह भी बताना पड़ेगा न।
रोमिला थापर

JNU की रोमिला थापर से CV माँग कर गुनाह किया है इस क्रूर, घमंडी, तानाशाही सरकार ने

जहाँ कुछ ही दिन पहले प्रधानमंत्री से डिग्री दिखाओ जी कहा जा रहा था, वहाँ एक रिटायर हो चुके प्रोफेसर से, सीवी माँगना गलत क्यों है? अगर वो कहें कि ये ऐसी जगह है जहाँ डिग्री की जरूरत ही नहीं होती, तो ये भी पूछिएगा कि प्रधानमंत्री होने के लिए कौन सी शैक्षणिक योग्यताएँ जरूरी हैं?
अनुराह पटेल, पवन जायसवाल

पत्रकार वीडियो बनाएगा तो उस पर मुक़दमा हो जाएगा! लोगों ने पूछा – पटेल साहब आपको DM किसने बनाया?

डीएम अनुराग पटेल कहते हैं कि प्रिंट के पत्रकार ने वीडियो बनाया, इसीलिए उस पर मुक़दमे दायर किए गए। डीएम साहब बताएँ कि रेडियो पत्रकार को देखने का हक़ है या उसे सिर्फ़ सुन कर ही काम चलाना है? प्रशासनिक लापरवाही को छिपाने के लिए ख़ुद का मज़ाक बना रहे डीएम।
बीबीसी प्रोपेगंडा, एनआरसी

BBC का नया ज़हर: रोहिग्याओं की तरह प्रवासी भारतीयों को भगाने का सपना देख रहे हैं वुसतुल्लाह

बीबीसी का वुसतुल्लाह ख़ान विश्व की सबसे बड़ी लोकतान्त्रिक पार्टी के मुखिया की तुलना 5 लाख लोगों के क़ातिल 'युगांडा के कसाई' से करता है। घृणा से ओत-प्रोत बीबीसी यह सपना देख रहा है कि सभी देश प्रवासी भारतीयों को भगा दें। लेकिन, ऐसा हो सकता है क्या?
पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह

मनमोहन सिंह की नीति से बढ़ी बीमारी: हर साल मरती हैं 1000 गायें, आज भी सॅंभले तो 1000 साल में खत्म होगा मर्ज

यह मर्जी का मसला नहीं है। न ही प्रधानमंत्री की अपील या सख्त नियम-कायदों का होना जरूरी है। यह मसला आपकी जिंदगी, आने वाली पीढ़ियों की जिंदगी से जुड़ा। इसलिए, खुद से ही संभलिए। देर हुई तो न हम बचेंगे न पर्यावरण।
प्रचार का पैंतरा कितना सहिष्णु?

हिन्दुओं को बार-बार नीचा दिखाओ, क्योंकि वे हमारा घंटा नहीं उखाड़ पाएँगे…रत्ती भर भी नहीं

हिन्दू का व्यवसाय धंधा तो मुसलमानों का कारोबार इबादत कैसे? क्यों असहिष्णुता गणेश चतुर्थी पर ही आती है, मुहर्रम पर नहीं? क्यों कम्पनियॉं मानती हैं कि जूते खाकर भी आप उनका ही प्रोडक्ट खरीदेंगे। जवाब है, हिन्दू आज अपनी ही संस्कृति, दर्शन और इतिहास का मज़ाक बनाने वालों के पोषक बने हुए हैं।
क्या सच में हर सेक्टर में हाहाकार है?

क्या सचमुच बर्बाद हो गई है हमारी अर्थव्यवस्था? सरकार क्या कर रही है? (भाग 2)

नीतियाँ लम्बे समय तक के लिए होती हैं, इसलिए सरकारों को सोच समझ कर बोलना चाहिए ताकि बिजनेस करने वालों के बीच यह भरोसा रहे कि यह सरकार जो बोलती है, वो करती है। अगर नीतियाँ तीन महीने में घोषणा के बाद बदलती रहेंगी, जो कि मोदी सरकार में कई बार हो चुका है, तो इंडस्ट्री उसे सही सिग्नल नहीं मानती।
ऐसा नहीं है कि उपाय मनमोहन सिंह ने नहीं किए- किए, लेकिन उनका फायदा उतना नहीं मिला, जितना आज नुकसान हो रहा है

GDP से क्या होता है? क्या सचमुच बर्बाद हो गई है हमारी अर्थव्यवस्था? (भाग 1)

ऑक्सफोर्ड से पढ़े हुए मनमोहन सिंह अर्थव्यवस्था पर ज्ञान दिए जा रहे हैं। मनमोहन सिंह कहते हैं कि मोदी की नीतियों ने भारत को इस स्थिति में पहुँचाया है। लेकिन आँकड़े इस दावे के उलट कुछ और ही कहानी कहते हैं।
बीटीवीआई, अनिल अम्बानी

हाई TRP के बावजूद अनिल अम्बानी के स्वामित्व वाला BTVi चैनल अचानक बंद

इंडिया टुडे के पत्रकार शिव अरूर ने ट्वीट कर लिखा कि तिरंगा टीवी और बीटीवीआई का बंद होना बताता है कि मीडिया जगत के लिए यह कठिन परिस्थिति है। बीटीवीआई के पत्रकार आदित्य राज कौल ने लिखा कि हर यात्रा का एक अंत होता है और रात के अँधेरे के बाद ही नया सवेरा निकलता है।
NRC

हिन्दू होने के नाते भारत की राष्ट्रीयता मिल जाने का प्रावधान जब तक लागू नहीं होगा, तब तक…

एनआरसी में जिन 19 लाख लोगों का आँकड़ा निकाला गया है, उसमें से अधिकांश हिन्दू ही हैं। जिन 19 लाख लोगों को एनआरसी से बाहर किया गया है, उनकी अपील को अगर फोरेनर ट्रिब्यूनल ने ठुकरा दिया तो उन्हें लम्बी कानूनी लड़ाई भी लड़नी पड़ेगी।
कैडबरी

मुस्लिम महिला सबसे गोरी, ब्राह्मण सबसे काले: Cadbury वालो, धंधा करो ज्ञान मत बाँटो

कॉर्पोरेट को समझना होगा कि उसके एजेन्डाबाज और राजनीतिक रूप से वामपंथी झुकाव वाले प्रोफेशनल किसी मुद्दे का समाधान करने की कोशिश नहीं कर रहे। यही कारण है कि मूल व्यवसाय से ज्यादा ऐसी फ़िज़ूल की गतिविधियों में ऊर्जा खपाना धंधे पर भारी पड़ रहा है।
रवीश कुमार

घोघो रानी… चुल्लू भर ही था पानी, इसलिए छेनू उसमें डूब के मर न सका!

लोकतंत्र के चार खम्भे जब गिनवाए जाते हैं तो विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बाद पत्रकारिता का नंबर भी आता है। जब पहले तीन से जनता सवाल कर सकती है तो आखिर ऐसा क्यों है कि पत्रकारिता सीजर्स वाइफ की तरह सवालों से बिलकुल परे करार दी जाती है?

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