Monday, October 18, 2021
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न्यूज़लॉन्ड्री के पतझड़! वैचारिक बवासीर के लिए मंदिर के पुजारी नहीं, हकीम लुकमान के पास जाओ

इस पर सबसे हास्यास्पद बात यह है कि न्यूज़लॉन्ड्री ने जिस पुजारी की बात पर अपनी छाती पीटने का प्रयास किया है, उसी के शब्दों में 'शायद' 'हो सकता है' 'हुआ होगा' जैसे कई अलंकरण इस्तेमाल किए गए हैं, जबकी ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान जिन लोगों से ऑपइंडिया ने बातचीत की, वो सभी लोग अपनी आँखों से देखी हुई घटनाओं के बारे में पूरी तरह से आश्वस्त थे।

अभी तक आपको यदि लगता था कि मीडियाकारों की सबसे बुरी नौकरी तैमूर के डायपर को कवर करना था, तो आपको न्यूज़लॉन्ड्री के फास्ट ट्रैक कोर्ट न्यायाधीश पतझड़ कुमार से मिलना चाहिए। पतझड़ कुमार मीडिया घरानों की रिपोर्ट्स में कुल लिखे गए शब्दों की गिनती करते हैं और बताते हैं कि कौन मीडिया कहा जा सकता है और कौन नहीं।

पतझड़ कुमार को जो जिम्मेदारी सौंपी गई है वह बेहद घिनौनी है, उसे घात लगाकार बैठे रहना होता है, और किसी भी तरह से साबित करना होता है कि कौनसा मीडिया किस गली-मोहल्ले से गुजर रहा है। इसके लिए उन्हें जेबखर्च से अपने रिक्शा का खर्चा खुद उठाना होता है। कम से कम पतझड़ कुमार की वेबसाइट के दयनीय हालात तो यही साबित करते हैं।

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दिल्ली में हुए हिन्दू विरोधी दंगों में ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्टिंग से एक ओर जहाँ ऑपइंडिया पीड़ितों का हाल दुनिया के सामने लाने में कामयाब रहा, वहीं दूसरी ओर मीडिया में सदियों से मठाधीशी जमाए एक वर्ग ऐसा भी था, जिस पर यह सब देखकर तुषारापात हुआ कि समाज के जिस वर्ग को अनदेखा करते हुए वह हमेशा अपने प्रोपेगैंडा की रोटियाँ सेंकता रहा, उनकी बात सामने लाने वाले कुछ लोगों ने मोर्चा संभाल लिया है।

वरना अब तक यही देखा जाता था कि किस तरह से दंगों के दौरान हिन्दुओं के साथ हो रहे अत्याचारों के बजाय कोई वामपंथी मीडिया फ्रेंडली कहानी को ही दंगों का मूल बिंदु बना दिया जाता था। इस तरह की कहानी को ‘वायरल’ करने के लिए अनुराग कश्यप जैसे बॉलीवुड निर्देशक तो मौजूद रहते ही थे।

ऑपइंडिया द्वारा की गई हिन्दू विरोधी दंगों की ग्राउंड रिपोर्टिंग ने तथाकथित फैक्ट चेकर्स को ही नहीं बल्कि वामपंथी मीडिया गैंग की कुछ घातक टुकड़ियों, जो अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए भी मशक्कत कर रहे हैं, को भी परेशान किया है। यही कारण है कि वामपंथ के इन वॉच डॉग्स को ‘फैक्ट चेक’ जैसे अपने झुनझुने के साथ बाहर आने को मजबूर किया है।

न्यूज़लॉन्ड्री जैसे तथाकथित मीडिया गिरोह के रिपोर्टर, पतझड़ कुमार (बदला हुआ नाम) का पहला दावा है कि ऑपइंडिया कि ग्राउंड रिपोर्ट, ग्राउंड रिपोर्ट न होकर ‘तथाकथित ग्राउंड रिपोर्ट’ है क्योंकि इसमें शब्द कम हैं। पतझड़ कुमार की मानें तो ग्राउंड रिपोर्ट वह होती है, जिसमें रवीश कुमार जैसे लोग अपना दंगा साहित्य का लप्रेक ठूँसकर उसे मारपीट कर, ठोक-पीटकर कम से कम एक हजार शब्दों तक पहुँचाने की कोशिश करते हैं।

अक्सर संपादक द्वारा मार्च के महीने में ‘देख लिए जाने’ की धमकी के अंतर्गत मीडिया का एक बड़ा वर्ग ऐसे हालातों में अपनी रिपोर्ट्स में अपने रिपोर्टर्स को फैज़ से लेकर अल्ताफ राजा तक के गानों को लिखने की धमकी देते हुए भी नजर आते हैं। तनख्वाह कटने के भय से पतझड़ कुमार ने चार शब्द अतिरिक्त जोड़ते हुए इसमें अपना दर्द करूण रस में व्यक्त करते हुए लिखा है कि ऑपइंडिया ने अपनी ग्राउंड मात्र 346 शब्दों में व्यक्त की है। वास्तव में किसी रिपोर्ट में जब आप अंदर से पूरी तरह से आश्वस्त हों कि आपके पास खंडन करने के लिए कुछ नहीं है, तभी सारा ध्यान मैटर छोड़कर शब्द गिनने पर केंद्रित हो जाता है।

न्यूज़लॉन्ड्री की पड़ताल का ‘बड़ा खुलासा’ इस स्क्रीनशॉट में खुद देख सकते हैं –

पतझड़ कुमार का दूसरा बड़ा दावा (पतझड़ कुमार के अनुसार, पड़ताल) यह है कि उत्तर-पूर्वी दिल्ली में मुस्लिम भीड़ द्वारा मंदिर में की गई तोड़फोड़ पर ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट झूठी है। पतझड़ कुमार का कहना है कि ऑपइंडिया ने मंदिर में पुजारी से बात नहीं की, जबकि स्वयं न्यूज़लॉन्ड्री की मानसिक विष्ठा में यह जिक्र कहीं भी नहीं किया गया है कि पुजारी दंगों के समय वहाँ मौजूद ही थे। और यह ‘स्थानीय लोग’ ही थे, जिन्होंने दंगाइयों के इस पूरे कृत्य की जानकारी ऑपइंडिया के साथ शेयर की थी।

न्यूज़लॉन्ड्री का दर्द यह जरूर हो सकता है कि स्थानीय नागरिकों, जिनसे कि ऑपइंडिया ने बातचीत की, उनमें से किसी ‘अब्दुल’ या ‘मोहम्मद’ को मंदिर का पुजारी नहीं बताया गया है। सबसे ज्यादा निराशाजनक बात न्यूज़लॉन्ड्री के इस ‘बड़े खुलासे’ में यह थी कि उसने इस बात का कहीं भी जिक्र नहीं किया है कि उसने यह रिपोर्ट ‘भाँग’ खाने के बाद तैयार की है।

ख़ास बात यह है कि न्यूज़लॉन्ड्री द्वारा शेयर किए गए वीडियो में पुजारी खुद कहते नजर आ रहे हैं कि वो करीब साढ़े छ घंटों तक पत्थरबाजी और पेट्रोल बम की घटनाओं के बीच अपने ही घर में बंधक बने रहे। यहाँ पर आप जानते हैं कि पेट्रोल बम और पत्थरों के ढेर आम आदमी पार्टी नेता ताहिर हुसैन के घर से बरामद हुए, यह बात साबित भी हो चुकी है। यह मंदिर ताहिर हुसैन के घर के सामने गली नंबर-5 में एक-दो मकान छोड़कर है, मंदिर से पहले पड़ने वाले ‘अरोड़ा फर्नीचर’ को भी ताहिर हुसैन के घर से आने वाली दंगाइयों की भीड़ ने पहले लूटा फिर जला कर खाक कर दिया।

भाँग खाने के बाद न्यूज़लॉन्ड्री की सनसनीखेज रिपोर्ट

न्यूज़लॉन्ड्री ने जिस पुजारी का बयान अपनी मानसिक विष्ठा में लिखा है, उसमें पुजारी गोकुल चन्द्र शर्मा ने स्पष्ट रूप से कहा है कि वह दंगों के समय कमरे में बंद रहे। इसके बाद की सभी बातें ‘संदेह’ के रूप में ही उन्होंने न्यूज़लॉन्ड्री के किसी सूँघकर फैक्ट चेक करने वाले सज्जन से की है। पुजारी ने कहा है कि पेट्रोल बम फेंके गए, जब वो कमरे में बंद थे। अगर माहौल इतना ही गंगा-जमुनी था, तो फिर पुजारी को अपने बेटे, दो बेटियों और पत्नी को ‘कहीं’ क्यों भेजना पड़ा, यह जिक्र कहीं भी नहीं किया गया है।

न्यूज़लॉन्ड्री की तथाकथित ‘पड़ताल’ से लिया गया स्क्रीनशॉट

सबसे बेहतरीन इस प्रकरण में न्यूज़लॉन्ड्री यह कर सकती थी कि वह मंगल ग्रह पर जाकर साबित कर आती कि वहाँ किसी भी तरह का कोई दंगा नहीं हुआ है और ऑपइंडिया अपनी ग्राउंड रिपोर्ट्स में झूठ कह रहा है। लेकिन उसने एक ऐसे मंदिर के पुजारी से पड़ताल करनी जरुरी समझी, जो खुद कह रहा है कि जब छतों पर आगजनी की जा रही थी, पेट्रोल बम फेंके जा रहे थे, तब वो 6 घंटों तक कमरे में बंद रहा और उसने अपने बेटे, बेटी और पत्नी को डर के कारण कहीं छुपा दिया है। लेकिन इस पूरी बातचीत में खुलासा क्या है, इसके लिए शायद अभी न्यूज़लॉन्ड्री को अन्य जानकारों की मदद लेनी होगी।

इस पर सबसे हास्यास्पद बात यह है कि न्यूज़लॉन्ड्री ने जिस पुजारी की बात पर अपनी छाती पीटने का प्रयास किया है, उसी के शब्दों में ‘शायद’ ‘हो सकता है’ ‘हुआ होगा’ जैसे कई अलंकरण इस्तेमाल किए गए हैं, जबकी ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान जिन लोगों से ऑपइंडिया ने बातचीत की, वो सभी लोग अपनी आँखों से देखी हुई घटनाओं के बारे में पूरी तरह से आश्वस्त थे। और वही बातें बिना किसी ‘दंगा साहित्य’ के कलेवर में लपेटकर सामने भी रखी गईं।

न्यूज़लॉन्ड्री की ‘पड़ताल’ से लिया गया स्क्रीनशॉट

न्यूज़लॉन्ड्री की इस विरोधाभासी विष्ठा के ठीक अगले पैराग्राफ में लिखा गया है कि मंदिर के पुजारी ने मंदिर में हमले की बात से मना किया, जबकि ‘संभावित’ शार्ट टर्म मेमोरी लॉस जैसी समस्याओं से ग्रसित न्यूज़लॉन्ड्री के पतझड़ कुमार ने अपने ठीक एक पैराग्राफ पहले ही लिखा है कि मंदिर के पुजारी ने कहा कि मंदिर की छतों पर पेट्रोल बम से हमला किया गया जिस कारण बाहर रखे कपड़े और तिरपाल जल गया

न्यूज़लॉन्ड्री के पतझड़ कुमार के ‘खुलासे’ में सबसे ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण जानकारी यह थी कि उनके अनुसार, मंदिर की जाँच करने जाने के बावजूद भी वो हर वाक्य से पहले ‘शायद’ और ‘संभव है’ जैसे शब्दों से वो अपनी बवासीर का इलाज करते हुए देखे गए हैं। यदि वह हमारी सलाह लेते तो हम यह जरूर कहते कि किसी भी प्रकार की बवासीर और भगंदर के इलाज की सबसे उपयुक्त जगह हकीम लुकमान दवाखाना होता है, ना कि मंदिर का कोई पुजारी। पूज्य नेहरू के समय भी हकीम लुकमान ही ऐसे रोगों के विशेषज्ञ हुआ करते थे और आज भी, इसलिए उन्हें ‘जस्ट फॉर अ चेंज’ जैसी चीजों के नामा पर ऐसे खतरनाक प्रयोगों से बचना चाहिए।

आप सोचिए, ऑपइण्डिया की टीम इन दंगों के दौरान ही ग्राउंड रिपोर्टिंग के लिए दंगा पीड़ित इलाकों में उतरी थी, वहीं दूसरी ओर न्यूज़लॉन्ड्री और ऑल्ट न्यूज़ जैसे पत्थर को बटुआ साबित करने वाले लोग दंगों के बाद, सब कुछ शांत हो जाने के भी दस दिन बाद घटनास्थल से अपनी सुविधानुसार कुछ घटनाओं को ले आते हैं और उन्हें ‘फैक्ट चेक’ का नाम देते हैं।

आखिरकार न्यूज़लॉन्ड्री अपने चिरपरिचित वामी शगल पर लौटते हुए वही लाइने लिखते हैं, जिस एक लाइने से सैकड़ों लिब-लेफ्ट विचारकों’ को सेकंड भर में स्खलन हो आता है ,यह लाइन है- ‘मंदिर की रक्षा मुस्लिमों ने की।’

खैर, न्यूज़लॉन्ड्री एक बार खुद ही स्वयं पर चुटकुला बनाते हुए नजर आता है। यदि न्यूज़लॉन्ड्री के कारोबार पर नजर डालें तो आपको कारोबार की जगह ‘औकात’ जैसी चीजें नजर आती हैं। हालाँकि, औकात जैसे शब्दों का प्रयोग निंदनीय है लेकिन जिस तरह से ये मीडिया गिरोह हिन्दुओं के साथ हुई बर्बरता को अपने ‘फैक्ट चेक’ से छुपाने का प्रयास करते नजर आ रहे हैं, इससे बेहतर विशेषण शायद ही कोई और बचता हो।

न्यूज़लॉन्ड्री की वेबसाइट ट्रैफिक देखने से पता चलता है कि इनकी खबरों को पढ़ने वाले लोगों की संख्या इनके पूरे स्टाफ से भी कम है। ऐसे में मीडिया के नाम पर जीवंत चुटकुला बन चुके न्यूज़लॉन्ड्री की इस ‘पड़ताल’ को कितनी गंभीरता से लिया जाना चाहिए वह हम सभी जानते हैं।

फिर भी, अरविन्द केजरीवाल के साथ तस्वीरें सामने आने के बाद खबरों की धुलाई करने का दावा करते हुए रोजाना अपने अखरोट छिलवाने वाले न्यूज़लॉन्ड्री के फाउंडर जरूर इस बात पर ध्यान दें कि उनकी पहली लड़ाई अपने अस्तित्व से है। ऑपइंडिया की लोकप्रियता से बौखलाने से पहले उसे अपनी पत्रकारिता के मानक रवीश कुमार जैसों की गोद से उतरकर उनसे पूछना चाहिए कि अनुराग मिश्रा का क्या हुआ? उन्हें क्रूरता से चार सौ बार चाकू गोदकर मार दिए गए आईबी अधिकारी अंकित शर्मा के घरवालों से बयान लेने जाना चाहिए। अगर वो इन लोगों के परिवार वालों को ढूँढने में सहायता चाहते हैं तो खुलकर हमसे सम्पर्क करें, हम उन्हें पीड़ितों के परिवारों तक ले जाने को तैयार हैं।

सस्ते दैनिक इंटरनेट से तैयार किए जा रहे न्यूज़लॉन्ड्री जैसे इंटरनेट आतंकी ग्राउंड रिपोर्ट में इस्तेमाल किए गए शब्दों को गिनने से पहले अपने अस्तित्व पर एक नजर डालकर जरूर अपना आँकलन करे। उसे देखना चाहिए कि जिनका पूरा अस्तित्व ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट्स को गलत साबित करना रह गया हो, और अब उनके नाम को इस्तेमाल कर अपनी प्रासंगिकता बचाए रखना चाहता हो, क्या वह इस काबिल भी है कि मृतक दिलबर नेगी के परिवार से बात कर सके? वही बीस साल का दिलबर नेगी जिसको आग में झोंकने से पहले दंगाइयों ने उसके हाथ-पैर काट डाले थे।

दिल्ली पुलिस के हेड कॉन्स्टेबल रतन लाल के घर जाकर भी इन फैक्ट चेकर पतझड़ कुमारों को एक रिपोर्ट तैयार करनी चाहिए और ऑपइंडिया की तरह ही पूरी हिम्मत के साथ लिखना चाहिए कि रतनलाल को मारने वाली गोली किसी मोहम्मद शाहरुख़ की ही बन्दूक से निकली होगी या उन पत्थरों में से ही कोई एक पत्थर हेड कॉन्स्टेबल रतन लाल की जान लेने को निकला था, जो ताहिर हुसैन के घर से बरामद हुए। जो चाँदबाग में चले।

लेकिन आसमानी गुलेलों और पेट्रोल बम की पड़ताल करना न्यूज़लॉन्ड्री जैसों के लिए अपने अन्नदाताओं को निराश करने वाली बात होगी। इसलिए अपने अन्नदाताओं के खिलाफ जाकर पतझड़ कुमार को कोई कदम नहीं उठाना चाहिए, ऐसा न हो कि उनके खिलाफ जाते ही भारत में बेरोजगारी के आँकड़ों में पतझड़ कुमार भी योगदान करते हुए नजर आएँ।

फिर भी, सबसे पहली प्राथमिकता पतझड़ कुमार को अपनी मानसिक भगंदर को देनी चाहिए, इसके लिए उन्हें ग्राउंड रिपोर्टिंग में इस्तेमाल किए गए शब्द गिनकर नहीं बल्कि हकीम लुकमान के पास जाना चाहिए, ज़ुबैर के पास नहीं, वो ‘पिंचर’ बनाता है और पुरानी पिंचर ट्यूब बदलता है। हकीम का काम आज भी लुकमान ही करता है। और हाँ ,जलो मत, बराबरी करो।

चलते-चलते शिव मंदिर पर क्या हुआ था, उससे सम्बंधित कई बयान हमारे पास मौजूद हैं, कुछ ने वीडियो पर बोला, कुछ के ऑडियो हैं। और कुछ के हम दिखा नहीं सकते क्योंकि वे अभी भी डरे हुए हैं और उन्होंने अपनी पहचान छिपाने की बात कई बार दोहराई है।



 

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आशीष नौटियाल
पहाड़ी By Birth, PUN-डित By choice

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