यह चुप्पी केवल आज की नहीं है, केवल मंगरू के मामले में नहीं है। यह हर उस मामले में ओढ़ा गया सन्नाटा है, जब 'डरा हुआ शांतिप्रिय' कोई अपराध करता है, और भुक्तभोगी कोई हिन्दू होता है।
रील वाली जायरा ने रियल में न जाने कितनी 'जायरा' को प्रभावित किया होगा, पर अफसोस! जायरा अपने फैसले से कितना आगे गईं, कितना पीछे, पता नहीं, लेकिन जिन्होंने जायरा के संघर्ष में खुद का भविष्य सोचा होगा, वो लड़कियाँ मानसिक तौर पर बहुत पीछे चली गई होंगी, यह पक्का है।
इस्लाम के समर्थकों और ईसाईयों को आत्म-विवेचन की जरूरत है- 'इनटॉलेरेंस' के लिए जिम्मेदार 'भगवाकरण' है, या हिन्दुओं को आक्रामकता अख्तियार करने के लिए मजबूर करने वाले उनके आचरण।
अगर आपको तबरेज की हत्या पर समाज में दोष दिखता है, तो आपको विनय की भी हत्या पर विचलित होना पड़ेगा। अगर आपको किसी चोर की भीड़ हत्या पर संवेदनशील होने का मन करता है तो आपको जीटीबी नगर मेट्रो स्टेशन के बाहर इस्लामी भीड़ द्वारा लिंच किए गए ई-रिक्शा चालक की भी मौत का गम करना चाहिए।
जब दलितों और मुस्लिमों में झड़प होती है, तो यही दलित हिन्दू हो जाते हैं। जब एएमयू SC-ST को आरक्षण नहीं देता, तब ये चूँ तक नहीं करते। लेकिन, जहाँ बात भारत को असहिष्णु साबित करें की आती है, 'दलितों और मुस्लिमों' पर अत्याचार की बात कर दलितों को हिन्दुओं से अलग दिखाने के प्रयास होते हैं।
अगर मारे गए किसी "समुदाय विशेष" के परिवार को मिले सरकारी मुआवजे को देखें और उसकी तुलना भीड़ द्वारा मार दिए गए डॉ नारंग, रिक्शाचालक रविन्द्र जैसी दिल्ली में हुई घटनाओं से करें तो ये अंतर खुलकर सामने आ जाता है।
मेरे देश में मौत महज एक आँकड़ा है, गणित है, अंक है। आइए, आपको गिनाता हूँ। मुजफ्फरपुर में भी मौतें हुईं। जहाँ बात निदान की होनी चाहिए, वहाँ सिर्फ़ एक व्यक्ति को ज़िम्मेदार ठहरा कर कोई निकल नहीं सकता। क्या एक बुरी घटना के लिए अच्छी चीजों पर भी विराम लगा दिया जाए?
वाक्य के आधे हिस्से में संवेदना दिखाते हुए, दूसरे हिस्से में जो आप सिनिकल हो जाते हैं उससे पता चलता है कि आपको बच्चों की मौत से कोई मतलब नहीं। आपको मुद्दा चाहिए ताकि आप आउटरेज करते हैं। आप चौबीस घंटे इसी मोड में रहते हैं, जैसे कि सत्ता के पक्ष में लिखने वाला चौबीस घंटे उसके बचाव में लगा रहता है।