इस्लामी कानून, रवायत और कठमुल्ले किसी के लिए मुस्लिम महिलाओं की आवाज का मोल नहीं। उलटे तकरीरों में उन्हें इस तरह पेश किया जाता है जैसे 'भोग की वस्तु' से अधिक उनका मोल न हो।
इस्लामपरस्त, वामपंथी, लिबरल... पूरा गिरोह डर में है। 90 के दशक में जिस कहानी पर लीपापोती कर दी गई, वह गोदी मीडिया के जमाने में गाँव-गाँव तक पहुँच रही है।