सामाजिक मुद्दे

मस्जिद में महिलाएँ Vs मर्द: बहनो… एक साथ खड़े होने का समय अब नहीं तो कब?

बहनो! यह सही वक्त है चोट करने का। मस्जिद में पल रही मर्दवादी सोच पर प्रहार करने का। एक साथ उठ खड़ी हो, हजारों किलोमीटर लंबी ह्यूमन चेन बनाओ। अल्लाह ने चाहा तो सुप्रीम कोर्ट भी आपके हक में फैसला सुनाएगा!

हिन्दू त्योहारों पर आम होती इस्लामी पत्थरबाज़ी: ये भी मोदी के मत्थे मढ़ दूँ?

हर आतंकी और उसका संगठन एक ही नारा लेकर निकलता है, काले झंडे पर सफ़ेद रंग से लिखा वाक्य क्या है, सबको पता है। बोल नहीं सकते, वरना 'बिगट' और 'कम्यूनल' होने का ठप्पा तुरंत लग जाएगा। हमने पीढ़ियाँ निकाल दीं कहते हुए कि आतंक का कोई मज़हब नहीं होता।

जब अम्मी-अब्बू ही ‘वेश्या’ कहकर हत्या कर दें, तो जहाँ में ‘बेटियोंं’ के लिए कोई जगह महफ़ूज़ नहीं

पिता इफ्तिख़ार अहमद और अम्मी फरजाना को बेटी के चाल-चलन पर शक़ था, जिसके चलते उसके मुँह में प्लास्टिक का बैग ठूंसकर उसकी निर्मम हत्या कर दी गई। उनको लगता था कि बेटी छोटे कपड़े पहनती है तो ज़रूर कोई ग़लत काम करने लगी है। इसी शक़ ने शैफिला की जान ले ली।

जब समुदाय विशेष खुद को स्वतः घुसपैठिया समझ कर सोशल मीडिया पर बकवास करता है

जब साफ-साफ घुसपैठियों की बात की है, और उसमें यह कहा है कि बौद्ध, सिक्खों और हिन्दुओं के अलावा जो भी बाहर से आए लोग हैं, उन्हें बाहर..

हिंदुस्तान के उत्थान में रमता था बाबा साहब का मन, उनके नाम पर विघटन-घृणा का बीज बोना वामपंथियों की साजिश

"मैं हिंदुस्तान से प्रेम करता हूँ। मैं जियूँगा हिंदुस्तान के लिए और मरूँगा हिंदुस्तान के लिए, मेरे शरीर का प्रत्येक कण हिंदुस्तान के काम आए और मेरे जीवन का प्रत्येक क्षण हिंदुस्तान के काम आए, इसलिए मेरा जन्म हुआ है।”

भीमा कोरेगाँव: बाबासाहेब अंबेडकर ने नहीं दी थी ब्राह्मणों को गाली, झूठ बोलते हैं अर्बन नक्सली

कोरेगांव की लड़ाई की प्रशंसा ब्रिटेन की संसद तक में हुई थी और कोरेगाँव में एक स्मारक भी बनवाया गया था जिस पर उन 22 महारों के नाम भी लिखे हैं जो कम्पनी सरकार की ओर से लड़े थे। यह प्रमाणित होता है कि कोरेगाँव की लड़ाई दलित बनाम ब्राह्मण थी ही नहीं, यह तो दो शासकों के मध्य एक बड़े युद्ध का छोटा सा हिस्सा मात्र थी।

अल्पसंख्यक ही नहीं बहुसंख्यक भी होते हैं सांप्रदायिक वारदातों के शिकार, छिपाता है मीडिया

हिन्दू आज़ादी से अपने त्यौहार मनाएँ, मुस्लिम बिना व्यवधान से नमाज़ पढ़ें, लेकिन दोनों ही मामलों में अगर कोई बाधा डालने वाला कार्य करता है तो दोनों ही ख़बरों को समान प्राथमिकता दी जाए। एक को छिपाना और एक को विश्व स्तर पर ले जाकर भारत को भीड़तंत्र वाला देश साबित करने का प्रोपेगंडा अब नहीं चलेगा।

बिहार का गुमनाम जलियाँवाला: नेहरू ‘तारापुर शहीद दिवस’ की घोषणा करके भी मुकर गए, क्या थी वजह?

इसमें केवल पासी, धानुक, मंडल और महतो ही नहीं शहीद हुए थे- मरने वालों में झा और सिंह नामधारी भी थे। तो दलहित चिंतकों के लिए इस मामले में रस नहीं होता। इसलिए यह नाम भी गुमनाम ही रह गए, और मुंगेर भी नेताओं के लिए जलियाँवाला जितना जरूरी नहीं बना।

किस तरह हर दिन हम मौत की तरफ बढ़ रहे हैं, वजह प्रदूषण: रामनवमी पर पर्यावरण बचाने की सार्थक पहल

इस समस्या से उबरने के लिए पूरी दुनिया को एक होने की जरुरत है, हम सब को अपने अपने स्तर पर कोशिश करते रहने की जरुरत है। हर वर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाने के पीछे भी यही मकसद है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक किया जा सके। लेकिन साल के किसी एक दिन को इस तरह की दिवस मनाकर हम इस विकराल समस्या को नही सुलझा सकते, इसके लिए पूरे वर्ष सतत प्रयास करते रहने की जरूरत है।

राहुल सांकृत्यायन और सदरुद्दीन एनी: साहित्यकार की कलम भविष्य भी लिख देती है

अगर दाखुंदा का शाब्दिक अर्थ देखें तो ये मोटे तौर पर पहाड़ी जैसा अर्थ लिए हुए है। जैसे हिंदी में 'देहाती' कहने पर सिर्फ ग्रामीण का बोध नहीं होता, उसमें 'गंवार', मूर्ख, नासमझ, या दुनियादारी से अनभिज्ञ वाला भाव भी होता है।

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