वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने जानकारी देते हुए बताया कि यस बैंक में भारतीय स्टेट बैंक 49 फीसदी की हिस्सेदारी खरीदेगी। इस दौरान वित्तमंत्री ने साफ किया कि SBI 3 साल तक अपनी स्टेक को 26 फीसदी से कम नहीं कर सकेगी। इसके अलावा प्राइवेट लेंडर्स भी इसमें निवेश करेंगे।
इस बात के कोई स्पष्ट साक्ष्य नहीं है कि इस 'हग अ चायनीज' कैम्पेन के कारण ही इटली में कोरोना वायरस का संक्रमण फैला, क्योंकि सभी चीनी नागरिक इस वायरस से संक्रमित नहीं हैं, जिसके कारण उनसे भेदभाव किया जाए। साथ ही यह भी सही है कि इस तरह के कैम्पेन को कोरोना वायरस के संक्रमण को देखते हुए फिलहाल टाला जा सकता था।
राकेश सिन्हा ने जुलाई 2019 में जनसंख्या विनियमन विधेयक को एक निजी विधेयक के रूप में पेश किया था। वहीं वर्ष 2018 सितंबर माह में कॉन्ग्रेस के राजनेता जितिन प्रसाद ने भी जनसंख्या वृद्धि की जाँच के लिए एक कानून बनाने की माँग की थी।
हर्ष मंदर ने कहा कि शाहीन बाग में पिछले कुछ महीनों से हो रहे विरोध प्रदर्शन को अब वापस ले लेना चाहिए, क्योंकि इसका इस्तेमाल आरएसएस और उसके सहयोगियों द्वारा मुस्लिमों के खिलाफ हेट कैंपेन को बढ़ावा देने के लिए ट्रिगर के रूप में किया गया।
पिछले तीन महीनों के उपद्रवों और फसादों के पीछे विपक्षी दलों की भड़काऊ बयानबाजी का सबसे महत्त्वपूर्ण रोल रहा है। पहले कॉन्ग्रेस की सोनिया गाँधी आदि का "आर-पार" की लड़ाई जैसे बयान आए, जिसमें उन्होंने सीएएए का विरोध करने के लिए सड़क पर उतरने की बात कही थी। साथ ही कहा था कि कॉन्ग्रेस इस तरह का विरोध करने वाले लोगों के साथ खड़ी है।
उस समय दुनिया आज की तरह ग्लोबल नहीं थी। फिर भी उस वायरस को दुनिया को अपनी चपेट में लेते वक्त नहीं लगा। उस समय दुनिया का हर चौथा शख्स इससे प्रभावित था। मृतकों में से आधे से ज्यादा 20 से 30 की उम्र के थे।
ऐसा नहीं है कि गहलोत और पायलट में अचानक से दूरियॉं बढ़ी है। सरकार गठन के बाद से ही पायलट की उपेक्षा की जा रही है। आरटीआई से सामने आई एक जानकारी से भी इसकी पुष्टि होती है। इसके मुताबिक 25 करोड़ के 62 विज्ञापन दिए गए। इसमें सिर्फ और सिर्फ गहलोत ही नजर आए।
इस संबंध में अंतिम फैसला शनिवार 14 मार्च को लिया जाएगा। लेकिन, माना जा रहा है कि इस बार IPL केवल प्रसारण के उद्देश्य होगा और मैच बिना दर्शकों के खाली स्टेडियम में आयोजित किया जाएगा।
दिल्ली में हुए हिन्दू विरोधी दंगों की सच्चाई को सामने लाने का जो प्रयास ऑपइंडिया ने अपनी ग्राउंड रिपोर्टिंग के जरिए किया, उसे एक ओर जहाँ बड़े वर्ग का स्नेह और सहानुभूति मिली, वहीं दूसरी ओर एक वर्ग ऐसा भी था जिसे दंगों के इस पहलू के सामने आने से परेशानी भी हुई।